19वीं सदी के जर्मन फलसफियों में एक नाम है जिसे नजरअंदाज करना समझ लें नामुमकिन है। आर्थर शोपनह हावर और इसकी वजह वजह यह है कि उनका फलसफा सीधे-सीधे लफ्जों में कहें तो काफी ना खुशगवार है। शोपन हावर कैसे इंसान थे? इसका अंदाजा बस उनके इस एक जुमले से हो जाता है। अपने दौर के सबसे मशहूर फिलॉसफर हेगिल के बारे में वह कहते हैं कि मैं मुस्तकबिल के लोगों से हेगिल का जिक्र करने पर माज़रत चाहता हूं। एक ऐसा फिलॉसफर जिसके बारे में उन्होंने कभी सुना ही नहीं होगा। सोचिए जरा इससे उनके तल्ख मिजाजी और तकब्बुर
का कितना साफ पता चलता है। जी हां, उनके फलसफे को मेटाफिजिक्स फ्रॉम हेल यानी जहन्नुम से आई माबादो तबियात तक कहा गया है। और सच पूछे तो यह नाम बिल्कुल गलत भी नहीं है। यह दुनिया का एक ऐसा तारीख लेकिन लेकिन बहुत गहरा नजरिया है जो सीधा उनकी अपनी दुख भरी जिंदगी से निकला है। अक्सर होता यह है कि हम फलसफियों के ख्यालात को उनकी जिंदगी से अलग करके भी समझ सकते हैं। लेकिन शोपन हावर के साथ यह मुमकिन ही नहीं है। उनका फलसफा असल में उनकी अपनी ही कहानी है। तो चलिए देखते हैं कि
आखिर यह कहानी थी क्या? उनकी जिंदगी शुरू से ही आप समझ लें मुसीबतों का एक सिलसिला थी। वालिद ने खुदकुशी कर ली। मां के साथ रिश्ता इतना सर्द मोहर था कि बस आखिरकार उन्हें घर से ही निकाल दिया गया। उसके बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगभग मुकम्मल तन्हाई में गुजारी। और तो और जब उन्होंने यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया तो पता है क्या किया? जानबूझकर अपने लेक्चर्स हेगल के लेक्चर के वक्त पर रखे। नतीजा एक स्टूडेंट भी नहीं आया उनके क्लास में। तो इन सब वाक्यात ने मिलकर इनकी सोच को वो मायूस कु शक्ल दी
जिसे आज हम पढ़ते। तो सवाल यह है कि इतनी तल्ख जिंदगी से आखिर कैसा फलसफा जन्म ले सकता है? देखें शोपेन हावर अपने फलसफे की शुरुआत एक और अजीम जर्मन फिलॉसफर इमैनुअल कांट के ख्यालात से करते हैं। लेकिन वो कांट के ख्याल को लेते हैं और उसे एक बिल्कुल नई और कहीं ज्यादा खौफनाक सिमट में मोड़ देते हैं। शोपेन हावर को समझने के लिए पहले कांट को समझना जरूरी है। कांट से पहले ह्यूम जैसे फिलॉसफी सोचते थे कि हमारा जहन एक खाली स्लेट जैसा है जिस पर दुनिया अपने तजुर्बात लिखती है। लेकिन कांट ने कहा
नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है। उनके मुताबिक हमारा ज़हन एक फाल मेमार की तरह है जो बाहर से आने वाली मालूमातों को अपनी अंदरूनी साख्त जैसे स्पेस और टाइम के कवानीन के मुताबिक ढालता है। इसका मतलब क्या हुआ? मतलब यह कि हम दुनिया को वैसी नहीं देखते जैसी वह असल में है। बिल्कुल नहीं। हम उसे अपने जेहन की बनी हुई ऐनक से देखते हैं। कंड के मुताबिक यह बिल्कुल ऐसा है जैसे हम एक कमरे में कैद हैं और दुनिया को सिर्फ एक खिड़की से देख सकते हैं। हम कभी बाहर जाकर असल हकीकत को छू ही नहीं
सकते। हम हमेशा अपने ज़हन की इस कैद में रहते हैं। अब शोपेन हावर यहां तक तो कांड से बिल्कुल मुत्तफिक हैं। वह मानते हैं हां बिल्कुल सही। हम अपने ज़हन की कैद में हैं। लेकिन फिर वह एक ऐसा मोड़ लाते हैं जो सब कुछ बदल देता है। वो कहते हैं कि इस कैदखाने की दीवार में एक छोटी सी दार है। एक ऐसा रास्ता है जिससे हम इस असल हकीकत की एक झलक देख सकते हैं। तो वो दरार आखिर है क्या? वही शोपेन हावर का सबसे बड़ा और सबसे असली तस्सवुर है। एक बेलगाम कुत जिसे वह
द विल यानी इरादा कहते हैं। अब यह इरादा वो नहीं है जो हम आमतौर पर सोचते हैं। जैसे कि मेरा इरादा है कि मैं यह काम करूं। बिल्कुल नहीं। यह एक अंधी, बेमकसद और हर चीज के अंदर मौजूद एक कुत है। यह कायनात की बुनियाद में एक मुसलसल जुद्दोजहद है। पौधे का सूरज की तरफ पड़ना, जानवर का शिकार करना और इंसान की कभी ना खत्म होने वाली ख्वाहिशें यह सब कुछ इसी एक इरादे के अलग-अलग रूप। तो फिर सवाल उठता है कि हमारी अकल, हमारा शूर कहां गया? शोपनर के मुताबिक हमारी अकल एक अंधे ताकतवर
घोड़े पर बैठे एक लंगड़े सवार जैसी है। सवार समझता है कि वह रास्ता दिखा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि यह बेलगाम घोड़ा यानी इरादा उसे जहां चाहे घसीट कर ले जा रहा है। हमारी सारी मंतिक हमारे सारे फैसले उस बुनियादी कुत के गुलाम हैं। तो इसका हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ता है? जनाब, असर बहुत ही भयानक है। हम बुनियादी तौर पर ख्वाहिश करने वाली मशीनें हैं। जिन्हें यह इरादा चला रहा है और ख्वाहिश का मतलब ही है कमी, एक खालीपन। जब हम कोई ख्वाहिश पूरी करते हैं तो यह खारिश खुजानी जैसा है।
चंद लम्हों का सुकून और फिर एक नई ख्वाहिश पैदा हो जाती है। यह चक्कर कभी खत्म ही नहीं होता और इसीलिए शोपिन हावर कहते हैं कि जिंदगी दुख है और बेहतर यही होता कि हम पैदा ही ना हुए होते। तो क्या इस दुख के चक्कर से निकलने का कोई रास्ता है भी या नहीं? शॉपिन हावर के नजदीक मुकम्मल निजात तो शायद मुमकिन नहीं। लेकिन हां इस कैद से वक्त तौर पर फरार के कुछ रास्ते जरूर मौजूद हैं। पहला रास्ता है आर्ट यानी जमालियात का। जब हम किसी पेंटिंग में खो जाते हैं या कोई मौसी सुनते
हैं तो कुछ लम्हों के लिए हम अपनी ख्वाहिशात अपनी मैं को भूल जाते हैं। हम सिर्फ एक खालिस मुशाहिद बन जाते हैं। और मौसी तो उनके ख्याल में खुद इस कायनाती इरादे की बराहेरा नकल है। दूसरा रास्ता है अखलाकियात का यानी हमदर्दी। जब हम किसी दूसरे के दुख को इतनी शिद्दत से महसूस करते हैं कि अपनी अना की दीवारें टूट जाती हैं तो हम समझ जाते हैं कि असल में हम सब एक ही दुख में शरीक हैं। लेकिन यह सब तो वक्त यानी आरजी हल थे। एक ज्यादा मुस्तकिल हल के लिए शोपिन हावर एक इंतहाई
रास्ता बताते हैं। तर्क दुनिया और तसवुफ यानी अपनी तमाम ख्वाहिशात को खत्म कर देना। अपने अंदर के इरादे को ही मुकम्मल तौर पर फना कर देना। उनके नजदीक यही इंसानी जिंदगी की सबसे बुलंद और सबसे पुरसुकून हालत थी। अब शायद यह सवाल जेहन में आए कि इतना मायूस कुन फलसफा आखिर पढ़ेगा कौन? लेकिन हैरानी की बात यह है कि शोपिनहावर का फलसफा जदीद सोच पर सबसे ज्यादा असर अंदाज होने वाले फलसफों में से एक है। चलिए देखते हैं कि इसकी असल मिराज क्या है। जरा इनके इरादे के तसवुर पर गौर करें। यही तसवुर आगे चलकर
नीचे के हां कुत का इरादा या विल टू पावर बन गया। और फिर सिगमंड फ्रॉयड ने इसी ख्याल को एक साइंसी जबान देकर लाशूर या द एड का नजरिया पेश किया। मतलब 20वीं सदी की पूरी नफसियात की बुनियाद इसी एक ख्याल पर रखी गई। और असर सिर्फ यहीं तक महदूद नहीं था। मुसीकार, रिचर्ड वेगना, अदीप, फ्रांस कैफका और यहां तक के फलसफी लडविक विगनंस्टाइन तक सब के सब शोपिन हावर से गहराई में मुतासिर थे। एक ऐसे शख्स के लिए जो अपनी जिंदगी में तकरीबन गुमनाम रहा। यह वाकई एक नाकाबिल यकीन मेरा है। तुक शोपनह हावर
की नजर में यह दुनिया कैसी है? उनके एक खामासर फलसफी थे लाइबिस जिन्होंने कहा था कि यह दुनिया तमाम मुमकिना जहानों में से बेहतरीन है। शोपेनहावर ने इसका जवाब अपने मखसूस तल्ख अंदाज में दिया। उन्होंने कहा यह तमाम मुमकिना जहानों में से बदतरीन है। अगर यह इससे जरा सा भी बदतर होती तो इसका वजूद ही ना होता। तो इस सारी तारीख और मायूसक कहानी से हमें क्या सबक मिलता है? शायद वही बुनियादी बात जिससे शोपनह ने शुरुआत की थी कि हम दुनिया को वैसी नहीं देखते जैसी वो है बल्कि वैसी देखते हैं जैसे हम हैं।
या जैसा कि शायद टीएस एलियट की एक लाइन है जो इस सबको समेट लेती है कि शायद गुलाब के फूलों में उन फूलों की सी झलक थी जिन्हें देखा जा रहा था।