से हालेलुया से एक ऐसा इंसान जिसके शब्दों से मुर्दे जिंदा हुए एक ऐसा इंसान जिससे परमेश्वर ने खुद बात की जिसे एक घाटी में ले जाया गया जहां सिर्फ सूखी हड्डियां थी और तब एक आवाज गूंजी इन सूखी हड्डियों से कह दे यह जीवित हो जाए। जैसे ही उसने बोला हड्डियां हिलने लगी मौत पीछे हट गई जिसके शब्दों से सूखी हड्डियों में नसे उभरने लगी मांस चढ़ने लगा और जीवन लौट आया और उसका नाम था यहेज के यहज केल कोई भविष्यवक्ता नहीं था। वह कोई महान राजा भी नहीं था। वह बस एक युवा याजक था।
एक निर्वासित एक टूटा हुआ मनुष्य जो बाबुल की भूमि में केबर नदी के किनारे बैठा था। यरूशलेम उससे बहुत दूर था। मंदिर जिसमें वह सेवा करने का स्वप्न देखता था। अब केवल स्मृति बन चुका था। उसका भविष्य धुंधला था और उसका हृदय आशा व निराशा के बीच झूल रहा था। यह लेवी के वंश से था। यदि यरूशलेम खड़ा होता तो वह शीघ्र ही परमेश्वर के मंदिर में सेवा करता। पर अब नगर उजड़ चुका था। लोग बंधुई में थे और परमेश्वर मौन था। दिनों तक वह नदी के किनारे बैठा रहता। वहां बुजुर्ग अपने अतीत को याद
करते। युवक भविष्य से डरते और याजक उत्तर खोजते। एक दिन उसकी पत्नी दबोरा ने कहा यहकल तुम चुप क्यों रहते हो? लोग उत्तर चाहते हैं। क्या तुम याजक नहीं हो? किस बात का याजक? देबुरा मंदिर नष्ट हो चुका है। हम सब कुछ खो चुके हैं। मैं उन्हें क्या दे सकता हूं? उसी समय एक बुजुर्ग साधुओं के पास आया। कहा जाता है कि यरमाया अभी भी यरूशलम में है। न्याय पूरा नहीं हुआ। परमेश्वर अपने घर को नाश्त नहीं करेगा। यह हिचकेल चुप रहा। वह भीतर से जानता था कुछ भयानक अभी बाकी है। और तभी अचानक आकाश
खुल गया। उत्तर दिशा से एक भीषण तूफान उठा। घने बादल, आग की लपटें और ऐसा शब्द जैसे सेना कूच कर रही हो। यह हिचकेल ने ऊपर देखा और वह दृश्य जिसे किसी मनुष्य ने पहले कभी नहीं देखा था। उसकी आंखों के सामने था। चार जीवित प्राणी, हर एक का चेहरा अलग। मनुष्य, सिंह, बैल और उका। चार पंख और चमकते हुए पांव जैसे तपाया हुआ काम सा उनके पास पहहिए थे। पहियों के भीतर पहिए और उन पहियों पर अनगिनत आंखें। वे बिना मुड़े हर दिशा में चलते थे। उनके ऊपर एक चमकदार आकाश था और उसके ऊपर
एक सिंहासन। सिंहासन पर एक मनुष्य के समान आकृति आग के समान चमकती हुई और उसके चारों ओर मेघनुष वाचा का चिन्ह यह हिच खेल भूमि पर गिर पड़ा। उसका शरीर कांप रहा था। तभी वह आवाज फिर आई। हे मनुष्य के पुत्रा खड़ा हो मैं तुझसे बातें करूंगा। यहिष्ेल कांपते हुए बोला प्रभु मैं कोई भविष्यवक्ता नहीं हूं। मैं योग्य नहीं हूं। परमेश्वर ने कहा मैं अपने वचन तेरे मुख में रखूंगा। मैं तुझे एक हठी जाति के पास भेजता हूं। चाहे वे सुने या ना सुने। तू बोलेगा। तभी परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाया। उसमें एक पुस्तक पत्र
था। वह दोनों ओर लिखा हुआ था। विलाप दुख और न्याय से भरा हे मनुष्या के पुत्रा इसे ले और खा। यहकेल ने कांपते हाथों से उसे लिया और खा लिया। वह न्याय से भरा था। फिर भी उसके मुंह में शहद सा मीठा लगा क्योंकि वह परमेश्वर का वचन था। दृश्य समाप्त हुआ। आकाश बंद हो गया। यह हिचकेल फिर धरती पर था। दबोरा और साधुक उसे घूर रहे थे। तुमने क्या देखा? मैंने प्रभु को देखा और उसने मुझे भेजा है। अब वह केवल याजक नहीं था। वह भविष्यवक्ता बन चुका था और उसका मिशन अभी शुरू ही
हुआ था। यह खेल अब चुप नहीं रह सकता था। जिस परमेश्वर ने स्वर्ग को खोलकर उससे बात की थी, उसकी आग अब उसके हृदय में जल रही थी। वह जानता था, यदि वह बोलेगा, तो लोग घृणा करेंगे। यदि वह चुप रहेगा, तो वह परमेश्वर के सामने दोषी ठहरेगा। उस शाम बाबुल की बस्ती में आग जल रही थी। निर्वासित लोग गोल घेरा बनाकर बैठे थे। कुछ बीते दिनों की बातें कर रहे थे। कुछ यरूशलेम की दीवारों को याद कर रहे थे और कुछ अब भी यही मान रहे थे कि यह बंधुआई थोड़े समय की है। तभी
यह हिजकेल आगे बढ़ा। उसकी आंखों में भय नहीं था। बस एक भारी सच्चाई। हे इजराइल के घराने उसने ऊंचे स्वर में कहा प्रभु यहोवा ने मुझसे कहा है तुम्हारा नगर नष्ट होगा। मंदिर अपवित्र किया जाएगा। तलवार, अकाल और महामारी आएंगी क्योंकि तुमने वाचा को तोड़ा है। एक सन्नाटा छा गया। फिर फुसफुसाहट और फिर क्रोध। साधोक खड़ा हुआ। यह झूठ है। परमेश्वर अपने ही घर को कैसे नष्ट कर सकता है? क्या उसने दाऊद से वादा नहीं किया था? कुछ लोग हिले, कुछ डरे, कुछ ने यरम्याह का नाम लिया। उसने भी यही कहा था। यह हिजकेल समझ
गया। शब्द पर्याप्त नहीं होंगे। और तभी प्रभु का वचन उसके पास आया। तू केवल बोलेगा नहीं। तू चिन्ह दिखाएगा। अगली सुबह लोग चौंक गए। यह हिजकेल भूमि पर लेटा हुआ था। एक ओर करवट लिए। ना हिलता ना बोलता। दिन बीत गया। वह वहीं पड़ा रहा। यह हिजकेल उठो। क्या बीमार हो? पर वह नहीं उठा। जब कई दिन बीत गए तो उसने कहा प्रभु ने मुझे आज्ञा दी है कि मैं इस ओर 390 दिन लेटा रहूं। इजराइल के पाप के वर्षों के लिए लोग हंसे पागल हो गया है। पर वह दिन-दिन वहीं पड़ा रहा। धूप में
धूल में लोगों की नजरों में जब 390 दिन पूरे हुए तो वह दूसरी ओर मुड़ गया। अब यहूदा के लिए 40 दिन अब हंसी कम हो गई। डर बढ़ने लगा। फिर एक और दृश्य यहिच केल रोटी बना रहा था। पर जिस ईंधन पर वह रोटी पका रहा था, उसे देखकर लोगों का चेहरा सहर उठा। यह अशुद्ध है। यह अपमान है। यहजकेल बोला, यरूशलेम में जो बचे रहेंगे, वे ऐसी ही अशुद्ध रोटी खाएंगे क्योंकि परमेश्वर ने अपना अनुग्रह हटा लिया है। एक स्त्री रो पड़ी। क्या कोई आशा नहीं? यजकेल ने धीरे से कहा, पश्चाताप की पर
वे सुनेंगे नहीं। कुछ दिन बाद लोगों ने उसे एक तेज तलवार के साथ देखा। वह चुपचाप अपने सिर और दाढ़ी के बाल काट रहा था। फिर उसने बालों को तीन भागों में बांटा। एक भाग उसने आग में जला दिया। दूसरे को तलवार से काटा, तीसरे को हवा में उड़ा दिया। यह क्या है? लोग फुसफुस। यह हिचकेल बोला, "यह रूशलेम का यही अंत है। एक तिहाई अकाल से मरेगी, एक तिहाई तलवार से और एक तिहाई राष्ट्रों में तितर-बितर होगी। पर थोड़े से बहुत थोड़े बचाए जाएंगे। अब कोई नहीं हंस रहा था। पर अभी भी बहुतों ने
विश्वास नहीं किया। और फिर एक रात परमेश्वर की आत्मा यहिजकेल पर आई और वह दर्शन में यरूशलेम पहुंचाया गया। जो उसने देखा वह उससे भी भयानक था। मंदिर के भीतर मूर्तियां याजक सूर्य की पूजा करते हुए बुजुर्ग झूठे देवताओं के लिए धूप जलाते हुए स्त्रियां तंबूज के लिए विलाप करती हुई हे प्रभु वापस आ जाओ हमें छोड़कर मत जाओ यह हिजकेल कांप उठा यह तो प्रभु का घर है तभी परमेश्वर बोला क्या तू देखता है उन्होंने मेरे घर के साथ क्या किया है और फिर अकल्पनीय परमेश्वर की महिमा पवित्र स्थान से उठी मंदिर के द्वार
तक गई और वहां ठहर गई मानो मानो अंतिम अवसर दे रही हो पर कोई नहीं बदला। फिर महिमा नगर की दीवारों को पार कर गई। जैतून पर्वत पर ठहरी और फिर आकाश में विलीन हो गई। यह रो पड़ा। हे प्रभु हमें इस तरह अकेला मत छोड़। हम अब भी तेरे हैं। पर उत्तर आया। उन्होंने अपना निर्णय स्वयं चुना है। कुछ ही सप्ताह बाद बाबुल से समाचार आया। नबूक दिनेश्वर की सेना यरूशलेम पर टूट पड़ी। अकाल ने नगर को खा लिया। उच्च लोग अपने घरों में मर गए। याजकों ने पुकारा हे प्रभु हमें बचा। हमारी पुकार
सुन। पर स्वर्ग मौन रहा और जब दीवारें टूटी तो आग भड़क उठी। मंदिर लूटा गया। वेदी तोड़ी गई। स्तंभ गिरा दिए गए और प्रभु का घर लपटों में समा गया। ये रूशलेम समाप्त हो चुका था। साधु रोता हुआ यह एजकेल के पास आया। तुम सही थे। परमेश्वर ने हमें छोड़ दिया। नहीं हमने पहले उसे छोड़ा। अब कोई राजा नहीं था। कोई मंदिर नहीं, कोई नगर नहीं। इसराइल मानो मर चुका था। पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती क्योंकि न्याय के बाद अब भी एक नई सुबह क्षितिज पर उग रही थी। यरूशलेम गिर चुका था। मंदिर राख
बन चुका था। इजराइल की पहचान मिट चुकी थी। बाबुल की धरती पर निर्वासित लोग अब खुलकर रोते थे। अब कोई भ्रम नहीं बचा था। कोई यह नहीं कहता था कि हम शीघ्र लौट आएंगे। हर आंख में एक ही प्रश्न था। क्या परमेश्वर ने हमें सदा के लिए त्याग दिया है? दिन बीतते गए। लोग मरते गए। कुछ बीमारी से, कुछ परिश्रम से और कुछ निराशा से। यह हिजकेल अब भी जीवित था। पर उसका हृदय भारी था। उसने न्याय देखा था। उसने आग देखी थी। उसने परमेश्वर की महिमा को जाते देखा था और अब वह प्रतीक्षा कर
रहा था। हे प्रभु क्या बस यही आंत है? क्या हम फिर कभी उठेंगे? तभी परमेश्वर का वचन आया। हे मनुष्य के पुत्र मेरे साथ चल। एक क्षण में यह हिजकेल आत्मा में उठा लिया गया। जब उसने आंख खोली तो वह एक निर्जन स्थान में खड़ा था। चारों ओर हड्डियां अनगिनत हड्डियां सूखी टूटी हुई बिखरी हुई। कोई कब्र नहीं कोई नाम नहीं। बस मृत्यु यह इजराइल था। यह हिजकेल हड्डियों के बीच चला। हर कदम एक इतिहास की याद दिला रहा था। राजा, याजक, बालक, माताएं, सैनिक सब समाप्त। तभी परमेश्वर की आवाज आई। मानुष्या के पुत्र, क्या
यह सूखी हड्डियां फिर से जिंदा हो सकती हैं? यह हिजकेल ठिठक गया। उसने चारों ओर देखा। तर्क कहता था, नहीं पर विश्वास कुछ और। उसने झुक कर कहा, हे प्रभु यहोवा, तू ही जानता है। इन हड्डियों से भविष्यवाणी कर कहा। हे सूखी हड्डियों यहोवा का वचन सुनो मैं तुम पर मांस चढ़ाऊंगा। मैं तुम्हें त्वचा से ढक दूंगा और तुम जीवित हो जाओगी। यह जगल ने कांपते स्वर में बोलना शुरू किया और तभी एक शब्द उठा। खड़खड़ाहट हड्डियां हिलने लगी। वे एक दूसरे की ओर बढ़ी जुड़ने लगी। नसें उगा आई। मांस चढ़ गया। त्वचा उड़ गई।
पूरी देहें खड़ी थी। पर उनमें जीवन नहीं था। फिर प्रभु बोला, "आत्मा से भविष्यवाणी कर। कह हे आत्मा चारों दिशाओं से आ और इन मरे हुए में फूंक मार। यह हिजकेल ने आज्ञा मानी और हवा चली। प्राणवायु ने देहों को भर दिया। वे उठ खड़ी हुई एक विशाल सेना जीवित। परमेश्वर ने कहा यह हड्डियां और इजराइल का घराना है। वे कहते हैं हमारी आशा नष्ट हो गई। पर मैं तुम्हें जीवित करूंगा। मैं तुम्हें तुम्हारे देश में लौट आऊंगा और अपनी आत्मा तुम्हारे भीतर डालूंगा। यह की आंखों से आंसू बह निकले। यह केवल वापसी की बात
नहीं थी। यह पुनर्जन्म था। फिर प्रभु ने और कहा, पर समस्या तुम्हारे शत्रु नहीं थे। समस्या तुम्हारा हृदय था। मैं तुम्हें नया हृदय दूंगा। पत्थर का हृदय निकाल दूंगा। मांस का हृदय दूंगा और अपनी व्यवस्था तुम्हारे भीतर लिखूंगा। यह केवल नगर का पुनर्निर्माण नहीं था। यह आत्मा का परिवर्तन था। फिर यह हिजकेल ने एक और दर्शन देखा। दो लकड़ियां, एक यहूदा की, एक इसराइल की। परमेश्वर ने कहा, इन्हें एक कर और वे एक हो गई। अब वे दो नहीं एक होंगे और उन पर एक राजा होगा। मेरा सेवक दाऊद उनका राजा होगा। वह सदा राज्य
करेगा। मैं उनसे सदा की वाचा बांधूंगा। यह हिजकेल समझ गया। यह केवल अतीत की वापसी नहीं थी। यह भविष्य का वादा था। एक ऐसा राजा जो कभी ना मरे। एक ऐसा राज्य जो कभी ना टूटे। जब दर्शन समाप्त हुआ यह हिचकेल अब निराश नहीं था। उसने मृत्यु देखी थी। पर उसने जीवन को उससे भी बड़ा देखा था। उसने समझ लिया परमेश्वर का अंतिम शब्द कभी विनाश नहीं होता। जहां हड्डियां हैं वहां भी परमेश्वर श्वास भर सकता है और इसराइल जो मरा हुआ प्रतीत होता था फिर जी उठेगा। क्योंकि जब परमेश्वर बोलता है तो असंभव भी
आज्ञाकारी हो जाता है। यरूशलेम अब भी खंडर था। मंदिर की जगह पर केवल राख और पत्थर बचे थे। इजराइल अब भी बंदी था। समय बीत रहा था 25 वर्ष। बहुतों ने यह मान लिया था कि परमेश्वर की उपस्थिति अब इतिहास बन चुकी है कि वह कभी लौट कर नहीं आएगा। पर यहकेल जानता था परमेश्वर का मौन अनुपस्थित ही नहीं होता। एक सुबह जब सब कुछ सामान्य लग रहा था यहल पर प्रभु का हाथ आया और वह आत्मा में उठा लिया गया। जब उसने आंखें खोली तो वह एक ऊंचे पर्वत पर खड़ा था। उसके सामने एक
विशाल नगर पर नगर से भी अधिक उसके केंद्र में एक मंदिर था। यह सुलेमान का मंदिर नहीं था। यह उससे भी अधिक भव्य था। पूर्ण निर्दोष पवित्र यह हिचकेल फुसफुसाया हे प्रभु यह क्या है? तभी एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। उसके हाथ में मापने की रस्सी थी। उसने कहा जो कुछ तू देखता है उसे ध्यान से देख। और इजराइल से कह यह खेल मंदिर के द्वारों से गुजरा। प्रांगण विशाल थे। वेदी केंद्र में खड़ी थी। हर माप सटीक हर पत्थर पवित्र पर सबसे आश्चर्यजनक अब होना था। अचानक पूरब की ओर से एक गर्जना उठी। ऐसी
ध्वनि जैसे बहुत जल गरजते हुए आकाश चमक उठा। धरती कांप गई और फिर वह महिमा जिसे यहकेल ने जाते देखा था। लौट आई। परमेश्वर की महिमा पूरब से आती हुई मंदिर में प्रवेश कर गई। यह खेल भूमि पर गिर पड़ा। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे क्योंकि वह समझ गया यह वह क्षण था जिसकी उसने वर्षों प्रतीक्षा की थी। प्रभु ने कहा हे मनुष्य के पुत्र यही मेरे सिंहासन का स्थान है। यहीं मैं सदा निवास करूंगा। इसराइल फिर कभी मेरे नाम को अपवित्र नहीं करेगा। महिमा लौट आई थी। पर दर्शन समाप्त नहीं हुआ। यहकेल ने
देखा मंदिर की दहली से पानी बह रहा था। पहले एक छोटी धारा फिर घुटनों तक फिर कमर तक और फिर एक ऐसी नदी जिसे पार नहीं किया जा सकता। वह नदी रेगिस्तान की ओर बह रही थी। जहां-जहां वह पहुंची मृत भूमि जीवित हो गई। पेड़ उग आए फल लगे। पत्तियां औषधि बन गई। यहां तक कि मृत सागर का खारा जल मीठा हो गया। मछलियां उभर गई। जीवन फूट पड़ा। प्रभु ने कहा जहां यह नदी पहुंचेगी वहां जीवन होगा। यह जल चंगा करेगा। यह खेल स्तब्ध था। यह कोई साधारण नदी नहीं थी। यह जीवन की नदी
थी। परमेश्वर की उपस्थिति से बहती हुई। फिर प्रभु ने कहा, मैं तुम्हें वापस लाऊंगा। मैं तुम्हें नया हृदय दूंगा। और यह नगर अब केवल यरूशलेम नहीं कहलाएगा। इसका नाम होगा यहोवा वहां है। यह खेल समझ गया। यह मंदिर केवल पत्थरों का नहीं था। यह एक संकेत था। एक ऐसा समय आने वाला था जब परमेश्वर पत्थर के मंदिरों में नहीं मनुष्यों के हृदयों में वास करेगा। जब उसकी आत्मा हर विश्वास करने वाले में होगी। जब पूरी पृथ्वी उसकी महिमा से भर जाएगी। दर्शन समाप्त हुआ। यह हिजकेल जागा। पर अब उसका हृदय बदल चुका था। उसने न्याय
देखा था। उसने मृत्यु देखी थी। पर अब उसने महिमा की वापसी देखी थी और वह जानता था। कहानी अभी समाप्त नहीं हुई। क्योंकि जहां महिमा लौटती है, वहां आशा कभी नहीं मरती। यह बहुत कुछ देख चुका था। उसने स्वर्ग को खुलते देखा था। उसने न्याय की आग को यरूशलेम को निगलते देखा था। उसने सूखी हड्डियों को जीवित होते देखा था और उसने वह मंदिर देखा था जहां परमेश्वर की महिमा फिर से वास करती है। अब वह वही व्यक्ति नहीं था जो कभी कई बार नदी के किनारे निराश होकर बैठा रहता था। उसकी आंखों में अब
भय नहीं था। उसके भीतर एक गहरी शांति थी क्योंकि वह जान गया था। परमेश्वर कभी असफल नहीं होता। इसराइल टूट चुका था। उसका राजा चला गया था। उसका नगर नष्ट हो चुका था। पर उसका परमेश्वर अब भी सिंहासन पर था। यजकेल ने अपने लोगों को देखा। कुछ अब भी शोक में डूबे थे। कुछ जीवन से थक चुके थे और कुछ ने पूरी तरह आशा छोड़ दी थी। और तब यहजकेल बोला हे इसराइल के घराने हम मरे हुए नहीं हैं। हम केवल दबे हुए हैं। जिसने हमें न्याय में गिराया वही हमें दया में उठाएगा। जिसने हमें
तितर-बितर किया वही हमें एक करेगा। उसने उन्हें याद दिलाया। परमेश्वर ने कभी यह नहीं कहा कि उसका अनुशासन ही अंतिम होगा। उसने हमेशा एक द्वार खुला रखा। यह स्केल जानता था। यह भविष्यवाणी केवल उनके समय के लिए नहीं थी। यह आने वाले युगों के लिए थी। एक दिन ऐसा आएगा जब परमेश्वर अपने लोगों को केवल एक देश में ही नहीं एक नई पहचान में बसाएगा। एक ऐसा राजा आएगा जो केवल दाऊद की गद्दी पर नहीं मनुष्यों के हृदयों पर राज्य करेगा। एक ऐसा चरवाहा जो भेड़ों के लिए अपना प्राण देगा। यह हिजकेल ने यह सब
स्पष्ट नहीं देखा। पर उसने उसका बीज देख लिया था। वह जान गया था। परमेश्वर का उद्देश्य सिर्फ इजराइल को लौटाना नहीं। मनुष्य को बदलना है। मंदिर गिर सकता है, नगर जल सकता है। राज्य समाप्त हो सकते हैं। पर वह स्थान जहां परमेश्वर वास करना चाहता है, वह मनुष्य का हृदय है। और जब हृदय बदल जाता है, तो इतिहास बदल जाता है। यहकेल की पुस्तक न्याय से शुरू होती है। पर आशा पर समाप्त होती है। क्योंकि परमेश्वर पाप से घृणा करता है। पर पापी से प्रेम करता है। वह दंड देता है। पर नाश के लिए नहीं
परिवर्तन के लिए। उसकी चुप्पी कभी त्याग नहीं होती और उसका न्याय कभी अंतिम शब्द नहीं होता। अंतिम शब्द हमेशा जीवन होता है। यहकेल की भविष्यवाणी आज भी गूंजती है। जब लोग कहते हैं सब समाप्त हो गया है तब परमेश्वर पूछता है क्या यह हड्डियां जीवित हो सकती हैं? जब विश्वास टूट जाता है तब उसकी आत्मा नया प्राण फूंकती है और जब मनुष्य हर आशा खो देता है तब परमेश्वर नई सृष्टि की शुरुआत करता है। यहज केल ने यह जानकर अपनी आंखें बंद की। उसका कार्य पूरा हो चुका था। उसने वह कहा जो कहना कठिन था।
उसने वह देखा जो किसी ने नहीं देखा था और उसने यह सिखाया कि परमेश्वर कभी अपने लोगों को नहीं छोड़ता। लोग उसे छोड़ सकते हैं। पर वह कभी नहीं। क्योंकि जहां मृत्यु का शासन होता है, वहां परमेश्वर जीवन लाता है। जहां अंधकार घना होता है, वहां उसकी महिमा और भी अधिक चमकती है। और एक दिन पूरी पृथ्वी उसकी उपस्थिति से भर जाएगी जैसे समुद्र जल से भरा रहता है। यही यहल की कहानी है न्याय की, पुन स्थापना की और अनंत आशा की और यह कहानी आज भी जीवित है क्योंकि परमेश्वर का वचन कभी खाली लौटता
नहीं।