हेलो फ्रेंड्स आज की इस वीडियो में हम लोग बात करने वाले हैं एडवेंटो यूरोपिय की हम लोग देखेंगे कि किस तरह 1498 में वास्कोडिगामा एक डायरेक्ट सी रूट को खोजते हुए इंडिया पहुंचा इस डायरेक्ट सी रूट की डिस्कवरी को एक लैंडमार्क डिस्कवरी के रूप में देखा जाता है और माना जाता है कि यही वह रीजन था जिसकी वजह से आगे चलकर इंडिया कॉलोनाइज हुआ तो यह तो हमें समझना ही होगा कि यह डिस्कवरी आखिर हुई कैसे बट इससे भी पहले हमारे सामने कुछ क्वेश्चंस हैं क्वेश्चन यह है कि यरो रोप से इंडिया जाने का यह
एक मात्र रास्ता थोड़ी ना है यूरोपियन मेडिटरेनियन सी को क्रॉस करके लैंड रूट के थ्रू भी इंडिया आ सकते थे और चाहते तो मेडिटरेनियन सी को क्रॉस करने के बाद रेड सी को क्रॉस करते और फिर अरेबियन सी के थ्रू भी इंडिया आ सकते थे और आप देख सकते हैं कि यह दोनों ही रूट्स उस रूट से काफी शॉर्ट है जिसे 1498 में वास्को डिगामा ने खोजा था तो फिर उन्हें अफ्रीका के नीचे से घूम के आने की जरूरत क्यों पड़ी तो चलिए शुरू करते हैं देखिए सिविलाइजेशन की शुरुआत से ही यूरोप और इंडिया के
बीच में ट्रेड की भी शुरुआत हो गई थी और हमेशा से ही यूरोपियन मार्केट में इंडियन गुड्स की डिमांड काफी ज्यादा रहती थी यह लोग भारत से प्रेशियस स्टोंस स्पाइसेज सिल्क और कैली सोल्स खरीदा करते थे कैली सोल्स मतलब कॉटन फैब्रिक तो यूरोप इन सब चीजों को भारत से खरीदता था और इसके बदले भारत को पैसा मिलता था यानी यह जो ट्रेड था वह यूरोप और इंडिया दोनों के लिए ही बेनिफिशियल था अब हुआ क्या कि 15 सेंचुरी में यूरोप इकॉनमी बहुत ही तेजी से बढ़ने लगी इसके पीछे का एक कारण यह था कि उन्होंने
बहुत सारे फॉरेस्ट को कट करके वहां पर भी कल्ट शुरू कर दिया था इसके अलावा उनके पास अब खेती करने के पहले से बेहतर तरीके आ चुके थे उनके पास पहले से बेहतर हल था और कई सारी साइंटिफिक टेक्निक्स जैसे कि क्रॉप रोटेशन को भी अब वह अपना चुके थे क्रॉप रोटेशन में होता यह है कि आप एक ही जमीन पर डिफरेंट सीजंस में डिफरेंट क्रॉप्स को कल्टटर हो इससे सोइल की फर्टिलिटी एनहांस होती है है कई बार क्रॉप रोटेशन सिस्टम में फोरेज क्रॉप्स जैसे कि लेगू मस और ग्रासेस को भी इंक्लूड कर लिया जाता
है इन फोरेज क्रॉप्स को कैटल और शीप्स के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है जिससे इन कैटल्स और शीप्स की हेल्थ इंप्रूव होती है और अल्टीमेटली वह नंबर्स में भी ग्रो होते हुए दिखते हैं तो अल्टीमेटली हम यह कह सकते हैं कि साइंटिफिक रोटेशन ऑफ क्रॉप की वजह से मीट की सप्लाई भी बढ़ती है और इस मीट को चाहे कुक करना हो या फिर प्रिजर्व करना हो दोनों ही चीजों के लिए स्पाइसेज यानी मसालों की जरूरत होती है तो इस पूरे डिस्कशन से आप इस बात को समझ पा रहे होंगे कि 15th सेंचुरी
के यूरोप को पहले से भी ज्यादा मसालों की जरूरत थी और यह मसाले अवेलेबल थे इंडिया में और 1450 तक इंडिया के साथ ट्रेड करने के लिए यूरोपियन जनरली दो ट्रेड रूट्स का इस्तेमाल कर रहे थे यह दोनों ही ट्रेड रूट्स मेडिटरेनियन सी के साथ कनेक्टेड थे पहले रूट को आप लैंड रूट कह सकते हैं यह पास होता था इराक ईरान और अफगानिस्तान से और दूसरा रूट पास होता था इजिप्त उसके बाद रेड सी और उसके बाद अरेबियन सी से बट प्रॉब्लम यह थी कि जो तुर्की वाला रीजन है यहां पर ऑटोमन तुर्क्स जो थे
वह 1450 के बाद बहुत ही ज्यादा पावरफुल होने लगे उन्होंने 1453 में कांस्टेंटिनॉपल को जीत लिया और इसके बाद वोह बहुत तेजी से एक्सपेंड करने लगे और आप देख सकते हैं कि 15th सेंचुरी के एंड होते-होते सिचुएशन यह हो गई थी कि यह दोनों ट्रेड रूट्स ऑटोमन तुर्क्स के कंट्रोल में आ चुके थे और प्रॉब्लम यह थी कि ऑटोमन तुर्क्स और यूरोप ं के संबंध अच्छे नहीं थे इनफैक्ट यह एक दूसरे के एनिमी थे और इसीलिए हम लोग कह सकते हैं कि 1453 यानी वह साल जब ऑटोमन तुर्क्स ने कांस्टेंटिनॉपल को जीता उसके बाद से
यूरोप और इंडिया के बीच में जितने भी ट्रेड रूट्स थे वह कट हो चुके थे और इसीलिए जरूरत थी एक ऐसे डायरेक्ट सी रूट की जिसके थ्रू यूरोपिय इंडिया तक पहुंच सके यानी अब अगर यूरोपीयंस को इंडिया तक पहुंचना है तो उन्हें अफ्रीकन कॉन्टिनेंट के बिल्कुल नीचे से घूम कर जाना होगा और यह एक बहुत ही मुश्किल काम था क्योंकि उस समय तक यह भी नहीं पता था कि अफ्रीकन कॉन्टिनेंट का जो सदर्न मोस्ट पॉइंट है वह कहां पर है तो डेफिनेटली यह काम मुश्किल तो था लेकिन इंपॉसिबल नहीं था उस समय तक पानी के
बड़े-बड़े जहाज बनने शुरू हो चुके थे इसके अलावा नॉटिकल इंस्ट्रूमेंट्स में भी काफी सारे साइंटिफिक इन्वेंशन हो चुके थे कंपास और एस्ट्रोलोक की मदद से नेविगेशन पहले से ज्यादा सेफ माना जा रहा था हालांकि ये जो कंपास और एस्ट्रो लोब है इन्हें यूरोपिय ने इन्वेंट नहीं किया था लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि लार्ज स्केल मेरीटाइम एक्टिविटीज में इनको यूरोपिय ने बहुत ही अच्छे से यूज किया तो यह जो मिशन है यूरोप से इंडिया तक के डायरेक्ट सी रूट को खोजना इस मिशन में यूरोप के दो देश लीड कर रहे थे यह दो
देश थे पोर्तुगीज शंस में यह दोनों देश यूरोप के बाकी सभी देशों से ज्यादा वेल इक्विप्ड माने जाते थे तो इसका मतलब यह हुआ कि इन दोनों देशों के बीच में अब एक तरह का कंपटीशन सा चल रहा था कि यूरोप और इंडिया के बीच में डायरेक्ट सी रूट कौन पहले खोजे का और क्योंकि अभी हम लोग बात कर रहे हैं 1450 की तो यह जो पोर्शन है जहां पर हमें वर्ल्ड मैप में नॉर्थ अमेरिका और साउथ अमेरिका दिख रहा है इसको हम लोग हाइड कर देते हैं क्योंकि 14550 तक यूरोपिय को पता ही नहीं
था कि इस तरह के दो कॉन्टिनेंट्स एजिस्ट भी करते हैं उनको लगता था कि वर्ल्ड का जो वेस्टर्न मोस्ट पॉइंट है वह है कैनरी आइलैंड्स कैनरी आइलैंड्स की लोकेशन आप यहां पर देख सकते हैं यह अफ्रीकन कॉन्टिनेंट में है तो चलिए सबसे पहले बात करते हैं पोर्च गल की और देखते हैं कि इस सी रूट को ढूंढने के लिए पोर्तुगीज एफर्ट्स किए तो जब भी सी रूट को डिस्कवर करने की बात आती है तो तीन पोर्तुगीज रूलरसोंग्स पोर्तुगीज रूलर थे वो थे जॉन सेकंड जिन्होंने 1481 से लेकर 1495 तक रूल किया चलिए सबसे पहले बात
करते हैं प्रिंस हेनरी की प्रिंस हेनरी जिन्हें द नेविगेटर भी कहा जाता है ऐसा माना जाता है कि प्रिंस हेनरी सोते उठते जागते हर वक्त यही डिस्कस करते थे कि किस तरह यूरोप से इंडिया डायरेक्ट सी रूट के थ्रू जाया जा सकता है यह इनका एक ऑब्सेशन बन चुका था और इस चीज को अंपलिफायर इंस्टीट्यूशन को भी एस्टेब्लिश किया था हर किसी को लगता था कि यह लड़का कुछ करके दिखाएगा और इसीलिए रोमन कैथोलिक चर्च के चीफ पोंटिफिकल 5थ ने 1453 में प्रिंस हेनरी को पपल बुल ग्रांट कर दिया यह पपल बुल बेसिकली एक तरह
का डिक्री या ऑर्डर था जिसमें प्रिंस हेनरी को यह राइट दिया गया था कि वह जैसे चाहे वैसे भारत तक का डायरेक्ट सी रूट खोजने की कोशिश कर सकते हैं प्रिंस हेनरी ने कई सारे पोर्च गीज नेविगेटर्स को स्पांसर किया उनको पेट्रोनस दी और उनको हर तरह की मदद प्रोवाइड की ताकि वह किसी भी तरह से अफ्रीकन कॉन्टिनेंट को सरकम वेंट करके भारत तक पहुंच सके बट इन सब प्रयासों के बावजूद प्रिंस हेनरी के जीते जी कोई भी पोर्च गीज नेविगेटर इक्वेटर तक भी नहीं पहुंच पाया इक्वेटर को भी वह पहली बार क्रॉस कर पाए
अल्फों सो फिफ्थ के रूल के दौरान जब 1471 में एक पोर्तुगीज नेविगेटर ने फाइनली इक्वेटर को क्रॉस किया इसके बाद पोर्तुगीज के इस मिशन में एक मेजर ब्रेक थ्रू तब आया जब किंग जॉन से ने जिन्होंने 1481 से लेकर 1495 तक रूल किया था उन्होंने यह जिम्मेदारी एक पोर्तुगीज नेविगेटर बार्थो मी डायस को दी कि वह एटलीस्ट अफ्रीका के वेस्ट कोस्ट के साउथ में जाकर देखें और कोशिश करें अफ्रीका की सदर्न टिप को सरकम वेंट करने की यानी उसके नीचे से घूम के जाने की कोशिश करके देखें बार्थो डायस ने बिल्कुल ऐसा ही किया वह
पोर्तुगीज अफ्रीका के वेस्ट कोस्ट तक पहुंचे और उसके बाद सदर्न डायरेक्शन में और आगे बढ़ने लगे इस समय तक उनको इस बात बात की बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी कि अफ्रीका की सदर्न टिप आखिर है कहां अब हुआ क्या कि वह सदर्न टिप तक अभी पहुंचे भी नहीं थे कि यहां पर समुंद्री तूफान आ गया और इस तूफान ने उनकी शिप्स को बहाकर मसल बे तक पहुंचा दिया तो मसल बे पहुंचने के बाद बार्थो डायस को यह रिलाइज हुआ कि शायद एक्सीडेंटली ही सही लेकिन उन्होंने अफ्रीका की सदर्न टिप को सरगम वेंट कर लिया है
और उनकी इसी रिटर्न जर्नी में 1487 में खोज हुई केप ऑफ गुड होप की कहने का मतलब यह कि 1487 में अफ्रीका की सदर्न टिप को खोज लिया गया था और इस जगह का नाम रख दिया गया केप ऑफ गुड होप एक्चुअली बार्थो में डायस ने तो इस जगह का नाम रखा था केप ऑफ स्टॉर्म्स क्योंकि यही व जगह थी जहां पर समुद्री तूफानों ने उनकी शिप्स को घेर लिया था और यहां से आगे बहा दिया था लेकिन जब यह बात किंग जॉन 2 को पता चली तो उन्होंने इस जगह का नाम केप ऑफ स्टॉर्म
से बदलकर कर दिया केप ऑफ गुड होप केप ऑफ गुड होप की डिस्कवरी मेरीटाइम एक्सप्लोरेशन में एक बहुत ही क्रुशल मूवमेंट माना जाता है है क्योंकि इस इवेंट के थ्रू यह डेमोंस्ट्रेट हो चुका था कि अफ्रीकन कॉन्टिनेंट के नीचे से किस तरह से नेविगेट किया जा सकता है और हर कोई इस चीज को जानता था कि अगर आप एक बार अफ्रीकन कॉन्टिनेंट के नीचे से निकलना सीख गए तो फिर भारत तक पहुंचना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा तो अब तक हम लोगों ने देखा कि 1487 तक पोर्च ने केप ऑफ गुड होप की डिस्कवरी तो कर
ली थी हालांकि अभी तक वह भारत नहीं पहुंच पाए थे चलिए एक बार नजर डालते हैं कि इस विषय में स्पेन क्या कर रहा था क्योंकि शुरुआत में हम लोग ने बोला था कि यूरोप से इंडिया तक के डायरेक्ट सी रूट को खोजने के लिए पोर्तुगीज कर रहे थे तो हमें यह जानना भी जरूरी है कि इस विषय में स्पेन के क्या योगदान रहे तो यहां पर हमें बात करनी होगी क्रिस्टोफर कोलंबस की जो कि एक जिनोज यानी इटालियन नेविगेटर थे इनके पास एक आईडिया था इनका कहना यह था कि धरती गोल है और अगर
धरती गोल है तो हमें यूरोप से इंडिया जाने के लिए अफ्रीका के नीचे से घूम के जाने की जरूरत नहीं है हम लोग वेस्ट की तरफ तरफ नेविगेट करेंगे और पीछे के रास्ते से भारत पहुंच जाएंगे स्पेन के किंग फर्डिनेंड और क्वीन इजाबेल को इनका आईडिया बहुत ज्यादा पसंद आया और उन्होंने कहा कि भाई जितना पैसा चाहिए आप लो और अपने मिशन पर आगे बढ़ो तो इस तरह स्पेन की स्पंस शिप पर क्रिस्टोफर कोलंबस ने वेस्ट की ओर नेविगेट करना शुरू कर दिया लेकिन भारत पहुंचने की बजाय वह पहुंच गए अमेरिका इसका मतलब यह कि
उन्होंने एक्सीडेंटली अमेरिका को खोज लिया था हालांकि उन्हें यही लगता रहा कि वह इंडिया पहुंच गए हैं इस कॉन्टिनेंट का नाम आगे चलकर अमेरिका पड़ा शुरुआत में इसे कहा गया न्यू वर्ल्ड यानी एक नई दुनिया तो हम कह सकते हैं कि 1492 में न्यू वर्ल्ड की खोज हुई और इसी के साथ इस बात का भी भरोसा होने लगा था कि सिर्फ यही नहीं शायद और भी बहुत सारी कंट्रीज और कॉन्टिनेंट्स हैं जिनको अभी खोजा जाना बाकी है और यह बात सच भी है क्योंकि इस इवेंट के कुछ सालों के बाद साउथ अमेरिका भी डिस्कवर किया
गया और यह जो चीज है यह स्पेन और पोर्ग के डिस्प्यूट का एक मेजर रीजन बन गया दोनों देश आपस में लड़ रहे थे कि अगर न्यू वर्ल्ड डिस्कवर होता है तो उसके ऊपर किसका हक होगा और जब यूरोप से इंडिया तक का डायरेक्ट सी रूट डिस्कवर कर लिया जाएगा तो उस पर किसकी मोनोपोली होगी इस पूरे के पूरे डिस्प्यूट को 1494 की ट्रीटी ऑफ टॉडी सिलाज में रिजॉल्व किया गया इस ट्रीटी ऑफ टॉर्डी सिलाज 1494 में केप वर्डे आइलैंड से 1300 माइल्स वेस्ट में एक इमेजिनरी लाइन खींची गई केप वर्डे आइलैंड्स की लोकेशन के
बारे में हम लोग पहले भी बात कर चुके हैं यह वह पॉइंट है जिसे समझा जाता था कि यह वर्ल्ड का वेस्ट मोस्ट पॉइंट है लेकिन अब यह बात खारिज हो गई थी क्योंकि अब पता चलने लगा था कि इसके आगे भी दुनिया है जिसे न्यू वर्ल्ड कहा जा रहा था तो ट्रीटी ऑफ डिसिला 1494 में यह तय किया गया कि जो भी न्यू वर्ल्ड होगा वहां पर ट्रेड मोनोपोली स्पेन की होगी और जो नोन वर्ल्ड है वहां पर ट्रेड मोनोपोली होगी पोर्तुगीज अब आपस में कंपीट नहीं करेंगे और अब यह पूरी की पूरी पोर्च
की जिम्मेदारी है कि केप ऑफ गुड होप की डिस्कवरी के बाद अब वह भारत तक के रूट को भी डिस्कवर करें और यह चीज हम लोग ऑलरेडी देख चुके हैं कि किंग जॉन 2 के रूल के दौरान ही केप ऑफ गुड होप की डिस्कवरी हुई थी भारत तक पहुंचना अभी बाकी था किंग जॉन 2 के बाद किंग मैनुअल फर्स्ट का रूल शुरू हुआ जिन्होंने 1495 से लेकर 1521 तक रूल किया किंग मैनुअल फर्स ने 1497 में यूरोप से इंडिया तक के डायरेक्ट सी रूट को डि कवर करने की जिम्मेदारी एक पोर्च गीज नेविगेटर वास्को डे
गामा को दी वास्को डेगामा ने केप ऑफ गुड होप को राउंड करने के लिए बिल्कुल वही रूट फॉलो किया जो कि बार्थो डायस ने डॉक्यूमेंट किया हुआ था और केप ऑफ गुड होप को सरगम वेंट करते हुए यह पहुंच गए मोजांबिक मोजांबिक एक फ्लोरिशिंग अफ्रीकन हार्बर था और मोजांबिक पहुंचकर तो इनकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था क्योंकि वहां पर इन्हें कई सारी इंडिया से आई हुई एंकर्ड शिप दिख गई इसका मतलब यह कि यहां पर ऐसे बहुत सारे लोग मौजूद थे थे जो कि यहां से इंडिया तक सेल करते रहते थे इसी तरह के
एक इंडियन सेलर अब्दुल माजिद को वास्को डी गामा ने हायर कर लिया और इसके बाद बहुत ही आसानी के साथ मोजांबिक से सेल करते हुए वास्को डी गामा कलकट पहुंचे कलकट केरला में है और आज की डेट में इसे हम लोग कोजी कोट के नाम से जानते हैं तो आज की इस वीडियो में हम लोगों ने केप रूट की डिस्कवरी को कवर किया और देखा कि यूरोपिय किस तरह डायरेक्ट सी रूट के थ्रू इंडिया है इंडियन हिस्ट्री इंडियन पॉलिटी और इंडियन इकॉनमी को डिटेल में कवर करने के लिए बुख सावा की प्लेलिस्ट को फॉलो कीजिए
थैंक यू सो मच फॉर वाचिंग एंड सपोर्टिंग बुवा