[संगीत] क्या हो अगर आपकी पहचान ही आपसे छीन ली जाए? सोचिए कोई अनजान शख्स आपके घर में आपके ही परिवार के बीच आपकी जगह ले ले और किसी को कानों कान खबर ना हो और हद तो तब हो जाए जब आपके अपने ही उस धोखे को पहचान ना पाए। आज की कहानी ऐसी ही हैरतंगेज हकीकत की है। यह कहानी है बिहार के एक हाई प्रोफाइल केस की। एक ऐसे शख्स की जिसने 41 साल तक किसी और की जिंदगी जी। इसमें एक लापता बेटा है जिसकी घर वापसी का इंतजार एक बूढ़ा बाप ता उम्र करता रहा।
एक शातिर बहरूपिया है जो किसी और की पहचान ओढ़कर एक भरा पूरा परिवार बसा लेता है। जमींदार बन बैठता है। एक मां है जिसका दिल कभी धोखे को कबूल नहीं करता और वह सच की लड़ाई लड़ती रहती है और अंत में एक सवाल है जिसका जवाब शायद कभी ना मिले। असली बेटा कहां गया? नमस्कार, मैं हूं भूपेंद्र सोनी और आप देख रहे हैं खबरगांव और यह किस्सा है 41 साल तक चले एक धोखे का जिसने एक परिवार को तोड़ कर रख [संगीत] दिया। तो चलिए परत दर परत खोलते हैं इस उलझी हुई दास्तान को। कहानी
शुरू होती है फरवरी 1977 में। बिहार के नालंदा जिले के मुरगावा गांव से। यह एक आम सा दिन था। लेकिन गांव के प्रभावशाली और अमीर जमींदार कामेश्वर सिंह के लिए यह दिन उनकी जिंदगी का सबसे स्या दिन बनने वाला था। कामेश्वर सिंह इलाके के बड़े आदमी थे। उनके पास 60 एकड़ से ज्यादा उपजाऊ जमीन थी और वह लगभग चार दशकों तक गांव के निर्विरोध मुखिया रहे थे। उनका रसूख ऐसा था कि उनके करीबी रिश्तेदारों में सुप्रीम कोर्ट के वकील और एक सांसद भी शामिल थे। उस दिन उनका 16 साल का इकलौता बेटा कन्हैया सिंह स्कूल
से मैट्रिक की परीक्षा देकर घर लौट रहा था। शाम ढलने तक उसे घर पहुंच जाना चाहिए था। लेकिन वह कभी नहीं पहुंचा। परिवार में कोहराम मच गया। जमींदार का इकलौता बेटा गायब हो जाना कोई मामूली बात नहीं थी। परिवार ने हर मुमकिन जगह उसे ढूंढा। पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई। लेकिन कन्हैया का कोई सुराग नहीं मिला। एक 16 साल का लड़का आखिर ऐसे कैसे गायब हो सकता था जैसे उसे जमीन निगल गई हो या आसमान खा गया हो। सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ वकील और कन्हैया के रिश्तेदार गोपाल सिंह उसे एक
शर्मीले शांत और मिलनसार लड़के के रूप में याद करते हैं। वह कहते हैं हम साथ बड़े हुए। हम साथ खेलते थे। जब वह गायब हुआ तो काफी शोरशराबा हुआ। अपने इकलौते बेटे के इस तरह गायब हो जाने के सदमे ने बूढ़े पिता कामेश्वर सिंह को तोड़ कर रख दिया। वह गहरे डिप्रेशन में चले गए और दुख और चिंता के कारण उनकी आंखों की रोशनी भी तेजी से कमजोर होने लगी। जब हर तरफ से दरवाजे बंद नजर आए तो हताश होकर उन्होंने अंधविश्वास का सहारा लिया। ओझा बाबाओं और तांत्रिकों के चक्कर लगाने लगे। एक गांव के
ओझा ने उन्हें उम्मीद की किरण दिखाई। उसने कहा कि उनका बेटा जिंदा है और जल्द ही किसी दिन प्रकट होगा। एक दुखी और लाचार बाप के लिए यह शब्द किसी संजीवनी से कम नहीं थे। उन्होंने ओझा की बात को सच मान लिया और अपने बेटे के लौटने का इंतजार करने लगे। दिन हफ्तों में बदले, हफ्ते महीनों में और महीने सालों में तब्दील होते गए। पर कन्हैया नहीं लौटा। समय के साथ मुरगावा गांव में कन्हैया के गायब होने की चर्चाएं भी कम होने लगी। लेकिन कामेश्वर सिंह के दिल के किसी कोने में उम्मीद की वो लौ
अब भी टिमटिमा रही थी जिसे ओझा ने जलाया था। उन्हें क्या पता था कि यही उम्मीद यही अंधविश्वास एक दिन उनके और उनके परिवार के लिए एक कभी ना खत्म होने वाली त्रासदी का दरवाजा खोल देगा। कन्हैया के गायब होने के 4 साल बीत चुके थे। सितंबर 1981 में मुरगामा से महज 15 कि.मी. दूर नालंदा जिले के ही एक छोटे से गांव समस्ती में एक अजीब वाक्या हुआ। करीब 20-22 साल का एक युवक वहां नजर आया। उसने भगवा कपड़े पहने हुए थे और कहता था कि वह गा बजाकर और भीख मांगकर अपना गुजारा चलाता है।
उसने बातों में स्थानीय लोगों से कहा कि वह मुरगावा गांव के एक प्रमुख व्यक्ति का बेटा है। यह बात हवा में उड़ी और उड़ते-उड़ते मुरगावा तक जा पहुंची। अफवाह बन गई कि कन्हैया वापस आ गया है। बेटे के लौटने की आस में जी रहे कामेश्वर सिंह को यह खबर मिली तो लगा जैसे सांस में सांस आ गई हो। वह खुद चलकर उस गांव गए। उनके कुछ भरोसेमंद पड़ोसी भी उनके साथ थे। कामेश्वर की नजरें अब बहुत कमजोर हो चुकी थी। वो युवक को ठीक से देख भी नहीं पा रहे थे। लेकिन उनके साथ गए पड़ोसियों
ने युवक को देखकर तस्दीक कर दी। हां मालिक यही आपका बेटा है। सालों से बेटे के गम में घुल रहे एक बाप के लिए यह शब्द अमृत समान थे। वो खुशी-खुशी उस युवक को अपने घर मुरगावा ले आए। पुलिस रिकॉर्ड्स के अनुसार उस वक्त कामेश्वर सिंह ने कहा था, "मेरी आंखें कमजोर है और मैं उसे ठीक से देख नहीं सकता।" अगर आप लोग कहते हैं कि यह मेरा बेटा है तो मैं इसे अपने साथ रख लूंगा। लेकिन कहानी का रुख पलटना अभी बाकी था। पिता धोखा खा जाए लेकिन एक मां अपने बेटे के मामले में
धोखा नहीं खाती। 4 दिन बाद बेटे की वापसी की खबर कन्हैया की मां राम सखी देवी तक पहुंची जो उस वक्त पटना में अपनी बेटी विद्या के पास रह रही थी। वह फौरन गांव लौटी घर के आंगन में खड़े उस युवक पर जैसे ही उनकी नजर पड़ी, उन्होंने एक पल में पहचान लिया। यह आदमी उनका बेटा कन्हैया नहीं था। राम सखी देवी ने तुरंत इस धोखे का विरोध किया। उन्होंने साफ-साफ बताया कि उनके बेटे कन्हैया के सर के बाई तरफ एक कटा हुआ निशान था जो इस आदमी के सर पर कहीं नहीं था। बात यहीं
खत्म नहीं हुई। जब कन्हैया के स्कूल के एक टीचर को बुलाया गया तो वह युवक उन्हें पहचान भी नहीं पाया। सारे सबूत उस युवक के खिलाफ थे। लेकिन कामेश्वर सिंह कुछ भी मानने को तैयार नहीं थे। वह अपने बेटे को वापस पाने के लिए इतने ज्यादा बेताब थे कि उन्होंने सच से आंखें मूंद ली और एक बहरूपिए पर अंधा विश्वास कर लिया। बस यहीं से सिंह परिवार दो फाड़ हो गया। एक तरफ मां और बेटी थी जिन्हें पूरा यकीन था कि यह आदमी धोखेबाज है और दूसरी तरफ पिता थे जो किसी भी कीमत पर यह
मानने को तैयार नहीं थे कि उनका बेटा अभी भी गुमशुदा है। रामसखी देवी ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस घटना के कुछ दिनों बाद ही उस युवक के खिलाफ स्थानीय थाने में धोखाधड़ी और प्रतिरूपण यानी इनपर्सनेशन का केस दर्ज कराया। पुलिस ने कार्यवाही की और उस आदमी को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन किस्मत शायद उस बहरूपिए पर मेहरबान थी। वह केवल एक महीने ही जेल में रहा और फिर जमानत पर रिहा हो गया। जमानत पर छूटने के बाद वो आदमी एक बार फिर कामेश्वर सिंह के घर उसी दो मंजिला महलनुमा हवेली में आकर रहने लगा।
कामेश्वर सिंह ने ना सिर्फ उसे अपने घर में पनाह दी बल्कि उसे पूरी तरह से अपने बेटे कन्हैया के रूप में अपना लिया। हद तो तब हो गई जब उसे घर लाने के महज एक साल बाद 1982 में कामेश्वर सिंह ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी अपनी ही जमींदार बिरादरी की एक महिला से करवा दी। धीरे-धीरे वह आदमी सिंह परिवार का अभिन्न सदस्य बन गया। उसने अपनी पहचान कन्हैया जी के रूप में स्थापित कर ली। जी इस जी पर खास ध्यान दीजिए। यानी यह आदमी अब समाज का सम्मानित सदस्य बन बैठा था। इस झूठी पहचान
को और पुख्ता करने के उसने तमाम हथकंडे अपनाए। कॉलेज में दाखिला लिया। परिवार के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार उसने एक स्थानीय कॉलेज से अंग्रेजी, राजनीति विज्ञान और दर्शनशास्त्र में स्थानक की डिग्री हासिल की। कॉलेज ने उसके आचरण को संतोषजनक बताया। समय के साथ उसके घर में किलकारियां गूंजी। उसके दो बेटे और तीन बेटियां हुई। वो एक भरे पूरे परिवार का मुखिया बन गया था। 1991 में कामेश्वर सिंह की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद इस बहरूपिए ने मुरगावा में स्थित उस पुश्तैनी लगभग 100 साल पुराने दो मंजिला महल का आधा हिस्सा कानूनी तौर
पर विरासत में पाया। यह घर जो एक बड़े पानी के टैंक के ऊपर बना था। आम और अमरूद के पेड़ों से घिरा था और बिना रंग के लोहे के गेट व ईंट की दीवारों से सुरक्षित था। अब उसका स्थाई निवास था। इस 16 कमरे वाले घर में तीन पीढ़ियां एक साथ रहती थी। वह अब सिर्फ कन्हैया जी नहीं बल्कि एक सम्मानित जमींदार और परिवार का मुखिया बन चुका था। उसने अपनी इस नकली पहचान का भरपूर फायदा उठाया। इन फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल करके उसने वोट डाला, टैक्स भरे, आधार कार्ड के लिए अपना बायोमेट्रिक डाटा
दिया। बंदूक का लाइसेंस हासिल किया और सबसे संगीन काम उसने कामेश्वर सिंह की लगभग 37 एकड़ पुश्तैनी जमीन बेच डाली। बाहरी दुनिया के लिए वो हर तरह से जमींदार कामेश्वर सिंह का इकलौता पढ़ा लिखा बेटा कन्हैया सिंह था। लेकिन इस सबके बीच राम सखी देवी और उनकी बेटी विद्या ने न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रखी। राम सखी देवी जिन्होंने सबसे पहले इस धोखे को पहचाना था। 1995 में न्याय का इंतजार करते-करते ही इस दुनिया से चल बसी। उनकी मृत्यु के बाद बेटी विद्या ने इस केस को आगे बढ़ाया। मामला भारत की धीमी न्याय प्रणाली
में सालों तक उलझा रहा। अदालतों में तारीखें पड़ती रही लेकिन फैसला नहीं हो पा रहा था। एक चीज थी जो इस बहरूपिए को हमेशा कटघरे में खड़ा करती थी। वो था डीएनए टेस्ट। वो लगातार डीएनए टेस्ट देने से कतराता रहा। 2014 में प्रोसीक्यूशन ने औपचारिक रूप से अदालत से मांग की कि उसका डीएनए सैंपल लिया जाए ताकि यह साबित हो सके कि वह और जमींदार की बेटी विद्या भाई-बहन हैं या नहीं। लेकिन वह 8 साल तक इस मांग को टालता रहा। अपनी पहचान बचाने और सच्चाई को दबाने के लिए उसने एक और कोशिश की। उसने
दयानंद गोसाई नाम के एक व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण पत्र अदालत में पेश किया। इस सर्टिफिकेट के अनुसार दयानंद गोसाई की मृत्यु जनवरी 1982 में हो चुकी थी। यह एक शातिर चाल थी। अगर दयानंद गोसाई मर चुका है तो कन्हैया जी के रूप में पहचाना जाने वाला व्यक्ति कौन हो सकता है? जाहिर है असली कन्हैया। लेकिन जांच में यह सर्टिफिकेट फर्जी निकला। इसे मई 2014 में बनवाया गया था। यानी कथित मौत के 32 साल बाद। पुलिस ने पुष्टि की कि सर्टिफिकेट बिल्कुल नकली था। जैसा कि जज मिश्रा ने बाद में अपने फैसले में लिखा। खुद को
कन्हैया साबित करने के लिए गोसाई ने खुद को ही मार डाला। झूठ के महल की दीवारें अब दरकने लगी थी। आखिरकार 41 साल के लंबे और थका देने वाले इंतजार के बाद न्याय की घड़ी आई। 2023 की शुरुआत में नालंदा की एक ट्रायल कोर्ट ने इस पेचीदा मामले की बिना रुके 44 दिनों तक लंबी सुनवाई की। फरवरी 2023 से केस शुरू हुआ और अप्रैल 2023 तक चला। अंत में अदालत ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जज मनविंद मिश्रा ने तमाम गवाहों और सबूतों के बिना पर उस शख्स को धोखाधड़ी, छद्म रूप धारण करने और आपराधिक षड्यंत्र
का दोषी पाया। फैसले में सबसे बड़ा खुलासा हुआ उसकी असली पहचान का। कन्हैया सिंह के नाम से चार दशकों तक सिंह परिवार और समाज को धोखा देने वाला यह व्यक्ति असल में दयानंद गोसाई था। वह नालंदा से लगभग 100 कि.मी. दूर जमुई जिले के मल्लेपुर गांव का रहने वाला था। जांचकर्ताओं ने पुष्टि की कि गोसाई जमुई के एक किसान के चार बेटों में सबसे छोटा था। वह कम उम्र में ही गा बजाकर और भीख मांगकर अपना गुजारा करने लगा था और 1981 में लगभग 17-18 साल की उम्र में अपना घर छोड़ गया था। उसकी शादी
जल्दी हो गई थी। लेकिन उसकी पत्नी जल्द ही उसे छोड़कर चली गई थी और बाद में उसने दूसरी शादी कर ली थी। गोसाई के आधिकारिक दस्तावेजों में भी उसकी जन्मतिथि को लेकर काफी विसंगतियां मिली। हाई स्कूल रिकॉर्ड में जनवरी 1966, राष्ट्रीय पहचान पत्र यानी आधार में फरवरी 1960 और वोटर आईडी कार्ड पर 1965। 1 2009 के राशन कार्ड में उसकी उम्र 45 साल लिखी थी। जिसका मतलब था वो 1964 में पैदा हुआ था। अदालत में जब जज मिश्रा ने गोसाई से पूछा कि गायब रहने के 4 साल के दौरान वो कहां रहा और किसके साथ?
तो उसने टालमटोल भरे जवाब दिए। उसने जज को बताया कि वह पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में एक साधु के आश्रम में रहा था। लेकिन वो अपने इस दावे के समर्थन में कोई गवाह या सबूत पेश नहीं कर सका। उसने जजों को यह भी बताया कि उसने कभी भी खुद को जमींदार के खोए हुए बेटे के रूप में पेश नहीं किया था। उसने कहा कि कामेश्वर सिंह ने सिर्फ मुझे अपने बेटे के रूप में स्वीकार किया और घर ले गए। उसने अंत तक यही रट लगाए रखी। मैंने धोखाधड़ी से किसी को भी गुमराह
नहीं किया। मैं कन्हैया हूं। लेकिन अदालत ने उसके दावों को खारिज कर दिया। उसके खिलाफ सबसे बड़ा सबूत था उसका डीएनए सैंपल देने से साफ इंकार। फरवरी 2023 में उसने एक लिखित बयान देकर स्पष्ट रूप से डीएनए सैंपल देने से मना कर दिया था। अदालत ने कहा अब किसी अन्य सबूत की आवश्यकता नहीं है। आरोपी जानता है कि डीएनए परीक्षण उसके झूठे दावों को उजागर कर देगा। जज ने अपने फैसले में एक अहम कानूनी सिद्धांत को भी रेखांकित किया। अपनी पहचान साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर है। जून 2023 में पटना उच्च न्यायालय ने भी
निचली अदालत के इस आदेश को बरकरार रखा और दयानंद गोसाई को 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सात गवाह पेश किए थे। लेकिन अदालत ने उन्हें सही नहीं माना। गोसाई के बेटे गौतम कुमार ने बाद में स्वीकार किया। हमने इस केस को कभी गंभीरता से नहीं लिया। हमें अपने सबूत बेहतर तरीके से इकट्ठा करने चाहिए थे। हमने कभी नहीं सोचा था कि मेरे पिता की पहचान पर कोई संदेह है। खैर दयानंद गोसाई की असलियत पकड़ी गई। लेकिन यह इस कहानी का अंत नहीं था। केस के फैसले में
अदालत ने पाया कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपराध नहीं बल्कि एक बड़ी साजिश थी। जज को संदेह था कि इस साजिश में मुरगावा के कई लोग शामिल थे। जिन्होंने गोसाई को सिंह परिवार के उनके खोए हुए बेटे के रूप में स्थापित करने में मदद की थी। संभवत सिंह परिवार की जमीनें सस्ते में खरीदने के लालच में जिन्हें बाद में गोसाई ने बेचा। राम सखी देवी ने भी अपनी मृत्यु से पहले अदालत को बताया था मेरे परिवार और हमारी संपत्ति के खिलाफ एक बड़ी साजिश रची गई थी। जिसमें मेरे पति के खराब स्वास्थ्य और कमजोर
दृष्टि का फायदा उठाया गया। लेकिन गोसाई के परिवार का क्या हुआ? उसके बड़े बेटे गौतम कुमार ने कहा, इतने सालों बाद हमारी जिंदगी और पहचान दांव पर लग गई क्योंकि मेरे पिता की पहचान छीन ली गई। गलती गोसाई की थी। लेकिन सोचिए उस परिवार का दर्द जिन्हें एक दिन पता चला कि उनका पूरा अस्तित्व, उनका नाम, उनका मान सम्मान सब एक झूठ की नीव पर टिका था। गौतम ने सवाल किया, वह हमारे पिता हैं। अगर मेरे दादाजी ने उन्हें अपने बेटे के रूप में स्वीकार किया था तो हम कौन होते हैं उन पर शक करने
वाले? आप अपने पिता पर कैसे भरोसा नहीं कर सकते? अंत में अब सबसे बड़ा सवाल, असली कन्हैया सिंह का क्या हुआ? फरवरी 1977 में जब वह 16 साल का था, वह स्कूल से लौटते समय हमेशा के लिए गायब हो गया। क्या उसका अपहरण हुआ? क्या उसकी हत्या कर दी गई? या वह कहीं और चला गया। भारतीय कानून के तहत 7 साल से अधिक समय तक गायब रहने वाले व्यक्ति को मृत मान लिया जाता है। इस हिसाब से कन्हैया को 1984 में ही मृत घोषित किया जाना चाहिए था। फिर भी अजीब बात है कि पुलिस ने
उसका गुमशुदगी का केस कभी बंद नहीं किया। क्या उन्हें लगता था कि वह जिंदा है या सिर्फ इसलिए कि परिवार दावा कर रहा था कि दयानंद गोसाई ही कन्हैया है। कन्हैया की एकमात्र मौजूदा तस्वीर एक ब्लैक एंड वाइट स्टूडियो फोटो है जो अदालती कागजों में स्टेपलर पिन से थोड़ी क्षतिग्रस्त हो गई है। इस तस्वीर में वह अपने बालों को करीने से सवारे हल्के रंग की शर्ट पहने कैमरे में देखता हुआ नजर आता है। आज मुरगामा में कन्हैया सिंह को लगभग भुला दिया गया है। विडंबना यह है कि जिस लड़के के नाम पर पूरा 41 साल
का विवाद चला उसके बारे में गांव में अब बहुत कम लोग बात करते हैं। वह एक खोई हुई याद एक धुंधला चेहरा बनकर रह गया है। 41 साल बाद दयानंद गोसाई को सजा हो गई। सच्चाई की जीत हुई लेकिन क्या यह जीत अधूरी थी? गोसाई द्वारा बेची गई 37 एकड़ जमीन, फर्जी दस्तावेज, आधार कार्ड, वोटर आईडी, गन लाइसेंस, धोखाधड़ी के यह निशान ज्यों के त्यों रह गए। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्चाई कभी-कभी कल्पना से भी ज्यादा अजीब होती है और न्याय का पहिया भले ही धीमा चले लेकिन चलता जरूर है। लेकिन यह
कहानी कई अनसुलझे सवाल और एक अधूरे अंत के साथ हमें छोड़ जाती है। कन्हैया सिंह का रहस्य शायद हमेशा के लिए एक रहस्य ही रह जाएगा। तो यह थी गुमशुदा कन्हैया की पूरी कहानी जिसकी पहचान ओढ़कर एक शख्स 41 साल तक एक परिवार में रहता रहा। यह कहानी लिखी थी मेरे साथी कमल ने और इसे कैमरा के पीछे रिकॉर्ड किया है मेरे साथी सर्वेश ने। आप देख रहे हैं खबर गांव। शुक्रिया। [संगीत]