नमस्कार मैं रवश कुमार। संजय ने धृतराष्ट्र से कहा था कि हमें सभी पांडव और कौरव योद्धाओं के प्रति निष्पक्षता से सोचना चाहिए। विजय या पराजय तो विधाता के हाथ है। यह संजय कहते हैं धृतराष्ट्र से। क्या हम भारत और पाकिस्तान के दावों की निष्पक्षता से जांच कर पा रहे हैं या झूठ को बचाने में लगे हैं? यह सवाल इसलिए कि बीजेपी ने अश्वत्थामा के प्रसंग का सहारा लेकर गोदी मीडिया के झूठ का बचाव किया। ऐसा झूठ जिसने भारत की सेना का मनोबल बढ़ाना तो दूर दुनिया में भारत का मजाक उड़ाया और भारत के लिए कूटनीतिक
मुश्किलें पैदा की। कायदे से गोदी मीडिया को अपनी तुलना संजय से करनी चाहिए। क्या वह इस युद्ध में संजय की तरह तटस्थ था? सबकी बराबर से रिपोर्टिंग कर रहा था? बिल्कुल नहीं कर रहा था। गोदी मीडिया अश्वत्थामा का सहारा लेकर सच बोलने वाले सवाल पूछने वाले संजयों पर हमला कर रहा है। बीजेपी गोदी मीडिया के साथ खड़ी हो गई। इससे दुखद क्या हो सकता है? गोदी मीडिया के इस झूठ का कोई भी कैसे बचाव कर सकता है कि भारत की सेना कराची इस्लामाबाद तक घुस गई। आधा पाकिस्तान साफ हो गया। पाकिस्तान में तख्ता पलट हो
गया और पाकिस्तान की सेना का प्रमुख असीम मुनीर भाग गया। झूठ की जरूरत गोदी मीडिया को रही होगी। भारतीय सेना को कतई ने। क्या सेना के कमांडर गोदी चैनलों को देखकर अपना मनोबल बढ़ा रहे थे? उनके पास इतना वक्त था। इस तरह की बातों का आखिर क्या तुक है? भारत की सेना ने तो गलत-सलत दावे किए नहीं बल्कि जितना किया उतना ही बताया और वह भी कम बड़ी कामयाबी नहीं। लेकिन गोदी मीडिया के इस झूठ के साथ बीजेपी कैसे खड़ी हो सकती है? सवाल पूछने वाले, सच बोलने का प्रयास करने वाले संजय के सामने अश्वत्थामा
को कैसे लाया गया? कहां है महाभारत के मनीषी विद्वान? गोदी मीडिया के इस झूठ का प्रतिकार क्यों नहीं करते? क्यों नहीं पूछते कि गोदी मीडिया अपने झूठ का बचाव करने के लिए अश्वत्थामा के मारे जाने का प्रसंग का सहारा कैसे ले सकता है? क्या आपने दिल्ली के गाजीपुर सीमा पर कूड़े के पहाड़ के पास आसमान में उड़ती हुई चीलों को कभी देखा है? एक नाटक है अंधा युग। उसी के एक प्रसंग के लिए यह वीडियो आपको दिखा रहा हूं। नाटक युद्ध के अंतिम दिन की संध्या से शुरू होता है और अब तक के युद्ध का
प्रभाव उसकी व्याख्या और टीका प्रस्तुत करता है। युद्ध के भयावह परिणामों पर टिप्पणी करता है। धर्म और मर्यादा पर विमर्श करता है और कृष्ण की मृत्यु के साथ इसका अंत होता है। मगर अंधा युग नाटक की शुरुआत इस तरह के एक दृश्य से होती है। आसमान में अंधेरा है। खूब सारे गिद्ध मंडरा रहे हैं और उसी के बीच दो प्रहरियों की बातचीत की आवाज आती है। एक प्रहरी कहता है, सुनते हो, कैसी है ध्वनि यह भयावह? तो दूसरा कहता है, सहसा अंधियारा क्यों होने लगा देखो तो दिख रहा है कुछ? इसी के जवाब में पहला
प्रहरी कहता है, "अंधे राजा की प्रजा कहां तक देख। दिख नहीं पड़ता कुछ। हां। शायद बादल है तो दूसरा प्रहरी कहता है बादल नहीं है वे गिद्ध है लाखों करोड़ों पंखे खोले लो सारी कौरव नगरी का आसमान गिद्धों ने घेर लिया झुक जाओ झुक जाओ ढालों के नीचे छिप जाओ नरभक्षी हैं वे गिद्ध भूखे हैं हम महाभारत जैसे महान ग्रंथ के एक्सपर्ट नहीं है क्योंकि ऐसे महान ग्रंथों का केवल एक ही मतलब नहीं होता भी नहीं सकता। इसीलिए वह महान है। अंधा युग नाटक का मंचन कई बार हो चुका है। एक नहीं अनेक तरीके से
इसके प्रसंगों को अभिनेताओं ने अपने अनुभव से अभिनय से जिया है। जिंदा किया है। ऐसे भी जीवन के कई संदर्भों में महाभारत की बातें सच लगने लगती हैं। जो हो चुका है वो होती हुई दिख जाती हैं। युद्ध के समय विनाश भारत पाक विभाजन के समय मानवीय त्रासदी को उभारने के लिए 1954 में धर्मवीर भारती ने रचा था अंधा युग। एक महान साहित्य जिस पर आज तक नाटकों का मंचन जारी है। यह नाटक हमें उन क्षणों के करीब ले जाता है जब इंसान ने इंसान को इंसान नहीं समझा। मारकाट ही उसकी अभिव्यक्ति हो गई। इसी
नाटक में धर्मवीर भारती अश्वत्थामा के प्रसंग को शामिल करते हैं और यह नाटक का केंद्रीय भाव बन जाता है। युद्ध के समय नैतिकता को ताक पर रखकर मर्यादा को रौंदकर आप युद्ध नहीं जीत सकते, विनाश नहीं टाल सकते। इस नाटक के लिखे जाने के 8 साल तक किसी ने हाथ नहीं लगाया। सबसे पहले इसका मंचन सत्यदेव दुबे ने किया। इब्राहिम अलकाजी के घर की छत पर और जब दिल्ली के पुराना किला में इसका मंचन हुआ तो यह नाटक दुनिया के नाटकों में ऐतिहासिक बन गया। धृतराष्ट्र को संजय से एक शिकायत थी कि उनका लगाव राजकुमार
अर्जुन से ज्यादा है। इसी के जवाब में संजय ने कहा था हमें सिर्फ पांडव और कौरव योद्धाओं के प्रति निष्पक्षता से सोचना चाहिए। विजय या पराजय तो विधाता के हाथ है। तब धृतराष्ट्र भी सहमत हो गए इस बात से और कहा कि तब नक्षत्रों को ही निर्णय करने दें। काल ही अगला कदम निर्धारित करें। क्या हम ऐसा होने दे रहे हैं या भीड़ को जमाकर, सरकार का डर दिखाकर धमका रहे हैं कि युद्ध का नतीजा वही है जो हम कह रहे हैं। YouTube पर हिंदी कविता पर अंधा युग नाटक के संदर्भ में एक संवाद है।
कलाकार आलोक चटर्जी इसका पाठ कर रहे हैं। इस संवाद में अश्वत्थामा बनकर युधिष्ठिर के झूठ की बात करते हैं कि उनकी हत्या वीरता और पराक्रम से नहीं झूठ से करने की कोशिश हुई। वन में भयानक स्वन में भी भूल नहीं पाता हूं। कैसे सुनकर युधिष्ठिर की घोषणा कि अश्वत्थामा मारा गया। शस्त्र रख दिए थे गुरु द्रोण ने रणभूमि में। उनको थी अटल आस्था युधिष्ठिर की वाणी में किंतु पाकर निहत्त ने पापी दृष्ट धुम ने अस्त्र से खंड खंड कर डाला भूल नहीं पाता हूं मेरे पिता थे अपराजय मात्र अर्ध सत्य से ही युधिष्ठिर ने उनका
वध कर दिया उस दिन से मेरे भीतर भी जो शुभ था कोमलतम था उसकी भ्रूण हत्या हत्या युधिष्ठिर के अर्धसत्य ने कर दी। धर्मराज होकर वे बोले नरो वा कुंजरो वाह मानव को भी पशु से पृथक नहीं किया उन्होंने। उस दिन से मैं हूं पशु मात्र। अंध बरबर पशु अपनी ही अंधी गुफा में भटक गया। अंधा युग नाटक का यह हिस्सा है। इसका चयन हमने क्यों किया? भारतपाकिस्तान युद्ध के बीच सीज फायर के बीच ट्रंप के दावों के बीच हम अंधा युग की बात क्यों कर रहे हैं? क्योंकि इस नाटक का संबंध युद्ध के माहौल
से भी है। अंधा युग का युग वह युग है जिस पर आजादी के समय हुए विभाजन और हिंसा के साथ दूसरे विश्व युद्ध में हुए परमाणु हमले से जापान की तबाही की भी छाया है। जिसमें मानव भविष्य के अस्तित्व पर प्रश्न है। यह नाटक मिथक की समकालीन व्याख्या करता है। इसके पात्रों और स्थितियों से सवाल करता है और इसी बहाने अपने युग की भी पड़ताल करता है। अमितेश ने लिखा है कि इस नाटक के लिए महाभारत के कम महत्वपूर्ण किरदारों को लिया गया है। है तो सभी महाभारत के लेकिन नायकों के साथ-साथ दूसरे किरदारों का
चयन किया गया ताकि आपको उनमें जनता का चेहरा उसकी दुविधा दिख सके। इस वीडियो को देखिएगा। कुछ कमियां नजर आ सकती हैं। तो अपनी तरफ से जोड़ लीजिएगा, सुधार कर लीजिएगा। लेकिन हमने रेत की तरह हथेली से सरकते इसी समय में इस नाटक के बहाने गोदी मीडिया के अधर्म और उसके झूठ को आईना दिखाने की कोशिश की है। अंधा युग खत्म नहीं होता वह हर दौर में जारी रहता है। इस दौर में भी जारी है। इसी वक्त में पत्रकारिता के धर्म और मर्यादा के कुचले जाने का जश्न मनाने की कोशिश हो रही है। इसलिए कि
उनके पास सत्ता है, सरकार है। आपको जेल में बंद करने की ताकत है। आपका चैनल डिलीट करवा देने का अहंकार है। जनता क्या करे? उसने तो युद्ध देखा है, युद्ध में खोया है, वो युद्ध में मारी गई है और मारने वालों में भी शामिल है। इसी नाटक में दो प्रहरी बात कर रहे हैं। सिपाही कहता है कि हमने मर्यादा का कोई अतिक्रमण नहीं किया। क्योंकि नहीं थी अपनी कोई भी मर्यादा। हमको अनास्था ने कभी नहीं झकझोरा। क्योंकि नहीं थी अपनी कोई भी गहन आस्था। हम यह सब अंधा युग से बता रहे हैं। उसी का संवाद
है। युद्ध शुरू होने से कई साल पहले विदुर और धृतराष्ट्र के बीच बातचीत हो रही है। इस नाटक का अंश है धृतराष्ट्र कहते हैं कि उन्हें आशंका हो रही है। इस पर विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं आज जो हो रहा है उसकी बुनियाद कई साल पहले पड़ गई थी। तब धृतराष्ट्र कहते हैं पहले पर कभी भी तुमने यह नहीं कहा। तब विदुर याद दिलाते हैं भीष्म ने कहा था गुरु द्रोण ने कहा था इसी अंतःपुर में आकर कृष्ण ने कहा था मर्यादा मत तोड़ो तोड़ी हुई मर्यादा कुचले हुए अजगर सी गुंजलिका में कौरव वंश को
लपेट कर सूखी लकड़ी सा तोड़ डालेगी। आज जो भी गोदी मीडिया के अधर्म की याद दिला रहे हैं उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। लेकिन लोग भूल गए कि अश्वत्थामा के मारे जाने के प्रसंग के पहले तक युधिष्ठिर के रथ का पहिया जमीन से ऊपर चलता था। उसके बाद जमीन पर चलने लग जाता है। गोदी मीडिया के लोग इस प्रसंग का पाठ कैसे करना चाहेंगे? क्या इसे भुला देंगे? क्या झूठ का प्रसंग भी अश्वत्थामा के मारे जाने के साथ खत्म हो जाता है या मारे जाने के बाद उसके परिणाम जारी रहते हैं? यह समझना मुश्किल
तो नहीं? आपने झूठ बोला, वक्त की जरूरत हो सकती है, लेकिन उस झूठ का परिणाम वक्त के उस खांचे तक ही सीमित नहीं रहता। आगे भी युगों युगों तक प्रभावित करता है। अगर अश्वत्थामा का पाठ गोदी मीडिया के झूठ को सच बताने और देश हित में जरूरी बताने के लिए किया जा रहा है तो इस प्रसंग की बात होनी चाहिए। जिसमें विदुर धृतराष्ट्र को याद दिलाते हैं। मर्यादा मत तोड़ो। तोड़ी हुई मर्यादा कुचले हुए अजगर सी होती है। यह नाटक इन प्रसंगों के जरिए बार-बार याद दिला रहा है। आप अचानक एक दिन मर्यादा को याद
नहीं कर सकते। आपको हमेशा निभाना होता है। आप एक दर्शक हैं। जरा इस संवाद को सुनिए। अपने दर्शक होने की भूमिका को समझिए। 7 मई से लेकर 10 मई के बीच जो हुआ उस दौरान आप कितने असहाय थे, मजबूर थे। आपके पास क्या था? एक ढंग की सूचना नहीं थी। प्रहरी थे हम केवल 17 दिनों के लोम हर्षक संग्राम में। भाले हमारे ये ढाले हमारी ये निरर्थक पड़ी रही अंगों पर बोझ बनी। रक्षक थे हम केवल। लेकिन रक्षणीय कुछ भी नहीं था यहां। अंधा युग नाटक में बलराम कृष्ण से कहते हैं तुम कुछ भी कहो
कृष्ण। निश्चय ही भीम ने किया है अन्याय। आज उसका अधर्मवार अनुचित था। क्या बीजेपी के किसी नेता ने अंधा युग नाटक नहीं देखा है? क्या बीजेपी को यह प्रसंग याद नहीं रहा कि उस समय भी अश्वत्थामा को लेकर किए गए झूठ के वार की किसी ने निंदा की थी और इसका भी प्रसंग उसी महाभारत में दर्ज है। जिस महाभारत से इतने शानदार नाटक उपजते हो। जिस महाभारत के प्रसंग आपके जीवन से हर दिन टकराकर जीवित हो उठते हो। उस प्रसंग का आधा अधूरा हिस्सा लेकर गोदी मीडिया अपने झूठ का बचाव कर रहा है। यह कुछ
और नहीं गोदी मीडिया का अंधा युग है। दुर्योधन कभी अकेले नहीं आता है। हमेशा झुंड में आता है। शिव के कुमार की यह पंक्ति मैंने महाभारत एक नवीन रूपांतर नाम की किताब से ली है। यह किताब राजकमल से छपी है। प्रभात के सिंह ने अनुवाद किया ₹450 की है। महाभारत पर टीका है। इसी से पढ़कर बता रहा हूं। 15वें दिन जयद्रथ के वध के बाद दुर्योधन की सेना हताश पड़ गई। यह खबर पांडवों के खेमे में पहुंचती है कि द्रोण ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसकी आशंका से घिरे युधिष्ठिर पूछते हैं तब क्या किया
जाए? एक अल्पकालिक चुप्पी छा गई क्योंकि कृष्ण कुछ सोचने लगे। फिर उन्होंने कहा हम सभी जानते हैं कि द्रोण का अपने पुत्र अश्वत्थामा के प्रति असीम मोह है। वही उनके लिए सब कुछ हैं। फिर युधिष्ठिर की ओर मुड़कर बोले यदि कोई अश्वत्थामा नामक हाथी को मार दे और यह समाचार द्रोण तक पहुंचे तो वह उसे अपने पुत्र की मृत्यु समझ बैठेंगे। सभी पांडव भाई विशेषकर अर्जुन या अधम योजना सुनकर कांप गए। यह भी तो हो सकता है कि कल मैं उन्हें द्वंद युद्ध में उलझा लूं और किसी तरह उनका वध कर दूं। यह एक न्यायोचित
तरीका होगा उन्हें रास्ते से हटाने का। किंतु कृष्ण ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। आपको तो अच्छी तरह ज्ञात है प्रिय अर्जुन कि आप अपने गुरु का वध कभी नहीं करेंगे क्योंकि वह आपको अपने पुत्र के समान ही प्यार करते हैं। कृष्ण की बात पर हस्तक्षेप करते हुए युधिष्ठिर ने बोला मैं यह झूठ बोल सकता हूं। चाहे इससे मेरे धर्म की घोर हानि ही क्यों ना हो। अन्यथा दूसरा विकल्प तो यही है कि मैं अपनी संपूर्ण सेना का संहार होने दूं। इसका तो यह भी अर्थ हो सकता है कि सत्य तक पहुंचने के लिए मैंने
एक घुमावदार मार्ग अपनाया। मैं यह देखकर कृष्ण ने कहा अत्यंत प्रभावित हूं कि आप एक अच्छे उद्देश्य के लिए अपनी मर्यादा भी दांव पर लगा सकते हैं। लेकिन तब भी इतना आसान नहीं था युधिष्ठिर के लिए झूठ बोलना। द्रोण पूछ बैठते हैं आप धर्म के प्रतीक हैं। इसलिए मुझे बताइए क्या यह सच है आपके अनुज ने अश्वत्थामा का वध कर दिया? इसका जवाब देते समय युधिष्ठिर कहते हैं हां आदरणीय गुरु अश्वत्थामा मर चुका है। पर बड़बड़ाकर धीमी आवाज में यह भी जोर देते हैं या तो हाथी था या मनुष्य था। इस धीमी आवाज को पहचानिए।
युधिष्ठिर को धीमी आवाज में यह बात क्यों कहनी पड़ी? क्योंकि झूठ बोला नहीं जा रहा था। लेकिन गोदी मीडिया झूठ बोलकर ऊंची आवाज में अपना बचाव कर रहा है। इस प्रसंग का जिक्र देवदत्त पटनायक ने अपनी किताब जय महाभारत में किया है। यह किताब पेंग्विन से छपी है। हिंदी में है और अनुवाद अनंत मित्तल ने किया है। ₹300 की किताब है और मैं इसका एक प्रसंग आपके सामने पढ़ रहा हूं। युधिष्ठिर ने कृष्ण से पूछा कृष्ण ने सहानुभूति पूर्ण मुस्कान फेंकी क्योंकि वे युधिष्ठिर के मन में चल रहे द्वंद को बखूबी भांप रहे थे। क्या
सत्य इतना महत्वपूर्ण था? यदि किसी झूठ से युद्ध समाप्त हो सकता हो तो सत्य बोलने की उनकी उत्कंठा का स्त्रोत क्या था? पुण्य करते दिखना जरूरी है या पुण्य करना? भारी मन से युधिष्ठिर ने अपने जीवन का प्रथम झूठ बोलने जरा सा सरासर झूठ बोलने का निर्णय किया। वो बोले हां अश्वत्थामा मारा गया और फिर दोबारा कुछ सोचकर बड़बड़ाए। शायद वो हाथी था या शायद वह मनुष्य था। लेकिन युद्ध के कोलाहल में बुरी तरह टूट चुका पिता बड़बड़ाहट सुन नहीं पाया। झूठ बोलना युधिष्ठिर के लिए आसान नहीं था। अश्वत्थामा मारा गया या युधिष्ठिर का पहला
झूठ था। उससे पहले युधिष्ठिर ने कभी झूठ का सहारा नहीं लिया। लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई के वक्त गोदी मीडिया ने पहली बार झूठ नहीं बोला। इसके पहले यानी 2014 से लेकर अब तक असंख्य बार गोदी मीडिया झूठ बोलता रहा है। सरकार के झूठ को बचाता रहा है। खुद भी झूठ गढ़ता रहा है। गोदी मीडिया कम से कम धर्मराज युधिष्ठिर की नैतिकता और दुविधा को किनारे कैसे कर सकता है? क्या उसे डर नहीं कि इस देश में गांव-गांव में महाभारत के विद्वान हैं। महाभारत के नाटक को लिखने वाले, बार-बार लिखने वाले, बार-बार खेलने
वाले लेखक और कलाकार हैं। उस देश में गोदी मीडिया महाभारत के प्रसंग का सहारा लेकर अपने झूठ का बचाव करता है। कमाल है। और तो और बीजेपी कैसे बचाव करने आ गई? बीजेपी का गोदी मीडिया के साथ आने का मतलब है सवाल पूछने वाले सच बताने की कोशिश करने वाले पत्रकारों पर हमला करना। यह वो लोग हैं जो आज के समय में संजय की भूमिका निभा रहे हैं। महाभारत में संजय को पता है उसके सच से दुख ही दुख है। संजय ने यह नहीं कहा कि युद्ध का समय है इसलिए झूठ बोल रहा हूं। बल्कि
यही कहा कि सच बोलना ही उनका धर्म है। गोदी मीडिया ने कितनी आसानी से खुद को संजय से ही किनारा कर लिया। अब सोचिए यह संजय नहीं है। संजय तो नहीं है। तब फिर क्या है? क्या इसकी पहचान महाभारत के किसी किरदार या प्रसंग में आपको मिल रही है? विद्वान बेहतर बताएंगे। देवदत्त पटनायक अपनी किताब जय महाभारत में लिखते हैं। युधिष्ठिर द्वारा जीवन में एकमात्र असत्य बोलने से पहले तक उनका रथ कभी भी पृथ्वी को नहीं छूता था। असत्य यह था कि मारा गया अश्वत्थामा नर था अथवा पशु यह उन्हें नहीं पता। युधिष्ठिर अपनी इस
हरकत से मनुष्य बन गए। एक असत्य ने उन्हें सचमुच पृथ्वी पर लाह पटका। अंधा युग में संजय अपनी इस दुविधा की बात करते हैं। कहते हैं उन्हें सच बोलने के लिए खत्म नहीं किया जा सकता। धर्मवीर भारती ने संजय का संवाद जिस तरह से लिखा है वह आपके स्क्रीन पर टहल रहा है और मैं पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। संजय कहते हैं फिर भी रहूंगा शेष फिर भी रहूंगा शेष फिर भी रहूंगा शेष सत्य कितना कटु हो कटु से यदि कटुतर हो कटुतर से कटुतम हो फिर भी कहूंगा मैं केवल सत्य केवल सत्य केवल
सत्य है अंतिम अर्थ मेरे आ गोदी मीडिया के चैनलों की एक दिक्कत है इन चैनलों ने भारत की संस्कृति की रक्षा धर्म की रक्षा का नाटक किया। उनका गंभीर अध्ययन कभी नहीं किया। भारतीय महान ग्रंथों में जीवन की दुविधा विविधता इतनी है कि उसी की बात कर माहौल का स्तर ऊंचा किया जा सकता है। लेकिन गोदी मीडिया भीड़ पैदा करना चाहता है। जो एक इशारे पर आप पर टूट पड़े। उन पर टूट पड़े जो सरकार से सवाल कर रहे हैं। गोदी मीडिया के झूठ पर सवाल कर रहे हैं। अंधा युग में अश्वत्थामा जब संजय को
मारने जाते हैं, संजय को दबोच लेते हैं तब कृपाचार्य ने एक बात कही कि संजय अवध है। वध नहीं किया जा सकता संजय का। संजय अवध्य है, तटस्थ है। कृतवर्मा कहते हैं, छोड़ो अश्वत्थामा। संजय है वह। कोई पांडव नहीं है। अश्वत्थामा संजय को जकड़े हुए कहते हैं केवल केवल वध केवल। कृपाचार्य की आवाज आती है। कृतवर्मा पीछे से पकड़ो कस लो अश्वत्थामा को वध लेकिन शत्रु का कैसे योद्धा हो अश्वत्थामा। संजय अवध है। तटस्थ है। संजय का हर वक्त इम्तिहान होता है। आप महाभारत पढ़िए। सच बोलने के कारण धृतराष्ट्र नाराज हो जाते हैं। उनके साथ-साथ
कई और किरदारों की नाराजगी संजय को झेलनी पड़ती है। धर्मवीर भारती अंधा युग में संजय की इस पीड़ा को कैसे लिखते हैं? हर लेखक महान गाथाओं के किरदारों में अपना संवाद भरता है। डालता है अपने समय की परीक्षा लेने के लिए सच का परीक्षण करने के लिए। संजय अंधा युग में कहते हैं मत छोड़ो विनती करता हूं। मत छोड़ो मुझे कर दो वध जाकर अंधों से सत्य कहने की मरमान तक पीड़ा है जो उससे वध ज्यादा सुखमय है। वध करके मुक्त मुझे कर दो अश्वत्थामा। अश्वत्थामा का प्रसंग हम सबके लिए सबक है। बहुत बड़ी चुनौती
है। मर्यादा के प्रति जीवन भर का कमिटमेंट होता है। चाहे वह राजा ही हो अंजाम उसे भी भुगतना पड़ता है। इसलिए इस नाटक में जब युद्ध खत्म होता है तो धृतराष्ट्र का एक अंत दिखाया जाता है। एक दृश्य की रचना की गई है। जंगल में आग लगी है और धृतराष्ट्र किसी से मदद नहीं मांगते हैं और आग की तरफ चले जा रहे हैं। समाए जा रहे हैं। मतलब मर्यादा तोड़ने पर चुप रहे तो इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी। अंत में गांधारी कृष्ण को श्राप देती हैं जिसे कृष्ण स्वीकार करते हैं। पांचवें अंग का समय कुछ वर्षों
बाद का है। युधिष्ठिर अपने को हारा हुआ पाते हैं। युत्सु आत्मघात कर लेता है। गांधारी, धृतराष्ट्र और कुंती जंगल की आग में मारे जाते हैं। विजय और युद्ध का खोखलापन स्थापित हो जाता है। आखिर में कृष्ण की मृत्यु के बाद बूढ़े याचक के संदेश से नाटक समाप्त होता है। इस प्रसंग का विवरण समाजशास्त्री इरावती करवे ने अपने किताब युगांत में किया है। जंगल की आग औरों को दिखाई दे इससे पहले धृतराष्ट्र धुएं को सूंघ लेते हैं। वे गांधारी से कहते हैं तुम मुझे छोड़कर नदी के पार जाकर आग से खुद को बचा सकती हो। मगर
गांधारी मना कर देती हैं। धृतराष्ट्र का हाथ पकड़ कर कहती हैं, यहां रहकर आग की राह देखने की अपेक्षा हम लोग वहीं क्यों ना चले चले? वे दोनों आग की तरफ चलने लगते हैं। तो उनके साथ जंगल में रह रहे विदुर और कुंती भी उनके साथ चलने लगते हैं। इरावती करवे इस प्रसंग का विवरण कुछ इस तरह करती हैं। एक बड़ी विचित्र घटना घट रही थी। एक पतिव्रता अपने जीवित पति का हाथ पकड़ कर सहगमन के लिए चल पड़ी थी। एक देवर अपने बड़े भाई की विधवा को चिता से उठाने की अपेक्षा साथ लेकर चिता
की ओर रवाना हो रहा था। कितना दुखद है लोग विवश हैं कि मीडिया सच नहीं दिखा रहा। सवाल नहीं पूछ रहा है। झूठ बोल रहा है। ऊपर से वही गोदी मीडिया कहता है। उसकी निंदा नहीं होनी चाहिए। उसके झूठ की निंदा नहीं होनी चाहिए। एक झूठ युधिष्ठिर के जीवन पर उनके पूरे जीवन के सच पर कितना भारी पड़ जाता है। गोदी मीडिया को याद रखना चाहिए। अश्वत्थामा को तब किसी ने फेक न्यूज़ नहीं कहा था क्योंकि फेक न्यूज़ आज की शब्दावली है। तब कोई मीडिया नहीं था। ना किसी ने संजय को गोदी मीडिया कहा है
क्योंकि गोदी मीडिया आज की शब्दावली है। जिस तरह धर्मवीर भारती अंधा युग में कहते हैं जो मर्यादा तोड़ी गई उसकी बुनियाद बहुत पहले पड़ चुकी थी। उसी तरह आज के फेक न्यूज़ की बुनियाद की ईंटें अश्वत्थामा के प्रसंग में भी मिल जाती हैं। गोदी मीडिया अपना अपराध धर्म का नाम लेकर नहीं छिपा सकता। धर्म के साधारण जानकार भी मानते हैं। गोदी मीडिया ने अपने पेशे के धर्म की रक्षा नहीं की। संजय बनने का वक्त आया तो संजय को ही नकार दिया। अश्वत्थामा मारा गया कि बात करने वालों के सामने धर्मवीर भारती के अंधा युग का
पाठ ही जवाब हो सकता है। पर जवाब चाहिए किसे? भीड़ को केवल भीड़ चाहिए। निकलने की रोशनी अंधा युग में कब से बंद है? नमस्कार मैं रवीश कुमार।