शादी की रात जब मैंने अपनी बीवी का काला चेहरा देखा तो मैं बहुत नाराज हुआ। जब मैंने उसे तलाक देने की ठानी तो वह मेरे पैरों में गिर पड़ी और बोली आप दूसरी शादी कर लीजिए। मैं घर के किसी कोने में पड़ी रहूंगी। मैंने एक खूबसूरत औरत से शादी की और उसे घर ले आया। पहली बीवी नौकरानी बनकर उसकी सेवा करने लगी। घर में सभी खुश थे क्योंकि उन्हें मुफ्त की नौकरानी मिल गई थी। लेकिन एक रात अचानक मैं बाहर खड़ा। खामोश निगाहों से अपने घर के दरवाजे को देख रहा था। ना जाने क्यों आज
हिम्मत नहीं हो रही थी कि दरवाजा खोलकर अंदर जाऊं। पास की मंदिर से भजन की आवाज गूंजी तो मैंने आसमान की ओर देखा। सर्दियों की शाम जल्द ही रात की स्याही में बदल रही थी। मैंने एक गहरी सांस ली। चाहूं या ना चाहूं आखिरकार मुझे अपने घर तो जाना ही था। इसके अलावा मेरा और कोई ठिकाना भी नहीं था। मैंने दरवाजा खोला और अंदर दाखिल हो गया। पूरा घर हमेशा की तरह चमक रहा था। मार्बल के फर्श पर मुझे अपनी परछाई नजर आ रही थी। शाम के इस पहर भी घर में कहीं धूल का नामोनिशान
नहीं था। जैसे घर की कई बार सफाई की गई हो। मेरे जूते मिट्टी से सने हुए थे। मैं जब आगे बढ़ा तो फर्श पर मेरे पैरों के निशान बनते चले गए। ड्राइंग रूम में दाखिल होते ही मेरी निगाह अंदर के नजारे पर पड़ी। वहां रौनक थी। मेरी बीवी सुर्ख लिबास में सजधज कर टीवी देख रही थी। उसके हाथ में चाय का कप था। उसे देखकर मेरे होठों पर मुस्कान फैल गई। वह बेहद हसीन थी। एक बच्चे की मां बनने के बाद भी उसके हुस्न में कोई कमी नहीं आई थी। मुझे देखते ही उसने मुझे पास
बैठने का इशारा किया और किचन की ओर मुंह करके आवाज लगाई। जीविका जरा अमित के लिए भी चाय ले आओ। मैं चुपचाप उसके पास बैठ गया। आज मेरा दिल बुझा हुआ था। मेरी बीवी भी मेरे चेहरे को देखकर कुछ समझ रही थी। वह इधर-उधर की बातें करके मेरा ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही थी। शायद उसे भी अंदाजा हो गया था कि मैं किस बात से परेशान हूं। थोड़ी ही देर में जीविका चाय का कप लेकर किचन से बाहर आई। उसे देखकर मैं चौंका लेकिन वह चुपचाप चाय रखकर वापस लौट गई। मेरी बीवी ने उसे
शाम के खाने की लंबी लिस्ट पकड़ा दी। जीविका ने सिर हिलाया और किचन की ओर मुड़ गई। रास्ते में जमीन पर पड़े खिलौनों को समेटकर मेज पर रखा। मेरी नजरें दूर तक उसका पीछा करती रही। मगर अब मैं मजबूर था। चाय का कप हाथ में था लेकिन मैं खोया खोया सा था। शाम का खाना बहुत स्वादिष्ट था। जीविका के हाथों में तो जैसे कोई जादू था। मेरी बीवी लगातार बातें कर रही थी और मैं गुमसुम सा उसकी बातों का जवाब देता रहा। खाने के बाद मैं जल्दी सोने चला गया। दिमाग पर ना जाने कैसा बोझ
था कि काफी देर तक करवटें बदलने के बाद भी नींद नहीं आई। मेरी बीवी गहरी नींद में थी। सोते हुए भी उसके हसीन चेहरे को देखना मुश्किल हो रहा था। मैं खामोशी से उठकर कमरे से बाहर आ गया। यूं ही कमरे में इधर-उधर टहलते हुए मेरे कानों में एक अजीब सी आवाज पड़ी। आवाज जिस दिशा से आ रही थी, मेरे कदम अनच्छा से उस ओर बढ़ गए। कमरे का दरवाजा खुला था। मैंने हल्का सा दबाव डालकर दरवाजा खोला और जो दृश्य मेरे सामने था उसे देखते ही मेरे होठों से एक घुटी हुई चीख निकल गई।
जो कुछ मैंने देखा उसके बाद खुद पर काबू पाना मेरे लिए नामुमकिन हो गया था। इसी वजह से आज मेरा दिल बोजिल था। यह एक अनजाना डर था जिसने सुबह से ही मुझे अपनी गिरफ्त में ले रखा था। आज मैं उस डर को अपनी आंखों से हकीकत बनते देख रहा था। उल्टे पांव दौड़ते हुए मैं वापस अपने कमरे में आ गया। मेरी सांसे थमने का नाम नहीं ले रही थी और मेरे पसीने छूट रहे थे। इस सर्द मौसम में भी मुझे अपने शरीर पर पहने हुए कपड़े चुभने लगे। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अगर कोई रात के इस सन्नाटे में मुझे जो कि एक मजबूत मर्द था। रोते हुए देख लेता तो ना जाने क्या सोचता। लेकिन सच्चाई तो यह थी कि मुझे बीता हुआ कल पूरी ताकत से झकझोर रहा था। चाहकर भी मैं खुद को 3 साल पहले की उस घटना को याद करने से नहीं रोक पाया जिसने मेरी पूरी जिंदगी को उलट-पलट कर रख दिया था। मैं इंग्लैंड से पढ़कर लौटा था तो मेरी व्यक्तिमत्व में एक अलग ही निखार था। मैं खुद को हवा में उड़ता हुआ
महसूस कर रहा था। पूरे खानदान में कोई लड़का मेरे मुकाबले का नहीं था। यहां तो लोग हिंदुस्तान में पढ़ने को तरसते हैं। उनके मां-बाप उन्हें कम उम्र में ही वर्कशॉप या सब्जी के ठेले पर खड़ा कर देते हैं। लेकिन मेरे मां-बाप ऐसे थे जिन्होंने मेहनत मजदूरी के बावजूद मुझे इंग्लैंड पढ़ने भेजा। मैं खुद भी काबिल था इसलिए स्कॉलरशिप हासिल कर ली। 4 साल इंग्लैंड में पढ़ाई के बाद जब मैं वापस आया तो पूरी तरह बदल चुका था। मेरे घर आने की खुशी में मां ने पूरे खानदान को दावत पर बुलाया था। खानदान की औरतें मेरा
माथा चूमते हुए मेरे लिए दुआएं कर रही थी। मैं सब समझ रहा था। लड़कियां छिप-छिप कर मुझे देख रही थी और एक दूसरे को इशारे कर रही थी। हर घर की यह ख्वाहिश थी कि मैं उनका दामाद बनूं। इस सोच ने मुझे थोड़ा घमंडी बना दिया था और घमंडी क्यों ना होता। मैं खूबसूरत भी था। पढ़ा लिखा भी और हिंदुस्तान आते ही मुझे एक बेहतरीन नौकरी भी मिल गई थी। अब तो ऐसा लगने लगा था जैसे घर में रुपयों की बहार आ गई हो। इन सब बातों ने मिलकर मेरी व्यक्ति महत्व में एक अजीब सा
घमंड भर दिया था। दावत के दौरान भी मैंने कई लड़कियों की निगाहें खुद पर महसूस की थी। लेकिन मैंने सर झटक दिया। शादी करूंगा तो अपनी ही मर्जी से और मेरी बीवी तो बिल्कुल मेरे बराबर की होनी चाहिए। इस ख्याल ने मेरे दिल में गहरी जगह बना ली थी। दावत खत्म हुई तो मां बर्तन समेटते हुए बेहद खुश नजर आ रही थी। वह बार-बार मेरी बलाएं ले रही थी। पहले इस खानदान ने कभी हमें महत्व ही नहीं दिया था और अब जब मेरा बेटा शिक्षित हो गया है तो देखो कैसे सब हमारे आगे पीछे फिर
रहे हैं। वो बड़े फक्र से कह रही थी। मैं मुस्कुरा दिया। तभी वो पिताजी के पास बैठकर उन्हें किसी रिश्तेदार के बारे में बताने लगी। जिन्होंने मुझे अपनी बेटी का रिश्ता देने की बात की थी। मुझे गुस्सा आ गया। मां मेरे लिए रिश्ता देखने की कोई जरूरत नहीं है। शादी तो मैं अपनी मर्जी से ही करूंगा। मैंने कहा लेकिन मां का तो चेहरा ही उतर गया। खबरदार जो ऐसी बात की अपनी मर्जी से ना जाने कहां से लड़की उठाकर ले आएगा। शादी से पहले जात खानदान सब देखना होता है। और सबसे जरूरी बात यह है
कि लड़की घर बसाने वाली होनी चाहिए। इसलिए शादी मैं अपनी मर्जी से ही करूंगी। और फिक्र मत कर। मैं तेरे लिए हीरे जैसी लड़की ढूंढकर लाऊंगी। मां की बात पर मैं मुस्कुरा दिया। चाहे मैं ढूंढूं या मां। मुझे तो हीरे जैसी लड़की ही चाहिए थी। इसी बीच मेरे मोबाइल पर किसी की कॉल आ रही थी। मैं मोबाइल हाथ में लेकर घर से बाहर निकल गया। लेकिन ज़हन अब भी मां की बातों में ही उलझा हुआ था। शादी के सपने तो मेरे दिल में पहले से थे। और वैसे भी कौन सा नौजवान लड़का होगा जिसे शादी
की ख्वाहिश ना हो। अच्छा घर, अच्छी शिक्षा, पैसे की कोई कमी नहीं थी। अब बस जिंदगी में एक खूबसूरत बीवी की कमी थी जो मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। एक रोज जब मैं नौकरी से घर आया तो घर में कुछ गैर मामूली चहल-पहल नजर आई। अपने कमरे में दाखिल हुआ तो देखा एक औरत मेरे सामने बैठी थी जो अचानक उठकर मेरा माथा चूमने लगी। मैंने गौर से देखा तो उनकी शक्ल कुछ जानी पहचानी लगी। मैंने सवालिया निगाहों से मां की तरफ देखा। मां मुस्कुराई, "यह तुम्हारी बुआ है जो दूसरे शहर में रहती
हैं। तुम्हारे इंग्लैंड से आने की खबर मिली तो तुमसे मिलने के लिए आई हैं। मां की बात पर मैंने समझने के अंदाज में सिर हिला दिया। बुआ मुझसे बहुत मोहब्बत से पेश आ रही थी। उनके साथ उनके पति भी थे। वह भी अच्छे इंसान लगे। हां, उनके हुलिए से लग रहा था कि वह लोग ज्यादा संपन्न नहीं है। कपड़े सादे मगर साफ सुथरे और अच्छे से स्त्री किए हुए थे। पिताजी उनसे बहुत मोहब्बत से पेश आ रहे थे और मां भी बार-बार खाने-पीने की चीजें उनके सामने रख रही थी। मुझे यह सब थोड़ा अजीब जरूर
लगा क्योंकि मां ने कभी अपने ससुराल वालों की इतनी खातिरदारी नहीं की थी। लेकिन मैं कंधे उचका कर अपने कमरे में चला गया। बाहर काफी देर तक महफिल जमी रही। सब लोग आपस में हंसीज़ाक करते रहे। अगली सुबह मैं काम पर चला गया। जब वापस आया तो मां बहुत खुश थी। उन्होंने बताया कि बुआ लोग यहां इसलिए आए थे क्योंकि वे मुझे अपनी बेटी का रिश्ता देना चाहते हैं। मैं गुरूर से मुस्कुरा दिया। लोग तो अब मुझे घर आकर अपनी बेटियों के रिश्ते देने को तैयार थे। मां बहुत खुश थी और वह इस रिश्ते के
लिए रजामंद भी थी। लेकिन मुझे थोड़ा संकोच था। मैं लड़की को देखना और उससे मिलना चाहता था। जब मैंने अपनी बात मां से कही तो वह हंस पड़ी और बोली, अरे फिक्र की कोई बात नहीं। मैंने उसे देख रखा है। वह बेहद खूबसूरत है और तुम्हारी हर उम्मीद पर खरी उतरेगी। वे लोग दूसरे शहर में रहते हैं और गरीब भी हैं। इसलिए वहां जाकर लड़की को देखना मुमकिन नहीं है। मैं जल्दी शादी करना चाहती हूं और मेरी बूढ़ी हड्डियों में अब इतना दम नहीं कि तुम्हारे नखरे उठाऊं। तुम्हारी बीवी आएगी तो वहीं तुम्हारे लाड उठाएगी।
मां की बात सुनकर मैं चाहकर भी मना ना कर सका। मुझे पता था कि मेरी मां इतनी जल्दी किसी चीज को पसंद नहीं करती। और अगर उन्होंने ससुराल की किसी चीज की तारीफ की है तो वह वाकई अच्छी ही होगी। मैंने शादी के लिए रजामंदी दे दी। घर में तुरंत ही शादी की तैयारियां शुरू हो गई। मैंने पूरी कोशिश की कि किसी तरह अपनी होने वाली बीवी से बात कर सकूं। लेकिन मुझे पता चला कि उसके पास मोबाइल फोन भी नहीं है और ना ही वह किसी से इस तरह की मुलाकात करती है। कोई बात
नहीं। मैंने खुद को तसल्ली दी। शादी में अब दिन ही कितने रह गए हैं। ऑफिस में मेरे सभी दोस्तों को मेरी शादी की खबर लग गई थी और सब मुझे मुबारकबाद दे रहे थे। वे सभी हाई स्टैंडर्ड वाले लोग थे। इसलिए मैंने शहर के सबसे बड़े हॉल में अपने रिसेप्शन की पार्टी रखी थी। मैं चाहता था कि जब मैं अपनी बीवी के साथ स्टेज पर जाऊं तो सबकी निगाहें हम पर ठहर जाएं। शादी का दिन भी आ गया। मैंने दिल खोलकर पैसे खर्च किए थे। बारी की एक-एक चीज शानदार बनाई गई थी। हमें बारात लेकर
दूसरे शहर जाना था। सफर की थकावट ने हम सबको थका दिया था। लेकिन मुझे अपनी शादी की खुशी थी। हालांकि जब मैं एक छोटे से घर में दूल्हा बनकर बैठा तो मुझे घुटन सी महसूस होने लगी। मुझे वहां बैठना बहुत बुरा लग रहा था। मैंने मां से कहा भी था कि बुआ से कह दें कि शादी हाल में हो। लेकिन उन्होंने अपने छोटे से घर में ही इंतजाम कर लिया था। मैं चाहकर भी कुछ कह नहीं सका और चुपचाप सहन करता रहा। मैं बेसब्री से अपनी दुल्हन का इंतजार कर रहा था। थोड़ी ही देर में
शादी के मंत्र पढ़ा दिए गए और शादी संपन्न हो गई। मैंने मां की ओर सवालिया निगाहों से देखा। मुझे भूख लग रही थी लेकिन दुल्हन वालों की तरफ से खाने-पीने की कोई चीज पेश नहीं की जा रही थी। आखिरकार थक हार कर मैंने अपने ससुर से पूछ ही लिया। मेरा सवाल सुनकर वो खामोश हो गए। फिर बोले बेटा हमने तो पहले ही कह दिया था कि हम बारातियों को खाना नहीं खिला सकते। तुम्हारी मां से पहले बात हो गई थी। उन्होंने ही कहा था कि बारातियों को खाना वो खुद खिलाएंगी। उन्होंने यह बात बहुत आम
अंदाज में कही। लेकिन मेरे ऊपर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। मुझे बहुत गुस्सा आया। यह तो सीधी साधी मेरी बेइज्जती थी। मेरे साथ आए मेहमान इधर-उधर खाना ढूंढ रहे थे और मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया था। ससुराल वालों के खिलाफ यह मेरी दिल की पहली गांठ बन गई थी। मैं चुपचाप उठा और एक जान पहचान वाले को फोन कर खाने के लिए कह दिया। थोड़ी देर में बारातियों का खाना पहुंच गया। मैं मां से कुछ पूछना चाहता था लेकिन वह समय सही नहीं था। मैंने खुद को समझाया। चलो कोई बात नहीं। जब मेरी
दुल्हन को मेरे सामने लाकर बैठाया गया तो मुझे थोड़ी तसल्ली हुई। वह लंबी कद की थी और उसने चेहरे पर घूंघट लिया हुआ था। उसका सजा संवरा हुआ रूप देखकर मुझे लगा कि वह जरूर बहुत खूबसूरत होगी। अब मुझे रुखसती की जल्दी होने लगी। थोड़ी ही देर में बारात रवाना होकर शहर के लिए निकल गई। जब हम वापस पहुंचे तो रात हो चुकी थी। मैं बेसब्र हो रहा था लेकिन मां को रस्मों की पड़ी थी। छोटी-छोटी कई रस्में करते-करते रात के 12:00 बज गए। आखिरकार मैंने इशारे से मां को बता दिया कि अब मैं अपने
कमरे में जाना चाहता हूं। इशारा सब ने देख लिया और हंसने लगे। फिर मां मेरी बीवी को कमरे में ले जाकर बैठा आई। उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी जिसकी वजह मुझे समझ नहीं आई। मेहमान कमरे से रुखसत हो गए तो मैंने दरवाजा बंद किया और पलटा। बेड पर मेरी बीवी अपने लहंगे को फैलाए बैठी थी। कमरे में असली फूलों से बहुत खूबसूरती से सजावट की गई थी। मैं धीरे-धीरे चलता हुआ बिस्तर की तरफ गया और उसके सामने जाकर बैठ गया। आज मेरे अरमानों के पूरे होने का दिन था। मेरी शानदार जिंदगी में
जो एक कमी थी वो आज पूरी हो गई थी। एक खूबसूरत बीवी जिसकी मौजूदगी मुझे मुकम्मल बना देती। मैंने हाथ बढ़ाकर उसका घूंघट उठाया लेकिन अगले ही पल जैसे मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मेरी आंखें हैरानी से फटी की फटी रह गई क्योंकि सामने मेरी बुआ की बेटी बैठी थी। वो मुस्कुरा रही थी। लेकिन उसकी मुस्कान के बावजूद चेहरे पर कोई खास चमक नहीं थी। उसका रंग बेहद सांवला था। नैन नक्श भी साधारण थे और सबसे बड़ी बात उसके दाएं गाल के ठीक ऊपर एक उभरा हुआ बड़ा समस्सा था। मेरे दिल में एक टीस
सी उठी। वो चुपचाप बैठी थी। शायद मेरी तारीफ की या मूंग दिखाई के तोहफे की उम्मीद कर रही थी। लेकिन एक नजर डालने के बाद मेरा मन नहीं हुआ कि मैं दोबारा उसकी तरफ देखूं। गम और गुस्से से मेरे दिमाग की नसें जैसे फटने लगी। यह क्या किया मां ने? उन्होंने तो कहा था कि तुम बेहद खूबसूरत हो। लेकिन तुम्हारी सूरत तो ऐसी है कि मैं तुम्हें एक बार देखने के बाद दोबारा नहीं देख सकता। तुम मेरी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई कि बिना देखे तुमसे शादी कर ली। मेरे
लबों से यह कड़वे अल्फाज़ निकल पड़े। वो जो अब तक धीमे-धीमे मुस्कुरा रही थी। अचानक मेरी तरफ देखने लगी। मेरी बातों ने उसकी आंखों में आंसू ला दिए थे। मैंने नफरत भरी नजर से उसे देखा और घृणा से मुंह फेर लिया। मुझे तो हमेशा से गोरे रंग की चाहत थी और मेरी बीवी का रंग इतना सांवला होगा। यह तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। सांवली रंगत पर किया गया मेकअप उसे और भी बदसूरत बना रहा था। मैं घबराकर बिस्तर से नीचे उतर गया और कहा, मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा। मैं तुम्हें अपनी
बीवी बनाकर नहीं रख सकता। कल रिसेप्शन में सब लोग तुम्हें देखकर मेरा मजाक उड़ाएंगे। मेरी इन बातों से उसके चेहरे पर जैसे सन्नाटा छा गया। वो अचानक बिस्तर से नीचे उतरी और मेरे पैरों को पकड़ लिया। नहीं अमित भगवान के लिए मुझे तलाक मत देना। मेरे मां-बाप बहुत गरीब हैं। यह सदमा उनके लिए पहाड़ जैसा होगा। अगर मैं बदसूरत हूं, तो इसमें उनका क्या कसूर है? मैं आपको हर खुशी दूंगी। बस मुझे तलाक मत दीजिए। वह फूट-फूट कर रो रही थी। लेकिन उसके गहरे सांवले हाथों में मेरे सफेद पैर बहुत अजीब लग रहे थे। मैं
पीछे हट गया। मैंने अपने सिर से टोपी उतार कर फेंक दी। मेरा दिल चाह रहा था कि कमरे की हर चीज को तहस-नहस कर दूं। वह फूट-फूट कर रो रही थी। अचानक ही वह अपनी जगह से उठी और बोली, अगर आपको मेरी शक्ल सूरत पसंद नहीं है, तो आप दूसरी शादी कर लें। मैं आपको कभी नहीं रोकूंगी। बस मुझसे मेरा नाम मत छीनिए। मैं यहीं घर के किसी कोने में पड़ी रहूंगी और आप लोगों की सेवा करती रहूंगी। मैं आपसे बहुत मोहब्बत करती हूं और आपके बिना नहीं रह सकती। उसकी बात पर मेरे अंदर नफरत
की एक और लहर जाग गई। उसका मुझसे किसी भी किस्म का ताल्लुक अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। लेकिन मैं कुछ कर भी नहीं सकता था। काफी देर कमरे में टहलने के बाद आखिरकार मैंने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया। मां बाहर सोफे पर बैठी थी। मुझे बाहर आता देख उनके चेहरे पर एक बार फिर मुस्कुराहट आ गई। उन्होंने मुझसे बिल्कुल नहीं पूछा कि मैं इस वक्त बाहर क्यों आया हूं। वह भी आज की रात बल्कि वह खामोशी से बैठी माला जपती रहीं। मैं घर से बाहर निकल गया। ना जाने कितनी देर सड़कों पर भटकता
रहा। आखिरकार मैंने फैसला कर लिया कि मैं अपने परख के मुताबिक एक खूबसूरत लड़की से शादी जरूर करूंगा। अगले दिन रिसेप्शन की पार्टी थी। मैंने उसे ताकीद की थी कि वह अपने चेहरे से घूंघट नहीं उठाएगी। उस बेचारी ने मेरी बात मान ली। पूरी पार्टी के दौरान लोग कहते रहे रिसेप्शन में दुल्हन का तो कोई घूंघट नहीं होता लेकिन मां सबको चुप करा देती। मेरा दिल उससे पूरी तरह बेजार हो चुका था। शादी के बाद जब दावतें शुरू हुई तो मैं बहाने बनाकर हर जगह मना कर देता। अगले दिन मैंने काम पर जाना शुरू कर
दिया। लेकिन मेरा सबसे अच्छा दोस्त समीर कुछ-कुछ समझ चुका था। मेरे जैसा घूमने फिरने का शौकीन इंसान शादी के अगले दिन ही काम पर पहुंच जाए। यह बात उसे खटक गई। उसने मुझे उसी शाम अपने घर दावत पर बुलाया। मैंने मना करना चाहा लेकिन उसने सख्ती से मेरी बात ठुकरा दी। उसने कहा भला शादी के अगले दिन कौन काम पर जाता है? तुम हनीमून पर नहीं गए। अब भाभी को लेकर मेरे घर दावत पर जरूर आना। मेरी उतरी हुई शक्ल देखकर वह सब समझ गया था। ना चाहते हुए भी उस शाम मैं अपनी बीवी को
लेकर उसके घर पहुंच गया। मेरे दो दोस्तों ने जब मुझे उस मामूली शक्ल सूरत वाली लड़की के साथ आते देखा तो वे समझ गए कि मेरा चेहरा उदास क्यों था। उसने घर में तरह-तरह के पकवान बनाए थे। उसके घर वाले मुझे घर का ही एक सदस्य समझते थे। जबकि उनसे यह मेरी पहली मुलाकात थी। समीर ने खाने पर बैठने का कहा। लेकिन मैं थोड़ी देर के लिए ठिठक गया। उसकी छोटी बहन खाने की मेद सजा रही थी। उसे देखकर मैं अपनी नजरें हटाना भूल गया। वह इतनी हसीन थी जैसे सीधे स्वर्ग के बाग से इस
दुनिया में आई हो। लंबे घुंघराले बाल, नाजुक चेहरा और गोरी रंगत मेरे दिल दिमाग पर छा गई। मैं बिल्कुल वैसी ही लड़की को अपनी पत्नी बनाना चाहता था। जब मेरी नजरों की दिशा का उसे एहसास हुआ तो उसने मुझे देखा और उसके चेहरे पर शर्म की लाली फैल गई। मेरा दिल बेकाबू हो गया। मैं किसी भी हालत में उसे अपनी बीवी बनाना चाहता था। मेरी बदसूरत बीवी चुपचाप यह सब देखती रही। उसने बहुत कम खाना खाया था। समीर के घर से लौटते वक्त मैं दिल ही दिल में तय कर चुका था कि मैं उससे समीर
की बहन से बात करूंगा। और मैंने ज्यादा इंतजार नहीं किया। अगले ही दिन मैंने उसे अपने दिल की बात बता दी। वह हैरान रह गया। उसने कहा लेकिन अमित अभी दो रोज पहले ही तो तुम्हारी शादी हुई है। मैं सकपका गया। मैंने कहा मुझे ऐसी बदसूरत बीवी नहीं चाहिए। वह तो मां की पसंद थी। मैं अपनी पसंद से शादी करना चाहता हूं। मैं तुम्हारी बहन को दुनिया की हर खुशी दूंगा। मैंने उसे हर तरह से यकीन दिलाया। मेरा शानदार स्टेटस, बेहतरीन नौकरी और पैसों की भरमार ने शायद उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। आखिरकार उसने
मेरे हक में फैसला कर लिया और मेरी शादी के लिए हामी भर दी। उस रोज मैं बहुत खुश था। मैंने घर आकर सबसे पहले मां को बताया। मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। जैसे कि सब पहले से तय हो। एक हफ्ते बाद ही मैं प्राची से शादी कर उसे अपने घर ले आया। उसकी खूबसूरती और बनाव श्रृंगार देखकर मेरी पहली बीवी जीविका कुछ पल वहीं खड़ी रही और फिर खामोशी से कमरे से बाहर निकल गई। मैंने अलमारी से उसके सारे कपड़े निकालकर सोफे पर रख दिए और कहा इस कमरे में अब
प्राची रहेगी। तुम मां के कमरे में या स्टोर रूम में सो जाओ। मैंने नफरत भरे लहजे में कहा। लेकिन वह कुछ नहीं बोली। हां, उसकी आंखों में आंसू जरूर चमक रहे थे। उसने चुपचाप स्टोर रूम को अपना ठिकाना बना लिया। मां सुबह से देर रात तक उससे काम करवाती थी। उन्हें जैसे कोई मुफ्त की नौकरानी मिल गई हो। बात बातबात पर वह उसे डांटती फटकारती और अपमानित करती। मुझे हैरानी थी क्योंकि अपनी नरम मिजाज मां का यह रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा था। लेकिन मुझे जीविका में कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसीलिए मां उसके साथ
जो भी सलूक करती मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैं तो अपनी नई जिंदगी में मग्न था। प्राची फैशनेबल लड़की थी। वह नए स्टाइल के कपड़े पहनती और हमेशा मेकअप किए रहती। उसका हुस्न देखकर मैं बहुत खुश रहता। घर के सारे काम जीविका करती थी। इसलिए प्राची को किसी काम की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। शादी के कुछ ही समय बाद मैं प्राची को लेकर हनीमून पर चला गया। यूरोप का लंबा टूर करने के बाद जब लौट कर आया तो पता चला कि प्राची गर्भवती है। मेरी जिंदगी अब पूरी होने जा रही थी। मैं बेहद
खुश था। बस एक बात खटकती थी। घर में खामोशी से चलती फिरती जीविका मुझे अब किसी साए की तरह लगने लगी थी। वह कभी कुछ नहीं कहती थी। कई बार मां ने उसके साथ मारपीट की और वह चुपचाप सहती रही। एक दिन दूध गिर जाने पर मां ने उसे छड़ी से इतना मारा कि वह फूट-फूट कर रो पड़ी। फिर भी उसके होठों से एक भी शिकायत नहीं निकली। ना जाने क्यों उस दिन मेरे दिल में एक अजीब सी बेचैनी भर गई। अगर मैं काम पर होता तो उसकी शिकायती निगाहें मुझे हर जगह नजर आती। आज
भी मैं इसलिए जल्दी वापस आया था। और अब रात के इस पहर जो कुछ मैंने देखा उसे देखकर मैं फूट-फूट कर रो पड़ा। मेरा बच्चा जोर-जोर से रो रहा था। मैंने उठकर उसे देखा। प्राची बेखबर सो रही थी। मैंने उसे हिलाया और बच्चे के रोने की ओर उसका ध्यान दिलाया। लेकिन वह करवट बदलकर फिर सो गई। मैंने एक ठंडी सांस ली। खूबसूरत तो वह जरूर थी, लेकिन उसमें सलीकेदार नाम कोई भी चीज नहीं थी। पूरी रात बच्चा रोता रहता तो मैं ही उसे संभालता। बच्चे को दूध पिलाकर मैं कमरे से बाहर निकल आया। मेरा रुख
फिर उसी कमरे की ओर था जहां कुछ देर पहले वह मंजर देखा था। इस बार स्टोर रूम का दरवाजा खुला था। सामने ही जीविका बैठी फूट-फूट कर रो रही थी। मां अब भी उसके सामने खड़ी थी। देखा तेरी मां ने शादी के बाद जो कुछ मेरे साथ किया था, उसका मैंने कैसा बदला लिया। मुझे तेरी शक्ल और सूरत देखकर अंदाजा हो गया था कि मेरा बेटा तुझे कभी मुंह नहीं लगाएगा। इसलिए मैंने जानबूझकर तेरी शादी उसके साथ करवाई। अब देख तू घर में किसी कचरे की तरह पड़ी रहती है और तेरी मां के दिल को
जो तकलीफ होती है उससे मुझे बहुत सुकून मिलता है। आधी रात को यहां भगवान की माला जप कर क्या साबित करना चाहती है? बहुत बड़ी नेक बनने की कोशिश कर रही है। चल उठ। मेरे लिए दूध गर्म करके ला। मां ने उसे जोर से लात मारी। वह फिर सिसक उठी और चुपचाप अपनी जगह से उठ खड़ी हुई। मुझ पर तो जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा था। मां ने मुझे अपने पुराने बदले के लिए इस्तेमाल किया था। मुझे नहीं पता था कि बुआ ने उनके साथ क्या किया था। लेकिन इस सब में जीविका का तो कोई
कसूर नहीं था। वह मेरे पास से खामोशी से गुजरने लगी। एक निगाह उसकी मुझ पर पड़ी तो मैं सर्द से पांव तक कांप गया। अगर वह बैठकर भगवान से मेरी शिकायतें कर रही थी तो भगवान जाने मेरा अंजाम क्या होगा। मुझे ऑफिस के लोगों के बदले हुए चेहरे याद आने लगे। बॉस को बार-बार मेरी शिकायतें दी जा रही थी। मेरा बच्चा लावारिस की तरह सारा दिन पड़ा रहता था। प्राची अपने हुस्न और सजने संवरने में ही मस्त रहती थी। जीविका मेरे पास से निकलना चाह रही थी। लेकिन मैंने उसका हाथ थाम लिया। रात के इस
समय आप मेरी पत्नी के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकती हैं। मां जो कुछ मैंने आज सुना है। उसके बाद मैं यह पाप अपने सिर नहीं लेना चाहता। आज से जीविका को मैं अपनी पत्नी का दर्जा दूंगा। वह अब स्टोर रूम में नहीं बल्कि दूसरे कमरे में रहेगी। इन दोनों पत्नियों के साथ इंसाफ करना अब मेरी जिम्मेदारी है। और आज के बाद आप मेरी पत्नी को कुछ नहीं कहेंगी। मैंने हाथ उठाकर मां से कहा जिनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। लेकिन ना जाने क्यों मेरे दिल में एक अजीब सा सुकून उतरता हुआ
महसूस हो रहा था। जीविका की आंसू भरी आंखों में भी एक अनोखी खुशी झलक रही थी। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। मैंने गौर से उसका चेहरा देखा। दुपट्टा थोड़ा सा ढलका हुआ था और उसके चेहरे पर मासूमियत बिखरी हुई थी। वह हसीन नहीं थी लेकिन बदसूरत भी नहीं थी। मैंने धीरे से उसका हाथ थामा और उसे अपने कमरे की ओर ले गया। सुबह होते ही मैंने ऐलान कर दिया कि मैं अपनी दोनों पत्नियों को बराबरी का हक दूंगा। प्राची पहले तो खूब रोई, चीख ही चिल्लाई लेकिन फिर चुप हो गई क्योंकि उसे मेरी दौलत और
जायदाद से हाथ धोना मंजूर नहीं था और जीविका वह इतनी खुश थी कि उठते-बैठते भगवान का शुक्र अदा करना नहीं भूलती। घर के सारे काम वह अब भी पहले की तरह ही करती थी। फर्क बस इतना था कि अब उसकी आंखों में आंसुओं की जगह हर वक्त मुस्कान रहती थी। उसकी संगत में रहते हुए मुझे एहसास हुआ कि सच्चा सुख देने वाली पत्नी कैसी होती है। मेरे कपड़े, जूते हमेशा तैयार हालत में मिलते। वह अपने हाथों से मेरे लिए गरमागरम खाना परोसती और कभी कोई शिकायत नहीं करती। और अब तो मैंने भी दिल में यह
ठान लिया था कि मैंने उसके साथ जो भी जुल्म किए हैं, मैं उसका प्रायश्चित जरूर करूंगा। इस कहानी का नैतिक संदेश मोरल यह है। सच्चा सुख और सच्चा रिश्ता सिर्फ रूप और दिखावे से नहीं बल्कि प्रेम, समर्पण और सेवा भाव से बनता है। जब इंसान अपने अंदर झांक कर अपनी गलतियों को स्वीकार करता है और उन्हें सुधारने का निर्णय लेता है, तभी वह वास्तव में इंसाफ करता है। खुद के साथ भी और दूसरों के साथ भी। जीविका जैसी पत्नी का सम्मान और प्रेम पाने से अमित को यह एहसास हुआ कि असली खूबसूरती बाहरी नहीं बल्कि
भीतरी होती है जो त्याग, सेवा और मुस्कान में बसती है। तो दोस्तों, यह थी आज की कहानी। इस कहानी के बारे में आपकी क्या राय थी? यह कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। अगर आपको कहानी पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें और स्टोरी कॉर्नर चैनल को सब्सक्राइब करें और बेल आइकन पर क्लिक करके इसे ऑल पर सेट करें ताकि आपको नए वीडियो की सूचना तुरंत मिल जाएगी। धन्यवाद।