जगत का स्वभाव जान ले तो विकारों में शांति हो जाएगी दुखों से शांति हो जाएगी और भगवान का स्वभाव जान ले तो नित्य नविन नित्य प्रीति नित्य सुख नित्य मंगल के द्वार खुल जाएंगे एक होता है जानना दूसरा होता है मानना संसार को जान लो और भगवान को मान संसार को जानो कि संसार बदल रहा है अनित्य है छूटने वाला है किसी को रुलाए बिना नहीं छोड़ा इस संसार यह धोखे से भरा है भगवान राम के पिताजी भी संसार में रोक कर गए ये संसार ऐसा है बुढ़ापे में कोई सामने देखता नहीं लड़का पैदा हो
जाए शादी करेगा कि नहीं करेगा यह सवाल उठ सकता है य मां-बाप की सेवा करेगा कि नहीं करेगा विदेश जाएगा कि नहीं जाएगा यह सवाल उठ सकता है लेकिन मरेगा कि नहीं मरेगा यह सवाल नहीं पक्का है जो पैदा हुआ है मरने के लिए और जो मिला है वह छूटने के लिए ये संसार का स्वभाव जो मिला है वह छूटने के लिए जो पैदा हुआ है मरने के लिए संसार का यह स्वभाव प्यारी से प्यारी पत्नी भी पति से कुछ ना कुछ छुपाए बिना नहीं रहती प्यारे से प्यारे पति भी पत्नी से कुछ बातें तो
छुपा के ही जीता है बेटा बाप से बातें छुपाए बाप बेटे से छुपाए यार यार से छुपाए ये स्वभाव नश्वरता धोखा कपट और अंत में मृत्यु से भरा है संसार और भगवान का स्वभाव जानो तो ज्ञान स्वरूप प्रेम स्वरूप आनंद स्वरूप और अमरता से भरा है आप दोनों में जी रहे हैं शरीर तो संसार है और आप भगवान कि चेतन से जुड़े शरीर से भी जुड़े हैं भगवान से भी जुड़े अगर भगवान से नहीं जुड़े होते तो हाथ को पता ही नहीं हाथ आपको पता है हाथ है ज्ञान स्वरूप भगवान पेट को पता नहीं मैं
पेट हूं आपको पता है यह पेट है आप भगवान से जुड़े हैं लाला और शरीर से भी जुड़ पेट की भूख से भी जुड़े हैं तो संसार है असत जड़ दुख रूप परिवर्तन और धोखे से भरा भगवान है सत चित्त आनंद और नित्य नवीन रस से नवीन सामर्थ्य से भरा हुआ संसार में नित्य नवीन समस्याएं आती रहती है और भगवान में नित्य नवीन ज्ञान प्रकाश और आनंद उभरता रहता है आप किसम प्रीति करते गलती क्या होती है कि जहां प्रीति करनी चाहिए उधर का उपयोग करते जहां उपयोग करना चाहिए वहां प्रीति करते वह मार खा
जाते संसार का तो उपयोग कर लो छूटने वाला है और भगवान से प्रीति कर लो दोनों हाथ में लड्डू हम क्या कर मंदिर में भी जाते तो भगवान का उपयोग करते यह दे दे यह कर दे दे और संसार में प्रीति करते संसार में प्रीति होगी और भगवान का उपयोग करेगा व मार खाएगा भगवान में प्रीति होगी और संसार का उपयोग कर लेगा निहाल हो जाएगा हाय हाय खुश हाल हो जाए भगवान में तो करो प्रीति और संसार का करो उपयोग अनिद्रा का रोग दुखी फरियाद जीवन किसका होता है जो संसार में प्रीति करता है
और आनंदित सुखी और दोनों हाथ में लड्डू वाला जीवन किसका होता है जो भगवान में प्रीति करता है रामायण में आता है उमा राम स्वभाव जही जाना ताही भजन तजी भावन आना रोम रोम में जो सत चित आनंद स्वरूप ईश्वर भरा है उसका स्वभाव जिसने जाना है वह उसके भजन मतलब किम लक्षण भजन रसन लक्षणं भजन उसका रस लिए बिना रहेगा नहीं जिसने भगवान का स्वभाव जाना और संसार का स्वभाव जिसने जाना वह उपरा हुए बिना बैराग के बिना रहेगा नहीं मंदिर में भी जाते हैं आश्रम में भी जाते और संसार का स्वभाव नहीं जानते
तो मंदिर में आश्रम में रहते हुए भी आदमी उधर की तरफ आकर्षित हो जाता है और मंदिर में आश्रम में रहते या घर में भी रहते और भगवान का स्वभाव जानते और संसार का पल जानते तो भगवान और सत्संग के तरफ आकर्षित हो जाएगा कबीर जी ने ऐसे मूर्ख लोगों के लिए कहा है जितना हेत हराम से उतना हरि से होय कह कबीर वासत का पला न पकड़े कोई जितना यह नश्वर संसार से प्रीति है उतना अगर हरि से हो तो कोई दुख आपका पल्ला पकड़ नहीं सकता तो मदन मोहन मालवे स्कूल जा रहे थे
कॉलेज मां आशीर्वाद दो बेटे बैल भी दूध देने लगे ये है मंत्र देती हू जिस किसी से मिलो भीतर में थोड़े शांत हो जाओ नारायण नारायण नारायण नारायण उसके गहराई में मेरा चैतन्य नारायण है चाहे व गरीब हो चाहे अमीर हो चाहे धर्मात्मा हो चाहे दुरात्मा गहराई में नारायण है ऊपर ऊपर से है सब अच्छाई बुराई जैसे सागर के ऊपर ऊपर अच्छी तरंगे बुरी तरंगे मैली तरंगे साफ तरंगे ऊपर ऊपर से गहरे में पानी ऐसे गहरे में सब में चैतन्य नारायण नारायण बेटे पास तो हो जाएगा बैल भी दूध देने लग जाएंगे फिर व कॉलेज
करके थोड़ा बहुत इधर उधर का समय थोड़ा राजनीति में समय लगा देश की आजादी में लगे उस वक्त अंग्रेजों ने ऐसी कूटनीति चली जो कुछ आंदोलन आंदोलन कर रहे थे उनको आपस में लड़ा ड़ा के ऐसा बुरा हाल कर दिया अधिवेशन विफल हो रहा था मदन मोहन मालवी जी ने नारायण नारायण नारायण नारायण स्मरण किया अंदर से मार्गदर्शन मिला गजेंद्र स्तोत्र का पा करो भागवत में है गजेंद्र स्तोत्र भगवान की स्तुति भगवान की प्रार्थना बड़ा बल देती भोजन ना मिले तो ना मिले लेकिन भगवान की प्रार्थना तो जरूर करनी चाहिए एक दिन भोजन का उपवास
तो स्वास्थ्य बढ़ा देता है लेकिन प्रार्थना छोड़ने से तो मन का स्वास्थ्य खराब हो जाता गांधी जी ने कहा मैं बिना पानी के रह सकता हूं बिना भोजन के रह सता हूं लेकिन प्रार्थना के बिना मैं नहीं रह सकता अगर मेरे जीवन में भगवान की प्रार्थना नहीं होती तो मैं पागल खाने में होता है या तो इस इस पताल में होता है या तो मैं आत्महत्या करके मर जाता मेरे साथ इतना इतना विश्वास घात हुआ इतना इतना संसार ने और अंग्रेजों ने मेरे साथ जो जो कुछ खेला है फिर भी मैं सफल होकर रहूंगा क्योंकि
मेरे पास भगवान की प्रार्थना है है राम का नाम है और गीता का ज्ञान है मैं सफल हो रहूंगा और हो गए सफल गीता का ज्ञान यह विद्या ब्रह्म विद्या है सब विद्याओं में श्रेष्ठ कर्म करते समय भी पाप और पुण्य के अहंकार से छुड़ा दे पुण्य करे लेकिन अहंकार ना कर नहीं तो वह पुण्य थोड़ा ही हो पाप से बचे और कैसे पाप से बचे यह ब्रह्म विद्या गीता सिखा देती कर्म करते समय पाप से कैसे बचे और पुण्य के अहंकार से कैसे बचे दुखों के भोग से कैसे बचे और सुख का सदुपयोग कैसे
करें सत्संग से गीता के ज्ञान से मिल जाता है गीता में कई विद्या हैं कर्म करने की विद्या योग की विद्या ज्ञान की विद्या भक्ति की विद्या समत्व विद्या ऐसी विद्या में गीता का रोज पाठ करते हैं प्रार्थना करते और भगवान राम के नाम का आश्रय लेते गांधी जी मदन मोहन मालवे जी ने नारायण नारायण किया और आया कि चलो गजेंद्र स्तोत्र करो तो वहां भगवान की स्तुति है और भगवान की स्तुति करके फिर उन्होंने बिखरे हुए सारे सम्मेलन को संबोधित किया जो टूट मूट रहे थे बिखर रहे थे वे इकट्ठे हो गए और देश
को आजाद कराने में मदन मोहन मालवे जी का बड़ा सहयोग रहा उसके बाद क्या हुआ कि उन्होंने काशी विश्वविद्यालय बनाने का संकल्प लिया अब काशी के लोग तो क्या दान देंगे बेचारे छोटी सी काशी उस समय तो चले गए हैदराबाद क्योंकि आंदोलन कार्यों में साथी मित्रों के नाए मिले जुले हैदराबाद के नवाब कुछ डोनेशन देंगे गए नवाब ने कहा मैं काशी वालों को लिए मैं यहां से काहे को दूंगा डोनेशन मेरा उनसे क्या लेना देना मालवे जी नारा नारायण करके लौटे रास्ते में कोई बुड्ढा आदमी मरते ना तो अपन लोग पैसे ने छावर करते फेंकते
तो कोई वृद्ध के ऊपर लोग पैसे फेंक रहे मदन मोहन मालवीय इतने तिलक गांधी नेहरू जिनकी इज्जत करते ऐसे मालवे जी जिन्होंने हारी हुई बाजी जीत में बदला नहीं का गजेंद्र स्तोत्र पाठ और प्रवचन देकर संगठित कर दिया ऐसे मालवी जी हैदराबाद की सड़कों पर आना दुवाना चलता था वो जमाने में आना दो आना चवन्नी अठन्नी 50 पैसी को अठन्नी बोलते व रास्ते चले जैसे छोरे ढूंढते ऐसे वो ढूंढने लग गए मुर्दे के ऊपर से पैसे फेंकते ना ने छावर करते वो ढूंढने लग गए तो सीआईडी वालों ने जाकर नवाब को बताया कि इतने बड़े
मदन मोहन मालवे काशी से आए और हैदरा की सड़कों पर चिल्लर ढूंढ रहे हैं तो उसने फिर से बुलाया नवाब बोले आप जैसा आदमी चिल्लर ढूंढे उन्होंने मन में वही चार बार नारायण नारायण जप लिया बोले मैं साथियों को कह के आया था कि मैं जाता हूं हैदराबाद के नवाब के पास और वो मेरे जाने माने परिचित है अच्छा खासा दान लेकर आऊंगा लेकिन आपने ना बोल दिया फिर मैं वो पूछेंगे क्या लाए तो मैं बोलू खाली हाथ आया नहीं जिंदो ने नहीं दिया तो कोई बात नहीं हैदराबाद के मुर्दे तो अच्छे हैं उन्होंने तो
कुछ दे दिया न आपके मुंह पर जुता पड़ गया बोले नहीं नहीं ऐसा ना करो ले जाओ लाखों रुपए का चेक दे दिया काशी विश्व विद्यालय आज भी इस बात की साक्षी है काशी में जाओगे विश्वविद्यालय मदन मोहन मालवे जी का देखने को मिल सकता है कहने का तात्पर्य है कि नारायण नाम गाय से तो दूध दिला देता है बैल को भी धोने की सफलता दे देता है बंद ताले भी खोल देता है नाम जपत मंगल दिशा दश भगवान का नाम मंगलकारी है दश दिशाओं में मंगल होता है रात्रि को सोते समय भगवान का नाम
लेकर थोड़ी देर पुनरावृत्ति करो जिससे ऊर्जा बने और आपका कमरा भगवन नाम के गुंजन से पावन हो जाए ताकि वह स्वासो स्वास आपके नींद में भी आपकी भक्ति को योग बना दे नींद को योग बना दे निद्रा यो होगा कैसे करेंगे कि रात को सोने के पहले पहले घर जाए तो हाथ पैर धो ले अच्छी तरह से सोते समय गले गीले पैर से नहीं सोए कभी अथवा पसीने वाले गीले वस्त्र पहन के नहीं सोना चाहिए रात्रि को स्नान नहीं करना चाहिए तो रात्रि को सोते समय बिस्तर पर मैं थका हूं ऐसा करके गिरे नहीं थोड़ी
देर बिस्तर पर बैठे बैठने के पहले थोड़ा वातावरण में हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ मधुर मधुर नाम हरि ओम ओम ओ ओम ओम ओ ओम ओ ओ हरि ओम ओम ओम ओ ओ ओ ओ ओम ओम ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ नंद देवा आनंद माधुर्य देवा हरि ओम ओम ओम राम राम राम राम शिव शिव शंभो भोलेनाथ अपने भगवत स्वभाव को जागृत करो भगवान सत है चेतन है आनंद स्वरूप
है मैं उनका हूं वे मेरे हैं संसार असत है जड़ है दुख रूप है अच्छा काम हो गया तो सच्चिदानंद की कृपा से प्रेरणा से हुआ बुरा काम हुआ तो अपने अहंकार से वासना से ना समझी से हुआ माफी वाफी मांग ली फिर सीधे लेट गए स्वास अंदर गया तो बाहर आया तो एक स्वास अंदर गया तो शांति बाहर आए तो दो स्वा संर आनंद बाहर आए तो तीन स संर सत चि आनंद ज्ञान स्वरूप मेरे प्रभु प्यारे प्रभु ओम प्रभु श्याम राम ओम माधुर्य आपका स्वभाव में जानता नहीं लेकिन आप है तो आनंद स्वरूप
महाराज मैं तुम्हारी गोद में आ रहा हूं बच्चा मां की गोद में निश्चिंत होता है इसी में तुम्हारी गोद में निश्चिंत नारायण की गोद में आ रहा हे माधव हे केशव हे अच्युता केशवा राम नारायण प्रेम स्वरूपा ज्ञान [संगीत] रूपा गुरु स्वरूपा ओम ओम ओ माध ओ माधुर्य [संगीत] भगवान के सच्चिदानंद स्वभाव की स्मृति करने से निंद्रा योग बन जाएगी छ घंटे नींद भी आ जाए और योग भी बन जाए इतना फायदा दिन भर की मजूरी से जो भी मिला उससे कई गुना ज्यादा फायदा है खाली नींद करने की अटकल ले लो निद्रा योग बन
सुबह नींद में से उठो तो थोड़ी देर मैं उस परमेश्वर का हूं जो मरने के बाद भी मेरा साथ नहीं छोड़ता शरीर तो असत है जड़ है दुख रूप है बीमारियों का खों का भरा संसार है लेकिन परमात्मा तो सुख शांति सत्यता और अमृता का भरा हुआ अनंत ब्रह्मांड में फैला हुआ मेरा मधुमय प्रभु ओम शांति ओम माधुर्य मन बुद्धि शरीर यह सब प्रकृति का है लेकिन उसको सत्ता स्पूर्ति और चेतना देने वाला मैं परमात्मा का हूं परमात्मा मेरे हैं ओम ओ परमात्मा को पाने में करण की अपेक्षा नहीं संसार को करण पकड़ते हैं करण
किसको बोलते हैं करण दो प्रकार के होते हैं बही करण अंतःकरण जैसे नेत्र नित्र इंद्री बाहर के दृश्य को पकड़ती है सूत्र शब्द को पकड़ता है नासिका गंध को पकड़ती है जीभ स्वाद को पकड़ती है त्वचा ठंडे गर्म को पकड़ती यह बही करण और मन भूख प्यास को जानता है बुद्धि वस्तु को परिस्थितियों को परिणाम को जानती तो यह नेत्र बाहर के वस्तुओं की आकृति बताते लेकिन बुद्धि उसके परिणाम और उसके गुण दोष बताए तो नेत्र कान जीव नाक त्वचा य बहि करण है बाहर का बताएंगे मन बुद्धि चित अहंकारी अंदर है देखा तो एक
व्यक्ति लेकिन यह मेरे साले का साला है साला यह मेरा चचेरा भाई है य मेरे किशनगढ़ का व्यापारी है हरीफ का दोस्त है मेरा मित्र का भाई बंद है यह बुद्धि बताएगी आंखें खाली व्यक्ति बताएगी तो बही करण और अंतःकरण यह संसार का ज्ञान देंगे लेकिन यह स्वयं ज्ञान लाएंगे परमात्मा से आंख को पता नहीं मैं आंख हूं पता है क्या कान को पता नहीं मैं कान हूं जीव को पता नहीं मन को भी परमात्मा चेतना के सिवाय पता नहीं कि मैं मन हूं बुद्धि को भी पता नहीं मैं बुद्धि हूं य तो जड़ है
प्रकृति लेकिन य सत चित आनंद स्वरूप ईश्वर से ही लाते और पकड़ते संसार को संसार की जानकारी देंगे भगवान को नहीं जान सकते ये करण है बही करण और अंतःकरण इसलिए कितना भी पूजा पाठ करो अच्छा है जरूरी है करना चाहिए कितना भी तीर्थ रटन करो अच्छा है भले करो लेकिन अंत में सतगुरु की कुंजी के बिना ताला नहीं खुले तो नहीं खुले नहीं खुले चाहे एक बार नहीं करोड़ बार तीर्थ कर चाहे एक दिन मंदिर में नहीं सभी दिन मंदिर में 2400 घंटे बैठे रहो एक दिन आंखें मंद के नहीं सारा जिंदगी समाधि कर
दो ये करणों से भगवान पकड़ में नहीं आएंगे जैसे सांसी हाथ से पकड़ते तपेली पकड़ में आएगी लेकिन जिस हाथ से पकड़ी जाती है उस हाथ को सान से नहीं पकड़े गी ऐसे ही मन और बुद्धि जहां से सत्ता लाते तो संसार को तो पकड़ेंगे लेकिन जहां से सत्ता आती उस भगवान को नहीं जान सकते तो हम गलती करते हैं मन बुद्धि से भगवान को जानने की मन बुद्धि से भगवान तो नहीं जाना जा रहेगा मति न लखे जो मति लखे बुद्धि जिको जान नहीं सकती लेकिन जो बुद्धि को जानता है मेरी बुद्धि बिगड़ी हुई
है कि अच्छी है वो कौन जानता है मेरा मन शांत है कि अशांत है वो कौन जानता है शरीर बीमार है ठीक है वो तो मन बताएगा लेकिन मन दुखी है कि सुखी है वो कौन बताएगा वो सच्चिदानंद का ज्ञान तो सच्चिदानंद का आपने स्वभाव जान लिया तो उसमें रसमय में आप मस्त हुए बिना रह नहीं सकते और जगत की नश्वरता जानी तो उससे आप उपरा हुए बिना रह नहीं सकते य पक्का करो उमा राम स्वभाव जही जाना उमा राम स्वभाव जही जाना ताही भजन तजी भावन आना साथी और मित्र गंगा के जल बिंदु पान
तक बीमार हो गए हकीम डॉक्टर ने हाथ ऊपर कर दिया तो मित्र और साथी क्या करेंगे जल पान करा देंगे साथी और मित्र गंगा के जल बिंदु पान तक अर्धांगिनी बढ़ेगी तो केवल मकान तक परिवार के सब लोग भी मिलकर अगर सहयोग करेंगे तो शमशान तक बेटा भी कर्तव्य निभाएगा तो अग्नि दान तक लेकिन तेरा कल्याण करेगा दोनों जहान में सच्चिदानंद बाकी कोई नहीं ऐसा मरने वाले शरीर तक है तुम्हारे तक इनकी पहुंच नहीं है शरीर को सहयोग कोई भी कर देगा लेकिन वो मरने वाले शरीर के सहयोग होगा तुम्हारे सहयोग तो गुरु की कृपा
की कुंजी और भगवान की कृपा उसके सिवा तुम्हारा सहयोग कोई कर नहीं सकता वहम घुस गया कि य हमको सहयोग करेगा यह सहयोग करेगा यह सहयोग करेगा सभी दुनिया दार मिलकर भी तुमको सहयोग नहीं कर सकते तुम्हारे शरीर को सहयोग कर और व शरीर तो मरने वाला है तुमको सहयोग करेगा गुरु मंत्र तुमको सहयोग करेगा भगवत प्र सा तुमको सहयोग करेगी गुरु कृपा ही केवलम शिष्य स्य परम मंगलम दीर्घ तापा नाम के त अच्छे समझदार व्यक्ति अपनी पत्नी को समझाए कि जगत तो नश्वर है त मेरे को छोड़ के मरेग या तो मैं तेरे को
छोड़कर मरूंगा बेटा बेटी या तो अलग हो जाएंगे नहीं तो मरेंगे तो शमशान पहुंचाएंगे और क्या कर लेंगे इसलिए संसार का स्वभाव पोलम पोल है संसार पर भरोसा करना महा मूर्खता है यह संसार कागज की पुड़िया बूंद पड़े गल जाना है यह संसार कांटों की झाड़ी उलझ उलझ मर जाना है कत कबीरा सुनो भाई साधु सतगुरु नाम काना है यह [प्रशंसा] संसार कागज की पुड़िया बूंद पड़े गल जाना है यह संसार कांटों की बाड़ी उलज उलज मर जाना है यह संसार झाड़ और झंकर आग लगे बरी जाना है कहा कबीर सुनो भाई साधु सदगुरु नाम
ठिकाना है पत्नी सहमत हो गई धन भागी वो पति पत्नी जो एक दूसरे को आध्यात्मिक सहयोग में सहमत हो जाते कर्म की गति गहन है लेना देना पड़ता है मैं अभी आपको कथा सुनाता हूं कैसी कर्म की गति तो यह दीर्घ तपा चले गए तो पत्नी ने भी देखा कि अपना समय भी हुआ है तो उसने भी अपना प्राणायाम किया और शवास रोका रोका रोका रोका रोका मन को इंद्रियो को यहां ले आई और झटका मारा तो शवास यहां से निकला ब्रह्म राद से वो भी पति के लोक को गई पति परमात्मा में लीन हुए
पत्नी भी लीन हुई अ बड़ा बेटा तो समझता था वो तो उन्होंने तो दोनों की मां बाप की दोनों की क्रिया की लेकिन छोटा जरा संसार में रुचि वाला था अब वो एकदम झटका लगा तो माड़ी रे मैं की कर जीवा रे पावक पावक मने कौन बुलावे ग रे माड़ी रे थारो पावक र यो तो माड़ी रे मु तो मरी गयो रे थारो पाव कटी जीवे गोरे मरे मां बाप रे बाप अब स्यापा करने लगे तो क्या मां या बाप आ जाएगा क्या थोड़ा देखा फिर पुनक ने कहा कि भाई तू मां को याद करके
रो रहा है पिता को याद करके रो रहा है अगर रोना है तो अगले जन्म में हिरणी तेरी मां थी हिरण तेरा बाप था उनके लिए भी थोड़ा रोले उसके पहले हाई देश में तू हाथी था हाथी नहीं तेरी मां थी और हाथी थाार बाप तो ले भी प्रो रो बंग देश में तू तित्र बना था तित्री तेरी मां थी और तित्र तेरा बाप था रे माटे भी रोले अरे एक बार तो आप और मैं दोनों भाई थे मैं तेरे से 10 महीने बड़ा था और जंगल में गए थे बेर खाने का शौक था फिर
वहीं कोई झटका आया और तू मर गया और मैं भी फिर कुछ समय के बाद मरा इस प्रकार तेरे और मेरे बहुत जन्म हो गए हैं लेकिन मैंने मात-पिता का अनुसरण करके इंद्रियों को मन को बुद्धि को जो सच्चिदानंद सत्ता देता है मैं उसमें विश्रांति पाया हूं मैं जानता हूं तेरे दिन तू मेरे को नहीं जानता यह संसार तो ऐसे ही है जैसे पानी का बुलबुला पानी केरा बुलबुला यह मानव की जात देखत ही छुप जात है जो तारा प्रभात क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज छोड़ी छोड़ी सब जात है देह गेह धन राज
ब बड़े राजे महाराजे आए हिरणपुर का हिरणाकुश वर्ष तपस्या किया ना ऊपर मरू ना नीचे मरू ना अंदर मरू ना बाहर मरू ना सुबह मरू ना शाम मरू ना दैत्य से म मनुष्य से ना देवता से ना किसी अस्त्र से मरू ना शस्त्र से मरू तो फिर भगवान का नरसी अवतार हुआ उसको भी मरना पड़ा तो यह मरण धर्मा शरीर है और वियोग धर्मा संबंध है तो यहां मरण और वियोग से तो कोई बच ही नहीं सकता चाहे भगवान राम का अवतार हो जाए वह भी अपना नियम स्वीकार करते हैं कृष्ण भगवान भी अपना नियम
स्वीकार करते हैं दशरथ का वियोग हुआ कौशल्या का वियोग हुआ राम जी को नहीं हुआ क्या हुआ और फिर राम का वियोग हुआ कई साथियों को तो संसार है मरण और वियोग से भरा है तो कब तक रोएगा इस प्रकार बड़े भाई ने छोटे को अज्ञान की नींद से जगाकर ज्ञान प्रकाश दिया तब पावक को लगा कि संसार का स्वभाव तुच्छ है इस पर भरोसा करना और इसमें सुखी रहने की कोशिश करना महा मूर्खता है सुख स्वरूप ईश्वर पर भरोसा करो आनंद स्वरूप ईश्वर को अपना मानो ज्ञान स्वरूप ईश्वर में शांति पाने का तरीका गुरु
कृपा से पाकर वोह भाई भी कल्याण के रास्ते चल [संगीत] पड़ा सुखदेव जी कोई साधारण आत्मा नहीं थे भगवान वेदव्यास जी के सपूत भगवान वेदव्यास जी विश्व के आर्ष ग्रंथ प्रथम ग्रंथ के रचता थे ब्रह्म सूत्र के भगवान वेदव्यास दृष्टि पात करके गर्भाधान कर दिया जिसे पांडु तरा और विदुर जन्मे थे भगवान वेदव्यास जी ने प्रति स्मृति विद्या से मरे हुए लोगों को बुलाकर धृतराष्ट्र से बात कराई थी करण दुर्योधन और भगवान कृष्ण जिनका आदर कर थे ऐसे भगवान श वद व्यास जी महाराज के सपूत थे जन्मते ही इतना विवेक था सुखदेव जी महाराज को
कि वो चल पड़ते भूख लगती तो भिक्षा पात्र यों करते तो वृक्षों से फल आ जाते ग्रहस्ती के घर इतनी देर ठहरते भिक्षा के लिए जितनी देर वो गाय दो ले नहीं तो काम क्रोध के लोभ के मोह के ममता के संस्कार वाले वातावरण में साधक बैठता तो फिर पतन होता है ईश्वर की प्राप्ति के लिए इतने विवेक वैराग्य वान थे सुखदेव जी महाराज ऐसे महामुनि सुखदेव जी महाराज कि यहां एक बार देव ऋषि नारद जी सुखदेव जी महाराज उठ खड़े होते हैं देखो क्या शिष्टाचार का महत्व है कितनी ऊंच आत्मा व्यास जी के सपूत
है और व्यास जी से भी ऊंची ब्रह्म निष्ठा के धनी एकदम विरक्त हो के जा रहे थे सुकदेव जी महाराज व्यास उनके पीछे पीछे बेटा कहां जा रहे हो आओ सुनो ब्रह्म सरोवर में कुछ महिलाएं स्नान कर रही थी नदी य सुखदेव जी चले गए तो उनको कोई संकोच नहीं हुआ लेकिन व्यास जी जब गुजरे पीछे से आने वाले तो महिलाओं को संकोच हुआ वो अपना सुकड़ सुकड़ के वस्त्र आदि में तो व्यास जी ने पूछा कि मेरा युवक बेटा पसार हुआ तो तुम तो निशंक होकर आश्य विलास से स्नान कर रही थी और मेरे
बुड्ढे को देखकर तुम सुकड़ गई हो क्या कारण बताओ बेटिया उन्होंने कहा महाराज वो जो गुजर गए तो उनके ऐसी परमात्मा में एकता नता थी कि यह स्त्री और यह पुरुष है भेद ही उनके चित्त में नहीं था हमको ऐसा लगा उनकी इतनी ऊंची ब्रह्म निष्ठा थी आपको तो अभी हम स्त्रियां दिखती है ना तो आप भी हमें पुरुष दिखते हैं तो इसलिए हमको आपसे संकोच करना उचित ही है मर्यादा कितनी ऊंची स्थिति के धनी रहे होंगे भगवान के तत्त्व में रमण करने वाले भगवान विद्यास के सुपुत्र वेदव्यास भी कम नहीं है उन्हीं की कृपा
से हम लोग कभी परमात्मा का ज्ञान शांति और माधुर्य पाने में सक्षम हो रहे हैं य उनि का प्रसाद है वेदों का अनुवाद किया संकलन किया वेदव्यास जी महाराज पंचम वेद महाभारत की रचना की 18 पुराणों का संकलन किया वेदों का संकलन नहीं मेरी गलती हो 18 पुराण चे वेदों का विभाग किए साधारण आदमी समझ सके ऐसा वेदों का प्रसाद समाज तक पहुंचाने की बड़ी भारी सेवा की वेदव्यास जी ने ऐसे वेदव्यास जी के सपूत सुखदेव जी महाराज जब आते सुखदेव जी महाराज और सुखदेव जी के आश्रम में जब नारद जी आए तो सुखदेव जी
उठ खड़े हुए अपने से ऊंचे ज्ञान ध्यान में मनोबल में प्राण बल में भगवत भाव में ऊंचे से ऊंचे व्यक्ति आते हैं तो अपनी प्राण शक्ति खींच कर उधर को जाती है अपन खड़े होते हैं तो उनको स्पर्श करके हमारी उन्नत दई प्राण शक्ति हम में स्थित होती है अगर हम बैठे ही रह जाते हैं तो हमारी प्राण शक्ति फिर दब्बू रह जाती उनकी प्राण शक्ति से तादात में की हुई प्राण शक्ति हमारी उन्नति करती है इसीलिए बड़े लोग आते तो उठकर खड़ा होता है जिससे हमारा मन और प्राण उनके बड़ों के बड़पन को छूकर
उन्नत हो सुखदेव जी महाराज उठ खड़े हुए साधारण बात नहीं है सुकदेव जी महाराज ने वेद इनका नारद जी का बड़ा अर्ग पाद से सम्मान पूजन किया अव मुनि शार दल भगवत ब्रह्म मूर्ति प्रेम मूर्ति सुख मूर्ति ज्ञान मूर्ति समता मूर्ति समता तो ऐसी सुखदेव जी में कि क्या क कोपिन पहनी की नहीं पहनी पता नहीं तन की सुधि न जिनको जन की कहां से प्यारे परीक्षित अन्न जल छोड़कर बैठे कि मुझे संसार से पार लगाने वाला कोई परम पुरुष महापुरुष मिल जाए कई जति जोगी ब्रह्मचारी मठ आदी से वो सब परीक्षित के सातव दिन
मृत्यु होने वाली है सज्जन धर्मा राजा थे सहानुभूति से भरकर सभी आए लेकिन ऐसा कोई पुरुष मिल जाए जो मौत के पहले मुझे अमरता का अनुभव करा उस संकल्प को लेकर अन्न जल का त्याग करके बैठे राजा परीक्षित ईश्वर कर तुम शक्य अ कर तुम शक्य अन्यथा कर तुम शकम और प्राणी मात्र के परम तेसी परमेश्वर मनुष्य मात्र को अपने सुख स्वरूप में ज्ञान स्वरूप में मोक्ष स्वरूप में माधुर्य स्वरूप में बुलाने की जिनकी महती कृपा है ऐसे भगवान भगवान हमको बुला रहे हैं इसका क्या प्रमाण क्या है संकेत क्या है कि हमको कोई भी
ना श्वर परिस्थिति नौकरी अच्छी लगी तो व से बदली करा देंगे पति पत्नी में अच्छा लगा मजा आया तो वहां कुछ ना कुछ विघ्न ढलवा द पैसे में रस आने लग गया तो इनकम टैक्स का नोटिस अथवा और कोई पैसा मर जाए मतलब मरने वाली चीजों में हम चिपकन रहे ऐसी भगवान की सुंदर व्यवस्था है ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाते हैं तो वहां से धोखा देर सबर आग खड़ा होता है य ईश्वर की कृपा है इसीलिए उस अंतर्यामी परमेश्वर का एक नाम श्री कृष्ण है वासुदेव देव की के यहां प्रकट हुए तब से
कृष्ण भगवान हुए ऐसी बात नहीं है भगवान तो वेदों में कृष्ण तो क्या राम जी तो लाखों वर्ष पहले हुए राम जी से भी पहले वेद है अत्यंत प्राचीन ग्रंथ है वेद वेदों में कृष्ण शब्द की महिमा है कर्ष आकर्ष कृष्ण जो सबको कर्ष आकर्षित कर दे आनंदित कर दे उस सच्चिदानंद परमेश्वर का नाम कृष्ण है जो सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय का कारण है वो सच्चिदानंद कृष्ण को को हम प्रणाम करते व्यास जी ने भागवत के मंगलाचरण में लिखा है आप उच्चारण करना सच्चिदानंद रूपाय सच्चिदानंद रूपाय विश्व उत्पत्ति आदि हे तवे विश्व उत्पत्ति
आदि हेतु ताप त्रय विनाशा त्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नमः श्री कृष्णाय जो सत्य है प्रलय होने के बाद भी जो रहता है और सृष्टि में भी जो व्याप रहा है और जो अभी हमारे अंतःकरण का मन और बुद्धि का साक्षी होकर बैठा है जो ब्रह्मा विष्णु महेश का भी आत्मा होकर बैठा है वह सत चित और आनंद स्वरूप जिसकी सत्ता से सृष्टि होती है उसका पालन होता है जिसमें सृष्टि विलय हो जा ऐसे सच्चिदानंद स्वरूप श्री कृष्ण को हम प्रणाम करते हैं ताप त्रय विनाशाय आदि देवी आदि भ और अध्यात्म यह त्रि ताप मिटाने
के लिए हम सच्चिदानंद कृष्ण को प्रणाम करते जो बंसी बजा रहे और घोड़ा गाड़ी चला रहे हैं उतने ही नहीं है ब्रह्मा विष्णु महेश और हमारे तुम्हारे आत्मा होकर जो विराजमान सूर्य में प्रकाश और चंद्रमा में चांद और जल राशि में स्वाद तत्व है पृथ्वी में गंद गुण जिनका है मां में जिनका वात्सल्य ल रस भरता है पिता में अनुशासन ऊर्जा देता है वह सत चित आनंद स्वरूप जो सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और परलय का कारण है उस परमात्मा को हम प्रणाम करते क्यों करते हैं प्रणाम बोले ताप त्रय विनाशाय आदि देविक आदि भौतिक और
मानसिक प्राकृतिक प्रकोप आरी देवी का है काम धंधा नहीं मिला बीमारी हो गई मकान नहीं मिला य आदि भौतिक मन में अशांति हो गई किसी दोष किसी पाप के कारण अध्यात्म भीतर ही भीतर दुख य तीनों ताप में लोग तप रहे हैं उन तीनों ताप की निवृत्ति के लिए लोग भगवान सच्चिदानंद को प्रणाम कर तीनों ताप की निवृत्ति के लिए यह बहुत उत्तम प्रार्थना है ऊंचा फल देने और उत्तम से तम सारे देवताओं को देवियों को रिझाओ लेकिन देवता और देवी भी आशीर्वाद या कृपा करेंगे तो उसे सच्चिदानंद की सत्ता से सीधा सच्चिदानंद को व्यास
जी ने मंगलाचरण में प्रार्थना की भागवत में मंगलाचरण का श्लोक है सच्चिदानंद रूपाय विश्व उत्पत्ति आदि हे तवे ताप विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नम ऐसे सच्चिदानंद स्वरूप में मगन सुखदेव जी महाराज जा रहे हैं मन चले छोरों ने उनको हे पागल है व कुछ का कुछ का लेकिन वो महापुरुष जानते हैं कि स्तुति जगत की धर जूते के तल चित्त में शोभ नहीं होता क्या ऊंची स्थिति अल्ला करने वाले लोग पीछे पीछे आए वो जा रहे ईश्वर सच्चिदानंद की प्रेरणा से सुखदेव जी परीक्षित जहां बैठे अन्न जल त्याग करके वहां जा उनकी ब्रह्म निष्ठा और
उनकी भार सच्चिदानंद में विश्रांति कितना महान बना देती है बड़े-बड़े जति जोगी तपस्वी ऋषि मुनि जो धर्मात्मा राजा परीक्षित मा के गर्भ में थे भगवान कृष्ण ने उनकी रक्षा की थी और मृतक दशा में भगवान कृष्ण ने अपनी समता का प्रयोग करके पानी छी था जीवित हो गए थे परीक्षित ऐसे परीक्षित इंतजार कर रहे वहां गए सोने के सिंहासन पर परीक्षित राजा ने सुखदेव जी महाराज को आशीन किया और रत्न जड़त सुवर्ण के थाल में उनके चरण धोरे हर्ष नहीं हुआ इतना लोग रयो कर रहे हैं मजाक कर रहे हैं उत्पात मचा रहे हैं तो
दुख नहीं हुआ और इतने बड़े धर्मात्मा राजा सज्जनों से सम्मानित राजा श्री कृष्ण से सुरक्षित राजा और पांडवों के कुल के दीपक राजा सुखदेव जी महाराज के चरणों में किंकर किनाई उनके चरण धो रहे हैं तो चित्त में हर्ष नहीं होता हर्ष शोक जाके नहीं वैरी मित समान कह नानक सुन रे मना मुक्तता ही ते जा आपको जब हर्ष आए नहीं तो देखना कि हर्ष चित्त में आया है हर्ष आता है जाता है शोक आता है जाता है लेकिन रहने वाला मेरा सच्च आपकी भक्ति द गुनी प्रभावशाली हो जाएगी बहुत लाभ होगा आपकी बुद्धि का
बड़ा भारी विकास हो जाएगा विवेक विकसित हो जाए व्यवहार में क्रिया और विवेक बस कर्म और विवेक का समन्वय हो तो आपका व्यवहार परमार्थ दोनों मस मौज करा द मौज विवेक और कर्म जुड़कर करो बिना विवेक के कर्म बंधन करा देते हैं नीच योनि में ले जाए और बिना कर्म के विवेक खाली हवाई तीर छोड़ता रहेगा भाषण भाषा में कर्म भी हो और विवेक भी हो तो ये राजा कर्म वीर भी थे और विवेक वीर भी थे ऐसे राजा परीक्षित सुखदेव जी का पूजन करते सुखदेव जी के चित्त में हर्ष नहीं होता धीरन द्वेट संसार
अपमान हु तो द्वेष नहीं आत्मा नम न दिक्षती हर्ष अम हर्ष वि निरमुक्त ना मृतो नच जीवती व मरता भी नहीं जीता भी नहीं मरता है तो मरने वाला शरीर और जीता है तो भी जीने वाला शरीर व पुरुष तो जीते जी विभु व्यापक ब्रह्म हो गया ब्राहमम स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष मोह कभी ना ठग सके इच्छा नहीं लवलेश ऐसी स्थिति में दृढ़ पर बैठे हम तो कुछ भी नहीं है सुखदेव जी महाराज की निष्ठा के ऐसे सुखदेव जी महाराज नारद जी का पूजन करते कैसा सुंदर विवेक और शिष्टाचार नारद जी उनके
पूजन और सत्कार से संतुष्ट होकर कहते हैं कि सुखदेव पुत्र नारद जी जीवन चिरंजीवी है सुखदेव की अपेक्षा सुखदेव जी भी चिरंजीवी है चरण दास जी को आकर मिले हैं 5000 वर्ष हो गए चरणदास तो भी हो गए चरण दास की शिष्या सहज बाई का भजन तो कैसे होई हरि तज दार गुरु को न ऐसी वफादार ऐसी ऊंची समझ की नी सहजो भाई बहुत ऊंची आत्मा सहज भाई गुरु की कृपा को ऐसा पिया ऐसा पचाया कि वाह धन्य है सहजो भाई के माता पिता भजन से मालूम होता है कि कितनी ऊंची स्थिति भी और चरण
दस जी महाराज दिल्ली के बादशा को का इतने दिन के बाद मुगल शासक तुम्हारे पर आएगा वार करेगा तुम तैयारी रखो और व मुगल शासक आया दिल्ली के बादशाह पर उसने कहला के भेजा कि मेरे को तो चरण दास महाराज ने पहले ही चार महीने पहले संदेशा भेजा था इसलिए मैं तो तैयार हूं तो उसने सोचा कि ऐसा फकीर तुम्हारे यहां रहता है तोहे तो पर चढ़ाई क्या करूंगा मुझे उस फकीर से मिलओ चरण दास के चरणों में आया मोहम्मद शाह ऐसे चरण दास के गुरु थे सुखदेव जी महाराज लेकिन नारद जी के आगे वह
बबलू होकर उनके चरणों में नतमस्तक हो रहे हैं क्या शालीनता है भारतीय संस्कृति की चक्रवर्ती राज राजा महाराजा तो कुछ भी नहीं होता सुखदेव जी के इंद्र का पद भी कुछ नहीं होता इंद्र देव भी कुछ नहीं होते देवता लोग आए थे प्रार्थना क्या सुखदेव जी को कि परिषद के लिए जो संकल्प करके आप ब्रह्म विद्या भागवत अमृत बरसाने वाले उनके बदले यह भागवत का कथा का सत्संग का अमृत हमें पिला दीजिए बदले में स्वर्ग का अमृत हम परीक्षित को पिला देते हैं सुकदेव जी ने कहा नहीं स्वर्ग का अमृत पीने से तो पुण्य नाश
होते और अप्सराएं मिलती है और विलास मिलता है सत्संग का अमृत पीने से पाप नाश होते हैं विवेक जगता है और भगवान का नित्य नवीन रस प्राप्त होता है ज्ञान प्राप्त होता है मोक्ष प्राप्त होता है स्वर्ग का अमृत तो है काच का टुकड़ा और सत्संग का अमृत है कोहिनूर पूरा काज का टुकड़ा देकर कोहिनूर लेने की येय बनिया गिरी तुम्हारी हम स्वीकार नहीं करते देवताओं को मना कर दिया वापस भगा दिया इतने बेपरवाह भाष थे सुखदेव जी ऐसे महा मु सुखदेव जी महाराज नारद जी का पूजन करते हार पहनने के लिए नहीं कृपा पाने
केलिए नारद जी का पूजन करते तो नारद जी बोलते वत्स तुम क्या चाहते हो तुम्हें जो भी प्रिय हो वो मैंने दे दिया तुम्हें जो भी प्रिय है वह मैंने दे दिया जो मांगो जो भी प्रिय हो मांगो तो मांगने वाले महा मनाओं को भी मात कर दे ऐसे मति के धनी विवेक के राजा विवेक जिनका सर्वोपरि परमात्मा प्रसाद सबसे बड़े में बड़ा बुद्धिमान हुआ है जिसकी अद्वित दृष्टि हुई दुनिया में बुद्धि मानों से बुद्धिमान है लेकिन अद्वित निष्ट की बुद्धि के आगे सब बुद्धिमान बबलू हो जाते हैं जितना व्यापक ज्यादा उतना बुद्धिमान ज्यादा होता
है नहीं तो एमबीए किया है मेरी लड़की एमबीए है दोनों कमाते 30 35 35 हजार लेकिन मेरा जवाई दारू पी के पड़ा और मेरी बेटी को मार मार के वो कर देता है लो एमबीए की ऐसी तैसी क्या पढ़ाई हुई 3 हज का नौकर बना और विदेशी कंपनियों का पिठू बनकर भारतवासियों को शोषित करके उनको ने दो करोड़ कमा के दिया साल में और तेरे को तीन चार लाख रुप पा लाख साल की सैलरी हो गई क्या हो ग एमबीए कर दिया तो बड़ी फूंक भर जाती है पीएचडी कर लिया तो फूंक भर जाती लेकिन
शांति तो नहीं मिली अपने परमात्मा पद को तो नहीं देखा नहीं जाना जो जन्म सिद्ध अधिकार था उस खजाने से वंचित रह गए पेट भरने के लिए नौकर बनने के लिए इतना पड़े हो अरे भगवान बनने के लिए कुछ तो यार थोड़ा समय निकालते बैठे पढ़ी पढ़ी पढ़ी जग पढ़ो लिखी लिखी लिखी क्या कीन तुलसी हृदय रघुवीर ना चिना तो रथा जन्मन व्यर्थ हो गया जन्म व्यर्थ खाना खराब कर दिया अपना खाकर काम क्रोध लोभ मोह में अपना रस नाश कर दिया जीवन खराब कर दिया मैं मैं हूं मैं पीएचडी हूं मैं फलाना हूं कभी-कभी
कहीं जाना होता है तो कुछ लोग परिवार वाले और उनके रिश्तेदार बैठे होते तो ऐसे ऐसे बेवकूफ की बात करते कि दया आती उन पर हम पसंद ही नहीं करते ऐसे बेवकूफ से बात करना आई वास फलाना में फलाना था रिटायर बुड्ढे बैठे रहते फिर बगते रहते मैं फलानी जगह का डायरेक्टर था मेरे हाथ नीचे इतने आदमी मैं फलाना न्यायाधीश था मैं फलाना था मैं फलाना था व रिटायर हो गए फिर भी व भूत को पकड़े रखे अरे तू इससे तो कितना ऊंचा था लाला वो नौकरी नहीं है हाथ काप रहे हैं कोई इज्जत नहीं
घर में बाबा जी आए दर्शन करने पड़ोस से भागा आया आकर यही सुनाता है कि आई वास सो इंडो मैं कहा अच्छा अच्छा भजन क्या करता क्या करूं उसके अहंकार को तो और बुडा मरेगा