[संगीत] [हंसी] [संगीत] सर्वेश तिवारी जी महाराज जी मन में ईश्वर के प्रति अपार आस्था और विश्वास है फिर भी तनाव और संकट के समय मन घबराता है अज्ञान जब तक निवृत नहीं होता देह भाव जब तक पुष्ट रहता है और भगवत विमुक्ताए उद्विग्न होता यह दूर नहीं होती ये बनी ही रहती है इसी को दूर करने के लिए हर समय नाम जपने के लिए हम कहते हैं हर समय प्रभु से जुड़े रहो आस्था है लेकिन हम प्रभु से जुड़े नहीं है तो आस्था का मतलब क्या रहा अगर हमारे हृदय में प्रभु का नाम चल रहा
है रात दिन हम प्रभु से जुड़े हैं तो फिर तनाव किस बात का तनाव शब्द नहीं रहता फिर यह तनाव शब्द बहुत ज्यादा जो सोचते रहते हैं ना उनको होता है ओवर थिंकिंग नाम जप है नहीं अब व बढ़ता चला जा रहा है मन कल्पना में सोच में बढ़ता कभी नेगेटिव कभी पॉजिटिव कभी रागा क्मक कभी द्वेषम अगर द्वेषम हुआ भार पड़ता चला जा रहा दिमाग कमजोर होता चला जा रहा वो डिप्रेशन वाला आदमी बन जाएगा अगर रागा मेंक तो गंदे आचरण में उतरता चला जाएगा तो भी परिणाम में डिप्रेशन में चला जाएगा दोनों तरह
से हाने राग और द्वेष दोनों तरह से आने राग द्वेष दोनों खोए खोजिए पद निर्वाण इसलिए हम कहते हैं राधा राधा राधा राधा राधा उठते बैठते चलते फिरते राधा राधा राधा राधा अरे तुम्हारा तो शरीर खानपान सब व्यवस्था है तनाव किस बात की तनाव ऐसा ना हो जाए कहीं कहीं ऐसा ना हो जाए ऐसा किया तो ऐसा क्यों नहीं हो गया ऐसा क्यों क्योंकि आस्था केवल जबान से कहने का विषय नहीं वो हृदय का होना चाहिए जब हृदय का विषय है तो भगवान ऐसा चाहते थे ऐसा हो गया भगवान जैसा चाहेंगे वैसा हो जाएगा हम
अपने कर्म से मतलब रखें कर्मण वाधिकारस्ते मा फलेश कदाचन राधा राधा राधा राधा मन कह रहा ऐसा हो सकता है भगवान ऐसा करेंगे तो मंगल भवन है कोई ना कोई मंगल विधान कर दे हम प्रसन्न हो जाएंगे हम आनंदित रहेंगे अगर भगवान से जुड़े रहे हम जुड़े नहीं जैसे लोग कहते हैं हम भक्ति करते हैं मंदिर जाते हैं अरे मंदिर में रात दिन बने रहो और भगवान का चिंतन नहीं चिंतन रुपया पैसा भोगों का तो भक्ति थोड़ी हो गई बात समझना है बात को अंदर से समझना है और आप हजार कोष दूर हो वृंदावन से
मंदिर से भगवान से प्रगट में लेकिन अंदर से चिंतन कर रहे हो तो आप भगवान के समीप हो चिंतन प्रधान और चिंतन विषयों का हो रहा है चिंतन भोगों का हो रहा है रूपया को हो रहा संसार का हो रहा है और मंदिर में बैठे हैं एक घंटा और कह देते हैं लेकिन हमें लाभ नहीं मिल रहा भाई चिंतन आपका कहां था भगवान चिंतन पर जोर दे रहे हैं गीता को देखिए अनन्य चिंत तो माम य जना परपा सते भगवान क अनन्य चेता सततम यो माम स्मृति नित्य सा अनन्य चिंतन पर जो तो आप राधा
या जो नाम प्रिय हो खूब नाम जपना शुरू करो देखो तनाव हटता है कि नहीं एक ही दवा हमारे हजार प्रश्नों के उत्तर की एक ही दवा है नाम जप नाम जप करके देखो आप आनंदित हो जाओगे तनाव नहीं जहां मन तनाव की स्थिति पैदा कर रहा है वहां नाम जप आप क्या भगवान शंकर भी भगवान शंकर जी ने पहले सती को समझाया पर जब सती के संशय दूर नहीं हुआ तो कहा जाओ परीक्षा ले लो जाक हमारे भगवान की जो तुम्हारे मन अस संदेह तो किन जाय परीक्षा लेहु अब होई सोई जो राम रच
राखा और को कर तर्क बढ़ावे साखा और असक लगे जपन हरि नामा क्या होगा अरे वही होगा जो भगवान होई सोई जो राम रच राखा भगवान ने जो रच रखा वही होगा भगवान जो रच रखा है वो बड़ा मंगलमय होगा क्योंकि भगवान मंगल भवन मंगल हारी है तो हमको भी चिंता क्या करनी है हमें दिमाग में तनाव की रखना देखो पूरी सृष्टि का भरण पोषण भगवान कर रहे हैं फिर भी तनाव नहीं है शेष सैया पर शयन कर रहे फिर भी शांता कार है हम भगवान के बच्चे हैं भगवान के अंश है हमें छोटी मोटी
सेवा मिली तनाव आपके परिवार में कितने लोग होंगे 10 लोग 20 लोग इत इससे ज्यादा तो नहीं होंगे आपकी पर्सनल तनाव वाला विषय पत्नी पुत्र परिवार अगर भाई है तो अपना अलग-अलग व्यवहार होता है हम कह रहे एक परिवार में कम से कम 20 लोगों का मान लो हम माता-पिता और जितना आपको प्रभु पर भरोसा की आस्था की बात करते हो लेकिन आपको भरोसा धन का है आपको अपने विचार का है अपने व्यापार का है व्यापार में घाटा तो आप ऐसा महसूस करोगे मर गया किसी काम का नहीं रहा अगर उसी समय पता चल जाए
कि अभी एक व्यापार हमारा पूरा सुरक्षित है लक्ष्मीपति भगवान वह एक चुटकी में जो है पता नहीं कैसे से क्या क्या कर देंगे तो आप प्रसन्न हो जाएंगे यार इधर का घाटा कहीं से पूरा कर देंगे पक्का कहीं से पूरा कर देंगे वो उनका भरोसा रखो अगर एक दिन भोजन नहीं मिला है तो भी निराशा मत करो वो एक दिन उसी रसोई से हजारों को भोजन दिला देंगे वो बहुत सामर्थ्य शली प्रभु है इसलिए हमें लगता तनाव रखने की तो जरूरत है ली प्रभु नाम जपने की जरूरत है प्रभु से जुड़ने की जरूरत है हृदय
से प्रभु से जुड़ने की जरूरत नरेंद्र सिंह जी रतलाम से राधावल्लभ राधा वल्लभ श्री हरिवंश गुरुदेव भगवान पिछले दो सालों से youtube2 सालों से मास मदिरा बिल्कुल छूट गया है हर पांच छ महीने में यहां आके आपके दर्शन कर करके सौभाग्य प्राप्त करते हैं यद्यपि सारे संशय लगभग दूर हो गए हैं फिर भी एक प्रश्न है महाराज श्री यदि किसे गुरु कृपा से ज्ञान प्राप्त हो जाए या अपने स्वरूप का बोध हो जाए तो वह साधक जा अवस्था में अपने स्वरूप में स्थित रहता है तथा भक्ति में वासुदेव सर्वम की स्थिति में रहता है किसी
ज्ञानी और भक्त की स्वप्न तथा शुक्ति अवस्था किसी अज्ञानी से किस प्रकार भिन्न होती है तथा जिस प्रकार स्वपन से जागने पर स्वपन झूठ प्रतीत होता है परंतु ज्ञान में संसार का अस्तित्व ना होने पर भी ज्ञानी का निरंतर प्रतिक्षण ले की ओर जाता दिखाई देता है महाराज जी इसका समाधान किसका प्रश्न है पहली बात तोय कि हम प्रश्न करते हैं आप उत्तर दो रसगुल्ला कैसा होता है मी कितना मीठा होता है मीठा होता इसके बाद बहुत मीठा होता है इसके बाद बहुत मीठा कितना होता है इसके बाद क्या उत्तर दोगे आप उत्तर नहीं दे
सकते अनुभव कर सकते हैं अनुभव ये जो आप स्थिति की बात करते हो यह अनिर्वचनीय स्थिति है अनिर्वचनीय माने जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता गाढ़ सुषुप्ति में तमोगुण के कारण वह बोध रहित होता है अज्ञानी जीव लेकिन गाढ़ सुसुप्त में जैसे बोध रहित स्थिति होने पर अज्ञानी को एक आनंद की अनुभूति होती छ घंटे बाद आज मैं बहुत अच्छा सोया क्योंकि सुषुप्ति में उसका कोई चिंतन नहीं हुआ संसार का समझ रहे हो ऐसे ज्ञानी पुरुष जागृत अवस्था में संसार की चिंतन से रहित और परमानंद में स्थित रहता है सुषुप्ति की तरह पर सुषुप्ति में
जागृत अवस्था अज्ञानी की नहीं है ज्ञानी जागृत अवस्था में सुषुप्ति की तरह है उसे तुरी अवस्था कहते हैं जागृत में गाढ़ सुषुप्ति की अवस्था की तरह आनंद में डूबा हुआ है और ऐसी स्थिति में उसके द्वारा क्रियाएं भी हो रही हैं इतनी आश्चर्यजनक स्थिति है उसका वाणी से वर्णन वो देखते हुए भी नहीं देख रहा सुनते हुए भी नहीं सुनता खाते हुए भी नहीं खा रहा है क्रियाए करते हुए भी व क्रिया रहित है क्रिया रहित होते हुए भी क्रिया सहित है समझ पा रहे हो क्रिया रहित होते हुए भी क्रिया सहित है क्रिया सहित
होते हुए भी क्रिया रहित है वह जागृत है पर जागृत होते हुए भी व जागृत नहीं है एक अलौकिक स्थिति ज्ञानी की अब प्रेमी की जागृत स्वप्न सुसुप्त स् फुरत में राधा पदा जत छटा वो जाग रहा है तो श्री जी में प्रियालाल में में और सो रहा है तो प्रियालाल में और स्वप्न में है तो प्रियालाल में इन जागृत स्वप्न सुषुप्ति अवस्थाओं का उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि इनका प्रभाव अज्ञानी देहा भिमानी पर पड़ता है वह हर समय अपने स्वरूप में रहता है जैसे ज्ञानी आत्मा स्वरूप में ऐसे भक्त भाव स्वरूप में
दास स्वरूप सखा स्वरूप गोपी भाव का स्वरूप सहचर भाव का स्वरूप ये भाव देह की प्राप्ति उत्तम अवस्था को प्राप्त महापुरुषों में जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति का भेद मिट जाता है जैसे वो समाधि में है ऐसे ही वह गाढ़ निद्रा में तमोगुण में जो सोया हुआ पुरुष है ऐसे अब ऐसी समाधि स्थिति में होते भी उसकी क्रियाएं हो रही है समाधि स्थिति में रहते हुए भी व खा पी रहा चल रहा है जी रहा है ये दिखाई दे रहा है लेकिन वो कुछ नहीं कर रहा है अब इस स्थिति को देहा विमानी कैसे समझ सकता है
एक अनिर्वचनीय स्थिति है इसीलिए जब तक अनुभव नहीं होगा तब तक सही माने में उसको नहीं समझ सकते क्योंकि जैसे प्रेम है वह अनिर्वचनीय प्रेम अनिर्वचनीय सूक्ष्म तरम अनुभव स्वरूपम कामना रहित यह स्थिति है द्वंती समम जो द्वंद वातीत हो चुका है सुख दुख मान अपमान लाभ हानि जीवन मृत्यु इससे अतीत अवस्था है उसकी अर्थात आत्म स्वरूप में स्थिति अब जब तक आत्म स्वरूप में स्थित रहे तो कैसे समझ पाएगा भला ऐसा कैसे हो सकता है कि देख रहा है और नहीं देख रहा है देखते हुए भी नहीं देख रहा खाते हुए भी नहीं खा
रहा चलते हुए भी नहीं चल रहा क्रिया करते हुए भी क्रिया रहित है और क्रिया रहित होते हु भी क्रिया सहित है ये तो बड़ा गुण प्रश्न है ऐसे ही प्रेमी का हैर रात मिलवे को निस दिन और मिले रहत निस दिन मनो कबहु मिलेना भगवत रसिक रसिक की बात रसिक बिना को समुझ सकेला बिना ब्रह्म बोध हुए बिना रसिक हुए स्थिति को समझा नहीं जा सकता स्वयं में भी नहीं समझा जा सकता औरों की तो बात झाले दो क्योंकि समझने की सामर्थ्य बुद्धि में होती है ना और बुद्धि को प्रकाशक है वह जो जिसको
हम बुद्धि से समझना चाहते वह बुद्धि का प्रकाशक है तो बुद्धि की इतनी क्षमता नहीं कि अपने प्रकाशक को जाए इसलिए बोध होता है अपने आप से अपने आप का बुद्धि से नहीं अपने आप से अपने आप का बोध होता है प्रेम होता है अपने आप का विस्मरण हो जाना जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है ये मतलब ये समझने का केवल इशारा मात्र है बकाया निज अनुभव ही इसका स्वरूप है वाणी से तो केवल संकेत मात्र चंद शाखा न्याय समझते ना चंद शाखा न्याय की तरह है अन्यथा स्थिति अनुभव गम में है
व बता जैसे बहुत साधारण अनुभव है गुलाब जामुन का रसगुल्ला का कैसा बोले मीठा बोले कैसा मीठा बोले बहुत मीठा बोले बहुत मीठा कैसा बोले खा के देख लो है नहीं तो ये परमार्थ की अनुभूति अध्यात्म की चल के देखो अनुभव करके देखो ये केवल संकेत है कि वो द्वंती है जैसे भगवान ने स्थिति का वर्णन किया निर्माण नमोहा जित संग दोषा अध्यात्म नित्या वि निवृत कामा द्वंद विमुक्ताए यम तत भगवान ने कहा व अव्यय पद को प्राप्त हो जा जो मान रहित है जो मोह रहित है अमोहा और जो जिसके ऊपर किसी भी विषय
वस्तु व्यक्ति स्थान के संग का किंचन मात्र कोई प्रभाव नहीं जित संग दोषा अध्यात्म नित्या जो आत्म स्वरूप में स्थित है विवृत कामा जिसकी सारी कामनाएं निवृत हो चुकी है जो दंद से मुक्त हो चुका है जो सुख दुख में समान भाव वाला है ऐसा ज्ञानी महापुरुष परम पद का अधिकारी होता है अमूढ़ा क्योंकि क तत्वा अभिमान रखने वाला मूढ़ पुरुष होता है अहंकार विमु आत्मा करता मति मनते वो करता और भोक्ता भाव से ऊपर उठा हुआ सिद्ध महापुरुष यह स्थिति है अब यह स्थिति अंदर आवे तब बात समझ में आवे कि व कैसे जागृत
स्वप्न सुसुप्त में हर समय भगवता का वृति रहती है ना भक्त सोता है और ना ज्ञानी सोता है जो स्थिति में आनंद है वह निद्रा में आनंद थोड़ी है निद्रा में जो इंद्रियों को नवीन चेतना और बल मिलती है और संसार का छ घंटे चिंतन छूट गया इसलिए और भक्त तो जागृत अवस्था में चिंतन संसार का छोड़कर भगवान में रमण करता है तो हर समय इंद्रियों को नवीन नवीन आनंद मिलता है इसलिए वोह विक्षेप को प्राप्त नहीं होती निद्रा विजय हो जाता है ज्ञानी भी और भक्त सोता हुआ नजर आएगा पर सुषुप्ति में नहीं है
वो वो उसी भगवता का चिंतन में मगन है निद्रा समाधि स्थिति ज्ञानियों की जो निद्रा है व समाधि स्थिति है भजन करो और सत महापुरुषों के वचन सुनकर उसके अनुसार चलते रहो तो यह अनुभव गम में विषय है बाल कृष्ण वशिष्ठ जी ग जय श्री राधे महाराज जी महाराज जी राधे राधे महाराज जी हम ब्रजवासी हैं और हमारा शरीर ब्राह्मण शरीर है महाराज जी हमारे बृज में जगह जगह में यात्री दर्शन करने आते हैं उन यात्रियों में से कुछ यात्री हमारे घर में आकर अमन प्रसाद जैसे चून चावल इत्यादि दे जाते हैं तो हम उसे
डर डर के लेते हैं कि पता नहीं किस भाव से दे जा रहा है हालांकि महाराज जी हम आपकी कृपा से हर एक वस्तु जो हमारे समक्ष आती है उसे प्रभु को अर्पित करके भोग लगाते हैं महाराज जी ये सब हमारे भगवत प्राप्ति में बाधक तो नहीं है हम आप बृजवासी हो आप तीर्थ पुरोहित का भी कार्य कर सकते हैं जैसे जगह-जगह ठाकुर जी को दर् ठाकुर जी दर्शन करना उसे कुछ रुपए मिले परिवार का सब हमारे ब्रज में सबसे बड़ी बात यह है कि धन का एक तरह से अभाव समझिए क्योंकि बहुत कम खेती
किसी किसी के पास होगी नहीं तो प्राया जीवन यापन करने के लिए ठाकुर जी है ठाकुर जी के दर्शन कराना ठाकुर जी की सेवा करना ठाकुर जी को लेकर ही हमारे ब्रजवासी जन और ब्रज में लाखों संत इन्हीं बृजवासन से जीवित है इन्हीं के उदर भरण पोषण के जो इन्हीं के घरों में होती है राधेश्याम मांगा एक रोटी इनके घर में एक रोटी ऐसे हजारों लाखों संत पूरे बृज चौरासी कोष में तो आप जैसे उ पुरोहित कर्म करके या य या फिर आपके घर में जो अमन आ जाता है ठाकुर को भोग लगा देते हैं
और किसी एक संत को रोटी दे देते हैं तो कभी कोई दोष आपको भगवत प्राप्ति में बाधा पहुंचा ही नहीं सकता हम यह जरूर प्रार्थना करेंगे कि हमारे जितने भी तीर्थ में दर्शन करा ने वाले ब्रज चौरा कोष में है बड़े भाव श्रद्धा से लोग आते हैं उनके साथ अगर छल कपट का व्यवहार होगा तो वह फिर अश्राथ धाम के ऊपर भी और धाम वासियों के ऊपर भी तो हमें चाहिए अर्थ की प्रधानता रख कर के हम छल कपट वाला व्यवहार ना करें सीधी सधी बात है कि हम चार जगह दर्शन कराएंगे अब हमारी जिम्मेवारी
बन गई कि चार जगह दर्शन कराकर उनको सुरक्षित स्थान तक छोड़ दे क्योंकि वो नहीं जानते तुम कहां ले जा रहे हो उनके साथ किसी भी तरह का छल ना हो कपट ना हो और उनको इतना विश्वास हो जाए कि अगली बार आवे तो आपके घर में आवे वह आपसे अपनापन कर ले अगर उनके साथ छल कपट हुआ तो धाम की भी श्रद्धा चली जाएगी और आप लोगों पर भी श्रद्धा चली जाएगी पर हम बाहर से आने वालों को प्रार्थना करते हैं कि जो 10050 रुपए आप देते हैं ब्रजवासी को तो आप निश्चित समझो जिन
संतों के आप दर्शन भी नहीं कर सकते ऐसे-ऐसे संतों को रोटी देते हैं वो जो एकांत में चुपचाप छुपकर भजन करते हैं ब्रजवासी के घर रोटी मांगते हैं हजारों की संख्या में मांगते हैं और उधर भरण पोषण होता है 20 वर्ष अपने लोग ऐसे जिए तो हमने देखा है कि जो सेवाकुंज निधिवन यहां वृंदावन में दर्शन कराने के लिए 50 या 00 लेते हैं और उनके घर में जब जाते तो घी की चुपड़ी रोटी हमें देते हैं तो सोचो वो 00 आपका कहां पहुंचा एक संत के उदर में एक रोटी के रूप में और हजार
हजार रुपया तो शराब पीने में खर्चा कर देते हैं लोग दसियों हजार लाखों रुपया होटल बाजी इधर-उधर में खर्चा कर देते हैं अगर ब्रज में आए 100 00 यहां के बृजवासन को दे दिया और वह दर्शन कराए तो हमें लगता है दोष दृष्टि नहीं करनी चाहिए दोनों पक्ष में और बृजवासन की व्यवस्था जब हमारे हाथ में आ गई कि अब हम दर्शन करा रहे हैं तो उनकी जेब सुरक्षित रहे उनकी चैन सुरक्षित रहे ऐसा उनको पहले संबोधन करके ऐसा व्यवहार करें कि अगली बार वो आपसे अपने घर जैसा व्यवहार करें तो कोई दोष नहीं है
क्योंकि यहां ब्रज में जीवन यापन के ठाकुर ही सब कुछ है सैकड़ों ब्रजवासी ऐसे हैं जिनके ना दुकान है और ना एक बीघा खेती बस केवल परिवार चल रहा ठाकुर जी से चार जगह दर्शन करा पूरा और उनके घरों में जाओ तो हम आपको कैसे बताए कि अगर एक दिन ना जाओ तो पूछते ए बाबा कल आए नहीं थे तुम देने के लिए इतने उत्साहित है कि कल आए नहीं थे तो इन बृजवासन पर कभी दोष दर्शन ना करें और बजवास को चाहिए कि बाहर आने वालों की कभी श्रद्धा का आनंद ना करें तो अगर
ऐसे चले तो बहुत बढ़िया भगवत प्राप्ति में कोई बाधा नहीं है कमलेश सिंह जी आजमगढ़ से राधे राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी जैसे स्वप्न में से जगने पर स्वप्न का जीवन मिथ्या लगता है वैसे ही कई बार मन में यह विचार आता है कि जो जीवन हम जी रहे हैं वह पूर्णत मिथ्या तो नहीं क्या इस संसार को जैसे मैं देख रहा हूं वैसा ही बाकी लोग भी देख रहे हैं या फिर सबकी दृष्टि का संसार अलग-अलग है वैसे दृष्टि की ही सृष्टि है जिसकी जैसी दृष्टि होती है वैसा ही संसार अनुभव
में आता है किसी को राम दृष्टि तो सीय राम में सब जग जानी किसी की श्याम दृष्टि और किसी की काम दृष्टि अलग-अलग दृष्टि है तो हमको जैसा दिखाई देता है वैसा आपको दिखाई देता है कि नहीं आपकी दृष्टि व आपको जैसा दिखाई देता है वो हमको दिखाई देता हैलिए हमारी दृष्टि यह संसार अपनी दृष्टि के अनुसार दिखाई दे देता है आंतरिक आंतरिक बात बाय तो मान लो जो स्त्री देख रहे तो स्त्री दिखाई देगा हजारों को लाखों को दिखाई देगा लेकिन आंतरिक दृष्टि में व स्त्री तत्व में भगवत तत्व देख रहा है कि नहीं
स्त्री शरीर में जो पांच भौतिक शरीर की रचना है उसमें भगवत तत्व देख रहा है कि नहीं या उसमें काम भाव देख रहा है या उसमें पूज्य भाव देख रहा है या उसमें मातृ भाव स स्त्री ही देख रहे हैं लेकिन उसमें आंतरिक चिंतन 100 का अलग-अलग होगा तो जो चिंतन वही माना जाता है इसलिए अपने को यही मानना है कि सबकी अलग-अलग दृष्टि है और एक दृष्टि हो गई जिसकी वही जीवन मुक्त हो गया एक दृष्टि भगवान के सिवा दूसरा कोई नहीं है एक को ब्रह्म द्वितीयो नास्ति उपनिषद शास्त्र कहते हैं एक ब्रह्म के
सिवा दूसरा कुछ नहीं है अगर यह दिखाई दे रहा है तो सही दिखाई दिया नहीं तो सही नहीं दिखाई दिया फिर तो अभी तब माया का द्वैत का जो मल है नेत्र में अभी हटा नहीं हट गया तो जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जाने बंदो सब के पद कमल सदा जोरि जुग पान सब में भगवान विराजमान सब भगवान ये सही दृष्टि है और गलत दृष्टि माया युक्त क्या ये पुरुष है ये स्त्री है गुणवान है ये दोष युक्त है यह उत्तम है ये अधम है यह नीच है यह महान है यह अज्ञान
की दृष्टि है और विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण गवित नहीं स्नी च सुपा केचा पंडिता संदर्शना यह पंडित की दृष्टि पंडित माने होता है ज्ञानी यह ज्ञानी की दृष्टि है जो विद्या विनय संपन्न में और गाय में हाथी में कुत्ते में चांडाल में एक ही तत्व को देखता है वो ज्ञानी है और जो अलग अलग देखता है वो अज्ञानी है जो सब में एक भगवान को देखता है वही सच्ची दृष्टि है जो अलग-अलग भेद दृष्टि नानाव दृष्टि यही अज्ञान की दृष्टि है वैसे हम यह कहना चाहेंगे कि मिथ्या केवल हमारी अभी की मान्यता है ब कुछ
मिथ्या नहीं है जैसे कहा जाता है ना शरीर मिथ्या है नहीं नहीं पंच भूतों से रचित है तो पंचभूत अपने अपने तत्व में मिल गए और वह अपने अपने में मिल गए और जब आप देखो तो सब जाकर ब्रह्म में मिल गए तो ब्रह्म स्वरूप अब भी है इसलिए सर्वम लमदम ब्रह्म पर पहले वैराग्य धारण करने के लिए पहले दो पद्धतियां स्वीकार की जाती है एक नहीं और एक है व्यतिरेक और अन्वय तो यह नहीं है यह नहीं है यह नहीं है तो जहा हम है में पहुंचे तब फिर जब देखेंगे तो सब वही है
एक भी चीज नाशवान नहीं है अब सब नाशवान है नहीं शाश्वतम भगवान कह रहे नाशवान है तो क्या नाशवान य आकृति यह आकृति नहीं रहेगी पर तत्व तो रहेंगे ना आकाश तत्व आकाश में मिल जाएगा जल तत्व जल में वायु तत्व वायु में अग्नि तत्व अग्नि में पृथ्वी तत्व पृथ्वी में और इन सब तत्त्वों के बाद में जहा मिलन होगा वह ब्रह्म है ब्रह्म से प्रकट हुआ ब्रह्म में ही लीन हो गया तो सब ब्रह्म ही है ब्रह्म के सिवा कुछ नहीं है केवल पद्धति है को समझने के लिए नहीं नहीं नहीं और फिर है
नेति लेति लेति और फिर इत यही है यही है यही है परमात्मा सब रूपों में साक्षात परमात्मा ही ये सब बना हुआ है सब कुछ वही बना हुआ है पर हमारी अभी वो दृष्टि नहीं जागृत ई इसलिए नहीं दिखाई दे रहा नहीं गोपी जन देख र ना जित देखू तित श्याम मई मैं जिधर देखती ह मुझे श्याम सुंदर गोपी जन कहती ना आनंद नारायण जी राधे राधे महाराज जी ईश्वर तो सर्वशक्तिमान है सर्वज्ञ है तो उन्होंने मनुष्य को ऐसा क्यों नहीं बनाया नहीं मनुष्य को बना अपने आप बने अभी तुमको ज्ञान ही नहीं है अपने
आप से अपने आप में रचना करके अपने आप में भूल गए अब आप जान जाओ आप कौन है तुम मनुष्य हो क्या मनुष्य शरीर ढाचा का नाम है क्यों इस ढांचे का नाम है ना ढांचा तो वो नहीं है जो है कहते वो निकल गया अब तो ढांचा रह गया है जब दूसरों को समझाते हो दूसरा कोई रोता होता है भाई देखो वह तो चले गए अब ये शरीर है अब इसकी अंतिम क्रिया कराओ रोने से क्या होगा मतलब शरीर से अलग है वो वोह अलग है वह कौन है आप जान पाए कि आप कौन
है अपने ढाचे को आप मान रहे हो कितने साल का शरीर है 63 साल 63 6 63 63 साल हो गए आपको शरीर में रहते हुए आप अपने को नहीं जान पाए अभी तक नहीं यह प्रश्न मन में आ गया ना कि मनुष्य को क्यों फसा दिया किसको फसा दिया आप है कौन आप खुद फस गए किसी ने किसी को नहीं फसाया आप हमें बोलो आपको क्या पकड़े आप पकड़े हो शरीर को आप पकड़े हो स्त्री को आप पकड़े मेरी पत्नी पुत्र को आप पकड़े घर को आप पकड़े हो रुपया को आप पकड़े आपको कौन
पकड़े आप बोलो आपको कौन पकड़े आप ही बंद गए तो आप कौन है अब लौट तो आप पढ़ी लिखी बात कहेंगे मैं भगवान कांस हू कहेंगे ना ऐा अगर आप थोड़ा भी शास्त्र पढ़े हैं तो ईश्वर अंश जीव अविनाशी रामायण गीता मम वां सो जीव लोके जीव भूता सनातना जीव कौन है मम वानस भगवान कां तो अब एक चम्मच गंगाजल लो तो क्या बोलोगे गंगाजल तो बोलोगे और एक टैंकर लो तो गंगा जल बोलोगे ना तो भगवान का अंश पूर्ण होता है वह भगवान ही है भगवत स्वरूप ही है अब अपने को भूल करके और
आप माया में फंस गए और आप दोष लगा रहे हो भगवान पर हा वो कौन फसा कौन फसाया किसने हमें बताओ कि तुम्हें भगवान ने फसा दिया कितना सुंदर मनुष्य शरीर मिला इससे ज्ञान प्राप्त करके आप भगवता आनंद में अभी डूब जाए लेकिन आप इस शरीर के भोगों में फस गए आप फसे हैं आपको भगवान ने कहा कि आप यह कर्म करो आप यह भोग भोगो आप ऐसा करो आप अपनी इच्छाओं में फसते चले गए इच्छा रहित हो जाओ आप भगवान के स्वरूप हो इच्छा रहित केवल आपको होना है इच्छा रहित हो जाओ आप भगवत
स्वरूप हो और आप कोई नहीं हो आप ढांचा नहीं हो जो हाथ जोड़े बैठा है ढांचा नहीं है आप आप वही हो वही झल निमान देखो इसमें बिजली है इसमें बिजली है इसमें बिजली है और बड़े-बड़े कारखानों में बिजली है बिजली तो वही है यंत्र के अनुसार काम कर रही ठंडी हवा गर्म हीटर यह सब ये यंत्रों का प्रभाव बिजली का नहीं बिजली तो पावर है ऐसे ही बुरा आदमी अच्छा आदमी बुरे आचरण गलत आचरण ये माइंड यंत्र की रचना तत्व वही है जो पावर दे रहा वो एक ही तत्व है परमात्मा दूसरा नहीं पर
जी आपकी बात ये मतलब सुन तो ली समझ भी धीरे धीरे आ रही पर उसका अनुभव कैसे हो भजन इसीलिए तो भजन कहा गया है बारी मथे ग्रत होए बरु सिकता ते बरु तेल बिनु हरि भजन भव तरी या सिद्धांत अपेल बिना भजन के कोई ज्ञान म्यान नहीं काम करता क्योंकि अभी तो यही नजर आ रहा है मेरा बेटा मेरी बह मेरा पैसा बि तो अभी तो ये सब ज्ञान की बातें केवल कहले सुनने की है स्थिति तो शरीर में है ना भी काफी ऊपर से जा रही है हा इसीलिए भजन करे भजन इसीलिए हम
सबको कहते हैं राधा राधा राधा राधा राधा नाम जप करो राम राम कृष्ण कृष्ण हरि हरि बड़ा मंगल हो जाएगा इसी से सब ज्ञान प्रकट हो जाएगा आप भगवान पर दोष ना करिए कि उन्होंने हमें फंसा दिया तो तुम कौन हो बात समझना पड़ेगा और क्यों तुमसे दुश्मनी है भगवान की फसा देंगे अबे बताओ कितना बढ़िया व्यवस्था की है भगवान ने हम लोगों को कितनी बढ़िया सुंदर मनुष्य दे दी है कितनी सुंदर व्यवस्था की कि यदि हम चाहे तो अच्छे राह पर चलकर आनंदमय यह जीवन व्यतीत करके और अंत में हम भगवान को प्राप्त हो
जाए भगवान की देखो अगर रसोई यहां है तो शौचालय भी साइड में है अगर शौचालय ना हो तो एक अधूरा घर है नहीं है ये रसोई है यहां से जा रही तो शौचालय भी भगवान पूरा संसार निर्माण किया अधूरा नहीं तो इसमें सब कुछ है अब आप पसंद क्या करते हो भगवान ने कैसे फसाया आप फस रहे हो अगर आप शराब ना पीना चाहो तो आपके मुंह में बोतल कौन डाल देगा आप मांस ना खाना चाहो तो आपको कौन खवा देगा आप व्यभिचार ना करना चाहो तो कौन व्यभिचार कराएगा ये कौन कर रहा है आप
कर रहे हो भगवान ने आपको पावर दिया है मान लो बोलने का पावर दिया आप अच्छा बोल सकते हो या बुरा बोल सकते हो ये छूट है आपकी अब आप किसी को निंदा करो गाली दो तो ये तुम्हारी गलती है बोलने का भगवान ने पावर आपको दिया आप इससे अच्छा भी बोल सकते थे आप दूसरे की प्रशंसा भी कर सकते थे आप इससे भगवन नाम कीर्तन भगवत गुण गा सकते थे तो हमें भगवान को दोष नहीं देना हमें देखने की शक्ति दी हम क्या देख रहे हैं अच्छा देख रहे हैं या बुरा देख रहे हैं
सुनने की बात दि अब हम बुराई सुन रहे हैं या भलाई सुन रहे हैं करने की बाद भी हम बुराई कर रहे हैं भलाई कर रहे हैं देखो पावर हमको दे दिया जैसे तुम्हें भूमि दे दी जोतने बोने के यंत्र दे दिए और बीज दे दिया सैकड़ों प्रकार का अब आप जो बीज बोना चाहो अब आप बो रहे बबूल और कह रहे हो दाग सुहारा नहीं दिया बड़ा अनर्थ कर दिया तो भगवान ने दाग सुहारा का भी बीज दिया था आप वो बो देते ऐसे ही आप चाहते सुख हो और करते पाप हो तो आपको
सुख कैसे पाप रूपी वृक्ष में दुख रूपी फल लगता है विपत्ति रूपी फल लगता है और पुण्य रूपी फल उसका जब आएगा तो सुख लगेगा आनंद मिलेगा तो आप आनंद के मार्ग में चलो तो अभी आनंद मिल जाए अब बुरे मार्ग में चलोगे बोले भगवान सर्व शक्तिशाली थे फिर उन्होंने ऐसा नहीं भगवान ने नरक भी बनाया है और भगवान ने स्वर्ग भी बनाया है भगवान ने अच्छाई भी बनाई है बुराई भी बनाई और दोनों का आपको ज्ञान है कि अच्छा है ये बुरा है तो आप बुरा ना करो अच्छे मार्ग में चलो आनंद हो जाएगा
भगवान कहां बांधे हुए हैं हमें तो ये नहीं समझ में आता कि हमें बांधे कौन है हम खुद बंधे हुए हैं तुम इच्छा करके गलत आ चरणों में बंधते चले जा रहे हो तो अब फ कहते भगवान की माया बड़ी जोरदार है छोड़ नहीं रही छोड़ कहां र तुम नहीं छोड़ रहे यार काहे को माया प डाले हुए हो तुम नहीं छोड़ रहे हमें बताओ तुम छोड़ दो तुम्हें कौन पकड़े आप ही पकड़े हो आपको कोई नहीं पकड़े अब लोग मूर्खता में फसे नहीं फसे बोले अब यार चाहे जो कुछ हो जिंदगी में यह तो
नहीं छोड़ सकते हम इसके बिना जी नहीं सकते और जब स्वीकार नहीं किया था तब भी तो जी रहे थे यह कमजोरियां हमारे अंदर आ गई यही भगवान की माया का दोषम दे देते हैं कि यह भगवान की माया है मां माने नहीं या माने जो जो है नहीं उसको हम दोष दे रहे हैं और हम ही गलती करके फंसते हैं क्यों भैया कहीं भगवान दोषी नजर आते हैं क्या आप हमें बता दो इतना सुंदर आपको नेत्र दिए कान दिए नाक दिए हाथ दिए पैर दिए कितने कृपालु हैं भगवान और हमको अवसर दिया कि हम
भजन करके भगवान को प्राप्त करें व हम भूल गए संसार के भोगों में अब इसमें भगवान का क्या दोष है हमें तो नहीं लगता प्यारे भगवान का कोई दोष है हमारे दोष हैं अब हम उनसे क्षमा याचना करके भजन करें अभी आनंद आ जाएगा भजन करो भजन करले से ही परमानंद की प्राप्ति होगी नाम जप करते हो अरे थोड़े बहुत से काम नहीं चलेगा आप शरीर छोड़ के जाना है यहां से भैया और यहां जो कुछ है वो सब घड़ी भी रह जाएगी तुम्हारी यही घड़ी भी नहीं जाएग य भी नहीं जाएगा तुम्हारे साथ तुम्हारा
हाथ भी तुम्हारे साथ ले जाएगा और का हाथ का और कोई कौन हाथ हमारा पकड़े हमारा हाथ भी नहीं रहे जाए यही सब जला दिया जाता है केवल नाम जप जाएगा और आपके किए हुए शुभ अशुभ कर्म जाएंगे इसलिए सबसे प्रार्थना है मन लगे ना लगे खूब नाम जप करो उठते बैठते चलते इसमें पैसा नहीं लगता भाई राम राम हरि हरि कृष्ण कृष्ण राधा राधा इसमें कहने पैसा लगता है क्या खूब नाम जप करो आज से और बढ़ाओ नाम जप एक ले लो काउंटर काउंटर बोले ऐसे ऐसे बड़ा उसम मन भी लगता है बोले 1000
हो गए हा 1500 उसम मन लगता है ले लो बहुत बढ़िया धन है भगवत नाम कबीरा सब जग निर्धना धनवंता नहीं कोई धनवंता सय जानिए जा के राम नाम धन आप जप के देखना आनंद आ जाएगा आप भगवान से शिकायत करना बंद कर दोगे रोना शुरू कर दोगे और भाषा बदल जाएगी कितनी कृपा है प्रभु आपकी हमारे ऊपर ऐसा अनुभव होने लगेगा ठीक है देवराज चंद्रा जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी बच्चों के अच्छे बुरे संस्कार के उसके माता पिता उत्तरदाई है लेकिन जब घर में स्कूल में टीवी दो बातें हैं एक तो उस
बच्चे का पूर्व जन्म का संस्कार और दूसरा नवीन संस्कार माता-पिता केवल माता-पिता ही नहीं ऐसे देखे गए माता-पिता बहुत बड़े भक्त और पुत्र महान दुष्ट पूरा दुष्ट देखा गया बहुत से ऐसे देखे गए कि माता-पिता बड़े दुष्ट स्वभाव के सब खानपान और लड़का मतलब बिल्कुल साधु स्वभाव का तो कई विपरीत देखी जाती है इसलिए हमने बोला कि पूर्व जन्म का संस्कार और माता-पिता का शिक्षण यह संस्कारों में आता पूर्व जन्म का संस्कार बहुत जोर का होता है बहुत जोर करता है तो माता-पिता का बहुत प्रयास होने पर भी यदि सफलता ना प्राप्त हो तो उसे
पूर्व संस्कार समझना चाहिए और माता-पिता अगर प्रयास करें तो कुछ नवीन संस्कारों में परिवर्तन दे सकते हैं पूर्व संस्कारों में नहीं पूर्व संस्कार धूर्त या उज्जवल दोनों प्रकार के होते कुमति या सुमति के अगर कुमति के हुए तो लाख कोशिश कर लो आप परिवर्तन नहीं कर सकते और सुमत के हुए तो थोड़ा सा सहारा देने पर भी व आगे बढ़ता चला जाएगा तो क्या कहना चाहते हैं आप कितना कहां तक प्रयास करना चाहिए अभी शायद इसका उत्तर अभी मिल गया हम एक प्रयास कर रहे हैं इसके बाद अगर हम असफल है तो समझते हैं पूर्व
जन्म का संस्कार इसको विवस करके सुनो भरत भावी प्रबल बिलख कहो मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विध्या एक हम उसको एक बार दो बार तीन बार चार बार समझाते चले जा रहे हैं फिर भी नहीं समझ रहा है अब उसको भोगना है अब उसको अपनी गति भोगनी इसलिए व आपके उपदेश नहीं मानेगा वो अपने मनमानी आचरण करेगा पूर्व संस्कार बहुत प्रबल होते हैं विनाशकारी होते हैं देखो भगवान श्री कृष्ण धृतराष्ट्र को भी समझा रहे हैं दुर्योधन को भी समझा रहे हैं कर्ण को भी समझा रहे लेकिन तीनों की समझ में आते हुए
भी कुछ नहीं आ रहा जो कह रहा है कि धर्म में प्रवृत्ति ले तो भगवान 20 दूत बन के गए नहीं समझ में आया तो माता-पिता को ये इसीलिए हम बीच में बोल पड़े थे उनको ध्यान रख ना चाहिए कि पूर्व जन्म का आया हुआ जीव है इसके क्या कर्म है अगर वह आपकी बात नहीं मान रहा तो ज्यादा गुस्सा होने की जरूरत नहीं है उसका पूर्व कर्म उसको नष्ट करेगा उसको ले जा रहा है आप केवल किसी आपका भी कर्म है उसके सहयोग से तो आप दुखी या सुखी हो सकते हैं अच्छे कर्म वाला
तो देख देख देख के सुखी होंगे बुरे कर्म वाला तो देख देख के दुखी होंगे क्योंकि आपका भी कर्म उससे जुड़ा हुआ है तभी आप पिता बने हैं आकर के तो जहां तक हो सके बचाने की कोशिश करें जब ना हो तो भगवान की शरण में हो जाए कि हे भगवान अब आप देख लो मेरे बस की बात नहीं रही तो फिर आगे जीव अपने कर्मानुसार फिर दुख सुख भोगता है और आजकल के बच्चे तो माता-पिता का कहा मान लेय कोई हमें लगता है पूर्व जन्म का बहुत आपका भजन होगा जो आपका कहा मान ले
आपका बच्चा नहीं तो बड़े उद्दंड स्वभाव हो रहे हैं जबकि विद्या से विनय आती है तो डिग्रियां है लेकिन उद्दंडता बहुत है ऐसे उत्तर दे देते हैं उद्दंडता पूर्वक जहां मात पिता प्रभु गुरु के वानी बिन विचार करी सुभ जानी जहां प्रातकाल उठ के रघुनाथा मात पिता गुरु नाव अब वो सब धर्म कौन बेटा अपने माता-पिता के चरणों में मस्तक रखता है कोई बिरला ही होगा नहीं तो चरणों में रखने की तो बात ही खत्म हो गई है वो मोबाइल में देख रहे हैं देखो आप अपना पढ़ाई का कार्य देखो आप क्या गेम देख रहे
हो क्या ऐसे वो उल्टा जवाब दे देंगे उनको डांट देंगे अपने माता-पिता को डांट देंगे तनिक भी दया उसके अंदर अपने पिता के प्रति केवल अपनी वासना की पूर्ति के लिए और वो बेचारे बूढ़े माता-पिता ऐसे व बहुत तो आजकल अगर बच्चा अपने माता-पिता की बात मान जाए तो हमें लगता है बहुत तपस्या रही है माता-पिता की जो बच्चा मान जाए नहीं तो बहुत ही उद्दंडता बच्चों में आ गई है पढ़ाई जहां विनम्रता आ नहीं चाहिए विनयम विद्या विनयम ददाति वहां उद्दंडता जागृत हो रही बड़े बुजुर्गों की बात ना मानना और संत तो महात्माओं की
बात ना मानना शास्त्र की बात ना मानना अब ये तो आज भगवान की असीम कृपा है कि हमारे नौजवान भाई कुछ हमारी बातें सुन रहे हैं और मान रहे हैं ये हम भगवान की बड़ी कृपा मान रहे हैं नहीं तो अपने बाप की नहीं मानते हमारी क्या मान जाएंगे हम तो बाबा जी हमारी बात क्या मान जाएंगे अपने बाप के नहीं मानते ये तो भगवान की कृपा को कि मान रहे हैं तो जहां तक हो सके तहां तक अंतिम स्वास तक अपना प्रयास करना चाहिए फिर जब हार हाथ में आ जाए तो समझना चाहिए इसका
प्रारब्ध होग है प्रयास तो हमने बहुत किया माता-पिता प्रयास ही कर सकते इसके आगे नहीं कर सकते माहौल भी घर में ऐसे ही रहता है महाराज जी की मोबाइल हो कि स्कूल भी हो हर जगह भोगवा दी सिखाया जा बच्चों को अच्छे स्कूल में भी डाले हैं वहां भी भोगना भोग ही सिखा रहे हैं हमको य लगता है हमारा जो जो परिश्रम है वो व्यर्थ जा रहा है क्योंकि देखो आधुनिक पढ़ाई में तो प्रवीण आपको मिल जाएंगे लेकिन अध्यात्म शून्य मिलेंगे टीचर भी बहुत से ऐसे हैं जो अध्यात्म शून्य वास ना के कीड़े हैं खुल
जाती है तो पकड़ में आ जाता है कि वहां का प्रिंसिपल पकड़ा गया वहां का मास्टर पकड़ा गया क्यों बड़े प्रवीण है लौकिक विद्या में लेकिन अध्यात्म विद्या ही काम क्रोध आदि को वश में कर सकती लौकिक विद्या थोड़ी कर सकती है ये आधुनिक पढ़ाई काम क्रोध आदि को बढ़ावा दे सकती है लेकिन उसको शासन में लेने के लिए अध्यात्म विद्या चाहिए बाहरी शत्रु को हम बाहर गोली से मार सकते हैं लेकिन आंतरिक शत्रु को अध्यात्म से ही मार सकते हैं तो आजकल के टीचर अध्यात्म विहीन जो हैं उनसे संभावना नहीं है कि बच्चों के
संस्कार या अच्छे चरित्र की नई संभावना है जो अध्यात्म से जुड़े हुए टीचर हैं वही हमारे बच्चों को जिनको अध्यात्म का शास्त्र का ज्ञान ही नहीं है तो फिर वोह ब्रह्मचर्य एक बहुत बड़ी नीव है चाहे गृहस्थ में जाना हो या अध्यात्म में चलना हो दोनों मार्ग के लिए ब्रह्मचर्य जरूरी है तो ऐसे गंदे आचरण सिखाने वाली पढ़ाई गंदे आचरण सिखाने वाले डॉक्टर हमारे बच्चों की नवीन पीढ़ी बहुत बुरी तरह गिरती चली जा रही कई ऐसे जैसे हस्त क्रिया आदि ऐसे शिकार हो रहे हैं नए-नए बच्चे जिनसे परमार्थ भीन हो रहे और खुल कर के
तो अब चलने ही लगा बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड ये सब चलने लगा इससे क्या होगा वैसे ही इंद्रिय और मन काबू में नहीं थे अब ये और छूट हो गई कि तुम जहां राजी हो तुम राजी हो तो तुम्हें कोई बोल नहीं सकता इतने पढ़े लिखे बुद्धिमान बच्चे और ऐसे मार्गों में जा रहे हैं कि अगर उनको रोकना चाहो तो आप रोक नहीं सकते अच्छा रोकने के लिए यही सब है अच्छा अपने तो हाथ जोड़ के समझा सकते हैं तो जो मदान बच्चे हैं व यह भाषा थोड़ी समझते हैं अब माता-पिता हर समय बच्चे के साथ थोड़ी
है अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं पैसा ले रहे फीस के लिए या स्कूल के लिए और मन बाली इधर उधर तो हमें लगता है कि अगर माता-पिता प्रयास करें और गुरु टीचर प्रयास करें और उनको वातावरण थोड़ा आध्यात्मिक मिले तो ही बदल सकते अन्यथा नहीं महाराज जी एक निवेदन आपसे गोस्वामी जी लिखे हैं मात पिता बालक बुला उधर आजकल तो पिता नहीं सा जिनके यह आचरण भवानी जान निचर संप पर बदला जा सकता है अध्यात्म से बदला जा सकता है घोर व्यभिचारी वैश्या गामी हिंसक भी महात्मा बन गए संतों के संग से बल गए
नहीं बल गए तो हमें निराश तो होना नहीं है अंतिम श्वास तक बदलने का प्रयास करना है आप पूछ रहे थे कि कहां तक अंतिम श्वास तक जब तक हमारा जीवन है हम प्रयास करते रहेंगे और बच्चा ना सुधरे भगवान जाने और बच्चे का कर्म जाने पर पिता है तो अंतिम स्वास तक उसे बचाने की कोशिश करेंगे अंतिम स्वास तक उसका सहयोग करेंगे वो भले गाली देके चला जाए पर हमको खबर मिलेगी तो हम उसका सहयोगी करेंगे ऐसा माता-पिता का भाव होना चाहिए और फिर अगर वह नहीं तो फिर उसका प्रारब्ध भोग हो तो भोग
नहीं पड़ेगा पंडित श्री सतवीर सत्यानंद जी शत शत नमन महाराज जी महाराज जी मैं 37 वर्षों से सदगुरु कृपा से भगवान शिव आराधना में संलग्न हूं परंतु जब मैं शिव मानस पूजा से स्तुति करता हूं तो मुझे यहां आकर शंका हो जाती है उसमें एक लाइन आती है य दत करो तलम शंभो तवा [संगीत] राधनैस्डा स्तोत्र का भाव है वो शिव समर्पित है शिव समर्पित का शरीर भी भगवान को समर्पित है मन भी भगवान को समर्पित है और स्वयं भी समर्पित है तो उसके द्वारा जितने आचरण हो रहे हैं देखो यहां तो तुम शिव आराधना
पर कर रहे हो देवर्ष नारद जी ने एक भक्ति का सूत्र गायन किया कि भक्ति का स्वरूप क्या है बोले तदर्थ चरिता तद स्मरण परम व्याकुल दे अखिला चरिता का मतलब समझते हो आप समस्त आचरण समस्त गीता जी में भगवान आदेश कर रहे येतु सर्वा कर्माणि म सस्य मत परा अनन्य नव योगेन माम ध्या उपाते यह तो सर्वा कर्माणि का मतलब समझ रहे हो ना नहीं समझ रहे हो सर्वा कर्माणि है ना सर्वा कर्मा तद पिता अखिला चरिता कम वहा पर स कर्म सत कर्म तो आप इसमें भाव समझना वह संभो तवा आराधन करने वाला
है ना तो व तत कहे या ना कहे यद कर्म करो जो मैं कर्म कर रहा हूं वह आपकी आराधना बन जाए क्योंकि वह शिव का समर्पित है तभी माना जाएगा शिव भक्त तभी मा होता महाराज मतलब जैसे हम मतलब कार्य करते हैं और करने में लगे हैं समर्पित नहीं हो पाए नहीं ये बात हमारी समझना होगा कि जब तक करता है कर्ता अगर बकाया है तो उसके द्वारा अपराध बनते हैं बनते हैं और साधना का स्वरूप है कर्तव्य मनो भीर अमल सोहम तव वासिता भक्त का स्वरूप क्या है जानते हो तनु वांग मनो भीर
अमल सोहम तव वासिता शरणागति अगर नहीं तो फिर आराधना किस बात की और ये शरणागति है तन वांग मनो भीर तो अगर आप अपने को अभी ये मान रहे हैं कि कर्म करता हूं तो आपके ऊपर शासन लगता है तस्मा शास्त्रम प्रमाण ते कार्या का व्यवस्थित आप शास्त्र के अनुसार कर्म करें अब शास्त्र के अनुसार जो कर्म होगा तत् कर्म होगा या स्वकर्म होगा विचार करो वह स्व वासना से युक्त होगा या शास्त्र सम्मत हो तोव शिव अर्पित हुआ कि नहीं हुआ तो उसमें आप कैसे भेद डाल सकते कि कुछ अर्पित करेंगे कुछ नहीं गीता
जी में आपने पढ़ा है यत करो से मैंने यही कहा था कि य सब कर्म कम शिवा तो आराधन भगवान जी सत क्रम आपके आराधना है अगर जो मेरे से गलत कर्म करते हैं मैं आपकी आराधना उसको कैसे मानू गलत कर्म हो कैसे सकते हैं जैसे हम चल रहे हैं तीता मर गया और कुछ हो गया उसका प्रारब्ध है हमारे द्वारा किया हुआ कर्म नहीं है वो वो हमारे द्वारा किया कर्म नहीं किया कर्म तब माना जाता है जब हम किसी चींटे पर जान के पैर रखेंगे हमारी चेष्टा नहीं ऐसे तो हमारी स्वांसों से बहुत
से जीवों की हत्या हो रही है जानबूझ कर के भी मार देते हैं जैसे मच्छर आया नहीं वो भक्त नहीं है हम अगर मच्छर बैठा हुआ है उसे धीरे से उड़ाएंगे हम उसकी हत्या नहीं करेंगे अब जानबूझकर भी अगर हत्या होती है तो मन वचन कर्म से हम भगवान की शरण में है और भगवान उन अपराधों का क्षमापन पापो हम पाप कर्मा हम श्लोक के नहीं क्षमापन के तो वो क्षमापन के भी श्लोक तो कहे जाते हैं और फिर स्तोत्र के एक एक अक्षर में अगर त्रुटि हो जाए मात्रा उसके लिए यक्ष पदम भ्रष्ट मात्रा
हीनम च भवे तो हमारे अगर किसी कर्म में दोष हो जाता है कोई अपराध जनित क्रिया हो जाती है तो हम उसको भी भगवान से क्षमा याचना करते हैं प्रार्थना करते हैं लेकिन हमें यह लगता है कि यहां जो स्तोत्र में कहा जा रहा है वो एक समर्पित हृदय वाला शिव भक्त बोल रहा है किसका स्तोत्र है जीी शिव मानस पूजा नहीं ये किसका भगवान शंकराचार्य जी का है शंकराचार्य जी अब आप सोचो इतने उच्च कोटि के महापुरुष कह रहे कोई आप थोड़ी बोल रहे हो समझ रहे हो ना आद्य गुरु भगवान शंकराचार्य जी बोले
इसीलिए तो कह रहे तो भक्त में या उच्च कोटि के महापुरुष में असत क्रिया की संभावना ही नहीं होती और दूसरी बात आपको और बता दे यदि चंदन डालो आग में तो आग हो जाएगा लोहा डालो आग में तो आग हो जाएगा और विष्ठा पड़ जाए तो आग हो जाएगी अगर आप ऐसे हो जाओ देखो शरणागत और ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष अगर पूरी सृष्टि का विनाश हो जाए तो भी उसके द्वारा अपराध नहीं माना जाएगा क्योंकि वह भगवान में पूर्ण तन्मय और वह स्वरूप में स्थित अर्जुन जी को भगवान ने यही समझाया कि तुम अपना
मन बुद्धि मेरे में स्थित कर दो इसके बाद मैं हूं हम तो हम सर्व पापे मोक्ष मास सर्व धर्मानना मेंे कम मव मना म बुद्धि निवे तो निव तू कहां रहेगा त मेरे में रहेगा तो वहां गुरुजनों को मार रहे हैं तो हम थोड़ा उठे इस कर्म प्रपंच से उठकर थोड़ा भगवत शरणागति और आत्म बोध की तरफ समझे तो हमारे अंदर यह प्रश्न ही नहीं रह जाएगा एक सिद्धांत में आता है गुण तुम्हार समझे निज दोषा ही सब भाति तुम्हार भरोसा आप सिद्धांत इसको पकड़ रहे हैं इसी सिद्धांत से जब भक्त आगे बढ़ता है तो
गुण दोष दोनों से परे हो जाता है सुनो माया कृत गुण और दोष अनेक गुण या उभय ने देखी देखी सो विवेक वो ऐसे हो जाता है कहता है अगर जबान से निकलेगा तो हे श्री कृष्ण आपकी वाणी हाथ से जो कर्म होंगे हे श्री कृष्ण आपके क्योंकि हाथ य अंतःकरण य आंख कान सब आपको समर्पित हो चुके हैं स्तोत्र सर्वा गिरो वाणी जो निकलेगी सब आपका स्तोत्र होगा और जो भी कर्म होंगे वो सब आपकी उपासना बन जाएगी उसी भाव को तो आद्य गुरु भगवान शंकराचार्य जी कह रहे हैं हमसे जो कर्म इस शरीर
से बनेंगे अब वो समझाने के लिए कह रहे अब हम नहीं रह गया मैं नहीं रह गया दोनों का मैं लीन हो जाता है कोटी तक जाने के लिए हमने यजत सत्कर्म क्रमत संभो आराधन सत्कर्म को ही अ आप की आराधना माना है हम ये कह रहे हैं नहीं असत उपासना उपासना से असत हो ही नहीं सकता जैसे सूर्य प्रकाशित हो गए तो अंधकार की चर्चा नहीं है आप असत की सत्ता क्यों पकड़े हुए हैं नासतो विद्यते भाव भाते सता आप क्यों पकड़े होए बात तो यही है ना हमारी बात जो बारबार हम आपको समझा
रहे हैं इस जिसकी सत्ता नहीं उसको इतना जोर से क्यों पकड़े उसकी सत्ता है क्या नासतो विद्यते भाव आप भगवान के भक्त है सूर्य का प्रकाश होने पर अंधकार रह नहीं सकता अगर अंधकार है तो फिर अभी सूर्य उदय नहीं हुआ तो फिर हमको प्रायश्चित करना चाहिए जो हमसे अपराध बने और सत्कर्म भगवान को को अर्पित करने चाहिए पर ये उच्च कोटि के महापुरुष की स्थिति जहां तवार चन्म है वो भगवान शंकराचार्य जी बोल रहे हैं आप अपनी स्थिति से उस बात को नहीं समझ पा रहे म जी वो पूरा जो श्लोक है ना उसमें
शरणागति का बहुत सुंदर व एक दो लाइन है हमा जी वो कह रहे हैं हे शंभो आप मेरी आत्मा है मां भवानी मेरी बुद्धि है मेरी इंद्रियां आपके गण है एवं मेरा शरीर आपका ग्रह है संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी ही पूजा है मेरी निद्रा की स्थिति समाधि स्थिति है मेरा चलना आपकी परिक्रमा है मेरे शब्द स्रोत है वास्तव में मैं जो भी करता हूं वह सब आपकी आराधना है बिल्कुल बहुत उच्च कोटि की स्थिति है आद गुरु भगवान शंकराचार्य जी आप मैंने पुष्प आपको कल अर्पित किया था जो मानव जीवन का लक्ष्य की
रूप जी जी छोटा सा विशु के लिए हम कोई अगर गलती हो गई तो हमें बुला कर के सीला कर दो हा अभी उसका समय तो नहीं मिला कि हम उसका स्वाध्याय करें एक बार उसे देखेंगे फिर आपकी चर्चा कर उसम हा और पहली बात तो आप ये समझ लीजिए कि आप यह जो कर्ता बने हुए हैं इसको थोड़ा मिटाने की कोशिश कीजिए ये आप कत्व भाव में बहुत अधिक लिप्त है आपसे कराया गया है आप इस पर आइए अभी सुखी होना शुरू हो जाएंगे आप कोई व्याख्या नहीं कर सकते आप कोई किसी भी ग्रंथ
को प्रकाशित नहीं कर सकते आपसे कराया गया है फिर आपको परेशानी क्या है समस्या जब हम करता होते हैं तो उसमें प्रशंसा या दोष यह दोनों बातें और जब हमसे कराया गया है तो हम दहाड़ के बोलते हैं बोले यह गलत है व आप देख लो गलत है मुझसे कहला दिया गया आप देख लेना किसी भी शास्त्र में देख और ढूंढ लेना कहीं ना कहीं आपको मिल जाएगा क्यों हमें पता है मैं नहीं बोल रहा हूं मेरे अंदर से बैठा हुआ प्रभु बोल और जब प्रभु बोल रहा है तो हर शास्त्र प्रभु के हैं आप
लिख लो तो थोड़ा कर्त भाव पर मिट्टी डालने की कोशिश कीजिए और उसको घुमा के लाइए कि भगवान शंकर की प्रेरणा गुरुदेव की प्रेरणा हरि की प्रेरणा से ऐसा वो हुआ और अगर कोई सुधार की जरूरत हो तो प्रभु बता देना क तत्व भाव को हटाने की कोशिश कीजिए ये कत और भोग तत्व भाव में विमूव छुपी रहती है मतलब थोड़ा आप समझना अहंकार विमु आत्मा करता मिति मनते मैंने ऐसा किया है मैं ऐसा कर सकता हूं मैं ये करूंगा इससे ऊपर उठिए थोड़ा आप समझ पा रहे हैं हा समझ जी राधा राधा राधा राधा
राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा [संगीत] राधा राधा [संगीत] राधा राधा श्री [संगीत] राधा राधा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] राधा हे