हर एक अक्षर जिस तरीके से लिखा जाता है तो वो मूवमेंट भी अपने आप में इज इन हार्मोनी इन अलाइनमेंट विद द यूनिवर्सल रिदमम। त में आपने दंड डाला। दंड से फिर आप नीचे की ओर उसका मूवमेंट होता है। इसीलिए तल शब्द जो है अतल वितल सुतल तलातल पाताल जो तल शब्द है वो नीचे की ओर नीचे की ओर है। इ से गति इ के गति में चांचल्य है। इ को जब लिखा भी जाता है। उसको भी इतने कॉन्शियसली इवॉल्व किया गया है। हम कहते हैं ना कि शिव जी के डमरू से शब्द जन्म लिया।
जब डमरू बजता है तो एक ऐसे चंद्र बनता है अर्ध चंद्र एक ऐसे बनता है। यह दोनों अर्ध चंद्र लिपियों में प्रयोग होता है। आज विज्ञान में 100 से ऊपर हमारे पास फंडामेंटल पार्टिकल्स हैं। तो जो हमारे अक्षर हैं वर्णमाला में अगर वो भी फंडामेंटल ध्वनियां हैं तो उनका विज्ञान क्या है? द से जितने भी शब्द बने हैं तो वहां पे हम देखेंगे कि एक फोर्सफुल मोशन व्हिच स्प्लिट्स। तो द से द्वार द्व द्विधा इवन अंग्रेजी में आप देखो ड्यूल डट [संगीत] डिवीजन डिफरेंशिएट इसी प्रकार प्रत्येक अक्षर का अलग-अलग अर्थ और उसके पीछे भी एक
विज्ञान और तंत्र उसको मात्र का विज्ञान के नाम से जानता है। तब तो प्रत्येक ध्वनि में कुछ ना कुछ अर्थ होगा। कुछ भी निरर्थक नहीं है। ऐसा कोई भी अक्षर नहीं है जो मंत्र नहीं है। साथियों इस महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर हमने निर्णय किया कि संस्कृत के अक्षरों में जो छुपा आध्यात्म है जो रहस्य है उसको डिकोड किया जाए। क्योंकि हम सभी को पता है कि भगवान शिव के डमरू से महेश्वर सूत्रों का जन्म हुआ और अगर आप इसका दर्शन देखें तो भगवान शिव परम तत्व हैं। उन्हीं की चेतन शक्ति से हम मनुष्यों को
प्रत्येक जीव को एक चेतना मिली है और उस चेतना में अक्षरों का ध्वनियों का जन्म होता है। हमने इस पॉडकास्ट में कठिन प्रश्न किए हैं कि ध्वनि जन्म कैसे लेती है? जब जन्म लेती है तो अर्थ को कैसे ग्रहण करती है? जब अर्थ बनते हैं तो वही अर्थ क्यों बनते हैं? और अगर हमारी संस्कृत की जो वर्णमाला है वो फंडामेंटल साउंड्स हैं तो उनमें जो क्रम है वो क्रम क्यों है? आ के बाद इ क्यों आता है? तो ऐसे बहुत ढेर सारे गहरे प्रश्नों पर इस पडकास्ट में चर्चा है और इसीलिए आपको आज बहुत आनंद
आने वाला है और इस महाशिवरात्रि पर स्वर के इस विज्ञान से जिसको तंत्र में मात्रिका विज्ञान कहा गया है। आपको यह बात जानकर हैरानी होगी कि हर एक अक्षर के सैकड़ों अर्थ होते हैं। प्रत्येक अक्षर पर पुस्तकें हैं और यह सभी अर्थ आपको ध्यान की अवस्था में आपके अंदर जागृत होते हैं। तो हमने ये प्रयास किया है कि इस महाशिवरात्रि पर आपको शिव स्तोत्रों से जोड़ा जाए। जो 11 प्रमुख शिव स्त्रोत्र हैं जो सबसे दार्शनिक, आध्यात्मिक और शक्तिदाई हैं। आप हमारे शिक्षणम प्लेटफार्म पर इन सभी शिव स्त्रोत्रों का लयबद्ध स स्वर पाठ सुन सकते हैं।
उसके साथ-साथ उच्चारण कैसे किया जाए यह भी हम इस प्रोग्राम में सिखा रहे हैं। तो आप उच्चारण के साथ मीनिंग के साथ शिव और स्वर के बीच जो आध्यात्मिक संबंध है उससे जुड़ सकते हैं और अपनी चेतना को शुद्ध कर सकते हैं। अगर आप महाशिवरात्रि के पहले जुड़ेंगे या आज जुड़ेंगे तो आपको अगले 3 महीने तक लाइव सपोर्ट भी मिलेगा। प्रत्येक सोमवार को आपको लाइव सेशंस भी मिलेंगे जहां पर आपको फर्दर गाइड किया जाएगा। इसके साथ-साथ प्री बुकिंग पर यह प्रोग्राम आपको कम से कम धनराशि में भी उपलब्ध होगा। तो आप सभी इस पॉडकास्ट को
देखें। ज्ञान का संवर्धन करें और इस पॉडकास्ट को देखने के बाद इस महाशिवरात्रि हमारी शिव स्तोत्र साधना से जुड़ना ना भूलें। अगर आपको कोई जानकारी चाहिए, कोई क्वेरी है तो स्क्रीन पर आ रहे नंबर पर मैसेज करें। आप सभी को महाशिवरात्रि की अनंत शुभकामनाएं। आइए पडकास्ट को प्रारंभ करते हैं। आचार्य जी प्रणाम। बहुत सौभाग्य की बात है कि मैं फिर से टीम हमारी फिर से आपके साथ बैठ पा रही है। जब जब मैं आपसे मिलता हूं तो हम लोग भारतीय ज्ञान परंपरा के किसी ना किसी विशिष्ट अंग पर बात करते हैं। गहराई में जाने का
प्रयास करते हैं। संस्कृत भाषा के वैशिष्ट पर हमने बात की कि संस्कृत भाषा दूसरी भाषाओं से कैसे विशिष्ट है। उसके बाद हमने अवधान पर चर्चा की किस तरह से हमारे ऋषि मुनि बहुत ढेर सारी चीजों को याद रख सकते थे। जब हम प्रथम बार मिले थे और पडकास्ट किए थे तो उसमें एक बहुत ही सूक्ष्म विषय आपने छुआ था। बहुत ज्यादा उस पर बात नहीं हो पाई थी। लेकिन वो मेरे मन के बहुत बहुत प्रिय विषय है जिसको हम मैं उसमें जाना चाहता हूं। जैसे व्युत्पत्ति होती है शब्द की या निरुक्त या शिक्षा उसका एक
एक वेदांग में हम जाते हैं कि जो हमारे अक्षर हैं या छोटी-छोटी इकाई है ध्वनि की वो किस तरह से अर्थ बनाती है उसका क्या प्रभाव है विज्ञान में हम क्या करते हैं कि किसी भी ऑब्जेक्ट को देखते हैं तो उसकी सूक्ष्मतम स्तर पर जाते हैं कि कैसे वो बना हुआ है तो हम एटम्स तक जाते हैं और फिर उसके बाद सब एटॉमिक लेवल पर जाते हैं। आज विज्ञान में 100 से ऊपर हमारे पास फंडामेंटल पार्टिकल्स हैं। तो जो हमारे अक्षर हैं वर्णमाला में अगर वह भी फंडामेंटल ध्वनियां हैं तो उनका विज्ञान क्या है? वो
कैसे आपस में कंबाइन करते हैं? कैसे अर्थ बनाते हैं? पर प्रारंभ यहां से करेंगे कि संस्कृत वर्णमाला में जब हम जाते हैं तो हम या तो उन्हें अक्षर कहते हैं या वर्ण कहते हैं। तो क्या दोनों में कुछ अंतर है और वर्णमाला क्यों कहते हैं? वर्ण समूह क्यों नहीं कहे? वर्ण धारा कह देते। वर्ण का कुछ भी हम गुच्छा कह देते। यह वर्णमाला क्यों है? और इनको अक्षर कहने में क्या कुछ और दृष्टिकोण है? इसके विषय में बताइए। जैसे आपने बोला कि आपके हृदय के करीब है। वर्णमाला एक ऐसा विषय है जिसको कोई भी व्यक्ति
अगर सजगता के साथ इस विषय को लेकर अध्ययन करना प्रारंभ करें। मेरा यह अनुभव है कि हम संपूर्ण जीवन एक जीवन ही पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे के रहस्य को उद्घाटन करने में अनेक तत्व अनेक रहस्य हर एक वर्ण के पीछे है। उसमें निहित है। गढ़ है। एक एक अक्षर का जो विज्ञान है, जो रहस्य है, जो तत्व है, जो शक्ति उसमें निहित है, उसको जानना और उसको प्रयोग में लाना और उसके प्रयोग से क्या लाभ होता है उसको भी जानना वह लाभ उठाना भी। यह बहुत ही एक सुंदर प्रक्रिया है। अच्छी बात है कि
आज हम इसके अलग-अलग पहलुओं को ले हम बात करेंगे। जो प्रश्न आपने पूछा पहले कि जो छोटी इकाई है भाषा की सबसे छोटी इकाई जो वर्ण होते हैं, ध्वनियां होती है। कोई भी भाषा हो। भाषा के हर एक छोटी इकाई को आइडेंटिफाई करना और इसको आइडेंटिफाई करने के बाद एक व्यवस्थित रूप देना उसको एक व्यवस्थित रूप में उसको सजाना यह अपने आप में एक विज्ञान है। एक कला है। अंग्रेजी में हम सुनते हैं कि यह अल्फाबेट है। इसको क्यों अल्फाबेट कहा जाता है? उसके पीछे लोग ऐसे अल्फा बीटा ए बी इससे जोड़ के कुछ बताते
हैं। पर हमारे यहां पे इसको दो अलग-अलग नामों से जाना जाता है। साधारण रूप से हम कहते हैं कि यह वर्णमाला है। जो सर्व भारतीय भाषा में भी यह प्रचलित है। वर्णमाला विशेष रूप से पाणिनि के व्याकरण में हम आएंगे। तो इसको वर्ण समामनाय या अक्षर समामनाय यह कहा जाता है। जो आपने पूछा ना कि अक्षर समूह क्यों नहीं कहा गया ये भी कहा गया है। अक्षर समानाय मतलब उसको एक जगह इकट्ठा करना। उसके पीछे अलग बात है कि क्यों इसको अक्षर समानाय कहा गया है कि एक एक जगह में एक व्यवस्थित रूप में उसको
इकट्ठा किया गया है। वर्णमाला जैसे माला में क्या होता है? अब धारा या गुच्छ आप कहो पर माला में एक क्रम का अनुसरण होता है। एक व्यवस्थित क्रम होता है। फूलों को एक रीति से सजाया जाता है उसको। तो देखें तो माला के रूप में और उसमें एक रिदमम है। ठीक है? इसी प्रकार वर्णों को एक व्यवस्थित क्रम में यहां सजाया गया है। यहां केवल एक अल्फाबेट के फॉर्म में डाल देना कि ये अक्षर है। इन अक्षरों को बस एक जगह रख दो। पर यहां पर जैसे अंग्रेजी में आप बोलो कि ए है, बी है,
सी है, डी है, ई है तो ए से लेकर जेड तक जितने अक्षर है उसको रख दिया गया है। पर अगर पूछा जाए कि ए के बाद बी क्यों? पहले बी क्यों नहीं आया? फिर उसके बाद सी क्यों? ए एक वोवेल है। बी सी डी यह कंसोनेंट है। फिर एक वोवेल है। इ वोवेल है। तो इसे कभी वोवेल कभी कंसोनेंट। और इसको इस क्रम में ए टू जेड जिस क्रम में है इसी क्रम में क्यों रखा जाता है? मैं क्यों बोलूं? ए बी सी डी। उसके पीछे अगर मुझे लॉजिक को जानना है। कोई छोटा बच्चा
अगर पूछे हमें कि इसको इससे क्यों बोला जाता है? हमारे पास कोई लॉजिकल आंसर नहीं होगा। पर संस्कृत वर्णमाला में अगर कोई पूछे कि अ के बाद आ क्यों है? अ आ के बाद इ ई क्यों है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] व्यंजन वर्ण में क, ख, ग, घ, न ये क्यों आते हैं? फिर उसके बाद तुरंत च झ आत है। फिर ट ठ ड ढ ण इस प्रकार क्रम में क्यों सजाया गया? अ से लेकर ह तक सारे ध्वनियों को सारे वर्णों को सारे अक्षरों को एक बहुत ही युक्ति सम्मत विज्ञान सम्मत व्यवस्थित
क्रम में रखा गया है। वो उसके पीछे रहस्य क्या है? उस बारे में हम चर्चा करेंगे और धीरे-धीरे एक है उसका जो ध्वनिगत मूल्य है उसको कैसे सजाया गया है उसके पीछे का विज्ञान क्या है दूसरा है उसका जो अर्थगत जो रहस्य है हर एक अक्षर का हर एक वर्ण का एक स्वतंत्र अर्थ होता है और वो एक ही अर्थ में सीमित नहीं है। अनेक अर्थ में फिर अनेक अर्थ उसमें समा हुए हैं। एक-एक अक्षर का अनेक अर्थ हमको मिलता है। कैसे मिलता है कि हमारे प्राचीन मुनि ऋषि लोग एक-एक अक्षरों को लेकर उसमें ध्यानस्थ
होते थे। उसको अपने चेतना में देखते थे। अपने संपूर्ण सत्ता में उसकी उपस्थिति को अनुभव करते थे। फिर उसके अर्थ क्या है? वह भी उनके चेतना में अभिव्यक्त होता था। उन अर्थों को वह फिर सजों के सजाकर रखते थे। तो इसी प्रकार हमारे पास एकाक्षर कोष मतलब एक एक अक्षर का जितने सारे अर्थ होते हैं सारे अर्थों को एक जगह रख के कोषक ग्रंथ बनाया गया है। एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, 30 से अधिक एकाक्षर कोष जिसमें हर एक अक्षर का क्या अर्थ है? कितने अर्थ हैं? सबको इकट्ठा रखा गया है। इसके बारे में
हम आगे चलकर बात करेंगे। पर जो हमारा प्रश्न था जिससे हम शुरू करना चाहते थे वो है कि इनको यह जो इकाई है छोटे-छोटे इकाई है अ है क है इनको वर्ण क्यों कहा जाता है इनको अक्षर क्यों कहा जाता है किसी और नाम से क्यों नहीं पुकारा गया तो इस पर हम चर्चा करते हैं पहले हम चर्चा करेंगे कि इनको अक्षर क्यों कहा जाता है अक्षर विज्ञान अक्षर तरह जो लेखन होता है जो प्रतीकात्मक रूप में उसका ध्वनि रूप भी है लिखित रूप में है। दोनों को अक्षर कहा जाता है। हालांकि लिखित जो स्क्रिप्ट
होता है उसको लिपि कहते हैं। पर उसका लिखित रूप को भी हम अक्षर ही कहते हैं। अक्षर शब्द को ही हम अगर देखें यह एक ज्यादातर इसका प्रयोग हम उपनिषदों में जब ब्रह्म विद्या का प्रसंग आता है। भगवान का सनातन का ध्रुव का चल का सनातन का जब बात होती है तब अक्षर ये अक्षर है अक्षय है अविनाशी है अक्षर शब्द का अर्थ है अविनाशी जिसका क्षर नहीं होता है क्षरण मतलब विनाश नहीं होता है जिसका ठीक है मतलब यह जो परम सत्ता है चरम सत्ता है जो सुप्रीम है, डिवाइन है उनके लिए इस शब्द
का प्रयोग होए तो अच्छा है पर ध्वनियों के लिए क्यों है? इसके पीछे का विज्ञान है कि जो आदि स्पंद के बारे में बात होती है। इसको स्पंदन भी कहा जाता है कि जब हम कुछ उच्चारित करते हैं एक स्पंदन पैदा होता है। वाइब्रेशन एक वाइब्रेशन और हर एक वाइब्रेशन जो है तो वह वाइब्रेशन अगर यह पूछा जाए फिजिक्स में भी आप जाओ अगर पूछे कि जब जैसे एक स्ट्रिंग इंस्ट्रूमेंट है उस स्ट्रिंग इंस्ट्रूमेंट को जब हम प्रेशर देते हैं तो एक स्पंदन का जन्म होता है। ठीक है? [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़]
जब स्ट्रिंग हम हिट नहीं करते हैं उसको चालित नहीं करते हैं तो वह स्थिर रहता है या एक बार हमने स्ट्रिंग को दबाया तो एक स्पंदन एक ध्वनि उसे जन्म हुआ तो वो स्ट्रिंग जब उसमें जब स्पंदन बंद हो जाता है जो स्पंदन पैदा हुआ जिसको हम सुने उसका क्या हुआ वो कहां चला गया तो कई कई लोग ये मानते हैं कि इट डाइस इट गोज़ इट वैनिशेस उसके बाद कुछ नहीं है। नष्ट हो जाता है। क्या वास्तव में नष्ट होता है? तो फिजिक्स में भी अलग-अलग थ्योरीज है। वैक्यूम थ्योरी है। इसको एक्सपेरिमेंट किया जाता
है कि शब्द उत्पन्न होने के बाद क्या शब्द रहता है या शब्द मर जाता है। यह तो एक बहुत फंडामेंटल क्वेश्चन जो उपनिषदों में मिलता है, ध्वनियों के बारे में मिलता है और मनुष्य के आत्मा के बारे में भी मिलता है। ठीक है ना? जैसे नचिकता ये हमको पूछता है कि क्या है रहस्य? तो इस रहस्य को उद्घाटन करने के लिए विज्ञान में भी यह प्रश्न पूछा गया है। उस पर भी एक्सपेरिमेंट हुआ है कि शब्द उत्पन्न होने के बाद क्या होता है शब्द का? शब्द रहता है या शब्द नहीं रहता है। मिट जाता है।
उसका उत्तर फिजिक्स अलग-अलग तरीके से देता है। पर प्राचीन मुनि ऋषियों का यह जो प्रश्न था उसका जो समाधान उनको मिला वह समाधान में यह कहते हैं कि शब्दों नित्य एक बार शब्द उत्पन्न होता है। कोई विस्पंदन होता है। वाइब्रेशन मैनिफेस्ट होता है। वो कभी मरता नहीं। शब्दों नित्य तो वो अमर है। अक्षर इसीलिए इसको कहा जाता है। कहां रहता है? आकाश में। वह आकाश में अबजर्व होकर रहता है। इसीलिए [गला साफ़ करने की आवाज़] और एक फ्रीक्वेंसी में वह रहता है। जो वैदिक ऋषि लोग हैं जो मंत्र दृष्टा उनको कहा जाता है। तो वो
अपनी साधना के योगिक एक प्रोसेस है। उस प्रोसेस में अपनी साधना के बल पर, तपस्या के बल पर या तपस्या के माध्यम से उस तर को पहुंच पाते हैं जिनमें वो फ्रीक्वेंसी को देख पाते हैं। वो रिवील होता है उनके सामने। उनको देख पाते हैं कि अच्छा यहां ये शब्द है। ये मंत्र है। उसको देख पाते हैं, सुन पाते हैं। ठीक है ना? जैसे आप यहां बैठे हैं, मैं यहां बैठा हूं। हमने एक रेडियो चैनल ट्यून कर लिया। तो यह तो शब्द तरंग के रूप में आकाश में है। विज्ञान भी यही मानता है। कैसे पहुंचता
है? कहां दूर-दूर तक कहां से हम ट्यून कर देते हैं? तो हमको सुनाई देता है। हम जो सुनना चाहते हैं वही सुन पाते हैं। घर बैठे कहीं भी बैठे। तो ये शब्द सब कहां है? कहां रहते हैं? आकाश में तरंग के रूप में वेव्स के रूप में वो रहते हैं। ऑब्जर्व होकर रहते हैं। इसलिए वह आकाशिक रिकॉर्ड की बात होती है ना कभी। तो प्राचीन मुनि ऋषि लोग यही मानते हैं कि शब्द का उत्पत्ति एक बार होता है। शब्द उत्पन्न होता है। ध्वनिया उत्पन्न होती है। स्पंदन का जन्म होता है तो वह कभी मिटता नहीं।
इसलिए उसको अक्षर नाम से वह पुकारते हैं। अव्यय नाम से पुकारते हैं। अविनाशी कहा जाता है। शब्दो नित्य न शब्द क्षयते न समुद्र क्षयते जैसे समुद्र का भी विनाश नहीं है। शब्द का भी ध्वनियों का भी विनाश नहीं है। उसका क्षरण नहीं होता है। वह अविनाशी तत्व है। आप लिखित अक्षर को मिटा सकते हो। आप एक किताब को जला सकते हो। पर उस पुस्तक में जो तत्व की बात हुई है वो मानव चेतना में स्मृति में वो अखंड काल तक है। उसको कोई नहीं मिटा सकता है। आप चाहे कितने भी पुस्तक जला दो पर उसके
तत्व को आप नहीं मिटा सकता। वह युग युग तक वो चलता ही रहेगा। यह जो अविनाशी तत्व की वजह से हर एक ध्वनि को हर एक जो [नाक से की जाने वाली आवाज़] वर्ण है उसको अक्षर कहा जाता है। यह अक्षर कहने के पीछे इसका रहस्य यह है। वर्ण क्यों कहा जाता है? वर्ण जो है उसके अलग-अलग प्रकार का अर्थ है। अगर उसके धातुगत अर्थ को हम देखेंगे वर्ण वर्णयति वर्णनम वर्णना वर्ण एक अर्थ होता है कि अभिव्यक्त करना डिस्क्राइब करना वर्णन आप अपने जीवन वृत्तों को वर्णन करिए। डिस्क्राइब योर लाइफ स्टोरी कहते वर्ण यह
भी एक अर्थ है रंगाना वर्ण का अलग एक अर्थ होता है रंग तो ये जो छोटी-छोटी इकाई हैं हमारे अंतरानुभूतियों को उपलब्धियों को अगर हम वर्णन करना चाहेंगे तो यह मूलभूत का यह उपादान है जो भाषा में भाषा का रूप ले हमारे अभिवक्तियों को वर्णन करते हैं। यह एक पक्ष हो उसका एक दूसरा पक्ष है कि इनको वर्ण अगर रंग का अर्थ मान लेते हैं तो यह क्यों कहा जाता है? रंग के अर्थ में अगर हम लेते हैं वर्ण को प्राचिन मुनि ऋषियों की यह उपलब्धि है [गहरी सांस लेने की आवाज़] जो सूक्ष्म और सूक्ष्मतम
की बात आपने की थी पहले कि हर चीज को किसी भी वस्तु को हम देखते हैं उसके स्थूलतम रूप से हम जब सूक्ष्मतम रूप तक पहुंचे ेंगे तब उसके रहस्य को हम जान पाएंगे। पूरी तरह से उसको जान पाएंगे। आधुनिक विज्ञान की अपनी तरीका है। वह अपने तरीके से उस सूक्ष्मतम को ढूंढता है। प्राचीन मुनि ऋषियों की जो तरीका थी जिस मार्ग से उन्होंने उसको ढूंढ निकाला वो अलग तरीका थे। वाक्य का जो हम बोलते हैं मैं बोलता हूं आप सुनते हैं आप बोलते हैं मैं सुनता हूं या कोई और सुनता है [अचानक ज़ोर से
सांस लेने की आवाज़] यह वाक्य का स्थूलतम रूप है इसको वैखरी कहते हैं यह सब कुछ नहीं है भाषा का पूर्ण रूप वैखरी नहीं है यह तो उसका स्थूल अभिव्यक्त रूप है उसका सूक्ष्मतम रूप क्या है उसको डिकोड करने के लिए पूरी तरह से समझने के लिए उसके वैखरी से ऊपर उठकर हमको परा तक जाना पड़ेगा। इसीलिए वैदिक ऋषियों ने तांत्रिक सिद्धों ने जो खोज कर पाया अपने अनुसंधान से अपने तपस्या से जो उनको मिला वो वाक्य के चार स्तर के बारे में बात करते हैं। परा पश्यती मध्यमा वैकरी जो परा है वह अव्यक्त सूक्ष्मतम
जिसको एक अबब्सोल्यूट स्टेट ऑफ द स्पीच यह कह सकते हैं। चरम स्थिति में है। निशब्दम तत परब्रह्म यहां पर शब्द नहीं है। निशब्द वेदों में यह भी कहा गया है कि यावत ब्रह्मा विष्टितम तावती वाक जहांजहां ब्रह्म की उपस्थिति है वहां वहां वाक की उपस्थिति है। किसी भी रूप में सूक्ष्मतम में हो और स्थूलतम में हो। तो परावाक जो है वह हाईएस्ट स्टेट ऑफ स्पीच है। वहां से अवतरित हुई वाणी वैखरी का रूप लेती है। जो अवतरण की प्रक्रिया में परा के बाद पश्यती है। जैसे उतरती हुई जब यह इच्छा जागृत होती है। जैसे सृष्टि
की प्रक्रिया भी आप देखिए उपनिषदों में जैसे कहा गया है। कि एक इच्छा जागृत होती है। एक हम बहु श्याम वो परा जो है एक हम की स्थिति है। एक है वहां एकत्व है। वन यूनिट है। वो बहु बनना चाहते हैं। तो जो उसके बाद का जो स्तर होता है तदक्षता उपनिषद में यही कहा था तदक्षता उन्होंने देखा क्या देखा? कि मैं किस रूप में किन-किन रूपों में मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकता हूं या कर सकती हूं। अनंत संभावनाओं को वो देख पाया। यह पश्यंत का रूप है। किस-किस रूप में पराव्यक्त हो सकती है।
तदाक्षत पश्यती सींग वर्ड उसको अंग्रेजी में अगर कहते हैं तो अनंत संभावना को उन्होंने देखा। फिर नेक्स्ट अच्छा अनंत संभावनाएं हैं तो फिर जो पर्टिकुलर मीनिंग है हम एक पर्टिकुलर अर्थ में मैं इस शब्द को प्रयोग करना चाहता हूं तो वह पर्टिकुलराइज्ड हो जाता है मध्यमा के लेवल में वो बुद्धि से विज्ञान से जुड़ती है कि किस विशेष अर्थ को लेकर वो प्रकाशित हो सकती है। यह मध्यमा का स्तर है। ठीक है? फिर वैर ही उसका स्थूल अभिव्यक्त रूप है। विकर वह नॉइज पैदा होता है तब तक नॉइज़ नहीं है। बिखर तो वैखरी तो यह
जो चार स्तर है जब उच्चतम स्थिति से सूक्ष्मतम स्थिति से उतरती हुई वाणी स्थूलतम स्थिति तक पहुंचती है तब विकार पैदा होता है। ठीक है? विकार मतलब उसका एक अलग जो मूल प्रकृति मूल स्वभाव जो उसका था वह स्वभाव में परिवर्तन आता है जो कलरलेस था जैसे सूर्य का कोई कलर नहीं है सूर्य रश्मि का प्रकाश का क्या कलर हो सकता है पर [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] जब यह अलग-अलग कंडीशंस के माध्यम से कहीं भी पहुंचती है तो अलग-अलग कलर ऑब्जर्व करता है तो ऋषि मुनियों ने यह अपनी साधना में, अपनी चेतना
में, अंतर्दृष्टि से यह देख पाया कि हर एक ध्वनि जब अपने सूक्ष्मतम स्तर से स्थूलतम स्तर के प्रति आते हैं जो कलरलेस है, जो वर्णहीन है वो एक-एक वर्ण उनमें वो देख पाते हैं। जैसे सूर्य रश्मि हम सात रंगों को देखते हैं। क्या वास्तव में सूर्य सात रंगी है? नहीं। पर वो अलग-अलग मीडियम से या अलग-अलग कंडीशंस में अलग-अलग रंग लेता है, रूप लेता है। तो हर एक वर्ण का एक रंग है। एक विशेष कलर है। विशेष वर्ण है। इसका भी वर्णन तंत्र साहित्य में हमारे कोषक ग्रंथों में अलग-अलग ग्रंथों में यह भी हुआ है
कि हर एक वर्ण का वर्ण क्या है? रंग क्या है? देवता क्या है? जाति क्या है? गोत्र क्या है? उसका सामर्थ्य क्या है? इस इतने मतलब विस्तार से ये सब चीजों को देखा गया, उपलब्ध किया गया। फिर उसको लिपिबद्ध किया गया। तो यह वर्ण और अक्षर यह शब्द का जो प्रयोग हुआ है ध्वनियों के लिए इसके पीछे का रहस्य यह है वर्ण इसीलिए कहा जाता है और इसको अक्षर इसीलिए कहा जाता है और अक्षर शब्द से और एक भी बात है जो हमारे मुनि ऋषियों किए थे क्योंकि शब्द नित्य है वो परमानेंट हो जाता है
इसीलिए वाणी के प्रयोग में भाषा के प्रयोग में वाक्य प्रयोग में बहुत ही सजगता और सचेतनता का अवलंबन करना पड़ता है। अगर हम नेगेटिव थॉट्स हम लाते हैं। हमारे वाणी अगर नेगेटिव होती है। उसमें अगर अच्छाई नहीं क्योंकि वो तो विचार के साथ एक थॉट भी आता है। वह भी एक वाइब्रेशन है। वो भी एक ध्वनि का रूप लेता है। एक थॉट भी एक वाइब्रेशन है। वह वाइब्रेशन परमानेंट हो जाता है। शब्द नित्य कुछ सोचा एक वाइब्रेशन पैदा हुआ। कुछ देखा कुछ अपने अंदर अनुभव किया। एक इमोशन जागा एक वाइब्रेशन पैदा हुआ। यह परमानेंट है।
अगर वह पॉजिटिव है तो पॉजिटिवली वो परमानेंट बनेगा। अगर वो नेगेटिव है तो नेगेटिव बनेगा। और जो व्यक्ति नेगेटिविटी के प्रति ओपननेस है तो वह वह सारे वाइब्रेशन के साथ जुड़ेगा। उसी हिसाब से उसका चरित्र बनेगा। मतलब अगर कोई नेगेटिव चरित्र वाला है तो उसका दोष 100% नहीं है। उसमें मेरा भी कुछ कंट्रीब्यूशन है। आपका भी कुछ कंट्रीब्यूशन है। क्योंकि कभी ना कभी हमने नेगेटिव सोच को स्थान दिया आपने हमारे भीतर। इसीलिए वैदिक ऋषि लोग क्या प्रार्थना करते थे कि आनो भद्रा कृतव यंतु विश्वतः कि जितने भद्र कृतव भद्र भावनाएं जो हमारे आत्मा के प्रगति
में आत्मा के उत्थान में जो काम में लगेंगे उसी प्रकार के विचार हमारी चेतना में पैदा हुए आनो भद्राकृत विश्वत हर जगह से अच्छे विचार हमारे पास आए है हमारे भीतर रहा है तो यह उसका रहस्य है। आचार्य जी अब इसमें जैसे आपने बताया कि जो अल्फाबेट है तो उसमें जो क्रम है उसमें हमें कोई लॉजिक नहीं दिखता है। और [नाक से की जाने वाली आवाज़] अभी यहां चर्चा हुई कि संस्कृत वर्णमाला में जो क्रम है क्योंकि ग्रुप का विभाजन तो हम समझ जाते हैं कि अलग-अलग स्थान पर जो हम उच्चारण करते हैं उसकी वजह
से अलग-अलग विभाजन हुआ है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] स्थान के माध्यम से तो हम समझ जाते हैं। लेकिन क्या इसके पीछे कुछ दर्शन भी है? क्योंकि हम यह मान रहे हैं कि स्वर या व्यंजन या अभिव्यक्ति जिसको हम बैकरी कह रहे हैं वो कहीं ना कहीं परा से ही आ रही है। तो किसी भी भाव के लिए वही स्वर क्यों आ रहा है या वही अक्षर क्यों आ रहा है? अ के बाद इ ही क्यों आ रहा है? दार्शनिक स्तर पे तो इसके पीछे कुछ बताइए। एक तो विभाजन क्रम है जो उसका उच्चारण
के दृष्टि से है और एक अनुभवात्मक दृष्टि से हम देखेंगे उसके आध्यात्मिक पक्ष को देखेंगे साधना की दृष्टि से अगर इसको देखा जाए एक व्यापक दृष्टि से तात्विक दृष्टि से इसको देखा जाए तो अकार जो है इससे प्रारंभ होता है। यह सृष्टि का आद्य अक्षर है। अकार सर्व ववरण्याग्र ये सारे वर्णों के अग्र भाग में मतलब प्रथम स्थान है अकारा इसको ब्रह्म के रूप में भी बताया गया है और जितने भी एकाक्षर कोष होते हैं एकाक्षर कोष के बारे में जैसे मैंने पहले भी इसके बारे में हमने बात किया था कि ऐसे 30 से अधिक
जैसे शिक्षा ग्रंथ है तो उच्चारणों के बारे में उच्च अलग-अलग प्रकार के उच्चारण जो होते हैं उच्चारण शिक्षा प्रदान की गई है। वर्णों के उच्चारण को लेकर बहुत सारे तत्व बहुत सारे तथ्य शिक्षा ग्रंथों में प्राप्त होता है। तो इसी प्रकार एकाक्षर कोष अनेक है। 30 से अधिक एकाक्षर कोष है। एकाक्षर का मतलब है एक स्वर। चाहे दो व्यंजन भी हो सकता है पर स्वर एक होता है। इस प्रकार के अक्षर में इन अक्षरों का जो अर्थ है उन अर्थों को बताते हैं। जैसे अ है तो अ का भी अनेक अर्थ है। आ का अनेक
अर्थ है। इ का अर्थ है। क का अर्थ है। च का अर्थ है। तो ऐसे अलग-अलग अर्थ अलग-अलग अक्षरों का होता है। एक अर्थ नहीं अनेक अर्थ होते हैं और ऐसी 30 पुस्तकें हैं। 30 से अधिक पुस्तक हैं। 30 32 पुस्तक हैं और पहले एक एकाक्षर कोष संग्रह करके राजस्थान से प्रकाशित हुआ था जो कि उपलब्ध होगा ऑनलाइन। पर ऐसे अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग प्रसंग में इन एकाक्षर कोषों का संग्रह है। जहां पे हर एक अक्षर का जो अर्थ है वो दिया गया है। और ऐसे भी जितने अभिधान नामक कोष ग्रंथ है जैसे हम वाचस्पत्यम
एक कोष ग्रंथ है शब्द कल्पद ध्रुम है तो उसमें भी जैसे अकार अ सेक्शन शुरू होता है तो पहले अकार के सारे अर्थ दिए जाते हैं। फिर इ सेक्शन शुरू हुआ तो इकार के अर्थ दिए जाते हैं। उनमें से भी हम अकार इकार उकार ककारकार इनके सब अर्थ हम पा सकते हैं और विशेष रूप से तो एकाक्षर कोष उपलब्ध है। तो इतने सारे क्यों? क्योंकि अलग-अलग कोषक ग्रंथ में अलग-अलग अर्थ फिर दिया गया है। यह सब अनुभव आधारित है। किसने और कुछ अनुभव किया तो वह अर्थ को जोड़ा और अनंत संभावनाएं हैं इसमें। आज अगर
मैं जितने अर्थ दिए गए हैं मेरी साधना की वजह से कोई अगर साधना करते हैं इसके ऊपर कंटेंप्लेट करता है और जो अर्थ अभी तक नहीं मिला है वो अर्थ अगर मिलता है तो मैं अपना एक एकाक्षर कोश बना के उसमें उस नया अर्थ को डाल सकता हूं। यही परंपरा हमारी चली आ रही है। तो एक-एक अक्षर का अनेक अर्थ यह आश्चर्य होता है कि हम अगर किसी और भाषा के को लेकर प्रश्न करें ए का क्या कुछ अर्थ हो सकता है? बी का कुछ अर्थ हो सकता है। सी का क्या अर्थ हो सकता है?
अगर अलग-अलग रूप से देखें और ऐसे पूछा भी नहीं जाता है कि भाई सी का अर्थ क्या है? कहीं तो हमने देखा नहीं। अगर आप अंग्रेजी डिक्शनरी में जाएंगे तो ए का अलग कुछ अर्थ दिया गया है क्या? बी का कुछ अलग अर्थ दिया गया है क्या? सी का अलग अर्थ दिया गया है क्या? तो इस प्रकार अर्थ हमको कहीं स्पष्ट नहीं किया गया है। उल्लेख भी नहीं किया गया है। पर संस्कृत में हर एक अक्षर का अनेक अनेक जो अर्थ है उसके भीतर जो शक्तियां जो सामर्थ्य है ना जो अनुभव संभूत जितने तत्व है
वो सारे तत्वों को लिपिबद्ध किया गया है। ठीक? यह सब एकाक्षर कोष का विषय वस्तु है। तो उस दृष्टि से हम अगर देखेंगे तो अकार जो है हर ग्रंथ में जो परम चेतना की बात होती है। डिवाइन मदर की बात होती है। परम शिव की बात होती है। परम शक्ति की बात होती है। भगवान विष्णु की बात होती है। तो यह सब अकार में आ जाते हैं। जो कुछ सर्वोत्तम है वो अकार का अर्थ होता है। क्योंकि वह आदि है। सृष्टि के प्रारंभ में है। और अकार से आप देखो श्री कृष्ण स्वयं भी भगवत गीता
में कहते हैं अक्षराणाम अकारोस्मि सारे अक्षरों में मैं ही अकार हूं। तो अ का महत्व ऐसे बताएं। ओम जो जो प्रमुख बीज मंत्र है जो एकाक्षर ब्रह्म जिसको कहा जाता है उसका जो आदि अक्षर अ ही है ना अ उ म इससे बनता है ओम तो अ को बहुत प्राधान्य दिया गया है। सारे कोष ग्रंथ में उसके अनेक-अनेक अर्थों को लिपिबद्ध किया गया है। और अ को अनुत्तर भी कहा गया है। अनुत्तर का मतलब होता है इसके ऊपर और कुछ नहीं है। ये जो अर्थ आता है कि इसके ऊपर और कुछ नहीं है। यह जो
अभाव बोध अ का गुण बन जाता है। तो इसीलिए हम जब रूप के साथ अ जोड़ देते हैं तो यह रूप का अभाव को परिलक्षित करता है अरूप। एक सेंस ऑफ नेगेशन जो है एक नेगेटिव पार्टिकल के रूप में अकार का प्रयोग होता है भाषा में। है ना? भद्र है तो अभद्र रूप है अरूप। ब्राह्मण है अब्राह्मण। तो इस प्रकार का प्रयोग होता है। एक नेगेटिव। क्यों? क्योंकि यही कारण है कि यह अनुत्तर है। उसके ऊपर और कुछ नहीं है। ठीक? वह सर्वोत्तम है। वह परम है। तो परम का स्थान दिया गया है अकार को।
और उसको अगर एकिस्टेंशियल ट्रुथ के दृष्टि से हम देखें एकिस्टेंस के दृष्टि से देखें तो जो मैंने सीखा महर्षि अरविंद इसके बारे में बहुत अच्छी तरीके से अपने सीक्रेट ऑफ द वेद और अपने जो वेद रहस्य का जो ग्रंथ है उसमें वेद को लेकर जब वो बात करते हैं और अपने रिकॉर्ड ऑफ योगा जो योग साधना से जो कुछ प्राप्त हुआ है उनको उनको उनके फिलोलॉजिकल स्टडीज फिलोलॉजिकल एंड वैदिक स्टडीज ग्रंथ में इसके बारे में बात करते हैं और उसमें हर एक अक्षर का जैसे एकाक्षर कोश है महर्षि अरविंद ने भी हर एक अक्षर का
अपनी दृष्टि से उसको अर्थ किया है। वह जो अर्थ करते हैं, वह क्या करते हैं कि इतने सारे अर्थों को ना लेकर यह सारे अर्थों को अगर हम रिड्यूस कर देते हैं एक ही वर्ड में एक तत्व में तो वो क्या बोलते हैं कि अ रिप्रेजेंट्स द एब्सोल्यूट स्टेट ऑफ एकिस्टेंस जो परावाक है। एब्सोल्यूट स्टेट ऑफ एकिस्टेंस जो एक है। ठीक है? जो एक अनेक बनता है। तो यह अ को यह एब्सोल्यूट स्टेट ऑफ एग्जिस्टेंस असाइन किया गया है। वह एक है जो अनेक बन सकता है। इसलिए कहा जाता है कि सारे वर्णों का उद्भव
स्थान अ है। इसीलिए सबसे पहले सबसे पहले अ है। वही अ ही सब कुछ बनता है। ठीक है? तो यह एब्सोल्यूट स्टेट ऑफ एग्जिस्टेंस है। वो एक को एक का प्रतिनिधित्व करता है। समत्व का प्रतिनिधित्व करता है। निशब्धता का प्रतिनिधित्व करता है। सर्वोत्तमत्व का प्रतिनिधित्व करता है। परम चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। सर्वव्यापकत्व का प्रतिनिधित्व करता है। ये अकार का अर्थ होता है। और वो अ जब अनभिव्यक्त अवस्था में रहता है। जब व्यक्त होने की इच्छा जागृत होती है जैसे एको हम बहुस्याम तो उसको एक्सपेंशन होता है। वो एक्सपेंशन जो है वो आ का शक्ति
है। आ ये एक्सपैंड होता है। इसलिए आकाश आनंद इस प्रकार का जो शब्द बनता है उसमें आ का प्रयोग करा किया जाता है। आलाप आलाद कर आलाद है ना तो आ का प्रयोग वो व्यापकता का सूचक है अभिव्यक्ति का सूचक है वो अभिव्यक्त करता है मैनिफेस्टेशन में उसको एक्सपैंड करने में विस्त विस्तार करना कराने में व्यापकत्व लाने में विशालता लाने में वो उसका सामर्थ्य है। ठीक है? तो फिर क्या होता है कि जब यह अ में एक इच्छा पैदा होती है। ठीक है? उसको आदि इच्छा कहते हैं। इच्छा शक्ति पैदा होती है। वो व्यापक बनना
चाहता है। उससे अपने में बंद ना होके अबब्सोल्यूट स्टेट में ना रह के वो व्यापक बनना चाहता है। वो जब व्यापक बनने का बनता है तो जहां पे मूवमेंट फिर उसमें मूवमेंट एक क्या होता है ना स्पंदन उत्पन्न होता है। एक थ्रोब एक स्पंदन एक कंपन जागृत होता है। तो वो कंपन धीरे धीरे धीरे धीरे वो फैलता है। व्यापक बनता है। हर जगह पहुंचता है। तो जब संचार गति इसकी बात करते हैं तो जहां पे मूवमेंट है तो वहां पर मूवमेंट मतलब कहीं पर पहुंचने का एक डेस्टिनेशन है। डेस्टिनेशन तक पहुंचता है तो डेस्टिनेशन में
पहुंचने की एक एस्पिरेशन एक इच्छा जागृत होती है। रहती है। तो वह ई कष्ट फिर एक जगह से दूसरे जगह जाता है या व्यापक बनता है तो उसमें संस्पर्श आ जाता है कांटेक्ट आ जाता है तो ये सारे जो है ये इ का स्टेट बन जाता है। नेक्स्ट अक्षर इसीलिए है इ से इच्छा शब्द है। इ एक धातु के रूप में संस्कृत में है। इ मतलब गतिमान बन जाना। गति गतर्थक धातु है ये इगतो एति ठीक है ना वो गत्यर्थक धातु गत्यर्थक जो गुण है गति परक गुण है जो इ में आ जाता है ठीक
है फिर अब देखो इ ठीक अ के बाद आता है उसका स्वरूप मतलब ये अ का करीब है जो तुरंत आता है वो अ का करीब है इसलिए इसलिए नैकट्य भी इ का अर्थ होता है। इसलिए हम बोलते हैं कि इदम ये यहां ये जो नैकट्य यह बोलने का अर्थ है ये पास में है निकट में है। ठीक है ना? यह अर्थ कहां से आया? इदम में यह में यहां जो बोलते हैं वो इ से भी शुरू होता है। क्योंकि वो अ का करीब है। ठीक है? तो वो इच्छा इच्छा का प्रतीक है। गति का
प्रतीक है। गति को समझाता है। तो ई से गति इगतो होता है। ई से इच्छा है। ठीक है? फिर वो इच्छा जब प्रबल हो जाती है उसमें रूलिंग पावर आ जाता है ईश्वर भाव आ जाता है फिर उसका दीर्घ रूप मतलब इंटेंसिटी हो जाता है तो फिर दीर्घ ई हो जाता है ईश ईश्वर यह दीर्घ ई से बनता है कांटेक्ट संस्पर्श संबंध इसका वाचक बन जाता है चंचलता का वाचक बन जाता है तो इसी प्रकार आप देखोगे ई को जब लिखा भी जाता है लिपि में जब हम लाते हैं जो देवनागरी लिपि है उसको भी
इतने कॉन्शियसली इवॉल्व किया गया है डेवलप किया गया है तो उस जैसे ब्राह्मी से इवॉल्व होकर वो अलग-अलग रूप लेकर अभी एक व्यवस्थित रूप में है पर उसमें जो जिस प्रकार लिखा जाता है वो जो मूवमेंट है हर एक अक्षर जिस तरीके से लिखा जाता है देवनागरी में संस्कृत भाषा जिस लिपि का प्रयोग करता है। ठीक है? तो वह मूवमेंट भी अपने आप में इज इन हार्मोनी इन अलाइनमेंट वि द यूनिवर्सल रिदमम। जैसे ग्रह नक्षत्रों का एक संचार है। एक वैश्विक छंद है। वैश्व छंद है। यूनिवर्सल रिदमिक पैटर्न है। तो उसके साथ उसका तालमेल रहता
है। ठीक है? तो ये अ से आ से ई ई से ई और इ जो है क्योंकि वो नैकट्य का प्रतीक बनता है। जैसे अ सर्वोत्तमत्व को दर्शाता है। यह नैकट्य का चांचल्य का गति मत्ता का बोधक है। द्वैत भी कह सकते हैं। द्वत द्वैत भी कह सकते हैं क्योंकि वे रिलेटिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस है। है ना? बड़ा इंटरेस्टिंग चीज है। अब देखो भय अबब्सोल्यूट स्टेट ऑफ एक्सिस्टेंस में भय नहीं रह सकता है। क्योंकि वहां पर एकत्व का प्राबल्य है। भय कहां से आएगा? जब द्वित बनेगा द्वितीयाद वैभयम। सेकंड एंटिटी है तभी भय बनेगा। इसलिए
संस्कृत में भी धातु जो है जिससे भय शब्द बनता है वह इकार को लेकर बनता है क्योंकि द्वैत वो रिलेटिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस को रिप्रेजेंट करता है इकार। सो महर्षि अरविंद लिखते हैं कि ये रिलेटिव स्टेट ऑफ एग्जिस्टेंस ई जो है अ जो है एब्सोल्यूट स्टेट ऑफ एकिस्टेंस को रिप्रेजेंट करता है। इ जो है रिलेटिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस को रिप्रेजेंट करता है। फिर उ जो है वो परवेसिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस को ऑक्यूप ऑक्यूपाइंग स्पेस। अगर ई में सीकिंग द स्पेस सीकिंग यह जो मीनिंग है कुछ चाहना यह अर्थ ई में आता है तो उ में
उसको ऑक्यूुपाई करना यह अर्थ आता है। ठीक है? वो परवेसिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस को रिप्रेजेंट करता है। र जो है र वो वाइब्रेंट स्टेट ऑफ एकिस्टेंस को रिप्रेजेंट करता है। तो इसी प्रकार आप देखो क जो है क्रिएशन को रिप्रेजेंट करता है। क के उच्चारण में भी आप देखो अल्प प्राण है वो। मिनिमम एयर का रिलीज होता है। तो क में एक कंसंट्रेशन की अवस्था हो जाए। ख में खुलापन होता है। क में कंसंट्रेशन होता है। और क्रिएशन के लिए कंसंट्रेशन की बहुत आवश्यकता है। ठीक है ना? तो वो डीप कंसंट्रेशन से क्रिएशन होता है।
सो क से क्रिएशन कृति क्रिएट कला हां कर करना क्र धातु जो है वो बनता है। ठीक है? और होना यह उ से परवेसिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस से आता है। ऑक्यूपाई किया मतलब वहां पे हुआ उपस्थित हुआ। तो ये जो होने का अर्थ है जिसको उड़कर किया जाता है भू स्वयं भी से भय रिलेटिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस। भू से होना ये परवेसिव स्टेट ऑफ एकिस्टेंस। ठीक है ना? और रु जोड़ता है रु रु अपने आप में एक धातु है। रुगतो पर वो गति में बहुत वाइब्रेंस है। डायनामिज्म है। गति भी अलग-अलग प्रकार के होता है।
ई की गति में चांचल्य है। रु की गति में बहुत वाइब्रेंट गति है। मूवमेंट है। इसलिए रु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। र जो है अग्नि का प्रतीक है। जो मणिपुर चक्र है अग्नि तत्व को रिप्रेजेंट करता है। उसका बीज मंत्र रम है। ठीक है? तो इस प्रकार हम देखेंगे क में एक सेंस ऑफ कंसंट्रेशन है, क्रिएशन है, फोकस है, ख में एक्सपेंशन का सेंस है। ठीक है? क्योंकि वहां पे महाप्राण है। वहां पे हिंसा का अर्थ भी आ सकता है। बहुत फोर्स अप्लाई किया। तो इससे क्या होता है ना एक ग्रेटर साइकोलॉजी को
भी हम ये अक्षरों के अर्थ में अक्षरों के क्रम में अक्षरों के जो उद्भव होता है उत्पन्न होता है उसकी जो पीछे जो साइंस है उसमें हम एक ग्रेटर साइकोलॉजी को देखते हैं। और उसको हम मानव चेतना के साथ लिंक कर सकते हैं। ठीक है? तो इसी प्रकार प्रत्येक अक्षर [नाक से की जाने वाली आवाज़] का अलग-अलग अर्थ और उसके पीछे भी एक विज्ञान और तंत्र उसको मात्र का विज्ञान के नाम से जानता है कहता है बताता है मात्र का विज्ञान इस पर अनेक अनेक कार्य हुआ है और कॉन्शियसली इसीलिए अक्षरों को और अक्षरों को
अ जोड़कर जो शब्द बनता है इतनी सजगता के साथ यहां पर शब्द निर्माण हुआ है। शब्दों का चयन हुआ है। शब्दों का प्रयोग किया जाता है कि कोई भी शब्द ऐसा नहीं है जिसके पीछे का रहस्य को उद्घाटन नहीं किया गया है। तो अर्थ की दृष्टि से हम अगर देखें हर एक वर्ण का जितने अर्थ हैं वह सारे अर्थों के ऊपर हम कंटेंप्लेट करें। हम देखेंगे कि यह हमारी चेतना में जैसे बताया गया है कि यह हमारी चेतना की बात है। यह केवल एक वर्णमाला कागज में लिखी हुई एक फॉर्मेट नहीं है। यह हमारे चेतना
में निरंतर यह जो अजपाजप है यह निरंतर उच्चारित होता रहता है। यह चेतना की बात है। हमारे भीतर यह पूरी कहानी यह चलती रहती है। [गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] तो जैसे मैं आपको ककार का उदाहरण दिया कि क में क्रिएशन का अर्थ है या अ इ उ रू के बारे में बताएं। तो इसी प्रकार आप अगर देखोगे और एक उदाहरण मैं देता हूं। अक्षरों के भीतर कैसे जो अनेक अर्थ निहित होते हैं और वो जो मूल अर्थ है जो फंडामेंटल सेंस है वाइब्रेशन का तो वो कैसे जब अलग-अलग
शब्द बनते हैं उसके भीतर फिर वो कैसे विस्तार रूप लेता है तो जैसे एक अगर उदाहरण हम लेते हैं द कार को ले लीजिए द से जितने भी शब्द बने हैं उसको अगर आप देखोगे और सारे अर्थों को लो द से जितने शब्द बनते हैं द आप डिक्शनरी उठा लीजिए द सेक्शन में चले जाइए द दा दी दु दई जितने भी है और संयुक्ताक्षर जितने जहां पे द आता है पहले ठीक है तो वो द के सारे अर्थों को अगर हम लेंगे तो वहां पे हम देखेंगे कि एक फोर्सफुल मोशन व्हिच स्प्लिट्स जो सबको विभाजित
कर देता है स्प्लिट कर देता है द्वितीय पैदा करता है तो द से द्वार द्व द्विधा स्प्लिट कर देना डिवाइड करना देव भी द से आता है दानव भी द से आता है अब देखो कैसे बताएंगे अगर यह स्प्लिट करने का अर्थ है विभाजन का अर्थ यहां पे आता है देव तो एकत्व का प्रतीक है विभाजन का प्रतीक नहीं है फिर दिव धातु से देव शब्द बनता है वहां भी द है दिव धातु का अर्थ क्या है? पेनिट्रेटिंग लाइट जो अंधकार को चीर देता है। दिव का अर्थ ये जहां से ये देव शब्द आता है।
देव का अर्थ खेलना भी होता है। क्रीडा क्रीडा के अर्थ में होता है। तो यह सब खेलने का मतलब है कुछ मतलब एक एक जो संचार है एक गति है जो कुछ को एकदम विभाजित करता है और खेलोगे तो खेलने में भी दो होना चाहिए किसके साथ खेलना है ठीक है क्रीडा जी ये जो संसार की लीला है लीला किस लिए है लीला तो वही है द्वैत के लिए है संसार के लिए लीला में द्वैत द्वैत भावना रहे तभी लीला बन सकती है। शिव और पार्वती दोनों बैठे तभी लीला हो सकती है। ठीक है ना?
तो द में आप देखो जितने भी शब्द बनते इवन अंग्रेजी में आप देखो डुअल डट डिवीजन है ना डाउट [नाक से की जाने वाली आवाज़] डिफरशिएट ये सब द का ये अर्थ होता है। फिर उसमें अगर फोर्स हम डालते हैं जो स्प्लिट हो जाता है बिखर जाता है। फिर वो सबको जैसे फोर्स डाल दिए तो इकट्ठे हो गए। जैसे हम कुछ चीजें हैं जो बिखरा हुआ है उसमें ज्यादा फोर्स डालते हैं तो वो इकट्ठा हो जाता है। ठीक है? या तो पूरा साफ हो जाता है या एक जगह इकट्ठा हो जाता है। फिर उससे ध
बनता है। ध में धारण करने का अर्थ होता है। ठीक है? तो इसी प्रकार अगर हम देखेंगे हर एक वर्ण को उसके भीतर जो अर्थ छुपा हुआ है उससे ही के उसको जब हम विश्लेषण करते हैं उसमें ध्यानस्थ होते हैं उस पर विचार विमर्श करते हैं उसका मंथन करते हैं तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा दर्शन है यह उपलब्धि अपने आप होती है। आचार्य जी इसमें एक मेरे मन में प्रश्न आ रहा है कि यदि प्रत्येक ध्वनि में और उस पर अगर हम चिंतन करते हैं, मेडिटेट करते हैं और उससे एक अनुभव में एक मीनिंग
आती है तब तो प्रत्येक ध्वनि में कुछ ना कुछ अर्थ होगा। कुछ भी निरर्थक नहीं है। वैसे तो यह भी कहा गया है कि अमंत्रम अक्षरम नास्ते। ऐसा कोई भी अक्षर नहीं है जो मंत्र नहीं है। जिसमें मंत्र शक्ति नहीं है। निरर्थक ऐसे कुछ नहीं है। निरर्थकता और सार्थकता को लेकर हमारे व्याकरण परंपरा में भाषा विज्ञान की परंपरा में प्राचीन काल में भी प्रश्न आया है। वहां भी दो ग्रुप है। एक ग्रुप एक स्कूल मानता है कि यह निरर्थक है। फिर एक स्कूल सार्थक मानता है। उस पर भी वाद विवाद हुआ है। पर सार्थक है।
इसको मानने वाले ज्यादा लोग हैं। तो यह जो सार्थकता को अगर हम देखेंगे जैसे कोई एक शब्द है एक शब्द में अगर बहुत से बहुत सारे अक्षर हैं। ठीक है? तो एक अक्षर को हम जब हटा देते हैं वो एक अलग शब्द बन जाता है। उसका अलग अर्थ हो जाता है। ठीक है? जैसे एक बहुत ही पॉपुलर श्लोक है। भोजराज ने यह कहा था कि मेरे राज्य में ऐसा कोई नहीं है जो काव्य रचना में प्रवीण नहीं है। तो इसको चैलेंज करते हुए बाहर राज्य से कोई एक आए विद्वान और ढूंढकर एक तंतु बाय को
उनके सामने ले आए। विवर तो बोले कि यह देखिए इनको पूछिए इनको कैसे आया होगा यह तो तंतुबा है वयन करना उनका काम है तो राजा फिर पूछे उनको कि क्या कुछ काव्य आदि करते हो तो उन्होंने काव्य में ही उनका उत्तर दिया उन्होंने क्या बोला काव्यम करोमि नहीं चारों तरम करोमि करता हूं पर इतना सुंदर नहीं करता हूं। यत्नात यत्नात करोमि यदि चार तरम करो यदि यत्न के साथ करूं थोड़ा सा एफर्ट लगाऊं प्रयत्न अगर रहे यत्नात करो यदि चार तरम करो सुंदर बना सकता हूं। फिर उसके बाद राजा को संबोधित करते हुए वो
बोलते हैं कि भूपाल मौल्य मणि मंडित पाद पीठ हे भोजराज कवयामि वयामि यामि ये जो कवयामि शब्द को आप ले लो उससे क हट जाता है तो वयामी रहता है व हट जाता है तो यामि रहता है कवयामि का अर्थ होता है कि मैं काव्य करता हूं कवयामि क हट जाता है तो वयामि वयन भी करता हूं काव्य भी कर लेता हूं वयन भी करता हूं तंतु वाय हूं और व हट जाता है तो यामि रह गया ठीक है तो यामि का मतलब है जाना। अगर आप देखो यामि में व जोड़ देते हैं तो वयामी
शब्द एक अलग अर्थ बनता है। फिर क जोड़ देते हैं तो कवया तो एक अक्षर को हटा देने से एक अलग अर्थ बन जाता है। वो अक्षर जुड़ने से एक अलग अर्थ बन जाता है। इसी प्रकार उपसर्गों को भी देखो अलग-अलग जो उपसर्ग हैं तो अगर वि जुड़ जाता है जैसे उपसर्गों के बारे में ये कहा जाता है विहार हार संहार ओके तो इस प्रकार हार संहार विहार उपहार परिहार तो एक-एक अक्षर भी जुड़ जाता है तो अलग अर्थ बन जाता है तो ये क्या दर्शाता है मतलब उन अक्षरों में कुछ शक्ति तो है कुछ
सामर्थ्य है कुछ अर्थ है जो अपने साथ लेकर आता है जब जुड़ जाता है वो अर्थ उसमें आ जाता है। तो यह सार्थकता का एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि हर एक अक्षर सार्थक है। उसमें एक शक्ति निहित है। उसमें एक अर्थ निहित है। जो एक दूसरे के साथ जुड़ने पर वो अर्थ वो अर्थ आ जाता है। स्पष्ट हो जाता है। स्पष्ट होता है क्योंकि उसके अंदर है जो अंदर नहीं है तो वह बाहर कैसे निकलेगा? व में कुछ शक्ति है जो यामि में लग के लग के वयामी शब्द बन जाता है। ऐसे तो एक्चुअली
क्या है कि य एक हुआ तो उसमें वय हुआ। उसमें हमको मूल धातु को जाना पड़ेगा। मूल धातु कैसे बनते हैं? मूल धातु ही फिर अक्षरों को जोड़कर बनाते हैं। तो अक्षरों में जो अर्थ है हर एक जो बीज अक्षर में जो अर्थ है तो वो जब दूसरों के साथ जुड़ते हैं फिर अलग एक अनुभूति वहां पे होती है तो वो उसका गुण बन जाता है। अर्थ बन जाता है। ऐसे अर्थ विस्तार जैसे ध्वनियों का विस्तार होकर शब्द पद ऐसे बनते हैं तो इससे अर्थ विस्तार भी होता रहता है। तो हर एक अक्षर जो है
वह सार्थक है और एक-एक अक्षर के भीतर अनेक अर्थ छुपे हुए हैं। तो यह हमारे जो तात्विक पक्ष है, दार्शनिक पक्ष है जो वर्णों को लेकर जितना काम हुआ है हमारे परंपरा में। एक और इंटरेस्टिंग पॉइंट मुझे इस व्यक्तव्य में मिला। जैसे जब आप इकार की बात कर रहे थे तो आपने बोला कि जैसे वो रिलेटिव सेंस ऑफ थिंग्स है इकार में और उसमें इच्छा है, चंचलता है। तो आपने ये बताया कि इकार में अगर आप देवनागरी लिपि देखें तो उसमें एक लचक भी है। तो इस पर आपने और स्टडी की है क्या कि जो
देवनागरी लिपि है जिसमें आज मुख्यता संस्कृत के हमें ग्रंथ मिलते हैं। तो क्या देवनागरी लिपि के पीछे भी कुछ दर्शन या कुछ आध्यात्मिक लिपि में अभी अक्षर बोलने में ध्वनि में हमने देखा कि जो चेतना से आ रहा है पर यह भी तो एक सृजनता है। देवनागरी लिपि भी तो हमने बनाई है। तो क्या यह संस्कृत निष्ठ है उस दर्शन से अलाइंड लिपि है। आपने सुना होगा कई कई लोग लिखते हैं कि संस्कृत एक ऐसी भाषा है जिसकी अपनी लिपि नहीं है। अलग-अलग लिपियों का प्रयोग करती है यह भाषा। इस पर भी बहुत बहस होती
है, चर्चाएं होती हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] संस्कृत को देवनागरी लिपि में अधिकतर लिखा जाता है। देवनागरी लिपि भी जिस स्थिति में अभी हमें प्राप्त है जो प्रचलित है। इस स्तर तक पहुंचने के लिए भी उसकी अपनी यात्रा है। उसका एक एवोलशनरी जर्नी है। जैसे अगर ब्राह्मी लिपि हम लेते हैं तो ब्राह्मी से आकर कि अलग-अलग लिपियों को हम लेते हैं। [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] तो हर लिपियों के साथ उसका कुछ ना कुछ संबंध हम देखते हैं। पर ऐसे लिपियों को हम अगर लेते हैं हम प्रचलित देवनागरी लिपि को लेते
हैं तो उसमें तीन उपादानों को लेकर यह लिपि बनती है। इसमें एक रेखा है, दंड है और अर्धचंद्र है। रेखा जिसको शिरोरेखा के रूप में हम लेते हैं जो हॉरिजॉन्टली लिखा जाता है। हर एक अक्षर के ऊपर रहता है। इसलिए उसको शिरोरेखा कहते हैं। ठीक है? और रेखा के बाद आता है दंड। दंड जो होता है वह वर्टिकल बार है। ठीक है? एक रेखा हॉरिजॉन्टल बार एक दंड वर्टिकल बार। उसके अलावा अर्धचंद्र है। वो अर्धचंद्र भी दो प्रकार से उपस्थित है। जैसे शिव जी हम कहते हैं ना कि शिव जी के डमरू से ही शब्द
जन्म लिया। तो जैसे डमरू बजता है तो एक ऐसे चंद्र बनता है अर्धचंद्र एक ऐसे बनता है एक क्लॉकवाइज एक एंटीक्लॉकवाइज इस प्रकार बनता है ना अर्धचंद्र ये दोनों अर्धचंद्र लिपियों में प्रयोग होता है जैसे आपको क लिखना है तो आप दंड डालते हैं फिर इससे डालते हैं फिर ऐसे डालते हैं फिर आपको ऊपर शिरोरेखा लगाते हैं तो ऐसे हर एक अक्षर को आप लो तो यह तीन उपादान आपको मिलेंगे एक हॉरिजॉन्टल बार है शिरोरेखा एक दंड है और एक अर्धचंद्र एक है दो है दो रूप में उपस्थित हो सकता है एक रूप में भी
उपस्थित हो सकता है पर अर्धचंद्र है ठीक है अब आप देखो जो वर्टिकल बार की हम बात करते हैं दंड की दंड भी तीन अलग-अलग प्रकार से उपस्थित है पूरे वर्णमाला में ठीक है एक है साइड बार पार्श्वदंड जो मैक्सिमम अक्षर में 80 80% अक्षर में साइड बार है। जैसे आपने ख लिखा, त लिखा, ग लिखा तो ये साइड में रहता है। ठीक है? और एक होता है उर्ध्वदंड। उर्ध्वदंड मतलब ऊपर छोटा सा रहता है। जैसे आपने ह लिखा तो वो दंड किस प्रकार है? सब में दंड है। सब में दंड है। पर अलग-अलग रूप
से है। आपने ह में थोड़ा सा ऊपर दंड डाल के फिर अर्धचंद्र डालते हैं। ठीक है? तो जैसे ट है, ठ है, ड है उसमें उर्ध्वदंड है। ऊपर रहता है दंड। और मध्य दंड है। साइड में नहीं आता है। ऊपर नहीं आता है। ठीक है? और मध्य आता है। ऐसे दो अक्षर हैं वर्णमाला में। कौन? क और फ। क और फ में वह बीच में आता है। मध्यदंड आता है। ठीक है? मध्यदंड वाले अक्षर और उर्ध्वदंड वाले अक्षर उनको आप अलग कर देंगे तो मैक्सिमम अक्षर जो रहेगा अधिकतर अक्षर जो है वो पार्श्व दंड वाले
होते हैं। ठीक है? ये पार्श्व दंड वाले सारे अक्षरों को लेकर अगर दंड को आपने लोप कर दिया तो वो अर्धा अक्षर बन जाता है। ठीक है? तो वो अर्धा अक्षर अगर किसी और व्यंजन के साथ मिलता है तो वो संयुक्त व्यंजन बन जाता है। ठीक है? तो ये उसके पीछे विज्ञान है। ठीक है? उसमें दर्शन क्या है? जो हॉरिजॉन्टल बार है यह यूनिवर्स को रिप्रेजेंट करता है। विश्व को ब्रह्मांड को, व्यापकता को, विशालता को, समष्टि को, सृष्टि को, परमेष्ठी को यह रिप्रेजेंट करता है। जो वर्टिकल बार है वो व्यष्टि व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
और अक्षरों में इसको शिरोरेखा के साथ मिला के पढ़ा जाता है। क्योंकि जब हम हम जब बचपन से जब हमारा इनिशिएशन होता है दीक्षा होती है या अक्षर लेखन की जो प्रक्रिया शुरू होती है हम करते हैं ना तो चावल रख के चावल के ऊपर अक्षर को लिखते हैं। ठीक है? यह जो प्रक्रिया है तो वह अक्षर से हमको क्या हमको सजग कराया जाता है। हालांकि छोटे बच्चे समझ नहीं पाएंगे पर उसके पीछे का दर्शन यही है। बड़े होकर यही समझना है कि इसको क्यों लिखाया जाता है। क्योंकि इसमें हमारे लाइफ का जो पपस है
उसको भी दर्शाया गया है। क्या है पर्पस? कि व्यक्ति को हमेशा विश्व के साथ ब्रह्मांड के साथ व्यापकता के साथ मिलकर रहना है। हारमोनियसली रहना है। एक होकर रहना है। यह एकत्व और समत्व को प्रतिष्ठापित करना चेतना में यह जीवन का उद्देश्य है। तो इसीलिए जो दंड और रेखा यह दोनों मिलकर रहते हैं। ठीक है? यह उसके पीछे यह लिपि के पीछे दर्शन है। तो एक लिपि हमारे पास है जो इस प्रकार के विज्ञान और इस प्रकार के दर्शन को हमें समझाता है। और दूसरी बात है अर्थ की दृष्टि से भी जो मूवमेंट है एक
अर्धचंद्र को इस प्रकार क्यों रखा गया? इस प्रकार क्यों रखा गया? त में इसको नीचे की ओर क्यों खींचा गया? थ में अलग प्रकार से क्यों रखा गया? क में अलग प्रकार से क्यों रखा गया वह भी अगर क के अर्थ को आप देखेंगे त के अर्थ को देखेंगे मैं एक उदाहरण स्वरूप समझाता हूं त जो है त में आपने दंड डाला दंड से फिर आप नीचे की ओर उसका मूवमेंट होता है। अगर त से आप अर्थ देखेंगे त का एक जो गुण है वो डाउनवर्ड मूवमेंट है। इसीलिए तल शब्द जो है अतल वितल सुतल
तलातल पाताल जो तल शब्द है वह नीचे की ओर नीचे की ओर है तो इसीलिए लिखते वक्त भी आप देखो एक डाउनवर्ड मूवमेंट का अर्धचंद्र को ऐसे घुमा के लिखा जाता है फिर थ में आप देखो थ में वो घूम के फिर उल्टा मूवमेंट हो जाता है ऊपर की ओर जैसे जाता है तो थ में आप अगर किसी भी कोश ग्रंथ में जाओगे थ का अर्थ क्या है वो देखोगे। थ का अर्थ है पर्वत शिखर मतलब पर्वत कहो त ऊपर की ओर आप देखोगे तो एक अपवर्ड मूवमेंट है और थ में फोर्स लगता है त
में अगर कंसंट्रेशन है थ में फिर वो महाप्राण आ जाता है वो ऊपर उठा देता है त अगर नीचे ले जाता है तो थ ऊपर उठा देता है तो ये सारी चीजों को ध्यान में रखा गया है लिपि को निश्चय करने के लिए तो ये भी तत्व आपको लिपि में भी मिलता है। उसके अर्थ के साथ उसका समन्वय स्थापित किया गया है। आचार्य जी बहुत ही अद्भुत चर्चा रही ये और जितनी भी बार आपसे चर्चा होती है तो कुछ ना कुछ एक विशिष्ट आध्यात्मिक अर्थ मिलता है हमें हर एक पहलू पर। यदि हम भारतीय ज्ञान
परंपरा से जुड़ते हैं। यदि हम संस्कृत भाषा और अक्षरों का ये जो मात्रिका विज्ञान है, अक्षर विज्ञान है, इसको समझेंगे तो आगे कैसे विचार बढ़ते हैं और फिर जो दर्शनों का विचार है, मंत्रों से अर्थ है मुझे ऐसा लगता है कि मुझे कम से कम 510 साल तो इसकी स्टडी करनी चाहिए। तो उसके बाद समझ में आएंगे कि यह जो मंत्र हैं उपनिषद में वेदों में कितनी गढ़ अपने अंदर अर्थ रखते होंगे और मैं पर्सनली ये चाहता हूं कि मैं निरुक्त हुआ या फिर जहां से या तंत्र में इस प्रकार का जो मात्रिका विज्ञान है
इसको और गढ़ता से इसमें अध्ययन किया जाए। जैसा कि मैं प्रारंभ में भी बोल रहा था कि मुझे बहुत प्रिय लगता है। इसीलिए जब भी मैं कोई नॉर्मल वीडियो भी करता हूं अपने चैनल पर तो मैं व्युत्पत्ति अवश्य जाता हूं। जैसे कि आप एक संस्कृत के पडकास्ट में आप सबसे पहले बोल रहे थे कि यदि किसी भी विषय को समझना है तो ठीक है लक्षण आदि से आप परिभाषा में जाएं लेकिन उसके पहले उस शब्द को ही अगर व्युत्पत्ति कर लें उसके धातु में चले जाएं और आप जान जाए कि वो शब्द ही कैसे बना
है वो चेतना में कैसे प्रकट ही हुआ है तो आधी जर्नी तो आपकी क्लियर हो जाएगी तो अब पॉडकास्ट तो यहीं समाप्त करेंगे लेकिन इस पॉडकास्ट के माध्यम से दर्शकों को एक एक सूक्ष्म दृष्टि दिखी होगी कि कितनी गहनता है कि केवल यह हर चीज और जैसे-जैसे मैं पॉडकास्ट करते जा रहा हूं भारतीय ज्ञान परंपरा पे ये चीज तो समझ में आ गई कि कुछ भी ऐसे ही नहीं है कि बस ऐसे ही डाला है या हर चीज के पीछे कुछ ना कुछ दर्शन कुछ तत्व कुछ आध्यात्म कुछ विज्ञान अवश्य है तो मैं आपका एक
बार फिर से धन्यवाद करूंगा और टीम भी आपका धन्यवाद करेगी कि आप बीच-बीच में हमारे लिए समय निकालते हैं और इतने विशिष्ट विषयों पर हम गहरी चर्चा करते हैं। दर्शकों तक पहुंचाते हैं। इसी के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। धन्यवाद।