स्टडी आईक्यू आईएस आपका सिलेक्शन हमारा मिशन इंडियन आईटी सेक्टर जो कभी देश की इकोनॉमी का क्राउन ज्वेल हुआ करता था इनोवेशन एंड ग्रोथ का पावर हाउस माना जाता था उसका रंग आज फीका पड़ता नजर आ रहा है जहां पहले नए ग्रेजुएट्स की एंट्री लेवल जॉब्स की लाइन लगी रहती थी आज वहां सभी बड़ी आईटी फर्म्स हायरिंग कट करने में लगी हुई हैं 2024 25 में आईटी सेक्टर के हायरिंग में 7 पर की गिरावट आई लास्ट ईयर जुलाई के डाटा के हिसाब से देश की टॉप फाइव आईटी कंपनीज ने लगातार सेवन क्वार्टर्स तक अपनी वर्कफोर्स को
कटडाउन किया है पिछले एक साल में टीसीएस फोसिस विपो एचसीएलटेक एलटीआर टेक्नोलॉजी सर्विसेस टेक वही अब उनके पंख काट रही है आज ज्यादातर बड़ी कंपनीज सर्वाइवल मोड में नजर आ रही हैं हायरिंग एक लग्जरी बनती जा रही है अमेरिकन मार्केट्स में इंटरेस्ट रेट्स और यूरोपियन मार्केट्स में जिओ पॉलिटिकल अनसर्टेंटी बढ़ने के कारण इंडियन आईटी सेक्टर की सबसे बड़ी रेवेन्यू जनरेटिंग मार्केट्स में ग्रोथ काफी मुश्किल हो रही है ऊपर से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आने से चीजें और भी कॉम्प्लिकेटेड हो गई हैं अनुमान यह है कि 2025 में 75 पर इंडियन आईटी फर्म्स एआई को अपनाने ने
वाली है ऊपर से वियतनाम फिलीपींस और चाइना जैसे देश भी आईटी सर्विसेस में इंडिया को कड़ी टक्कर दे रहे हैं इसकी वजह से इंडिया इस सेक्टर में अपनी मोनोपोली खोता नजर आ रहा है ऐसे में सवाल यह है कि क्या इंडिया का क्राउन ज्वेल अब उससे छीनने वाला है हमारे देश के गोल्डन सेक्टर पर आए इस तूफान की असली वजह क्या है वह कौन से बड़े चैलेंज हैं जो इसे चोट पहुंचा रहे हैं और आगे इसकी ग्रोथ का क्या अनुमान है दोस्तों अगर आप इन सभी सवालों के जवाब जानना चाहते हैं तो हमारे साथ इस
डिस्कशन को एंड तक जरूर देखते रहिएगा आइए अब बिना देर किए इस चर्चा को शुरू करते हैं दोस्तों भारत के आईटी और कम्युनिकेशन रिवोल्यूशन को आजाद भारत की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक गिना जाता है तो आइए सबसे पहले आपको इस रेवोल्यूशन से रूबरू कराते हैं भारत का इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी यानी आईटी सेक्टर सॉफ्टवेयर और आईटी सर्विसेस बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग यानी कि बी बीपीओ इंजीनियरिंग आर एनडी और टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स के साथ मिलकर एक्सपोर्ट और डोमेस्टिक मार्केट दोनों में एक मेजर रोल प्ले करता है 20 23 में इस सेक्टर ने 25 बिलियन डॉलर का रेवेन्यू जनरेट
किया जिसमें से 194 बिलियन डॉलर सिर्फ एक्सपोर्ट से आया था आपको जानकर हैरानी होगी कि इसमें टेक्नोलॉजी सर्विसेस का शेयर ही इंडिया के टोटल सर्विसेस एक्सपोर्ट्स का आधा से ज्यादा है करीब 5 मिलियन लोग डायरेक्टली इस इंडस्ट्री में काम करते हैं और कई मिलियन लोगों का जीवन इस पर इनडायरेक्टली डिपेंडेंट है अक्सर लोग इसकी सक्सेस को 1991 के इकोनॉमिक लिबरलाइजेशन से जोड़ते हैं लेकिन सही मायने में इंडिया में कंप्यूटिंग की कहानी 1947 के बाद साइंस एंड टेक सेक्टर के विकास से जुड़ी हुई है 1947 में भारत सरकार ने काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च यानी
कि सीएसआईआर की स्थापना की थी जिसका आईटी डेवलपमेंट में एक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा आजादी के तुरंत बाद देश के कई एंबिशियस साइंटिफिक प्रोजेक्ट्स के चलते देश में एनालॉग और डिजिटल कंप्यूटर्स के डेवलपमेंट की शुरुआत हुई उदाहरण के लिए इंडियन स्टेटिस्टिक्स प्रोजेक्ट्स के लिए डेटा प्रोसेसिंग मशीनस की जरूरत थी उसी तरह होमी जहांगीर भाभा के एटॉमिक रिएक्टर प्रोजेक्ट्स के लिए भी ऑनलाइन कंप्यूटर्स और इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलप किए गए इसी दौरान टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च कंप्यूटर बनाया और इंडियन स्टेटिस्टिक्स ने इंडिया में फैब्रिकेशन सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और मेंटेनेंस के स्किल डेवलप की
इस इंफ्रास्ट्रक्चर की मदद से ही 1960 में पहली जनरेशन के सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और प्रोग्रामर्स की ट्रेनिंग हुई लेकिन 1970 का दशक इंडियन आईटी इंडस्ट्री के लिए क्रिटिकल फेज था ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस की वजह से देश को ऑयल शॉक लगना और सरकार की रिस्ट्रिक्टिव लाइसेंसिंग पॉलिसीज का आना इस इंडस्ट्री के लिए काफी डिस्टर्बिग रहा ऊपर से 1978 में आईबीएम राजनीतिक मामले की वजह से देश छोड़कर जा रही थी इस वैक्यूम ने नए आईटी प्लेयर्स के लिए नई अपॉर्चुनिटी के रास्ते को खोल दिए 1976 में शिव नादर को इस बात का एहसास हुआ कि भारत में कंप्यूटर्स
नहीं है इसलिए उन्होंने सबसे पहले 18700 करोड़ हिंदुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड यानी कि एचसीएल में इन्वेस्ट किए इसी दौरान नरेंद्र पत्नी ने पटनी कंप्यूटर सिस्टम की स्थापना की नरेंद्र पटनी ने ही डाटा कन्वर्जन का काम अमेरिका से इंडिया भेजने का आईडिया दिया जिसे आगे चलकर ऑफशोरिंग कहा गया इनके पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स में नारायण मूर्ति ने यंग प्रो ग्रामर्स के एक ब्रिलियंट ग्रुप को लीड किया यही ग्रुप बाद में इनसे अलग होकर फोसिस के रूप में आगे बढ़ा दूसरी तरफ अजीम प्रेम जी जो वेस्टर्न इंडिया प्रोडक्ट्स लिमिटेड के उत्तराधिकारी थे उन्होंने विप्रो इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी लिमिटेड की स्थापना
की जिसे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस में इनक्यूबेट किया गया अर्थ वर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस भी इसी वक्त अपने बिजनेस को एक्सपेंड कर रहा था टाटा ने बोरोज के साथ पार्टनरशिप की इन सभी कंपनीज को इंडिया की बड़ी मार्केट का फायदा मिला जो 1978 में आईबीएम के एग्जिट के बाद मेन फ्रेम्स और डाटा प्रोसेसिंग से मिनी और माइक्रो कंप्यूटर्स की ओर शिफ्ट कर रही थी 1970 के एंड तक एक मॉडेस्ट स्केल पर सॉफ्टवेयर सर्विसेस के एक्सपोर्ट्स भी शुरू हो गए थे फिर जब 1980 में प्रोटो लिबरलाइजेशन का दौर शुरू हुआ तो इंपोर्ट एंड फॉरेन एक्सचेंज पर
लगाए गए कुछ रिस्ट्रिक्शंस को हल्का किया गया इसी बीच सरकारी दफ्तरों में कंप्यूटर्स के यूज़ को बढ़ावा देने के लिए बड़े लेवल पर स्कीम्स भी लॉन्च की गई इस दिशा में इंडियन रेलवेज के पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम का कंप्यूटराइजेशन एक बहुत बड़ा कदम साबित हुआ इस प्रोजेक्ट ने दिखाया कि कंप्यूटर सर्विसेस को किस तरह से बेटर किया जा सकता है इसके बाद बैंकिंग सेक्टर का कंप्यूटराइजेशन हुआ और नेशनल इंफॉर्मेशन सेंटर के माध्यम से गवर्नमेंट ऑफिसेसूट तब आया जब 1986 की सॉफ्टवेयर पॉलिसी ने सॉफ्टवेयर को एक इंडिपेंडेंट इंडस्ट्री के रूप में रिकॉग्नाइज किया और सेटेलाइट डाटा लिंक्स
के माध्यम से इसके एक्सपोर्ट्स की परमिशन दे दी गई लेकिन उस समय डेटा लिंक्स इतने महंगे थे कि कोई भी सॉफ्टवेयर कंपनी इन्हें अफोर्ड नहीं कर सकती थी सिर्फ टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स ही एक ऐसी कंपनी थी जो बेंगलोर में अपने डेडिकेटेड सैटेलाइट अर्थ स्टेशन के जरिए सॉफ्टवेयर को एक्सपोर्ट करती थी इस समस्या को सुलझाने और छोटी सॉफ्टवेयर फर्म्स को सपोर्ट करने के लिए डॉ एन शेष गिरी ने सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क यानी कि एसटीपी स्कीम का कांसेप्ट दिया जिसे 1990 में डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स के सेक्रेटरी एन विटल ने इंप्लीमेंट कराया एसटीपी ने इन कंपनीज को सिंगल विंडो
क्लीयरेंसस और हाई स्पीड डटा लिंक्स की सुविधा दी जिसने स्मॉल फर्म्स के लिए एक्सपोर्ट को काफी आसान बना दिया लेकिन इस सेक्टर की रिवोल्यूशन ग्रोथ अभी भी बाकी थी 1991 का लिबरलाइजेशन रिफॉर्म्स इस सफर का सबसे बड़ा माइलस्टोन साबित हुआ बस फिर क्या था आईटी सेक्टर के लिए ग्लोबल अपॉर्चुनिटी की बाढ़ आ गई सॉफ्टवेयर कंपनीज को कैपिटल मार्केट्स तक पहुंचने का मौका मिला फॉरेन कंपनीज के साथ जॉइंट वेंचर्स के रास्ते खुल गए और देश की सॉफ्टवेयर कंपनीज को बड़ी-बड़ी ग्लोबल मार्केट्स एक्सप्लोर करने का मौका मिल गया और यह सब केवल एक तरफा नहीं था इस
दौरान ग्लोबल सॉफ्टवेयर कंपनीज ने भी इंडिया में अपने ऑफिसेज एस्टेब्लिश किए यही पीरियड अमेरिका में इंटरनेट और ड कॉ बूम का था जिसने इंडियन कंपनीज को और भी बड़ी अपॉर्चुनिटी दे दी 1996 में इंडिया को y2k प्रॉब्लम के रूप में एक और बड़ा मौका मिला y2 के प्रॉब्लम और कुछ नहीं बल्कि एक कंप्यूटर बग था जिसकी वजह से पुराने सॉफ्टवेयर सिस्टम्स 2000 का यर रिकॉग्नाइज ही नहीं कर पाते थे और इसकी वजह से ग्लोबल कंप्यूटिंग सिस्टम्स के फेलियर का खतरा बढ़ता जा रहा था ग्लोबल फर्म्स को अपने कंप्यूटर सिस्टम्स को y2k के लिए अपग्रेड करना
था जो उनके लिए एक बड़ी प्रॉब्लम थी लेकिन इंडियन कंपनीज ने इस प्रॉब्लम को ही एक बड़ी अपॉर्चुनिटी में तब्दील कर दिया y2 के प्रोजेक्ट के बाद इंडियन फर्म्स की क्वालिटी और टैलेंट से इंप्रेस्ड क्लाइंट्स ने इनके साथ अपने बिजनेस को और भी ज्यादा बढ़ा दिया फिर 2000 के दौरान इंटरनेट और ब्रॉडबैंड की बढ़ती रीच ने एक नए सेगमेंट बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग यानी बीपीओ को जन्म दिया हालांकि बी बीपीओ का मेन बेस आईटी सर्विसेस ही थी लेकिन इसमें नॉन आईटी काम जैसे कस्टमर सपोर्ट और फाइनेंशियल प्रोसेसिंग भी शामिल थी इसके चलते वेस्टर्न बैंक्स और इंश्योरेंस
कंपनीज ने अपना बैक ऑफिस का काम इंडिया में शिफ्ट करना शुरू किया इंजीनियरिंग आर एनडी कंसल्टिंग और नॉलेज प्रोसेसिंग जैसे हाई एंड ऑपरेशंस भी इंडिया में आउटसोर्स होने लगे और इंडिया की यह इंडस्ट्री बूम होती चली गई आपको जानकर हैरानी हो होगी कि 1999 2000 में इंडिया के सॉफ्टवेयर सर्विसेस एक्सपोर्ट्स मात्र 3 बिलियन डॉलर से भी कम के थे व 203 में बढ़कर 194 बिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर चुके हैं इंडियन आईटी इंडस्ट्री देश में वाइट कॉलर जॉब क्रिएशन में भी एक बड़ी सहायक रही है लेकिन साथ ही इसने 20078 की ग्लोबल इकोनॉमिक क्राइसिस
से लेकर कोविड पडेम के दौरान आए इकोनॉमिक स्लंप का भी सामना किया है खैर इस पूरी जर्नी में हाई क्वालिटी टेक्निकल एजुकेशन ट्रेन मैन पावर एंटरप्रेन्योरल स्पिरिट और सपोर्टिव गवर्नमेंट पॉलिसीज ने इस सेक्टर को काफी सपोर्ट किया अब आप सोच रहे होंगे कि यदि सब कुछ अच्छा ही चल रहा था तो फिर इस क्राइसिस का जन्म हुआ कैसे तो दोस्तों बात यह है कि आईटी बूम के उस दौर में और आज के दौर में जमीन आसमान का फर्क आ चुका है सबसे पहले तो आपको बता दें कि हमारे आईटी सेक्टर का बिजनेस मॉडल लेबर आर्बिट्रेजिंग
यानी सस्ता लेबर और ज्यादा काम यानी हमारा चीप लेबर दुनिया को बहुत कम दाम पर सर्विसेस प्रोवाइड करता था ए कम के मुताबिक इंडिया के आईटी एक्सपोर्ट्स का 55 टू 60 पर रेवेन्यू अभी भी लो स्केल सर्विसेस जैसे कि बेसिक कोडिंग सॉफ्टवेयर टेस्टिंग कस्टमर सपोर्ट और बीपीओ से ही आता है लेकिन यह फार्मूला अब क्यों फेल हो रहा है क्योंकि एआई और ऑटोमेशन ने सबको रुला दिया है आज के जमाने में टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि ट्रेडिशनल एजुकेशन और स्किल्स उसकी स्पीड को मैच नहीं कर पा रहे 2025 में इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज
में स्किल गैप इंडियन आईटी इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा चैलेंज बन रहा है ऊपर से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ सभी इंडस्ट्रीज में ऑटोमेशन की जो लहर आ रही है वह ट्रेडिशनल स्किल्स को और भी इरेलीवेंट बना रही है एक एस्टिमेटर से 2025 में 70 पर इंडियन आईटी टास्क्स ऑटोमेट हो सकते हैं जिससे लाखों जॉब्स पर बुरा असर पड़ सकता है 2024 के इकोनॉमिक सर्वे ने भी यह वार्निंग दी है कि आईटी जॉब्स में ऑटोमेशन आने से लो वैल्यू एडेड सर्विसेस पर से ज्यादा बुरा असर पड़ने वाला है आसान शब्दों में कहें तो अब इन्हें ज्यादा
स्किल्स और कम हाथों की जरूरत पड़ने वाली है जैसा कि हमने शुरुआत में भी देखा 2025 में 75 पर इंडियन आईटी फर्म्स एआई को अपनाने वाली हैं जिससे एआई ब्लॉकचेन मशीन लर्निंग डेटा एनालिटिक्स और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे फील्ड्स में स्पेशलाइज्ड स्किल्स की डिमांड बढ़ जाएगी इसकी वजह से जॉब रोल्स रूटीन टास्क की बजाय ज्यादा कॉम्प्लेक्टेड और हाईली स्किल्ड पोजीशंस की तरफ शिफ्ट होंगे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के हिसाब से 2025 में इंडिया की लगभग 50 पर वर्कफोर्स को री स्किलिंग की जरूरत होगी इससे डील करने के लिए कंपनीज 2025 में अपने अप स्किलिंग बजट को 15
टू 20 पर तक बढ़ाने वाली हैं लेकिन हमारे देश में इंडस्ट्री और एकेडमिक्स अभी भी काफी पुअर है जिसकी वजह से हमारा एकेडमिक करिकुलम मार्केट नीड्स के हिसाब से फिट ही नहीं हो पाता साथ ही साथ रूरल एरियाज में इंडस्ट्री रिलेवेंट स्किल्स का एक्सपोजर भी आज भी बहुत कम है आइए अब इस मिसमैच को थोड़ा गौर से समझते हैं तो इंडिया में हर साल 1.5 मिलियन से ज्यादा इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स निकलते हैं लेकिन इनमें से एंप्लॉय बल कितने होते हैं सिर्फ 22 60 पर से भी ज्यादा को उनके स्किल्स के हिसाब से जॉब मिलनी मुश्किल होती
है इंडिया इंजीनियरिंग टैलेंट का एक लीडिंग हब है लेकिन उसके बावजूद भी यहां ग्रेजुएट्स की संख्या और उनकी एक्चुअल एंप्लॉय बिलिटी के बीच काफी बड़ा गैप देखने को मिलता है यह गैप सिर्फ इंडिविजुअल करियर्स के लिए नहीं है बल्कि देश के इकोनॉमिक और टेक्नोलॉजिकल ग्रोथ के लिए भी एक बड़ी चुनौती है नासकम का एस्टीमेट है कि आने वाले कुछ सालों में इंडिया को एआई और एमएल जैसे एडवांस सेक्टर में 1 मिलियन से ज्यादा इंजीनियर्स की जरूरत पड़ेगी लेकिन 2028 तक डिजिटल टैलेंट का डिमांड सप्लाई गैप 25 पर से बढ़कर 30 पर तक पहुंचने की संभावना
है और तो और इंडियाज ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स 2025 से पता चलता है कि केवल 42.6 6 पर इंडियन ग्रेजुएट्स ही रोजगार के योग्य हैं जो 2023 के 44.3 से भी कम है और इसका सीधा कारण है देश में बढ़ता स्किल गैप इसीलिए पीएम मोदी ने भी कहा है कि इमर्जिंग रोल्स के लिए इंडस्ट्री लीडर्स को वर्कफोर्स को लार्ज स्केल पर रेस्किल और अप स्किल करने की जरूरत है इंडस्ट्री लीडर्स को एमएल क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी पर फोकस करते हुए हेवी ट्रेनिंग प्रोग्राम्स में इन्वेस्ट करना होगा स्कूल्स में इमोशनल इंटेलिजेंस क्रिएटिविटी और प्रॉब्लम सॉल्विंग जैसे
ह्यूमन स्किल्स को डेवलप करने पर जोर देना होगा और सबसे जरूरी इंडस्ट्री और अकडम को साथ मिलकर काम करना होगा ताकि एजुकेशन इंडस्ट्री के नीड्स के साथ-साथ अलाइन हो सके क्योंकि इंडिया में इंजीनियरिंग टैलेंट की कमी नहीं है लेकिन अगर हम इस एंप्लॉय बिलिटी गैप को ब्रिज नहीं करते तो यह पोटेंशियल वेस्ट हो जाएगा यहां एक और बड़ा मुद्दा यह है कि हमारा आईटी सेक्टर मुख्य तौर पर सर्विस बेस्ड ही रहा है हमने प्रोडक्ट बनाने के बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं आज भी इंडिया चाइना और यूएसए इनोवेशन और पेटेंट फाइलिंग्स में काफी पीछे है
यह गैप दिखाता है कि इंडिया ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट को उतनी तवज्जो नहीं दी जिसकी वजह से ग्लोबल कंपटिंग खत्म हो सकती है इनोवेशन के लिए रिसर्च और डेवलपमेंट में फंडिंग और पॉलिसी सपोर्ट का होना भी बहुत जरूरी है यह ना सिर्फ नए इनोवेशंस को बढ़ावा देगा बल्कि इंडिया की पेटेंट फाइलिंग्स में भी सुधार आएगा जिससे हम ग्लोबल स्टेज पर अपनी कंपटिंग बनाए रख सकते हैं खैर इसके बाद हमारी आईटी इंडी इस्ट्री के आगे एक और बड़ा चैलेंज है वियतनाम और फिलिपींस जैसे देश इंडिया का आईटी सेक्टर वियतनाम और फिलीपींस चाइना और कोस्टारिका जैसे देशों
से इंटेंस कंपटीशन का भी सामना कर रहा है वियतनाम का आईटी सेक्टर चीप लेबर कॉस्ट स्किल्ड वर्कफोर्स के बूम और गवर्नमेंट सपोर्ट की वजह से तेजी से ग्रो कर रहा है जैसे-जैसे कंपनीज कॉस्ट इफेक्टिव सॉल्यूशंस के लिए वियतनाम की ओर बढ़ रही हैं इंडियन आईटी फर्म्स की ट्रेडिशनल डोमिनेंस पर प्रेशर बढ़ रहा है इस शिफ्ट का एक बड़ा कारण इंडिया में बढ़ते ऑपरेशनल कॉस्ट्स भी हैं हमारे यहां स्किल्ड आईटी वर्कर्स की सैलरीज में काफी ज्यादा इजाफा हुआ है जिस वजह से कंपनी ज्यादा अफोर्डेबल अल्टरनेटिव्स ढूंढ रही हैं इसीलिए वियतनाम की यंग एंड वेल ट्रेंड वर्कफोर्स
एक अट्रैक्टिव ऑप्शन बन गई है वियतनाम का एक नए टेक हब की तरह उभरना इंडियन टेक प्रोफेशनल्स की जॉब सिक्योरिटी को भी खतरे में डाल रहा है यह शिफ्ट इंडियन कंपनीज के लिए भी चिंता का विषय बन गया है स्किल्ड प्रोफेशनल्स की कमी और वेंचर कैपिटल फंडिंग के लिमिटेड होने से इंडस्ट्री के लिए बड़ी समस्या आ गई है लेकिन इंडियन टेक एक्सपर्ट्स की एडेप्टेबिलिटी और इनोवेशन दुनिया भर में पहचानी जाती है अगर इंडियन टेक प्रोफेशनल्स वक्त रहते खुद को एआई और एमएल जैसे एरियाज में स्पेशलाइज करते हैं तो वह अपने आप को नए लीडर्स के
रूप में पोजीशन कर पाएंगे यहां आपको बता दें कि इंडिया के आईटी एक्सपोर्ट्स का 80 पर सिर्फ आंध्र प्रदेश कर्नाटका महाराष्ट्र और तमिलनाडु से आता है तो नई मार्केट्स में एक्सपेंड करने से रीजनल लटिल का रिस्क कम होगा और इंडस्ट्री ज्यादा स्ट्रांग बनेगी जिससे किसी एक रीजन पर ओवर डिपेंडेंस को खत्म किया जा सकता है खैर इसके बाद इंडिया के आईटी सेक्टर के आगे एक और बड़ा चैलेंज है साइबर सिक्योरिटी थ्रेट्स आजकल एआई पावर्ड साइबर अटैक्स और भी ज्यादा सोफिस्टिकेटेड और कॉमन होते जा रहे हैं रैंस सम वेयर एज अ सर्विस प्लेटफॉर्म्स की वजह से
कम टेक्निकल स्किल्स वाले क्रिमिनल्स भी सोफिस्टिकेटेड अटैक्स कर पा रहे हैं और तो और 5g टेक्नोलॉजी के आने से नई वल्नरेबल कीज भी पैदा हो रही हैं जिन्हें साइबर क्रिमिनल्स एक्सप्लॉयड कर सकते हैं इससे निपटने के लिए कंपनीज को रेगुलर ऑडिट्स अवेयरनेस ट्रेनिंग और एआई ड्रिवन थ्रेट डिटेक्शन में इन्वेस्ट करना होगा साथ ही इनको डिजिटल पर्सनल डटा प्रोटेक्शन एक्ट और आईआरडीएआई की साइबर सिक्योरिटी गाइडलाइंस 2023 दोनों स्टैंडर्ड्स को मीट करने वाली साइबर सिक्योरिटी प्रैक्टिसेस को लागू करना होगा साथ ही साइबर सिक्योरिटी वर्कफोर्स को भी तैयार करना होगा ताकि सिक्योरिटी प्रोफेशनल्स की बढ़ती डिमांड को मीट
किया जा सके तो दोस्तों आप देख सकते हैं कि यहां चैलेंजेबल बढ़ाएं तो इन सभी चैलेंज से लड़ना नामुमकिन भी नहीं है 2025 में इंडिया की आईटी स्पेंडिंग 11.2 तक बढ़ने का अनुमान है जिससे यह 160 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है गवर्नमेंट भी एआई फॉर एवरी इंडियन जैसी एंबिशियस इनिशिएटिव लेकर आ रही है जिसका फोकस हर व्यक्ति तक एआई को पहुंचाना है आईटी कंपनी के लिए भी यह बेहद जरूरी है कि वह एआई मशीन लर्निंग और डेटा साइंस जैसे नए एरियाज में अपनी वर्कफोर्स को ट्रेन करें अगर ऐसा नहीं किया गया तो जॉब लॉसेस
के साथ-साथ ग्लोबल कंपटीशन में पीछे रहने का रिस्क बढ़ जाएगा यहां यह जानना बेहद जरूरी है कि आईटी इंडस्ट्री एक साइक्लिकल इंडस्ट्री है यह ग्लोबल इकोनॉमिक ट्रेंड्स के अप्स और डाउन से बहुत क्लोजल गुथी हुई है यानी जब दुनिया में कोई उतार चढ़ाव होता है तो इसका असर हमारी आईटी इंडस्ट्री पर तुरंत दिखाई देता है लेकिन जब चीजें रिकवर होती हैं तो आईटी सेक्टर में वह रिकवरी काफी स्लो होती है इसलिए यह सेक्टर एक्सटर्नल शॉक्स के आगे काफी वल्नरेबल होता है 202122 में आए ग्लोबल इकोनॉमिक स्लोडाउन का असर आज तक इंडिया की आईटी इंडस्ट्री पर
दिख रहा है क्लाइंट्स अपने डिस्क्रीशनरी स्पेंडिंग कम कर रहे हैं और नए प्रोजेक्ट्स की पाइपलाइन श्रिंक हो रही है लेकिन अगर 2025 में ग्लोबल इकोनॉमी में स्थिरता आती है तो हमें नई अपॉर्चुनिटी देखने को मिल सकती हैं अगर इंडिया अपने डोमेस्टिक चैलेंज का सम न करें और इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज का पूरा फायदा उठाए तो इससे ना सिर्फ आईटी इंडस्ट्री अपने ट्रैक पर वापस आएगी बल्कि यह इस फील्ड में ग्लोबल लीडरशिप भी हासिल कर पाएगी तो दोस्तों इसी के साथ आज के डिस्कशन में इतना ही आप इसके बारे में क्या सोचते हैं हमें कमेंट सेक्शन में जरूर
बताइएगा स्टडी आईक्यू आईएस आपका सिलेक्शन हमारा मिशन