झाल कर दो कर दो कर दो [संगीत] कि आत्मा के न जानने से मनुष्य अपने को दुखी जानता है मैं मरूंगा मैं दरिद्र हूं मैं दास हूं इतना अधिक दुख तब तक होते हैं जब तक आत्मा को ले जाना है कि जब आत्मा को जानोगे तब आनंदरूप हो जाओगे ना कि जैसे किसी स्त्री की गोद में पुत्र हो और वह स्वप्न में देखा कि बालक मेरे पास नहीं है तो बड़े दुख को प्राप्त हो और रुदन करने लगे थे का परिचय स्वप्न से जागे और देखें कि बालक उसकी गोद में है तो बड़े आनंद को
प्राप्त हो और उसके दुख शोक नष्ट हो जाते हैं में ही राजन वैसे ही तेरी आत्मा तेरे पास और सदाबहार रूप है उसके प्रमाद से तो अपने को दो कि जानता है कि जब अज्ञान रूपी निद्रा से जागे का या तब अपने को जाने का है और तेरे दुख और शोक नष्ट हो जाएंगे देगा और इंद्रियां देख जो अदृश्य है उनसे मिलकर अपने को यह जानना कि मैं हूं यही अज्ञान रह हूं कि शरीर और इंद्रियों वाले शरीर को मैं मानने आदमी का ज्ञान है मैं अमन में जो वासना है कि वह मेरी पूरी हो
इच्छा तुम्हें सुखी हूं यह मक्का गेहूं का भाव है कि कहीं वाजपेई पूरी होंगी तो क्या हो गया है अब तो जो होना यह होते हैं नहीं होता है नहीं होता है चलता रहता है कि वासनापूर्ति का सुख बंधन करता है कि शरीर को मेहमान ना यार ध्यान है बस तुमको मेरा मानना ही अज्ञान को पोषण दलाल है हैं कि आत्मा को मेहमान ना परमात्मा एक ₹100 विख्यात को तैयार ज्ञान को चीज का जैसे बादलों को चीरकर सूर्य प्रकाशित होता है अंधकार ऋषि गौतम जी बहुत प्रॉब्लम है मैं उसके बिना दुख नहीं है है क्योंकि
कपट चालू है ना अपने कपड़े धूप को बढ़ाता है धूप को मिटाता है अपने कपड़े गांठ मन में नहीं सबसे साहित्य सभा नारायण वक्त कि लगी किनारे आ कि ऐसा आत्मकथा है अभी जैसे जब मणिकरण से ढकी होती है तब नहीं देख पाती और जब तुरंत दूर करिए तब मनी प्रकट हो जाती है वैसे ही आत्मा रूपी मणि वासना रूपी वितरण सड़क है बैठे हैं कि मैं शिवमणि जिन आंखों से ढूंढ है तो नहीं देती थीं कि हटाइए तो दिखती ऐसे आत्म-अभिमानी वासनाओं के तिनकों से रखिए का कोई वास्तविक प्रभाव मेहमान कप टीम हुआ है
और अपने दोस्तों को डांटने की कला कोई वासना से खाते हैं हुआ है कि यह 200 गुड पसंद तो उसका भविष्य अंधकारमय है मैं अपनी गलती में सफाई देखें मंत्री से बचना चाहता है समझ लो उसको लंबे समय तक इस पाप को में रहना है जनम-मरण मां के घर में रहना है मैं हूं कर दो को एक हीरा जनम एक उपाय तुझसे कहता हूं उसे कर जिसमें तेरे दुख नष्ट हो जावे एक वस्तु जो अहम अभिलाषा सहित वासना है उसका त्याग कर फिर जहां इच्छा हो वहां पवित्र शब्द है कि मैं मेरे शरीर को मैं
मानने और अपनी इच्छा के अनुसार और सुखी होने की कोशिश दो छोड़ दें जहां जाएगा ब्रह्म है आ जाओ चाय पिछड़ों रोजी रोटी खाना सब मौज ही मौज इतना जरा सा है लेकिन इसी में कइयों की जो व्यक्ति नहीं उठी आदत पानी शरीर को मैं मानने और संसार को सच्चा मान यह गंदी वासना के अधीन विचारों को मार लेते हैं कि इतने नीचे नहीं है कि गुरु के पास भी नहीं आ सके हम बैठ सके कुछ तो है बुनने लेकिन उभरा है नई दिल्ली चौबे दुरुपयोग और बैठ भी नहीं सकते हैं कि स्वप्न देवता यमराज
अंधविश्वास सुननी बजाय जिसके पुण्य फल प्राप्त होते हैं उनको दो भगवान गुरु शास्त्र में विश्वास नहीं होता है मैं तो एकदम के नीचे भी नहीं आ रहे डम सच्चे कि उत्तम जिज्ञासु भी नहीं है हुआ है कि अ और फिर तुझे धोखा प्रश्न होगा मु कि ऐसा करोगे तो दुख दोष नहीं होगा कि शरीर में अहम और वासना की पूर्ति यह छोड़ दो तो फिर दुख कभी हो गई कि विकेट धीमा होता है तो समझ लो कि ईश्वर प्राप्ति नहीं हुई है विशुद्ध भारतीय जाए तो दुख नहीं है है जैसा अमरत्व इसी बीच रखा टीम
ने सामान्य सामान हर्ष ही नहीं होता ईश्वर प्राप्ति के तक काम नहीं बताओ मैं विश्रांती की महिमा कोई पूरी गारंटी नहीं सकता ईश्वर की महिमा भी नहीं रह सकता है तो इस पर प्राप्त महापुरुष को भी पूरा नहीं आ सकता पैसे शुभ हो तो फिर मन चाहा इश्क तो वह विमान लगेगा लेकिन वास्तविक में है आ सकता अंतरात्मा है जो ईश्वरों का भी ईश्वर ही मंगलेश्वर यह फलाना सारे विश्व का जो इश्वर है वह आत्मदेव ब्रह्म या ईश्वर का शुक्र है ए ब्वॉय स्वरों का शुक्र है वह तुम्हारा हमारा सब प्राइस है है और उसे
एक सेकेंड का हजारवां हिस्सा अलग न्यूज़ आधे घंटे में कि राज्य में लाने की ई वास नॉट क्लियर अज्ञान की बलिहारी कि हिंदी लोग ताकि फिल्म Ae हुआ है यह देखो मैं माल निकाल जान दे रहता जेनी दशा वर्ते देहातीत को तेज ज्ञानीना चरणमां हो वंदन अगणित अ कुछ देर होते हुए भी देहाती गीत में शरीक होते हुए भी सारी रात रीत सदा आनंद समय ऐसा साक्षात्कारी महापुरूषों का है 9th तुलना के नजर आए थे उसके तुम ना फिर शेखर कि श्रोता ए राजा इक्ष्वाकु भगवान राम इक्ष्वाकु के कुल में पैदा हुई एक राजा एक
सॉन्ग मनु महाराज की है जो भक्त थे है कि मनुमहाराज प्रधान क्या तुम्हारा है ए राजा ने बोला के अ कुछ लोगों की नजर से तुम्हें बहुत बड़ा आदमी बड़ा सूखी देता हूं लेकिन मैं अब हरा अनशन आंसू नहीं रख में घूमता हूं यह मेरा जय जय कार करती लेकिन मैं कौन हूं अभी तक जाना नहीं है कि आखिर एक दिन मर जाएंगे शरीर यानि पड़ा रह जाएगा अब कि यह राजभवन लक्ष्मी क्या मेरे साथ हैं अ तो कृपा करके बजे में अपने उद्धार कॉल दृष्टि तब मनु महाराज ने का जो घर में भोजन मिले
स्वास्थ्य का ख्याल करके खा लो यह चाहिए यह चाहिए उस माइक मत करो है जहां निदा एवं शुरू हो है जो धन मिल गया मिल गया छुप गए जो मान अपमान हुआ कि नित्य आत्मा परमात्मा की प्राप्ति का व्यास अंतर शुक्रवार को स्विच ऑन करो मैं तुम्हारे सारे दुख मिट जाएंगे फिर तुम जिसे इंटर पर पैर रखोगे वह पूरे नहीं होते हो जाए कि तुम बस तू कुछ वस्तुओं पर साथ अ कि तुम जिस पर दृष्टि डालोगे वह भी धन्य आत्मा पुण्यात्मक कि आत्मा है हैं यानि की दृष्टि से लोग सुखी आत्म नहीं होते क्या
हैं अब तुम ऐसे बन जाओगे हुआ है श्री राधे कृष्णा उल्लंघन है कि पूरे विश्व को पलते हैं है रघु राठौर दिलीप राजा दशरथ राजाओं के राजा राम है 1978 खा लिया है मैं अज्ञानी स्वरूप के प्रमाण से अभिमान करता है कि यह मेरे हैं और मैं इनका हूं और उनका नाश होने से दुखी होता है कि नहीं जानता कि शत का नाश नहीं होता असद का नाश होने से शत्रु का नाश मान बैठता है जैसे घटना होने से घटा कांच का नाश मानिए पैसे मूर्खता से रूक पाता है अ में ही राजन तो अपनी
आत्मा को जान लें है उसमें वाणी की गति नहीं है यहां पर शास्त्रों के उपदेश से जाना जाता है है क्योंकि मन और वाणी में भी आत्म सकता है उसी से आत्मा अधिक संख्या सिद्ध होती है कि जैसे जितने स्वप्न के पदार्थ है उनमें अनुभव सकता है उससे भी पदार्थ सिद्ध होते हैं है वैसे ही जितने कुछ अर्थ संज्ञा है विश्व आत्मा सिद्ध होती है कि ऐसा जो तेरा स्वरूप है उसमें स्थित हो जिसमें जरा मृत्यु आदि दुख नष्ट हो जाए ही राजन वह शास्त्रों और गुरु के वचनों से पाया जाता है और तब से
नहीं मिलता मैं केवल अपने आप जाना जाता है कि शास्त्र आदि तो लगा देते हैं परंतु यह है ऐसा कहकर नहीं जाते थे हैं 10 टॉप पुरुष अपने आप जानता है जैसे नेत्रों में जो सूर्य की जाती है वहीं सूर्य को देखती है वैसे ही आत्मा ही आत्मा को देखता है कि वह अंतर्मुख और संकल्प से रहित होकर अपने को आप देखता है कि जब संकल्प बहिर्मुख होता है तब वहीं दृढ़ होकर स्थित होता है और फिर उसकी भावना होती है में ही राजन जीव को और कोई दुदही नहीं अपनी संकल्प से अ सम्मुख दर्शित
दुख होता है समय दृश्य को जगत दृष्टिगोचर होने पर भी दुखदाई नहीं होता है है जैसे रस्सी में सर्प की भावना होती है तो मैं प्राप्त होता है कि वृषभ राशि को जान लेने से सरकार भ्रम दूर होता है तब मैं भी जाता रहता है वैसे ही पुरुष को जो संसार की भावना होती है वह मुद्दा है कि इससे आत्मा की भावना कर जिसमें तेरे शब्द रुख नष्ट हो जाते हैं में ही राजन तू सर्वदा आनंद रूप और अद्वैत है अ मैं तुझ में कोई कल्पना नहीं है वह हुए हो कर दो कर दो कर
दो कर दो हुआ है