क्षत्रिय का कर्तव्य है कि सीमाओं की रक्षा करना दुर्बल को साथ सहकार देना ब्राह्मण गौ की रक्षा करना लेकिन जब मन्मुख हो गए शराबी कबाबी बन गए और र्चना करने लग गए तो परशुराम ने उन्हें दंडित किया और 21 बार परशुराम ने क्षत्रियों को दिन के तारे दिखाए प्रसन्न वदन होकर भगवान शिव जी के दर्शन करने को जा रहे थे कैलाश की और मां उमा को वंदन करने जा रहे थे लेकिन देव बड़ा बलवान है तीन प्रकार का प्रारब्ध होता है मंद तीव्र तर तीव्र मंद तो पुरुषार्थ से बदला जाता है तीव्र प्रारब्ध को आपका
पुरुषार्थ और किसी सत्पुरुष के आशीर्वाद कृपा की जरूरत है तर तीव्र प्रारब्ध तो अवश्य मेव भक्ति तुम कृतम कर्म शुभा शुभम तर तीव्र प्रारब्ध तो सभी को भोगना पड़ता है जैसे मान लो कोई मंद रोग है मानो पैर कट गया आपने सो प्रोमस फलाना ड़ा किया उससे ठीक नहीं हुआ एक साधु का कार के नीचे पैर आ गया था एड़ी कट गई थी मैंने उन्हें नरेंद्र हॉस्पिटल में ताके दिलवाए इंजेक्शन दिलवाया कैप्सूल खिलवा महीना भर हो गया उस साधु को ठीक नहीं हो रहा था साधु ने मुझे कहा कि बापू जी मैं जरा सा ठीक
हो जाऊ मैं तेल बनाऊंगा उससे ही सब ठीक हो जाता है उन्होंने तेल बनाया और सुबह और शाम वो तेल लगाते थे जो काम सोप्रो मायन दे टोल डक डर और कई टिया एंटीबायोटिक आदि नहीं कर सकी वह साधु के तेल ने काम किया उस तेल को फिर हमने सर्वगुण तेल नाम देकर समिति वालों को बताया अब मैंने देखा कि कहीं फोड़ा पक्का अंदर हो रहा है तो एक बार फोड़ा हुआ था तो पुष्कर में तो मैंने नस्तर रखवाया था और काफी दिन के बाद वोह पोड़ा से जान छूटी अभी एक फोड़ा हुआ था पेट
के तरफ व तेल रगड़ा दो तीन दिन में फड़ा गायब एक बार उंगली कटी सर्वगुण तेल रगड़ा दो तीन दिन गायब दो चार दिन पहले कुछ चोट लगी थी खून बहा था सर्वगुण तेल लगा दो दिन तीन दिन में ठीक हो गया तो साधु ने यह सर्वगुण तेल बताने की विधि दी तो जैसे यह सर्वगुण तेल घाव पर अथवा फोड़े पर काम करता है ऐसे सर्व हरी है समझकर कर्म करते हैं तो सब जगह वह समझ काम कर देती है तो मंद तीव्र मंद रोग हो तो अपने पुरुषार्थ से तीव्र कुछ चोट बोट हो तो
तीव्र औषधी से तर तीव्र हो तो महाराज डॉक्टरों की हाजरी में ही पेशेंट को रवाना होना पड़ता है खुद डॉक्टरों को भी तर तीव्र रोग में शरीर से हाथ धोने पड़ते तो मंद प्रारब्ध तीव्र प्रारब्ध तर तीव्र प्रारब्ध यह रहा होगा कोई तीव्र प्रारब्ध परशुराम का और गणपति जी का भिड़ना गणपति जी को देखकर परशुराम ने अपनी विजेता का कुछ बना होगा चित्त में उत्साह उल्लास अरे हटो तो गणपति जी हटे नहीं आपस में तू तू में मैं हो गई तू तू में में हो गई तो परशुराम ने धक्का दे मारा तो गणपति जी गिर
गए गणपति जी गिर गए गणपति जी को लगा कि परशुराम के अहम को थोड़ा नियंत्रित करना अनिवार्य है गणपति जी ने अपना गरिमा रूप धारण किया बड़ा रूप धारण करके परश राम को सून में पकड़ के डुलाने लगे तो परशुराम ने अपने गुरु इष्टदेव शिवजी के स्तोत्र का कवच धारण किया और स्मरण किया श्री कृष्ण का और अपना परशु बाए हाथ बाए दांत पर दे मारा दांत के टूटने का तड़ाका हुआ यक्ष गंधर्व किन्नर और देवलोक के लोग कंपित हुए पृथ्वी पर हाहाकार हो गया और वे गजानंद प्रभु जिनकी समता सदा सेवा में रहती है
रक्त के फुहारे छूट रहे हैं देखने वाले आक्रांत कर रहे हैं लेकिन गणपति जी शांत सौम्य भाव में पड़े मां उमा को खबर दी कार्तिक जी ने सारा वृतांत सुनाया उमामा को पायमा हो गई और भगवान शभ सदाशिव तक खबर पहुंचे शिव जीी भी पधारे पार्वती जी गणेश जी की और देखते हुए दयामय मां का हृदय अपने हाथ न रहा ऐसी कौन सी मां है कि बेटे के रक्त के फुहारे दे चुप बैठे अ वे जगत जननी पार्वती जी कुपित होकर कहती हैं कि अरे परशुराम तुझे इतना हंकार आ गया जो मक्खी पर भी कभी
वार नहीं करता ऐसा मेरा सहिष्णु जितेंद्रिय पुरुष इस विश्व में गणपति जी जैसा जितेंद्र पुरुष कौन है इसलिए तो इसकी अग्र पूजा होती है और ऐसे क्षमाशील और संयमी मेरे पुत्र को तूने स्तोत्र और कवच का स्मरण करके अपने परशु का दुरुपयोग किया है यह अगर चाहे तो तेरे जैसे हजारों जंतुओं को अपनी सूंड में अथवा अपनी शक्ति से कुचल सकता है फिर भी शांत बैठा है अरे परशुराम तू अपने को आखिर क्या समझता है पत्रता में पार्वती मां की बराबरी कौन कर सकता है और संयमी पुरुषों में गणपति की बराबर भी कौन कर सकता
है ना पार्वती परा साधवी ना गणेशा परो वश ही पार्वती के समान कोई साधवी नहीं और गणेश जी के समान कोई इंद्रियों को वश करने वाला पुरुष नहीं परशुराम ने देखा के मा को पाय मान हुई अब परशुराम को कुछ खबर हुई कि मेरे से अनुचित हो गया परशुराम ने मन ही मन अपने इष्ट देव का चिंतन किया श्री कृष्णम शरणम ममा रक्षमाम रक्षमाम जो ही आर्त भाव से भगवत शरण गए भगवत शरण जाने वाला पुरुष तमाम तमाम आपदाओं से सहज में बच जाता है भगवत शरणागति योग बड़ा सलामती योग है आपको किसी ना किसी
की शरण तो जाना ही पड़ता है हर छोटे को बड़े की शरण जाना पड़ता है छोटे चपरासी से क्लर्क से तहसीलदार से लेकर और तमाम ऑफिसर को किसी ना किसी बड़े ऑफिसर से थोड़ा बहुत इस रास्ता बनाए रखना पड़ता है अब एक दूसरे मनुष्यों की शरण जाओ तो मनुष्यों के सर्भ जो परमात्मा है वो तुम रा आत्मा होकर बैठा है अगर उसकी शरण जाने की कला आ जाए तो तुम्हारे दुख तो दूर हो जाएंगे लेकिन चित चैतन्य के आनंद और करुणा से भर जाएगा गांधी जी के बेटे की तबीयत ठीक नहीं हो रही थी आखिर
पारसी डॉक्टर ने कहा कि अंडा डालकर दूध में पिलाओ बोले शरीर को ठीक करने के लिए हृदय खराब करना आदि भौतिक के फायदे के लिए आध्यात्मिक को बिगाड़ना यह मूर्खता है यह मैं कभी नहीं कर सकता पारसी डॉक्टर चिड़कर चला गया तुम मिट्टी ललाट पर रखो या तो पोते रखो और तुम्हारे बेटे को तुम ही ठीक करो हम जाते हैं पारसी डॉक्टर चला गया गांधी जी ने अपना कंबल बंबल उठाया और जो कुछ प्राकृतिक चिकित्सा जानते थे किया लेकिन तुरंत फायदा तो नहीं हो रहा था गांधी जी चले गए समुद्र किनारे और आर्त भाव से
राम जी को प्रार्थना करने लगे कि लोग कहते हैं कि मणिलाल मेरा बेटा है लेकिन प्रभु वास्तव में मेरा बेटा मणिलाल नहीं सभी तुम्हारी संतान है ये तो शरीर भी तुम्हारा है अन्न तुम्हारा धरती तुम्हारी जल तुम्हारा उससे बना ये तन तुम्हारा इसी तन से गुजरा मणिलाल भी तो तुम्हारा और मणिलाल का जीवात्मा भी तुम्हारा हे राम हे राम अब वो मेरा पुत्र नहीं मैं उसे नहीं संभाल सकता हूं तुम ही उनकी रक्षा करो प्रार्थना करते करते गांधी जी अनजाने में उस मौन अवस्था में पहुंच गए थे जहां हृदय और शब्द एक हो जाते हैं
राम कृष्ण कहते हैं हृदय और हृदय और आपकी प्रार्थना जब एक हो जाती है तो तुम्हारे अंतर आत्म परमात्मा का वहां सिक्का लग जाता है प्रकृति नियम बदलने को तत्पर हो जाती है गांधी जी प्रार्थना करके लौटे उसके पहले तो मणिलाल को थोड़ा पसीना निकला मां से पूछा पिताजी कहां गए और पिताजी को लेने दरिया के किनारे तरफ मणिलाल आया गांधी जी ंक रह गए कई दिनों से बिस्तरे के हवाले बैटा और चल फिर के यहां पहुंचा गांधी जी को लिखना पड़ा कि पानी पीने से प्यास मिटती है भोजन करने से भूख मिटती है लेकिन
हो सकता है कि भोजन से भूख ना मिटे पानी से प्यास ना मिटे लेकिन सच्चे हृदय की प्रार्थना मेरा राम सुनता है और मुसीबत मिटती है अब देखें मिटती है कि नहीं मिटती ऐसा संदेह रहेगा तो फिर कभी नहीं भी मिटे लेकिन संदेह रहित भगवत प्रार्थना करने वाले परश राम ने जो ही प्रार्थना की जैसे चाहू और देखने वाली द्रोपदी ने देखा कि बड़े-बड़े महारथी लकीर के फकीर हुए बैठे हैं और यह अभागा दुरा दुशासन तो मेरे चिर हर के ही रहेगा मेरी साड़ी खींचने को उद्यत हो रहा है द्वारका धीश बस बोली द्वारिका बोली
तब द्वारिका में थे और धीश बोली तो परमेश्वर का वस्त्र अवतार हुआ दुशासन खींचता गया वह बिचारी घूमती गई जैसे एक्सल के आधार पर हब घूमता है पैया घूमता है ऐसे वो घूमती गई वो खींचता गया वो घूमती गई वो खींचता गया खींचता गया वह घूमती गई आखिर हाथियों का बल रखने वाला दुशासन थक गया पसीने से तरबतर हो गया और बकने लगा कि नारी है कि साड़ी है ना नारी है ना साड़ी है वो करुणा वरुणा लय का स्त्र अवतार है परशुराम ने भगवान कृष्ण की मनो मन प्रार्थना की देखते ही मां को पायमा
होकर परशुराम पर प्रहार करें इतने में तो नन्ना मुन्ना एक आकर्षक वामन स्वरूप दिव्य मान तेजोमय बालक परिश्रम के आगे वह ब्राह्मण बालक को देखकर शभ सदाशिव जान गए उठकर खड़े हुए और शिव जी स्तुति करने लगे तो मां उमा चुप कैसे रहे उस बालक के रूप लावण्य ओज तोज को देखकर मां का कोप स्नेह में बदल गया और शिव जी स्तुति करने लगे मां समझ गई कोई साधारण नहीं है यह परशुराम के इष्ट देव इस रूप में प्रकट हुए हैं इष्ट देव ने परशुराम को कहा कि परशुराम निश्चित ही तुमने बड़ी भारी गलती की
है अब इस गलती का दंड तुझे मां दे चाहे तो मां से तू क्षमा करवा दे जैसा तुझे उचित लगे परशुराम ये काल की गति जानी नहीं जाती है तर तीव्र प्रारब्ध की गति जानी नहीं जाती तुम्हारे जैसे बुद्धिमान और गणपति जैसे महान आत्मा के बीच भी ऐसा संघर्ष ये काल बड़ा बलवान है लेकिन से भी ज्यादा बलवान है भगवत कृपा और भगवत प्रार्थना तुम भगवत प्रार्थना करके भगवती को रिझा सकते हो और तुम्हारी आपदा टाल सकते हो तब परशुराम ने प्रार्थना की रक्ष रक्ष जगन माता अपराध रक्ष सम मेव रक्ष रक्ष जगत माता अपराध
में रक्षक में शिशु नाम अपराध न कतो माता ही उप शिशु नाम अपराध है ना कु तो माता ही कु सत रक्ष रक्ष जगन माता अपराध रक्ष स्वम शिशु नाम अपराध ना कुतो माता ही कु सत्य हे जगत जननी रक्षा करो रक्षा करो मेरे अपराध को ना देखो क्षमा कर दो माता कहीं बच्चे के अपराध करने से माता कुपित होती है तब वामन भगवान कहने लगे प्रभु भोलेनाथ और मां जगदंबे तुम तो आज शक्ति हो आपके तो परशुराम भी पुत्र है और गणपति भी पुत्र है मां नन्हा भी बालक तेरा और बड़ा भी बालक तेरा
बड़ी भूल करने वाला बड़ा मूर्ख भी तेरा और नहीं भूल करने वाला नन्हा भी तेरा अब मा तू तो सबकी आधार शक्ति है हे मां कृष्ण की सत्ता भी तू है और जगत जननी भी तू है मां तू प्रसन्न हो प्रसन्न हो और मां का हृदय तो कैसा होता है माताओं से पूछो अथवा मां को पायमा होती है बच्चों पर और थोड़ी देर में कैसी मिठाई खिलाती है वो देखकर समझ जाओ मां तो मां होती है मैंने सुनी है कहानी एक नगर सेठ मर गया अथाह संपत्ति छोड़ गया एकलौता बेटा लोफर के संग में आया
और वैशा के पास जाने लगा कोई वैशा की बुद्धि प्रेरक परमात्मा था एक वैशा के पास गया उसने कहा वैशा को कि तेरा नाम सुना है तू बड़े बड़े सम्राटों से ही मिलती है लेकिन मैं सम्राटों से कम नहीं एक रात के लिए तू मेरे को अपने पास रहने दे वैशा ने देखा कि ये बड़े घर का लड़का है इस गंदे रास्ते आएगा तबाह हो जाएगा उसने कहा मैं नहीं बोले तू जो मांगे मैं दे देता हूं तुझे सुवर्ण दूं अंगूठी दूं चैन दूं मेरे सारे गने गांठे दूं और भी कुछ तो तू मांग ले
वैशा ने ऐसी शर्त रखी कि वह ना दे सके वैशा ने कहा तेरी मां का कलेजा लाकर दे तो मेरे घर में रह सकता है रात भर वह शराब के नशे में दुर्बुद्धि युवक गया मां ऊपर की मंजिल में सोई थी सुनी है मैंने कहानी सत्य समझाने के लिए होती है कहानी छुरा निकाला और मां का कलेजा काटा नशे नशे में चलते चलते गिरा गिरा तो कलेजे से आवाज आई बेटा त झे चोट तो नहीं लगी अरे मां तू तेरी चोट भूल गई और बेटे की चोट तुझे याद आ रही तभी तो तू मां है
10 शिक्षक एक आचार्य स आचार्य एक पिता 100 पिता मिला दो 100 पिता हों का भाव तब एक मां का हृदय बनता है और दुनिया भर की सभी माताए तो तेरा ही स्वरूप है मां त परशुराम को क्षमा नहीं कर पा पाएगी क्या मां कहती क्षमा तो मैंने कर ही दी कृष्ण परशुराम को मैं आशीर्वाद देती हूं बेटा तेरा परशु अजय होगा तेरा यश धरती पर फैला रहेगा और गणपति और तुम्हारे बीच स्नेह रहेगा हे परशुराम तुम जुग जुग जियो रेणु का पुत्र तुम्हारा मंगल हो अपने बेटे गणपति देव का दांत तोड़ने वाले परशुराम को
वरदान देने वाली जगदंबा की जय हो अंबे मात की जय कैसे हैं भारत के देव कैसी है यह भारतीय संस्कृति कैसी उदार संस्कृति कैसी है परस्पर देवो भव की संस्कृति और भगवान को प्रकट करने वाली संस्कृति कर्मों की गति बड़ी गहन है कर्म का फल भोगना पड़ता है एक ही उपाय है कि कर्म तो करें लेकिन करने की सत्ता जिस सर्वेश्वर से आती है उसकी प्रीति अर्थ कर्म करें तो आपका कर्म ष कर्म सिद्धि हो जाएगा निष्काम कर्म योग हो जाएगा फिर कर्म बंधन आपको बांधे नहीं शुभ तो उसके चरणों में जब शुभ वो स्वीकार
कर लेगा तो अशुभ कर्म में आपको दंड भोगने के लिए क्यों भेजेगा ऐसा कोई लक्षाधिपथी कि जिसकी पत्नी फटे चित्रे पहनकर फुटपाथ पर भीख मांगे वह चुप रहेगा किसी करोड़ा िप का बेटा फटे चित्रे पहनकर भीख मांगे तो इज्जत सेठ की जाएगी ऐसे तुम ईश्वर के होकर शुभ कर्म ईश्वर को अर्पित करते हो तो कहीं छोटा मोटा गलत हो भी गया तो व करोड़पति हों के बाप का बाप तुम्हें क्षमा करके अपनी देवी संपदा देकर अपनी प्रार्थना देकर पवित्र भाव देकर तुम्हारे हृदय में रस भर दे तो एक होता है स्मार्त कर्म दूसरे होते भगवती
कर्म स्मार्थ कर्म यह है कि एक देवे दस पावे तीर्थ में जाकर करे तो और ज्यादा कोई ग्रहण है चंद्र ग्रहण है सूर्य ग्रहण है कोई अच्छा और शुभ है तो 10 का स गुना फल भी होता है स्मार्थ कर्म से भी भगवत कर्म बहुत बहुत ज्यादा हितकारी कैसे हम समझे एक राजा मंदिर की सीढ़ियां चढ़ रहा है मालि ने कहा अाता बाप जी गनी थम्मा राजा ने हार ले लिया चार सीढ़ियां चढ़ा दूसरी माले ने कहा अन् आता बाप जी हार चढ़ा राजा ने हार ले ली दोनों भगवान के चरणों में धरकर राजा ने
एक टक प्रभु को देखा प्रणाम किया लौटते समय मंत्री को बोला पैसे मालिन ने सोचा कि हार तो है चार आने का लेकिन पांच रुपए मांग लू दे देंगे मालिन ने कहा पाच रुप दे दे दिया दूसरी मालिन से पूछा उसने बोला अन दता पिया मैं पिया की कर लिया अन दता थे तो हमारा माय बाप हो रा हार स्वीकार की दो के मने आनंद म तो य प्रार्थना कर रोज नु जीी वो अंता खममा पधारो रोज मो हार लियो कितना भी राजा ने कहा लेकिन मालिन ने नहीं लिया राजा ने इस वक्त तो कुछ
नहीं दिया मालिन की सेवा स्वीकार कर ली लेकिन सेवा स्वीकार कर ली किसने राजा ने मंत्री को कहा कि इसका एड्रेस खोद लो इसके बेटे को राज्य की कोई खास नौकरी पर रख दो और इसके पास जमीन कितनी जांच कर लो 101 एकड़ से जमीन दे दो अब राजा उसके फूलों की कीमत चार आने के बदले पाच रुपया नहीं चुका है अपनी और से देता है ऐसे जो आप कर्म करते हो मां की सेवा करो री मां है मैं बेटा हूं सेवा करूंगा तो मेरे को वारसा मिलेगा त विकर्म बना दिया गरीब गुरब की सेवा
किया जरा दिखावे के लिए विकर्म बना दिया बंधन बना दिया कुछ कर्म किया सेवा का मेरा नाम हो वाहवाही हो गड़बड़ कर दी कर्म तो किया लेकिन वाहवाही हो चाहे गालियां पड़े ईश्वर मेरा खुश हो तो आपने कर्म को अकर्म बना दिया और आपके कर्म को भगवान ने स्वीकार कर लिया और भगवान जब देगा तो राजा से भी अनंत गुना देगा राजा तो पाच 25 एकड़ जमीन दे दिया छोरे को नौकरी दे दिया लेकिन वो राजाओं का राजा तो अपने आप को दे डालता है अपने आप को प्रगत कर देता है तुम्हारे हृदय में यह
होता है भगवती कर्म तो आज का यह श्लोक हमें कर्म करते समय कर्म बंधन बढ़ाने के लिए कर्म ना हो अपी तु कर्म से कर्म काटने की कला सीखें कर्म बंधन नहीं कर्म काटने की कला ये गीता सिखाती है भगवान अर्जुन को कहते हैं के मया आसक्त मना पार्थ योगम यंजन मदा श्रय असस संशयम समग्र माम यथा ज ससी तत् मेरे में मन आसक्त है जिसका भगवान में आसक्त होने का एक सुंदर उपाय अगर भगवान में आसक्त नहीं होंगे तो भोग में आसक्त होंगे देह में आसक्त होंगे परिस्थितियों में आसक्त होंगे और परेशानी के सिवा
और क्या मिलता है ईश्वर में आसक्ति नहीं होगी शाश्वत में आसक्ति नहीं होगी तो नश्वर में होगी और नश्वर की आसक्ति बारम बार नाश के तरफ धके लेगी फिर जन्म लो और फिर नाश हो जाओ फिर जन्मो और फिर मरो फिर जन्मो और फिर मरो ऐसे करते करते सदियां बीत गई भगवान बुद्ध कहा करते थे हे भिक्षु को यह जो पहाड़ दिख रहा है तुम्हारे कई जन्मों के अस्थियां कट्ठी करें तो इस पहाड़ को नन्ना कर दे इतने तुमने जन्म लिए और यह जो सरोवर लहरा रहा है तुम हर जन्मों में रोए हो और उन
आंसुओं को एकत्रित करें तो यह सरोवर छोटा देखेगा अब तुम चेत जाओ सावधान हो जाओ भगवान कहते हैं मया सक्त मना पार्थ योगम यंजन मदा श्रय असं शयम समग्र माम यथा ज ससी तत्स हे पृथु नंदन मुझ में आसक्त मन वाला मेरे आशित होकर योग का अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्र रूप को नि संदेह जैसा जानेगा उसको सुन भगवान के समग्र स्वरूप को जानने के बाद आपका समग्र व्यवहार भगवत मय हो जाएगा आपकी निगाह साकार निराकार और उनसे विलक्षण सभी में परमात्मा को देखोगे जैसे सोने को जान लिया तो गहने को देखते भी सोने
को देख रहे हैं और सोने को देखते हुए भी सोने को देखते और सोने को एक गोल लगड़ी जैसा बना दो या कुछ सिक्का बना दो तभी भी आप सोने को जानते हैं ऐसे भगवान के समग्र स्वरूप को जानने वाले के लिए साकार निराकार का भेद नहीं रहता और दूरी नहीं रहती जो सदा है वह अभी है जो सब में है वह मुझ में भी है जो सर्वत्र है वह यहां भी है उसके लिए दिल ने तस्वीरें हैं यार जबक गर्दन झुका ली मुलाकात कर ली यह तो योग अभ्यासी के लिए है ज्ञानी के लिए
तो खुल ली आंख परमेश्वर का दर्शन खुली आंख अपने सच्चिदानंद स्वरूप का दीदार हो जाता है फिर घोर युद्ध जैसे घोर कर्म करते समय भी अर्जुन को भगवत तत्व की विस्मृति नहीं होती तो भगवान में आसक्ति हो जाए भगवान में आसक्ति के बिना जगत की आसक्ति मिटेगी नहीं और जगत की आसक्ति मिटे बिना दुखों का अंत नहीं होता दुखों का रूपांतर हो जाता है अंत नहीं होता जैसे कटियारा बोझा से दुखी होकर गर्दन की पीड़ा सहते हुए वह काठी के बोजे को दाए कंधे पर लिया बोलता है हास आराम हुआ फिर दाया कंधा थक्का तो
उठाकर बाए कंधे पर किसी ने रखवा दिया बोले हास आराम हुआ फिर बेच दिया हास पैसे मिले बोले हास आराम हु सामान खरीदा घर लाया खाया पिया पेट प हाथ घुमा के बोलता है हास अब सुख मिला लेकिन दूसरी सुभ होती है वही कुड़ी और वही रस्सी और वही फिर हास चालू दुख ने रूप रूप बदले बाकी दुख मिटा नहीं ऐसे ही पढ़ने पास हो जाए हा आठवी हो गए नौमी हो ग हास ऐसे करते करते ग्रेजुएशन हो गया हास फिर बोलते अब हो जाए शादी हो ग बोले हास सुख से शादी विवाह हो गया
हास तो हास टिक गई नहीं अब नौकरी प्रमोशन हो जाए फिर बच्चे हो जाए अंत में बच्चे पढ़े लिखे सेट हो जाए अब सेट हो गए और बुढ़ापे ने अपना मुंह देखा अब चाचा बोलता है क्या अरे मर गए इससे तो बस संसार में कोई सुख नहीं मर जाए तो सुखी हो जाऊ लेकिन बड़े भैया मरने के बाद भी सुख का शाश्वत कोई गारंटी नहीं मरो मरो सबको कहे मरना न जाने कोई एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना ना होई और ऐसे मरने की कला है कि भगवान में प्रीति हो जाए भगवान में आसक्ति
हो जाए भगवान में प्रीति भगवान में आसक्ति तो जब भगवान में अपनापन होगा तो आसक्ति प्रीति होगी और जहां प्रीति होती वहा स्मृति होने लगती है हम लोग आश्रय संसार का लेते हैं प्रीति संसार की करते और उपयोग भगवान का करते मंदिर में जाते तुमे व माता च पिता तुमे व फिर उधर देखते हैं जूते चप्पल की और तुम व बंधु च सखा तुमे व उन्हीं का आश्रय ले फिर भगवान के तरफ तुमहे विद्या द्रविणं तोम फिर बच्चों तरफ तमेव सर्वम मम देव देवा तो आसक्ति परिवार की प्रीति परिवार की या प्रॉब्लम सॉल्व करने की
होती तो मंदिर में होते हुए भी हम संसार में है लेकिन तुम संसार में होते हुए भी मंदिर में पहुंच सकते हो अगर भगवान में प्रीति हो जाए भगवान में प्रीति हुए बिना प्रॉब्लम का अंत नहीं होता हां रूपांतर होता है अंत नहीं होता अभी कोई दुख अभी कोई मुसीबत आई थोड़ा रूपांतर हुआ हटी लेकिन फिर बड़े में बड़ा मृत्यु का भय तो सबके सिर पर नाच रहा है और मरे तो फिर जन्म जन्म दुखम जरा दुखम जाय दुखम पुनः पुनः अंत काले महा दुखम त स्मात जाग रही जाग रही जाग रही ऋषि कहते हैं
कि जन्म के दुख का ख्याल करो मां के गर्भ में ये तुम्हारे माता-पिता के रजवीर का लिक्विड जब शरीर के रूप में रूपांतरित होता है तो गर्भा अगनि उसे नौन मने उस प्रोसेस में पकाती है जैसे बाहर हमारी कोई चमड़ी उतार दे तो जो पीड़ा होती वैसी पीड़ा जन्म लेते समय शिशु को होती है लेकिन बेचारा बोल नहीं पाता रुदन करता या तो चित सा हो जाता है गंदगी के साथ जन्म लेता है मकोड़े कीड़ी मच्छर को भगा नहीं सकता पेट की पीड़ा बता नहीं सकता दांत आते पीड़ा सहता है फिर थोड़ा बड़ा हुआ कभी
कीड़ी ने मकोड़े ने कटा कभी कुछ हुआ कभी कुछ हुआ ऐसे करते करते पढ़ने गया कभी न पास हुआ तो दुख है पड़ा हुआ या भूल गया तो दुख है ऐसे दुख तो जरा सा सुख का हर्ष का जरा सतरंग आता है बाकी तो दुख ही दुख इसलिए संसार को शास्त्रों ने कहा दुखा लया अशा स्वत दुखाल शाश्वत नहीं और दुखा लय है मजे की बात है कि नश्वर शरीर चंचल मन का सदुपयोग करे तो शाश्वत सुख स्वरूप को परमात्मा को पा सकता है और उनके बाहो में बहे तो मनुष्य योनि से भी नीच घोड़े
गधे और आथ भेड़ पौधों की योनि में क्रिकेट आदि की योनि में नृग राजा जैसों को भटकना पड़ा संसार की आसक्ति बड़े-बड़े राजाओं को कीड़े मकोणों की योनि में धकेल देती है क्रिकट आदि की योनि में धकेल देती और परमात्मा की आसक्ति जीवात्मा को परमात्मा मय बना देती है भगवान को पाने की इच्छा मात्र से मन में सद्गुण आने लगते और संसार के मजे लेने की इच्छा मात्र से मन में कपट बेईमानी सुकरान शुरू हो जाती संसार मिलेगा तो पूरा नहीं मिलेगा अरे जो उदयपुर भी एक व्यक्ति को पूरा नहीं मिल सकता उदयपुर की एक
कॉलोनी का भी एक व्यक्ति एक लते मोहले का भी एक व्यक्ति मालिक आज के इनकम टैक्स के जमाने में नहीं हो सकता लेकिन परमात्मा मिलते तो पूरे मिलते हैं संसार मिलता है तो जरा सा मिलता और संभाल संभाल के मर जाओ छूट जाता है लेकिन भगवान मिलते तो पूरे मिलते और फिर संभालने की मुसीबत नहीं छूटने का भय नहीं ऐसे भगवान के लिए नानक जी कहते हैं पूरा प्रभु [प्रशंसा] आराध पूरा प्रभु आराध पूरा जा का नाम नानक पूरा पाइए पूरे के गुण गाए पूरा प्रभु आराध पूरा जा का नाव नानक पूरा पाइए पूरे के
गुण का अब शब्द तो जरा सा है राम लेकिन वो पूरे प्रभु का है रोम रोम में रम रहा है अखिल ब्रह्मांड में रम रहा है वह चैतन्य राम कांटा निकलता है लोहे से लोहा कटता है हीरे से हीरा कटता है ऐसे ही आसक्ति से आसक्ति मिटती है संसार की आसक्ति मिटाने के लिए भगवान में आसक्ति हो जाए इसलिए भगवान को अपना मानो और बार-बार उसका जप करो जप के थ उसका पूजन करते जाओ तो जप का प्रभाव द गुना हो जाएगा अगर बाह्य पूजन करते हो तो जप का प्रभाव 10 गुना और मानसिक पूजन
और ध्यान करते हो तो जप का प्रभाव स गुना हो जाता है और अंतर का रस प्रकट होने लगता है परमात्मा मिलते हैं तो पूरे मिलते हैं और उन्हें संभालने की इच्छा मेहनत मजूरी नहीं होती संसार मिलता है तो तनिक मिलता और संभवा बलवा के हमको खपा देता है भगवान को पाने की इच्छा से सद्गुण उभरने लगते और संसार की वस्तुएं पाने की इच्छा मात्रा से दुर्गुण उ भने लगते संसार को याद करते करते मर गए तो दुर्गति हो जाएगी और भगवान को पाने की इच्छा इच्छा से मर भी गए तो भगवान के धाम में
जाने का शुभ अवसर आ जाएगा और भगवान को पाना य वास्तविक में पाना है संसार को पाना भ्रांति मात्र है एक होती है प्राप्ति और एक होती है प्रतीति तो संसार की प्राप्ति नहीं होती संसार की होती है प्रतीति कि मेरे को मकान मिल गया मेरे को गाड़ी मिल गई मेरे को बेटा बेटी पत्नी गहने गांठे मिल गए ये हमारा हमारा हमारा हमारा करके सब छोड़ के जिस शरीर को बोलते मैं वो भी छोड़ के जाना पड़ता है तो जैसे स्वप्ने में प्रतीति होती है कि घर मेरा है यह दुकान मेरी है ये गाड़ी मेरी
है ये गहने गांठे मेरे हैं बेटे बेटियां मेरे हैं फलाने मेरे हैं प्रतीत हो रहा है मेरा है मेरा है लेकिन आंख खुली तो सब छू ऐसे यहां आंख बंद हुई तो सब छू भगवान शभ सदाशिव कहते हैं उमा कह मैं अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब सपना नानक जी कहते हैं जैसे जल से बुलबुला उपजे बिन से नीत जग रचना तैसी रची जान ले रे मीत जैसा स्वपना रन का तैसा यह संसार राजा स्वप्न देख रहा था बड़ी प्रसन्नता में था घर में कुछ गड़बड़ हुई और नौकर भागता आया मंत्री को बुलाकर ले
गया और मंत्री ने देखा कि लड़का तो गया हाथों से आंख की पुतलियां चढ़ गई ठंडा हो गया वैद राज ने घोषणा कर दी के व कुवर मर गया मंत्री भगा हुआ आया राजा जहा आराम कर रहे थे राजा को बोला राजन राजन राजन राजा चौके बोले क्या है रे क्यों परे [संगीत] क्या मैं तो इंद्र बना बैठा था और चर डला रही थी ललना पागल क कि मेरा राज छीन लिया बोले राजा साहब आप सपना देख रहे थे मैं खबर ले आया हूं आपका कुंवर मर गया बोले वह स्वपना था तो यह भी तेरे
बाप का स्वपना ही है यह सच्चा कैसे है जय राम जी की वो स्वपना था तो यह भी स्वपना है चलो इसकी विधि विधान करें लेकिन है स्वपना तेरा बचपन स्वपना हो गया मेरा बचपन स्वपना हो गया बचपन के सुख भी स्वपने हो गए दुख भी स्वपने हो गए बचपन के मित्र भी स्वपने हो गए और न मुने याद शत्रु भी स्वपना हो गया जवानी के दिन भी स्वप्ना हो गया अब तेरी मेरी उम्र हो गई है यह भी तो स्वपना है ऐसे ही इंद्र बना था यह भी स्वपना है और बेटा मर गया यह
भी स्वपना है यह सारा जगत स्वपना है ऐसा सोचकर भगवान ही अपने है जो करोगे तो भगवान में प्रीति हो जाएगी आसक्ति हो जाएगी और दुख सुख का आकर्षण नहीं रहेगा यह भगवान ज्ञान सहित विज्ञान कहेंगे ज्ञान सहित विज्ञान जिसको भगवान का मिल गया उससे फिर भगवान दूर नहीं वो भगवान से दूर नहीं भगवत प्राप्ति के लिए भगवान को मेरा मानना और अपने को भगवान का जानने का दूसरा है य भगवान कण कण में क्षण क्षण में स्वास शवास में सत्ता स्फूर्ति में उसी की सत्ता है जो कुछ है स्थूल सूक्ष्म कारण वह भगवान की
माया मात्र है भगवान की लीला मात्र है भगवान का विवर्त मात्र है ऐसा समझे जैसे गंगा के तरंग भी जल है बुलबुले भी जल है फैन और झाग भी जल है ऐसे ही सब कुछ भगवत मय है ऐसा सोचना भी भगवान को अथवा तो जहां जहां नजर पड़े पक्षी की लोल कर रहे तो उसमें चेतना मेरे प्रभु की है ऋषियों की क्या पहनी दृष्टि है क्या सूक्ष्म ब्रह्म वेता हों ने हमारे उपासना के लिए उपाय कोज चार पैर वाले प्राणी का नाम रख दिया भगवान का नाम पशु पश्च पशु जो इंद्रियों के द्वारा देख रहा
है अंतर में जो तुम्हारे मन को देखता है तुम्हारी इंद्रियों को जानता है आंख ठीक देख रही कि नहीं देख रही उसको मन देखता है मन हमारा शांत है कि अशांत है उसको मति निर्णय करती और मति ठीक निर्णय करती कि नहीं उसको हमारा वह परमात्मा देख रहा है तो इंद्रियों को देखने की सत्ता मन को संकल्प विकल्प की सत्ता बुद्धि को निर्णय करने की सत्ता और ये ठीक कर रहे कि नहीं उस सबको वो देख रहा है पश्यंति पशु जो सबको सत्ता स्फूर्ति देख दे रहा है और देख रहा है उस परमेश्वर का एक
नाम पशु है चार पैर वाले प्राणियों का नाम पशु रखकर ऋषियों ने अनुग्रह कर दिया कि उन पशु को देखते याद आ जाए कि वह परमात्मा का नाम है जय राम जी की पसंती ति पशु पक्षी भगवान का नाम है जो अपने भक्त का पक्ष ले उसे पक्षी कहते हैं दो पंख वाले प्राणियों का नाम ऋषियों ने रख दिया पक्षी पक्षी दिखे तभी परमात्मा की याद आए पशु दिखे तो परमात्मा की याद आए किल होल करता नन्ना मुन्ना मधुर हास्य छटा करता है तो उसके चैतन्य स्वरूप परमेश्वर की याद आ जाए तो इस प्रकार जहां
त भगवत याद आ जाए तो भगवान में आसक्ति हो जाएगी योग तो बहुत लोग करते हैं लेकिन भगवान के लिए योग करें रिद्धि सिद्धि पाने के लिए योग करे स्वास्थ्य के लिए योग करें दुख मिटाने के लिए संसार की कुछ उपलब्धि के लिए योग करें ऐसे योग तो कई करते हैं लेकिन मया सक्त मना पार्थ योगम जंजन मदा शया मुझ में आसक्त मन वाला मेरे आश्रित होकर योग अभ्यास करें फिर भक्ति योग का अभ्यास करे ध्यान योग का अभ्यास करें कर्म योग का अभ्यास करें लय योग का अभ्यास करे नादानुसंधान योग का अभ्यास करे लेकिन
करे भगवान के लिए वास अगर भगवान के लिए किया जाए तो युद्ध भी एक प्रकार का कर्म योग हो गया अर्जुन का लंका में जा सेवा योग हो गया हनुमान का भगवान के लिए करूं रोज सुबह उठो के प्रभु तेरी सत्ता मिलती है हृदय धड़कता है तेरा ही ज्ञान मिलता है मन बुद्धि को सत्ता मिलती है यह पृथ्वी तेरी है जल भी तेरा है बादल तेरे सूरज तेरे तो जो अनाज होता है वह भी तेरा है हमारी मैं मैं एक कल्पना मात्र है बाकी य सब कुछ तेरा है तो अन्न तेरा है तो अन्न से
जो तन बनता है वह भी तेरा है अन्न खाते उसके तीन भाग हो जाते हैं स्थूल भाग रोज शरीर से विदाय करना पड़ता दुनिया तुम्हारे किसी दुश्मन ने नहीं बनाई है पक्का कर लो दुनिया किसी आपके शत्रु ने नहीं बनाई दुनिया किसी भूत प्रेत भरने नहीं बनाई दुनिया तो आपके परम हितेश ने बनाई जो प्राणी मात्र का सुहृद आपको कैसे कहां से ले ला के कष्ट या अनुक देखकर कैसे ऊपर उठाता है एक शिकारी था विरला विरला नाम था भील विरला भटका भटका भटका लेकिन शिकार नहीं मिल रहा है सोच रहा है कि क्या मेरा
पाप है भगवान क्या मेरे को भूखा मारेंगे भूखा मारकर भी तुझे कहां ले जाना चाहता है मूर्ख तुझे पता नहीं भटकते भटकते भटकते मध्य मध्यान का भटकता भटकता संध्या हो गई अंधेरी रात हो गई कुछ ला नहीं उस समय तो लगता है कि बुरा हुआ हाय रे बुरा हुआ लेकिन उस बुराई के पीछे कितना वह तेरा परम मंगलकारी मंगल करता है तुझे पता नहीं भटकते भटकते भूख और प्यास ने सताया एक साधु की झोपड़ी दिखी और छोटा सा शिवालय पानी पीने के बहाने कहे समझो लेकिन उस शिवालय के पास रहना पड़ा रात भर उस साधु
की हरि कथा शिव कथा सुनी और उस अपराध वृति वाले शिकारी का जब मृत्यु हुआ तो यमराज ने कहा कि अनजाने में शिवरात्रि जागरण संत दर्शन और भगवत कथा सुनी है अब यह विरला राजा वीरसेन बनेगा राजा वीरसेन को लगा के एक रात्रि शिवजी के लिए जागरण हुआ वो भी भूख प्यास मजबूरी का नाम महात्मा गांधी तो मुझे वरले उस हिरण के मास की खोज वाले खरगोश के मास की और प्राणियों के मांस की खोज वाले को अनजाने में संत का और शिव जी की कथा का आश्रय मिला तो मैं वीरसेन हुआ अगले जन्म की
स्मृति आई भगवान शिव का बड़ा वीरसेन राजा भक्त हुआ पूरे राज्य में शिव मंदिर और शिव पूजा की महिमा कर और जीवन भर शिव चिंतन स्मरण में राज्य काज में गया मरने के बाद वोह शिव जी का गण होकर वहां सूक्ष्म रूप में रहने लगा दक्ष प्रजापति ने गड़बड़ी की और नारद जी घूमते घाम आए शिवजी से पूछा कि मां पार्वती नहीं दिखाई दे रही बोले वो अपने दक्ष पिता के यज्ञ में गई है नारद जी बोलते प्रभु ऐसा ना कहो यज्ञ में गई है वर्तमान के वचन मत बोलो यज्ञ में गई थी शिव जी
बोलते क्या मतलब गई थी क्या आई तो नहीं है गई गई थी नहीं गई है बोले नहीं प्रभु गई थी और आप कहा अपमान करने के लिए यज्ञ का आयोजन था किसी को नीचा दिखाने के लिए शुभ कर्म भी अशुभ फल देता है मां पार्वती दुखी होकर योगा अग्नि प्रकट करके अपने देह का अंत लाया अब नए शरे से व प्रकट होगी जन्म लेगी और दक्षण ऐसी स लुचाई की शिव जी को उपाय मान हुए और अपनी जटा से एक बाल नोचा और राजा वीर सेन जो हो सूक्ष्म रूप शिव लोक में रहता था उसको
संकल्प करके उसको प्रकट कर दिया और जरा युद्ध राजा बने थे शिकारी थे तभी भी मारपीट में कुशल थे राजा बने तभी भी युद्ध में कुशल थे तो अब जाओ वीरभद्र जरा देखो दक्ष के यज्ञ को वही वीरभद्र अभी भी पूजा जा रहा है कहां तो एक भील और कहां परमात्मा की करुणा कृपा उसके वीरभद्र होकर पूजवा की योग्यता लाती ऐसे ही मनुष्यों का कहां तो एक र माता के शरीर से पसार होने वाला साधारण जीव ऐसे जीव कई नाली में बह जाते हैं और वह फिर मां के गर्भ में आया और फिर रहा फिर
संस्कार मिले और कहीं कोई भक्त बना कोई सेठ बना कोई सावकार बना कोई इधर का उधर का ज्ञाता बना ये कितनी उसकी सुंदर व्यवस्था है जोज उसकी व्यवस्था और उसकी लीला को विचारो होगे तो उसमें प्रीति होने लगेगी प्रीति जोर पकड़े गी आसक्ति हो जाएगी मया सक्त मना पार्थ योगम यंजन मदा श्रय असं शयम समग्र माम यथा ज्ञा ससी तत् भगवान का आश्रय और भगवान की प्रीति हम क्या है मंदिर में जाते हैं ऑफिस में जाते हैं तो आश्रय तो नौकरी का लेते हैं लेकिन प्रीति होती है पगार में जय राम जी आश्रय सरकारी नौकरी
का लेते आश्रय दुकान का लेते आश्रय किसी का लेते लेकिन प्रीति किसी में होती है लेकिन यहां भगवान का ही आश्रय और प्रीति भी भगवान में तो काम बन जाए भगवान का आश्रय ना ले तो महाराज नश्वर का आश्रय लेना पड़ेगा और नश्वर का आश्रय ले लेकर नाश को ही प्राप्त हुए हैं हर जन्म में कुछ बने कुछ जाना सीखा अंत में मृत्यु के झटके ने नाश कर दिया ऐसे कई जन्मों का जो कुछ पाया था वो नाश हो गया तो इस जन्म का भी ऐसा ही होने वाला है बुरा मत मानियो आज तक तुमने
जो जाना है दुनिया भी आज तक जो तुमने पाया है आज तक जो सीखा है और आज के बाद जो जानोगे पाओगे सीखो मृत्यु के एक झटके में क्या होगा नाश हो जाएगा कि नहीं होगा आज तक जो शरीर को संवारा संभाला है मृत्यु के एक झटके में नाश हो जाएगा कि नहीं होगा पढ़ी पढ़ी पढी पढ़ी जग पढ़ो लिखी लिखी लिखी क्या की न तुलसी हृदय रघुवीर न चीना तो रथा जन्म दिन पढ़ पढ़ के सब जग पढ़ लिया लिख लिख के आखिर क्या किया बुढ़ापा आता है अ स्मृति हो जाती है पढ़ा हुआ
भूल जाते हैं जोरों का बुखार आ जाए तो बुद्धि का ज्ञान जरा दब जाता है नहीं तो मृत्यु का झटका आता है तो सब छू हो जाता है लेकिन भगवान में प्रीति किया आसक्ति किया लेकिन 100 पर 100 ट नहीं हुई 50 ट भी नहीं हुई थोड़ी प्रीति हुई और मृत्यु ने झटका मारा आपका शरीर मर गया शरीर मर गया लेकिन भगवान का जो भजन किया भगवान में जो प्रीति की वह प्रीति मौत का बाप भी नहीं मिटा सकता है आपने हमने सुना होगा कि रहि दस अगले जन्म के एक साधक थे बचपन से ही
भगवान का भजन करते थे संत तुलसीदास उनका दर्शन करने गए वर्ष के रहि दस का मीरा को गुरु मंत्र दिया रहि दस ने और मीरा ने श्रद्धा भक्ति से रटा और भजन किया मेवाड़ को झुमा और अभी भी नारी जाति को प्रोत्साहन मिल रहा है मीरा की गाथाओं और कथाओं से मीरा के नाम से गायक लोग रोकड़ी कर लेते हैं 50 प 100 स रुप की टिकट लागी लगन वो तो महलों में पली बनकर जोगन चली बनकर जोगन चली करके लोग को रोकड़ी कर लेते तो रही दस ने दिया हुआ मंत्र रहि दस अगले जन्म
रामानंद स्वामी के शिष्य थे किसी कारण गलती हो गई गुरु ने श्राप दे दिया कि मुझे चमार के घर का अशुद्ध अन्न खिलाया मन भगवान में नहीं लगता तुझे एक योनि दंड के रूप में चमार के घर जाना पड़ेगा वही साधक मरने के बाद रघु चमार के घर जन्मा मृत्यु ने उसका शरीर तो छीन लिया लेकिन की हुई भक्ति प्रीति मृत्यु का बाप भी नहीं छीन सका और बचपन में ही वह भक्ति जागृत हो गई अष्टावक्र और जनक अगले जन्म में गुरु के शिष्य थे अभ्यास करते थे त्रुटि रहने के कारण जनक को तो राज्य
मिला लेकिन वह भगवत प्राप्ति की प्यास मनी रही और अष्टावक्र को मां के गर्भ मेंही भगवत तत्व का ज्ञान साक्षात्कार हो गया जैसे कोई बीज बोया है आज नहीं तो कल परसों वो फूट निकलता है ऐसे ही जनक के संस्कार थे अष्टावक्र गुरु मिले और जरा सा स्विच न किया फिटिंग थी लाइट का कनेक्शन था जरा सा स्विच न कि ऐसे अष्टावक्र के निमित्त मात्र उपदेश से जनक को राज्य में साक्षात्कार हो गया अगले जन्म का योगी हमने सुना अगले जन्म के भक्त हमने सुने लेकिन अगले जन्म का डॉक्टर मैंने आज तक कहीं देखा सुना
नहीं डॉक्टर होना है तो फिर से ए बी सीडी पढ़ो और एमबीबीएस बनो वकील बनना है तो फिर से क ख ग ए बीबी सीडी लिखो और पढ़ो और फिर वकील बनो सनत लाओ लेकिन भगवान की भक्ति तुमने जितनी की और जहां छोड़ी है वहां से फिर तुम्हारी यात्रा शुरू हो जाती है भगवान में प्रीति एक बार हो जाए तो उसको मौत का बाप विमय नहीं तोड़ सकता क्योंकि भगवान शाश्वत हैं अमर हैं तो उनकी प्रीति थोड़ी भी हो जाए तो मौत उस प्रीति को मार नहीं सकता है देखा होगा कि एकही कुटुंब में एकही
मां के दो पूत हैं एक को तो बैठा पढ़ाती समझाती फिर भी भगवान में नहीं लगता और दूसरे को कुछ भी नहीं कहती बेटा खाना खा ले बोले नहीं मां अभी मेरी पूजा बाकी है धव पा साल के थे और कृष्ण की पूजा करते मां बोलती बेटा कलेवर कर लो बोले मां भी पूजा बाकी और दूसरे बैल जैसे चोरे होते थे उनके मां-बाप बोलते देख ये पा साल का ध्यान भजन करता तू कर बोले मैं तो नहीं करता तो धव के अगले जन्म की भगवत भक्ति थी आपकी अगले जन्म की होगी तो अभी आगे बढ़ो
कुछ बढ़े हुए अपने को पाओगे अगर अभी की भी है तभी भी यात्रा पूरी हो जाए तो परमात्मा की प्राप्ति और यात्रा अधूरी रह गई तो परमात्मा के लोकों के दिव्य लोकों के भोगों की प्राप्ति यज्ञ याग करके स्वर्ग में प्रा जाता है और वह पुण्य नष्ट करके भोग भोगता है लेकिन भगवान का भक्त अगर अधूरी साधना रह जाती है तो दिव्य लोकों के भोग उसको मुफत में मिलते हैं फिर से जहां साधना छूटी है वहां से उसकी शुरू हो जाती है ये गणेश चतुर्थी का उत्सव और गणपति का पूजन महाराष्ट्र में मनाया जाता है
राजपुताना प्रांत में और महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का खूब धूमधाम से उत्सव होता है गणेश चतुर्थी और भादरवा सुद्ध चौथ इन दोनों का अलग-अलग उपयोग है भादरवा सुद्ध चौथ कैसे बनी कि कथा कहती है कि एक बार नारद जी घूमते घाम शिवलोक में गए नारद जी के पास दिव्य फल था देवयोग से ब्रह्मा जी भी वहां बैठे थे नारद जी ने वह फल शिव जी के आगे धरा तो गणपति जी और कार्तिक दोनों वत्स बैठे थे एक फल था और बड़ा सुंदर सुहावना अलौकिक आकर्षक फल था हंसते हंसते शिव जी ने पूछा ब्रह्मा जी से
कि ब्रह्मण यह एक फल किसे दूं ब्रह्मा जी ने कहा कि गणेश जी छोटे हैं तो नियति तो यह कहती है कि उन्हीं के हिस्से दे दो शिव जी ने गणेश को थमा दिया गणेश को सूझी लीला करने की ब्रह्मा जी सृष्टि करने का जब संकल्प करके अपने ब्रह्मपुरी में बैठे तो गणेश जी विचित्र रूप बनाकर खड़े हो गए तो ब्रह्मा जी थोड़े चकित से हुए ब्रह्मा जी चकित हुए गणपति मंद मंद मुस्कराए और गणपति की लीला देखकर ब्रह्मा जी चकित चकित से हुए थोड़े कांपे भी और कहां से भी इन दोनों का हास्य विलास
रूप लावण और सौंदर्य के अहंकार से भरे हुए चंद्रमा ने देखा और चंद्रमा ने खिल्ली उड़ाई गणपति की ब्रह्मा जी तो गणपति के मूल चैतन्य स्वभाव को जानकर प्रेम पूर्वक हंसे थे विनोद पूर्वक प्रेम पूर्वक वो गणपति को देखकर चंद्रमा अहंकार से भरकर हंसे थे अहंकार से किसी को कोई चीज देते हो तभी भी उसमें मजा नहीं आता और प्रेम से अगर गाली भी देते हो ना उसमें भी रस आता है जय राम जी की शादियों में क्या होता है प्रेम से गालिया तो मिलती और क्या होता है दुल्हा की मां को गालियां देते फिर
भी जाती वसा ारे दुश्मन जी दवा वणन सजन ज गार थ आए सब ख्याल जो चरखो जगत दिलदार जी मूरत दुश्मन की दु दुर्जन की दुश्मन की मिठाई भी कड़वी लगती और सज्जन की गालियां भी मीठी लगती है क्योंकि अपना त्व है तो ब्रह्मा जी हंसे तो अपना तो भाव से हंसे और चंद्र हंसे तो और भाव से हसे तो भगवान गणपति ने चंद्र को श्राप दे दिया कि तुझे सौंदर्य का अहम है तू हमारी खिल्ली उड़ाता है तेरे को कोई देखेगा नहीं तू मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगा चंद्रमा श्रापित होकर मलिन होकर बड़े
दुखी हुए फिर उपाय पूछा देवताओं को भेजकर क्या किया जाए तो भगवान गणपति के स्तोत्र का पाठ करके गणपति जी का क्रोध शांत और तुम्हारे प्रति उनकी अमी दृष्टि हो ऐसी विधि बताई देवताओ ने और इस विधि के अनुसार गणपति जी को प्रसन्न करके चंद्र ने क्षमा याचना की तब चंद्र को गणपति जी ने कहा कि और दिनों में तो तेरी कला बढ़ेगी लेकिन फिर घटेगी और चौथ के दिन तूने ये मजाक उड़ाई तो भादरवा सुद्ध चौथ को तो तुझ पर कलंक रहेगा तू कि तू किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगा कोई तेरा
मुंह देखेगा तो उस पर कलंक पाप और उसे सहन करना पड़ेगा और लोगों को याद रहे कि अपने रूप लावण्य और सौंदर्य को देखकर दूसरे किसी की अवहेलना अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि सभी में सच्चिदानंद परमात्मा पूर्ण है उस परमात्मा की दृष्टि जागृत रखना चाहिए अवहेलना की दृष्टि नहीं रखनी चाहिए तब से यह भादरवा शुद्ध चौ को श्राप मिला कि भादरवा शुद्ध चौथ को कोई चांद देख ले तो उसे कलंक लगेगा पाप लगेगा और उसे वर्ष भर कष्ट उठाने पड़ेंगे लोग बच जाते हैं चौथ से थोड़े बच निकलते हैं और जो बोलते हैं हमें तो
कुछ नहीं हुआ हम देखते क्या होता है फिर उनको पता चलता है कि कितने विशेष होता है तो संसार में महत्व बुद्धि रखे तो कोई परमात्मा को जान नहीं सकता है कितना भी योग करे कितना भी तप करें कितना भी व्रत करे लेकिन संसार में आसक्ति है तो परमात्मा को नहीं जान सकता है और परमात्मा में आसक्ति तो संसार के व्यवहार में गला डूब परा रहे फिर भी उसको बंधन नहीं होता क्योंकि परमात्मा की आसक्ति उसको परमात्मा से मिला देगी