नैनागढ़ के राजा नेपाली सिंह के तीन पुत्र जोगा भोगा विजय और एक पुत्री सुनवा थी जो अत्यंत रूपवती और चंचल स्वभाव की थी वह अपनी सखियों के संग खेलकूद में मग्न रहती और माता-पिता भी उससे अत्यंत प्रसन्न थे एक दिन उसकी एक सखी ने मजाक में कह दिया अब तक राजा ने तेरे लिए कोई दूल्हा नहीं देखा तू खेलते खेलते कब जवान हो गई यह भी ध्यान नहीं दिया यह बात सुनवा के मन में गहरे उतर गई और उसने इसे अपनी मां से साझा किया जब राजा नेपाली सिंह र निवास में आए तो रानी ने
यह बात राजा को बताई राजा को भी एहसास हुआ कि सुनवा अब यवन की दहलीज पर कदम रख चुकी है अगले ही दिन राजा ने अपने दरबार में पंडित को बुलवाया और अपनी पुत्री के लिए योग्य व का संदेश लिखवा करर सभी देश देशांतर के राजाओं के पास संदेश पहुंचाया राजा नेपाली ने दूतों से महोबा जाने को स्पष्ट मना कर दिया और कहा था कि महोबा के बनाफर तो चंदेल के सेवक है वह हमारे बराबरी के नहीं है महीनों के बाद जब दूत लौटे तो उन्हें कोई भी योग्य व नहीं मिला सुनवा ने ने अपने
माता-पिता से कई बार आल्हा और उदल की वीरता की बातें सुनी थी इन चर्चाओं से प्रेरित होकर उसने स्वयं उदल को एक पत्र लिखा पत्र में उसने लिखा प्रिय उदल मैं तुम्हें अपना देवर मानकर यह पत्र लिख रही हूं मैं आल्हा को अपना स्वामी मान चुकी हूं अब तुम्हारा दायित्व है कि तुम उन्हें दूल्हा बनाकर लाओ और मेरे पिता को इस विवाह के लिए राजी करो सुनवा ने यह पत्र एक तोते के साथ भेजा जो महोबा जा पहुंचा प्रातःकाल उदल सैर के लिए बगीचे में गया हुआ था उसने एक आम की डाल पर बैठे तोते
को देखा जिसके चौच में कागज था उदल के पास आते ही तोते ने कागज गिरा दिया उदल ने पत्र उठाकर पढ़ा और उसमें अपना नाम देखकर चकित रह गया उदल ने तोते को साथ लिया और पत्र लेकर राजा परिमा के दरबार में पहुंचा राजा ने पत्र पढ़ा और फिर उसे अपनी गद्दी के नीचे रख दिया वीर मलखान ने पूछा दादा जी यह पत्र कहां से आया है और इसमें क्या लिखा है तब राजा परिमाण ने पूरी बात बताई कि यह पत्र नैनागढ़ की राजकुमारी सुनवा का है जो आल्हा से विवाह करना चाहती है लेकिन नैनागढ़
के राजा ने हमें विवाह के लिए टीका नहीं भेजा है राजा परिमा ने रानी मलना को जाकर बताया कि मलखान और उदल दोनों को समझा देना नैनागढ़ से लोहा लेना हमें भारी पड़ेगा रानी मलहरा ने दोनों वीर पुत्रों को बुलाया और समझाने की कोशिश की मलहरा से मलखान ने कहा माता हम मानने वाले नहीं हैं आल्हा के लिए यह ईश्वर ने ही संदेश भेजा है इसको स्वीकार करने में ही हमारी कीर्ति है इंकार करने से हमारी शान में बट्टा लग जाएगा माता विवश हो गई उसने दिवला और तिलका दोनों को बुलवाया तीनों ने प्रसन्नता पूर्वक
पंडित को बुलवाया और विवाह के लिए पंचांग से शुभ घड़ी दिख वाई पंडित ने कहा कि इस समय ही शुभ घड़ी है तुरंत ब्याह की तैयारी करो फिर तो और महिलाओं को बुलवाकर मंगल गान होने लगे वीर आल्हा को बुलवाकर चौकी पर बिठाया गया सात सुहागिन महिलाओं ने आल्हा पर तेल हल्दी चढ़ाने की क्रिया शुरू कर दी सभी को यथा जोग्य नेग इनाम दिए गए आल्हा को सुंदर वस्त्र पहनाकर पालकी में सवार किया रानी मलना दिवला और तिलका ने आल्हा और सभी भाइयों को भी आशीर्वाद दिया रानी दिवला कुएं में गिरने की परंपरा निभाने चली
तो मलना बोली बोली यह रस्म मैं पूरी करूंगी मैंने आल्हा उदल को पाला है दिवला को तो ऐतराज ही नहीं था मलना कुएं में गिरने का नाटक करने लगी तो आल्हा ने उन्हें गोदी में उठा लिया और विवाह करने का आश्वासन दिया आल्हा ने तीनों माताओं के चरण छुए और कूछ का डंका बजा दिया उदल ने फिर सुनवा के लिए पत्र लिखा और तोते के गले में बांधकर उसे उड़ा दिया उदल ने पत्र में सुनवा को भरोसा दिया कि आल्हा की बरात आ रही है विवाह किए बिना हम नहीं लौटेंगे चाहे प्राण चले जाएं इधर
मलखान ने हाथी और घोड़े तैयार किए ब्रह्मा देवा सब तैयार होकर नैनागढ़ की ओर चल पड़े नैनागढ़ से पांच कोस पहले ही डेरा डाल दिया पांच कोस तक डेर में फौज बैठ गई तब उदल ने रूपन को पत्र देकर राजा नेपाली को संदेश देने को कहा रूपन नैनागढ़ के दवार पर पहुंचा द्वारपाल ने उसे भीतर पहुंचाया रूपन ने राजा को प्रणाम किया और पत्र दिया रूपन ने परिचय दिया हम की महोबा से आए हैं आल्हा का विवाह है बारात लाए हैं राजा नेपाली ने रूपण को पकड़ने का आदेश दिया परंतु रूपण अपनी तलवार से वार
करता हुआ बाहर निकल आया खूनम खून रूपण अपने डेरे में पहुंचा तो मलखान ने वहां का हाल पूछा रूपण ने कहा कि नैनागढ़ की लड़ाई बहुत कठिन पड़ेगी नैनागढ़ के राजा नेपाली सिंह ने अपने तीनों पुत्रों को बुलाकर युद्ध की तैयार का आदेश दिया हाथी घोड़े सब तैयार हो गए पैदल सैनिक भी बख्तर पहनकर तैयार हो गए जोगा ने अपने पिता को बताया कि महोबा वाले इतनी बड़ी सेना लेकर आए हैं कि कोसों दूर तक झंडे ही झंडे दिखाई पड़ रहे हैं नैनागढ़ की सेना को सामने से आता देखकर महोबा की सेना भी तुरंत तैयार
हो गई दोनों ओर से पहले नगाड़े बजे फिर पत्थर के गोले चले गोले हाथियों को लगते तो वे चिड़ने लगते घोड़े के लगते तो वह रण छोड़कर भागने लगते और सैनिक के लगते तो वहीं ढेर हो जाते फिर सेना आमने-सामने पहुंच गई तो तलवार और भालों से लड़ने लगे खटखट तलवारें चल रही थी हदे रक्त से भर गए थे जिस पर वार पड़ता वहीं से रक्त का फव्वारा छूटता जीवितो की जुल्फें भी रक्त से लाल हो गई आठ कोस की दूरी तक केवल तलवारों की आवाजें आ रही थी कदम कदम पर लाशें बिछी पड़ी थी
ढाल खून पर ऐसे तैर रही थी मानो खून की नदी में कछुए तैर रहे हो उदल का घोड़ा बदुल हर मोर्चे पर नाच रहा था उदल ने उत्साह दिलाया तो महोबे वाले और उग्र हो गए महोबे के वीरों ने ऐसा युद्ध किया कि नैनागढ़ के सैनिक अपने हथियार फेंक कर भागने लगे कोई रो-रो कर अपने बेटों को याद कर रहा था तो कोई पुरखों को पुकार रहा था कोई अपनी पत्नियों को याद कर कर के विलाप कर रहा था जोगा के साथ 3 लाख सैनिक आए थे जो डेढ़ लाख ही रह गए आधे मारे जा
चुके भोगा ने यह सूचना नैनागढ़ जाकर अपने पिता नेपाली सिंह को दी राजा ने भोगा को रवास से लाकर अमर ढोल दिया और कहा इस ढोल को ले जाओ ढोल की आवाज जिसके कान में पड़ेगी वह मरा हुआ भी उठ जाएगा भोगा ने युद्ध में जाक कर अमर ढोल बजाया जो डेढ़ लाख सैनिक भूमि पर पड़े थे वे उठ खड़े हुए महोबा के केवल 10000 सैनिक काम आए थे वे भी उठ खड़े हुए यह देख उदल और मलखान की चिंता बढ़ गई उन्होंने कहा कि इस ढोल ने सारी मेहनत बेकार कर दी तब उदल वेश
बदलकर नैनागढ़ गया वहां के महलों में पहुंचा सुनवा अपनी खिड़की में खड़ी थी अपने महल में अलग सूरत को पहचानकर वह सीढ़ियों से नीचे उतरी उदल ने सुनवा से कहा कि या तो तुम्हें व्याह कर ले जाएंगे या अपने प्राण दे देंगे पता नहीं क्या होता है आधी फौज हमने खपा दी थी परंतु मरे हुए सैनिक फिर से उठकर लड़ने लगे अब हम क्या करें तब सुनवा ने बताया कि यह अमर ढोल का कमाल है मैं उस ढोल को वापस मगाने का उपाय करती हूं तुम प्रातः माली का वेश बनाकर देवी के मंदिर के पास
आ जाना नजर बचाकर अमर ढोल को ले जाना बस फिर विजय तुम्हारी है