अरे क्या करूं शक्ति नहीं है साधना करनी है ऐसा कभी ना सोचो साधन में श्रम की आवश्यकता नहीं है शक्ति की जरूरत नहीं है केवल सुकृति की जरूरत है ध्यान से सुनना इसी में बड़ा चक्कर पड़ जाता है अब वो बोल रहे थे ना मैं किसी की बात नहीं मानूंगा अपने गुरुदेव की बात मानूंगा तो उनको कहीं मानसिक रूप से किसी ने अपने मन से चलाने की कोशिश किया होगा और ने ठान लिया तो गहरे मन में य बात उतर गई अभी ध्यान ध्यान में वही रिपीट हो रहा है तो साधन करने में श्रम की
आवश्यकता नहीं है शक्ति की आवश्यकता नहीं है साधन करने में केवल सुकृति की आवश्यकता है सावधानी की आवश्यकता है जो लोग सुकृति नहीं देते जो थारी मर्जी वो मारी मर्जी लोग साधन कर कर के थक जाते फिर भी जीवन में बदला हट नहीं आती दूसरे लोग श्रम कर कर के थक जाते हैं तो भी रस नहीं [प्रशंसा] आता यह भी अनुभव होता है क्योंकि साधन करते और चाहते तुच्छ भजन करते श्रेष्ठ का और चाहते तुच्छ और वो हमको तुच्छ देकर फसाना नहीं चाहता इस बात की सुकृति नहीं है हम अपने मन माना चाहते हैं कि
ऐसा हो जब अपने मन की ठान लेते हैं तो सब तो अपने मन की होगी नहीं अगर व्यक्ति के मन की होने लग जाए तो संसार का सत्यानाश हो जाए सबके मन की होने लग जाए तो संसार चलेगा ही [संगीत] नहीं तो हमको सुकृति देना है जो तेरी मर्जी जी सो मेरी मर्जी साधन में श्रम नहीं सुकृति और सावधानी है परदेश के लोग साधन भजन तो नहीं करते लेकिन कहीं जाते अतिथि होकर तो उसका मकान गंदा ना हो उसका ख्याल रखते उसका पायखाना में भी व साफ रखते और हम लोग साधना करने जाते हैं तो
आश्रम में जहां रहेंगे जहां पायखाना में रहेंगे गंदा पड़े तो पड़ा आप पार फेंकी नहीं चलती पकड़ी तो ये जो हमारी सावधानी नहीं है व्यवहार में जो सावधानी चाहिए वो एक प्रकार का साधन है लोग तो धर्म की जगह पर भी अपना अहम पोछने को आ जाते हैं तोय असावधानी है आश्रम में और गुरुद्वार पर अहम छोड़कर मिलजुल के काम करने की जरूरत है लेकिन आश्रम में और गुरुद्वार में भी अपनी गंदी आदत राग की द्वेष की काटा काटी की हम चलाना चाहते हैं जो खुशा मत करे वह चाहे पीतल का हो फिर भी सोने
का लगेगा और दूसरा चाहे सोने का हो फिर भी पीतल का लगेगा तो यह हमारी सावधानी की कमी है जय राम जी हम अगर सावधानी का बर्ताव करें तो हमारा साधन सहज में होगा फिर से सुन ले साधन करने में श्रम की जरूरत नहीं है सुकृति की जरूरत है ईश्वर की हां में हां ईश्वर और गुरु के अनुभव में अपने सहमत हो जाना बहुत श्रम बच जाता है अभी नहीं तो हजार वर्ष के बाद भी सहमत होना पड़ता है तो अभी क्यों ना हो जाए ईश्वर की दृष्टि में अपनी दृष्टि मिला दे को जैसा जगत
दिखता है और स्व दिखता है ऐसा तू अपने को स्व को देख और जगत को देख सुकृति दे दे हो गया काम तो साधना का मतलब है आपको सुकृति देने की तैयारी ईश्वर की हा में हां गुरु की हा में [प्रशंसा] हां साधन श्रम साध नहीं है सुकृति साध्य है और जो सुकृति आसानी हो जाएगी एक बात एक तो सुकृति दूसरी बात है सावधानी की सावधानी क्या करनी है कि अहंकार पोछना नहीं है राग द्वेष पोछना नहीं है शत्र मित्र के भाव को पोछना नहीं है इसको क्षीण करना है अगर यह सावधानी नहीं रही तो
मंदिर में जाने के बाद भी ऐसा है उसका ना ऐसा है उसका गाल ऐसा है उसका मुंह ऐसा है आश्रम में जाने के बाद भी आ सारो छ ना फलान छ ना ंग ना पूछड़ छ येय राग द्वेष की सृष्टि करेगा अगर सेवा करना [प्रशंसा] है तो तुम कहीं भी सेवा कर सकते हो पहले के जमाने में तो सेवा करने वाले थे सेवा लेने वाले नहीं मिलते थे भाई क्यों किसी की सेवा ले का सिर प बोझ चढ़ाना अपने से हो सके तना अपने आप कर लेना राजकुमार जा रहा था मेले में रास्ते में उसका
चाबुक गिर पड़ा घोड़े पर था व तो वापस आया घोड़ा खड़ा करा और फिर नीचे उतरा चाबुक उठाया उसने तो मेले में जाने वाले लोगों ने कहा राजकुमार कह देते य जरा चाबुक दे दो तो हम उठा के दे देते तुम घोड़े से नीचे उतरे चाबुक उठाया फिर घोड़े पर बैठे तो उस बुद्धिमान राज कुमार ने कहा कि मैं तुम्हारी यह सेवा ले लेता तो मुझे कब अवसर मिलता यह सेवा चुकाने का तुम कब घोड़े पर बैठते तुम्हारा कब चाबुक गिरता और कब मैं उठाकर तुमको बदले में देता मेरा शरीर में तो शक्ति है बल
है तो मैं काहे को तुम्हारी सेवा लो तो सावधानी बरतनी चाहिए हम जिनसे बात करते हैं उतनी जरूरी है क्या जहां समय देते उतना जरूरी है क्या सावधानी केवल सावधानी से साधन हो जाता है केवल सुकृति से साधन हो जाता है ईश्वर प्राप्ति हो जाती है तो शास्त्र ढंग से हमारा व्यवहार हो सावधानी शब्द छोटा है लेकिन इसमें बहुत कुछ आ जाता है खाने में सावधानी बोलने में सावधानी समय खर्च में सावधानी करने में सावधानी है तो दो बातें सुकृति और सावधानी आज उसी पर चलता है सुकृति और सावधानी श्रम नहीं श्रम कितना भी करा
लेकिन सुकृति और सावधानी नहीं है तो हाथ में कुछ नहीं लगेगा मैं 40 साल से भजन करता हूं तू 40 जन्म से कर मैं नंगे पैर घूमता हूं मैं फल ही फल खाता हूं तू चाहे हवा ही हवा पी क्या फर्क पड़ता है अगर उसकी हां में हां नहीं किया और फल खाकर अपना अहम पोच हो अथवा लोग फलाना फलाना करके अपना अहम पोते हो अथवा जो खुशा मत करे वो चाहे पित्तल का हो और अच्छा लगता है और दूसरे से जिससे गांठ बंद गई है कि इसने कहा कि तुम हमारे शत्रु हो और वह
अपने मगज में है तो उसकी हर चेष्टा अपने को ऐसी लगेगी क्योंकि एंटी ग्रुप है यह एंटी ग्रुप राग द्वेष य असावधानी और असु कृति का फल है और इसी से व्यक्ति में पर कुटुंब में समाज में राज्य में देश में विश्व में अशांति की आग लगी यह दो मूर्खता से मूर्खता खाली दो है असावधानी जिससे राग देष बढ़ता है मनुष्य मनुष्य का शत्रु होता गुरु भाई गुरु भाई के शत्रु हो जाते कैसी बेवकूफी एक पिता के पुत्र आपस में शत्रु हो जाते कितनी नालायक पलो पलान टा ता से पलो पलान यो ता से कुतरा
हक सु कर तुम अपना मनुष्य मानुषी हक भोगो कुत्ते एक ग्रुप के दूसरे ग्रुप को एक एक मोहल्ले के दूसरे महलो को सारी रात भ करते [प्रशंसा] रहते य तो उनको दिया प्रकृति ने आपन राग देवेश करके क्यों जलसी करके एक दूसरे को सताए परदेश में भी यही हाल है जलसी का और अपने देश में भी बहुत आ गया सुकृति नहीं है ईश्वर की हां में हां नहीं है ईश्वर के साथ प्रीति नहीं है ईश्वर के साथ मोहब्बत नहीं है इसीलिए राग द्वेष से पिंड छुता नहीं है संसार का चिंतन करोगे तो या तो राग
आएगा या तो द्वेष आएगा [प्रशंसा] अपने में प्रीति करोगे तो अभिनिवेश आएगा और भगवान में प्रीति करोगे तो भगवान आएगा हृदय में तुम जैसा चिंतन करते वैसा तुम्हारा हृदय हो जाता है तुम्हारा चित्त हो जाता है इसीलिए कृपा करके भगवत चिंतन करो सुबह उठो मेरे हृदय में भगवान है बाहर गा लेकिन उसी की सत्ता से बारबार उसी में आऊंगा स्वासो स्वास में जो अजपा गायत्री दिया है उसको जपो नाम दान के वक्त जो टेक्निक बताई युक्ति बताई उसका अभ्यास कर व्यवहार के हर एक घंटे में दो पाच मिनट उसी का अभ्यास करो कृष्ण ने कहा
अभ्यास योग युक्ति न चेत नान गामिनी परम पुरुषम दिव्यम याति पार्थन चिंतन अभ्यास को योग में बदल दो चिसा तुम्हारी अन्य गामिनी मत होने दो अन्य अन्य व्यक्तियों में दिखेगी अन्य अन्य व्यवहार में दिखे लेकिन अन्य अन्य की गहराई में जो भगवान छुपा है वो अनन्य है लटटू अलग है ट्यूबलाइट अलग है पंखा अलग है एंपलीफायर अलग है मोटर पंप अलग है तो फ्रिज अलग है लेकिन है तो सब में लाइट की सत्ता ऐसे ही सब में मेरे सब घट मेरा साया खाली घटना कोई शत्रु के प्रति भी मेरा साया है ऐसा गहरा चिंतन करोगे
तो शत्रु की शक्ति तुम्हें दबाए गी नहीं तुम्हारी निष्ठा शत्रु के हृदय को बदल [प्रशंसा] देगी केवल सावधानी रखो कि आपका चित्त दूषित ना हो आपका चित्त राग द्वेष में अभिनिवेश में ना गिरे इतनी सावधानी और उसकी हां में हां सुकृति दे दो जैसा ईश्वर और गुरु कहते हैं गुरु की मानना है तो देखो गुरु मनवा हैं गुरु की मानना है तो गुरु कहते हैं कि सुख और दुख के भोगी मत बनो सुख के चाक मत बनो और दुख से पलायन वादी मत करो दुख आए तो उसको भी देखो किस बात से आया क्यों आया
आता है कितना दिन टिकता है देखो सावधान होकर दुख के दृष्टा बनोगे तो दुख तुम्हे दुख का भोगता नहीं बनाएगा ऐसे सावधान होकर सुख को भी देखोगे आखिर कब तक य क्या आकर्षित हुए वस्तु मिली आखिर क्या तो सुख सुख में आसक्ति तुम्हें दबा देती और दुख का भय भी तुम्हें दबा देता है इससे अंतःकरण मलिन होता है राग द्वेष से भी अंतक मलीन होता है अपनी विशेषता अपने अधिकार अपनी विशेषता इससे भी अंतक में परिछन और मलिन होती तो आज के सत्संग की यह दो पॉइंट है साधन श्रम साध्य नहीं सुकृति साध्य है तुम्हारे
पास कितनी शक्ति है उसको पता है उसके अनुसार ही तुम करो कोई जरूरी नहीं कि तुम्हारे पास शक्ति है तुम्हारे पास है 25 वोल्ट और तुम 200 वोल्ट का बल्ब जला के दिखाओ नहीं तुम्हारे पास जीरो वोल्ट है तो जीरो भी काफी है तुम्हारे पास जो शक्ति है जो योग्यता है ऐसे ही साधन करो और सावधानी रखो कि तुम्हारी शक्ति और योग्यता और जगह बिखर तो नहीं रही फालतू बात में फालतू खाने में फालतू सोचने में फालतू आकर्षणों में तुम्हारी जीवन शक्ति हरा तो नहीं हो रही इसकी सावधानी यह दो बात ऐसा है कि इसको
महामंत्र कह दे तो कोई अपत नहीं सुकृति और सावधानी दो बातें सुबह उठ हो के आज सुकृति और सावधानी की साधना करूंगा बस हर एक घंटे में फिर याद करो सुकृति और सावधानी ही तीन दिन ऐसा करके देखो आपको तीन महीने संसार क्या मजूरी करने से जो नहीं मिला अथवा मन माना भजन करने से जो नहीं मिला वो तीन दिन में इन दो पॉइंट से मिल जाएगा शांति प्रसन्नता सुकृति और सावधानी सुकृति और सावधानी बस सुरत लगा दो केवल शब्दों की रट नहीं वह बाद में आ जाए तेरी हां में हां सुकृति दुख तब होता
है जब हम सुकृति नहीं उसकी हा में हा नहीं करते और समय अंत समय बर्बाद होता है अंतक खराब होता है जब हम असावधानी रहते हैं हम सावधान रहे और ईश्वर की सुकृति सुकृति श्रम साध्य नहीं है साधन सु ति साध है बैठे हैं विचार आ रहा है आप चिल्लाए विचार आ रहा है नहीं आवे नहीं आवे करोगे तो और आएगा ठीक आ रहा है विचार उसको मैं देख रहा हूं सुकती है विचार शांत होने [प्रशंसा] लगे जय राम जी की सड़क के किनारे तुम्हारा घर है बेलगाड़ी नहीं आए तो झगड़ा कार भी आती है
बैलगाड़ी भी आती है ऑटो भी आती है तो पैडल रिक्षा भी आती है तो तु तु ट्रक भी गुजरती है गुजरती तो गुजरती सड़क के किनारे जिनके घर है उनको हैबिट पड़ गई गुजरती तो गुजरती देहात में कोई गाड़ी जाती तो सब घर से बाहर आते क क्या लेकिन शहरों में जो मकान है उनको कभी ऐसा नहीं होता कौन क्या आते हैं जाते सुति हो ग आदत पड़ ऐसे जीवन में अनुकूलता प्रतिकूलता की गाड़िया आती जाती मान अपमान का आता ही जाता है तू अपने घर में बैठ अपने आत्मा में बैठे सब आ आके सड़क
से रवाना हो जाए आई ऑटो तो पकड़ा उसका पहा आई बारात तो उसके साथ हो गए आई निकली शमशान यात्रा तो हाय हाय रोने लग गए तो आदमी पागल हो जाएगा सड़क के किनारे मकान है शमशान यात्रा वाले भी जाएंगे बरात वाले भी जाएंगे ऑटो वाले भी जाएंगे पैदल रिक्शा वाले भी जाएंगे कोई पैदल भी जाएंगे कोई मोटे भी जाएंगे मोटे देखकर हाय मैं मोटा हो जाऊं पतले देखकर हाय रे इसको पतला क्यों करा ऐसा तो नहीं सोचना पड़ता है जो है ठीक है संसार है रस्ता है गुजर र है ऐसे तुम्हारे शरीर और मन
से ये सब गुजर रहा है गुजरने दो हवा ने किसको देख हवा को किसने देखा ना तूने ना मैंने लेकिन जब पेड़ सिर झुकाते तो पता चलता है हवा पसार हो रही ऐसे तुम्हारे चित में कुछ भी आए सुकृति चलो ठीक है तो बाबा काम आ जाए क्रोध आ जाए लोभ आ जाए चिंता आ जाए उसकी सुकृति नहीं जा इसलिए काम आया उसकी सुकृति उसकी हा में हा नहीं की इसलिए क्रोध आया काम क्रोध लोभ मोह ये मन की अपनी मान्यता से देखते हैं अपनी मान्यता से नहीं उसकी हां में हां कर दो उसकी उसके
साथ दृष्टि मिलाओ सावधान रहो काम का विचार आता है जब आदमी निकम्मा होता है जब राम का रस नहीं होता राम का चिंतन नहीं होता तभी काम आता है राम का चिंतन नहीं होता तभी क्रोध आता है राम की दृष्टि नहीं है सावधानी नहीं तभी मोह होता है पुत्र में मोह होगा पत्नी में मोह होगा परिवार में मोह होगा तो होने दे सावधानी पुत्र के रूप में पिया को देखो पत्नी के रूप में उसके पिया उसम पिया छुपा है पति के रूप में व ऐसी सावधानी तो काम क्रोध को बदल देगी आली पतंग मगन गज
एक एक रस आच तुलसी तिनकी कौन गति जिनको व्याप पांच पतंग रूप में जल मरता है भरा सुगंध में जल मरता है हाथी स्पर्श में कागज की घास पत्तो की हाथी नी के स्पर्श में खड्डे में फस मारता है एक एक विकार जीवों का जीव ले लेते हैं तो जो पांचों विकारों में सुकृति के बहाने गिरता रहेगा तो उसका क्या हाल होगा सुकृति का मतलब है थारी हा में मारी हा विकारों के हा में मेरी हा [प्रशंसा] नहीं तो अपमान कराता है वाह दे अभ्यास मिटाने के लिए मान देता है वाह नजर उस पर हो
नजर अगर ईश्वर पर है तो इन विकारों को ज्यादा दिन जगह नहीं [प्रशंसा] मिलेगी नजर विकारों पर है आवश्यकता विकारों की लगती है तो भगवान में मन नहीं लगता आवश्यकता भगवान में की लगती है तो फिर विकारों में मन नहीं लगेगा और जो सावधानी बरती और सुख तो मन में राग द्वेष मिटने लगेगा मन में शांति का संचार होगा जो शांति आई सामर्थ्य आ जाएगा जो सामर्थ्य आएगा विकारों पर आपका क तो एक होता है इंद्रिय गत ज्ञान दूसरा होता है बुद्धि गत ज्ञान तीसरा होता है वास्तविक ज्ञान वास्तविक ज्ञान य आत्मा है परमात्मा है
ब्रह्म [प्रशंसा] है बीच में एक और रोल आता है इंद्रिय गत ज्ञान और बुद्धि गत ज्ञान के बीच में मन होता है मन अगर इंद्रियों के पक्ष में आता और बुद्धि को खींचता है तो पतन के रास्ते जाते है और मन अगर बुद्धि गत ज्ञान के तरफ आता और इंद्रियों को संयम करता है तो उत्थान होता है आंख ने दिखाया रूप आसक्ति ई खींचे मन सहमत हुआ बुद्धि ने निर्णय किया उसको ऐसे फसाओ इसे ऐसे लाव मैरिज कर लो ये कर लो तो पतन कस्ते आंख ने दिखाया भेल पूरी मन मन ने कहा ले लो
खा लो अभी दूध या चाय पी आ एक घंटा भी नहीं हुआ दो घंटा भी नहीं हुआ और भेलपुरी खाया तो कोड़ के दाग हो जाएंगे सफेद दाग हो जाएंगे बुद्धि का उपयोग किया तो मन बुद्धि के सहमत हो गया तो संयम आ गया अगर मन ने बुद्धि को अपने पक्ष में खींच लिया और खाने लग गए तो पतन है तो बुद्धि को बलवान करने के लिए बुद्धि दाता के विषय में विचार और बुद्धि दता के हां में हां करा दो इसमें अभ्यास की जरूरत है तो जब हम साधन भजन के अभ्यास की जगह पर
[प्रशंसा] बैठे तो आसन का भी महत्व होता है ध्यान और संध्याय दोनों पर्याय वाचक है एक ही धातु से उनकी उत्पत्ति हुई ध्यान और संध्या संध्या उसे कहते हैं कि जिस जो क्रिया कलाप करने से भगवान की याद आए प्राणायाम करो जप करो स्मरण करो भगवान की याद आए तो ध्यान में क्या होता है भगवान की स्मृति भगवान की याद त्रिकाल संध्या इसीलिए करवाई जाती थी और करते थे लोग कि सुबह की संध्या में प्राणायाम जप आचमन तर्पण आदि जो मुद्रा द यह स्वास्थ्य तन के स्वास्थ्य और मन को मन के स्वास्थ्य की रक्षा कर
फिर सुबह से दोपहर तक कहीं इधर उधर मन भटक गया या तन भटक गया फिर संध्या करके स्वस्थ हो गए फिर शाम को संध्या करके स्वस्थ हो गए अभी आधुनिक संध्या करो भले अर्घ देने की व्यवस्था नहीं हो रही है तो चलेगा प्रणाम करो स्वासो शवास को देखो यह जो काम क्या हाथ पैरों ने किया मन ने सोचा उसको देखने वाला वास्तविक ज्ञान है बुद्धि के निर्णय बदले उसको देखने वाला वास्तविक सो है मन के संकल्प विकल्प को देखने वाला साक्षी चैतन्य है ओम आनंद ओम शांति ओम ओम थोड़ा गोता मारा अगर रोग और बीमारी
आती है उस समय भी लंबा श्वास लिया हरि ओम उ का जितना लंबा हो सके फिर उतनी देर शांत रहे बीमारी मुझे नहीं मैं सावधान हूं बीमारी शरीर को है हाथ को है पैर को है मुझे नहीं है बस सावधानी बरती बीमारी की जड़ उखड़ जाएगी आत्म शक्ति का संचार होगा भय है चिंता है शोक है प्रॉब्लम है सुबह उठो ना धो के पूरा अभिमुख हो जाओ 10 पा 15 ऊर्जा प्राणायाम करो फिर दीर्घ प्रणवा का जप करो भय आया है मन में आया है मैं सावधान हू शोक और चिंता आय तो मन में है
मैं सावधान हूं तू जो भी करेगा हमारे तन स्थिति के लिए उत्तम ही होगा तुम कितने नखे कीना अपने को ब रहे हो तुम अचल से मिलो आत्मा अचल है परमात्मा अचल है बस उसके साथ आप सावधानी बरत के संबंध अपना स्मरण कराइए ईश्वर के साथ संबंध जोड़ने को मैं कभी नहीं कहता तु ईश्वर के साथ संबंध जोड़ लो संबंध वहा जोड़ा जाता है ज नहीं हो ईश्वर के साथ तो तुम्हारा पक्का शाश्वत संबंध है ईश्वर के साथ तुम्हारा शाश्वत संबंध है और शरीर के साथ संसार के साथ माना हुआ संबंध है मैं मोहन भाई
मैं जयंत भाई नाम सुना और मान लिया ये मेरा मकान मन की मान्यता है लेकिन यह मेरा भगवान है मन की मान्यता नहीं भगवान तो मेरा है ही है जैसे तरंग का और पानी का शाश्वत संबंध है ऐसे जीवात्मा और परमात्मा का शाश्वत संबंध है केवल सावधानी रखे कि उस संबंध को उस संबंध की विस्मृति ना हो अथवा उस संबंध से विपरीत संबंध ना बना ले मकान के साथ घर के साथ वो कितना प्यारा होगा और वो मेरा आत्मा है बस सावधान होकर स्मरण करिए साधन बन जाएगा सुकृति दीजिए और सावधान होइए बस भले 200
माला करने वाले करते मुबारक है नंगे पर यात्रा करते हैं करते उनको मुबारक है तीर्थ व्रत उपवास मक्का मदीना जाते उन्हें व मुबारक है तुम तो अंतर्यामी परमात्मा में जाओ जहां जाने के बाद फिर कहीं जाना नहीं पड़ता सो साहिब सद सदा हजूर अंधा जानत ता को दूरे वो सद सदा हजूर है अंधा उसे दूर जानता है तुलसीदास ने कहा घट में है सूझे नहीं नालतली ऐसे जीव को भयो मोतिया बिंद वो घट में है साक्षी वास्तविक ज्ञान उसकी शरण जाओ तमेव शरणम गच्छ सर्व भावे न भारता त प्रसादा पराम शांति स्थानम प्रा शाश्वतम तुम
सर्व भाव से उस अंतर्यामी ईश्वर की शरण जा श्री कृष्ण कह रहे तव शरणम गच्छ सर्व भावे भारता त प्रसादा परम शांति आदि देविक आदि भौतिक आध्यात्मिक य छोटी शांति य तो आती जाती रहती बचारी लेकिन परम शांति एक बार मिलने के बाद फिर जाती नहीं ऐसी परम शांति तुम पा लोगे तमेव शरणम गच्छ सर्व भाविन भारता शरीर से जो कुछ कर्म करते उ अंतर्यामी की प्रसन्नता के लिए करो विकार को पोचने के लिए नहीं अहंकार को पोचने के लिए नहीं ईश्वर की प्रसन्नता के लिए काम करो वो तुम्हारी सच्ची सेवा हो जाएगी फलाना भाई
फलाना भाई फलाना भाई ऐसा करके जो लोग तुम्हारे से काम लेना चाहते हैं या करना चाहते हैं तो आप अंदर सावधान रहो कि इस शरीर का नाम लिवा कर हम सेवा कर रहे हैं इस शरीर में छुपे हुए परमात्मा अथवा गुरु को साक्षी रखकर हम हम सेवा कर रहे केवल सावधानी करो आपकी सेवा में चार चांद लग [प्रशंसा] जाएगा और स्वभाव बदल जाएगा तो छापन स्वभाव में से हट जाएगा टाटिया खींच प्रोग्राम हट जाएगा जो खुशामद खोर के अथवा वा भाई वाह के लिए सेवा करते वह आपस में लड़ते रहते झगड़ते रहते कुत्तो कीना बड़े
तोड़े हो जाते हैं जो वाहवाही के लिए सेवा करते हैं उनका स्वभाव बड़ा तो छड़ा हो जाता है गंदा हो जाता है लेकिन भगवान की प्रसन्नता के लिए गुरु की प्रसन्नता के लिए जो सेवा करते हैं उनका स्वभाव बड़ा मधुर हो जाता है तमेव शरणम गच्छ इस श्लोक को खाली आप स्वीकार कर लो आपका कल्याण हो जाएगा इन दो सूत्रों को स्वीकार कर लो आपका कल्याण हो जाएगा सावधानी और सुकृति बस सावधानी और सुकृति कल्याण हो जाएगा हमारी यह हालत है कि बुद्धू हलवाई के बेटे जैसी बुद्धू हलवाई का बेटा काशी में पढ़ने गया साल
भर के बाद उसका काशी का प्रिंसिपल आया गांव में बुद्ध पूछते मेरा बेटा खाता पिता है मनी डर छड़वा आता है कपड़े पपड़े अच्छे उनको भेजे थे मिल गए पहनता करता है बोले कपड़े भी पहनता है खाता भी है पीता भी है और मनी डर भी छुड़वा आता है सब करता है [संगीत] खाली दो बात की कमी है बोले बस आखिर तो मेरा बेटा है उसने पीट ठोकी अपनी मेरा बेटा है दो ही कमी है कौन सी दो कमी बोले अपनी उसको अकल नहीं और हमारी बात मानता नहीं बाकी रहा भी क्या अपनी अकल नहीं
और हमारी बात आचार्यों की बात शिक्षक की बात मानता नहीं ऐसी मुक्त होने की हमारे मन को अकल नहीं है माना भगवान की और संतों की बात मानता नहीं संतों के पास आकर भी हम अपने मन की बात मनवाने की जो दृष्ट होता करते हैं अथवा मन की आदत के अनुसार सेवा मिलती है अथवा मन के अनुसार काम मिलता है और मन के अहम को पोषण होता है फाका पोषा जाता है तो बड़ा उत्साह से काम होता है देखते फाके को अहंकार को पोषण नहीं मिलता है तो सेवा वेवा धरी रह जाती मैं यह सेवा
नहीं करूंगा वो करूंगा यह काम नहीं करूंगा मैं वह करूंगा मन चाहा मन चाहा करोगे तो पुष्ट हो जाओगे तुम्हारे अहम का पोषण होगा ईश्वर और गुरु और शास्त्र को अस्वीकृत अस्वीकृति हो जाएगी शास्त्र ईश्वर और गुरु को स्वीकृति कर दो और अहम की अस्वीकृति कर दो कल्याण बन जाएगा हम जब गुरु के वहा सात साल जब इधर उधर गए यात्रा वात्रा तो कभी कभार जानबूझ [प्रशंसा]