साल 1527 बाबर ने पानीपत में विजय पाई पर असली चुनौती अब उसके सामने थी राजपूताना के अजय योद्धा महाराणा सांगा 80 घाव एक हाथ एक आंख और एक पैर खोने के बावजूद उनकी वीरता अटूट थी बाबर की सेना तोपखाने और घुड़सवार से सुसज्जित थी जबकि राजपूतों के पास मात्र तलवारें और साहस था खानवा के मैदान में युद्ध प्रारंभ हुआ राजपूत सेना ने अप्रतिम पराक्रम दिखाया शत्रु पंक्तियां चीर दी चारों ओर तलवारों की टंक रणभेरी की गूंज और युद्ध के जयघोष उठने लगे परंतु युद्ध केवल शौर्य से नहीं जीते जाते बाबर की तो ने धूल और
धुए का जाल बिछा दिया युद्ध की गति बदली और दुर्भाग्य से कुछ राजपूत सेना नायकों ने विश्वासघात कर दिया इसके बावजूद महाराणा अंतिम क्षण तक लड़े परिणाम स्वरूप बाबर की जीत हुई पर यह केवल रणभूमि की विजय थी आत्मा की नहीं महाराणा सांगा जीवित रहे किंतु यह पराजय सह न सके वे वीरगति को प्राप्त हुए किंतु उनकी गाथा अमर हो गई वीरों की गाथा कभी नहीं मरती अपने विचार कमेंट बॉक्स में शेयर करें