[संगीत] [हंसी] [संगीत] सुकन्या जी उड़ीसा पुरे राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं नाम जप तो करती हूं परंतु कोई समस्या आ जाए या कुछ बुरा हो जाए तब भी नाम जप पर भरोसा तो रखती हूं पर अगर कोई घर वाले या दोस्त कुछ कह देते हैं तो मन में वही बात अटक जाती है दोस्त तो दूर की बात है घर वालों की बातों का क्या करू नाम जप में कारण बाधा भी उत्पन्न होती है मराज जी देखो जब तक विवेक जागृत नहीं होता तब तक य फसाओ बने रहते हैं जहां विवेक होता
है एक सेकंड में काट कर के स्थित हो जाता है मान लो किसी ने हमको कुछ कहा उस पर हम विचार करते हैं अगर उसने व्यर्थ में हमको कहा तब तो सोचने लायक बात है ही नहीं अगर हम में कमी है व कमी कहा तो हमें दूर कर लेना चाहिए अब जैसे कोई हमारा उपहास करे भक्ति का उपहास करे तो हम समझ रहे ना वो व्यर्थ है बाल भूत विवस मतवारे ते नहीं बोले वचन विचारे तिन कर कहा सुनी नहीं काना हम ज्यादा देर अगर संसार की बात का चिंतन करके टिकें तो हमारा अंतःकरण मलिन
हो जाएगा या तो हमसे उससे द्वेष हो जाएगा और ये तो राग हो जाएगा अनुकूल बात है तो राग हो जाएगा प्रतिकूल है तो द्वेष हो जाएगा राग द्वेष दोनों भगवान के मार्ग में बाधक है इसलिए विवेक का प्रयोग करो ना घर का या बाहर का कोई कुछ बोले हम हम उसके बोलने से अपने दिमाग को परेशान कर ले यह बुद्धिमानी नहीं यह विवेक नहीं है हमें अपनी मर्जी में जीना है पहले तो य सीखो तुम मुस्कुराओ तो हम मुस्कुरा दें ऐसा जीवन जिसका है ना वह बहुत खतरे का जीवन है पहली बात तो आप
चाहे हो चाहे जवान हो चाहे कोई भी हो आप अपनी मस्ती को नष्ट मत होने दीजिए आजकल मस्ती को समझा जाता है वय विचार शराब पीना पार्टी बजी नशा यह मस्ती नहीं है यह गुलामी है यह पराधीनता है विषयों की गुलामी व्यसन की गुलामी नाना प्रकार की अपनी मस्ती भगवान है अपने भगवान का चिंतन करते हुए मस्त है तुम गाली दो तुम प्रशंसा करो य तुम्हारा दिमाग है जब हमारे विषय में कोई बात करे घर या बाहर का तो बहुत विवेक से चिंतन करना चाहिए यह व्यक्ति ऐसा बोला चाहे घर का या बाहर का क्या
मेरे में कमी है अगर हम ढूंढते हैं तब तो भगवान कृपा करके उनकी तरफ से हमें सावधान कर रहे हैं यदि नहीं है तो फिर वो बोलता रे पागल जैसा हमें उसकी बात नहीं सुननी है हो अपने लग गए राधा राधा राधा राधा अगर ऐसी प्रवीणता नहीं रखोगे तो दिन भर विक्षेप पड़ता रहेगा कोई कहे ना कहे 10 साल पहले की बात सचवा के मन विक्षेप करवा देगा 10 साल पहले हमको स्कूल में ऐसा बोला था अब वो परेशान करवा देगा अभी वर्तमान में परेशान करा देगा तो हम विवेक के द्वारा मन को और बुद्धि
को तले जो कमियां हो उनको निकाले और बिना कमी के संसार यदि हमें कह रहा है तो हमें उसकी चिंता नहीं करनी चाहे घर का हो चाहे पड़ोस का हो चाहे देश का हो किसका प्रश्न था समझ पा रहे आप नहीं तो आप परेशान हो जाएंगे आप परेशान हो जाएंगे परेशान नहीं होना सबसे पहली साधना संतुष्ट न के हर परिस्थिति में मुझे अपना दिमाग बचाना है अगर हम ऐसे डिस्टर्ब होते गए तो धीरे-धीरे कोई ऐसी बड़ी बात आ जाएगी जो डिप्रेशन में पहुंचा देगी हमें काटना सीखना है हर बात को काट के मस्त एकदम राधा
राधा राधा नहीं अगर यह सब लोग खिलाफ है तो क्या होगा भगवान है ना प्रभु है ना वह मंगल ही करेंगे कोई कुछ बाल बांका नहीं कर सकता हम गलत नहीं होने चाहिए अगर गलत है और हमें कोई गलत कहता है तो धन्यवाद आपने हमें सावधान किया आगे से हम सावधानी पूर्वक चलेंगे गलती नहीं होगी गलत नहीं है तो आप बोलते रहो आपका दिमाग है हम अपनी मस्ती में राधा राधा राधा राधा अगर ऐसे चलोगी तो पार पा जाओगी नहीं तो संसार सपोर्ट करे असंभव नहीं सपोर्ट करेगा एक आदमी बूढ़ा और जवान उसका बेटा व
घोड़ा लेकर जा रहा था तो बेटे ने कहा पिताजी तुम बैठ जाओ हम नीचे चल रहे हैं क बूढ़े हो पिता हो बैठ गए चार लोग मिले अरे इस बुड्ढे को शर्म नहीं आ रही लड़के को पैदल चला रहा है ऊपर घोड़े में बैठा है उन कहा तुम बैठ जाओ वो नीचे चले चार लोग मिले बोले जवान हो के शर्म नहीं आ रही बूढ़े को पैदल चला रहा है बोले पिताजी तुम भी बैठ हो बैठ गए बोले हराम का घोड़ा मिला होगा दोनों चढ़े हो इसमें दोनों उतर गए बोले यार कितने बेवकूफ है घोड़ा खाली
जा रहा है अब बोलो घोड़े वाला करे क्या घोड़े वाला क्या करे सिंगल में तो परेशानी डबल में तो परेशानी नहीं बैठ रहा तो लोग ट्रंट मार रहे लोग तो कहेंगे हमको लोगों की चक्कर में नहीं पड़ना हमें अपनी मस्ती में रहना है अगर हम लोगों के चक्कर में पढ़ेंगे तो फिर ना तो भजन हो पाएगा और ना हम चैन से रह पाएंगे किसी भी तरह से चलो आप किसी भी तरह से समाज का कार्य है डिस्टर्ब करना माया का कार्य है डिस्टर्ब करना अपने को संभलना है अपने को सावधान अपने से कोई गलती नहीं
होनी चाहिए फिर दूसरों की बातों पर हम ध्यान ना दें क्यों मीनाक्षी जी राधे राधे महाराज जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी मेरा प्रश्न है कि एक ही माता-पिता की दो संतान है एक से हमें दुख और एक से सुख की प्राप्ति होती है महाराज जी क्या यह हमारा प्रारब्ध है हां जी हां बिल्कुल ध्रुव सत्य है कि वो तुम्हारा प्रारब्ध ही पुत्र रूप में आकर के उसकी बुद्धि में बैठ कर के एक से सुख दिला रहा है एक से दुख दिला रहा है ना वह दोषी है ना वो गुणवान है हमारे कर्म जब
प्रबल हो जाते हैं तो दोषी और गुणवान वो सामने हमारे कर्म प्रकट कर देते हैं जैसे वो तो पुत्र है अब हम रास्ते में जा रहे हैं अब कोई लेना देना नहीं एक आदमी आता है टक्कर मारता है लड़ने लगता है हमारी उसकी कोई दुश्मनी नहीं कोई परिचय नहीं है पर हमारा कर्म जो है ना हमको दुख देने के लिए तत्पर हुआ तो हमें गाली देने लगा पीटने लगा गलती भी उसी की गाली भी हमें को देगा तो ऐसे ही हमारे जो पूर्व के बहुत ही दुख सुख देने वाले कर्म बहुत ही मान लो वो
तो घटना घटी चला गया लेकिन पुत्र वह तो जीवन भर देगा ना सुख या दुख अच्छे कर्म हमने किए तप किया भजन किया तो देखो भगवान पुत्र रूप में आए नंद यशोदा के हां दशरथ जी कौशल्या के यहां देवकी वसुदेव जी के यहां भगवान पुत्र रूप में आए तो अगर भजन हमारा नहीं है केवल पुण्य और पाप का खेल है तो दुख और सुख देने के लिए एक ही पुत्र से दो घटनाएं हो सकती हैं उसका कभी ऐसा अनुकूल स्वभाव बन सकता है कि बहुत सुख दे और कभी ऐसा प्रतिकूल स्वभाव तो ऐसे ही हमारे
द्वारा कर्म बनते हैं तो वह कर्म हमारे पुत्र या निज सग संबंधी बनते हैं आकर और कर्म के वशीभूत को हमको दुख देते रहते हैं तो ये पक्की बात है कि दो पुत्र जैसे हैं एक से सुख मिल रहा है एक से से दुख तो दोनों में हमारे ही कर्म प्रधान है राघव सेठी जी दिल्ली से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम मराज जी राधा रानी और श्री कृष्ण हमारे मन में वास करते हैं तो उसी मन में यह व्यभिचार अहंकार क्रोध काम वासना कैसे प्रकट होती है महाराज जी मन के
दो स्वरूप है एक है जैसे कहते हैं कि यार मेरा मन बहुत गिलान से हो गया हमने ये खा लिया एक मन कहता करो एक मन कहता ना करो गंदा काम करने चलोगे तो एक मन उपदेश करेगा आपको गलत है फस जाओगे पीटो दुख पाओगे और एक मन कह रहा करो तो जैसे बुद्धि में दो वृतिया होती कुमति और सुमति कुमति सुमति सबके उर रा नाथ पुराण निगम अस काहे जहां सुमति त संपति नाना और जहां कुमति तहा विपत निदाना तो ऐसे कुमार्ग गामी मन और सुमार्ग गामी मन सुमार्ग गामी मन में भगवान का वास
है और कुमार्ग गामी मन में पाप का वास है जैसे यह रसोई है और बाथरूम है यह रसोई है और ये बाथरूम है पासी है भगवान की छाती से सामने से धर्म प्रकट हुआ और पीठ से अधर्म प्रकट हुआ अब कहा जाए कि ऐसे मन में भगवान का तो मन के दो विभाग है भगवान जहां बैठे हैं वहां से जब स् फुरित होगा तो सत्य बात आ यार हमारे मन में आया था कि यार ना करें पर हमने सुना नहीं कर दिया फस गए तो वो जो निर्मल मन है एक हिस्सा निर्मल मन है उसमें
भगवान वास करते हैं और एक में वासना वास करती है अगर हम वासना वाला हटा दे निर्वासन कर दे तो पूरा मन इंद्रिया नाम मनश्या स्म भगवान ने गीता जीने कहा इंद्रियों में मन मैं हूं पूरा मन भगवान हो जाएंगे और जब मन भगवान हो गया तो फिर अपने आप आप भगवता अंद का स्फुरण होता रहता है देखो इसी मन में कभी कितने अच्छे विचार आते हैं तो जो अच्छे विचार आते हैं इस यही विचार तो आपको यहां लाकर बैठा ले मनही तो लेकर बैठा ला और मनही गंदे आचरण करवा देता है तो मन के
दो विभाग है अच्छे विभाग वाले को आप सपोर्ट करो और बुरे विभाग वाले को आप डाटो और रोको और धीरे-धीरे पूरे मन को अच्छा कर लो यही तो साधना है निर्मल मन पूरा कर लिया तो भगवान पूरे में प्रकाशित हो गए अभी छुपे बैठे हैं मन के दो विभाग है एक गंदा मन एक अच्छा मन तो अच्छे मन को बढ़ावा देते हुए गंदे मन को धीरे-धीरे पूरा अच्छा कर ले सब काम बन जाए समझ में आ रही है बात आपकी श्रीनिवास जी दिल्ली से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोट कोटि प्रणाम महाराज जी
अद्वैत वेदांत के संदर्भ में एक प्रश्न है क्या ब्रह्मा का वृत्ति एक ही बार उदय होती है जब ज्ञान की निवृत्ति होकर ब्रह्म ज्ञान होता है अथवा बारबार उदय होती है जबन के जो उदय होती है उसका अभ्यास के द्वारा परिपक्व अवस्था लाई जाती है जैसे आपने जो वस्तु जानी दो पद्धतियां होती हैं ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने की अन्वय और व्यतिरेक व्यतिरेक पद्धति में ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या जगत में तीनों शरीर हैं स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर कारण शरीर मिथ्या है आप नहीं हो आप इनके दृष्ट हो साक्षी हो आप अपने स्वरूप की तरफ जब लौटो
ग इनको मिथ्या करते करते तो हमारा सत्य सच्चिदानंदम स्वरूप है फिर जब वहां से हम दृष्टि डालेंगे तो जिसे हम कह रहे थे मिथ्या वह भी सर्वम खल में दम ब्रह्म अन्वय है व्यतिरेक नहीं है यहां से शुरुआत होती है लेकिन स्थिति है में होती है सर्वम खलि दम ब्रह्म अब हमारे सामने जैसे हम स्वप्न देखा और जगे तो पक्का चला कि झूठा है अगर भयावह हुआ तो स्वप्न में देखा कि चोर डाकू आए मार रहे पर तो खिड़की देखी जाती जगने पर भी कि खिड़की ठीक है सब ठीक है वह जगा हुआ भी काफी
समय तक स्वप्न का प्रभाव पड़ता है समझ रहे हो ना सुखद या दुखद तो जग चुका उसे ज्ञान हो चुका है कि मैं ब्रह्म हूं पर स्वप्न का प्रभव है अभी अभ्यास में अगर नहीं रहेगा तो स्वप्न उसे बाधित करता रहेगा जगत उसे बाधित करता रहेगा वोह कच्चा ज्ञानी है आत्म ज्ञान होना और आत्म तत्व में स्थित होना दोनों अलग बात है तो ज्ञान तो एक बार हो गया लेकिन उसमें स्थित होना अब जैसे दो प्रकार का ज्ञान है एक है शास्त्री ज्ञान सत्संग से सुना हुआ या पढ़ा हुआ और एक है अनुभूत ज्ञान तो
श्रद्धावन लभते ज्ञानम श्रद्धावन को संतों के द्वारा शास्त्र के द्वारा ज्ञान प्राप्त हुआ तत्परा सतेंद्र उस ज्ञान के तत्काल परायण हुआ और अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की मन पर विजय प्राप्त की फिर ज्ञानम लब्ध उसी श्लोक में है पराम शांति ये अनुभूत ज्ञान है वो शास्त्री ज्ञान है जो श्रद्धावन लभते ज्ञानम वो शास्त्री सत्संग से प्राप्त ज्ञान है तत्परा सहित इंद्रिया अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी मैं चिंतन नहीं कर रहा हूं य अंतःकरण में चिंतन हो रहा मैं इसका दृष्टा हूं क्योंकि मेरा स्वरूप अचिंत है अंतःकरण चिंतन नहीं कर सकता अब अब
उस चिंतन का साक्षी बनकर अन्य चिंतन ना होने देना और ब्रह्मा का भगवता का वृत्ति को बढ़ाते रहना उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सब फिर जब अनुभव हो जाता है तब फिर बात आत्म ज्ञान होना और अनुभव होना जब पूज्य पाद उड़िया बाबा जी को आत्म ज्ञान के लिए विकल होता हुई तो इतनी जोर की मुमुक्षा थी कि जीना मुश्किल हो गया जैसे विरहिणी को अपने प्रीतम के ऐसे मुमुक्षु को मुक्त होने की मुमुक्षा जागृत हो जाए कहते हैं हजारों जन्मों की साधना हों के बाद कहीं मुमुक्षा जागृत होती है और हजारों साधकों में
किसी एक के जागृत होती मैं मुक्त होना मतलब सहा नहीं जा रहा रहा नहीं जा रहा विकल है वह पूज पाद उड़िया बाबा जी ने दंड भंजन करके गंगा जी में फेंक दिया कि क्या होगा इससे बहुत बड़ी मुमुक्षा जागृत तीन दिन तीन रात प्रयागराज में ऐसे जड़त शरीर रोक दिया ना लो शंका ना सोच ना भूख ना प्यास मुझे ब्रह्म बोध हो कुछ नहीं अब विचार किया गंगा में शरीर विसर्जित कर देते हैं कितनी बड़ी मुमुक्षा फिर मुमुक्षा चयन नहीं लेने दिए क्या शरीर विसर्जित करने से तत्व बोध हो जाएगा एकदम फिर उठे वहां
से एक भगवान शंकर का मंदिर गंगा किनारे था उसी में जा कैसे अ श्रद्धा पूर्वक डेहरी पर सर रख दिया और लिंग पर चरण रख दिया और मब घोर मुमुक्षा मतलब उसको तो वही जानता है जिसके अंदर जागृत होती है विकल होता के आप खानपान कुछ नहीं प्राण त्या गेंगे ऐसे अगर तत्व बोध नहीं होगा तो भगवान नर और नारायण प्रकट हुए और दो श्लोक का उपदेश किया बाबा की वाणी में दो श्लोक लिखे हैं करते ही व तो तैयार भूमि थी तत्व ज्ञान तो हो गया लेकिन बोध के लिए 18 18 घंटे पद्मासन में
बैठते एक कवल एक ग्रास केवल जैसे शास्त्र में लिखा सन्यासी को एक ग्रास तो एक ग्रास केवल दार लुटी से करके एक मुह केवल द 18 18 घंटे जो अनुभव हुआ उसी अनुभव में डूबते फिर संप्र ज्ञात समाधि के आगे असं प्रज्ञात विचक्षण समाधि जीवित ब्रह्म रूप शरीर धारी ब्रह्म स्थिति जागृत हो गई अब जो स्थिति आ गई तो एकदम खुला जीवन क्योंकि नहीं स्वात्मा रामम विषय मृग तृष्णा भ्रम ति एक बार जब पता चल गया कि रस्सी है सांप नहीं है तो गले में डाले घूमो कोई भय का विषय नहीं है और दूर से
जब तक रस्सी को सांप देख रहे हैं तब तक भवा तो है ही ज्ञान की टर्च पड़ी तो लगा अरे हंस दिया के रे ये तो रस्सी थी हम इसे साफ समझ रहे थे ऐसे ही मृत्यु का भय शोख चिंता दुख उद्वेग भय ये सब नष्ट हो जाते हैं जहां ब्रह्म बोध हुआ पर अभ्यास आजीवन अभ्यास आजीवन अभ्यास बाबा कहीं भी बैठते पद्मासन लगा कर के ऐसे स्वरूप में बैठे हैं तो यह है एक बार स् फुरित हुआ उससे काम चलेगा नहीं जैसे हम जग गए पर बढ़िया स्वप्न हुआ तो उसी में डूबे जग गए
झूठा भी है पर हम उसमें डूबे हैं भयावह है तो भय लग रहा है जगने के बाद भी ऐसे हीय ज्ञान होने के बाद भी काफी देर तक संसार स्वप्न का प्रभाव रहता है अगर ब्रह्म बोध नहीं हुआ तो आत्मज्ञान होने मात्र से काम नहीं चलेगा वस्तु को जान लिया लेकिन बोध नहीं हुआ अनुभव में नहीं आया तदा का नहीं हुए तो फिर बात नहीं बनी आत्मज्ञान बहुत अमृत है गुरु प्रसाद से प्राप्त होता है पर वो सतत प्रयत्नशील साधन में प्रयत्नशील साधन में शिथिलता बाबा कहते थे अगर आत्मज्ञान हो भी गया है तो बोध
तक नहीं पहुंच पाएगा तृप्ति नहीं हो पाएगी आत्म रति नहीं हो पाएगी आत्म वान नहीं बन पाएगा आत्म निष्ठा जागृत नहीं होगी आत्मज्ञानी तो हजारों मिल सकते हैं जो आत्मज्ञान का लेकिन आत्म बोध एक बार पूज्य पाद उड़िया बाबा जी महाराज गंगा किनारे भ्रमण कर रहे थे तो कानपुर के आगे ब्रह्मावर्त बिठूर है तो वहां एक आत्मज्ञान वशिष्ठ योग वशिष्ट का प्रवचन कर रहे थे बहुत सुंदर निर्णायाम बाबा बड़े प्रभावित हुए तीन दिन रह कर के सुना और इसके बाद एकांत में उनसे मिले तो उन्होंने खड़े होकर साष्टांग दंडवत किया क्योंकि सन्यास वेश तो उन्होने
कहा पंडित जी आप ऐसा आत्मज्ञान का वर्णन करते हैं बिल्कुल नीर शर का विवेक आपके अंदर है आप सची बताना कि आपको तत्व बोध हुआ है उनका आप हमारे आश्रम गुरु है आपसे हम झूठ नहीं बोलेंगे ये हमारा पांडित्य है ना कि तत्व बोध है बाबा ने कहा बहुत सुंदर तुम सत्य बोले बहुत सुंदर तब बाबा कह रहे थे कि हम आश्चर्य चकित थे उनके तत्व ज्ञान का वर्णन करने की शैली से लेकिन वो भी तत्व बोध संपन्न नहीं थे तो बाबा ने कहा तत्व ज्ञान का इसीलिए उपनिषद कहता है नायम आत्मा प्रवचने न लभ
ना मे धया ना बहुना सुरते न आत्म बोध जो है वह बहुत प्रवचन कर रहा है इसका मतलब थोड़ी कि आत्म बोध हो गया है बहुत बुद्धिमान है इसका मतलब थोड़ी आत्म बोध हो चुका है बहुत सुन रहा है इसका मतलब जिसे आत्मा वर्ण करती है अर्थात जो गुरुदेव कृपा करें मोक्ष मूलम गुरु कृपा गुरु कृपा से तत्व बोध हो जाता है और तत्व बोध जिसको हो गया फिर उसी में रमण करें जब सत्य वस्तु जान ली तो उसी में रमण करें अगर वो उसमें रमण नहीं करता तो जान लेने मात्र से भय दूर नहीं
होगा जान लेने मात्र बहुत तत्व ज्ञान की वार्ता करके हम चाहेंगे इंद्रिय विलासिता ही भाई हलुवा बनाने की पूरी प्रक्रिया जान गए आप लेकिन कभी बना के खाया नहीं तो मामला क्या हुआ फिर परिणाम तो और खाया है तो आपका रोम रोम बताएगा हलवा खाके आए हो जब आप हलुवा का वर्णन करोगे ना तो चूंकि स्वाद लिए हो ना तो रोम रोम से व स्वाद प्रकट होगा तो ब्रह्म ज्ञान की चर्चा केवल कर लेना और ब्रह्मा अभूतपूर्व के सारे भोग उपस्थित होने पर भी हमारा मन चलायमान ना हो तब तो बोध हुआ है नहीं तो
केवल आत्म ज्ञान की चर्चा मात्र होती है बोध बात बहुत अलग बोध जिन महापुरुषों को हुआ वो शरीर भाव रहित हो गए देहा तीत स्थिति है आत्मज्ञान है नहीं और देह की विलासिता में यदि फसे तो हमने गंगा किनारे एक से एक ब्रह्म बुध संपन्न महापुरुषों का दर्शन 20 वर्ष वही गंगा किनारे भ्रमण किए ना तो एक से एक अवधूत शिरोमणि हा नंग धड़ंग कोई होश नहीं शरीर का ब्रह्मा काकार वृत्ति में डूबे हुए हैं अब जब जान लिया ये मिथ्या है तो इसका क्या है इसका और काशी में देखते थे कि उनको लोग पागल
समझकर कुल्लड़ मार रहे हैं से कर कोई उससे मतलब नहीं और जब गंगा किनारे एकांत मिलते वार्ता करते तो अमृत त पकता उनकी वाणी और बाहर पागलो जैसी चेष्टा और शास्त्र भी आदेश करता है कि बड़ा धीमान होकर के भी जड़ वत व्यवहार करें जड़ वत पागल वत बाल वत ऐसा रहे कि संसार जान ना पावे तो जो ब्रह्म तत्व का हमें ज्ञान हुआ उसी में रमण करे तब तो ब्रह्मा भूति एक बार जरा सा स्फुरद हुआ तो फिर वो जो ज्ञानिक चित अप रई बियाई विमोह बस करे माया का इतना प्रचंड स्वरूप है जो
बड़े-बड़े ज्ञानियों को बोध संपन्न को नहीं ज्ञानियों के भी चित्त का अपरण करके और माया में आकर्षित कर दे ऐसी देवी माया है भगवती माया ऐसी प्रचंड है हा बहुत विचित्र माया भगवान की है देखो कैसे फसाते तुम्हें उदाहरण बताए भ्रमण करते थे अब बचपन से है इसी मार्ग में बहुत प्रवीण बुद्धि थी हर घटना को हर बात को घुस करके दिमाग में उस पर बैठना चिंतन करना ऐसा कैसे हो गया ऐसा एक महात्मा दिन में नहर में दिगंबर रहते थे नहर में घुसकर इतना गंगा नहर में और भजन करते थे धीरे-धीरे लोग दंडवत प्रणाम
ऐसे रात्रि में बाहर निकलते थे जंगल था नहर थी अगर कोई दे दिया तो भोजन पाया दिन में गंगा जी गंगा की जो नहर थी उसमें रहते थे अब लोगों का धीरे-धीरे प्रभाव यश बढ़ना शुरू हुआ तो आसपास के गांव के लोग आने लगे टिफिन ले लेकर तो एक टिफिन लेते और फिर क्रम बंद गया कि तुम्हारा अमुक दिन तुम्हारा अमुक दिन कहां भागवती आकाश वृत्ति में और कहां टिपन वृत्ति में साधु को देखते रहना चाहिए कि मेरी निष्ठा गिर रही है कि उठ रही है अब टिपन महीना दो महीना चार महीना तो जो टिपन
में अच्छा तो प्रियता बढ़ने लगती है ना क्योंकि बोध नहीं हुआ तो इंद्रियां घसीट लेंगी तो अब जो मान लो अच्छे खाते पीते लोग तो खीर पुआ ये वो गुलगुला सब अब स्वामी जी जवान थे तोब उनसे कहा स्वामी जी घर की माताएं बहने भी दर्शन करना चाहती हैं अगर एक गमछा लगा लो चलो भाई आप लोग कहते आप लोगों कहने से क्या है अगर दिगंबर वृत्ति लिए हो तो फिर दिगंबर ही वृत्ति है चाहे ब्रह्मा भी कहे वृत्ति वृत्ति होती ना अंबर धारण करना या दिगंबर दिगंबर मतलब जिसकी दिशाएं ही वस्त्र है दिशाए ही
वस्त्र है अर्थात वस्त्रहीन अब अंगोछा धारण करके बाहर आने लगे उपदेश शुरू हुए साल दो साल जो समय लगा फिर उनमें प्रार्थना स्वामी जी गृहस्थ के अगर घर आप जैसे महापुरुष के चरण नहीं पड़े तो स्मशान समझो आप घर स्वामी जी घर जाने लगे कहां नहर में खड़े दिन भर बजल करते थे वृति यह घटना है आपको बता रहे हैं वो स्वयं को मिले वो स्वयं पीटने के बाद पीटने के बाद अब वो धीरे-धीरे घर अब फिर वहां लोग स्वामी जी प्रसाद पाके फिर दू धूप में तो यही आराम कर ले अब स्वामी जी आराम
देखो गृहस्थ लोग अपने जगह ठीक है लेकिन साधु को य ध्यान रखना चाहिए कि हमारा मार्ग क्या है अगर उनकी सियाओं पर शयन करोगे तो उसमें परमाणु है गृहस्थ के और फिर अगर ठिकाने पर नहीं लगे हो तो भ्रष्ट हो जाओगे पक्का भ्रष्ट हो जाओगे गृहस्थ के घर में प्रसाद पाले बहुते बहुत गांव बाहर मंदिर देवालय बने व वहां या उस गृहस्थ का कोई जहां जानवर बंधते हो ऐसी जगह रहे गृहस्थ की सहिया में ऐसे विरक्त के लिए निषेध किया गया है कभी ऐसा संयोग पड़े तो अपना वस्त्र बिछा कर ले उनके वस्त्र हटा के
एक तो भगवान से प्रार्थना करें कि विरक्ति में संयोग ऐसा ना पड़े गृहस्थी से केवल भिक्षा और शिक्षा का संबंध रखे अब नर भूल गए आना वही रहने लगे अच्छा गृहस्थ की क्या होती है कोई कोई ऐसे श्रद्धावन होते हैं कि पूछो मत एकदम मतलब भगवान संतों को समझते हैं हमने देखा है एक तो अपना कर्तव्य क्या है जितनी ऊंची उनकी श्रद्धा है उतना ही हमारा त्याग जोर का होना चाहिए कि उनकी श्रद्धा में फर्क ना पड़े पर अगर हमारी स्थिति नहीं है तो कुसंग से हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी कोन कुसंगति पाय न साई
रा न नीच मते चतुराई अब वही रहने लगे 10 द दिन अब घर में सुबह दोपहर शाम भोजन फिर उपदेश बातचीत हसना जो प्रधान उनमें गांव के थे वह बहुत श्रद्धा करते थे तो गांव में राम लीला थी तो राम लीला में सब लोग एकत्रित होते हैं स्वामी जी वहीं थे और उन्हीं के घर में टिके थे नई बहू थी स्वामी जी का हसी खेल बातचीत से नई बहू का भाव अब केवल बहू स्वामी जी स्वामी जी दरवाजे पर तखत और जब स्वामी जी ने देखा उनका भाव पहले से जैसा भी हो वो अब जो
घर का मालिक था उसके दिमाग में गलत भावना से नहीं इस ना से लगा कि एक बार मुझे राउंड मारा आना चाहिए क्योंकि पूरा गांव रामलीला में है वह जब गए तो तखत खाली तो उन्होंने कहा स्वामी जी चले गए क्या बड़ा अंदर उनको छोभ हुआ लेकिन अंदर आवाज आ रही थी तो उका लड़का तो रामलीला में है बह से कौन बात कर रहा है दरवाजा खटखटाया पर खुला नहीं तो माइक से जाकर राम लीला में कहते भैया हमारे घर में बदमाश आ गए व प्रवीण बुद्धि के थे उनका बदमाश आग अब सैकड़ों आदमी टूट
पड़ा अब दरवाजा जब खुलवाया गया तो स्वामी जी और बहू इतने जूता चले होंगे क्या वही जानते होंगे जितनी श्रद्धा बहुत बच के रहे टिपन के साथ और कुछ भी आएगा फिर वो भागे बचाए लोग उनको ब्रह्मावर्त बिठूर में मिलकर अपनी कहानी बताते क्योंकि हम नई अवस्था के थे तब बा स्टेज 24 की तब वो हमारे लिए बताए थे कि भाई बच के बच के चलना क्योंकि ये मार्ग ऐसा है तो क्या उनको तत्व ज्ञान नहीं था कि आत्म ज्ञान अरे जो शरीर का इतना राग त्याग कर खड़े पर बोध नहीं था तो माया ने
गिरा दिया इसी तीन खाए हैं कंचन कामिनी कीर्ति कंचन से बचा तो कामिनी कामिनी से बचा तो नाम कीर्ति यस अगर इसमें लिप्त हो गया तो भी बोध र ऐसे थोड़ी कि तुम साधन करो बोध हो गया परीक्षाएं भी हैं विघ्न भी है अगर गुरुजनों का कृपा प्रसाद प्राप्त है आप शास्त्र के आज्ञा के अनुसार चलोगे तो कोई तुम्हें भ्रष्ट नहीं कर सकता जब हम गुरु और शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं तब हम भ्रष्ट हो जाते हैं अन्यथा माया ऐसे अटैक नहीं करती शास्त्र आज्ञा का उल्लंघन किया त आप मारे जाओगे तो अब
जो तत्व ज्ञान का स्फुरण हो उसका अभ्यास वैराग्य पुष्ट दृढ़ वैराग्य नहीं तो फिर ज्ञान वो केवल बकवास रह जाता है बकवास का मतलब वाणी का विषय और वाणी का विषय ज्ञान नहीं है वो मनवाणी से अगोचर तत्व है वो स्वयं से स्वयं को जाना जाता है वो बुद्धि से नहीं जाना जाता बुद्धि से जो जानने का विषय आता है वो सब प्रकृति होती है परमात्मा नहीं होता है समझ पाया अब चूंकि प्रसंग ऐसा था कि उसको इतने विस्तार से समझाने के लिए कि क्या मान लो केवल ऐसा कि मैं ब्रह्म हूं तो इतने से
काम नहीं चलेगा माया पहले देखेगी तुम्हें ठोक बजा के तुम कितने ब्रह्म हो क्योंकि ब्रह्म निष्काम पूर्ण का माप्त काम अब आपके अंदर कोई कामना नहीं आनी चाहिए हर विषय का संयोग होने पर भी यहां तक कि खाते हुए पीते हुए चलते हुए भोगते हुए भी आपने नहीं खाया नहीं पिया नहीं देखा नहीं भोगा यह यह स्थिति ब्रह्म बध की होती है तो फिर जाए चंदन लगाया जाए माथे पर चाहे जूता चलाया जाए दोनों में समान स्थिति होती है ज्ञानी की इसी शरीर पर वरता होने पर तो है बहुत ऊंची स्थिति तो उसी का इसलिए
भूमिका से बताया कि हां ना में तो बात नहीं बनेगी उसको समझो कि कैसा अभ्यास होना चाहिए अगर अभ्यास चूका तो ऐसे ऐसे ज्ञानियों को भी मुकी खवा दिया माया बहुत विचित्र है केवल ज्ञान से काम नहीं चलेगा इसीलिए सनका हर समय जपते रहते हरि शरणम हरि शरणम हरि शरण हरि वही बचाते हाका तुम्हारा ज्ञान जो है एक मिनट में माया अपनी चका चौन में बुलवा दे लेकिन जिनको बोध हो चुका है खत्म जैसे भुने हुए चने पर दोबारा हा चा जितना खाद पानी लगा अंकुरण नहीं होगा ऐसे तत्व ज्ञानी के हृदय में विषय स्
पुरणा नहीं हो सकता जैसे लोग कहते हैं हमारे पास समय नहीं हम कह 24 घंटे में 18 घंटे आप काम करो इससे ज्यादा तो नहीं कर पाओगे ना 18 घंटे कोई काम नहीं कर सकता हमें लगता है क्यों कोई भी नहीं काम कर सकता है 12 घंटे बहुत बहुत समझ लो पर चलो दो भी भाग कर लो 24 घंटे होते हैं 12 घंटे पढ़ाई लिखाई काम काज जो आप कर रहे हो छ घंटे सोने के समझ लीजिए कितने बचे छ घंटे इसमें दो घंटे ले लो खानपान विभाग सब फिर कितने बचे चार घंटे में अगर
जो मनोरंजन इधर-उधर समय बर्बाद करते हो वह अगर शास्त्र स्वाध्याय और नाम जप में लगा दो तो बहुत बड़ी उन्नति हो जाए 24 घंटे में 20 घंटे आपके चार घंटे अध्यात्म में दे दो शास्त्रों का स्वाध्याय नाम जप धर्म के कार्य करना मंदिर जाना जो भी जैसा चार घंटे भक्ति कर ले बहुत ज्यादा चलो सब छोड़ो 24 घंटे में 24 मिनट दे दो 24 मिनट 24 मिनट केवल एकाग्र होकर के चाहे वो शास्त्र स्वाध्याय में नाम जप में दे तो फिर आप आप देखो आपकी दिनचर्या में प्रकाश आने लगेगा आपकी बुद्धि प्रकाशित होने लगेगी व
जैसे थोड़ा शास्त्र स्वाध्याय करो तब वार्ता करने में आनंद आवे ना अब हम बंबई की वार्ता करें हमको एक गली का भी पता नहीं तो फिर परेशानी हो जाएगी ना बताने वाले को कि आप अमुक जगह गए बोले नहीं अमुक जगह बोले नहीं तो हम फिर आपको बताए तो कैसे बताए तो हम जिस विषय को जानना चाहे पहले उस विषय में घुसे और उसके कुछ पॉइंट तो जाने फिर अंदर की बात हम किसी से पूछ सकते हैं संत महात्मा से जब चर्चा करेंगे तो हमको आनंद आने लगेगा क्योंकि हम पढ़े हैं हम उस बात को
समझना चाहते हैं अभी-अभी तो परमार्थ से ठीक है तो कोई ना कोई ग्रंथ आप पढ़िए तो हम एक ग्रंथ का नाम ले आप उसे पढ़ के पूरा फिर हमें बताओ साधक संजीवनी गीता पृष्ठ से आती है और पूज्य श्री स्वामी राम सुख दास जी की लिखी हुई है इतनी मोटी है तो एक भी श्लोक गीता का अर्थ सहित पढ़ो उसको धीरे-धीरे एक बार पढ़ जाओ तो आप देखोगे एक बार पढ़ने आपकी बुद्धि कितनी पवित्र हो गई फिर जब चर्चा करोगे तो आनंद आने लगेगा आपका ठीक है आप जरूर लाना बच्चा क्योंकि नए बच्चे हो ना
और अगर थोड़ा धर्म में चलोगे तो आगे चलकर धर्मात्मा पुरुष बन सकते हो कि अगर यह ठान लेना तो हमारे भारत को सुधरने में देर ना लगे यह नशा ना करें ये बे विचार ना करें यह धर्म पूर्वक चलने लगे तो यह चलेंगे तो इनके चार दोस्त इनका अनु अनुकरण करने लगे तो फिर पांच का 10 अनुकरण करने ऐसे बन जाएगा हजारों बच्चे हैं जिन्होंने गंदी आदत छोड़ दी सत्संग सुनके हजारों लोग हैं ऐसे जो यहीं आके बोले कि हम सब नशा छोड़ दिए गंदी बातें छोड़ दी अच्छे से चल रहे हैं तो आप तो
अच्छे है ही हो कोई नशा तो करते नहीं क्योंकि चेहरा बता रहा है आपका तो आप शास्त्र स्वाध्याय करने तो आपको आध्यात्म का ज्ञान होने लगेगा ठीक है आप सभी पितांबरी दवार से आप सभी विरक्त भाव से ही चल रहे हैं मराज जी आप सभी साधकों के लिए आपके मार्गदर्शन महाराज जी इस मार्ग में चल पड़े हैं विरक्ति के तो किन किन सावधानियों का ध्यान रखें कैसे सबसे पहली बात जैसे मकान की न्यू मजबूत हो तो मकान बहुत अच्छा होता है ऐसे ब्रह्मचर्य चाहे स्त्री शरीर हो चाहे पुरुष शरीर हो यदि वह निवृत्ति मार्ग में
जाता है प्रवृत्ति मार्ग गृहस्थ है इस वस्त्र का प्रतीक है कि आप सब निवृत्ति मार्ग परायण है मतलब गृहस्थ में अब नहीं जाना है तो इसमें ये नियम ले लेना है कि शरीर भले छूट जाए ब्रह्मचर्य नहीं टूटेगा अगर यह नीव पक्की है तो फिर जो परमार्थ के ऊपर की वृत्तियां वो अपने आप आ जाएंगे परमार्थ में रसेंद्र और जने इंद्री वैसे तो दश इंद्रियों को काबू में किया जाता है पर द में प्रधान है रसेंद्र और जनदरी इन दो ने पूरे विश्व को गुलाम बना रखा है रसेंद्र और जन इंद्रिय ज्ञान की बातें चाहे
जितना कोई करे वैराग्य की बातें करें लेकिन दो इंद्रियां अच्छा-अच्छा खाने की जो प्रवृत्ति है और विषय भोगने की आकांक्षा इस सबके चराचर हृदय में होती है साधु भगवत मार्ग का पथिक इन्हीं इंद्रियों को काबू में करता है जिसका भोजन सरस है उसका भजन नीरस होगा और जिसका भोजन नीरस है उसका भजन सरस होगा और जिसका भजन सरस होगा वही अध्यात्म में प्रारंभ से लेकर अंत तक टिकेगा नहीं बीच में ऐसे माया प्रलोभन भेजेगी जिनमें भ्रष्ट हो जाता है साधक भ्रष्ट हो गया तो बस एक बैलेंस बना के कोलू के बैल की तरह एक दिनचर्या
कोई परमानंद का अनुभव नहीं दिव्यानंद का अनुभव नहीं अभी एक माता जी आई थी तुम लोग शायद परिचित ना हो गीता वाटिका गोरखपुर बाईजी श्री हनुमान प्रसाद पोतदार पूज्य श्री राधा बाबा के परिकर के 85 वर्ष के थे ही ऐसे करके उन्होंने हाथ स्पर्श किया ऐसा लगा कि जैसे परमानंद का करंट मारा हो कांप रही थी ऐसे नाम जब 85 वर्ष की थी नाम ज बाल ब्रह्मचारिणी एक दृष्टि होती भागवत भागवत दृष्टि से देखा तो चंडिका के समान थी देवी भगवती अंबा के समान पवित्र तो अब जब कदम रख दिया परमार्थ में तो आप किसी
भी तरह अपने ब्रह्मचर्य केहान होने दे और ब्रह्मचर्य पुष्ट रखने के लिए आहार सात्विक और कुछ समय 10 15 20 मिनट व्यायाम और फिर प्राणायाम प्राण संयम अत्यंत आवश्यक प्राणायाम का उधर तो ज्ञान करा ही दिया जाता है इसके बाद व्यवहार में परमार्थ को उतारना जो हमारा व्यवहार है वह परमार्थ में हो हमारे में इतनी शांति होनी चाहिए क्योंकि हम शांति मार्ग के पथिक हैं कि किसी के द्वारा किया हुआ अपमान निंदा या कोई भी प्रतिकूल व्यवहार जो हमारे मन को रोष पैदा करे क्रोध पैदा करे हमें शांत रहना है हमारे मन में किसी भी
तरह का द्वंद हमको उद्वेग ना कर पावे शांति अ व्यर्थ कालम विरक्ति मान शून्यता जो वैराग्य वान महापुरुष है वह पहले शांति धारण करता भगवान का स्वरूप वर्णन जब किया जाता है ना तो शांताकारम लेकिन शयन किस पर क रहे हैं कर रहे हैं भुजग सयम शेष पर्यंत सया है ना भगवान कैसे हैं बोले इतनी प्रीत स्थिति भगवान शेष जी हजार फण से सैया बने हुए हैं और सरकार शांत भाव से शांता कम और उपासना मार्ग में सबसे पहला भाव है शांत भाव शांत भाव दास भाव सख्य भाव वात्सल्य भाव गोपी भाव सचर ऐसे प्रेम
की स्थितियों के भाव है तो पहला सूत्र शांति शांति उसे कहते हैं कि कोई भी द्वंद जैसे मान है जब उसे हम स्वीकार करते हैं तो हरष रूपी द दोष पैदा हो जाता है अपमान है अगर उसे स्वीकार करते हैं तो शोक रूपी दोष पैदा हो जाता है हमारे जीवन में यह घटनाएं घट हम वैराग्य मार्ग में चल रहे हैं तो परस्पर हो सकता है आपस ही में कोई ऋषिया करने लगे आपस में आपको कोई उद्वेग करने लगे तो आपको अशांत नहीं होना यह ध्यान रखना है भगवत प्राप्ति करनी है तो हमारा जीवन किसी के
दिखावे के लिए नहीं है हमारा जीवन परमात्मा प्राप्ति के लिए है तो शांति कोई भी द्वंद में अशांत ना कर पाए शांति अव्य काल तोव एक मिनट भी भगवत चिंतन नहीं छूटना चाहिए जो नाम जप नहीं करता है वह इस भेष को ढोंग में भले उतार दे वह इस भेष का लाभ नहीं ले सकता नाम जप जो तुम्हें प्रिय हो राम कृष्ण हरि जो नाम प्रिय हो या गुरु ने जो नाम दिया हो बड़े-बड़े योगी मुनियों के चित्त वृति को बलात अपरत करके माया आकर्षित कर लेती है अगर हर समय हमारा भगवत चिंतन चल है
अ व्यर्थ कालम एक मिनट भी व्यर्थ नहीं होने देना अंदर से नाम चल रहा है श्वास शवास कई कई नाम हम जप रहे हैं मंत्र जप रहे हैं अगर जप नहीं है तो हमारी बात लिख लेना जीवन कलय अशांति में खोखा हो जाएगा और नाम जब चल रहा है तो तुम्हें सब कोई छोड़ दे तो भी तुम महान बल से युक्त होगी और लगेगा भगवान मेरे साथ जैसे मीरा जी के साथ कितनी प्रतिकूलता हो रही पर एक लक्ष्य है मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरों ना कोई बाल बांका भी नहीं कर पाया पूरा विश्व में उनकी
जयति जयती हुई जय जय हुई तो आप लोग नाम जब करती हैं बराबर अभ्यास निरंतर चलता रहे हमें बात करने का अवसर ना मिले जब बात करना लगे तो ऐसा लगे कि मानो हमको दंड दिया गया है क्योंकि हमारा नाम छूट रहा है अंदर ही अंदर ही अंदर चित्तवृत्ति से प्रभु के नाम में प्रभु के मंत्र में और वो भी ऐसे जपे जैसे हम राधा जपते हैं तो सामने हमारे लिखा हुआ है राधा मन से हम बार-बार राधा राधा लिखते हैं और अंदर से पुकारते हैं राधा राधा और अंदर के ही कानों से सुनते हैं
राधा राधा चाहे आंख बंद हो चाहे आंख खुली हो हर समय नाम में पकड़ लेना हमारी बात जीवन धन्य हो जाएगा अगर वृंदावन आए हो अपना चिंतन न छूटने पावे तुम्हें कोई छोड़ सकता है स्वार्थ की पूर्ति जहां नहीं होती ध्यान रखना वहां कोई तुम्हें प्यार नहीं करता करेगा जहां स्वार्थ की पूर्ति होती है और गुणवान होता है उसे सबको ही प्यार करना क्योंकि स्वार्थ की पूर्ति हो रही नहीं तो इस जगत में कोई किसी से प्यार नहीं करता कभी किसी के भरोसे मत रहो वैराग्य लिया है तो भगवान का इतना दृढ़ भरोसा करो कि
तुम्हें सब छोड़ दे तो भी तुम भेस ना छोड़ो और अपना उद्देश्य ना छोड़ो भगवान तुम्हारे साथ है यह तब होगा जब अव्य काल त्वम निरंतर नाम जपने का अभ्यास करेंगे और विरक्ति ये हमें ध्यान रखना है कि जो संसार सुखों में लगा हुआ उसी का हम त्याग किए इसीलिए हम वैरागी कह जाते हैं वैराग्य का मतलब यही है कि संसार जिन भोगों में सुख प्राप्त कर रहा है उनसे हम पूरा उल्टा है जैसे संसार को चाहिए कि कोई अपना तो होना चाहिए और हमें कि हमारे जीवन में कोई अपना नहीं होना चाहिए संसार के
थोड़ा तो हमारा मान सम्मान हो हमें सम्मानम कल्या घोर गलम नीचा अप मानम सुदा अगर हमें सम्मान मिलता है तो उसे हम विष के समान समझे और अपमान मिलता है तो अमृत के समान समझे हमारा मार्ग उल्टा है हम वैरागी हैं और वह रागी हैं उनसे बिल्कुल उल्टा हमारा मार्ग है तो हमारे जीवन में यह बात सामने रहनी चाहिए कि हम विरक्त हैं हमारा खानपान उठना बैठना यह विरक्त मार्ग के पथिकोंडा उनका कैसा जीवन विरक्ति और मान शून्यता कभी मान को स्वीकार ना करें मान को स्वीकार करने से देया अभिमान पुष्ट होता है गीता जी
के 15 अध्याय में लिखा हुआ है जो जीवन मुक्त महापुरुष होता कैसा होता है बोले निर्माण अमोहा जित संग दोष अध्यात्म नित्या विवृत कामा द्वंद विमुक्ताए अब जैसे हमें श्लोक तो याद है लेकिन इसका शब्द हमारे हृदय में स्थिति आ जाए निर्माण किसी भी तरह की मान प्रवृत्ति में हमारा कोई भी हर्ष नहीं होना चाहिए वृत्ति में अमोहा किसी से मोह नहीं किसी के संग का कोई प्रभाव नहीं जित संग दोषा हमारा जो लक्ष्य है उस पर कोई बदलने वाला नहीं चाहे जितना कोई हमें समझावे चाहे जितना भोग सामाग्री सामने आ जाए चाहे हमारे साथ
भोग सामग्री रखी हो हमारा मन विचलित नहीं होना चाहिए जित संग दोषा क्यों क्योंकि व आत्म स्वरूप का ज्ञानी है अध्यात्म नित्या और विवृत कामा समस्त कामनाओं का त्यागी द्वंद भी मुक्ता कोई भी द्वंद मान सम्मान लाभ हानि सुख दुख जय पराजय ये उस साधु के हृदय पर प्रभाव नहीं डालती क्यों क्योंकि सुख दुख में समान भाव है बोले ऐसा परम पद अव्य पद का अधिकारी होता है आशा बंधा दृढ़ आशा करो इसी जन्म में मुझे भगवत प्राप्ति हो नहीं इस भेष का मतलब क्या रहा इस भेष का तो मतलब है ब्रह्म साक्षात्कार भगवत प्राप्ति
आशा बंदा दृढ़ आशा रखो इसी जन्म में भगवान की प्राप्ति हो सम उत्कंठा नाम गाने सदा रचि उत्कंठा के साथ भगवान का यश गान करना भगवान की लीला गुणों का गायन करना भगवान के दिव्य दिव्य बातें एकांत में बैठकर चिंतन करना यह बड़े-बड़े परमहंस करते रहे अपने लोग तो क्या है अगर भगवान के चरित्र नहीं सुनते भगवान का चिंतन नहीं करते देखो सनका दि हर समय जपते रहते हरि शरणम हरि शरणम अगर आप चिंतन नहीं करेंगे तो खाली हृदय मन शैतान है कहीं ना कहीं वह आपको फसा देगा अंदर की वृत्ति किसी न किसी राग
में या द्वेष में फस जाएगी व्यक्ति मान शून्यता आसा बंदा समुद कंठा नाम गाने सदा आसक्ति स् तद गुणा ने भगवान की चर्चा सुनने के लिए ऐसा व्याकुल होना चाहिए जैसे नशेबाज को अफीम च को अफीम समय पर ना मिले तो व्याकुल हो जाएगा ऐसे ही सनका दि है चार हैं एक प्रवक्ता बन जाता है तीन श्रोता बन जाते हैं सनक सनन सनातन सनत कुमार अब इतने लोग आप हैं एकांत में बैठे कोई भगवान की मधुर चर्चा कर रहे हैं तो कोई सुन रहे हैं कभी वो कर रहे तो हम सुन रहे हैं आसक्ति तद
गुणा ने भगवत चर्चा करने में आसक्ति होनी चाहिए देखो परमहंस सुखदेव जी श्रीमद् भागवत की चर्चा कर रहे हैं ना बड़े-बड़े योगी महापुरुष चित्त को भगवान में लगाकर जब गुणगान करते हैं तो जो परमानंद मिलता है वो बड़ी-बड़ी साधना में नहीं मिलता और आखिरी जो बात है भगवान की लीला थलियों में वास करना स तो मिला ही है मान लो हरिद्वार भी है तो भगवत स्वरूप ही है परम पवित्र ही है उत्तराखंड तो भगवान का परम पावन क्षेत्र है ही अगर कभी-कभी अवसर मिले तो लीला स्थली जैसे वृंदावन है अवधपुरी है ऐसे ऐसे कभी सामूहिक
यात्रा की और भगवान की लीला स्थली हों के दर्शन किए इस तरह हमारा जीवन परम पवित्र भगवत चिंतन परायण संग दोष रहित और अर्थ आदि की चाह ना रह जाना तीन ही दोष हैं जो हमको गिरा सकते हैं पहला है रूपए की चाह कंचन हम कितना अथ बैक बैलेंस कर ले वासना अगर है तो विरक्ति ढोंग है फिर कुछ नहीं दूसरा शरीर सुख की आकांक्षा जिसे कामनी कहते कंचन कामिनी और कीर्ति तो जैसे स्त्री शरीर तो उसके लिए पुरुष आकर्षण से बिल्कुल बचना चाहिए सांसारिक सुख के लिए वैराग्य नहीं लेना चाहिए वैराग्य का मतलब है
कि जिसके हम आश्रित है तो फिर वह भी घोर वैरागी होना चाहिए और हमारा शोषण ना करे अगर शोषण करे तो सिंघ वत हो जाए हमारी बात समझ कहीं भी रहो सिंघ वत रहो सिंह की तरह रहो भगवान और कानून दोनों हैं दोनों है समर्थ भगवान का आश्रय और प्रकट में अगर कोई आवश्यकता पड़े तो कानून का आश्रय लेकिन अपने जीवन को परम पवित्र रखना चाहिए अपवित्र आचरण जीवन में ना होने पावे और खूब नाम जप करो और भगवान से प्रार्थना करो कि इसी जन्म में मिल जाओ या तत्व बोध हो जाए तो जीवन सार्थक
हो जाओ मैं बहुत खुशी है जैसे आप लोग ऐसे सब नवीन अवस्था में बहुत बहुत खुशी पर पवित्रता झुकना नहीं टूटना नहीं अकेले रहे हैं टूटने का जब अवसर आया है तो हमें भागवती कृपा बल मिला है सावधान तुम्हारी जिंदगी का लक्ष्य क्या है तब जाकर के जो बात समझ में भगवान की कृपा से कोई तुम्हारा सहयोगी नहीं है हरि गुरु ही हमारे सहयोगी हैं और गुरु वो जो विषय छोड़ा वे गुरु वो जो साध सेवा आवे गुरु वो जो तत्व बोध करावे गुरु वो जो संसार के भोगों से हमें बचाकर भगवान में लगा दे
कोई भी हो कहीं भी हो सिंघ वत रहना भजन करना भगवान तुम्हारे साथ है कभी भी कहीं ऐसा हो तो प्रश्न तुरंत करें जब सिंघ वत रहोगी तो औरों को भी संभाल लोगी आप देवी हो और खुद परम पद के अधिकार नहीं बनोगी आई हो तो हमारी यही प्रार्थना सच्चे बनो और भगवान को प्राप्त करो राधे राधे जी मैं मैं बालकृष्ण गुरुस्वामी हूं विश्व में गाय का महत्व बताने वाले एक ही एक पहला शास्त्रज्ञ श्री कृष्ण भगवान है महाराज मेरा नाम बाल कृष्णा है मैं तेलंगाना राज से हूं मैं अभी तक 22000 किलोमीटर तक पैदल
यात्रा करा कि गाय को बचाने के लिए मेरा प्रश्न है आप यज्ञ यागा कृत सब करते बहुत से स्वामी जी है सब यह करने को बहुत से स्वामी जी है स्वामी अगर गाय नहीं है तो यज्ञ यागा कत कैसे कर सकते कैसे हो जाएगा बिल्कुल बक पूरा देश भर में मैं ज पैदल जल रहा हूं जी पूरा जरसी गाय कहीं भी देसी गाय नस्ले नहीं है यह बात मैं अमित शाह जी को भी बताया था हां अभी आपने देखा नहीं है लाखों गाय हमारे ब्रज मंडल में है देसी लाखों गाय हैं पूज्य रमेश बाबा कई
ऐसे महान संत है पूज्य श्री गुरु शरणानंद जी लाखों गायों का पालन पोषण हो रहा है हम आपका बहुत ही वंदन करते हैं कि आप हमारे धर्म के मूल गौ के प्रति इतनी श्रद्धा इतना पूर्ण समर्पण कर रहे हैं और यह बात सबको समझनी चाहिए कि हमारा धर्म प्रिय देश है हमारा जो देश भारत देश है यह शास्त्रों में बहुत वंदनीय धर्म प्रिय देश है और धर्म का मूल गाय है हमारे यहां धर्म का मूल गौ माता है ये साक्षात यहां से नहीं ऊपर के लों में वि वशिष्ठ जी के पास जो कामधेनु गाए उसी
से सब हविष्य की पूर्ति होती है जमदग्नि जी के पास गाए थ जो शास्त्र अर्जुन ने अपरण किया तो भगवान परशुराम जी ने 21 बार क्षत्रियों का विनाश किया मूल उसमें गाय ही कारण थी तो गाय की रक्षा के लिए भगवान गोविंद प्रकट हुए शास्त्र गायों को स्वयं चराया उनकी सेवा की तो गौ से तो हमारा जीवन ही है बहुत सी ऐसी हमारी प्रवृत्तियां बदलती जा रही है जो हमारे धर्म के विरुद्ध है कि देखो हमारे आपके प्रयास छोटे-छोटे हैं जब तक हमको सरकार का पूरा सपोर्ट नहीं मिलेगा तब तक आप पैदल चलो आप पैदल
चलो आप पैदल चलो आप प्रयास करो तो उसका प्रयास उतना नहीं पड़ेगा जितना सरकार से पड़ेगा हम ऐसे जो बद स्थान है जिसमें गायों को रोज काटा जाता है आप जानते हैं नहीं जानते हैं तो उन पर अगर सरकार रोक करे तो हमारी गौ रक्षा हो जाए ना हमारी सभा समाज गांव नगर इस बात पर उत्साहित हो अगर एक एक रुपया जोड़े तो 100 गौओं की रक्षा के लिए हम गौशाला खोले एक 100 गौओं की दूसरी खुले इस तरह से बनेगा और जो जो दूध नहीं देती या बैल है सान है उनको ऐसे खुला छोड़ा
जाता है तो ऐसे से हमारी गौ सेवा कैसे पुष्ट होगी हमें सबको जागृत होना पड़ेगा गौ सेवा के लिए उसकी दृष्टि पार्थिव रुपय पर है ना कि धर्म पर है ना कि शरीर स्वस्थ पर है ना कि भगवत प्रसन्नता पर है कि स्वयं भगवान श्री कृष्ण चंद्र गौओं के पीछे घूमकर उनको चराया उनका पालन पोषण किया हम उन्हीं की संतान हैं भगवान के ही तो जन है तो अगर हम गौ सेवा नहीं कर पाते हैं तो कुछ अर्थ निकाल देते हैं और कई लोग मिलकर के छोटी सी गौशाला खोल लेते हैं जो गाय दूध नहीं
देती हैं हम उनकी भी सेवा करें जो बैल छोड़ दिए जाते हैं हम उनकी भी सेवा करें धर्म का स्वरूप है बैल बैल और गाय ये हमारे धर्म के प्रतीक है पर आज ना नई पीढ़ी से समझ रही है और ना अर्थ लोलु समाज समझ र इस बात को तो सब लोग मिलकर इस पर लगे तभी विजय प्राप्त हो सकती है नहीं महाराज आप आपसे आपने अभी बोला आपके स्वस्थ्य के लिए पूरा देश भर प्रार्थना कर रहे आप अच्छे रहना बोलके जैसा आप आप लोग आए तो पूरा देश भर में इकट्ठा होता हमारे जैसे लोग
कितने भी और बिल्कुल बिलकुल हां बिल्कुल कह रहे बिल्कुल आप आए तो भी कब भगवान बुला था नहीं मालूम भगवान आप तो भगवान समझते सब जन आज तो मैं पहली बार देखा मैं चिनेज स्वामी के आश्रम में सभी आश्रम में फिरा आज सुबह में पहली बार दो डेढ़ बजे से आपका इंतजार में थे इतना वक्त इतना प्यार आपके ऊपर जी पूरा पूरा बिल्कुल अब इस पर तो हम ऋ है समा के रेडी है कि तीन-तीन चार-चार घंटे रोड में खड़े रहना मात्र एक ऐसे निकल केस ऐसे और सब उल् लसित सब आनंदित कोई दुखी नहीं
कोई परेशान नहीं लेकिन सब मर्यादित सब अपने आनंद में और सब श्रद्धा से ये हमारा धर्म प्रधान देश है ना ऋषि मुनियों का तो अभी संस्कार हैं भगवान की कृपा है जिसे लोग आदर कर रहे हैं नहीं तो आगे और कलयुग आएगा संत महात्माओं का आदर या भगवन मार्ग का आदर ये सब लुप्त हो जाएगा धीरे धीरे लुप्त हो जाएगा जैसे हम असंतुष्ट है कि आज जो हमारा धर्म प्रचार है वो दूसरा रूप ले रहा है आज जो हमारे शास्त्रों की व्याख्या है वह दूसरे रूप में की जा रही केवल अर्थ प्रधान वासनाओं के पोषण
के लिए धर्म और भगवान व अंदर की बात वासना जो बाहर बात वैराग्य की कर रहे हैं व अंदर वासना का खेल खेल रहे तो क्या वैराग्य का लक्षण चले पर फिर भी भगवान की अभी कृपा है संत महात्मा जन है अभी धर्मात्मा जन जैसे आप पैदल चल कर के गौ माता की रक्षा के लिए ऐसा व्रत लिए कि पूरे भारत में भ्रमण कर हम ऐसा करें तो हम भी यही प्रार्थना समस्त भारतवासियों से समस्त देशवासियों के चरणों में झुक के करते हैं कि धर्म स्वरूपा गाय की रक्षा की जाए एक कवल के लिए अगर
आप निकालो ग एकएक कवल के लिए तो बहुत मिलकर के गाय का भोजन हो जाएगा गाय की व्यवस्था बन जाएगी अगर हमारी गाय सुरक्षित है गौशाला में तो कटने से बच जाएंगे तो ये वही गाय हैं जैसे सड़कों में बैठी है इधर-उधर घूम रही तो उनको लोग ले जा रहे हैं तो हम लोग चार लोग अगर धन है तो ऐसी व्यवस्था करें कोई गौशाला खोल ले और उनको चारा हमारी व्यवस्था नहीं बन पा रही है तो महीने में अगर हम 00 गाय के लिए निकाले हर भारतवासी तो हमारी गाय सुरक्षित हो जाएगी और इसमें किसी
को कष्ट नहीं मिलेगा धर्म की रक्षा होगी तो आपको अपने आप सुख मिलेगा शांति मिलेगी अरे जब भगवान गौ सेवा के भगवान को कुछ भी अगर यशोदा मैया को शंका हो जाती ना कि लाला को कुछ निष्ट ना हो जाए तो गौ की पूछ घुमाना है नहीं ग अब बताओ भगवान जो सर्व रक्षक है उनकी रक्षा गौ पूछ से हो रही है गौ की गोबर लगा के भगवान के अंगों में और उनका नाम से उनकी रक्षा कर रहे हैं तो यह हमारे सनातन धर्म की बहुत बड़ी मर्यादा है गौ और बैल आदि की धर्म की
रक्षा करना तो आप लगो भगवान ही आपको प्रेरित कर रहे हैं हमारी भी सबसे प्रार्थना है और हजारों लोग लग रहे हैं हजारों लोग लग रहे हैं इस बात में ऐसा नहीं हजारों धर्मात्मा पुरुष लग रहे पर सफल वही होगा जिसका उद्देश्य धर्म होगा गौ रक्षा या गौ पोषण के बहाने अपनी वासनाओं का पोषण करना वह तो बात अलग हो गई डोनेशन लेकर के अपने में प्रयोग करना छाप गई गांव की और अन्य लगा लेना वो अलग जिसका उद्देश्य गौ सेवा है उसके साथ भगवान है और जिसके साथ भगवान वहां विजय पक्की है उसकी बात
जरूर पक्की होगी उसकी जरूर बात पूरी होगी जो इच्छा करी हो मन माही हरि प्रसाद कछ दुर्लभ नाही आप बिल्कुल धर्म पूर्वक