नमस्कार दोस्तों हमारे प्रेम धार्मिक ज्ञान यट चैनल में आपका दिल से स्वागत है आज की कहानी एक ब्राह्मण और उसके बेटे की है दोस्तों यह कहानी बड़ी ही शिक्षाप्रद और ज्ञानवर्धक है मुझे पूरा विश्वास है कि आज की कहानी आपको बहुत पसंद आएगी दोस्तों यह कहानी कर्मों के फल पर आधारित है तो चलिए कहानी को शुरू करते हैं प्राचीन समय की बात है तुंग भद्रा नदी के किनारे एक गांव था वहां पर आत्मदेव नाम के एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धुंधली के साथ रहते थे आत्मदेव बहुत ही सज्जन आदमी थे परंतु उनकी पत्नी धमधर स्वभाव की
थी हमेशा किसी ना किसी लड़ती झगड़ी रहती थी आत्मदेव जी के कोई संतान नहीं थी इसलिए बहुत दुखी रहते थे आत्मदेव जी संतान प्राप्ति के लिए बहुत प्रयास किए पर उन्हें कोई सफलता नहीं मिली अंततः एक दिन आत्मदेव जी आत्महत्या करने का निश्चय किए आत्मदेव जी आत्महत्या करने के लिए एक नदी के किनारे पर बैठे गए तभी एक महात्मा जी उनके पास आए और उनके दुख का कारण पूछा पंडित जी आप यहां मरने के लिए क्यों बैठे हो क्या बात है क्या नाम है तुम्हारा आत्मदेव जी महात्मा जी की बात सुनते ही उनके सामने रोने
लगे और बोले महात्मा जी मेरा नाम आत्मदेव है मैं इसी गांव के पास का रहने वाला हूं मुझे कोई संतान है नहीं है इसलिए मरने की इच्छा से आत्महत्या करने यहां आया हूं संतान के लिए मैं इतना दुखी हूं कि सब सुना सुना लगता है जिस गाय को पालता हूं उसको थी कोई बच्चा नहीं होता वह बांझ हो जाती है घर के आगन में तुलसी का पेड़ लगता हूं वह भी सूख जाता है मैं बहुत भागा हूं ऐसा कहकर जोर-जोर से रोने लगते हैं तब महात्मा जी ने कहा तुम्हारे कोई संतान नहीं है यह तो
ईश्वर की कृपा है जिसके कोई संतान नहीं होती वह तो सभी आरों से मुक्त है अतः हे ब्राह्मण पुत्र लालसा का मोह त्याग दो क्योंकि पुत्र की कामना से धन की संसार की भी इच्छाएं जागी और तुम परमात्मा से दूर हो जाओगे प्रतिकूलता में भी जो परमात्मा की कृपा का अनुभव करता है वही सच्चा वैष्णव भक्त है उसी की सद्गति है आत्मदेव ने कहा आपके उपदेशों से मेरी मुक्ति नहीं होगी मुक्ति के लिए तो पुत्र ही चाहिए तब महात्मा जी ब्राह्मण बात सुनकर उसके हाथ की रेखाओं को देखते हैं और उनकी हाथ की रेखाओं को
देखकर कहते हैं कर्म की गति बड़ी ही प्रबल है वासना को छोड़ दो और सुनो मैंने तुम्हारी भाग्य देख लिया है तुम्ह इस जन्म तो क्या अगले सात जन्मों तक तुम्हारी कोई संतान नहीं होगी तब ब्राह्मण कहता है कि फिर मुझे अपने प्राण त्यागने दीजिए या आप किसी भी प्रकार से पुत्र प्राप्ति का मार्ग बताइए तब महात्मा जी देखते हैं कि यह ब्राह्मण किसी भी प्रकार से बात मानने को तैयार नहीं है प्राण त्यागने को लिए तैयार है तब महात्मा जी अपनी झोली से एक फल निकलते हैं और कहते हैं अच्छा ठीक है मैं तुम्हें
यह फल दे रहा हूं इसे अपनी पत्नी को खिला देना इससे आपको एक पुत्र हो जाएगा आत्मदेव जी खुशी खुशी घर लौटते हैं और अपनी पत्नी को फल दे देते हैं धुंधली ने फल नहीं खाया अनेक तरह की बातें सोचने लगी अरे गर्भावस्था में तो भारी कष्ट उठाना पड़ेगा झंझट ही झंझट है मैं बालक का लालन पालन कैसे करूंगी और इस फल के रूप में सुखदेव जी जैसा बालक आ गया और 12 वर्ष तक मेरे गर्भ में रह गया तब तो मैं निश्चित ही मर जाऊंगी यह सब सोच ही रही थी कि इतने में उसकी
छोटी बहन आ गई धुंधली ने अपनी छोटी बहन से सारी बात कही तो उसने युक्ति बताई मैं गर्भवती हूं मुझे बालक होने वाला है तो ऐसा करती हूं कि मैं तुझे अपना बालक दे दूंगी तू आज से ही गर्भवती होने का नाटक कर और यह फल गाय को खिला दे आत्मदेव जी कुछ समय के पश्चात घर आए और जब अपनी पत्नी पूछा कि फल खा लिए हो तो पत्नी ने कहा हां मैं उसी समय खाली थी आत्मदेव जी बड़े भोले आदमी थे पत्नी बात सच मान ली और वहां से चले गए समय बीतने लगा और
कुछ महीनों के पश्चात धुंधली की बहन को एक बालक का जन्म हुआ और रात्रि के समय धुंधली अपनी बहन का पुत्र ले आई सुबह होते ही पति को बोला कि देखो मुझे बेटा हुआ है बड़ा भारी उत्सव मनाया गया नामकरण संस्कार हुआ स्वयं का नाम आत्मदेव था तो उसने बेटे का नाम ब्रह्मदेव रखने का सोचा पर धुंधली फिर झगड़ गई बेटा मेरा है मैंने कष्ट सहा है तो अपने बेटे का नाम मैं ही रखूंगी आत्मदेव बोले ठीक है तू ही रख ले उसने कहा मेरा नाम धुंधली है तो मेरे बेटे का नाम धुंधकारी होगा धुली
ने गाय को जो फल खिलाया था कुछ दिनों के पश्चात गौ माता के गर्भ से एक बालक का जन्म हुआ उसके कान बड़े-बड़े थे इसीलिए आत्मदेव ने उसका नाम गोकर्ण रखा अब दोनों बड़े होने लगे धुंधकारी दुष्ट प्रवृत्ति का था और गोकर्ण बड़े ही ज्ञानी और विद्वान प्रवृत्ति के थे धुंधकारी सारे दुष्कर्म कार्य करने लगा शराब पीता जुआ खेलता और उसने धीरे-धीरे सारी संपत्ति नष्ट कर दी एक दिन धुंधकारी ने आत्मदेव की भी पिटाई कर दी पुत्र के दुरा चरण को देखकर आत्मदेव को बहुत दुख हुआ उसने सोचा इससे अच्छा तो पुत्र हीन ही रहना
अच्छा था पिता के दुख को देखकर गोकर्ण पिता के पास आया और उन्हें भगवान की भक्ति का उपदेश दिया पिताजी यह संसार दुख रूप है तथा मोह से बांधने वाला है संसार में सिर्फ भगवत दृष्टि रखकर ही हम सुखी हो सकते हैं अतः पुत्र मोह त्याग कर भगवान की भक्ति करिए तभी मनुष्य जन्म सफल है अब धुंधकारी की गतिविधियों की तरफ ध्यान ना देकर वन में जाकर प्रभु की आराधना कर करें गोकर्ण की बातों को समझकर पुत्र मोह त्याग कर आत्मदेव जी गंगा के किनारे आ गए भागवत के दशम स्कंध का रोज पाठ करने लगे
आत्मदेव के चले जाने के बाद एक दिन धुंधली भी पुत्र के उपद्रव से दुखी होकर कुएं में जा गिरी और उसकी मृत्यु हो गई इधर गोकर्ण जी तीर्थ यात्रा के लिए निकल गए खुली छूट मिलने के कारण अब धुंधकारी पांच वैश्या को घर ले आया वह वैश्या की मांगों को पूरा कर करने के लिए डाका डालता शराब पीता जुआ खेलता था इनकी मांगों को पूरा करते करते एक दिन धुंधकारी ने राजा के महल से भी चोरी कर ली वैश्या ने सोचा यदि यह जीवित रहा तो एक ना एक दिन हम सब पकड़े जाएंगे अतः इसे
मार ही डाले तो अच्छा रहेगा ऐसा सोचकर रात को उन्होंने सोते हुए धुंधकारी को रस्सी से कसकर बांध दिया और जलते हुए अंगारे उसके मुख में भरकर उसे तडपा तडपा कर मार डाला फिर उसके शरीर को वहीं धरती में गाड़ दिया और वे पांचों औरतें सारा धन लेकर वहां से चली गई धुंधकारी अपने कुकर्म के कारण भयंकर एक प्रेत बन गया कोकण जी जब तीर्थ यात्रा पर निकले थे और उन्हें धुंधकारी की मृत्यु का संदेश मिला तो गोकर्ण जी को बहुत दुख हुआ तो गोकर्ण जी गया जाकर धुंधकारी के नाम का श्रद्ध किया बहुत समय
तक तीर्थ यात्रा करते-करते गोकर्ण जी एक दिन अपने गांव लौटे तो उनको रात हो गई अपने घर की तरफ देखा तो उनका घर खंडहर की तरह दिख रहा था बड़ी-बड़ी घास जमी थी सोचने लगे अपने घर को देखकर चलो अब रात्रि में किसको परेशान करूं इसी घर में ही विश्राम कर लेता हूं आसन बिछाए और उसी में लेट गए तब धुंधकारी आधी रात को अलग-अलग रूप लेकर गोकर्ण जी डराने लगा जब गोकर्ण महाराज जी ने डरे तो धुंधकारी एक मनुष्य का रूप लेकर प्रकट हुआ तब गोकर्ण जी पूछा कौन हो आप क्यों ऐसे डरा रहे
हो धुंधकारी जब बोल नहीं पा रहा था तब गोकर्ण जी अपने कमंडल से जल लेकर मंत्र का जाप करके उसके ऊपर छोड़ा तो अचानक धुंधकारी बोल पड़ा बड़े भैया मैं आपका छोटा भाई धुंधकारी हूं गोकर्ण जी को आश्चर्य हुआ धुंधकारी लेकिन मैंने तो आपके नाम का गया में श्रद्ध कर दिया था तुम अभी तक मुक्त नहीं हुए तब धुंधकारी ने कहा बड़े भैया गया में श करने से जो छोटे मोटे पापी होते हैं वह तर जाते हैं जो बड़े पापी मुझ जैसे होते हैं एक स श्रद्ध से भी मुक्ति नहीं होती इसलिए मेरे लिए कोई
और उपाय करो तो गोकर्ण महाराज ने कहा ठीक है कल विचार करेंगे और पूरी रात गोकर्ण जी को नींद नहीं आई चिंता सताती रही सुबह तुंगभद्रा नदी में स्नान करने गए और स्नान करके सूर्य भगवान को स्मरण करने लगे तब सूर्य भगवान प्रसन्न होकर गोकर्ण महाराज के हृदय में प्रकाश किए और आवाज दिए पुत्र गोकर्ण एक स गया श्रद्ध से भी जिसकी मुक्ति नहीं है उसकी मुक्ति का उपाय ढूंढ रहे हो ना भागवत सप्ताह का वाचन करो पुत्र यह करेगी उसको मुक्त गोकर्ण महाराज बड़े खुश हुए तब तुंगभद्रा नदी के पास ही भागवत कथा का
आयोजन किया और गांव वालों को बुलाकर कथा सुनाने के लिए बैठे गए धुंधकारी भी वहां आकर के बैठ गया लेकिन उसको हवा बार बार उड़ा कर के ले जा रही थी तब सात गांठ वाला एक बांस का टुकड़ा पड़ा था धुंधकारी आकार उसके छिद्र में बैठ गया पहले दिन की कथा उसी में बैठकर सुना और शाम होते ही उस बांस की पहली गांठ टूट गई इसी तरह धुंधकारी ने सातों दिन की कथा उसी बांस में बैठकर सुनी जैसे ही सातों दिन की भागवत खत्म हुई बांस की सारी सातों गांठ टूट गई और अंतिम दिन की
भागवत कथा के समाप्त होते ही धु कारी ने एक दिव्य रूप लेकर प्रकट हुआ और वह मुक्त होकर परम लोक धाम को प्राप्त हुआ तो दोस्तों कैसी लगी आपको यह कहानी आप हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताना ऐसी ही कहानी सुनने के लिए यदि हमारे चैनल में नए हैं तो हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए और बेल आइकन ऑन कर दीजिए ताकि हम जब भी नई वीडियो अपलोड करें तो आप हमारी वीडियो देख सके [संगीत]