[संगीत] [संगीत] [संगीत] ब्रह्म भूत प्रसन्ना आत्मा ब्रह्म भूत प्रसन्ना आत्मा ब्रू त प्रसन्ना आत्मा ब्रह्म भूता प्रसन्ना आत्मा न सोचती न कांति न सोचती न कांति न सोचती न कांति न सोचती न कांति सम सर्वे शु भूतेषु सम सर्वे शु भूतेषु सम सर्वेश भूतेषु सम सर्वेश भूतेषु मद भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते प मद भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते पराम इस वचन पर खूब ध्यान देने जैसा है भक्ति सब लोग करते हैं कोई अ भक्त नहीं धरती पर जय राम जी बोलना पड़ेगा जय राम जी की भक्ति बधा लोग
करे छ भक्ति विना एक पण मनुष्य आ धरती परर नथी त कशो के बापा मारो दीक नास्तिक जव छ ं नथी मानतो फलान भाई नास्तिक छ कम्युनिस्ट छ कोई नहीं भक्ति नथी करतो कोई नहीं भक्ति करे कोई पैसों का भगत है कोई लाड़ी का भगत है कोई नास्तिकों का भगत है जय राम जी की किसी को ना मानने वाला भी किसी ना किसी बॉस को मानता है जय राम जी बोलना पड़ेगा कोई हाल मस्त कोई माल मस्त कोई तूती मैना सुए में कोई खान मस्त पहरान मस्त कोई खानपान का भगत है तो कोई वेष भूषा
का भगत है कोई रुपए पैसे का भगत है तो कोई ठाकुर जी का भगत है तो कोई बीवी का भगत है तो कोई बच्चों का भगत है कोई पद का भगत है तो कोई प्रतिष्ठा का भगत है और कोई तो फिर सौंदर्य का भगत है किसी को भी नहीं मानता तभी भी कुछ तो मानता है जय राम जी की और कुछ मानता है किस लिए मानता है सुख लेने के लिए मानता है प्राणी मात्र सुखाय प्रवृत्ति जीव मात्र सुख के लिए कोशिश करता है कुल मिलाकर सब लोग सुख के भगत तो मिलेंगे मिलेंगे और मिलेंगे
सुख के भगत तो सब लोग ही हैं ऐसा कोई नहीं जो सुख का भगत ना हो कृष्ण को मानते तो भी सुख के लिए और राम को मानते तो भी सुख के लिए अल्लाह अकबर एक इसके लिए क्यों करता है दुख के लिए नहीं करता है मुल्ला मौलवी या और कोई यह भी सुख के लिए करता आयो आयो आयो आयो लाल झूले लाल झूले लाल आयो लाल यह भी सुख के लिए करता है अाई अ चवान संत चवान बपर दो कदम चलकर जाए संत का दर्शन करने जाएंगे एक एक कदम चलने से यज्ञ करने का
फल होगा फिर गीता का ज्ञान सुनने को मिलेगा जन्म जन्म के पाप मिटेंगे पाप मिटेंगे तो क्या होगा सुख मिलेगा तो आप लोग भी सुख के भगत तो है ही जय राम जी भगवान का भक्त कह दो चाहे सुख का भक्त कह दो लेकिन प्राणी मात्र भक्त है नास्तिक नास्तिक किसी को नहीं मानता ना गुरु को मानेगा ना मां-बाप को मानेगा किसी को नहीं मानता किसी को नहीं मानते हो तो चलो जो आदमी किसी को नहीं मानते हो वह सब अलग हो जाए तो बोले किसी को न मानने वाले सब अलग हो गए तो किसी
को न मानने वाले की भी पार्टी बन जाती है अपक्ष भी एक पक्ष हो जाता है ऐसे कि किसी को न मानने वाले भी किसी न किसी को तो मानते अपने से बड़े कम्युनिस्ट को तो मानते हैं नास्तिक भी अपने से बड़े नास्तिक को तो मानता है नास्तिक बना कहां से नास्तिक के किसी बड़े नास्तिक के विचारों से बना तो मानना पड़ता है कि सब लोग भगत हैं इस सब लोगों की भक्ति के दो विभाग हो सकते हैं एक भक्त हैं जो चैतन्य की शरण लेते हैं उनको आस्तिक कहा जाता है जो भगवान से सुख
चाहते हैं भगवान से शांति चाहते हैं और भगवान का शाश्वत पद चाहते हैं उनको आस्तिक भगत कहा जाता है और जो भगवान को न मानकर भी सुख चाहते हैं तो उनको नास्तिक भगत कहा जाता है तो नास्तिक हजार हजार की शरण लेगा हे वाइन तू मुझे मजा दे हे डिस्को तू मुझे बजा दे हे पफ पाउडर लाली लिपस्टिक तू मुझे मजा दे और हे नेरो पेंट तू मुझे मजा दे हे नेशनल हाईवे छाप मछे तू मुझे मजा दे अथवा हे लंबी दाढ़ी मूछ तू मुझे मजा दे हजार हजार चीजों में वो लोग मजा खोजते हैं
हे आमलेट और अंडा तू मुझे मजा दे य नर्क या स्वर्ग को हटाकर तो डिस्को डांस या पिक्चर से भी वो लोग सुख ही तो लेते हैं जो एक की शरण लेकर सुख चाहता है उसको आस्तिक बोलते हैं और जो अनेक के शरण चाट रहता उसको नास्तिक बोलते हैं जय राम जी जो एक आश एक भरोसा ईश्वर के सहारे जो सुखी होना चाहता है उसको आस्तिक बोलते हैं और विकारों के सहारे जो सुखी होना चाहता है उसको नास्तिक लेकिन सुखी होना दोनों चाहेंगे तो मानना पड़ेगा कि प्राणी मात्र सुखाय प्रवृति मनुष्य मात्र की सुख के
लिए कोशिश है और दिन से रात तक जीवन से मौत तक वह जो करता है सुखी होने के लिए ही कोशिश करता है शादी भी सुखी होने के लिए और मंगनी भी सुखी होने के लिए बेटा भी सुखी होने के लिए और बेटे की शादी कराना भी सुखी के लिए नौकरी करना भी सुख के लिए रिजाइन करना भी सुख के लिए यहां तक कि चोर चोरी करता है उसमें भी उसकी भावना तो सुखी होने की होती है चाहे रास्ता गलत है लेकिन भावना तो सुखी होने की होती है प्राणी मात्र सुख के लिए कोशिश करते
हैं लेकिन ये सुख दो प्रकार का होता है एक होता है क्षणिक सुख भक्ति भाव से भी और दूसरा होता है शाश्वत सुख एक होता है विषयों का क्षणिक सुख और दूसरा होता है निर्विक शाश्वत सुख तो क्षणिक सुख में तो जिंदगियां एक नहीं करोड़ों जीवन खत्म हो गए क्षण भर के लिए सुख फिर दुख फिर थोड़ा सुख फिर दुख सुख दुख सुख दुख के झपेटपुर शाश्वत सुख का रास्ता बताते हैं ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा सब लोग प्रसन्न होना चाहते सुखी रहना चाहते हैं लेकिन तब तक पूर्ण सुख नहीं मिलता जब तक यह जीवात्मा ब्रह्म
भूत नहीं होता भगवान कहते हैं ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांश ब्रह्म भूत प्रसन्न मन वाला पुरुष ना किसी वस्तु की या परिस्थिति की इच्छा करता है सुख के लिए क्योंकि उसको पूरा सुख मिल गया है अब वोह सुख के लिए कुछ नहीं करता अपितु सुख बांटना उसका स्वभाव बन जाता है अब वह सुख का दाता हो जाता है सुख का प्यासा नहीं लेकिन सुख का खुद प्याऊ बन जाता है नूरानी नजर सा दिलबर दरवेश मुखे निहाल करे छज ब्रह्म ज्ञानी की दृष्टि अमृत वर्षी ब्रह्म ज्ञानी का दर्शन वड भागी पावई ब्रह्म ज्ञानी
को बल बल जाव ब्रह्म ज्ञानी का भोजन ज्ञान ब्रह्म ज्ञानी का ब्रह्म ध्यान ब्रह्म ज्ञानी मुगत जुगत का दाता ब्रह्म ज्ञानी पूर्ण पुरुष विधाता वह वैसा बन जाता है ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांति सुखी होने के लिए उसके उसको कोई सोच विचार नहीं करना पड़ता है सुखी होने के लिए उसे कोई आकांक्षा नहीं क्योंकि वो पूरा सुखी हो गया मानो मुझे अहमदाबाद से गांधीधाम इस मंच पर पहुंचना है तो जब तक नहीं पहुंचा तब तक गाड़ी के पहिए घूमे स्टेरिंग पर ध्यान रखे ड्राइवर ये वो साधन अगर मैं यहां पहुंच गया तो
यहां पहुंचने के लिए मुझे सोचना नहीं और यहां पहुंचने की मुझे आकांक्षा नहीं रही मैं पहुंच गया ऐसे ही पूर्ण सुख में जो पहुंच गया है पूर्ण जीवन में जो पहुंच गया है पूर्ण पद में जो पहुंच गया है उस पुरुष को ना स्वच्छ होता है ना आकांक्षा होती है उसने अपने जीवन का फल पा लिया उसने अपने जीवन का पूर्ण फल पा लिया और उसके संग में आने वालों का जीवन भी सफलता के रास्ते चलने लगता है यह बहुत ऊंचे में ऊंची उपलब्धि है मनुष्य जन्म की उपलब्धि की पराकाष्ठा है इससे ज्यादा और उपलब्धि
करने योग्य कुछ भी नहीं है दुनिया की सब उपलब्धि हो गई लेकिन यह ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांती वहां नहीं पहुंचा तो उसकी सारी उपलब्धियां मृत्यु के झटके में पराई हो जाती है जितना भी आज तक हमने कमाया है जितना आज तक पाया है जितना आज तक जाना है मृत्यु का एक झटका पाया अपाया में कर देगा जाना अनजाने में कर देगा लेकिन इस ब्रह्म परमात्मा को जाने तो वो ब्रह्म परमात्मा शाश्वत है धन छूट जाने का भय होता है शरीर मर जाने का भय होगा लेकिन आत्मा ना छूटता है ना मरता
है अभयम सत्व सं शुद्धि ज्ञान योग व्यवस्थित दानम दमस यज्ञ स्वाध्याय तप आर्वम यह ब्रह्म भूत होने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए कि जीवन में आध्यात्मिक रास्ते जाने के लिए निर्भय होना चाहिए भय को झाड़ फेंक फिर आ व्यवहार थोड़ा सात्विक करना दान जिसके जीवन में सत्कर्म के लिए दान पुण के लिए जिसके जीवन में समय शक्ति या व्यवस्था नहीं है वह तो अपने आप को कंगाल किए जा रहा है चार दिन का जिंदगी है नश्वर तन से नश्वर मन से नश्वर धन से अगर शाश्वत की यात्रा हो जाए तो य सौभाग्य की
बात है शाश्वत की यात्रा नहीं किया और नश्वर चीजों में उलझता रहा तो वह आदमी अपने आप का शत्रु है करने योग्य उसने कुछ नहीं किया खाई खाई खाई खाई है भीम से जो पी थी ने छ बहुत बहुत तो शरीर मोटा हो जाएगा तीन छंगामल बन जाएगा और क्या हो जाएगा बाबा खाया फि देखो मैं कितना सुखी हूं सुखी तो क्या है उठाने वाले के लिए जरा वजन बढ़ा दिया कंधे पर उठाकर जो ले जाएंगे उनके लिए जरा हैवी ड्यूटी हो गए और ज्यादा क्या किया तुमने बहुत बहुत तो टांग भर राख ज्यादा छोड़
जाओगे 100 ग्राम हड्डियां ज्यादा छोड़ जाओगे और करोगे क्या शरीर मोटा बड़ा हो गया तो बड़ी बात नहीं मकान बड़े हो गए तो बड़ी बात नहीं गाड़ियां लंबी चौड़ी बढ़िया हो गई तो कोई बड़ी बात नहीं बड़े में बड़ा जो आत्मा है परमात्मा है उससे आत्मा की मुलाकात कर ली उसने जहां में बड़ी बात कर ली जहां में उसने बड़ी बात कर ली जिसने आत्मा से मुलाकात कर ली और आत्मा से मुलाकात करने के लिए अभयम सत्व सं शुद्धि ज्ञान योग व्यवस्थित आत्म ज्ञान चाहिए हम छोटी-छोटी बातों को सुनते छोटी-छोटी बातें पाते हैं छोटी-छोटी वस्तुएं
पाते तो उसमें खुशी और गमी होती रहती है बड़े में बड़ा जो आत्मा है उसका लक्ष्य नहीं इसलिए छोटी-छोटी चीजें हमें धक्के देती रहती है मिली तो सुख गई तो दुख सुख दुख के चोटें हृदय को कमजोर कर देती है कृष्ण का योग निराला है योग शब्द अपनी अपनी जगह पर अर्थ रखता है दो वस्तुओं के मेल को आयुर्वेदिक योग बोलता है फलानी दवा और फला फलानी भस्म का योग कीजिए सुवर्ण भस्म और बंग भस्म का एक [संगीत] एक 50 50 मिली योग कीजिए 20 20 मिली योग कीजिए और 40 दिन खाइए आप बुढ़ापे में
भी जवानी का एहसास महसूस करेंगे यह आयुर्वेदिक का योग है दो आंकड़ों का मेल को गणित बोलता है योग पांच और सात का योग कीजिए 12 बनेंगे 12 और 25 का योग करोगे तो 37 बनेगे पतंजलि का योग निराला है पतंजलि कहते हैं कि योग चित्तवृत्ति निरोध योग उसको बोलते पतंजलि महाराज कि अपनी चित्त की वृत्तियों का संकल्प और विकल्पों का निरोध हो जाए और मन शांत हो जाए ताकि उसमें सामर्थ्य आ जाए लेकिन कृष्ण का योग इन सबसे निराला है कृष्ण का योग गिरी गुफा में सिद्ध करना जरूरी नहीं है कृष्ण का योग आयुर्वैदिक
ढंग से जो देखना जरूरी नहीं कृष्ण का योग है क्या सुखम वा यदि वा दुखम सहयोगी परमो मता बहुत बढ़िया योग गीता तुम्हें गिरि गुफा में ले जाने को नहीं कहती गीता तुम में यज्ञ की वैदी पर बैठकर ही धर्म प्राप्त करने का आग्रह नहीं करती गीता तो कहती कि तुम जहां भी हो जो कुछ भी करते हो उससे धर्म की प्राप्ति कर सकते हो तुम जहां भी हो जैसे भी हो वहीं से तुम यात्रा कर सकते हो जो गिरी गुफा में योग सिखाया जाता था वह योग युद्ध के मैदान में श्री कृष्ण ने अर्जुन
को सुना दिया सिखा दिया जो धर्म यज्ञ की वैदी प मंदिर में संपन्न होता था व धर्म बाण चलाते हुए भी धर्म का फल पाने का रास्ता अर्जुन को दिखा दिया कृष्ण ने जो धर्म अथवा तत्व ज्ञान गुरु के चरणों में सेवा करके फिर पाया जाता था वह तत्व ज्ञान अर्जुन ने रथ में बैठे-बैठे पाले गीता ऐसा अद्भुत ग्रंथ है गीता का ज्ञान ऐसा है कि तुम जहां हो जो व्यवसाय कर रहे हो जो तुम्हारी जाति है जो तुम्हारा वर्ण है जो भी तुम उम्र है जो भी तुम्हारी समझ है उस सबको गीता बोलती हमें
स्वीकार है केवल हमारी ज्ञान की नाव में बैठो तुम संसार से यूं उतर जाओगे देखते देखते मुआ पीनो वायदो नकाम को जाने छे काल आज अत्यारे अब घड़ी साधु जोलो नगदी रोकड़ माल युद्ध के मैदान में अर्जुन को साक्षात्कार हुआ है गीता ऐसा नगद धर्म बताती इस नगद धर्म का प्रसाद पाने के लिए केवल अपने हृदय में प्यास हो अपने हृदय में तड़प हो पापी आदमी को सत्संग की रुचि नहीं होती और पापी आदमी सत्संग में चला जाए तो उसके पाप नहीं बचते पाप दगद होने लगते जिने हरी कथा सुनी नहीं काना श्रवण रंद्र ही
भवन समाना जे नहीं करही राम गुण गाना सुधा दुर जीह समाना जिन्होंने हरि कथा नहीं सुनी उनके कान सांप के बिल जैसे हैं जिन्होंने भगवन नाम कीर्तन नहीं किया उनकी जीव मेडक के जीभ जैसी जे नहीं करही राम गुण गाना जीह सुदा दुर जीह समाना और भगवन नाम की महिमा बड़ी भारी है शब्द तो बहुत छोटे राम कह दो कृष्ण कह दो हरि ओम कह दो शब्द तो छोटे लेकिन इनका प्रभाव बहुत भारी बहुत बढ़िया राम न सके राम गुण गाई और ऐसा भी नहीं कि दशरथ के घर राम जी आए उसके बाद लोगों ने
सीताराम सीताराम जपा अथवा राम राम जपा नहीं नहीं दशरथ के घर राम जी अवतरित हुए उसके पहले दशरथ राजा रघु राजा दिलीप राजा अज राजा राम राम जपा करते थे वेदों में राम राम की महिमा आती रमंते योगी यस्मिन स राम जिसमें योगी लोगों का रमन कर ता है मन वह आत्मदेव राम है जो रोम रोम में रम रहा है उसको राम कहते हैं उसी को नानक जी ने कहा अकाल पुरुष सिख धर्म का पहला ग्रंथ जप जी है सिख धर्म का पहला ग्रंथ जप जी और जप जी का पहला मंत्र कहो पहली पौड़ी कहो
पहला वचन कहो एक ओंकार है एक ओंकार सत नाम कर्ता पुरख निर्भग निर्वैर अका मूर्त शरीर मूर्तिमंत है लेकिन वह तुम्हारा परमात्मा अथवा सृष्टि का आधार अथवा तुम्हारा आत्मा अकाल है उस पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता शरीर पर काल का प्रभाव पड़ेगा झुरियां पड़ जाएगी बाल सफेद हो जाएंगे और एक दिन मर जाएगा मकान पर काल का प्रभाव पड़ेगा पद पर काल का प्रभाव पड़ेगा लेकिन तुम्हारे आत्मा पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता है उसको जान लो जिन खोजा तिन पाए गहरे पानी पैठ मैं पोरी डू बन डरी रही किनारे बैठ देह के किनारे
हम बैठे रहे तू तू मैं मैं के किनारे बैठे रहे उस आत्मा की गहराई में गए नहीं इसीलिए सब दुख मिटे नहीं और पूरा सुख मिला नहीं और सब दुख मिटे नहीं पूरा सुख मिला नहीं इसलिए यह जीव पूर्ण प्रसन्न नहीं हुआ और सब कामना इसकी मिटी नहीं सोच विचार उसका नष्ट नहीं हुआ आकांक्षाएं उसकी हटी नहीं सुख के लिए सोचता रहता है बेचारा कितना भी सुख मिले अधिक सुख लेने को सोचता है यहां तक कि इस दुनिया का सुख नहीं स्वर्ग का सुख जिन देवताओं को है उन देवताओं का भी जो चेयरमैन है देवताओं
का भी जो सम्राट राजा इंद्र है वह भी बाहर का सुख लेते लेते उसको संतोष नहीं हुआ सुख लेने की वासना बढ़ती रही सोच विचार बढ़ते रहे आखिर गौतम की पत्नी अधिक सुंदर थी उसके पास वह सुखी होने के लिए आया काम चेष्टा के लिए और वहां से उसको श्राप मिला जो आदमी बाहर की चीजें अधिक अधिक अधिक अधिकम अधिकम अधिकम करके सुखी होना चाहते उनको एक ऐसा चमाटर जाती है एक ऐसी थप्पड़ लग जाती है कि करा कराया चौपट हो जाता है जैसे कंस बाह्य सत्ता से बाह्य वैभव से अधिक से अधिक अधिक से
अधिक शोषण करके सुखी होना चाहता था लगी थप्पड़ श्री कृष्ण की आलिंगन मिला और पहुंच गए यमपुरी बुरी हालत रावण बाहर के पद से सत्ता हों से अधिक से अधिक अधिक से अधिक सुखी होना चाहता था अंत में देखो कि सीता जी का हरण करके वह अभागा सुखी होना चाहता था सीता जी से कुदृष्टि करके वह सुखी होना चाहता था तो बाहर की चीजों की आकांक्षाएं और सोच विचार करते करते कितनी भी चीजें मिल जाए कितनी भी आकांक्षा पूरी हो जाए तभी भी आदमी की आकांक्षाएं मिटती नहीं तब तक नहीं मिटती जब तक ब्रह्म भूत
प्रसन्न आत्मा नहीं होता हजारों जन्म के बाप मिलकर वह चीज नहीं दे सकते हजारों जन्म की माताएं मिलकर वह चीज नहीं दे सकती हजारों जन्म के लाखों मित्र मिलकर वह चीज नहीं दे सकते जो सत्संग में हंसते हंसते वह चीज मिल जाती है इसलिए सत्संग की महिमा है कर नसीब बा वाले सत्संग दो घड़ियां तन सुखाए पिंजर कियो धरे रैन दिन ध्यान तुलसी मिटे न वासना बिना बचारे ज्ञान सियावर रामचंद्र की ये आत्म ज्ञान का विचार किए बिना इस जीव की आकांक्षाएं सोच विचार और चिंताओं का दुख दूर नहीं होता है कितना भी सोच विचार
करते-करते कितना भी पाया फिर भी पाने का कुछ बाकी रह जाता है एक चीज ऐसी कि जिसको पाया तो फिर पाने की इच्छा मिट जाती है पूर्ण हो जाता है ऋषि कहता है पूर्ण मद है वह परमात्मा वह आत्मा वह तुम्हारा चैतन्य पूर्ण है पूर्ण मदम उससे जो प्रकट होता है वह भी पूर्ण है जो जिससे आता है वह भी पूर्ण है जो आया वह भी पूर्ण और उसमें फिर वापस डाल दो कई सृष्टि पैदा हुई और सृष्टि उसमें लीन हो जाए तभी भी परमात्मा ऐसे क ऐसा पूर्ण है वही परमात्मा तुम्हारा आत्मा बनकर बैठा
है उसको तुमने एक बार तीन मिनट के लिए ठीक से जान लिया तो तुम्हारा सोच चिंता आकांक्षा सदा के लिए मिट जाएगा दूसरा सब कुछ तुमको मिल गया लेकिन यह पॉइंट नहीं मिली सब कुछ न मिला हो जाता है सब कुछ जाना कृष्ण ने कहा यन लवान चा परम लाभ मन्य ना अधिकम तता यस्मिन स्थि तो न दुखे न गुरु नाप विचा जिसको पाने के बात अधिक कुछ पाना नहीं जिस लाभ से अधिक कोई लाभ नहीं और जिसमें स्थिर होने के बाद बड़े भारी दुख से भी योगी चलित नहीं होता है वह आत्म लाभ पा
लेना चाहिए और वह आत्म लाभ जब हो जाए तब तो हो जाए उसकी कथा सुनने से भी हजारों तीर्थ करने का फल होता है भगवान शिव जी एक बार आकाश मार्ग से पार्वती सहित यात्रा करते-करते हिमालय के उस इलाके से पसार हुए जहां वशिष्ठ मुनि तपस्या कर रहे थे वशिष्ठ कहते योग वशिष्ठ में कथा आती है राम जी को सुनाते राम जी के गुरुदेव के राम जी में हिमालय में तपस्या करता था सुबह अपना ध्यान भजन आदि करता था फिर जंगल में विचरण करते हुए कंद मूल लाता था उसका ही भोग लगाता था और शाम
के समय इर्दगिर्द गुफाओं में तपस्या करने वाले मेरे साधकों को भक्तों को बुलाकर मैं शास्त्रों के ज्ञान का उपदेश देता था ऐसा मैं तपस्वी जीवन यापन करता था उन दिनों में एक बार भगवान शभ सदाशिव उमा सहित आकाश मार्ग से जा रहे थे और मेरी दृष्टि खुल गई थी मैंने देखा दृष्टि खुलना माना ये आंख के पोपे खुल गए तो वह दृष्टि नहीं दूसरी एक दृष्टि होती है जिसको तीसरा नेत्र भी कहते हैं सूक्ष्म जगत की एक्टिविटी देखने की योग्यता उसकी दृष्टि वो दृष्टि एक सूक्ष्म दृष्टि जैसे यहां टीवी के रेडियो के वेव्स हैं लेकिन
हमको इस आंखों से नहीं देखते हैं रेडियो लाओ उसका स्टेशन शो एंड शो खोलो टीवी लाओ उसका चैनल नंबर शो एंड शो खोलो तो उसमें दिखेगा अब डाल का डब्बा लाकर रखो तो टीवी का दृश्य नहीं दिखेगा केरोसिन के डब्बे में कोई रेडियो का गीत नहीं आएगा तो रेडियो को सुनना है तो कोई डिब्बा लाना पड़ेगा ट्रांजिस्टर जैसा ऐसे ही सूक्ष्म जगत को देखने की दृष्टि वशिष्ठ की खुल गई और वशिष्ठ ने देखा कि आकाश में प्रकाश पुंज और वह प्रकाश पुंज मेरे आश्रम की और उतर रहा है वशिष्ठ ने सूक्ष्म दृष्टि से देखा कि
ये तो भगवान शिव और पार्वती हे राम जी मैंने मन ही मन भगवान शिव पार्वती का अभिवादन किया और अर्घ पाद से उनका पूजन किया इतने में तो वह मेरे आश्रम में आ पधारे मैंने उनको यथा योग्य आसन दिया और शिव जी का मैंने अर्घ्य पाद से पूजन किया और मैंने शिव जी का अभिवादन करते हुए शिव जी से प्रार्थना की कि अरुंधति मेरी पत्नी के साथ पार्वती जी का सत्संग हो जाए और मैं आपके साथ सत्संग करूं तब शिव जी ने पार्वती को संकेत किया और पार्वती अरुंधति जी से सत्संग करने गई और मैं
शिव जी के चरणों में सत्संग करने को बैठा भगवान शिव ने मेरे से कुशल क्म पूछा कि हे मुनीश्वर इस हिमालय में तुम्हारे को कोई कोई तकलीफ तो नहीं है गंगा तुम्हें शीतल जल तो देती है वृक्ष तुम्हें पक्के और मधुर स्वादिष्ट फल तो देते हैं कुबेर के यक्ष गंधर्व किन्नर ये तुमको कोई तकलीफ तो नहीं देते हैं तब मैंने कहा जो एक बार भी शिव कह देता है उसके दोष दूर हो जाते हैं और उसका मंग हो जाता है तो जो सदा शिव का चिंतन करता है उसको कौन तकलीफ देगा हे भोलानाथ आपकी कृपा
से मैं कुशल हूं आनंदित हूं प्रसन्न हूं मुनीश्वर तुम्हारा हम क्या अभीष्ट कर सकते हैं तमार श हित करी सकू भगवान शंकर बोल्या त्यारे वशिष्ठ जी कह के मैं कह के प्रभु आप जवा पूर्ण स्वरूपे न सोचती न कांती कोई सुख माटे तहे कई विचार करता ना अने काई आकांक्षा नथी करता सदा शिव स्वरूप मा निमग्न रहो छो आप जेवा भगवान मड़े तो मारे बीजू काई बाकी रहत नथी फक्त सत्संग नी बे वातो मड़े तो मारो बेड़ो पार थई जश त्यारे भगवान शभ सदाशिव कह छ कि मुनीश्वर पूछो तुम्हारे श पूछू छे तुम पूछो तुमको
क्या पूछना है दो ब्रह्म ज्ञानी मिलेंगे तो संसार के उद्धार का ही कुछ रास्ता नया निकलेगा ऐसे भगवान और पूर्ण ब्रह्म ज्ञानी संत मिलेंगे तो संसार के जीवों के कल्याण की ही बात होती है भगवान शिव जी के चरणों में वशिष्ठ जी ने प्रार्थना करते हुए कहा कि प्रभु कलयुग के जीवों का शीघ्र मंगल कैसे हो तो भगवान शिव जी कहते हैं कि हे मुनीश्वर सहस्त्र नेत्र धारी इंद्र भी देव नहीं है तुम भी देव नहीं हम भी देव नहीं नारायण भी देव नहीं लेकिन तुम्हारे में मेरे में और नारायण में और ब्रह्मा में जो
आत्म देव रम रहा है उसी देव का यह विलास है ऐसे आत्म देव का जो ज्ञान पाता है उसके सारे दुख और सारी चिंताएं सदा के लिए नष्ट हो जाती उस आत्म देव का ज्ञान पाकर तेरा निमिष जो कोई ध्यान करता है तो उसे बाज पर यज्ञ करने का फल होता है 17 निमेष निमेष माना आप पलती मार के बैठे हैं दाया हाथ है दाए घुटने को छू दाए घुटने से चले बाए को चक्कर मार के चुटकी बजा उसको निमेष बोलते य दो निम तीन निम य चार निम सत निमेष जो उस आत्म देव का
आत्मा परमात्मा न ज्ञान साभ ने ज अंतर मुख थाय 1 निमेस माटे ने बाजपे यज्ञ करवान फल थाय भगवान शंकर वशिष्ठ जीने कछ वशिष्ठ कोई साधारण पुरुष नथी भगवान श्री राम ना गुरुदेव छ प्रात काल उठ रघु नाथा मात पिता गुर नाव माथा राक्षसों ने तो बाण न निशानों बनाव ब्राह्मण कुलमा जन्मेला रावण ने तो यमपुरी पहुंचा पण एज रामचंद्र जी गुरुना चरणे माथू न मावे छ गुरु केटल आदर एवा वशिष्ठ महाराज शिवजी ने कह के प्रभु 7 निमेष आत्मा परमात्मा सत्संग साभ ने ध्यानत थवा बाजपे यज्ञन फल थाय मने आश्चर्य लागे त्यारे शिवजी क
7 निम मा आलू पुण्य थाय पण जो एक घड़ी ले सा बा मिट एक घड़ी एक घड़ी अगर आत्मदेव ना सत्संग श्रवण करीने आत्मा परमात्मा ना विचार में तल्लीन थाय तो ने राजस यज्ञ करवान फल थाय हे मुनि शार दुल एक महूरत ले चार घड़ियों आत्मा परमात्मा ना सत्संग ने ध्यान मा रहे ने केटला अश्वमेघ यज्ञ करवान फल थाय एक पहर के केटलाक पहर ज आत्मा परमात्मा ना चिंतन मा रछ तो बीजा ना पाप नष्ट करवान सामर्थ्य ल आवे छ आत्म देवनी महिमा छ ब्रह्मज्ञानी का दर्शन वड भागी पावई ब्रह्म ज्ञानी मुगत जुगत का दाता
य मुगत जुगत ना दाता कई रीते थाय छ कैसे बनते हैं कि वो आत्म देव का सत्संग सुनकर आत्म परमात्मा का ध्यान करने से य सामर्थ्य उनके पास आता है साधारण आदमी तो कुछ खर्च करता है तो कंगाल हो जाता है लेकिन ब्रह्मज्ञानी तो दिन रात दुआओं का और लोक कल्याण के कार्यों में कई तपस्या हों का खर्च करते रहते फिर भी वे कभी कंगाल नहीं होते वे शहंशा के शहंशा रह जाते हैं यह आत्म देव ऐसी चीज है ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांती ने सुख लेवा माटे काई सोच विचार कर पड़ता
नथी अने सुखी थवा माटे ने आकांक्षा रहती नथी एक पोते ज सुखन दरियो थई जाए जे लोको आवे एमा नाय अने पावन थई जाए भगवान दत्तात्रेय महाराज ऐसी स्थिति को पाए हुए थे दत्तात्रेय के दर्शन करके लोगों को रस आने लगता था मजा आने लगता था दत्तात्रेय जहां जाए वहां लोक जहां जाए वहां लोक जहां जाए वहां जिते ब संत उते खलक खलक खलक खलक खलक नी व कि दत्तात्रेय महाराज उब गए एक बार दत्तात्रेय महाराज अज्ञात चले गए तो अज्ञात गए फिर भी छुप छुप के लोग उनके दर्शन करने लगे उनके दर्शन से ऐसे
मजा आता बस बैठाने तो संत भाई गुरुता सा फलान पर संत के कर दिल में कित बस वया जा दहनी मु जिय में जोगी वया जादू हनी मुझे जिय में जोगी न सामन खेत संभार पई कर याद उन्नन जी रहमत केे मवर ड निहार पई वया जा दहनी मुझे जिय में जोगी ह याद नन जीी बाकिया हर मसा साथिया वया सुनी सिख्या दई संत सचा जिनसा प्रीत पकी मु पाति आ वया मुरली बजाए मनड़ो खनी तिन सांग खेत संभार पई कर याद उन्न जी रहमत के मा स स घोड़ा गाड़ पई वया जादु हनी मुझे
जिय में जोगी प्रेम दई जिन पासे विहार नूरानी नेन सा मुद निहार उन नेन खेत संभार पई कर याद उनने जी रहमत के माड़ जडो पज जार पईया जा दहनी मुझे जिय में जोगी ऐसा जादू भगवान कृष्ण की निगा में था नूरानी नजर सा दिलभर दरवेश मुखे निहाल करे छ ऐसा जादू गौरांग के आंखों में था गौरांग के दिल में था न सोचती न कांती अवस्था पर चैतन्य महाप्रभु पहुंचे हुए थे गौरांग गौरांग एक बार हरि बोल हरि बोल कीर्तन की मस्ती में चलते गए और आंखें बंद हो गई मस्ती मस्ती में पगडंडी भूल कर
एक तलाव में जाग गिरे तलाव में जाग गरे उनके प्राण शक्ति ऊपर महाराज तलाव में पड़े रहे देव योग से मछु के बेटे तलाव में मच्छी पकड़ने के लिए जाल डाली महसूस किया इसमें कोई बड़ा मच्छ आ रहा है इत्मीनान से धीरे धीरे धीरे धीरे जाल को किनारे ले आए देखा के बड़ा मच तो क्या ये तो आदमी आ गया माडू जार में और मारू दे तो बस अख बंद लगी पन कोई बस अज ग भी कोई ये माडू की उन मच्छु के लड़कों ने हिलाया डला या हाथ पैर से जिंदा है कि मर गया
कौन है कहां से आया कैसे तो अनजाने में उनको उस महापुरुष के स्पर्श का फल मिला और उस महापुरुष ने ध्यान ध्यान में से उठकर चलने के पहले निगाह तो खोलनी है आंख खुली और ध्यान के बाद की आंख उन्हीं मच्छु पर पड़ गई लड़कों पर अब वो नूरानी निगाह पड़ गई नूरानी नजर दिलभर दर्वेस मुखे निहाल कर चलो जो न सोचती न कांती अवस्था पर पहुंचा है उस महापुरुष की आंखों से भक्ति की तन मात्राए बरसती है उस महापुरुष के शरीर के रोम कपों से आत्म ज्ञान का आनंद का व्यस बरसता है उस महापुरुष
की वाणी में तासीर होता है दुख मिटाना पाप मिटाना उस महापुरुष की वाणी का स्वभाव होता है संशय दूर करना इस महापुरुष की वाणी में कुदरती तेज होता है गौरांग का कृपा प्रसाद उन बच्चों पर ढुल पड़ा बच्चे तो नादान थे ना समझ थे बच्चे अब घर गए भोजन करते करते हरि बोल हरि बोल करके गश थ गश थी गया मतलब बेहोश नहीं हुए अंदर होश चला गया गहराई में कुटुंब को पता नहीं चला छोरा कोरो थयो छोरा छा थयो छोरो थयो छोरो बोले ना तो मुआ भूत पियो कोई प्रेत पियो कोई डाकनी आई छोरा
कुरो थयो हरि बोल अरे छा तो च न जो हमते जो छोरो भी करेने जम जो छोरो भी कर फलाने जो छोरे मुड़ छोरा गांडा थया के पागल थ कर थयो वया जादू हनीज में जोगी लगी हो त कल पनत पछ लग वार एक दिन दो दिन चार दिन हुआ सुती फकी दवा दार इलाज लेकिन कुछ असर नहीं दवा कान थी मुझे दर्द हकी मन खे कड़ी खबर मर्ज जीी मु जो दारू दवात जो दीदार वा मु जो दारू दवा तो जोती दारवा बसारण हकी मन के बेकार हकीम को दिखाना बेकार हो गया दारू दवा
टूना फीना कोई काम नहीं लगा आखिर किसी ने कहा कि जब से वह मच्छु मच्छी पकड़ने गए थे और मच्छी के बदले एक बाबा आ गया जाल में उस बाबा को निकाला ढोला बाबा तो जाग के चला गया बाबा तो जिंदा होगा और ये छोरे पागल हो गए अब उन्होंने पगरा लिया बाबा का बाबा की कुटिया तक पहुंचे बोले महाराज जिस दिन से तुमको निकाला है तिस दिन से यह तुम्हारी बीमारी हमारे छोरों को लग गई महाराज ने कहा मेरी बीमारी छोरों को लग गई लेकिन मेरा तो वही वही हाल है मेरा कुछ खुटा नहीं
और ये निहाल हो गए बोले महाराज यह सब निहाल बल ता पाण वट रखो असज छोरा हुआ ड़ा नोड़ा कर दियो महाराज ने कहा भाई जेड़ा छोरा ड़ा नोड़ा करण में ताके घाटो जेड़ा आए ने थ अवयो ता एकही कुल तरी म जो बड़ पार थ दो कुछ मछुआ को समझाया समझ के थोड़ा बहुत शांति हुई गए घर घर गए तो जहां गाम होने त्या गटर भी होए जय श्री कृष्ण नालियों होए जिते गोठ सबन सा सब भीन जय राम जी की समझ चंडाल चौकड़ी के लोग भी होते हैं सब जगह उन चंडाल चौकड़ी के
लोगों ने कहा कि बावे हनीन छोरे न मंत्र यो ना छोरा घर जा रने घाट जा र छोरा हरि बोल हरि बोल करे गांडा थ इन चोर लगन की थ य छोरा कमाई के इन जिंदगी बर्बाद करे चन बाए महाराज विपरीत संस्कार जल्दी पड़ जाते अच्छी बात तो समझ से समझ में आती है लेकिन बुरी बात तो ना समझी से भी घुस जाती किसी की निंदा किसी महापुरुष की निंदा फैलाओ तो आपने सु उनको देखा ना देखा लेकिन मन में उनके प्रति अश्राथा जमती भी नहीं जय राम जी की तो थोड़ी बहुत उनकी श्रद्धा जमी
फिर नुगर लोगों ने ऐसा वैसा मछु को कह दिया वो सब बाहे चढ़ा के महाराज एकही कुल तरी विदान हे थने म गाल त पाट रखो आसा जाता छोरा जेड़ा हु ड़ा करयो हमारे जो जैसे छोरे थे ऐसे कर दो ये तो हरि बोल हरि बोल करते बस डोलते फिर आंखें इनकी बस मशगूल हो जाती है का व पहले जैसा घूमते नहीं ये नहीं करते वो नहीं करते सब शांत बैठे रहते इससे इससे क्या होगा महाराज महाप्रभु ने देखा कि अन अधिकारी को मिल गया है प्रसाद न सोचती न कांति का जैसे नादान बच्चों को
हीरे मोती जहारा दे दो तो वह हीरे मोती छूकर छोड़ देगा चॉकलेट पर राजी हो जाएगा ऐसे अल्प पुण्य वाले हैं अल्प मति वाले हैं और अनजाने में इनको मिल गए आध्यात्मिक हीरे जिस आध्यात्मिक ध्यान के लिए शांति के लिए आनंद के लिए योगी योगत योग करते भक्त भक्ति करते तपस्वी तप करते और संसारी लोग दान पुण करते कि देर सवेर हमारी ऊंची अवस्था आ जाए वह चीज इनको ऐसे मुफत में मिली और अनादर य भगवान बोले हाय भगवान बाय भगवान नहीं महाराज असा सब माची क्रूर है मगज क्रूर आए तोरी ता जो मान रख
न ूप बपो हड़ य छोकरा जेड़ा ड़ा ड़ा करे महाराज बोलता है झोपड़ा जला दोगे उसका तो मेरे को भय नहीं है लेकिन इनको जो दिया है वह सब नष्ट हो जाए अच्छा तो नहीं है बोले महाराज जैसा ऐसा कर दो नष्ट बट हम नहीं जानते अस छोरा जड़ा ड़ा करयो ब माथा को रामायण कर करता मूर्ख हृदय न चेत यद्यपि गुरु मिल बरं सम मूर्ख आदमी का हृदय कदर नहीं करता है जब ब्रह्म ज्ञानी गुरु मिले तभी भी मूर्ख आदमी उसका फायदा नहीं उठाता गौरांग ने कहा अच्छा ऐसा करो कि जो ब्राह्मण दान लेता
हो और संध्या वंदन ना करता हो भगवान के नाम का जप तप ना करता हो उस ब्राह्मण के घर का इसको भोजन खिलाओ तो इसकी भक्ति नष्ट हो जाएगी दान करने वाला आदमी का तो पाप नष्ट होता है लेकिन दान लेने वाला आदमी दान का पैसा जिसके पास आता है वह अगर भजन ध्यान अथवा परोपकार में दान की वस्तु नहीं लगाता है तो उसका प्रभाव क्षीण हो जाता है और उसके घर का अन्न मलीन हो जाता है उसके घर का अन्न व्यर्थ हो जाता है और मन व्यर्थ के संकल्प विकल्प करता है इनका मन शांत
हो गया है न सोचती ना कांति की अवस्था में आ गया है तो पापम अन्न खिलाओ तो फिर व्यर्थ के संकल्प विकल्प करेंगे और व्यर्थ के हाय घोड़ा में पड़ेंगे महाराज मासिक धर्म में आई हुई महिला के हाथ का भोजन हो अथवा दान का पैसा लेता हो न जप ध्यान संध्या गायत्री पूजन ना करता हो ऐसे लोगों के घर का अन्न खिलाओ तो तुम्हारे छोकरे जैसे थे ऐसे हो जाएंगे उन लोगों ने ऐसा ही किया और छोरों की जो ऊंची अवस्था थी भक्ति ध्यान की वह शांत हो गए कई बार मेरे पास लोग आते कि
बापू शिविर में आते तो हमारी वो सुषुप्त शक्ति जागृत होती है प्रकाश के दर्शन होते देवी देवता के दर्शन होते हैं कभी जो होने वाला होता है वो बातें हमारी बहुत ऊंची अवस्था हो गई बापू छह महीना तक तो हमारी बहुत अच्छी अवस्था थी लेकिन बाबा मैं क क्या हुआ बोले बापू मैं क द सु थ बेटा के बापा क मैं कू क दे क दे हम जीी गयो थोड़ू क दे के बापू छेला चार महीना थी मारी बंधी साधना खप गई ध्यान लागत नथी मैं क्या ध्यान नहीं लगता है तो तुमने ना खाने जैसा
खाया होगा ना करने जैसा किया होगा तो तुम्हारी जो ऊंची स्थिति एकदम ऊंची होनी चाहिए वहां तो तुम पहुंचे नहीं थे आधे में तुमने अपनी कमाई बिखेर दी इसलिए ऐसा हुआ है अभी फिर से तुम एकाद शिविर भरो फिर से थोड़ा धक्का लग जाएगा और फिर अपना आध्यात्मिक धन की रक्षा करना तो इस कथा से हम लोगों को सावधान होना चाहिए वल्लभाचार्य ने कहा भगवान रामानुजाचार्य ने कहा कि जो भक्त है जिसको भक्ति का प्रसाद मिल चुका है वो अ भक्त से बैठकर एक थाली में अथवा एक साथ भोजन ना करें उस के वाइब्रेशन से
अपनी भक्ति की रक्षा करें उसमें हे दृष्टि छूता छूत कीया वह तुच्छ है ऐसा भावन भले ना करे लेकिन अपनी भक्ति नष्ट ना हो इस प्रकार सावधान रहे जिसको गुरु मंत्र मिला है जप ध्यान करता है उसके अध्यात्मिक तरंगे और व्वस पवित्र होते हैं जिस किसी के बिस्तरे पर आराम नहीं करना चाहिए अपनी पथरी पर अपने बिस्तर पर और अपन जिस बर्तन में भोजन करते हैं उसी में करें तो उसके भक्ति की सुरक्षा रहती है ये तो अभी विज्ञान भी बांधता है डॉक्टर लोग मरीज को देखते फिर साबुन से हाथ क्यों दे धोते सूक्ष्म जर्म
से है सूक्ष्म वेव से हैं काम करते हैं तो ऐसे भक्ति के इससे भी ज्यादा तीव्र सूक्ष्म होते हैं जो निगरा है जो अभ क्त है जो शराबी कबाबी है उसके वाइब्रेशन भक्ति में डिस्टर्ब करते हैं लेकिन शराबी कबाबी भी अगर भक्ति के रास्ते चल पड़े मैंने तो यहां तक शास्त्र में पढ़ा सुना है कि 500 आदमी बैठे हो 500 लाख आदमी बैठे हो और एक ब्रह्मज्ञानी संत हो लाख आदमी चाहे कितने भी बहिर्मुखी करते-करते अपनी निगाहें डालता है वातावरण में तो वो आदमी कैसे भी हो सब के सब आदमियों को हरि भक्ति का प्रसाद
मिलता है और उनको आनंद आने लगता है इंजन तो 10 डब्बे 11 12 15 डब्बे खींच सकता होगा डीजल का इंजन लेकिन ब्रह्म ज्ञान रूपी संत इंजन ब्रह्मज्ञान जन पाया हुआ संत रूपी इंजन लाखों डिब्बों को हर जगह खींचकर भवसागर से पार के किनारे रखने का सामर्थ्य रखता है इंजन को दो डब्बा ज्यादा लगा दो तो लोड हो जाएगा पांच डिब्बे और धर दो तो यूं ही कर देगा लेकिन संत रूपी इंजन से लाखों लाखों डब्बे जुड़ जाते हैं फिर भी वह संत रूपी इंजन थकता नहीं और उसके पहिए सबको कुछ ना कुछ आध्यात्मिक यात्रा
करा देता है टला मा तेट लू तो टला मा किटल अनपेक्षित दक्ष अ अपने लिए कोई अपेक्षा नहीं अंतःकरण शुद्ध है और दक्ष है अपने आत्म प्रभाव में यह भगवत भक्ति का जादू है तुलसीदास महाराज ने कहा मेरे पास वशीकरण मंत्र है आपको मैं बता देता हूं मोट वशीकरण मंत्र है आपको मैं सिखा दूं वशीकरण मंत्र प्रेम को जो आते हैं उनकी भलाई की भावना से तुम्हारा हृदय भर दो भगवान के साथ तुम्हारा हृदय जोड़ दो फिर तुम जो बोलोगे सामने वाला वश में हो जाएगा और यह वशीकरण ना अपना बुरा करेगा ना दूसरे का
बुरा करता है बाकी जो टूना फुना करके वशीकरण करते हैं उनके वशीकरण में दो आदमी वश हुए तो तीन रूठेंगे तीन को वश करेगा तो पांच नाराज हो जाएंगे लेकिन ब्रह्मज्ञानी का वशीकरण सबसे निराला होता है कृष्ण का वशीकरण निराला है गौरांग का वशीकरण निराला है एकनाथ और मीराबाई का वशीकरण निराला है वशीकरण मंत्र प्रेम जो प्रेम न खेतो उपजे प्रेम ना हाट बिकाय राजा च हो प्रजा च हो शीश दिए ले जाए अपना अहंकार मिटा दे उस परमेश्वर में वो प्रेम का खजाना ले जाए आजकल तो लवर लवर हों को बोलते प्रेम उसमें प्रेम
2 पर होता है 98 पर सेक्स होता है प्रेम के शब्द को अपवित्र कर देते हैं लवर लवर हों का प्रेम नहीं है वह तो काम विकार है फिल्म में जो प्रेम बताते हैं ना वह प्रेम का विकृत स्वरूप है सच्चा प्रेम तो मीरा करती है कन्हैया को और कन्हैया करता है मीरा को तुम्हारे काम में तुम्हारे व्यवहार में प्रेम को मिला दो तो व्यवहार भक्ति हो जाएगा और भक्ति में भी स्वार्थ को मिला दोगे तो दुकानदारी हो जाएगी राम जी की प्रेम जब बहु व्यापी बहु जन हिताय बहु जन सुखाय होता है तो परमात्मा
बन जाता है प्रेम जब शरीर में अकता जकड़ है तो अहंकार बन जाता है और दूसरे के शरीर में रुकता है तो काम बकार हो जाता है और प्रेम जब पद पर रुकता है तो अहंकार हो जाता है प्रेम जब धन पर रुकता है तो लोभ हो जाता है प्रेम जब परिवार में मंडता है कुटुंब में मंड ता है तो मोह हो जाता है प्रेम जब व्यापक होता है तो परमात्मा हो जाता है यह वशीकरण मंत्र है जो अपने बेटे बेटियों को पालते पूछते ऐसा अगर किसी से ब्लड रिलेशन ना हो और दूसरे के बेटी
बेटों के प्रति आपर व्यवहार करेंगे तो आपका अंतःकरण का प्रेम प्रकट हो जाएगा अपने वालों से न्याय करो और दूसरों से उदारता का व्यवहार करो तो आपकी यह स्थिति जल्दी आएगी ब्रह्म भूत प्रसन्न तुम्हारा आत्मा प्रसन्न होगा पजे स्वार्थ ला तो कुतो स पूछ लो एक कुत्ता चपरासी के आगे पीछे पूछ हिलाता हिलाता किसान य किसान के नौकर के आगे पीछे पूछ हिलाता हिलाता कुत्ता जिंदगी पूरी कर लेता कुत्ता समझता कि सबसे बड़ा यही हमारा मालिक अपने स्वार्थ के लिए तो कुत्ता भी पूंछ हिलाता है लेकिन भगवान को पाने के लिए जिसने अपना दिल हिला
लिया उसका दिल दिल भर से पहुंच जाता है तुम 1215 घंटा अपने शरीर के लिए करते हो लेकिन वह शरीर एक दिन जल जाएगा राख हो जाएगा मिट्टी में मिल जाएगा शरीर मिट्टी में मिले उसके पहले तुम थोड़ा समय भगवान की प्राप्ति के लिए निष्काम कर्म करो सेवा करो जप करो स्मरण करो अच्छी पुस्तकें पढ़ो पढ़ाओ बांटो बटाओं पुस्तकें लेकर माथे पर एक गांव से दूसरे गांव ने निताल में जंगलों में गांव होते ना पहाड़ी वहां जाते किताब देते अठवाड़ा अथवा 15 दिन के बाद आऊंगा यह किताब ले जाऊंगा दूसरा दे जाऊंगा ऐसे करके उन्होंने
लोगों की सेवा की बैठे रहते आराम से रोटी मिलती चोब कीना खा पी के पेट पर हाथ घुमा के एक थे चोबा जीी बता दूं किसी को बोलना नहीं हा प्राइवेट बात है एक था चोबा जीी चोबा ने कहा कि महाराज खाना खाया भोजन किया है पेट भारी भारी है कोई तुम तो जानते हो कोई बूटी बूटी कोई इलाज मैं क्या चोबा जी क्या खाया है बोले आज तो गुजरात की गाड़ी आई थी लग्जरी बस आई थी मुर्गे मिल गए आज तो खूब माल खाया और मुर्गे मिल गए गए थे हरि भजन को ओटन लागे
कपास गए थे भगवान का भजन करने वृंदावन में लेकिन दूसरों का माल हड़प करके फाद बढ़ा दी मु जड़ टे चार मान निक थ जित डि उ गुलो पेट इतना मैं क्या क्या खाया बोले सुबह सुब सुब को भगवान का म मोहन भोग पाया मैं क्या क्या खाया उसमें बोले थोड़ा सा मन थाल थोड़ा सा मने 500 ग्राम तो होगा इतना बोले थोड़ा सा मन थाल बछ खा दो और क्या खाया बोले और तो कुछ नहीं दो तीन माल पए खाए मैं कहा और बोले और थोड़े भजिए खाए भजिए बटाका वड़ा गुजरात में बनाते बटाका
वड़ा वो बटाका वड़ा खाए मैं कहा ठीक दोपहर को क्या खाया बोले दोपहर को वही भोजन करा ठाकुर जी का महाप्रसाद मैं क्या क्या खाया बोले इतना थोड़ा सा चावल खाया और लड्डू बने थे तो इतने थोड़े से लड्डू खाए और थोड़े वो होते ना वो बनाते बर्फी बर्फी ऐसा थोड़ा खाया मन थाल की दो चार चक्की खाए और खमन खाया इतना थोड़ थोड़ा सा मैं सोचा माल तो उसका पेट इसका जय राम जी आपके शरीर को जितनी आवश्यकता है उससे दो ग्लास कम खाएंगे तो शरीर स्वस्थ रहेगा और दो ग्लास ज्यादा खाया तो आज
खबर ले नहीं तो कल खबर ले परसों खबर ले नहीं तो बुढ़ापे में भी खबर लेगा ऐसा प्रकृति के नियम में है इसलिए कम खाना गम खाना और पहले जो खाया वो पचाने और ऊपर से दूसरा ठास तो एसिडिटी होगी वायु होगा पेट में कोई गोला भागता होगा फिर समझेगा कि मुखे के करे छडयो कोई भूत कौन है प्रेत भी कौन है तोखे के ना कयो तो तोखे कहुआ युद्ध ज मैदान में भगवान तंदुरुस्ती जी गाल बचा आहार युक्ता आहार विहारस्य युक्त चेष्टा कर्म सु ठीक ठीक आहार व्यवहार करो अधिक ना खाओ अधिक बुखा मरी
मत करो कई स्त्रियां तो बस वृत वृत जो सुहागन स्त्री है जिनके पति देव हैं उन स्त्रियों को ज्यादा व्रत नहीं रखना चाहिए हफ्ता में एक आद एक टाना करें एकदम भूखा मरी का व्रत करने से पति की आयुष्य नष्ट होती है और जो गंगा स्वरूप है जिनके पति स्वर्गवास हो गए उनको हफ्ते में तीन व्रत करने से ज्यादा लाभ रहता है लेकिन एकदम बुखा मरी भी ना करे और एकदम ठास ठास के भी ना खाए एकदम उजागर भी ना करें और ज्यादा सोए भी नहीं ज्यादा बोल बोल भी नहीं करें और ज्यादा हनुमान जी
जैसा य करके भी ना बैठे बैठा दोय बकरि ही दजन बकरि उभी दुजे उठ जड़ी लगे हवा ते दीजे पुट जाओ श्री राम बैठा दोय बकरियों उभा दोय ऊंट जेवो वाय वायरो ते दए पठ सावण ना महीना मा दूध पिए ने तो के कोई विरला ने पचे बाकी तो लगभग दस्त बस्त के और कुछ शरीर की तकलीफ हो जाती है सावन के महीने में दूध नहीं पीना चाहिए और भादों में दही नहीं खाना चाहिए भादों की दही दे भूतों के और कातिक की दही दे पूतो को कती ज महीने में दही दे पटन केे दही
खा रहा है बडे में दही खा रहा है भूतनम मरे ड़ा ते अ भादो की दही दे भूतों को और कार्तिक की दही दे पूतो को तो भादों में दही नहीं खाना और सावन में दूध नहीं पीना लेकिन भगवान का नाम तो बारो मा ऐसा और 2400 कलाक कभी भी ले सकते हैं खानपान में यह खाना यह ना खाना लेकिन भगवान के भजन में ऐसा नहीं है तो चोबा जी ने खाया मैं क्या और क्या खाया बोले हमने थोड़ा सा खमन खाया मैं क्या और भी कुछ खाया बोले वो पात्रा है ना पात्रा अरबी पान
जा ना पात्रा वो खाता थोड़ा मैं क्या और भी कुछ खाया महाराज बोले बस और तो कुछ नहीं खास और तो कुछ नहीं बाकी तो क्या बस वो पूरी ई थी बस माचा मार में पेट आ कि दिल्ली दरवाजे जो मार्केट आ सब बंदर माल मैं चा कि अपना संत कृपा चूर्ण है वह साधक के हाथ से बना है किसी फैक्ट्री में होता तो करोड़ों रुपया कमा सकते थे लेकिन यह साधकों ने सेवा भाव से बनाया और सस्ता भी है और इसमें बहुत चीजें पड़ती है तुलसी के पान है जीरा है यह है वो है
तुम चोबा जीी ऐसा करो कि संत कृपा चूर ले लो उसकी दो तीन थोड़ा सा गुड़ के साथ छोटी-छोटी गोली बना लो और वोह गोली खा लो मैंने देखा यह पानी का शर्बत पिए ऐसी तो जगह भी नहीं होगी मैंने कहा कि चूर्ण की गोली बना के ले लो दो तीन तो इससे तुम्हारा हजमा भी ठीक हो जाएगा नस नाड़ी भी शुद्ध हो जाएगी और तुम्हारा स्फूर्ति भी आ जाएगा बुखार भी दूर होता है और भी बीमारियां दूर होती है इसमें बहुत सारी कीमती चीज है तो संत कृपा चूर्ण स्टाल से ले लो और उसकी
गोली बना के दो बोले महाराज तुम कैसी बात करते हो अगर दो तीन गोली रखने की जगह होती तो दो तीन लड्डू नहीं रख देता महाराज दो तीन रसगुल्ले और नहीं डाल देता महाराज मैं क्या फिर तो चौबे जी राम राम फिर तो भगवान ही आपको ठीक करे मेरे बस की बात नहीं है युक्ता हार विहारस्य जितना हित हराम से इतना हरि से होए कहे कबीर वासत को पलान पकड़े कोई स आवर रामचंद्र की जितना शराब कबाब खानपान से जीवा के लटको से जितना आ सक्ती है उतना अगर अंदर का रस पाने की इच्छा हो
तो यह अवस्था आ जाएगी ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा तुम ब्रह्म सुख ले लोगे वशिष्ठ महाराज को भगवान शंकर कहते हैं कि मुनि शादुल जो एक पहर इस ब्रह्म परमात्मा के रस में रहता है उसको अश्वम कई अश्वमेघ यज्ञ करने का फल होता है जिन साधु संतों के दर्शन से संसारी लोगों की चिंताएं दूर होती है पाप नष्ट होते हैं और हृदय कमल खिलता है अर्थात जिन ब्रह्म ज्ञानी संतों से अर्थात जिन आत्म वेता संतों के दर्शन से संसारी लोग पवित्र होते हैं यह संत भी अंतर्यामी परमात्मा के अमृत से खुद आनंदित और पवित्र होते हैं
और दूसरों को भी पवित्र करते हैं यह भगवान का ज्ञान और ध्यान पवित्र करने वालों को भी प पवित्र करता है इस आत्मदेव की महिमा इस ब्रह्म ज्ञान की महिमा जितनी करो उतनी कम है किसी एक ऊंचे संत ने अपने गुरुदेव से पूछा कि बाबा जी शास्त्रों में हमने गीता में सुना है कि ब्रह्म ज्ञान की महिमा है गुरुवाणी में सुना है ब्रह्म ज्ञानी की महिमा है ऐसा कोई सत ग्रंथ है जिसमें ब्रह्म ज्ञान की महिमा ना हो बोले जिस जिस सत ग्रंथ में ब्रह्म ज्ञान की महिमा नहीं है वह सत ग्रंथ सत ग्रंथ भी
नहीं है ऐसा आज तक हमने कोई सत शास्त्र नहीं देखा जिसमें ब्रह्म ज्ञान की महिमा ना हो चाहे रामायण हो भक्ति का ग्रंथ है फिर भी ज्ञान की महिमा है तुलसीदास जी महाराज कहते हैं घट में है सूझे नहीं नालतली ऐसे जीव को भयो मोतिया बिंद राम नाम जिम जपही जाग ही जोगी प्रपंच रंच रंच वियोगी ब्रह्म सुख अनुभव अनुपा अकथ अनामय नामन रूपा रामायण में इस ब्रह्म ज्ञान की महिमा है भागवत में महिमा है उपनिषदों में महिमा है ब्रह्म सूत्र में महिमा है वेदों में ब्रह्म ज्ञान की महिमा है कोई भी सच्चा संत ऊंचा
संत होगा वह आत्मज्ञान की महिमा सुने सुनाए बिना नहीं रहेगा गीता में भागवत में रामायण में तीन प्रकार के सिद्धों की कथा आती है जञा न सिद्ध ब्रह्म ज्ञानियों की कथा आती है जड़ भरत सुखदेव जी वामदेव जी राजा जनक सुलभा योगिनी स्वयं प्रभा लड़की 18 साल के ब्रह्म ज्ञानी थे उनकी महिमा आती है तो ज्ञान सिद्धों की महिमा आती है भक्त सिद्धों की महिमा आती है जैसे मीरा है शबरी है राजा अमरीष है या दूसरे बहुत सारे योग सिद्धों की भी महिमा आती है पतंजलि महाराज है और दूसरे कई योगियों की बात आती है
लेकिन भभु सिद्धों की महिमा किसी शास्त्र में हमने देखी सुनी नहीं तो भभूत निकालते उनको भी हमारा धन्यवाद है जो भी कुछ जो करते हैं हमारा किसी से विरोध नहीं हमारा तो इस श्लोक पर ध्यान खिंचवाने का हेतु है कि आप लोग इन चीजों में रुक मत जाना आप भगवान के इन वचनों को मानना फिर से दोहराना ब्रह्म भूत प्रसन्ना आत्मा ब्रह्म भूत प्रसन्ना आत्मा ब्रह्म भूता प्रसन्ना आत्मा ब्रह्म भूता प्रसन्ना आत्मा न सोचती न कांति न सोचती न कांति सम सर्वे शु भूतेषु सम सर्वे शु भूतेषु सम सर्वेश भूतेषु समा समा सर्वेश भूतेषु मद
भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते पराम भक्ति कई प्रकार की होती है एक भक्ति होती है वैदी भक्ति जो कुल की परंपरा से बच्चे करते हैं बह फिर बड़े होते हैं वो करते हैं माया भाई सब लोग करते हैं उसको वैदी भक्ति कहते हैं सिंधी है तो झूलेलाल की सेवा पू करेगा और कच्छी है तो अपने अपने देव की देवी की पूजा करेंगे उसको वैदी भक्ति बोलते वैदी भक्ति करते करते कोई पुण्य जोर करे सत्संग मिल जाए तो वैदी भक्ति वाला फिर भगवान की साक्ष्य भक्ति में भगवान
को सखा मानेगा अथवा दास भक्ति करके भगवान के साथ कुछ अपना त्व ज्यादा बनेगा फिर उसके बाद एक कदम और रागा भक्ति भगवान में राग और भगवान के प्यारे संतों के वचन में राग हो जाएगा वैदी भक्ति गौड़ी भक्ति रागा भक्ति इस भक्तियोग बढ़ते बढ़ते जब ऊंचाई आती है तब इस भक्त को परा भक्ति मिलती है जब परा भक्ति मिलती है तो परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है जैसे केजी में पढ़े फिर मिडिल हाई स्कूल में पढ़े स्कूल में पढ़े कॉलेज में पढ़े और फर पीएचडी हो गए ऐसे ही परा भक्ति यह भक्ति की पराकाष्ठा
है कमाल के पास परा भक्ति का प्रसाद था भगवान का नाम तो सब लोग जपते हैं राम राम तो मेड़ वो फुटपाथ प भीख मांगने वाले भी राम राम बोलते हैं राम राम बोलना अच्छा है इससे लाभ तो होता है लेकिन वो गोड़ी भक्ति रागा भक्ति या परा भक्ति है तब तक उनके जीवन में बड़ा चमत्कार नहीं दिखता है और प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांति का अनुभव नहीं होता है जब परा भक्ति होती है तो उनका जीवन धन्य हो जाता है ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांती समा सर्वेश भूतेषु सब भूत प्राणियों
के प्रति उस पुरुष की क्षता रहती है सुख देने वालों के प्रति उसकी आसक्ति नहीं और दुख देने वालों के प्रति उसके दिल में नफरत नहीं दिल जा दरवाजा मुह खोल्या हर कला क जड़ा छो विचार त में िड़ माण कड़ा कड़ा हर कला हित जाए जरी हर कता मा वारी नन साछ मु जो मतलब मुजी दुनिया [संगीत] री जो मजहब प्यार करनवा प्यार करया मा जो मजहब प्यार करनवा प्यार करया मर कख म जो प्यार अजल अन खुट खूब विराया हर कखे प्यार ही मु जो मालिक खालिक प्यार संधी दिलदारी नन साचा मुज मतलब
मुझी दुनिया न्यारी मुझी दुनिया न्यारी हो साधु मुझी दुनिया न्यारी न साचा मुज मतलब मुझी दुनिया न्यारी दिल जा दरवाजा मु खोला हर एक लायक जड़ा दिल जा दरवाजा मु खोल हरला जड़ा सो विचार तह में िड़ ना मानू कड़ा कड़ा विचार त में घि मान कहना कहना हर कला हित जा हर कता मा वारी हर कला हित जाए जरी हर कता मा वारी न साचा मु मतलब दुनिया री नन साचा मुजो मतलब मुंजी दुनिया न्यारी [संगीत] जो मजहब प्यार करनवा प्यार करया मा हर मब प्यार कर प्यार कर मा जो मजहब प्यार कर प्यार
कर मा हर क मजब प्यार कर प्यार कर मा हर [संगीत] ब्रह्म वेता का मजहब क्या है उसका पंथ कौन सा है जो ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांश की उस अवस्था पर पहुंचाए उस संत का वर्ण क्या है आश्रम क्या है मत क्या है मजहब क्या है उसकी पार्टी कौन सी है कई कांग्रेसी नेता मेरे शिष्य हैं और कई भाजप के नेता भी मेरे भक्त और शिष्य हैं कई लोग मुझसे पूछते हैं और मध्य प्रदेश सरकार के कई मंत्री आके कथा में बैठे हो सुंदरलाल पटवा बेचारे लोगों के सामने गदगद वाणी में
रो पड़े और मत्था टेकते हुए बोले कि स्वामी जी हम आपसे कुछ नहीं मांगते एक चीज तो जरूर मांगेंगे कि राजकारण की दलदल में है काजल की कोठरी में हूं कहीं काजल की कोठरी में जीते जीते कहीं इस गंदगी का मेरे हृदय पर असर ना हो ऐसी आप मेरे को दुआ कर देना अब वो मध्य प्रदेश का मंत्री सीएम वह भी मेरे मेरे को अपना मानता है और उनके एंटी लोग भी मेरे को अपना मानते हैं कुछ पत्रकार मेरे से पूछते कि बाबा तुम कौन सी पार्टी के हो जय राम जी की कुंभ के मेले
में बाबा 80 70 % प्रजा तुम्हारे पास बाकी पूरे कुंभ में 30 % लोग तो तुम आखिर किस पार्टी के हो जिस पार्टी के तुम हो उस पार्टी का विजय हो जाएगा मैंने कहा मैं किसी पार्टी का नहीं सब मेरी पार्टियां है मैं किसी पार्टी का नहीं मैं कोई जड़ चीज नहीं कि बिकाऊ चीज नहीं कि मैं इस पार्टी का हो गया उस पार्टी का हो गया मैं तो भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं और भगवान की जनता जनार्दन सब पार्टियां भगवान की है तो सब पार्टी मेरी है मैं किसी पार्टी का नहीं लेकिन
सब पार्टी के जो अच्छे लोग हैं उनको मैं विशेष प्यार करता हूं और जो बुरे लोग हैं उनसे मैं विशेष दुआ मांगता हूं वीआईपी कोटा की कृपा करके उनका भी मंगल कर दे मैं तो उसकी पार्टी का हूं दिल जा दरवाजा मुंह खोला हर क ला हिक जड़ा सो विचार तह रंदा माणु कड़ा कड़ा हर हिक लाय हित जाए जझ हरकता मा वारी अगर तुम किसी एक मजहब के किसी एक मोहल्ले के होगे तो दूसरे मोहल्ले के साथ तुम्हारा राग द्वेष होगा अगर तुम एक पार्टी के हो ग तो दूसरे पार्टी में अच्छे लोग होंगे
उनके लिए भी तुमको जरा कटु बात तो बोलनी सोचनी पड़ेगी उसमें राग द्वेष होगा हृदय की शांति का भंग होगा अगर तुम भगवान की दृष्टि से जियोगे तो सबके लिए तुम्हारे हृदय में स्नेह रहेगा और छोटी मोटी बातों में तुम्हारा हृदय उलसत उलझी नहीं होगा हम जब संकीर्णता बनाते हैं तो अंदर में शत्रुता और मित्रता राग और द्वेष क्रिएट होता है हम जब विशाल हदय बनाते हैं तो शत्रुता मित्रता क राग द्वेष कम होकर आत्म भाव जगता है और वही आत्म भाव देर सवेर परमात्मा भाव में बदल जीवात्मा को परमात्मा का साक्षात्कार करा देता है
मैंने सुनी है वह छोटी सी अकबर बीरबल की कहानी एक बार बीरबल देर से आए थे अकबर को दिल लगी करने की आदत थी बीरबल से कुछ सीखने को मिलता था अकबर ने क्या किया अपने मित्रों को जो साथ में इर्दगिर्द बैठे थे मंत्रियों को कहा कि तुम सदैव बोलते हो कि बीरबल बीरबल को हम प्रेम करते हैं लेकिन आज तुम और हम सब मिलकर बीरबल की खूब मजाक उड़ाएंगे बर बलि के बच्चे को भी पता चलेगा आप अब मैं बीरबल से कोई बात करूं तुम जोर-जोर से हंसी उड़ाना फिर देखो बीर बलिया क्या करता
है आपस में साजिश कर दी देखते देख देखते बीरबल आए और बीरबल को आते देखकर राजा अकबर भी हंस पड़ा और मंत्री भी हंस पड़े जैसे कोई अनजाना आदमी और एका एक हंस पड़ो तो उसको जरा गिल्टी लगे ऐसा सब साथ में हंस पड़े बीरबल समझ गया कि आज कुछ दाल में काला है य समझ कहां से आई बीरबल 11 साल का था बीरबल को किसी संत से उसकी मां ने सरस्वती मंत्र दिलाया था और उस मंत्र से बुद्धि शक्ति का विकास हुआ था अपने आश्रम में जब बच्चों की शिविर होती है तो तेजस्वी बच्चों
को मैं सरा स्वत्य मंत्र देता हूं और स्कूल में तो व चमत्कार कर देते हैं घर और कुटुंब में भी वे बच्चे बिल्कुल कुछ निराले से महसूस होने लगते हैं यह मंत्र का प्रभाव है और इसी कारण तो कनेडा से अमेरिका से मद्रास से और दिल्ली से भी बच्चे आते हैं शिविर भरने को चार दिन की शिविर अटेंड करने को आते अच्छा तो बीरबल ने देखा के दाल में काला है बीरबल शांत हो गया कोई आपकी हंसी उड़ाए अपमान करे तो आप उसी समय डिसीजन मत लेना नहीं तो आपकी मनोदशा ची हो जाएगी बीरबल की
ना शांत होकर बैठना अंतर्यामी में गोता मारना अकबर ने कहा बीरबल मैंने बड़ा विचित्र स्वपना देखा है बोले जहांपना अच्छा बोले हां बहुत मजे का स्वपना देखा बोले हजूर ठीक है कह दीजिए बोले जरा ऐसा वैसा है बोले फिर कह दूं रबल बुरा तो नहीं मानोगे बोले नहीं नहीं महाराज जहां अपना बोले हम बुरा क्यों माने बोले तुम और हम घूमने गए थे मेरे को सपना आया घूमते घूमते घूमते हम लोग भटक गए फिर दो हौद मिले दो स्विमिंग पूल मिले ऐसा मान लो एक में तो शुद्ध दुग्ध भरा था उसमें तो मैं न आया
और दूसरे में गटर का पानी था नाली का गंदा मैला एकी बेकी का कचरा सब कुछ उसमें था बीरबल तुम उसमें जाकर गिरे वो मंत्री सब जोर से हंस पड़े बीरबल उसम जाकर गिरे बीरबल उसम जाकर गिरे उसमें जाकर गिरे हा हा लेकिन बीरबल शांत है मंत्र का प्रभाव है एकाग्रता का प्रभाव है हंसी उड़ाकर लोग तुम्हें दुखी करना चाहे उस समय तुम दुखी हो गए तो तुम लोगों के खिलौने हो गए दुखी करना चाहे फिर भी तुम शांत रहे तो तुमने उन खिलौनों को लात मारकर गेंद बना दी और तुम सफल हो गए सफलता
सिखाने की कुंजी ये सत्संग है बीरबल ने कहा अच्छा राजन बड़ा आपको विचित्र स्वपना आया है लेकिन स्वपना पूरा हो गया अकबर ने कहा मैंने तो इतना ही देखा बीरबल कहता है जहां पर ना मैंने और थोड़ा आगे का देखा जो मालिक को स्वप्ना आया वही इस दास को भी आया था हम दोनों भटक गए थे और हम दोनों होद में गिर गए थे मेरे को भी स्वप्ना आया मंत्री और राजा हंसता कि हां फिर तुम गिर गए तो बोले मैं मैं तो उसी गंदे होद में गिर गया जहां पना और आप दूध के मलाई
मावे के होद में गिरे और महाराज आप तो आप ही हैं मैं तो उस गंदे होद में गिरा लेकिन हम लोग जब गिरे तो नहा के जब बाहर निकले तो हम लोगों के पास पहुंचने के लिए कपड़ा नहीं था त आल नहीं था तो राजन फिर क्या हुआ हमने सोचा कि एक दूसरे को चाट चाट के पहुंच ले तो मैंने जहां पना के शरीर को चाटा मक्खन मिश्री मलाई चाटी और आपने मेरा वो जो नाली का एकही बेकी का मसाला था महाराज आपने वो चाट लिया ऐसे को तैसा ब्राह्मण कोना ऐसी सुना दी उल्टे मुंह
की दे दी के अकबर नीचे और वो हंसने वाले तो फंस पड़े कि राजा साहब को ऐसा सुना दिया तो अब राजा खिल्ली करने गए मजाक करने गए उसकी मजाक हो गई ऐसे मौत सब पर राज्य करता है और मौत तुम पर भी खिल्ली करे और तुम पर मजाक करे के अ इस मेरा मेरा कहने वाले चल बंदे अब मैं तेरे को उठा ले जाता हूं मौत तुम्हारा सब छीनकर उठा के ले जाए तुम पर मजाक करे उसके पहले तुम मौत पर मजाक करो कि तेरी तेरी दाल मेरे शरीर तक गलती है मुझ आत्मा तक
तेरा प्रभाव नहीं पड़ता है उल्टे मुंह की मौत को सुना दो इसी का नाम गीता का ज्ञान है इसी का नाम संत का संग है जे को जन्म मरण ते डरे साद जिना की शरणी पड़े जे को अपना दुख मिटा वे साद जिना की सेवा पावे ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांती सुख के लिए आकांक्षा फिर नहीं रहती है सुख के लिए सोच विचार नहीं होता है तुम्हारा सहज जीवन होता है नानक बोले सहज स्वभाव तुकाराम महाराज कहते हैं मना जगत में सर्व प्रकारे सुखी कौन आए तुम शोधुनि पाहे गहरी यात्रा करने के
बाद तुकाराम को अनुभव हुआ दृष्टि ज्ञानम कृत्वा पत हरि रेव जगत ब्रह्म ज्ञान की दृष्टि जगा दो सब प्रकार से आदमी सुखी हो जाएगा चलो गीता के श्लोक को फिर से दोरा दे गीता भगवान के मुंह से निकली हुई गीत वाणी है गीता पापनाशिनी है भग भन के श्री मुख से निकले हुए श्लोक को आप भी दोहराए ब्रह्म भूत प्रसन्ना आत्मा ब्रह्म भूता प्रस आत्मा ब्रह्म भूता प्रसन्ना आत्मा ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा न सोचती न कांति न सोचती न कांति सम सर्वे समा सर्वेश भूतेषु समा सर्वेश भूतेषु सम सर्वेश भूतेषु मद भक्ति लभते पराम मद
भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते पराम मद भक्ति लभते पराम वो ब्रह्म भूत ब्रह्मा को जानकर ब्रह्म वेता ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ब्रह्म वेता ब्रह्म वित भवती ता की वाणी वेद ऐसा ब्रह्म भूत पुरुष जो वचन बोलता है वह शास्त्र की नाई कल्याणकारी हो जाता है भगवान बोलते वो ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा जो अपने आप में संतुष्ट है खुश है सुखी है ऐसा पुरुष ना सोच विचार करता है ना आकांक्षाएं करता है सुख के लिए और ऐसा इच्छा वासना रहित पुरुष सब कुछ व्यवहार करते हुए भी अंदर में अकता अभग पद में प्रतिष्ठित है
वह ना शोक करता है ना मोह करता है सब प्राणियों के प्रति संभाव से सबके कल्याण के निमित्त से ही उसका अपना आचरण व्यवहार होता है जैसे सूर्यनारायण सबके कल्याण के निमित्त प्रकाश देते हैं गंगा सबके कल्याण के निमित्त बहती है फिर चाहे गौ गंगा का पानी पिए चाहे हिंसक शेर आकर गंगा का पानी पिए गौ और शेर के लिए गंगा सम भाव से बहती है ऐसे उस ब्रह्मज्ञानी वाणी की ब्रह्म ज्ञानी महापुरुष की ज्ञान गंगा सब प्राणियों के हित के लिए बहती है जैसे भगवान की वाणी सबके हित के लिए होती है ऐसे भगवान
को पाए हुए भगवत प्राप्त महापुरुष ब्रह्म भूत प्रसन्न आत्मा पुरुषों की वाणी भी सबके मंगल की होती है हित की h [संगीत]