प्रेसिडेंट मिस्टर कुली कुली बड़ा कम बोला था साथी चाहते थे कि कुछ बोले ज्यादा बोले कुली समझते थे कि वाणी को व्यर्थ करना ठीक नहीं जैसे भगवान गणपति ने व्यास जी को कहा बच्चों गुप्ति रखनी चाहिए वाणी की शक्ति का सत उपयोग करें बाकी की वाणी बचा कर रखे व कुली बचो गुप्ति के रहस्य को थोड़ा बहुत कैसे जाना मित्रों ने एक महफिल रची कि कुछ भी हो आज इनको बुलवाएं खूब एक चतुर चपल स्त्री को कांटेक्ट दिया भोजन बनाओ और हम लोग डिनर पार्टी करें तुम बार-बार कुली से पूछो कैसा बना क्या है ऐसा
करके कुछ तो व्याख्या करें यह बहुत कम बोला आदमी उस भोजन परोसने वाली चतुर चालाक चलती पुर जी ने बहुत ट्राई की यह कैसा बना है कुलि ने इशारा किया यह कैसा है बार-बार घूम फिर के कोलीज को परोसे और कोलीज को छेड़े के क्या है आखिर कुली ने कहा ऑल इज गुड बस कुली के अपने चार साल पूरे हुए साथियों ने कहा कि तुम बच्चो गुप्ती नहीं बोलते और मौन और तुम्हारा थोड़ा बोलना बड़ी असर करता है जो व्यर्थ की बकवास करते उनकी वाणी की कोई वैल्यू नहीं होती लेकिन जो वाणी की रक्षा करते
साधन काल में और फिर जब बोलते हैं तो उनकी वाणी सुनकर हजार दो हजार नहीं लाख दो लाख नहीं करोड़ों लोग पावन हो जाते हैं जो इस रहस्य को समझते हैं हम मौन रखते थे साधना काल में गुफा में रहते थे तो अकेले रहते थे तो बोलने का प्रसंग ही नहीं आता अभी भी हम सत्संग में सार सार बात बोलने पर ध्यान देते हैं लंबा विस्तार या फालतू बातें ना आए ऐसा हम ध्यान रखते हैं कि कम समय में कम शब्दों में आप लोगों का ज्यादा भला हो जाए आप लोगों का ज्यादा मंगल हो जाए
को साथियों ने कहा कि तुम चुनाव लड़ने के लिए प्रचार ना भी करोगे केवल तुम फारम भ दो दूसरी बार प्रेसिडेंट होने को आप निश्चिंत दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति हो जाओगे मैं तो शाबाश देता हूं कुलजी ने क्या आई हैव नो टाइम अब मेरे पास वेस्ट करने के लिए टाइम नहीं मैंने वाइट हाउस में रहकर देख लिया है मैंने लोगों का थैंक्स देख लिया है ये क्या काम आएंगे मुझे कैसा रहा होगा वह बुद्धिमान राष्ट्रपति बिल्कुल तैयार है दूसरी बार आप आराम से आ जाएंगे आपको स्पीच भी नहीं करनी पड़ेगी हम व्यवस्था कर लेंगे
आपकी बड़ी इंप्रेशन है बोले इंप्रेशन है तो क्या है टाइम वेस्ट करूं मैं प्लीज एक्सक्यूज मी आई हैव नो टाइम मर कुले राष्ट्रपति पद से निवृत होकर शांति के रास्ते चला मैं तो शाबास दूंगा कनेडा के प्रेसिडेंट को मिस्टर ट्रूडो को ट्रूडो ने जब गीता पढ़ी ट्रूडो का हृदय भर गया गीता का की जन्मस्थली देखने को 85 86 19 86 में मैंने सुना है कि वह ट्रूडो आए थे ट्रूडो रिजाइन करके एकांत गए दूध के लिए गाय रखी और आध्यात्मिक पोषण के लिए उसने उपनिषद और गीता रखी और अंतर आत्मा में विमल विवेक में उसने
आगे की कच की क्या इन बुद्धिमान की कथा सुनकर आप अपना विमल विवेक नहीं जगा सकते क्या जगा सकते हो ईश्वर की र बार-बार पढ़ो और भाई लोग तो कभी कभार शमशान में जाए और मन को बोले कि देख बेटा इथे आना सतन व देखले य तेरा आखिरी एड्रेस है जिसको तू मैं मानता वह मुर्दा इथे जलेगा अगर मुसलमान है तो बता दे कि यह कब्रस्तान तेरा आखिरी ठिकाना कम वक्त यहां गाड़ देंगे और जब कयामत होगी तभी तेरा कल्याण होगा इस कल्पना को छोड़ मौलाना जलालुद्दीन रूमी की नाई अथवा दारा से को कीना तोत
उपनिषद और गीता को समझ के अभी ब्रह्म ज्ञान पाके अभी अनलक बोल दे यार मंसूर की [प्रशंसा] नाई क्या विमल विवेक है सुकरात का महापुरुषों के चरणों में हजारों लाखों लोग जाते उनको सुख मिलता है शांति मिलती है ज्ञान मिलता है प्रेरणा मिलती है आरोग्यता मिलती है न जाने कितना कितना कुछ मिलता है बदले में लोग कुछ ना कुछ देते हैं तो महापुरुष फिर वही चीजें समाज की उन्नति के लिए लगा देते ऐसे संतों के लिए भी कुछ का कुछ कु प्रचार करने वाले और षड्यंत्र रचने वाले लोग अना काल से चले आ रहे बाबा
नानक ने क्या लिया रूखी सुखी रोटी ली कभी कणा प्रसाद खाया होगा कभी रथ में बैठे होंगे यात्रा के लिए कभी पैदल भी इतनी सारी मुसीबत सही जिस महापुरुष ने उस महापुरुष को भी नालायक लोगों ने बाबर बादशाह के जैल में धकेल दिया दुनिया जानती ऐसे ही सुख रात को दुष्ट लोगों ने ऐसे च मेंला दिया कि सुकरात को सर सरकारी तौर से मृत्यु दंड घोषित हो गया मृत्युदंड कैसे कि सुकरात को जहर का प्याला फलानी दिन को फलानी जगह पर पिलाना पड़े सुकरात के मित्र जो शिष्य थे वे मृत्यु के दिन नजदीक आने की
छूट छाट लेकर आए वे आंसू बहा रहे रो रहे हैं सूली पर चढ़ाए मनसूर को कहते कि अभी भी तुम्हें मौका है अगर जान बचाना चाहते हो तो अनलक ना कहो अन हक कह दो बोले नहीं हो सकता है अनलहक अनलक आवेश द्वेष विवेक हीन मूर्खों ने ऑर्डर कर दिया और मनसूर शूली पर चढ़े शूली का अपना जो कुछ व्यवस्था था हुआ हुआ और व महापुरुष ने जाते जाते कहा कि अनलक जिसको मौत मारती है व मैं नहीं मैं तो सत्य स्वरूप खुद खुदा स्वरूप ब्रह्म सुकरात के शिष्य आंसू बहा रहे हैं समय होने की
तैयारी है बज रहे हैं पांच सुकरात उठे जहर घोलने वालों को बोला के तुम समय देखो टाइम हो गया है इतना धीरे से घलते हो तो कब दोगे तुम उन्होंने कहा कि अजीब इंसान हो हम तो चाहते कि तुम्हारा जैसा नेक इंसान थोड़े स्वास और ले ले इसलिए हम जानबूझकर स्लो काम कर रहे हैं धीरे कर रहे हैं 10 पाच शवास और जी लो तुम सुकरात ने कहा नहीं नहीं हम 10 पाच स्वास क्या जिएंगे हमारी तो मौती नहीं होती भैया जिसका जन्म हुआ था वह मरेगा तुम अपना ड्यूटी करो टाइम सर घोलो जल्दी करो
नौकरों ने रगड़ ज्यादा जल्दी मारी जहर का प्याला पिस लिया तैयार कर लिया सुकरात के हाथ में थमाया और सुकरा जैसे कोई पानी का गिलास पी रहे हैं शरबत पी रहे ऐसे पी लिया चीखने लगे मित्र रोने लगे सेवक सुकरात लेट गए बोले चीखने का वक्त नहीं है पागलो यह रोने का वक्त नहीं है जो जीवन भर यह ताबूत तुम्हें नहीं सिखा सका वह अभी प्रैक्टिकल प्रयोग से तुम्हें सिखा रहा है सुनो अब ये शरीर के अव्यय मर रहे हैं पैर ठंडे हो गए पैरों तक की चेतना समेटी गई है अब घुटनों तक आ गया
इसका असर अब साथल तक आ गया जांघों तक आ गया अब जांघों से ऊपर चला है इसका प्रभाव अब यह मरोट रहा है जीवनी शक्ति को शरीर की जीवनी शक्ति को इस यंत्र को मरोट रहा है यह मेरा यंत्र अब खलास होने की तैयारी है मेरा यंत्र खलास होने की तैयारी है ऐसे मैंने यंत्र पापा करर छोड़ दिए जिनकी गिनती हो नहीं सकती लाख दो लाख करोड़ दो करोड़ पाच करोड़ 50 करोड़ अरब खरब बोले नहीं हो सकती गिनती सृष्टि अनादि काल से है तो माया भी अनादि काल से है प्रकृति अनादि काल से है
तो जीव भी अनादि काल से है ईश्वर भी अनादि काल से और ब्रह्म अनंत अनादि है ये सारे अनादि काल से चक्र चल रहे हैं जो ब्रह्म को जानता है वह अनंत अनादि हो जाता है और बाकी के सब शांत हो जाते उसके आज यह सारे अनादि शांत हो गए और मैं अनंत अनादि हो रहा हूं और तुम रो रहे हो देखो य अनादि चक्र अब पूरा हो रहा है अब हम दोबारा ना जन्में ना मरेंगे हम ब्रह्मा होकर सृष्टि करेंगे विष्णु होकर पालन करेंगे खुदा होकर सबके दिल में व्याप रहेंगे देखो मृत्यु किसकी होती
है शरीर की मृत्यु हो रही है और मैं उसे देख रहा हूं पागल हूं मैं नहीं मर रहा हूं तुम मुझे मरता हुआ समझ रहे हो जीवन भर मेरा यही संदेश था अब कम से कम कम भक्ति छोड़ो मौत के समय तो यह मान लो वि विवेक जगाओ कि तुम भी वही हो जो मैं हूं तुलसी हरि गुरु करुणा बिना विमल विवेक न होई बिन विवेक संसार गोर निधि पार न पावई कोई वृंदावन में एक बड़े उच्च कोटि के संत थे आनंदमय मां भी उनके चरणों में जाकर बैठती थी आनंदमय मां के वे मित्र संत
थे हाथी बाबा उड़िया बाबा और दूसरे भी संत थे तीन बाबा चौथी आनंद महिमा वो भी बाबा थी नेहरू उनके चरणों में मथा टेक के अपना भाग्य बनाते थे और इंदिरा बार-बार उनके पास जाकर अपनी मुकद्दर को संवारने का मौका ले लेती थी इस बात में मैं इंदिरा को भाग्यशाली मानता हूं बुद्धिमान मानता हूं महापुरुष के चरणों में प्राइम मिनिस्टर पद मिलने के बाद भी महापुरुषों के चरणों में श्रद्धा भक्ति से नीचे बैठना यह कोई मजाक की बात नहीं अहंकार बैठने नहीं देता सिक्योरिटी की मुसीबत महापुरुषों के चरणों में पहुंचने नहीं देती लेकिन वह पहुंचती
थी इंदिरा गांधी पंडित भी कभी कभार आनंद में मां उड़िया बाबा हरि बाबा और हाथी बाबा य तीन बाबाओं के साथ य बाबा रूप आनंदमय मा बड़ी खूबसूरत थी जब शादी हुई बड़ी महा सुंदरी थी बाहर की सुंदरी तो थी लेकिन भीतर भी बड़ी सुंदरी थी वह देवी शादी हो गई पति जैसे सब पति समझते पत्नी को भोग की मशीन वैसे ही पति समझकर उसके साथ केली करने की चेष्टा करते लेकिन विमल विवेक है उस देवी का पति को समझाया कि यह शरीर को सुंदर दिखता है लेकिन ये चमड़ा है हार्ड मास है आप अपनी
ऊर्जा को नष्ट क्यों करे और मैं अपनी ऊर्जा को क्यों नष्ट करूं इधर उधर की बातें करके विमल विवेक का प्रकाश देकर उनको सुला दिया अलग से एक हफ्ता दो हफ्ता बीता फिर उसके मन में हुआ वही विकार की बात ऐसे कुछ महीने बीते व देवी क्या करती जो सुन रखा था सत्संग से जो पा रखा था वह दुल्हन घर में चने की दाल स्ट पर रख दी और छत पर जाकर बैठ गई ल गया ध्यान दाल उबल उबल के कोल से हो गई कुटुं ने टोका रोका लेकिन जिसको विमल विवेक मिला है रब का
रस मिला है वो दाल के रस को कब तक संभालेगा फल के रस को कब तक संभालेगा जिसको सफल जीवन बनाने का फल मिल गया आत्म ज्ञान गुरु की कृपा हरि गुरु करुणा बिना गुरु और हरि की करुणा मिल गई उसकी साधना और अंदर की मस्ती बढ़ गई जहां राम तहां नहीं काम जहां काम तहां नहीं राम जहां काम विकार का केंद्र है वहां राम का रस नहीं और जहां राम का रस आता है वहां काम नहीं टिक सकता है सब अलग-अलग विभाग है वहां स्थिति होने लगी हृदयेश्वर के आनंद में तो वहां काम का
भाव कैसे ठीक लेन पति अभी पति बनकर बैठा है एक रात को सोचते सोचते उस परमेश्वर का ध्यान करते करते विमल विवेक की धनी उद देवी मध्य रात को जगी पति को ठंड हो रहा चल उठ उठ पति खुश हुआ के वाह आज ये सोने की रात हमारे लिए आज तो सुवर्ण का दिन सुवर्ण नाइट गोल्ड नाइट वास्तव में उस गोल्ड नाइट हो रही थी वास्तव में हो रही थी और जो मूर्ख सेक्स करके गोल्ड नाइट समझते उनकी तो मौत नाइट होती है कमर तोड़ नाइट बनती उनकी उस आनंद महिमा के मैंने सुना है जो
कहलाने वाले पति थे सच्चा पति तो परमात्मा है शरीर का पति तो कहलाने वाले पति पत्नियों का जो तुम जानते हो वही बुलाया मैं साक्षात जगदंबा हूं मैं आद्य शक्ति हूं मैं ब्रह्म हूं जा पूजा की थाली ले आ सेवा कर पूजा कर विमल विवेक में ब्रह्म भाव में जो वचन होता है ना पत्थर पे लकीर हमने उस रब की महिमा का कुछ स्वाद लिया है मुझे पता है क्या-क्या होता [प्रशंसा] है प्रकृति उसकी आज्ञा टाल नहीं सकती लेकिन ऐसे महापुरुष बार-बार प्रकृति में हस्तक्षेप नहीं करते राम कृष्ण ने गुलाबी पौधे में सफेद फूल उभार
दिए शिष्यों का तर्क था कि आत्मशक्ति से प्रकृति पर विजय हो सकता है गुरु जी बोले होता है प्रकृति अपना नियम बदल देगी गुरु जी बोले बदल देगी क्या योगी चाहे तो बरसात कर सकता बोले कर सकता है रोके तो रोक सकता है रोक सकता है मुर्दे में प्रा का संचार कर सकता है बोले कर सकता है गुरु जी यह पौधे में जो गुलाबी फूल खिले हैं गुलाब में क्या उसमें सफेद कर सकता है समर्थ योगी बोले क्या बड़ी बात है बातें होते हुए शिष्य विदा हुए दूसरे दिन आए तो देखा कि ठाकुर के कमरे
के पास जो पौधा था गुलाबी रंग लिए हुए गुलाबी फूल लिए हुए उसके साथ ही साथ उसी पौधे में सफेद फूल खिले बोले गुरु कैसे बोले कभी कवार सत्य की महता बताने के लिए जोगी के हृदय में स्फना हो जाता है यह करना नहीं पड़ता यह नाटक करके मदारी जैसा खेल नहीं है यह तो मौज है फकीरों की रब की मौज होती तो फकीरों की मौज हो जाती हरि और गुरु दिखते दो है लेकिन वो ब्रह्म दोनों में एक ही है ईश्वर गुरु रात में ती मूर्ति भेद भी भागन त व्याप्तम देवाय तस्मै से गुरुवे
नमः ईश्वर और गुरु मूर्ति भेद से दो दिखते हैं बाकी तो वही एक ही सच्चिदानंद है संत को संत कहा तो क्या हो गया गुरु को गुरु कहा तो क्या बड़ी बात है लेकिन जब गुरु को भगवंत कहते और भगवंत को जगतगुरु बोल देते वंदे कृष्णम जगतगुरु तो उनका सम्मान है सेठ को सेठ कह दिया तो क्या बड़ी बात है जब कह दो कि ये तो कुबेर है हमारे तो उनका सम्मान हो गया गुरु नानक को गुरु नानक कह दिया तो क्या हो गया कह दो कि हमारे तारणहार है सच्चे पाशा है तो उनका सम्मान
हुआ महाराज आनंदमय मां ने कहा मैं जगदंबा हूं पूजक कर उसने पूजा की व्यवहार दृष्टि से तो पति से पूजा करवाना भारतीय परंपरा में गलत लेकिन उसका विमल विवेक जगाह था अपने को हाड मास का शरीर नहीं मानती थी वह निर्लेप पद में पहुंची थी ब्रह्म ज्ञानी सदा निर्लेप जैसे जल में कमल अलेपा मैं तो उस भाई को भी धन्यवाद दूंगा कि इस देवी की बात मानकर पूजा की पूजा का फल हो के उस देवी की प्रसन्नता हुई जगतबा के रूप में पत्नी को पूजा अब पत्नी पत्नी र रहे माता क्या आज्ञा है बोले जाओ
उत्तर काशी में भजन करो अपना जीवन संवार विमल विवेक जगाओ वो बंगाली युवक चल पड़ा और पहुंचा उत्तर काशी हम भी वोह जगह देखे हुए फिर वो तो लगी लगी लगी कीर्तन करे भक्त जप करे ध्यान करे खुद बैठे रहे चांदण व्रत किए क्या क्या किया कुंडलिनी शक्ति जगी एक बार तोते आदमी का खाना खा गई तुम भी जब इसमें आगे बढ़ो तो हो सकता है लेकिन सबको ऐसा नहीं होगा हमारे जीवन में ऐसा नहीं आया तोते आदमी का खाना और कभी तो मनो भर खाए नहीं एक और खा ले ऐसे ऐसे गीत पैदा होते
हैं कि कल्पना भी ना कर सको ऐसे ऐसे शब्द निकलते हैं कि आप सोच नहीं सकते ऐसे ऐसे एक्शन होते हैं कि आप करना चाहो तो नहीं कर सकते जब वो आद्य शक्ति कुंडली जागृत होती है और परम विवेक के द्वार खोलने की यात्रा शुरू होती है तो जन्मो जन्मों के पड़े हुए संस्कार जन्म जन्मांतर के पड़ा हुआ कचरा भाव कुव स्वभाव जो भी है वह निकलकर स्वच्छता होती है तुम कमरे में ध्यान भजन करोगे तो कैसे ऐसे एक्शन ऐसे ऐसे आसन करोगे ऐसे ऐसे मेडक कीना जंपिंग होने लगेगा कि आप सोचेंगे क्या हो रहा
है लेकिन यह सब होता है आनंदमई मां जिस साधु को संत को आदर से देखती थी मथा टेकते थी प्राइम मिनिस्टर जहां मत्था टेक के अपना भाग्य बनाते थे वह देवी जिस संत को मत्था टेकनी वह संत थे उड़िया बाबा संत संत में मथा टेक देते उसमें छोटे बड़े का भाव नहीं होता बस शिष्टाचार होता है संतों का हृदय तो नम्र होता ही है महान आत्माओं का हृदय तो नम्र होता ही हम सत्संग जब पूरा करते तो आप सबको बार-बार हम प्रणाम करते मथा टेकते आप सबको आप देखते हैं आनंदमय मां अपने मित्र संत उड़िया
बाबा को बड़ा आदर से मथा उड़िया बाबा का शरीर शांत हुआ समय पाकर उनका शिष्य पलटू बड़ा प्रेमी था गुरु का गुरु के सेवा कार्य खोज लेता था चार प्रकार के सेवक होते हैं एक होते हैं फोर्थ क्लास सेवक दूसरे होते हैं थर्ड क्लास तीसरे होते हैं सेकंड क्लास और पहले होते हैं फर्स्ट क्लास सेवक उत्तम सेवक उत्तम सेवक गुरु का देवी का अथवा गुरु की सेवा खोज लेता है उसको कहना नहीं पड़ता जैसे भूखा रोटी को खोज लेता है प्यासा पानी को खोज लेता है नेता कुर्सी को खोज लेता है ऐसे ही सत शिष्य
सतगुरु की सेवा सतगुरु का देवी कार्य का कुछ सेवा खोज लेते हैं वह उसमें का था पहले नंबर का शिष्य था लेकिन विमल विवेक के तरफ न थोड़ा कम दिया चार प्रकार के सेवक उत्तम सेवक सेवा खोज लेता है मध्यम सेवक को सेवा का संकेत मिलता है वह मध्यम है सेवा का संकेत पाके सेवा कर लेता है दिल से प्रेम से उसे खुशियां भी मिलती है पुण्य भी मिलते और उसके खानदान भी उज्जवल होते हैं उत्तम और मध्यम सेवक तीसरा होता है कनिष्ठ सेवक थर्ड क्लास वह संकेत भी नहीं समझेगा सेवा खोजे का भी नहीं
उसको तो आज्ञा करनी पड़ती कि भाई एक क्या कर तू इतना काम कर ले तू इतना एक कर ले वह कर लेगा चलो गुरु की आज्ञा है भले मेरे को समय नहीं है कैसा भी लेकिन गुरु की आज्ञा भलाई के लिए होती है ब्रह्म ज्ञानी की आज्ञा है हमारे कुल तारे की यार कर लो ये तीसरे नंबर का सेवक और चौथे नंबर के तो ऐसे आलसी पलायन वादी फोर्थ क्लास होते हैं कि गुरु की आज्ञा होवे फिर भी टाइम सर वो कर नहीं पाते क्या करें यह वो अरे किसी ने यह मंडप बनाया किसी ने
बिछाया किसी ने इतनी सेवा की और तुम सुन सुना के चले जाओ और जाकर पकोड़े खाओ तुम्हारा भी तो कुछ कर्तव्य है बेवकूफ कुछ तो कमाई करो दूसरे लोग दान दे दूसरे लोग मान लाए दूसरे लोग बिछाए और तुम सुनकर कपड़े छिटक के चले गए तो बस खाली के खाली रह गए जैसे नेशनल हाईवे पर बारिश पड़ी तो क्या उगेगा हां गोबर के दाग डीजल के दाग थोड़े धुल जाएंगे बस उगेगा कुछ नहीं ऐसे पाप ताप कुछ मिट जाएंगे लेकिन वो अंदर की भक्ति उगाना है तो तू कोई ना कोई सेवा खोज ले जिन सेव्या
तिन पाया मान नानक गा गुण निधान जितना कुछ करके पाया जाता है उतना उसकी कीमत होती है बिन कमाए नान का मन सादा जैसा कर सादा जैसा नहीं हो सकता भाई प्रव तुलसी हरि गुरु करुणा बिना विमल वि ओ ओ ब्रह्मचारी अरे ब्रह्मचारी रे ओ अरे भई हमारे आश्रम में में वो जो ब्रह्मचारी बैठा उसको बुलाना ओ ब्रह्मचारी रे अरे वो बहरे ओ ब्रह्मचारी ओ सुन रे वो दूर दूर आश्रम में गंगा में नहा रहे बाबा जी अपने मित्र संत के साथ और दूर आश्रम में ब्रह्मचारी था उसको बुलाया आया बोले बेटा मेरे को जरा
गंगाजल पीना है वो वापस गया सेवक उसने लोटा लाया और गंगा के बालू में मांजा वो जानते हैं कि गुरुजी साफ सुथरे लोटे में पानी लेंगे वो फिर ब्रह्मचारी अपनी धोती कमर को बांधकर पानी में उतरा कमर तक के पानी में गुरुजी और साधु के साथ नहा रहे थे वहीं से लोटा भरा और गुरु जी को थमा दिया और गुरु जी ने हाथ की अंजली बनाकर लोटे से पानी की ार लेकर लोटा पिया पानी पिया लटा दे दिया सेवक को बोले जा बेटा अच्छा हो गया और दूसरा साधु जो नया था मित्र बन के आया
था वह हैरान हो गया कि बाबा जी तेन एक गंगाजल द धारा न पीना था पानी व आपको यह धारा काई पानी पीना था और हाथ मेंही पीना था तो इतना चिल्लाए वो ब्रह्मचारी अरे ब्रह्मचारी अरे बैरे अरे फलाने को भेज वो फिर आया आपने आज्ञा द पानी पीना वो फिर गया वो फिर लोटा लाया मांजा धोया आपके पास आया यहीं से भर के आपको दे दिया यह बात समझ में नहीं आती बाबा जी आप जैसे इतने ज्ञानी संत ब्रह्म ज्ञानी कहलाते हो लाखों लोग तुमको मानते पूछते हैं और यह बालक जैसी चेष्टा आपकी हम
मित्र होने के नाते पूछ रहे हैं बाबा जी बाबा ने कहा क्या करें इस बहाने उसको सेवा देनी थी उसके कर्म काटने थे यार [प्रशंसा] मैं आपको बिल्कुल सच कहता हूं यह बोर्ड पर रात को हमने देखा लिखा था कि आश्रम इतना इतना बना है उतना बनने की और है य तो यहां तक तो ठीक था लेकिन जो सहयोग करने की बात लिखी थी मुझे अच्छी नहीं लगी ऐसे ऐसे लोग है सारा बना केर चले जाए और आपको पता भी नहीं चले ऐसे लोग मेरे पीछे घूमते हैं मैं बोलता हूं नहीं जब बाहर के लोग
आकर दान देकर बना जाओगे तो इधर के लोग क्या करेंगे इसीलिए दूसरे को मौका मिले बाकी तो भाई ऐसे लोग भी हैं कि बाबा जी जितने शिविर होती है जितने कुछ होता है कार्यक्रम हम ड्राफ्ट भेज दे 10 लाख 20 लाख 50 लाख का हमारे तरफ से होने तुम परदेश में कमा कमा कर हमारे देशवासियों को खिलाओ या भजन करे पुण्य तो तुम्हारे से जाएगा तो इनको क्या पलेगा हम जब शिविर करते थे तो एक व्यक्ति ने खूब ऑफर किए कि शिविर में जो भी घर चाहता है अंबे जा करें मेरे को सीधा बोलने की
उसकी हिम्मत नहीं हुई समिति वालों को बोला फिर सूरत शिविर में भी कई काठियावाड़ के भक्त बोलते थे कि लंकर फ्री रखें और जो भी आए जाए उनकी सेवा हम लोग कर लेंगे अपन मैं क्या नहीं भजन करें और उनको मुफत का खिलाए पुण्य तुम ले जाओ तो वह क्या करेंगे बेचारे अपने को कोई टोटा नहीं है फिर भी अपने आश्रम में खीर मालपुआ यह भंडारे भंडारे नहीं होते बच्चे बेचारे साहित्य बांटते चूर्ण बांटते यह बेचते वो बेचते उसमें से गुजारा करते और कुछ बच जाता है तो आदिवासी इलाकों में हॉस्पिटलों में और और जगह
देश भर की समितियों को यही हमने आज्ञा दिया किसी समिति से आज तक एक रुपया हमने नहीं मांगा नहीं मंगवाया नहीं स्वीकार किया है कोई बोलता है लो यह समिति के तरफ से बाबा जी मैं अपने पास रख नहीं चाहिए तुम आपस में भीख मांगकर मेरे को दो मैं वो भिखारी का चेला नहीं और भिखारी का भक्त नहीं मैं शहनशा का [प्रशंसा] भक्त मैं जब साधना करता था तो भूख लग ग तो भूने हुए चने ले गया नर्मदा किनारे पपिया लिया और पपीता रखा सुना था कि माता प्रकट होती है दर्शन देती है बातचीत करती
मैं कहा चलो आज उनसे बातचीत करेंगे ऐसे ही था कुछ फक्कड़ शई थी बड़ी गजब की वह हमारा साधना का समय आप देखो ना तो आपको ताज्जुब लगे जब हम साधना में रहते थे किसी से नहीं मिलते थे शाम को घूमने जाते लोग दूर से दर्शन करते मायों को आने की मना थी और कोई माही आ दूर दर्शन कर लि तो कर लिया लेकिन नजी आही बा कर दिया तो माई के कपड़े गीले हो जाते थे रंग रंगे जाते थे कपड़े उनके एमसी हो जाती थी ऐसा बड़ा ते यह तो अभी थोड़ा डील डाल करके
फिर गुरु जी ने कहा कि अब तुम्हारा तो काम बन गया है रहत माया में फिरत उदासी कत कबीर में उसका दासी अब बेटा संसारी लोग डर रहे हैं ना कि तो साधु हो सकते ज्ञानी तो संसार हों को संसारी बनकर भी उनको उठाने का काम अब गुरु की आज्ञा मानकर नीचे लाएगा राम कृष्ण परमहंस बात करते करते ब्रह्म ज्ञान की व विमल विवेक के धनी और अविवेकी बनने का नाटक करते थे शारदा क्या बनाया चटनी पुदीना डाला है इमली डाला नाथ जल्दी बना अच्छा इडली बनाया है डोसे और क्या बनाया बारबार रसोई घर में
चक्कर मारे कथा करते करते बीच में चक्कर काटे रसोई करके एक दिन दो दिन महीना दो महीना छ महीना आखिर व सती साधवी जैसी बोल पड़ी कि तुम इतने बड़े विवेकी इतने बड़े महान संत और यह जीभ का स्वाद रख लोग तो बोलते परमहंश और आप रसोड़ा और पूछते तो मेरे को लगता है कि क्या बात है ने कहा राम कृष्ण ने कि मेरा जीवन उस मां के अनुभव में इतना भीतर से सराब हो गया कि मेरी ना हो आनंद की म बीच मजदार में चली जाएगी तो लोग कैसे बैठेंगे इसलिए मैं कोई ना कोई
वासना उभार कर इस जीवन की नाव को संसार के किनारे बांध रखा ताकि लोग आए और पार हो जाए शारदा जिस दिन मैंने यहां से खूंटी खोली स्वाद में अपने मन को जो लगा रखा है यहां से खूंटी खोली तो फिर यह नाव संसार हों को ले जाने के काबिल नहीं रहेगी मैं उस आनंद में लीन हो जाऊंगा मैं तो ऐसे महापुरुषों को फिर फिर से प्रणाम करता हूं क्या नानक को कमी थी कि इधर से उधर भटकना पड़ता था कुछ खाने पने के लिए नहीं जीवन की नाव को आप जैसों को बिठाने के लिए
वे महापुरुष भटका सहते थे राम कृष्ण कहो विवेकानंद कहो राम तीर्थ कहो लीला सा बापू कहो जो भी व विमल विवेक को पाए वे महापुरुष कुछ नान कुछ खूंटा लगा के रखते हैं ताकि हम लोगों के बीच उठने बैठने के काबिल रहने तो बैठ बंद हो गई आंखें समाधि हो गई ज्यादा दिन लगे रहे समाधि में खाना पना छूट गया ब्रह्म में लीन हो गए रमण महर्षि और मेरे गुरुदेव की मुलाकात हुई जब गुरुदेव को देखा रमण महर्षि ने बोले आपकी इतनी ऊंची स्थिति लीला श फिर क्यों घूम रहे हो लोगों में ले जो मैंने
पाया है वे मेरे हजारों हजारों भारतत वासी हैं उनको कुछ दिला सकूं इसलिए मैं घूम रहा हूं अगर वे लीला सा बापू नहीं घूमते तो आसुमल आसुमल ही रह जाता आशाराम नहीं बन [प्रशंसा] पाता कैसा विमल विवेक है ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष मोह कभी ना ठक सके इच्छा नहीं लवलेश फिर भी इच्छा रखते हैं अच्छा भाई शांत रहो शोर मत करो ऐसे करो यह करो वो करो ये क्यों करते कराते क्या लेना खाना देना है उनको लेकिन व्यवहार में आपकी नहीं आप जैसा ही व्यवहार करेंगे उसमें विवेक अगर हीन होगा तो
बोले बाबा में और हमारे में की फर्क है जो बाबा न भी बेटा बेटी है अरे भाई वह खूंटी को ठोक दिया इधर रामकृष्ण ने कहा शारदा जिस दिन मैं खूंटी उखाड़ दूंगा फिर यह नाव नहीं रहेगी लोगों के काबिल देवी शारदा है एक दोपहर को थाल सजा कर ला रही थी जो ठाकुर को प्रिय भोजन था वोला रही थी ठाकुर ने अपनी खूंटी उखाड़ दी भोजन को देखकर मुंह घुमा दिया उस महापुरुष ने शारदा के हाथ से थाली गिर पड़ी अब ये नाव चल देगी संसार से ठाकुर ने मुंह घुमा लिया तो घुमा लिया
फिर स्वाद वृति की खूंटी कहां से लाए वो दरिया में डाल दी खूंटी तीन दिन के बाद वह महापुरुष ब्रह्म में लीन हो गए अब उनकी यादें हैं लेकिन वह नाव नहीं है कि समाज जड़कर तर जाए ऐसे महापुरुष होते हैं हयात उनके साथ बड़ा अन्याय होता है वे सब सहते हैं फिर भी महापुरुष सह लेते हैं चलो बच्चे हैं इन दो चार पाच 25 मूर्खों के कारण क्या करोड़ों लोगों से ये नाव छीन लू क्या मैं नहीं नहीं कई महापुरुषों के पास आते हैं रोते रोते आते हैं मेरे को रहने दो यह करने दो
जब उनको ऊपर उठाया और उनको जरा डांटा फटकारा तो वही जाकर कुछ की कुछ बदनामी और कुछ का कुछ अफवा कर देते हैं एक दोने कई आते कई जाते हैं फिर भी महापुरुष बोलते कोई बात नहीं क्या नानक जी ने ठेका लिया था उल्टा काम करने का मूर्ख बक रहे थे उल्टा मार्ग दस दजी और नानक खुद पागल होया वो घर बार छोड़ के भटकता है और तुमको भी भटका है उल्टा मार्ग द सेना कितना साहा होगा उन पुरुषों ने फिर भी तुम्हारे बीच टिके रहे डटे रहे तुम क्या दे सकते हो उनको तुम्हारे पास
देने को है भी क्या आत्म धन से तो तुम कंग हो और नश्वर धन तो वो लात मारकर महापुरुष हुए तुम्हारे पास है क्या यह तन जिसमें हाड़ मास मल मूत्र विष ये तन तुम्हारे पास मन जिसमें काम क्रोध कपट छल बेईमानी चापलूसी खुशा मत खोरी की बेईमानी भरी और तुम्हारे पास है क्या धन जो रखने से इनकम टैक्स की चिंता हो जाए वही तो तुम्हारे पास बोले हमारे पास आत्मा है तुम्हारे पास आत्मा है वो उनका आत्मा अपने आप में तृप्त है जागे हैं आत्मा तो तुम उनको दे नहीं सकते हो क्योंकि वह स्वयं
महात्मा ब्रह्म है और तुम्हारी चीजें उनके काम की नहीं फिर भी वह तुम्हारे पीछे लग गए और तुम्हारी चीजें लेते हैं फिर तुम्हारे को प्रसाद करके देते हैं कुछ दृष्टि पड़ जाए कुछ तरंग मिल जाए कुछ कल्याण हो जाए कबीर ने क्या बिगाड़ा काशी नरेश मथा टेकते हैं और वही काशी नरेश कबीर को मुजरिम बनाकर अपनी कोर्ट में खड़ा कर देते काशी नरेश को शांति पाने के लिए भटकना पड़ा और कबीर के द्वारा आए डेरे आए तो उनको शांति मिली कबीर को नमन करते हैं और वही काशी नरेश तखत बैठा और कबीर को मुजरिम की
नाई खड़ा कर दिया काशी नरेश का कसूर नहीं है कबीर काशी में रहते थे और काशी पंडितों का गढ़ था विद्वानों का पंडितों का धर्म के ठेकेदारों का गढ था उस समय कबीर जो ही सत्य कहा प्रसाद बांटने लगे तो लोग उन पर कुर्बान होने लगे तो कबीर तो सत्य स्वरूप में टके थे सच्ची बात बता देते थे पंडित वाद वदंती झूठा मिश्री कहे मुंह मीठा तो राम कहे राम दा पंडित राम वाद बदन जूठा पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़ ऐसे सत्य वक्ता थे यह दे दो तुम्हारे पिता को सर्दी लग रही
है सर्दियों में तुम कंबल दान करो अब वो कंबल लेकर बेच देते और लोगों को बोलते तुम्हारे दादा को स लगी कबीर कब तक सहन करेंगे सच्चे महापुरुष हालांकि उन महापुरुषों का कोई दुश्मन नहीं होता लेकिन अभी भी देखते हैं कि समाज का कहीं शोषण होता है य देश को लोग खंड खंड करने के षड्यंत्र कर रहे हैं तो हम लोगों को भी कुछ सच्चाई बोलनी पड़ती है और फिर उनके नजर में हम लोग दुश्मन जैसे लगते हैं वे लोग भी हमारा कु प्रचार खूब करते हैं जिनके धंधे खराब होंगे जिनकी दुष्ट मुरादे नाकामयाब होगी
तो वे दुष्ट लोग तो कुछ ना कुछ तो हमारे लिए भी बक करेंगे सीधी बात है वह सब सहन करके भी तुमको जो जगाने के पीछे लगे उनका दिल कितना तुम्हारे लिए उदार [प्रशंसा] है कबीर जी की निंदा होने लगी अवाए होने लगी क्या क्या क्या आरोप लगने लग गए तस्मा कारु भावे न प्रभु तू करुणा कर उन मूर्खों के दिल दिमाग प आखिर कबीर पर आरोप लगते लगते कुछ लोग बिखर गए कुछ लोग श्रद्धालु थे बोले संतों के ऊपर तो भाई य नालायक लोग करते रहते भगवान राम के गुरु थे वशिष्ठ महाराज उस पर
भी लोग आरोप करते थे योग वशिष्ठ में लिखा है हे राम जी मैं बाजार से गुजरता हूं तो मूर्ख लोग मेरे लिए क्या क्या बकते क्या क्या अफवा बनाते क्या क्या बातें बनाते लेकिन हमारा दयालु स्वभाव कैसे कैसे षड्यंत्र कैसी कैसी अफवा क्या क्या बनाते हैं नया नया बनाते वो अभी से नहीं पिछले 30 साल से चल रहा [संगीत] है मेरे गुरु जी के पास जाते हैं य बापू ने हमारे को कर दिया य कर दिया य कर दिया वो किसी माई को तो आपके सामने लाऊ ना तो आप बोलोगे वो लोग पागल है एक
भील माई थी उसके दाढ़ी मूछ भी थोड़ी थोड़ी निकलती और मैं था उस समय 29 30 साल का व 45 साल की थी और वो माई के धंधे ऐसे ही थे कुछ तो उस माई को जो बेटा हुआ था वह ले आए मेरे बापू जी के पास बोले य आपके शिष्य ने हमको बेटा कर दिया है और अभी खबरदार ी शादी हुई सुंदर पत्नी को और परिवार को छोड़ मेरे पास रहा है इस लड़के को मैं जानता हूं और तुम इनको लाए और कार्यकर्ता लोग लाए उस माई को आगे देखो अब हमारा कोई इस बेटे
का सच्चे बाप तो बापू जी है उसने नाटक कि लेकिन गुरु जी ध्यान करके ता 30 साल [संगीत] पहले 28 साल पहले करीब में 29 साल का 28 29 का था तब की बात खैर अभी तो ड़ी बाड़ी सफेद हो गई स्टंट तो अभी नहीं चल सकते तो दूसरे शुरू हो जाते [संगीत] हैं नारायण हरि मैं आपको क्या बताऊं मोटेरा का आश्रम जो अभी साबरमती में बना है वोह चारों तरफ खाया थी थोड़ी सी जमीन थी आधा एक बगा बस बाकी अपन लोगों ने लेवल की चारों तरफ दारू की 40 40 बठिया चलती थी पुलिस
आ जाए तो पुलिस की वैन की पिटाई करके उनको वापस भेज दे कि तेरा बाप डीआईजी खाता है आईजी खाता है एसपी खाता है और तुमको टुकड़ा देते तुम्हारे इंस्पेक्टर को कुत्ते तुम आए यहां तुम्हारी मां का तुम्हारी बहन का ऐसे करके गालिया देते डंडे लेकर उनके पीछे पड़ते मैंने आंखों से देखा एक बार तो पुलिस के जवान भागते भागते हमारे डेरे में घुस गए बाबा जी बचाओ मैं कहा कोई बात नहीं हम बाहर निकले उन्होंने कहा बापू इन कुत्तों को बाहर निकालो खाकी कुत्तों को सालो यह हमारे से फिर हफ्ता खाते और लेते हैं
मैं कहा अभी हमारी शरण में आए पुलिस है तो क्या है हमारी शरण आए तुम जाओ तो कभी-कभी बदमाश लोग भी संतों की इज्जत करता है जय राम जी की वो चले गए पुलिस वालों ने कहा बाबा जी हमको आपने आज बचा दिया मैं क्या बचाने वाला वही ऐसी जगह पर जब आश्रम किया होगा तो कितने विघ्न आएंगे जरा सोचो अभी तीर्थ धाम बन गया आप लोग वो लेवल की खड्डे पूरे ये किए वो किए सब ठीक ठाक 40 बठिया जो दारू की थी वे बंद हुई तो वो भट्ठी और भट्ठी के जो मालिक और
भट्ठी चलाने वाले जो लोग होंगे उन उनको कैसा लगा होगा बाबा बाबा बड़ा बदमाश है बड़ा दुष्ट है लेकिन अब उनकी आजीविका अच्छी चल गई और अभी वह खुश है अब मथा टेकते बेचारे लेकिन पहले तो उन्होंने भी तो सुनाई खूब ऐसा एक नहीं फिर वो और लोग भी थे जिनके शराब के धंधे कम हो गए जिनके टने टोटके बंद हो गए और जिनके थोड़े चेले चाटी बिखर गए उनके पंथ य उनकी दुकानदारी कम हो गई उन लोगों ने एक संगठन बनाकर कु प्रचार किया कुछ एक बारे तो ऐसा ऐसा पैसे लेकर भी उन लोगों
से ऐसा ऐसा लिखती कि महाराज आप पढ़े ने तो आपको लगे कि बाबा नहीं इनको अभी मार डालो ऐसे ऐसे लोग लिखते जय राम जी की हम कोई से य बापू जी के पूजे जा रहे हैं नहीं नहीं तुम्हारी उन्नति के लिए हम सब कुछ सह रहे और इससे द गुना सहने की हमारी तैयारी है फिर तो जिन अखबारों ने ज्यादा मसाला मोड़ तोड़ के लिखा वो एक बार का जो मुख्य आदमी था जिसका मालिक था व इंटरेस्ट ले रहा था ब्लैकमल का उसको हार्ट अटैक हुआ गया अखबार बंद हो गया और दूसरे की अखबार
चली नहीं बंद हो गई लोग सावधान हो गए हम किसी का बुरा ना सोचते ना करते लेकिन हमारी बुराई के लिए कोई करता है तो हमें हम यही कहते जिसी ने दिया दर्द दिल उसका प्रभु भला करे आश को को वाजिब है कि यही फिर से दुआ कर कबीर के यहां एक आदमी आया क्यों महाराज कल तो शराब ले गए पैसे बेचता हूं और आदी पी और अभी तक पैसे नहीं कबीर ने देखा अ ये सत्संग में रोड़ा डालेगा अच्छा भाई ले जा दूसरा आया क्यों महाराज आधी बोतल शराब की थी और एक शेर मीट
लिया हमसे और तुमने कुछ भेजा नहीं इसलिए हमको आना पड़ा मीट कैसा रहा कल हमने मीट भेजा था लिया था आपने कैसा रहा शराब तो आपको अच्छी लगी होगी व बाकी के जो सुने थे ना बंदे वो आधे जल के भाग गए बोले आज तक तो सुन रहे कि कबीर जी शराब पीते या मीट खाते या वैसा के पास जाते आज तक तो समझते थे अफवा लेकिन ये तो सचमुच में गंगन को आरसी क्या जिनको विमल विवेक नहीं था वे सारे भाग गए फिर भी आधे लोग बैठे रहे इतने में तो एक आई चल आके
गदी पर बैठ के क्यों बलमा रात भर मेरे बिस्तर पर था तू और अभी अभी संत बन के उपदेश दे रहा है वाह मेरे बलमा तुमने तो कहा था कि तेरा हाथ नहीं छोडूंगा और तू भूल गया बाकी के जो बंदे और बंदिया बैठी थ उन्होंने देखा याद हो गए हमारे सामने व आलिंगन कर रही बंदा कुछ बोलता नहीं जरूर दाल में काला है और जिनकी खोपड़ी में काला था दिल में काला था उन्होने दाल में काला समझ के वे भी चलते बने कभी कहते तो देवी क्या मर्जी है बोले तुमने बोला था तेरा हाथ
पकड़ा है मैं नहीं छोडूंगा तुम भूल गए बोले नहीं मैं नहीं भूला हं यह तेरा हाथ पकड़ा मैंने कबीर जी ने उसका हाथ पकड़ा और शराब की खाली बोतल थी शराब तो क्या खाली बोतल में कुछ पानी वानी रंग मंग डाल के शराब की बोतल बना दी एक हाथ तो उसके हाथ में और एक हाथ में बोतल कबीर जी काशी के बाजार में निकल पड़े सुनो मेरे भाइयों सुनो मेरे मितवा कबीरो बिगड़ गयो रे बिगड़ गए रे भटक रहे हो रे सुनो मेरे भाइयों सुनो मेरे मितवा कबीरो बिगड़ गयो रे सुनो मेरे भाइयों सुनो मेरी
बहना कबीरो बिगड़ गयो रे बिगड़ गयो रे भटक गयो रे कबीरो बिगड़ गयो रे और जो षड्यंत्रकारी वो पंडित पंडित वो शराबी क अब अपने मुंह से बोला बाबा का बच्चा आज तक तो बोले अफवा अफवा आज तेरा बाप ने फिट कर दिया खुशिया मना रहे दही संग दूध बिगड़ो मक्खन रूप भयो रे कबीरो बिगड़ गयो रे पारस संग भाई लोहा बिगड़ो कंचन रूप भयो रे कबीरो बिगड़ गयो रे के बाजार से जब वो यात्रा निकली प्रोसेस निकला कैसा रहा होगा जरा सोचो हम ऐसा नहीं निकालेंगे आप डरना मत और कोई ऐसा कर भी दे
तो हमारे सेवक उनके चक्कर में नहीं आएंगे यह मेरे को बिल्कुल अनुभव हो चुका है हमारे को जिसने एक बार सुन लिया वह किसी के अफवा का शिकार होता ही नहीं हमने देखा [संगीत] है ऐसे करते करते पंडितों ने जाकर काशी नरेश को कहा कि तुम मथा टेक रहे हो तुम्हारा विवेक नष्ट हो गया विवेक नष्ट हो गया और नष्ट विवेक वाले दूसरे को बोलते तेरा विवेक नष्ट हो गया अद हो गई काशी नरेश को उभारा मूर्धन्य पंडितों ने काशी नरेश ने कहा [संगीत] जाओ ये कब की बात है बोले कल दोपहर को बाजार में
घूमे रात को वैशा को अपने घर में भी रखा है यह बिल्कुल पक्का प्रूफ है और बात सच्ची थी पैशा को ले गए घर कैसे रहे होंगे महापुरुष जरा सोचो तो बंदे दिल पिघल जाता है और शरीर में रोमांच खड़े हो जाते हैं आंखों से आंसू आ जाते हैं रात भर वैशा उनके घर रही सुबह तो आ गई पुलिस काशी नरेश का फरमान है कबीर को ले आओ अभी तो बाइज्जत लाने का फरमान है अगर आपने हाना कानी की तो बल्ब पूर्वक अपराधी की नाए आपको ले जाने की भी आज्ञा मिल चुकी है कभीर ने
कहा हम तो वैसे भी आने को तैयार है चलो चलो काशी नरेश ने बुलाया अपनी जोड़ी बन गई है अपने चलते दोनों उ बैशा का हाथ पकड़ के कबीर पहुंचे वही बोतल उठाई काशी नरेश सोचते कि मैंने सुना था कि तुम बोतल लेकर वैशा का सम पकड़ के घूम रहे थे बाजार में लेकिन मुझे विश्वास नहीं आया कि मैं तुमको जानता हूं तुम महान पुरुष हो लेकिन सचमुच मैं आंखें देख रहा हूं वैशाख को साथ में लिए हाथ में बोतल महाराज मैंने सिर झुकाया है मैं अभी भी तुम्हें सलाह देता हूं कि इस का हाथ
छोड़ो अपनी इज्जत का ख्याल करो अपनी महानता को देखो मैं तुम्हें यह गुनाह माफ कर सकता हूं कबीर ने कहा माफ मत करो कोई दया धर्म की जरूरत नहीं है इसका हाथ हमने पकड़ा है तो क्यों छोड़ेंगे बोले महाराज ये आपको ऐसे कैसे हो गया बोले कैसे हो गया यह बोलते हाथ पकड़ा तो छोड़ना नहीं तो मैं क्यों छोडूंगा भगवान और संत पकड़ते तो छोड़ते नहीं जब तक मुक्त नहीं हो तब तक पीछा लगाए रखते किसी ब्रह्मज्ञानी की दीक्षा ली और तुमने साधना थोड़ी की और फिर छोड़ दी तो देखो फिर अंदर से ब्रह्मज्ञानी कैसे
आपको चाबुक लगाता कैसे स्पने में कैसे मुंह दिखाता और आप साधन भजन करो तो फिर स्वपने में कैसा दर्शन देता है देखो जरा मजा चक के देखो जैसे पुण्य और पाप आपका पीछा नहीं छोड़ते ऐसे ब्रह्मज्ञानी की रहमत भी आपका पीछा तब तक नहीं छोड़ती जब तक मुक्ति का प्रसाद नहीं [संगीत] पाया वैशा कहती कि राजा मुझे भी तो सुनो बोल तू बोले मुझे क्या पता कि चंद चांदी के टुकड़ों में मेरी यह हालत होगी मुझे फला समाज के फलाने फलाने संगठनों ने पैसे का प्रलोभन दिया और मेरे को बताया कि ऐसा ऐसा जाकर करो
कबीर हार मान जाएंगे भाग जाएंगे ये वो करेंगे तेरा नाम हो जाएगा लेकिन मैं तो रात भर इनके घर रही कई नखरे करती रही महाराज अब तो मैं सचमुच मैं इनका हाथ पकड़ा हूं मैं इनकी चेरी होकर रहूंगी दासी होकर रहूंगी अपने पाप धंधा छोड़ देती हूं [संगीत] महाराज महाराज ने इतने में वह बोतल की धार कर दी बोले महाराज जी शराब यहां क्यों ढोल रहे बोले जगन्नाथ जी में रसोया ठाकुर जी का भोजन बना रहा है उसके कपड़े जल गए व जल मरता है इसलिए मैंने यहां से बुझा दिया उसको कैसे होते हैं कारक
पुरुष काशी नरेश ने आदमी भेजा जब वह दिन वह तारीख वह समय की सच्चाई का पता चला काशी नरेश ने गले में कपड़ा डाला मुंह में तिनका डाला बोले महाराज गलती हो गई मैं आपके चरणों की गाय हूं मुझे माफ करना संत सताए तीनों जाए तेज बल और वंश जो संत को सताता उसका तेज बल और वंश नाश हो जाता है महाराज हमारी गल हो कबीर जी कहते कोई बात नहीं आओ गले लगा दो संत का निंदक महा हत्यारा संत का निंदक परमेश्वर मारा संत के निंदक की पूज ना आस नानक संत का निंदक सदा
निराश संत भावे तो ले उबा अगर वह प्रश्चित करता और संत उसको माफ कर देता है तो फिर तार भी देता है ज को जन्म मरण ते डरे साध जिना की शरणी पड़े ज को दुख मिटा साध जिना की सेवा पा साधु को अपने लिए क्या चाहिए साधु की सेवा का मतलब है कि साधु का जो दवी कार्य अथवा साधु के हृदय में जो समाज रूपी देव को उन्नत करने का भाव है साधु जो संकेत करे उसको पकड़ के अपने समाज रूपी देवता की सेवा करके आत्म देव को जगा दो यही तो साधु चाहेगा और
क्या [प्रशंसा] चाहे क्या करोड़ों करोड़ों लोग क्या साधु को खिला पाएंगे साधु का इतना पेट थोड़े है [संगीत] भाई साधु को इतने वस्त्रों की जरूरत थोड़े है अभी इधर वस्त्र पहन के आए अंदर जाकर उतार के रख देंगे दो दिन इनको चलाएंगे कभी कभार एक दिन में भी बदलने पड़ते हैं देखते भीड़ भाड़ तो जरा ढोंग करना पड़ता है टीप टाप होने का बाकी साधु तो अंदर से ऐसा उजला है कि उसे उजले कपड़े क्या है और मैले क्या है उसके लिए गाड़ी में बैठना क्या है और गधे पर बैठना क्या है उसके लिए तो
जैसा अमृत तैसी बस खाटी जैसा मान तैसा अप माना हर्ष शोक जा के नहीं वैरी मित समान कह नानक सुन रे मना मुक्तता हीते जान निंदा स्तुति मान बान धर जूते दे तले वो तो उस पद को पहुंचे हैं जिनका विमल विवेक जगाह है विमल सुख पाया है वो उसका वर्णन तो नहीं कर सकते लेकिन चुप भी नहीं बैठ सकते जिन पाया तिन छुपाया छुप नहीं कछु छुपे छुपाया गुरवाणी क जिन्होंने पाया उन्होंने छुपाया कि कौन समझेगा लेकिन फिर भी जिस भाषा में लोग समझे जिस ढंग से समझे कीर्तन के द्वारा सेवा के द्वारा ध्यान
के द्वारा हरि ओम के द्वारा राम राम के द्वारा विठ्ठल विठल के द्वारा जय अंबे के द्वारा जैसे भी इनको थोड़ा सा चखा ले फिर भाई विमल विवेक के तरफ आएंगे तो पूरा समझ लेंगे