देवराज इंद्र को जब पता चला कि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के छोटे भाई आज पाठ छोड़कर तपस्या हेतु जंगल चले गए हैं तब देवराज इंद्र ने राज्य में सुरक्षा बनाए रखने हेतु एक देव को भेजा जब चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को पता चला तब वे वापस अपनी राजधानी की ओर वापस चल पड़े सम्राट विक्रमादित्य अपनी राजधानी पहुंचे तब आधी रात हो चुकी थी जिन देव को देवराज इंद्र ने भेजा था उन्होंने सम्राट विक्रमादित्य को प्रवेश करने से रोक दिया देव ने उनसे पूछा तुम कौन हो तब सम्राट विक्रमादित्य ने कहा मैं इस भूमि का सम्राट विक्रम हूं
यह मेरी राजधानी है तुम मुझे रोक ने वाले कौन होते हो तुम अपना परिचय दो यह सुनकर देव बोले मुझे देवराज इंद्र ने इस नगर की सुरक्षा के लिए भेजा है मैंने सुना है सम्राट विक्रमादित्य बड़े ही शक्तिशाली और समर्थ योद्धा है मुझसे युद्ध करो और यह सिद्ध करो कि तुम ही सच्चे सम्राट विक्रमादित्य हो दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ युद्ध में परास्त होने के बाद देव ने सम्राट विक्रमादित्य से कहा अब मुझे विश्वास हो गया है आप ही सम्राट विक्रमादित्य हैं देव ने कहा हे राजन जब आपका जन्म हो रहा था उस समय
एक ही नगर एवं नक्षत्र में तीन मनुष्यों का जन्म हुआ था जिनमें से आपने राजा के घर में जन्म लिया दूसरे ने तेली और तीसरे ने एक कुम्हार के घर में जन्म लिया कुम्हार ने साधना से स्वयं को सिद्ध कर लिया है उसने तेली को मारकर पिशाच बना रखा है कुम्हार ने तेली के शव को शमशान में सिरस के पेड़ से लटका रखा है वह आपको भी मारने आएगा आप सावधान रहिए यह सब कहकर देव वापस अपने लोक को चले गए सम्राट को वापस आए देख प्रजा में आनंद की लहर दौड़ गई उत्सव मनाया जाने
लगा कुछ समय पश्चात एक साधु सम्राट के दरबार में आया उसने सम्राट को प्रणाम कर एक फल दिया और फिर वहां से चला गया सम्राट को आशंका हुई कि देव ने जिस आदमी के बारे में बताया था हो सकता है यह साधु वही तेली हो सोच विचार कर उन्होंने उस फल को नहीं खाया और भंडारी को दे दिया आज साधु रोजाना आता और सम्राट को एक फल दे जाता सम्राट उस फल को भंडारी को दे दिया करते एक दिन सम्राट घोड़ों का जायजा ले रहे थे तभी वह साधु वहीं पहुंच गया और उसने फिर से
राजा को फल दिया सम्राट के हाथ से वह फल छूटकर नीचे गिर गया और फल में से एक लाल रंग का हीरा निकला जिसकी चमक से सबकी आंखें फटी की फटी रह गई साधु के जाने के बाद राजा ने भंडारी को बुलवाकर सभी फल मंगवाए और सबको खोलकर देखने पर सबसे एक-एक लाल हीरा निकला तब सम्राट ने जोहरी को बुलवाकर हीरों के परीक्षण करवाए इससे पता चला एक-एक लाल हीरे छोटे-मोटे राज्य के बराबर मूल्य के हैं आश्चर्य चकित सम्राट ने साधु को बुलाने का आदेश दिया एकांत में सम्राट ने साधु से पूछा कि आप इतने
अमूल्य हीरे कहां से लाते हैं तब योगी ने उत्तर देते हुए कहा महाराज यह रत्न मैं अपनी सिद्धियों से प्राप्त करता हूं साधु ने कहा गोदावरी नदी के किनारे स्मशान में मैं एक साधना सिद्ध कर रहा हूं उसके सिद्ध हो जाने पर मेरे मनोरथ पूरे हो जाएंगे इसके लिए आपकी मदद चाहिए यदि मैं आपको पहले ही यह बता देता तो शायद आप मेरी बात बिना पूरा सुने ही मुझे भगा देते इसलिए मैंने यह तरीका अपनाया साधना की अंतिम रात्रि पर मेरे सिद्ध स्थान पर अकेले आकर मेरी सहायता कीजिए राजन इससे अधिक मैं अभी आपको बताने
में असमर्थ हूं सम्राट सब समझ रहे थे उन्होंने साधु को उत्तर देते हुए कहा अच्छी बात है साधना के अंतिम दिन सूचित कीजिएगा मैं आपकी सहायता हेतु अकेला ही आऊंगा कुछ दिन उपरांत अमावस्या की रात्रि आ गई अमावस्या की आधी रात को राजा साधु के पास पहुंचे थोड़ी देर बैठने के बाद सम्राट ने साधु से पूछा योगी जी मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं साधु ने कहा राजन यहां से दक्षिण दिशा में दो कोस दूर शमशान में एक सिरस का पेड़ है उस पर एक शव लटका हुआ है आप उसे मेरे पास लेते आइए
राजा उस शव को लाने शमशान के मध्य में चले गए जब शमशान पहुंचे तो उस रात्रि वहां बहुत अंधेरा था और बारिश हो रही थी वहां डरावनी आ आवाजें आ रही थी सांप बिछू पैर पर चढ़ रहे थे जंगली जानवरों की भयावह आवाजें आ रही थी अघोरी शवों को खा रहे थे पर इन्हें क्या पता था कि वह कोई मामूली मानव नहीं सम्राट विक्रमादित्य है बिना किसी भय बिना किसी डर के सम्राट विक्रमादित्य आगे बढ़ते गए ना शेर की दहाड़ का डर ना हाथी के चिड़ने का डर बेधड़क बेखौफ राजा विक्रमादित्य सिरस के पेड़ के
पास पहुंच गए पेड़ की जड़ से ऊपर तक उस पूरे पेड़ में आग लगी हुई थी और पेड़ पर रस्सी से बंधा एक शव लटक रहा था सम्राट ने अपनी तलवार से उस रस्सी को काटकर नीचे गिरा दिया गिरते ही शव दहाड़े मारकर रोने लगा तब राजा ने ने पूछा तू कौन है राजा के पूछते ही वह शव दहाड़े मारकर हंसने लगा और वापस जाकर पेड़ पर लटक गया विक्रमादित्य पूरे खेल को समझ रहे थे उन्होंने फिर से तलवार से रस्सी को काटकर शव को नीचे गिरा दिया इस बार उन्होंने अपने हाथों में जकड़ करर
उससे पूछा तू कौन है इस पर उस शव ने कोई उत्तर नहीं दिया तब सम्राट विक्रमादित्य ने उसे चादर से बांध दिया और फिर उसे लेकर चल पड़े रास्ते में शव ने कहा मैं बैताल हूं तू कौन है और मुझे कहां ले जा रहा है सम्राट विक्रमादित्य ने कहा मैं इस भूमि का चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हूं मैं तुझे उस साधु के पास लेकर जा रहा हूं जिसने मुझे तुझे यहां से ले जाने की विन्नति की है तब बेताल ने कहा तेरे साथ चलने की मेरी दो शर्तें हैं पहली रास्ते में तू कुछ भी नहीं कहेगा
यदि तूने एक शब्द भी कहा तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटक दूसरी मैं तुझे कहानी सुनाऊंगा सम्राट विक्रमादित्य ने इशारे में उसकी बात का समर्थन किया सम्राट उसे उठाकर ले जा रहे थे और बैताल ने राजा को कहानी सुनाना शुरू किया बेताल ने कहा सुनो राजन काशी में प्रताप मुकुट नाम का राजा राज करता था उसके वज्र मुकुट नाम का एक बेटा था एक दिन राजकुमार दीवान के लड़के को साथ लेकर शिकार खेलने जंगल गया घूमते घूमते उन्हें तालाब दिखा दोनों मित्र वहां रुक गए और तालाब के पानी में हाथ हाथ मुंह धोकर ऊपर
महादेव के मंदिर दर्शन के लिए गए घोड़ों को उन्होंने मंदिर के बाहर बांध दिया वो मंदिर में दर्शन करके बाहर आए तो देखा कि तालाब के किनारे कोई राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई है दीवान का लड़का तो वहीं एक पेड़ के नीचे बैठा रहा पर राजकुमार से ना रहा गया वह आगे बढ़ गया राजकुमार ने उसकी ओर देखा तो वह उस पर मोहित हो गया राजकुमारी भी उसकी तरफ देखती रही फिर राजकुमारी ने जुड़े में से कमल का फूल निकाला कान से लगाया दांत से कुतरा पैर के नीचे दबाया और फिर छाती
से लगा अपनी सखियों के साथ चली गई राजकुमारी के चले जाने पर राजकुमार निराश हो अपने मित्र के पास आया और सब हाल सुनाकर बोला मैं इस राजकुमारी के बिना नहीं रह सकता पर मुझे ना तो उसका नाम मालूम है ना ठिकाना वह कैसे मिलेगी दीवान के लड़के ने कहा राजकुमार आप इतना घबराए नहीं वह सब कुछ बता गई है राजकुमार ने पूछा कैसे वोह बोला उसने कमल का फूल सिर से उतार कर कानों से लगाया तो उसने बताया कि मैं कर्नाटक की रहने वाली हूं दांत से कुतरा तो उसका मतलब था कि मैं दंत
बाट राजा की बेटी हूं पांव से दबाने का अर्थ था कि मेरा नाम पद्मावती है और छाती से लगाकर उसने बताया कि तुम मेरे दिल में बस गए हो इतना सुनते ही राजकुमार खुशी से फूल उठा बोला अब मुझे कर्नाटक देश में ले चलो दोनों मित्र वहां से चल दिए घूमते फिरते सैर करते दोनों कई दिन बाद उसी शहर में पहुंचे राजा के महलों के पास गए तो एक बुढ़िया अपने द्वार पर बैठी चरखा काटती मिली उसके पास जाकर दोनों घोड़ों से उतर पड़े और बोले माई हम सौदागर हैं हमारा सामान पीछे आ रहा है
हमें रहने को थोड़ी जगह दे दो उन दोनों की शक्ल सूरत देखकर और बात सुनकर बुढ़िया के मन में ममता उमड़ आई और बोली बेटा तुम्हारा घर है जब तक जी में आए तब तक रहो दोनों वहीं ठहर गए दीवान के बेटे ने पूछा माई तुम क्या करती हो तुम्हारे घर में कौन-कौन है तुम्हारी गुजर कैसे होती है बुढ़िया ने जवाब दिया बेटा मेरा लड़का राजा की चाकरी में है मैं राजा की बेटी पद्मावती की धाय थी बूढ़ी हो जाने के कारण अब घर में रहती हूं राजा खाने पीने को दे देता है दिन में
एक बार राजकुमारी को देखने महल में चली जाती हूं राजकुमार ने बुढ़िया को कुछ धन दिया और कहा माई कल तुम वहां जाओ तो राजकुमारी से कह देना कि जेठ सुधी पंचमी को तुम्हें तालाब पर जो राजकुमार मिला था वह आ गया है अगले दिन जब बुढ़िया राजमहल गई तो उसने राजकुमार का संदेशा उसे दे दिया सुनते ही राजकुमारी ने गुस्सा होकर हाथों में चंदन लगाकर उसके गाल पर तमाचा मारा और कहा निकल यहां से बुढ़िया ने घर आकर सब हाल राजकुमार को कह सुनाया राजकुमार हक्का बक्का रह गया और राजकुमार के मित्र ने कहा
राजकुमार आप घबराए नहीं उसकी बातों को समझें उसने दसों उंगलियां सफेद चंदन में मारी इससे उसका मतलब यह है कि अभी 10 रोज चांदनी के हैं उनके बीतने पर मैं अंधेरी रात में मिलूंगी 10 दिन के बाद बुढ़िया ने फिर राजकुमारी को खबर दी इस बार राजकुमारी ने उसे फटकार कर पश्चिम की खिड़की से बाहर निकाल दिया उसने आकर राजकुमार को बता दिया सुनकर दीवान का लड़का बोला मित्र उसने आज रात को तुम्हें उस खिड़की की राह बुलाया है हमारे खुशी के राजकुमार उछल पड़ा समय आने पर उसने बुढ़िया की पोशाक पहनी इत्र लगाया हथियार
बांधे दोपहर रात बीतने पर वह महल में जा पहुंचा और खिड़की में से होकर अंदर पहुंच गया राजकुमारी वहां तैयार खड़ी थी वह उसे भीतर ले गई रात भर राजकुमार राजकुमारी के साथ रहा जैसे ही दिन निकलने को आया कि उसने उसे छिपा दिया रात को फिर बाहर निकाल लिया इस तरह कई दिन बीत गए अचानक एक दिन राजकुमार को अपने मित्र की याद आई उसे चिंता हुई कि पता नहीं उसका क्या हुआ होगा उदास देखकर राजकुमारी ने कारण पूछा तो उसने बता दिया बोला वह मेरा बड़ा प्यारा दोस्त है बड़ा चतुर है उसकी होशियारी
ही से तो तुम मिली हो राजकुमारी ने कहा मैं उसके लिए बढ़िया-बढ़िया भोजन बनवा हूं तुम उसे खिलाकर तसल्ली देकर लौट आना खाना साथ में लेकर राजकुमार अपने मित्र के पास पहुंचा वे महीने भर से मिले नहीं थे राजकुमार ने मिलने पर सारा हाल सुनाकर कहा कि राजकुमारी को मैंने तुम्हारी चतुराई की सारी बातें बता दी हैं तभी तो उसने यह भोजन बनाकर भेजा है दीवान का लड़का सोच में पड़ गया उसने कहा ये तुमने अच्छा नहीं किया राजकुमारी समझ गई है कि जब तक मैं हूं वह तुम्हें अपने बस में नहीं रख सकती इसलिए
उसने इस खाने में जहर मिलाकर भेजा है यह कहकर दीवान के लड़के ने थाली में से एक लड्डू उठाकर कुत्ते के आगे डाल दिया खाते ही कुत्ता मर गया राजकुमार के क्रोध की सीमा ना रही राजकुमार ने कहा ऐसी स्त्री से भगवान बचाए मैं अब उसके पास नहीं जाऊंगा दीवान का बेटा बोला नहीं अब ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे हम उसे घर ले चले आज रात को तुम वहां जाओ जब राजकुमारी सो जाए तो उसकी बाई जांग पर त्रिशूल का निशान बनाकर उसके गहने लेकर चले आना राजकुमार ने ऐसा ही किया उसके आने पर दीवान
का बेटा उसे साथ लेकर योगी का भेस बना मरघट में जा बैठा और राजकुमार से कहा कि तुम ये गहने लेकर बाजार में बेच आओ कोई पकड़े तो कह देना कि मेरे गुरु के पास चलो और उसे यहां ले आना राजकुमार गहने लेकर शहर गया और महल के पास एक सुनार को उन्हें दिखाया गहने देखते ही सुनार ने उन्हें पहचान लिया और कोतवाल के पास ले गया कोतवाल ने पूछा तो उसने कह दिया कि ये मेरे गुरु ने मुझे दिए हैं गुरु को भी पकड़वा लिया गया सब राजा के सामने पहुंचे राजा ने पूछा योगी
महाराज ये गहने आपको क कहां से मिले योगी बने दीवान के बेटे ने कहा महाराज मैं शमशान में काली चौदस को डाकिनी मंत्र सिद्ध कर रहा था कि डाकिनी आई मैंने उसके गहने उतार लिए और उसकी बाई जांग में त्रिशूल का निशान बना दिया सुनते ही राजा दौड़कर महल में गया और उसने रानी से कहा कि पद्मावती की बाई जांग पर देखो कि त्रिशूल का निशान तो नहीं है रानी ने देखा तो सही में निशान था राजा को बड़ा दुख हुआ बाहर आकर वह योगी को एक ओर ले जाकर बोला महाराज धर्मशास्त्र में खोटी स्त्रियों
के लिए क्या दंड है योगी ने जवाब दिया राजन ब्राह्मण गौ स्त्री लड़का और अपने आसरे में रहने वाले से कोई खोटा काम हो जाए तो उसे देश निकाला दे देना चाहिए यह सुनकर राजा ने पद्मावती को डोली में बिठाकर जंगल में छुड़वा दिया राजकुमार और दीवान का बेटा ताक में बैठे ही थे राजकुमारी को अकेली पाकर साथ ले अपने नगर में लौट आए और आनंद से रहने लगे इतनी बात सुनाकर बेताल बोला राजन यह बताओ कि पाप किसको लगा है राजा ने कहा पाप तो राजा को लगा दीवान के बेटे ने अपने स्वामी का
काम किया कोतवाल ने राजा का कहना माना और राजकुमार ने अपना मनोरथ सिद्ध किया राजा ने पाप किया जो बिना विचारे उसे देश निकाला दे दिया विक्रमादित्य ने इतना कहा ही था कि बेताल फिर उसी पेड़ पर जा लटका आगे क्या हुआ जानने के लिए चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें