[संगीत] आहा कैसी सुगंध है अब मुझे कौन पूछता है जब रोटियों के ही लाले पड़े हैं तब ऐसा भाग्य कहां कि भर पेट पूरियां मिले यह विचार कर उन्हें रोना आया कलेजे में ूगी उठने लगी परंतु रूपा के भय से उन्होंने फिर मौन धारण कर लिया काकी देर तक इन्हीं दुखदाई विचारों में डूबी रही घी और मसालों की सुगंध रह रह कर मन को आपे से बाहर किए देती थी मुंह में पानी भर भर आता था उड़ियों का स्वाद स्मरण करके हृदय में गुदगुदी होने लगती थी किसे पुकारू आज लाडली बेटी भी नहीं आई दोनों
छोकरे दिख किया करते हैं आज उनका भी कहीं पता नहीं कुछ मालूम तो होता कि क्या बन रहा है क्यों ना चलकर कड़ा के सामने ही बैठूं पड़िया छनछन कर तैयार होंगी कड़ा से गरम गरम निकाल कर थाल में रखी जाती होंगी फूल हम घर में भी सूंघ सकते हैं परंतु वाटिका में कुछ और बात होती है इस प्रकार निर्णय करके बूढ़ी का की हाथों के बल सरकती हुई बड़ी कठिनाई से चौखट से उतरे और धीरे-धीरे रेंगती हुई कड़ा के पास जा बैठी सहस रोपा ने काकी को कड़ा के पास देखा तो जल भुन गई
वह अपना क्रोध रोक ना सके इसका भी ध्यान ना रहा कि पड़ोसी बैठी हुई है मन में क्या सोचें लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे वह काकी पर छपती और उन्हें दोनों हाथों से झटक कर बोली कोठरी में बैठते हुए क्या दम घुटता था अभी भगवान को भोग नहीं लगा मेहमानों ने नहीं खाया तब तक धैर्य ना हो सका गांव देखेगा तो कहेगा कि बुढ़िया भर पेट खाने को नहीं पाती तभी तो इस तरफ मुह बाए फिरती है बूढ़ी काकी ने सिर उठाया ना रोई ना बोली चुपचाप रंगती हुई अपनी कोठरी में चली गई वे अपनी
कोठरी में जाकर पश्चाताप करने लगी उन्हें रूपा पर क्रोध नहीं था अपनी जल्दबाजी पर दुख था सच ही तो है जब तक मेहमान भोजन ना कर चुक घर वाले कैसे खाएंगे उसे इतनी देर भी ना रहा गया सबके सामने पानी उतर गया अब जब तक कोई बुलाने नहीं आएगा ना जाऊंगी मन ही मन इस प्रकार का विचार कर वे बुलावे की प्रतीक्षा करने लगी परंतु घी की रुचिकर स्वास बड़ी धैर्य परीक्षक प्रतीत हो रही थी उन्हें एक एक पल एक एक युग के समान मालूम होता था वे उकड़ बैठकर सरकती हुई आंगन में आई परंतु
हाय रे दुर्भाग्य मेहमान मंडली अभी तक बैठी हुई थी काकी को देखकर कई आदमी उठ खड़े हुए पुकारने लगे अरे य बुढ़िया कौन है यहां कहां से आ गई पंडित बुद्धि राम काकी को देखते ही क्रोध से तिल मिला गए लपक कर उन्होंने काकी के दोनों हाथ पकड़े और घसीटते हुए लाकर उन्हें कोठरी में धम से पटक दिया आशा रूपी वाटिका लू के एक झोके से विनट हो गई मेहमानों ने भोजन किया घर वालों ने भोजन किया सभी भोजन कर चुके परंतु काकी को किसी ने ना पूछा उनके बुढ़ापे पर दीनता पर किसी को करुणा
ना आई थी अकेली लाडली ही उनके लिए कोड़ रही थी लाडली को काकी से अत्यंत प्रेम था बेचारी फूली लड़की थी बाल विनोद और चंचलता की उसमें गंद तक ना थी दोनों बार जब उसके माता-पिता ने काकी को निर्दयता से घसीटा तो लाडली का हृदय ट कर रह गया वह झुंझला रही थी कि हम लोग काकी को पड़िया क्यों नहीं दे देते क्या मेहमान सब के सब खा जाएंगे और यदि काकी ने मेहमानों से पहले खा लिया तो क्या बिगड़ जाएगा वह काकी के पास जाकर उन्हें धैर्य देना चाहती थी परंतु मां के भय से
ना जाती थी उसने अपने हिस्से की पड़िया बिल्कुल ना खाई थी अपनी गुड़िया की पिटारी में बंद कर रखी थी वह उन पड़ियो को काकी के पास ले जाना चाहती थी उसका हृदय अधीर हो रहा था काकी मेरी आवाज सुनते ही उठ बैठेगी बुढ़िया देखकर कैसी प्रसन्न होंगी मुझे खूब प्यार करेंगी रात के 11 बज गए थे रूपा आंगन में सो रही थी पर लाडली की आंखों में नींद ना आती थी काकी को पड़िया खिलाने की खुशी उसे सोने ना देती थी उसने गुड़ियों की पिटारी सामने रखी थी जब विश्वास हो गया कि अम्मा सो
रही है तो वह चुपके से उठी और सोचने लगी कैसे चलू चारों ओर अंधेरा था वह पिटारी उठाकर काकी की कोठरी की ओर चली कोठरी में काकी लेटी हुई थी सहसा कानों में आवाज आई काकी उठो मैं पड़िया लाई हूं काकी ने लाडली की आवाज पहचान ली चटपट उठ बैठ दोनों हाथों से लाडली को टटोला और उसे गोद में बिठा लिया लाडली ने पड़िया निकाल कर दी काकी ने पूछा क्या तुम्हारी अम्मा ने दी है लाडली ने कहा नहीं यह मेरे हिस्से की है काकी पड़ियो पर टूट पड़ी पाच मिनट में पिटारी खाली हो गई
लाडली ने पूछा काकी प बैठ गया जिस प्रकार थोड़ी सी वर्षा ठंडक के स्थान पर और भी गर्मी पैदा कर देती है उसी प्रकार इन थोड़ी सी पड़ियो ने काकी की शुधा और इच्छा को और उत्तेजित कर दिया था बोली नहीं बेटी जाकर अम्मा से और मांग लाओ लाडली ने कहा अम्मा सोती है जगाऊ गी तो मारेगी काकी ने ने पिटारी को फिर टटोला उसमें कुछ खुरचन गिरी थी बारबार ह चाटती थी चटखारे भरती थी हृदय मसोस रहा था कि और पड़िया कैसे पाऊ वे कुछ देर तक इस इच्छा को रोकती रही पर काकी का
अधीर मन इच्छाओं के प्रबल प्रवाह में बह गया जिससे उचित और अनुचित का विचार जाता रहा सहसा लाडली से बोली मेरा हाथ पकड़कर वहां ले चलो जहां मेहमानों ने बैठकर भोजन किया है लाडली उनका अभिप्राय समझ ना सकी उसने काकी का हाथ पकड़ा और ले जाकर झूठे पतलो के पास बैठा दिया दन शुधा तुर काकी वहां पतलो से पड़ियो के टुकड़े चुन चुन कर भक्षण करने लगी ठीक उसी समय रूपा की आख खुली उसे मालूम हुआ कि लाडली मेरे पास नहीं है वह चौकी चारपाई के इधर उधर ताक लगी कि कहीं नीचे तो नहीं गिर
पड़ी उसे वहां ना पाकर वह उठी तो क्या देखती है कि लाडली झूठे पतलो के पास चुपचाप खड़ी है और वही काकी पतलो पर से पड़ियो के टुकड़े उठा उठा कर खा रही है रूपा का हृदय सन्न हो गया ऐसा प्रतीत हुआ मानो जमीन रुक गई हो आसमान चक्कर खा रहा हो करुणा और भै से उसकी आंखें भर आई वह सोचने लगी हाय कितनी निर्दय हूं जिसकी संपत्ति से मुझे र की आय हो रही है उसकी यह दुर्गति और मेरे कारण हे दयामय भगवान मुझसे बड़ी भारी चूक हुई मुझे क्षमा करो आज मेरे बेटे का
तिलक था सैकड़ों मनुष्यों ने भोजन पाया मैं उनके इशारों की दास ही बनी रही अपने नाम के लिए सैकड़ों रुपए व्यय कर दिए परंतु जिसकी बदौलत हजारों रुपए पाए उसे इस उत्सव में भी भरपेट भोजन ना दे सकी रूपा ने दिया चलाया अपने भंडार का द्वार खोला और एक थाली में संपूर्ण मगरिया सजाकर काकी की ओर चली काकी के समीप पहुंचकर उसने कंठ रुद्ध स्वर में कहा काकी उठो भोजन कर लो मुझसे आज बड़ी भूल हुई उसका बुरा ना मानना परमात्मा से प्रार्थना कर दो कि वह मेरा अपराध क्षमा कर दे भोले भाले बच्चों की
भांती जो मिठाइयां पाकर मार और तिरस्कार सब भूल जाते हैं काकी सब बुलाकर बैठी हुई खाना खा रही थी उनके एक एक रोए से सच्ची दुआएं निकल रही थी और रूपा इस अनुपम दृश्य का आनंद लेने में निमग्न [संगीत] थी ब [संगीत]