ये ओम नमो भगवते वासुदेव मंत्र के ऋषि है ब्रह्मा जी और देवता है स्वयं वासुदेव छंद है गायत्री यह डोली कैसी आ रही उधर से डोली में बैसन चान करछ अच्छा नंद घेर आनंद भयो ओम आज तो उपवास का दिन है और मैंने भी उपवास रखा भूख भी खूब लगी उपवास में जो भूख है वह रोगों को स्वा करती जन्माष्टमी का उपवास आरोग्य और बल प्रदायक है और पूर्णिमा का उपवास पाप नाशक है पूर्णिमा के उपवास में पंचगव्य प तो आदमी आरोग्य और पापनाशिनी ऊर्जा भगवान की काम करती है यह भगवान के अवतार कैसे होते
भगवान ना अवतार केवा [संगीत] थाय परित्राणाय साधु नाम विनाशाय च दुष्कुल भाव के हैं जिनके लिए संसार असार है और भगवान सार है सच्चाई से प्रसन्नता से पवित्रता से परहित से जीते हैं ऐसे लोगों के लिए और जो शोषण करते हैं अति स्वार्थी है अति कामी है अति क्रोधी है अति मोही लोभी लालची है ऐसे लोगों का कल्याण करने के लिए अर्थात उनका विनाश करके कल्याण करते और साधुओं का पोषण करके कल्याण करते हैं ऐसे परम कल्याण के लिए जो अवतरण उसे अवतार कहते हैं एक होता है आरोहण दूसरा होता है अवतरण आरोहण माना नीचे
से ऊपर उठना केजी वाला मिडल में गया फिर कॉलेज में गया फिर पीएच हुआ यह आरोहण हुआ संसार में भटकने वाला जीव उपवास रखता है व्रत रखता है नियम करता है धीरे-धीरे अपने आत्मा परमात्मा के सुख को पाने के योग्य बनता है यह है आरोहण और भगवान का होता है अवतार जो ऊपर से नीचे आए उसे कहते हैं अवतार जैसे कोई उद्योगपति अपने कल कारखाने में जाए बाबू लोगों के साथ और मजूर लोगों के साथ मिलकर काम करे हसते खेलते तो हो गया उस सेठ जी का अवतार अथवा तो कोई राजाधिराज महाराज प्रजा के हित
के लिए अपनी अपने कार्यालयों में अपने नौकर चा करों के साथ मिलकर कार्यशैली बताने के लिए बैठे रहे यह हो गया अवतार आरोहण हुआ के पटा वाले में से बाबू बन गए तो आरोहण हुआ लेकिन सेठ में से अथवा राजा में से बाबू बन गए तो हो गया अवतार तो भगवान का होता है अवतार अवतार भी कई प्रकार के होते हैं कई बार कथा में तुमने सुना होगा लेकिन नए-नए लोग आते तो मुझे फिर से बोलने में अच्छा लगता है तो पहले की जन्माष्टमी की कथाएं सुनी हुई है वे पुराने है लेकिन भगवान की कथा
फिर फिर से सुनने से वही का वही ज्ञान प्रकाश और रस आता है सूर्यनारायण वही का वही लेकिन रोज सुबह उसका दीदार आलहा दाई है तो भगवत गीता में भगवान कहते परित्राणाय साधुनाम परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कर्म संस्थापन अर्था धर्म संस्थापन अय संभवामि युगे युगे जो सज्जन है साधु पुरुष है साधु का उद्धार करने के लिए और पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग युग में प्रकट हुआ करता हूं भगवान प्रकट होते हैं तो सामान्य आदमी ऑफिस में दुकान में या राजा
राज्य में जाता है तो अपने स्वार्थ से जाता है लेकिन भगवान जब ध पर अवतार लेते हैं तो भगवान का स्वार्थ नहीं होता भगवान कृपा वश सुता वश अवतार लेते हैं हेतु रहित जग जुग उपकारी तुम तुम्हारा सेवक असुरारी भक्त और सज्जन साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए दषक दुष्कृतम् से रुक जाते शोषण से रुक जाते हैं अधिक संग्रह अधिक शोषण अधिक भोग वासना से वे बच जाते हैं तो बोले महाराज फिर हम भगवान में तो लग नहीं सकते हम तो पाप करते रहे और भगवान आएंगे और हम जैसों को मारेंगे और अपने धाम
में भेज देंगे तो यह आराम हो गया य मन चाहे मौज करो लूटो और अंत में भगवान उद्धार करने के निमित हमको मारेंगे तो अपने धाम में पहुंचा देंगे भाई भगवान तो ऐसे पापियों को मारते हैं जो और किसी के बश का नहीं ऐसे पापियों को मारते आम आदमी को मारने के लिए भगवान अवतार नहीं लेते जैसे आम दवाई करने के लिए सर्जन नहीं आता जब भयंकर कोई बीमारी है और ऑपरेशन करना होता है तभी सर्जन आता है बाकी तो नीचे के कंपाउंडर और डॉक्टर अपना काम कर लेते हैं तो कोई ब बड़ा बड़ा ऐसा
विरोधी तत्व हो और बड़े प्राण बल वाला भाव बल वाला हो ऐसा कोई विशेष निमित्त हो तभी भगवान अवतार लेते हैं ऐसा नहीं कि और पाप करते रहे और भगवान अवतार ना लिए और बीच में मर गए तो बुरा हाल होगा जय राम जी की इसीलिए यह बाट नहीं देखना चाहिए कि चलो हम पापियों को भगवान मारेंगे तो अपन पाप करते ही रहो और भगवान के हाथ से मरेंगे तो मुक्त हो जाएंगे नहीं अभी अपने जीवन में सद्भाव ले आओ सत कर्म ले आओ सत चिंतन ले आओ और सत्य स्वरूप परमात्मा का सत्संग और ज्ञान
ले आओ भगवान का अवतार तो होता है लेकिन एक अवतार राम जी का मध्य दोपहर को धधकती धूप में गर्मियों में तो दूसरा अवतार बादलों की छटा में और सावन के महीने में और महाराज कृष्ण पक्ष अंधेरी राति और वह भी अष्टमी को होता है और फिर अष्टमी अंधेरी रात तो है लेकिन रात को 12 बजे क्यों ऐसा एक का होता है दिन को 12 बजे और दूसरे का दूसरा अवतार होता है रात को 12 बजे यह 12 बजना कैसे भगवान कृष्ण ने पसंद किया भगवान राम ने पसंद किया और बापू जी का भी 12
बजे का ये सब 12 बजे क्यों पसंद करते हैं बाहर आ गया के पसंद पड़या गीता कहती है अनुग्रह भूता नाम मानुष देहम अस्थि भजते ता दृश क्रीड़ा या शत तत् पररो भवे ये भागवत में आता है भगवान जीवों पर विशेष कृपा करने के लिए ही अपने को मनुष्य रूप में प्रकट करते हैं और ऐसी लीलाएं करते हैं जिन्हें सुनकर जीव भगवत परायण हो जाते और याद करके भी भगवान की भक्ति और भगवान के प्रेम में धन गणित होते रहते हैं भगवान श्री कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं के युधिस्टर व्रत पारण सरलता देवताओं की पूजा
गुरु सुसरा सब तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ माना जाता है गुरु तीर्थम परम ज्ञानम अस्ति तीर्थम अस्थ तीर्थम विद्यते ज्ञान तीर्थम परम तीर्थम ब्रह्म तीर्थम सनातनम गुरु रूपी तीर्थ से परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है इसलिए उससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है ज्ञान तीर्थ सब तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ है और ब्रह्म तीर्थ तो सनातन है जहां ब्रह्म परमात्मा का ज्ञान होता है तो भगवान का अवतार नमित अवतार माना जाता है और संतों का प्रगट नित्य अवतार में माना जाता है तो एक होता है नित्य अवतार दूसरा होता है नमित अवतार तो संतों में जो कारक पुरुष
है मुक्त आत्मा है वे भी कुछ ऐसा समय ऐसी तिथि ऐसा दिन पसंद करते हैं और भन का अवतरण होता है निमित्य कंस का निमित्त लेकर आए रावण का निमित्त लेकर आए कोई बड़ा निमित्त लेकर आए तो बड़े निमित्त में भी भगवान यह बात युधिष्ठिर को कहते हैं कि गुरु रूपी तीर्थ से परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है इसलिए उससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है ज्ञान तीर्थ सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है और ब्रह्म तीर्थ सनातन है ऊपर के श्लोकों में आया कि परित्राणाय साधु नाम विनाश आया च दुष्कृतम् युगे युगे युग युग में आता हूं और कई
बार युग में एक युग में कई बार भी भगवान आते हैं अभी भी आ रहे हैं डोली में बैठे बैठे कैसा बनाया है नारायण नारायण नारायण नारायण ये सूरत में डोली में भगवान इस प्रकार आते जाते यहीं दिखते होंगे दूसरी जगह ऐसा नहीं होता होगा मुंबई में भी नहीं होता [संगीत] [प्रशंसा] होगा तो भगवान का अवतार कैसा कैसे करुणा वरुणा लय है जो सदा तृप्त है वे छिन भरी छाछ पर मांगते हुए दिखते हैं जो सदा देने में सक्षम है वोह गोपी की तगारी उठाते उठाते बोलते कि इतनी मेहनत करवाती मुझे क्या देगी जीव ने
कहा कि महाराज आप और हम सखा है तो आप तो मुक्त है आनंद स्वरूप है और हम बंधन में तो फिर सखा कैसे भगवान ने कहा भाई तुम संसार से सुख लेने के लिए पढ़ते हो इसलिए बंधन में हो और मैं संसार से सुख लेता नहीं सुख देने के लिए चेष्टा करता हूं इसलिए मुक्त हूं भगवान लेकिन हमारी तो आदत ऐसी है और तुम्हारी आदत ऐसी है फिर भी हम तो सखा है तो भगवान ने कहा अच्छा सखा तो फिर तुमको सखा होकर अवतार लेकर में तुम्हारे नाई तुम्हारे नाई सुखी दुखी हुआ करूंगा भगवान का
एक नाम है दामोदर दा माना रस्सी उदर माना पेट पेट से रस्सी से पेट पेट से बंधे रस्सी के द्वारा और उखली से बांधे गए इस उखली से बांधे जाना और उसमें भी नलकर का कल्याण करना और वहां कंस का उद्धार करना यह सारी चेष्टा दिखती साथ-साथ में भक्तों को सनातन सुख आनंद माधुर्य देना यह अवतार की विशेषता है भगवान का एक नाम है केशव के माना ब्रह्मा श माना शिव व माना विष्णु ब्रह्मा को विष्णु को महेश को यह सब करने की सत्ता जिससे आती है वह परब्रह्म परमात्मा का नाम केशव है एक ब्रह्मांड
में एक ब्रह्मा एक विष्णु एक महेश होते हैं अनंत कोटि ब्रह्मांड है तो अनंत कोटि ब्रह्मांड के अनंत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश के जो आत्मा होकर बैठे हैं वेही तुम्हारी आंखों के द्वारा टुकुर टुकुर देखने की लीला करते हैं मन के द्वारा सोचते हैं बुद्धि के द्वारा निर्णय करते हैं जागृत अवस्था आती जाती है स्वपना आता है जाता है गहरी नींद आती है जाती है फिर भी उनको जानने वाला जो तुम्हारे से कभी अलग नहीं होता शरीर भी चला जाता है बचपन चला गया जवानी चली गई किशोर अवस्था चली गई प्रोड अवस्था चली गई बुढ़ापा
चला गया फिर मृत्यु आई फिर भी जो साथ नहीं छोड़ता वह केशव है और वह अचत है शरीर तो छूट जाता है अवस्था तो छूट जाती है फिर भी जो अपने पद से कतेही नीचे नहीं होता केशव अच्युतम केशवम राम नारायणम श्रीधरम अधरम गोपिका वल्लभ जानकी नायकम श्री रामचंद्र भजो बोले बापू जी भगवान एक है फिर इतने भगवान के नाम क्यों लोग मिसगाइड ना हो जाए एक भगवान नाम रख देते बस बहुत हो गया सृष्टिकर्ता सबका ईश्वर एक रख देते कोई अल्लाह बोलता है कोई ताओ बोलता है कोई करीम बोलता है कोई रहीम बोलता है
कोई झूलेलाल बोलता है कोई अंबे मा बोलता है कोई द्वारकाधीश बोलता है ऐसे ऐसे इतने सारे भगवान के नाम क्यों मान मुजी ना पवन लोग गलती में ना आ जाए भैया डॉक्टर एक नाम बोलने से काम चल जाता है क्या डॉक्टर यह डॉक्टर लेकिन थीसिस वालों को भी डॉक्टर कहा जाता है तो फिर व्याख्या करनी पड़ेगी नहीं थीसिस लिखकर डॉक्टर बने लेकिन यह आरएमपी डॉक्टर है मैट्रिक के पास थोड़ा कोर्स किया हुआ यह एमबीबीएस डॉक्टर है यह एमडी डॉक्टर है लेकिन इतना कहने से भी काम नहीं चलता फिर बोलना पड़ता है के एमडी है और
सर्जन है फिर सरकारी प्रैक्टिस करते हैं या प्राइवेट करते हैं फिर लोबी है कि पेशेंट के हितेश है तो जो जो व्याख्या करोगे त्यों त्य सामने वाले को समझने में आसानी हो होगी ठीक से पहचान पाएगा तो इस्लाम धर्म ने भगवान के नवाणु नाम खोजे रहीम जो परम दयालु है उसको रहीम बोला इस्लाम ने करीम जो अति उदार है रहमान जो कृपालु है बिस्मिल्लाह रहमानी रहीम रमी मैं अल्लाह के नाम से ये काम शुरू करता हूं चीनियों ने भगवान का नाम खोजा ताओ जो तना हुआ है विकसित करना जो जानता है विश्व में व्याप रहा
है उसको ताओ बोलते हैं तो सबने उस परमात्मा के अपने अपने भावों गुणों प्रभावों को ध्यान में रखते नाम खोजे लेकिन हिंदू धर्म ने तो कमाल कर दिया धोती फाड़ के रुमाल कर दिया नहीं महाराज अपने अहम को चिर करर रुमाल कर दिया अहम को फाड़कर रुमाल कर दिया भगवान के हजार हजार नाम हिंदू सनातन संस्कृति ने खोजे हजार हजार नाम उन हजार नामों में एक नाम भगवान का है गुरु जो लघुता से ऊपर उठा दे जो प्रकाश दे दे अंधकार से प्रकाश की और ले जा लघुता से उन्नति की तरफ ले जाए और वही
नाम फिर महापुरुषों का है गुरु है लेकिन गुरुओ में भी कुल गुरु है कि विद्या गुरु है के अक्षर गुरु है कि पौराणिक उपदेशक गुरु है यह करते करते फिर बोला के सत्य स्वरूप ईश्वर से एक हुए जो महापुरुष है उनको बोलते हैं सतगुरु जलाना सागरो राजा यथा भवती पार्वती गुरु नाम तत्र सर्वेशम राजाम परमो गुरु जैसे जलाशयों में समुद्र सब जलाशयों का राजा है सारे जलाशय समुद्र से ही जलवा होते हैं ऐसे सत्य सनातन परब्रह्म परमात्मा से ही सारे गुरुओं की बुद्धि प्रकाशित होती है उस परमात्मा का साक्षात्कार करके दूसरों को साक्षात्कार कराने की
जिनम उदारता है माधुर्य है स्नेह है ज्ञान है प्रेम है ऐसों को बोलते हैं सदगुरु तो बोले सदगुरु कैसे होते बोले सदगुरु मेरा [संगीत] सूरमा वो अज्ञान को अंधकार को दूर करने में बड़े बहादुर होते हैं सतगुरु मेरा सुरमा करे शब्द की चोट मारे गोला प्रेम का शत्रु चोट करता है लेकिन द्वेष का गोला मारता है लेकिन गुरु जी चोट करते हैं तो अंदर प्रेम भरा होता है मारे गोला प्रेम का हरे भर्म की कोट यह भ्रम हो गया कि मैं माई हूं मैं मावा हूं मैं गुजराती हूं मैं सुरती हूं मैं फलाना हूं मैं
दुखी हूं मैं सुखी हूं माई मावा ये शरीर का ढांचा है सुख और दुख मन की भावना और वृति है काला और गोरा चमड़े का खेल है मोटा और पतला यह चर्बी गोस्त का खेल है लेकिन तुम तो इस शरीर के पहले थे अभी हो और बाद में रहोगे उस परमात्मा के सनातन सखा [संगीत] हो यहां एक बात ध्यान देना भगवान कहते हैं धर्म की संस्थापक युग में अवतार लेता हूं धर्म का विनाश नहीं होता धर्म का हराश हो जाता है तो जो स्वार्थी लोग होते हैं मनमाना अर्थ घटन करते करवाते हैं तो सही रास्ता
लेने वालों को नहीं मिलता तो फिर प्रकाश करते हैं ठीक से बाकी राम जी के पहले धर्म था और कृष्ण जी के पहले धर्म था उसी धर्म के अनुसार तप किया और संत ने आशी आवाद दिया के जाओ तुम्हारे यहां भगवान अवतार लेंगे तो धर्म की व्यवस्था तो भगवान के अवतार के पहले थी लेकिन थोड़ी अस्त व्यस्तता को ठीक करने के लिए और दुनिया के जो मजहब धर्म है वह किसी ना किसी महापुरुष के द्वारा पैगंबर के द्वारा ईश्वर के पुत्र के द्वारा किसी के द्वारा चलाए गए हैं लेकिन हिंदू धर्म सनातन धर्म किसी व्यक्ति
के द्वारा नहीं चलाया गया ना कोई ऋषि के द्वारा चलाया गया ना कोई मुनि के द्वारा चलाया गया ना कोई तपस्वी के द्वारा चलाया गया हिंदू धर्म सनातन धर्म श्री कृष्ण के द्वारा भी नहीं चलाया गया और श्री कृष्ण के पहले लाखों वर्ष पहले राम जी आए उनके द्वारा भी हिंदू धर्म नहीं चलाया गया आपी तो हिंदू धर्म सनातन धर्म उनके पहले था और यज्ञ की विधि पहले थी और ऐसे यज्ञ करेंगे और खीर प्रकट होगी और फिर कौशल्य और आदि राणि ने पाया और रामा अवतार हुआ तो राम जी के अवतार के पहले सनातन
धर्म था तो इसको सनातन बोलते जैसे सूर्य सनातन है सृष्टि सनातन है ऐसे सृष्टिकर्ता की कृपा को पाने का सृष्टिकर्ता को जानने का सृष्टिकर्ता का माधुर्य और सामर्थ्य पाने का दुखों से पिंड छुड़ाने की व्यवस्था भी जिस धर्म में सनातन है उसे सनातन धर्म कहते हैं और जहां फला फूला और प्रचारित हुआ हिंदुस्तान में इसलिए उसको हिंदू धर्म बोलते हैं और धर्म किसी ना किसी महापुरुष के द्वारा स्थापित हुए किसी ना किसी मनुष्य के पैगंबर के पीर के किसी ना किसी के मस्तक की उपज है जबकि सनातन धर्म किसी के मस्तक की उपज नहीं है
किसी के मति की उपज नहीं है मति में मत मता होता है तो वे मत मता होते लेकिन सनातन धर्म में कुछ लेकर अपना मत स्थापित करने वाली परंपरा तो मिलेगी लेकिन मूल सनातन से लिया तो और जो भी धरती पर मत है पंथ है मजहब है उनमें जो अच्छी बातें सीधी अन सधी यह सनातन धर्म से लेकर ही मानव का कल्याण करने की व्यवस्था है फिर थोड़ा बहुत अपना सिंबल बिंब लगाकर चल पड़े तो यह सनातन व्यवस्था है और सनातन व्यवस्था में जब अति स्वार्थ और अति मनमाने अर्थ घटन होने लगते हैं तो फिर
भगवान प्रकट होते हैं तो ऐसे भगवान जब प्रकट होते हैं तो संजय से धृतराष्ट्र पूछते हैं क्या आखिरी युद्ध का क्या होगा तो संजय कहते हैं यत्र योगेश्वर कृष्ण यत्र पार्थ धनुर्धर तत्र श्री विजया भूति दवानी तिति मेमती जहां योगेश्वर भगवान कृष्ण है और जहां पुरुषार्थ करने वाला अर्जुन है वहां श्री है श्री मना भीतर और बाहर से साफल्यम् लक्ष अर्जुन का भी शुद्ध लक्ष्य है कि मैं राज्य अपने लिए नहीं करता अथवा युद्ध भी अपने लिए नहीं कर रहे थे धर्म की रक्षा के निमि राम कृष्ण जी ने करा है नहीं तो तो जा
रहे थे भीतर और बाहर से शुद्ध वही होता है जिसमें प्रेम होता है काम भीतर से शोषक होता और बाहर से तारा विना मने नहीं चाले बाला नहीं मा टूटो मने आम देखाए टूटो आवी छे टूटो आओ छ काम में बाहर से मीठी बातें होती और अंदर से स्वार्थ होता है प्रेम में भीतर से और बाहर से निस्वार्थ की पवित्र स्वास होती है काम भोगने के बाद आदमी थक जाता है जड़ता आ जाती है और प्रेम से आदमी के अंदर और बाहर निखार आ जाता है जड़ता नहीं आनंद और उल्लास होता है काम से अशांति
और झगड़े पैदा होते हैं प्रेम से शांति और समाधान प्रकट होता है काम में परिणाम में दुख होता है और प्रेम के परिणाम में आनंद स्वरूप ईश्वर की मुलाकात होती है काम विकारी होता है प्रेम निर्विका होता है काम नाशवान होता है जो काम भोगता है ज्यादा उसके शरीर को मन को पुण्य को ओज को जवानी को नाश कर देता है और प्रेम अविनाशी होता है नए दिव्य रस रसायन अंदर पैदा करता है और आदमी बुढ़ापे में भी जवान जैसा धन गणित रहता है वह प्रेम कर सकता है काम आदमी को जड़ जैसा बना देता
है काम भोगने के बाद थ लेकिन प्रेम चेतन उन्मुख कर देता है प्रेम करते करते चेतना और आनंद स्पूर्ति आ जाती है काम मनुष्य को अन आत्मा में ले आता है हड मास के शरीर में ले आता है चमड़े में ले आता है और प्रेम मनुष्य को भीतर ले जाता है आत्मा में ले जाता है और महाराज काम में इच्छाएं बढ़ती रहती है और भोगो भोगो भोगो जब तक मरे नहीं कमर टूटी नहीं फिर थोड़ा शरीर भरा फिर भोगो भोगो और प्रेम में इच्छाएं मिटती है काम में इच्छाएं बढ़ती है तो काम में आठ दोष
है और प्रेम में आठ दिव्य गुण है जो प्रेमा स्पद से मिला देता है लेकिन मजे की बात है कि काम और प्रेम में तिन खे बर का ही फर्क है कामी को भी जो सुख मजा मिलता है शुरू शुरू में लगता है कि प्रेमी भक्त क्या जाने एक जगह में सत्संग कर रहा था तो लोगों ने बताया समिति वालों ने सरदार नगर में साई इधर दारू बहुत बिकता है जरा दारू पर बोलना तो मैंने दारू से अल्कोहल से इतने हानि होती है आठ महापाप होते हैं बालक बालिकाओं की आंख की कैंसर की संभावना हो
जाती है दारू पीने से ही ऐसा होता है तो व एक दारुड़िया वही बोला महाराज बेचारे को क्या पता दारू का क्या मजा है एक दो पौवा महाराज को दे दे तो पता चलेगे कितना मस्त देसी है प्रेम में सात विष विशेषताए होती है प्रेम जिस प्रेमा स्पद से किया जाता है परमेश्वर से वोह अटूट है क्योंकि परमात्मा सदा रहता है लेकिन कामिनी और कामी का शरीर सदा ऐसा नहीं रहता दूसरी बात प्रेम में कठोरता नहीं होती प्रेमी का दोष या भूल हो जाती तो भी चल जाता है यार कोई बात नहीं चाय बनाकर ले
आ रहा था हम बीमार पड़े थे और मित्र चाय बनाकर ला रहा था और हाथ में से तपेली छूट गई अरे क्या हुआ आपको लगा तो नहीं पैर जला तो नहीं चाय का नुकसान महत्त्वपूर्ण नहीं प्रेमी को छूट तो नहीं लगे अगर नौकर से डुल जाए तो दे जा है क्या यार पगार लेता है 1200 यह क्या करता है तो वहां कामना पैसा देकर वह काम करता है तो उसको डांटते लेकिन आप मित्र मिलने को आए और आप थोड़े लेटे हैं उसने चाय बनाई और आपसे तपेली छूट गई तो तपेली की ऐसी तैसी शक्कर चाय
की ऐसी कैसी आपको लगा तो नहीं तो प्रेम दोष नहीं देखता गलती नहीं देखता कठोर नहीं होता जिसके प्रति प्रेम होता है उसकी सुरक्षा के तरफ भागता है इसलिए भगवान को प्रेम करिए ताकि तुम्हारी सुरक्षा करे पति-पत्नी को प्रेम करने से तो कामना होती है और लवर बूढ़ा हो गया यहां पावर नहीं है तो दूसरा लवर कर लेगी दूसरी लवरी कर लेंगे लेकिन यहां दूसरा तो संभव ही नहीं एक ही नित्य नवीन रस से पूर्ण भरपूर है हाजरा हजूर ओम माना अखिल ब्रह्मांड में व्याप रहे नमो माना हम तुमको नमन करते हैं भगवते माना भगवान
कृष्ण भगवान राम भगवान बमन भगवान नरसी भगवान फला कई भगवान होने के बाद भी तुम वासुदेव भी ऐसे ऐसे हो महाराज जैसे रात को स्वपन में कई मनुष्य कई माया कई रेलगाड़िया और कई पैसेंजर बनने के बाद भी जिसकी सत्ता से बनते ज का ों है ऐसे सृष्टि होने के बाद भी तुम जो के है वा देवा आनंद देवा माधुर्य देवा मारा लड़ा मारा प्रभु [प्रशंसा] [संगीत] शंख से वीर ध्वनि पैदा होती है और बंसी से प्रेम के आंदोलन आंदोलित इसलिए श्री कृष्ण ने युद्ध के मैदान में शंख भका और ग्वाल गोपियों का उद्धार करने
के लिए [प्रशंसा] ओ नमो भगवते वासुदेवा कृष्ण देवा आनंद देवा बंसी धरा श्रीधरा मुरली मनोहरा मुरली बजाकर मन को हरने वाले का नाम है मुरली मनोहर [संगीत] उसे प्रेम करो साधु पुरुषों के हृदय को सुरक्षित करने वाले दुष्टों के हृदय का दमन करने वाले धर्म की स्थापना करने वाले युग युग में और एक युग में कई बार अवतरित होने वाले तोत हमारे हृदय में भी अवतरित होता है तेरा नित्य अवतार भी होता है तेरा नैमत अवतार भी तेरा प्रेरणा अवतार भी है प्रभु और तेरा साक्षी अवतार भी तेरा अयोध्या अवतार भी है और तेरा विग्रह
अवतार मूर्ति से भी तू प्रकट हो सकता है दिल से भी प्र हो जाता और जो तेरे लिए थोड़ा कुछ सत्कर्म करता है उसके हृदय में तू प्रेरणा अवतार होकर उसको प्रेरित करके अपने प्यारे संत के द्वार तक ले जाने वाले मेरे प्रभु मारा वालड़ा माधव गोविंद गो माना इंद्रिया इंद्रियों को स तास पूर्ति देने वाले गोविंद गोपाल दामोदर पेट से बंधे हुए बं जाने वाले भक्तों के लिए दिन दयाल जो अपना गर्व और अपनी विशेषता को तुच्छ समझकर तेरी महिमा जानता और प्रार्थना करता है उस पर तू दया करता है भगवान की भक्ति न्याय
के लिए नहीं होती कर्म का फल मांगने के लिए भगवान की भक्ति नहीं होती कर्म का फल तो यमराज देते हैं दंड देना अथवा स्वर्ग भेजना य कायदा विभाग यमराज का है अगर भगवान भी कर्म का फल ही देंगे तो भक्ति क्यों करें अपने अपने कर्मों के बल से जो मिलेगा मिलेगा भक्ति इसलिए करते कि हमारे कैसे भी कर्म हो क्षमा करने में जो बहादुर है हमारी कैसी भी अयोग्यता है लेकिन गले लगाने में जो बहादुर है जिसका स्वभाव है सु हदम सर्व भूता नाम प्राणी मात्र का जो सुहृद है हम उस परमेश्वर का नाम
लेते हैं उस परमेश्वर की भक्ति करते लेखे कतन छुटिया न किन बोलन हार क्षण क्षण में गलती करने वाला यह जीव अपना लेखा चोखा करा के कब मुक्त होगा नहीं मेरा लेखा हिसाब हिसाब नहीं तेरी करुणा [संगीत] कृपा जैसे किसी दरिद्र के यहां घूमते घाते भटकते जंगल में किसी राजा ने पानी पिया भोजन किया राजा कहता कि कभी नगर में आओ तो मेरे महल में आना अब उस बेचारे गरीब ने टूटी खटिया दी फूटी सुरा का पानी का प्याला दिया और बाजरी की रोटी का टुकड़ा और गुवार की सब्जी खिलाई लेन जब राजा उसको देता
है तो क्या उतना ही देगा नहीं नहीं राजा अपने तरफ से देता है ऐसे जीव बेचारा भगवान को प्रणाम करें चिंतन करे स्मरण करें चार दाने चावल के डाले अक्षत मेरा अक्षय पुण्य हो मेरी अक्षय भक्ति हो चार पैसे डाले ले ठाकुर जी स्वीकार कर ले पत्र पुष्पम फलम पत्र पुष्प फल ईश्वर को अर्पण करता है ईश्वर उसका स्वीकार कर लेते हैं जब ईश्वर अपनी कृपा के अनुसार देते हैं तो जीव फिर मंगता नहीं बनता स्वयं दाता हो जाता है ऐसे दाताओं के दाता है परमेश्वर उस परमेश्वर की करुणा कृपा प्रीति भक्ति पुकार छोड़कर कब
तक जहां तहां नाक रगड़ [प्रशंसा] रहोगे सेठ तू राजी हो जा सेठानी नेता तू राजी हो जा जनता तू राजी हो जा तो कुर्सी मिल जाए लेकिन कुरसी का मिली फिर क्या नेता का नेता राजी हो गया थोड़ा सा लाइसेंस दिला दिया कुछ कर दिया फिर क्या अरे एक साधे सब सधे सब साधे सब जाय उस एक परमात्मा की प्रीति को साध लो तो फिर सब सदा हुआ मिलेगा नेता को रिझाना नहीं पड़ेगा जनता को रिझाना नहीं पड़ेगा देवताओं को रिझाना नहीं पड़ेगा सब रीझे हुए मिलेंगे क्योंकि सबका आत्मा वो हो बैठा आज सुबह के
प्रभात के सत्संग में था श्री कृष्ण धव को कहते धव तुम उन महापुरुषों की नाई जो मुझे आत्म रूप से जानते और आत्मा ब्रह्म रूप से जानते ऐसे होकर इस कल दुग से मुक्त हो कर विचरण करो जब श्री कृष्ण अपनी लीला विसर्जित कर रहे थे उधव को शक पड़ा और उधव ने कहा प्रभु मुझे कुछ उपद्रव दिख रहे हैं आप सुकन दिख रहे हैं कृष्ण ने कहा कि आज से सात में दिन मेरे चले जाने के बाद पृथ्वी पर से मंगल चला जाएगा उपद्रव अमंगल होगा आज से सात में दिन समुद्र द्वारका को डुबा
देगा और यदुवंशी ऋषियों के श्राप से पहले ही पूरे हो चुके हैं अब देखने भर को है कि आपसी कला और जंग से समाप्ति होगी प्रिय धव अब कलयुग का प्रवेश होने वाला है लोक अल्प आयु अल्प मति पेट पालू जीवन वाले लोगों का जीवन ऐसे ही जाने के युग आ रहा है उधव तुम्हारे योग्य य धरती नहीं रहेगी तब ध गदगद होकर कहते कि प्रभु तुम मुझे आप जब लीला समेट के जा रहे हो तु मुझे साथ ले चलो तब श्री कृष्ण कहते हैं कि धव कोई साथ आया नहीं कोई साथ चलता नहीं शरीर
करके लेकिन मैं जो अंतर्यामी रूप से सबका साथी बना बैठा उस स्वरूप में तुम आओ यह देह को मैं मानने की गलती परिवार को मेरा और वस्तुओ को हमारी मानने की वृत्ति को शांत कर दो हटा दो जिससे यह मैं और मेरा देखता है वह सब मोह मूल है देखिए सुनिए गुनिला मोह मूल परमार्थ नाही जो दिखे सो चालन हार लपट रहे हो सो अं अंधार यह सब दिखने वाला बदलता है मिथ्या है जिससे दिखता है वह आत्मा परमेश्वर सत्य है उस सत्य स्वरूप में तुम प्रीति करो ये 36 तत्व प्रकृति के शरीर आदि पांच
भूत आति मन इंद्रिया और विषय उसके भोग इन 36 तत्वों से पार जो साक्षी तत्व है चैतन्य उसकी धारणा करो धव तुम बद्री का आश्रम चले जाओ उधव कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे पा साल के उ मां बोलती बेटा कलेवर कर लो नाश्ता कर लो बोले मां मैंने अभी सुबह की पूजा नहीं की पूरी नहीं की पूजा करके नियम करके फिर खाऊंगा धव की शिक्षा के गुरु थे बृहस्पति देवताओं के गुरु अधव के सामाजिक और सब प्रकार के ज्ञान के गुरु कृष्ण थे और प्रेमा भक्ति की गुरु गोपिया थी और कृष्ण के सखा धव को
कृष्ण कहते कि धव अपना मन संसारी संबंधों से समेटकर अब एकांत में चले जाओ यह सार गर्भित सत्संग सुब था तो आपको भी हिमालय धव को तो श्री कृष्ण ने हिमालय भेजा आप अपने घर में ऐसा कोई कमरा बना दो जहां पूर्णिमा को अमावस्या को गाव के झरण से पोता लग जाए उसमें दिव्यता है अपने शरीर पर भी गोमूत्र गो झरण और गो गोबर से लेपा लगक स्नान करें ताकि शरीर के दोष मिटे तुलसी के पत्तों का सेवन करें ताकि छह प्रकार के फायदे होते हैं तुलसी के पतों का उपयोग करने से द्रव्य की शुद्धि
भाव की शुद्धि वस्तु की शुद्धि कर्म की शुद्धि इस प्रकार शुद्धि रखे और फिर उस पूजा के रूम में ध्यान के रूम में संसारी व्यवहार ना हो ऐसा आसन बिछा हो जिसमें आप भजन करें तो आपकी ऊर्जा को अर्थिंग ना मिले जैसे जनरेटर घूमता है तो विद्युत बनती है ऐसे आप भगवन नाम जप करते तो एक प्रकार की भगवती रा बनती है आसन बिना जो जप करते हैं उनकी भगवती ओरा को अर्थिंग मिल जाते हो ठन ठन पाल रह जाते तो कमरे में फर्नीचर ना हो धरती पर बिछा हुआ आसन हो और प्लास्टिक बिछा हो
अथवा गर्म कपड़ा बिछा हो उस पर सूती कपड़ा बचाओ लेकिन सूती कपड़ा धरती को ना छुए अर्थिंग ना मिले कभी कभार ताजे फूल रख दो महीने में दो पांच दिन गगल का दूप सुबह बताया था वेद में अथर्ववेद में गगल की महिमा आती है गगल के ऋषि हो गए अथर्व जहां गगल के धूप का प्रभाव होता है वहां से रोग और पाप ऐ कीटाणु रोग रोग और पाप में कीटाणु ऐसे भागते जैसे शेर की गर्जना से जंगल के पशु भाग जाते पुराण में भगवान ने कहा कि शर्करा और गाय भैंस की घी से मिश्रित गगल
की आहुति दोषों को हरति आदमी को पुण्य बय बनाती रोग मुक्त करती तो कभी कभार अपने कोई एक ऐसे कमरे को बना रखो कि जब भी कोई आपदा आए मुसीबत आए तब भी मार्गदर्शन लेने के लिए वह कमरा और जब ध्यान भजन करे तो वह कमरा और कभी चुप्पी साथ के बैठे रहे उससे बातें करें तो वह कमरा फैमिली रूम तो बनाते कमर तोड़ कार्यक्रम का रूम कमरा तो बनाते लेकिन दिल जोड़ने का जो कमरा बनाते हैं वे जीवन की बाजी जीत जाते हैं काम भोग के लिए कमरा बनाना यह कोई बड़ी बुद्धिमानी नहीं है
लेकिन प्रेम प्रसाद में एकाकार होने के लिए पूजा रूम बनाना लोग पूजा रूम का क्या करेंगे एक कबाटरे जी रख देते राम राम खास व जग हो और धरती पर बिछा आसन उत्तर के तरफ बैठकर ध्यान भजन करें या पूर्व के तरफ और सूरज उगने के पहले अगर ध्यान भजन करते तो आपकी धारणा शक्ति बढ़ेगी अमावस्या और पूर्णिमा के दिन करते हो जन्माष्टमी की रात को थोड़ा जागरण करके जप करोगे आज जन्माष्टमी अमित पुण्य होगा ो ो तो आम आदमी भले कृष्ण की जयंती ो ो करके मनाए लेकिन साधक को तो हरि ओम शांति जितना
शांत प्रसाद प्राप्त करोगे उतना विशेष लाभ होगा आरंभिक में भगवन नाम हरि ओम हरि ओम कृष्ण कृष्ण यह पाप नाशिनी ऊर्जा पैदा करेगा हरि ओम कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वास दे साफल्यम् [संगीत] [हंसी] [संगीत] [संगीत] नाथ [संगीत] नारायण [संगीत] वासुदेव पलू उच्चारण से भगवान में विश्रांति मिलेगी प्रीति का प्राकट्य होगा काम राम में बदलेगा द्वेष शमा में बदलेगी जड़ता च नता में बदलेगी बंधन मुक्ति में बदलेगा दुख माधुर्य में बदलेगा दुख हारी भगवान का एक नाम है हरि [संगीत] हरि ओ [संगीत] [संगीत] ह ओम होठ बन इस प्रकार उच्चारण करें भगवत विग्रह
के सामने देखें ओमकार के सामने देखे हरि ओम शब्द लिखा हो व सामने देखे स्वस्तिक के सामने देखे गुरु मूर्ति के सामने देखे एक लव्य तो ध्यान मूलम गुरु मूर्ति तो इस प्रकार आप अगर भगवत विग्रह के सामने गुरु विग्र के सामने ध्यान का अभ्यास करेंगे तो आपके लिए य ईश्वर प्राप्ति दुखों से पिंड छुड़ाना कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि ईश्वर प्राप्त करने के लिए ही मनुष्य जीवन मिला है और ईश्वर की प्राप्ति हो जाए इसलिए ईश्वर के अवतार ईश्वर का उपदेश ईश्वर का नाम ईश्वर की कथा और ईश्वर प्राप्ति हो जाए इसलिए संसारी दुख
भी हमको धक्के मारकर ईश्वर के मार्ग ले जाते हैं वे आदमी अभागे हैं वे लोग जिनके जीवन में कोई दुख नहीं आया लेकिन वे अभागे अभागे रह जाते हैं दुख आने पर भी दुख के प्रभाव से प्रभावित नहीं होते दुख आता है यह फिर फिर से दुखी होना दुखी आदमी की भूल का फल है एक बार दुख आया सावधान हो जाए बुद्ध ने देखा दुखी आदमी बुद्ध ने देखा बीमार रुग्ण और मुर्दे को बुद्ध सावधान हो गए कि शरीर बीमार भी होगा वृद्ध भी होगा रुग्ण भी होगा मर जाएगा तो मरना नहीं चाहते रोग नहीं
चाहते तो जरूर ऐसी जगह है जहां मृत्यु नहीं है रोग नहीं है दुख नहीं है और बुद्ध ने खोजा जिन खोजा तिन पाया बुद्ध अ केलिए खोजते खोजते बड़ा उपवास और परिश्रम के भगमति नदी लाने में भी बुद्ध असमर्थ से थे सुजाता नाम की कन्या ने उनको खीर खिलाई ये खीर खाने की सीजन है शरद पूम तक मक्खन मिश्री खाने की सीजन है शरद पुनम तक लेकिन भोजन अधिक ठास के करेंगे तो बीमारी इस पूनम शरद पूनम तक बीमारी की ये माता है सीजन शरद ऋतु तो भोजन का जरा ख्याल रखना अंगूर किशमिश द्राक्ष पेठा
पेठे की सब्जी कोरू की सब्जी दूधी की सब्जी परवल की सब्जी खाने योग्य भारी खोराक बदाम काजू पिस्ता ट्टा पदार्थ बीमारी ले आएगा हल्का फुलका भोजन शरद पुनम भोगम नदी पार करने में बुद्ध लड़के से जा रहे थे सुजाता नाम की कन्या ने उनको खीर दी तब उनके शरीर में थोड़ा बल आया वही बुद्ध जब बैठे तो अब क्या करें आखिर जहां मौत नहीं है जहां दुख नहीं है शोक नहीं है मृत्यु नहीं है वह कौन सी अवस्था है खोजते खोजते खोजते बेचार करते करते विल विल फाइंड ए वे जहां चाह वहां रहा कोई मिल
गए होंगे महापुरुष युक्ति बता दी बस लोग हाथ तो जोड़ते उस युक्ति परंपरा तो चल रही है लेकिन हाथ जोड़ना एक शालीनता ही रह गया हकीकत में क्या है कि हथेली पर हथेली अंगूठे के सामने अंगूठा और हर अंगली के सामने अंगली तो और फिर आमने सामने दबाव पड़े और फिर आप एक टक देखो तो यह नाड़ियों के दबाव के प्रभाव से मन की चंचलता की गति रुक जाती बुद्ध को संकेत मिला और ध्यान में खो गए ध्यान में खो गए और जिसको खोजते थे वही हो गए समय की धारा बीती गई एक दिन कोई
मुर्दा जा रहा था राम बोलो भाई राम उठाकर कोई कंधे पर लोग जा रहे और बुद्ध खूब हसे तब सुजाता ने पूछ ही लिया के भंते आपने किसी की मृत्यु देखी और संसार मरण धर्मा है ऐसा वैराग्य हुआ और आपने कठोर साधना की फिर आपको रहस्य आ गया समझ में और आज वो मुर्दा देखकर आप हंस रहे हैं क्यों बुद्ध ने कहा सुजाता घटना तो वही की वही है लेकिन अब मैं वही का वही नहीं हूं लगता था कि यह मर गया तो मैं भी मर जाऊंगा अब पता चला कि जैसे यह मरा ऐसे यह
भी मर जाएगा फिर भी मेरी मौत नहीं होगी मैं वो चैतन्य हूं जा मरने ते जग डरे मोरे मन आनंद कब मरिए कब मिलिए पाइए पूर्ण परमानंद तो आपकी भी मृत्यु आए तो चकले का क्या होगा चिड़े का क्या होगा खेतन सठ से फलाना न सठ से मारो ससे बण बिलाड़ा था सो नहीं मृत्यु आती है तो इस मरने वाले शरीर की आती छूटता है तो जो पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा वह छूटता है लेकिन जो पहले था भी है बाद में भी रहेगा वो तू तो मेरे को कभी नहीं छोड़ सकता है
मृत्यु आई शरीर छूटेगा लेकिन मैं तो तेरा सखा बिन फेरे हम तेरे हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओ ओ ओ ओ ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओ घर वाले बोले ठहरो ठहरो ठहरो ठहरो ठ ठहरो ठहरो ठहरो ठहरो ठहरो घर वाले बोले क्या हुआ क्या हुआ अरे बोले अब ये शरीर छोड़कर जा रहा हूं हरि से एक होने को जा रहा हूं हरि सच बोलते कि हा हरि ओम हरि ओम हरि ओम गए ऐसे जाना कि मारू सूट कह राते कहरा क्या जाना
जब हम भगवान के सखा हैं और भगवान परम सर्द है परम दयालु है मुक्ति करने के लिए तो अवतार भी लेते उपदेश भी देते कथाओं में भी ले जाते और उन्हीं का नाम है अब हमको डरने की क्या बात है चलो राम राम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ऐसा मरना रोज सीखो मरो मरो सबको कहे मरना ना जाने कोई ऐसा मरना सीख लो तो फिर मरना ना [संगीत] होई बंसी धरा कृष्ण कन्हैया बंसी बजैया बिंद्रावन की कुंज गलियों में मेरे साधकों की दिल की गलियों में त ठुमक ठुमक ठुमक [संगीत] ठुमक
रास रचैया [संगीत] प्यार करते जाओ [प्रशंसा] उसे मारा ओम नमो भगवते वासुदेव तो वासुदेव है बसरा है सब [संगीत] में मनुष्य को अपना ईश्वर के साथ का संबंध पुख्ता कर देना चाहिए इससे क्या होगा पौरुष आएगा श्री आएगा विजय आएगा द्रवा नीति दृढ़ निश्चय शक् आएगी वैभव [संगीत] आएगा पानी घास यह संपदा है लेकिन घास से दूध बनना यह भगवान का वैभव पानी से अंगूर का रस बनना य वैभव ऐसे तुम्हारे भोजन की थाली से रक्त मांस और बुद्धि बनना ये तुम्हारे आत्मा का वैभव है जीव तो जैसे मेरा बाहर श्री वैभव है ऐसा तुम्हारा
भी तो श्री और वैभव है इसलिए हे मनुष्य तुम और हम सखा है हर जन्माष्टमी को कृष्ण लीला के गुणगान होते हैं लेकिन सत्संग में कुछ ना कुछ नवीन रस नवीन आनंद नवीन ज्ञान नवीन माधुर्य मिलता ही रहता है