वो दूर नहीं है दुर्लभ नहीं है और उसको पाने के लिए समय का इंतजार नहीं करना है और जो सदा बदलता है उसको कितना भी पाओ कितना भी संभालो जो बदलता है वह बदलता है और जो अदल है सो अब बदल है तो जो बदल है वह प्रकृति है जो बदल है वह माया है और जो अब बदल है वो आत्मा है जैसे हाथ से चलाने वाली आटा पीसने की घंटी उसमें गेहूं डालो बाजरी डालो कुछ डालो पीस दे लेकिन कोई दाना बच जाता है जो कील पर रहता है अब बदल को छुए रहता है
वोह पीसने से बचता है कबीर जी ने बताया चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय दो पाटन के बीच में साबित बचा ना कोई कबीर जी ने सार बात कही य बदलने वाली बात कई लेकिन बदल जो जो चल रहा है वो अचल के सहारे बीच में एक्सल होती उसके आधार पर चक्की घूमती है जसे साइकिल का पैया है एक्सल और हब है ह घूमता है एक्सल ज साइकिल घूमती है लेकिन साइकिल में अघम चीज ना हो तो घूम नहीं सकती सा आ घूम है मोटरसाइकिल के अंदर साइकिल के अंदर तो पैया जिस पर घूमता
है वोह अघु है ना घूमने वाले पर ही घूमता है ऐसे अचल पर ही चल चल रहा है जैसे बचपन चल गया लेकिन अचल आत्मा के बल से दुख चल गया सुख चल गया मन चल गया बुद्धि चल गई चित्त चल गया अ चल गया अ भी चलता रहता है कभी अ छोटा होता है कभी हम बढ़ता है इन सबको देखने वाला अचल है तो उस अचल में अगर प्रीति हो जाए अचल का ज्ञान अगर पाने में लग जाए तो जो अचल है वो अस्लत है और जो चल है व माया है कोई दुख आए
तो समझ लेना ये चल है सुख आए तो समझ लेना ये चल है चिंता आए तो समझ लेना चल खुशी आए तो समझ लेना चल आया है ना जो आया है तो चल है ना अचल दिखता है अचल के बल से चल दिखता है अचल सदा रहता है चल चलता रहता है तो दो तत्व है एक प्रकृति चल है और परमेश्वर आत्मा अचल है तो अल में जो सुख है अचल में जो ज्ञान है अचल में जो सामर्थ्य है उसी से चल चल रहा है वो दिखता है चल अचल दिखता नहीं जैसे मन भी दिखता
है बुद्धि से बुद्धि भी दिखती है विवेक से विवेक भी दिखता है अचल से मेरा विवेक विकसित है कि अ लेन अचल से सब चल दिखेगा सारे चल मिलाकर अचल को नहीं देख सकते तो अचल है परमात्मा चल है प्रकृति अचल को बोलते एक ओंकार सति नाम कर्ता पूरक कर्ता धरता ही अ चल योनि से चल योनि में आता है अचल योनि में नहीं आता तो मिले कैसे बोले गुर प्रसाद जप आ चल के आदि में जो था चल के समय में भी है चल मर जाए फिर भी जो रहता है जप आद सत जुगा
युगों से अचल अचल है सतयुग चल पड़ा द्वापर चल पड़ा त्रेता चल पड़ा कलयुग चल पड़ा चार ुग बीते उसको जानने वाला बता होता तो चार ुग को कौन बताता सतयुग के साथ अ चल चला जाता तो कौन बताता कि भया पहले स सतयुग था त्रता था द्वापर था कल मैंने सब्जी रोटी खाई थी और य सीजन जरा हाजमा ठीक नहीं है तो अदरक भी खाई अब अदरक नहीं है सब्जी रोटी नहीं है उसको जानने वाला अचल है वो सब चली गई अद्रक सब्जी रोटी ी जन में भोजन कर ले आधा ये सीजन इतना भारी
खाने की नहीं बादल वाला सीजन है अजीर करेगा तो ये सीजन कम खाने का चूप और ध्यान भजन करने का सीजन तो ध्यान भजन में भगवान नारायण देव शैनी एकादशी के से लेकर अचल में शांत हो जाते साधु संत भी चतुर्मास अचल में आने के लिए कुछ कुछ समय ध्यान होते श्री कृष्ण 13 साल अचल में रहे आप हरि ही शुरू करके आखिर म में आते उतनी देर मन अचल में रहता है थोड़े समय में लगता है कि फ्री हो गए वरी लेस हो गए बच्चे जब पढ़ाई करें तो लंबा स्वांस लेकर हरि ओम सात
बार करने के बाद पढ़े तो कम समय में अच्छा पढ़ सकते पढ़ते पढ़ते जीभ तालू में लगाकर फिर याद करें थोड़ी देर में सब याद रह जाएगा क्योंकि उसमें अचल का सीधा संबंध होता है अचल तो परमात्मा है कई बार बताया हमारे शरीर में 72 करोड़ 72 लाख 100 हज और एक एक भी नहीं छोड़ी प्रश्न उपनिषद में आता है 72 करोड़ इसमें 7 करोड़ इसमें 7 करोड़ 7 लाख 10000 200 और एक नाया है काट पीट के एमबीबीएस एमडी वालो ने नहीं खोजा है हमारे ऋषियों ने खोजा है अचल में ध्यान करके चल को
सारा जैसे आप अलग होकर देखते हैं ऐसे ही शरीर को पूरा नाभी केंद्र में समाधि ध्यान हो एक भी नाड़ी छोड़ी नहीं नहीं तो लिख देते 72 करोड़ 72 लाख करीब 100 हज अथवा 100 हज कितना सुख विज्ञान है भारतीय ऋषियों का और उसमें 22 नारिया मुख्य है 10 मस्तक के दाए 10 बाहे दूसरा प्रकरण है उसमें 14 नार मुख्य है 14 में भी तीन इंडा पिंगा सक्षम लेकिन य ऊपर के विभाग में 22 नाया 10 दाए 10 बाए 20 हो गई 21 में नाड़ी ब्रह्म नाड़ी जो संयम करता है हमारी शादी हुई अगर हम
संसार का विकारी जीवन भी जीते और भजन करते तो बरकत नहीं आती संयमी रहे तो हमारी ब्रह्म नाड़ी मजबूत हुई और गुरु जी की ब्रह्म कृपा से ब्रह्म नाड़ी के द्वारा ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर पढ़ते होंगे आशा ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे नाश शेष गुरुवर कार्य रहे ना शेष मोह कभी ना ठग सके इच्छा नहीं लवले पूर्ण गुरु कृपा मिले पूर्ण गुरु का ज्ञान गुरुवर पूर्ण गुरु का ज्ञान आसू मल से हो गए साई आशाराम तो पूर्ण गुरु का ज्ञान य प्रश्न उपनिषद है कठ उपनिषद है बहुत ऊंचे शा वैदिक ग्र तो 72 हज
7 72 करोड़ 720 नाड़ियों में 22 नाड़ी और 22 नाड़ियों में 10 दाए 10 बाए छोटी मोड़ी तो बहुत है र 21 में नाड़ी ब्रह्म नाड़ी और 22 में नाड़ी है सुमति नाड़ी जैसे कोई बात याद नहीं रहती हो तो तालू में जीभ लगाकर फिर उस बात को सुने और मन में जैसे फोन में नंबर सेव कर देते कंप्यूटर में कोई प्रोग्राम सेव कर देते ऐसे उस नाड़ी में सेव हो जाता है कंप्यूटर अथवा य फोन मोबाइल किसने खोजा इन नाड़ियों में रहने वाले जीव नहीं खो जाए ठीक बात है तो अब फायदा क्या उठाना
है कि ब्रह्मणा और ना यह दो नाड़ी जितनी सेंसिटिव जितनी सबल रहे उतना बाकी का सब काम ठीक होने लगता इसलिए योगी लोग ध्यान करते तो बोले तालू पजवा लगाओ तो यह ध्यान का तरीका है ज्ञान का तरीका है कि एक चल है दूसरा अचल है अचल आत्मा है और चल शरीर है संसार है मन है बुद्धि है तो चल कितना ही चला गया देखा अ चलने चल कितना ही बदल गया सुख दुख देकर उसको जानने वाला अचल तो जो अचल है वह कौन है चल है य तो प्रकृति अचल है कौन है अब दूसरे
तरीके से देखो एक होता है यह दूसरा होता है वह यह वह यह माना जो पास में है वह माना जो दूर है मैं हूं तब यह होगा और वह होगा ठीक है ना अकल टॉप में आजकल बिल्कुल ऊंच जल्दी स्थिति हो जाए गुरु नानक 60 साल के थे तो सत्संग प्रवृति से थोड़ा निवृत हो गए 63 साल के बाद सोचने लगा कि हम भी अब निवृत हो कोई मिल जाए ऐसा नहीं निवृत हो जाएंगे तो कोई पलायन करते या थक गए नहीं उस मैं में ज्यादा समाधि स्त रहे इसलिए हम भी सब धीरे धीरे
समय कम देते पहले जितना देते थे इधर समय अब नहीं देते निवृति के तरफ जा पहले के सत्संग की अपेक्षा आजकल सत्संग बहुत साधक को जल्दी उठाने वाला हो रहा है तो मैं के बल से यह दिखेगा वह दिखेगा यह होगा वह होगा तो वह और यह बदलेगा मैं जो कते है यह मेरा दोस्त है वह मेरा दुश्मन है वह मेरा मित्र है यह मेरा ऐसे ही है यह मेरा मकान है वह मेरा मित्र है लेकिन दोनों मैं के आधार पर होगा ठीक है ना तो मैं कौन उसको खोजो ग तो परमात्मा दिख जाएंगे अथवा
परमात्मा कैसे मिले उसमें लगोगे तो अपना मैं का पता चल जाएगा क्योंकि जहां मैं है वही आत्मा है और जो आत्मा है वही परमात्मा है जहा बुलबुला है वही पानी है और जो पानी है वही सागर है बोले बुलबुला सा कैसे हो सकता है बुलबुला सागर नहीं लेकिन पानी सागर है ऐसे ही जो अचल आत्मा है वही परमात्मा का अविभाज्य अंग घड़े का जो आकाश है थोड़ा दिखता है लेकिन यह महाकाश है यह केबिन का आकाश है इस आकाश से क्या होता है कै बिन तो खाली आवरण है महाकाश से य अलग नहीं है ये
जो आकाश है केबिन का वो हल के आकाश से अलग नहीं है हल काश बाहर के आकाश से अलग नहीं बाहर का आकाश हंग कांग अमेरिका दुबई और स्वर्ग के आकाश से अलग नहीं है तो मेरा आकाश स्वर्ग के आकाश से मिला है मेरे आकाश में ही सूरज लटक रहा है क्या ख्याल है केबिन को हटाओ लेकिन यह आकाश में ही सूरज लटक रहा है ंदा चमक रहा है तारे टिम टमा रहे केबिन का आवरण दिखता है लेकिन सच्चा नहीं है केबिन यह है दरवाजा हु है लेकिन आकाश में में ऐसे अंत कण का चकाश
में स्वरूप मन य है बुद्धि याय है चित य है शरीर य है लेकिन चदा काश में वही तो बचपन बदल गया कि नहीं बदला उसको जानने वाला मैं वही का वही जवानी बदली मैं वही का ई घर थे बच्चे ढीले ढीले पतले डबले व बल गया लेकिन उसको जानने वाला मैं वही का वही अब मजबूत नहीं हो रहे क्या बल बढ़ा है कि नहीं बुद्धि बड़ी है कि नहीं चिंतन बड़ा है कि नहीं दुख बड़ा है कि नहीं नहीं बड़ा है शाबाश समझ के बोलते तो जो अचल है उसमें आ जाओ तो चल का
प्रभाव दुख नहीं देगा नहीं तो चल की भी ठीक करो शरीर को कभी कुछ कभी कुछ ये होता है तो शरीर को होता मेरे को नहीं होता हरि ओम ओम ओ शरीर का इलाज करो लेकिन शरीर की पीड़ा अपने में मत मिलाओ मन की गड़बड़ी अपने अचल आत्मा में मत मिलाओ शिष्य जा रहा था गुरुकुल से पढ़ लिखे 20 साल की 18 साल की उम्र तक गुरुकुल में रहा फिर पढ़ाई पूरी हुई गुरु जी को प्रणाम किया गुरु जी आज्ञा करो बोले जाता है ना घर बैठे एक बात याद रखना हां सबकी करना गली अपनी
मत भूलना हां सबकी करना गली अपनी मत भूलना गली क्या है मीरा जी कहती है सकरी गली में सदगुरु मिलिया बाता कराने मीठी दुर्जना ने बाई कहे प्रभु गिरधर नाग में तो चाल चलूंगी अनूठी दुर्जन जाए जल मरो अंगीठी रविदास चमार है चमार की बस्ती में राज रानी जाकर बैठती है सामान्य चमार लो के बीच मीरा बैठती है नीरा ने कहा राणा जी माने या बदनामी लागे मीठी कोई निंदो कोई विंदो मैं चलूंगी चाल अनूठी साकली गली में सतगुरु मिलया रविदास चप्पल बनाने का काम करते थे साकरी गली में सतगुरु मिलया क्यों कर फिरू अपति
सतगुरु जी से बाता करता दुर्जन लोगों ने दी थी सतगुरु से मैं बातचीत कर रही थ दुर्जन लोगों ने देखी देख लिया चमार से बात करती है ऐसा करती चमार क गुरु तो गुरु होता है चमार तो शरीर है कि बनिया शरीर है गुरु तो गुरु होता है अचल तो अचल होता है साकली गली में सदगुरु मिलिया क्यों कर फिरू आपूर्ति भाई बेटा बेटा नहीं है बेटा करो यह करो अरे जब सतगुरु का प्रसाद मिल गया तो मैं तो जगत माता हो जाऊंगी मीरा बाई को बेटा नहीं हुआ तो क्या बात है हजारों बेठ मीरा
के है शबरी के हजारों शबरी मां के हजारों बच्चे हैं ऐसे राम कृष्ण की मां के हजारों बच्चे राम कृष्ण की पत्नी के अपनी कोक से बेटा नहीं हुआ तो क्या मां शारदा मां शारदा मां खाली उस चल में रहो तो बस हो गया तो साकली गली में सतगुरु मिलिया क्यों कर फिरू अती सतगुरु श बाता करता दुर्जन लोगों ने दथ मीरा के प्रभ गिरधर नागर दुर्जन जलो जाए अंगीठी जाके पचो निंदा के आग में मैं तो चाल चलूंगी अनूठी तो अनु ठी चाल उस अचल में जब प्रीति हो गई तो फिर भय शोक विरोध
ये वो आदमी को दबाता नहीं भय शोक विरोध चिंता निंदा ये सब चल में होता है अचल ईश्वर में उसकी गति नहीं है नानक जी की कितनी निना हो नानक जी पर कितने आरोप लगते थे यहां तक कि बाबर ने ऐसा दुर्बुद्धि किया कि नानक जी को जल में डाल दिया फिर भी नानक जी अभी भी लोगों के हृदय में है ऐसे ही बुद्ध के लिए कबीर के लिए और तुकाराम महाराज के लिए कसे जो जो महापुरुष जीसस को भी देखो खले ठोक दिया क्रॉस पर मैगलन के साथ उसका नाम जोड़ दिया मैन [प्रशंसा] थी
जरूरी थोड़ी है कि जीसस मैडलिन के साथ बुरा व्यवहार किया होगा नहीं हमारा हृदय नहीं मानता हम नहीं बोलते लेकिन उस समय के लोगों ने और कानून ने तो जीसस को अपराधी मानकर क्रॉस प चढ़ा दिया फिर भी जीसस तो लोगों के सामने अभी भी आदर्श से लाखों लोग उनको जानते [संगीत] [प्रशंसा] मानते दुख ना आए या विरोध ना हो ऐसा नहीं है लेकिन विरोध जहां नहीं पहुंचे उस मैं स्वरूप आत्मा में पहुंच तो मौत भी आएगा तो आपको पीड़ा नहीं होग मरना तो पड़ेगा शरीर को लेकिन मौत शरीर की होते बेटे तुम्हारी मौत नहीं
जा मरने ते जग डरे मोरे मन आनंद दुनिया डरती है जिस मौत से उसके लिए मुझे आनंद है कबीर जी बोलते कि मरेगा तो यह मरेगा वह मरेगा वह मेरा संबंध मरेगा या मेरा शरीर मरेगा इन दोनों को जानने वाला मैं हूं अपना आप ह परिस्थिति का बाप हरि ओम मा हरि ओम मा हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम ओम प्रभु जी ओम प्यारे जी हो मेरे जी हो इस ज्ञान का बदला अपन नहीं चुका सकते दुनिया की सारी विद्या सीख ले लेकिन यह आत्म विद्या नहीं सीखा िकार है सब विद्या दुनिया का सारा
धन पा लिया लेकिन आत्म धन नहीं पाया तो कंगला दुनिया का सारा सुख भोग लिया य का व का लेकिन मैं स्वरूप आत्मा का सुख नहीं लिया तो कुछ भी नहीं ज कर मिले राम मिले सब मिल तो थयो दुनिया में दिल जो मतलब पूर थ बाबा कुछ स्पन भगवान शिव जी ने कहा पार्वती को उमा का में अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वपना तो मनुष्य मात्र को सच्चे ज्ञान की जरूरत है मनुष्य मात्र को आत्म सुख की जरूरत है और जो कु प्रचार करते हैं उनके लिए भी मेरे मन में कहीं नफरत
नहीं है कहीं द्वेष नहीं है अगर होता तो मेरा दिल खराब तो यह दिव्य ज्ञान कहां रहे राजेंद्र बाबू के लिए कुछ का कुछ लिखते थे राजेंद्र बाबू बो को लोग बोलते आप रद याद बोले भाई कुत्ते भोके और हाथी उनके पीछे पड़े तो कुत्ते की कीमत बढ़ जाती चलो जी भगवान में प्रीति करना और भगवान को चैतन्य रूप जब तक नहीं जाना तब तक दुख चिंता सुख नहीं मिलता है और वह चैतन्य तुम्हारे से अलग होकर चैतन्य नहीं रह सकता वो चैतन्य एक जगह पर नहीं हो सकता वो चैतन्य व्यापक है और विभु है
जो व्यापक है विभु है वो यहां भी है जो सर्वत्र है वो यहां भी है जो सदा है वो अब भी है और जो सब में है वो मुझ में भी है तो सबसे मिल मिल के थक जाओगे लेकिन जो मुझ में अपने आप में मिलोगे तो सबका सार मिल जाएगा चावल का बड़ा देग है एक एक दाना चेक करोगे तो थक जाओगे लेकिन थोड़ा सा चेक करो तो पूरी दे वही की वही है पूरा सरोवर तुम पी के हिसाब नहीं निकालो एक आचमन ले लिया तो सरोवर के पानी का स्वाद आए ऐसे अपने मैं
का य अनुभव कर लिया तो सबके अंतक में जो मैं मैं है वही का तो फिर आपको अपने में का ज्ञान हो जाएगा तो सबकी म में आपकी समता रहेगी आपके पास वशीकरण मंत्र हो जाएगा वशीकरण मंत्र क्या है सब अपने आप को प्रेम करते हैं अपने आप को प्रेम करते ऐसी मुसीबत आ जाए कि यह छोड़ना पड़े यह छोड़ना पड़े तो वह छूट जाए लेकिन मैं तो बचू अ मैं में भी यह शरीर समझो तो शरीर का अंग छूट जाए फिर भी मैं बचू तो वो जो मैं है सुख रूप है ज्ञान रूप है
चेतन रूप और नित्य है उसको जानेंगे तो सब दुखों का अंत हो जाएगा अभी अपने मन में मैं करके बैठे शरीर में मैं करके बैठे बुद्धि में मैं करके बैठे जाति में मैं करके बैठे मैं में मैं का पता चल जाए यही कला कौशल्य है यही मनुष्य जन्म की बुद्धि की का और जब तक गुरु कृपा पूर्ण हजम नहीं हो तब तक किसी भी कीमत में गुरु की छाया का त्याग नहीं करना अगर हम गुरु से आज्ञा लेकर घर आते रहते इधर जाते रहते तो हम भी भटक भैया में होते लगे हैं तो लगे हैं
काम निपटा पहले जरा दो दिन इधर जाऊ चार दिन उधर जाऊ ऐसे लोग तो कई आए कई गए हम सात साल में एक दिन भी कहीं गए नहीं गुरु जी की छाया छोड़ के कहीं भी तो गुरु जी की आज्ञा से इधर रहे उधर रहे तो गुरु के हो तो कठिन नहीं है दूर नहीं है दुर्लभ नहीं है य लोग बोलते तांत्रिक त्रिक फलानी ये सब बहुत छोटी छोटी बातें है परमात्मा लाभ के आगे यह सब छोटे छोटे लाभ है कैसे कैसे लाभ किसी को सता के किसी को दुख देकर कोई लाभ होता है तो
उसको तो हम लाभ मानते भी नहीं यह तो ब्रह्म विद्या ऐसी किसी को सताना नहीं किसी को दुख देना नहीं कुका कुछ छीनना नहीं अपने आप को खोजना है बस देखा अपने आपको को मेरा दिल दीवाना हो गया ना छेड़ो मुझे यारों में खुद पर मस्ताना हो गया ऐसी ब्रह्म विद्या है राज विद्या सारे विद्याओं में राजा विद्या है राज विद्या राज को हम पवित्रम उत्तम पवित्र है उत्तम है और यही फल देने वाली और सुलभ भी है दूसरी कई विद्या दुनिया में एक से एक विद्या है उनकी अपनी अपनी डिम डिम है लेकिन आत्म
विद्या के आगे सब बोनी पड़ जाती यही आत्मविद्या भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दी युद्ध के मैदान अष्टावक्र ने जनक को दी 12 साल के अष्टावक्र आत्मविद्या के धन जनक को कहते हैं बेटा 80 साल का बेटा है 12 साल का बाप है इधर तो 70 साल का बाप है वहां तो 12 साल का बाप 80 साल का बेटा बेटे जो बा बादशा 12 साल का अष्टावक्र 80 साल के जनक को कहते हैं बेटा जनक अगर मोक्ष है तो चाहता विषय तज विश्वत ताे आ समा संतोष सुधा पी दिन रात्रे अर्थात सरल हदय रख जो
कुछ मिले खाने को रहने को संतुष्ट और सुधा अपने मैं में गोता मार शवास अंदर गया सो बाहर जाए तो हम चैतन्य मेरा गुरु की कृपा की कुंजी के बिना चाहे कितना धन कमा लो कितनी सताओं पर पहुंच जाओ आखिर कुछ नहीं अमेरिका में मेरा प्रवचन था मुरारजी भाई दे सारी देसाई प्राइम मिनिस्टर पद का अनुभव किया वो बोलते हैं गणेश टेंपल में मैं आईएस ऑफिसर के बाद फाइनेंस मिनिस्टर हुआ प्रधानमंत्री हूं फ भी मुझे वह सुख का अनुभव नहीं हुआ जो रमण म ऋषि के चरणों में और रमण म ऋषि यही उपासना बताते थे
अपने मैं को खो अपन भी वही ऊंची साधना बताते और करते करवाते 40 साल से जो भी अपन साधन भजन गीता भागवत और यह वेदांत अपने अपने में को साक्षी स्वभाव में आओ वही साधना चलती सत्य में वजय थे गांधी जी चल रहे सत्य के रास्ते अंग्रेज भारत छोड़ो कई अखबार वालों ने और कई प्रचार वालों ने गांधी जी के लिए क्या-क्या लिखा होगा फिर भी गांधी जी लगे रहे तो भारत को आजाद करा दिया ऐसे तुम लगे र तो अपने मैं को आजाद करा दो अपना मैं जो शरीर में फसा है मन में फसा
है इंद्रियों में फसा है बुद्धि में फसा है तो गुलाम बन रहे अपने मैं को आजाद करा दो अपने मैं को आत्म रूप में जान लो य आजाद हो गया अपने मैं को उलझा मत यह में व में मैं उलज गया यह शरीर है यह मन है यह बुद्धि है यह मैं हूं यह मेरा है यह को मैं मान यह हाथ है यह पैर है यह पेट है यह मन है यह बुद्धि है इन सबको हम मैं मानने की गलती कर बैठे मैं तो अलग है इनसे यह तो मरेंगे तो यह तो यही पड़ा रह
जाएगा फिर भी मैं तो अलग हूं आप यह शरीर अपने को मानते दिखते लेकिन आप शरीर नहीं है अगर अपन शरीर होते तो मरने के बाद शरीर को साथ ले जाते स तो होता नहीं है शरीर मरने के बाद भी हम तो रहते ना मैं तो रहता हूं और मरत तक मरा हुआ व्यक्ति मूर्छित हो के आकाश में पड़ा रहता फिर उसको सुरता आती देखता है कि यह पड़ा है यह मेरे मित्र रो रहे फलाने तीसरा मनते ताकि जिससे मिलना जुलना हो उसकी ममता छूटे और आगे की यात्रा करे लेकिन वहां भी अपने मैं को
असली रूप में नहीं जानेगा सूक्ष्म रूप से मैं ने मरने के बाद कहीं साक्षात्कार नहीं होता जब शास्त्र है गुरु है और बुद्धि है तो यही काम बनाना है मरने के बाद थोड़ी नहीं मरेंगे कहीं ऊपर जाएंगे उधर वहां भी ध कम धक्की है जो कुछ होता है कार्य कारण नियम के सिद्धांत के अनुसार ही होता है तो सत्संग से जीव की सूझ बूझ सात्विक होती सत्संग से कु विचार कुमति कम होती जाती है सुविचार और सुमति बढ़ती जाती है जहां सुमति वहां संपत्ति नाना विचार की संपत्ति सेवा की संपत्ति धैर्य की संपत्ति रुपए पैसे
वैभव की संपत्ति इस प्रकार अनेक प्रकार की संपत्ति आती है केवल धन संपत्ति नहीं है धन को तो कहते हैं गुजराती मा के ताड़े ते वित जो बहु पैसा ताड़े न नाम वित ज्यादा पैसा होने से आदमी संपत्ति वान नहीं है लेकिन जिसके पैसों के साथ सेवा कार्य है सत्कर्म है सूझबूझ है शास्त्र का कुछ ज्ञान ध्यान है संतों का संग है तो समझो उसके पास पूरी संपत्ति है नहीं तो खाली वित्त है अकेला वित तो रावण के पास भी था लेकिन राम जी के पास संपत्ति अकेला वित्त कंस के पास भी था लेकिन रावण
के पास कंस के पास वित था कृष्ण के पास संपद तो संपदा में श्री कृष्ण संतों का सत्कार करते युधिस्टर के यज्ञ में भगवान कृष्ण संतों को आओ भगत करते समय पैर धुला उनकी जूठी पत्तल उठाते हैं इसमें ही भगवान का भगवती पण महान की महानता है बाहर से बड़ा आदमी थोड़ा छोटा काम करेगा तो उसको डर लगेगा लोग क्या बोलेंगे मेरा बड़पन तो नहीं चला जाएगा लेकिन कृष्ण का बड़पन ऐसा है कि पत्तल उठाने से भी बड़पन नहीं जाता संतों के चरण धोने से भी उनका बड़पन नहीं मिटता और द्रोपदी के पद त्राण जूते
उठाने में पीतांबर में जूते उठा लेते हैं चल द्रौपदी मुझे दे देय तेरे चल और तू नंगे पैर जा भीष्म के पास प्रणाम करने नहीं तो जूतों के आवाज से व पहचान जाएगा कि द्रोपदी य भगवान का भगवती पन है कि बड़े से बड़े होते हुए भी छोटा काम भक्त का करने में उन्हें संकोच नहीं होता तो जिनके पास असली संपत्ति होती वह चाहे वकील का पेशा करो चाहे दुकानदार का पेशा करो चाहे न्यायाधीश का करो चाहे कोई भी काम धंधा कर उसको यह नहीं होगा कि अरे लोकमान्य बगो के मेरे पिताजी को उनके रिश्तेदार
कहते कि क्या साधु संतों के चक्कर में फिर भी कभी उनकी बातों में नहीं आते और गुरु जी को अपने घर में ही ठहरा और गुरुजी घर में है तो आए गयो की तो भीड़ लगती है ताता लगता है तो आए गए की भी थोड़ी आव भगत करनी पड़ती है तो उस समय के लोग मेरे पिताजी को भूला मानते थे अरे य भी को क्या बाबा के चक्कर में पड़ा है हमारे पिताजी को भी टोक थे लेकिन वह जाते रहे टोकने वाले के किसी का लड़का ऑटो चला रहा है तो दूसरा बड़ा लड़का ट्रक ड्राइवर
था मर गया मेरे से बड़ी उम्र का था मेरे बराबरी का उनका लड़का जो है वो ऑटो चलाता और मैं पुत्र तुम्हारा जगत में सदा रहेगा नाम लोगों के तुमसे सदा किसी के धन्यवाद का इंतजार करके कर्म फल नहीं देता अथवा किसी की नालज का इंतजार करके कर्म का फल नहीं मिलता कर्म फल देने में स्वतंत्र है और वह कर्म चाहे भगवान का अवतार ही वपु हो उनके साथ भी वह भगवान का सिद्धांत भगवान स्वीकार कर लेते रामावतार में बाली को छुप के मारना जरूरी था क्योंकि नहीं तो बाली को वरदान था कि जो सामने
आएगा शत्रु तो आधि शक्ति तुम्हारी उसकी आधि शक्ति तुम्हारे पास आ जाएगी उसी से तुम लड़कर उसको भगा सको अपनी शक्ति तो तुम्हारे पास बनी रहेगी ऐसा बाली को वरदान था तो राम जी ने देखा के अपने भाई की पत्नी और भाई का राज्य छीन लिया और बलवान बाली को सामने मारने जाऊंगा तो मेरी शक्ति से मेरे साथ पड़ेगा तो श्री रामचंद्र जी ने सात ताल के पेड़ों के पीछे से छुपकर जो कदम कदम पर मर्यादा का ध्यान रखे उस राम जी को छुपके माना धोखे से नहीं तो ललकारना पड़ता है सावधान तीर कमान नहीं
है तो तू ले ले धनुष्य के टंक आज जा हथियार अगर गिर गया तो रुकना पड़ता है हथियार लेले लेकिन यहां हथियार थिर लेने को भी नहीं कहा मैं आ रहा हूं नहीं कहा सात सात ताल के वृक्षों के पीछे रहकर राम जी ने तीर ठोक दिया और बाली मारा मरते मरते कहता है कि सुग्रीव तुम्हारा मित्र है तो मैं तुम्हारा वैरी का तुम्हारा हमारा तो कोई लेना देना नहीं फिर तुम मेरे को मारते हो और तारा आकर रोती उनकी पत्नी भगवान कहते तू किस लिए रोती है पंच भौतिक अधम शरीर तो तेरे पास पड़ा
और जीवात्मा तो नित्य है सति जल पावक गगन समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा सो तनु तव आगे सोहा जीव नित्य तू क लगी रोहा तारा आई थी शोक लेकर लेकिन जरा सा श्री राम जी का तात्विक सत्संग सुनकर तारा का तो जन्म जन्मांतर का अज्ञान मिट गया और आत्म राम का साक्षात्कार दशरथ नंदन राम तो बाहर से दिखते हैं लेकिन राम के राम का जो रू रोम तत्व ब्रह्मांड में बस रहा है उसका अंतरात्मा होकर प्रकट हो गया अब शत्रु की पत्नी को इतना दे डाला कि बड़े बड़े ऋषियों को वर्षों की साधना के
बाद मिलता है निगाह मात्र से फिर भी बाली को तो मारने वाले रहे राम लेकिन कर्म का विधान ऐसा है राम जी जैसे दाता को भी कर्म के विधान को स्वीकृति देनी पड़ती कृष्णा अवतार हुआ और वही वाली तीर कमान लेकर शिकार करता करता ऐसी असमंजस में पड़ा कि दूर से दिखने वाला मर मुकुट धारी कृष्ण उसे मृग देखा और सग निशाना ताका और श्री कृष्ण के पैर में वो तीर जा लगा व शिकार समझ के लेने गया य तो श्री कृष्ण कृष्ण ने बाण खींच कर दे दिया ले जा तू नहीं जानता मैं जानता
हूं बाली था तब मैंने मारा था वही बाली अब शिकारी बनकर यात्रा पूरी कर है कर्म का विधान जाओ ज भगवान के अवतार को कर्म के विधान से को स्वीकृति देनी पड़ती है गुजरना पड़ता है तो आप अच्छा काम करेंगे कोई देखता है कि नहीं देखता उसकी चिंता क्यों करना और बुरा काम कोई करता है तो उसका फल भी होता है कभी तुम्हारे लिए कोई कुछ बोल दे कोई किसी के किसी को अफवा कर दे तो आप घबराओ नहीं डरो नहीं आप आपका कर्म सही है आप बद ना करिए फिर बदनामी होती तो डरिए मत
बदनामी होती है तो आपका पुण्य जोर मार रहा है आपका मनोबल बढ़ रहा है हा आप बद करते तो मनोबल कमजोर हो जाएगा आपने गलती की है तो मनोबल कमजोर होगा लेकिन गलती नहीं की और आपके ऊपर आरोप हो रहे तो आपको मनोबल बढ़ेगा क्या ख्याल है अभी मैं कह दूं कि तुमने दारू पिया और सिगरेट पी रहे थे एक घंटा पहले पी रहे थे कि नहीं पी रहे थे बोले बापू नहीं पी रहे थे अरे मैं बोलता हूं पी रहे थे बोले बापू फिर भी सच बोलते नहीं पी रहे अरे मैं बापू सच बोलता
हूं तुम पी रहे थे दारू सिगरेट भी पी रहे थे तो आप हस दोगे के बापू ठीक है चलो पी रहे थे चलो बाबा दो नहीं चार पी रहे थे तो आप भगवान के लिए समाज में सुखी संपन्न और सम्मानित जीने के लिए आप अपने कर्म को भगवत प्रीति भगवत ध्यान भगवत ज्ञान और समाज रूपी देवता का मंगल पैसा ज्यादा आया कि कम आया उसका महत्व नहीं है लेकिन तुम्हारी सुमति बढ़ी कि नहीं बढ़ी सुमति असली मत असली संपदा है जहां सुमति वहां संपति नाना जहां कुमति वहां दुख निधान हरि ओम शांति तो संपत सच्ची
संपत्ति है सुमति तो भगवान का ध्यान भगवत जनों का संग संतों का भगवान को अपना मानना और भगवान के नाते गरीब गुरब अथवा आप दुकान पर मकान में जो भी व्यवहार करते कोई ना कोई सेवा का पात्र मिल ही जाता जिनको सेवा करनी हमको रोज मिलते हैं सेवा के पात्र अभी हम सत्संग कर रहे सेवा है कि नहीं है कोई फीस लेना है क्या कुछ बदला बदला चाहकर हम नहीं सत्संग सुना रहे आपका मंगल हो इसलिए सुना रहे तो ये सेवा हो गई तो मेरी तो सुमति की पुष्टि हो रही है आपसे हम कुछ दक्षिणा
में ले और फिर ऐसे आने दे फीस ले बैठने की अथवा य जो खर्चे पानी होते हैं उसको गिन के कुछ ले और फिर सुनाए तो सुमति नहीं होगी व्यवहार मति होगी व्यवहार मति से तो हजार गुना फायदा सुमति में है कमाले सेवानी तो छड़वा नहीं ज नहीं शोधी लेवानी भूखे को अन्न प्यासे को पानी हरे को हिम्मत देना भी सेवा है अनजान को रास्ता बताना भी सेवा है दुर्बल को बल मिले वो भी सेवा है कुल मिलाकर जिस प्राणी को जहां जिस वस्तु की जिस चीज की जिस बात से उसका मंगल होता हो निर्भय
होता हो उ सय होता हो उसका कल्याण होता हो वो उस प्रकार की जो भी आपकी सहायता है वो सेवा है हम वकील है और कोई असल है और उसको मैंने सच्ची सलाह दे दी वो उसने पैसे दिए तो ठीक कम दिए तो ठीक और नहीं दिए और देखता हूं कि पात्र है मैंने सलाह दे दी उसका मैं कैस भी लड़ गया मेरा हो गया सुमति कान हम जाते रास्ते में कई लोग मिलते हैं हम बोलते हैं बेटा टोपी पहना करो फलाना ये खाया करो तुम्हारी तबीयत में यह तकलीफ है वो पूछे ना पूछे हम
से से बता देते हमारी सेवा हो जाती है हमारी सुमति पुष्ट हो जाती है जैसे रात्रि को कुछ नहीं करते फिर भी थकान मिटती रहती है खून बनता रहता है पाचन होता रहता है और एक प्रकार की निद्रा की मिठास सुबह लेकर उठते हैं तो कुछ करने से शक्ति का खर्च होता है और शांत होने से शक्ति का संचय होता है दूसरे दिन हम ताज की का एहसास करते हैं लेकिन हम शरीर भाव से नींद में जाते अगर आत्मा भाव से हम परमात्मा में जाए तो फिर समाधि से उठेंगे तो यही कारण है कि नींद
में जैसी दशा में जाता है व्यक्ति उसी संस्कारों को लेकर जागता है ले न ध्यान का अभ्यासी जिस संस्कारों से ध्यान में जाता है उठता है तो उसमें सत्व होता है आत्म वैभव होता है माधुर्य होता है प्रसन्नता होती है ज्ञान आदि में दिव्यता आदि सद्गुणों की वृद्धि होती है ये ध्यान करने वाले बच्चे या साधक या भक्त पहले भले छोटी बुद्धि के रहे हो लेकिन ध्यान अभ्यास करते तो उनकी बुद्धि का विकास हो जाता कल्पना शक्ति का विकास हो जाता है धैर्य का संयम का अनुमान का सब क्योंकि सभी सद्गुणों और सभी सामर्थ्य का
खान है आत्म देव जैसे गेहूं बाजरा मक्का य अनाज तो ठीक लेकिन पेड़ पौधे वनस्पति हजारों प्रकार की औषधियों का भी उद्गम स्थान पृथ्वी है मिट्टी को खोजो ग काटोगे ढेर कर दोगे तो कुछ नहीं दिखेगा लेकिन इसी मिट्टी में न जाने कितनी कितनी औषधिया छुपी कितने कितने रसीले फल फ्रूट छुपे तो इस मिट्टी में जो शक्ति है पृथ्वी में पुण्य गंध है भगवान की पुण्य गंम पृथम च पुण्य में जो गंध है अ उ भरने की ऊर्जा है जो पेड़ पौधों और वो चेतन की सत्ता है तो कितना सारा धरती के द्वारा उस चैतन्य
का विलास है ऐसे जल में भी परमात्मा सत्ता रस रूप से तेज भी है वायु में स्पर्श रूप है और आकाश में शब्द रूप में य परमात्मा सत्ता पंच भूतों में भी है और हमारी आंख में भी वह परमात्मा सत्ता है कान में आकाश के साथ कान को आकाश का प्रतिनिधि मान लो आख को सूर्य का जीव को रसना का तो यह पांच भूतों के ही छोटे छोटे पांच ज्ञान इंद्रिया है तो ज्ञान इंद्रियों में ज्ञान चैतन्य परमेश्वर का है और पांच भूतों में जो गंध है रस है तेज है स्पर्श है अवकाश है उसमें
भी परमात्मा सता है और इन सबका अनुभव करने वाली जो परमात्मा है अंतःकरण अवन चैतन्य उसमें वो अनुभव होता है तो ऐसे सब मिलाकर मैं हूं लेकिन फिर कुछ मेरा स्थूल अंग है जैसे नाक है तो मरा हुआ अंग है बाल है तो मरे हुए अंग है लेकिन मैं ही हूं फ ज त्वचा है जरा लगता है तो बाल कटे तो फर्क नहीं पड़ता नख कटे तो फर्क नहीं पड़ता लेकिन मरा हुआ और सचेत और अचत दोनों मिलाकर मैं हूं ऐसे ही जड़ में और चैतन्य में परमात्मा सत्ता जो के है इसलिए भक्त की आखिरी
यात्रा होती है वासुदेव सर्व मिति सब भगवतम है तो वासुदेव सर्व मिति स महात्मा सु दुर्लभ जिनको अंदर बाहर परमात्मा सत्ता का अनुभव हो गया साक्षात्कार हो गया ऐसे महात्मा दुर्लभ माने जाते तो उत्तम साधक के महान पुरुष मार्गदर्शन इस प्रकार करते कि देर सवेर सर्वत्र वासुदेव पर पहुंचना है तो अ भी से यह मान लो कि सब वासुदेव है शास्त्र के अनुरूप पवित्र अपवित्र शु अशुद्ध का ख्याल करके बर्ताव करें लेकिन गहराई में वासुदेव सर्व मिति इससे मन जल्दी शांत हो इसको कहा अभ कंप योग ध्यान समाधि करके शांत होते हैं उस समय तो
योग होता है लेकिन जब उठते तो कंपित योग हो जाता है इस प्रकार का गुरु प्रसाद लेकर अगर हम चलते हैं तो अभ कंप योग हो जाता है और इस अभिकल्प योग की कृपा और बचाने का वातावरण पाने के लिए राजे महाराजे राज पाठ छोड़कर गुरुओं के चरणों में बैठे हम भी अपना वातावरण छोड़कर गुरु के चरणों में रहे और उधर का अभ्यास ही अभी हमारे पूंजी है तो भगवत प्राप्ति का अभ्यास और महापुरुषों का सानिध्य और सत कर्म अर्थात कर्म योग भक्ति योग और ज्ञान योग इन तीनों के द्वारा यह वियोगी होने वाले शरीर
का उपयोग करके परमात्मा से योग करें शरीर का वियोग हो जाएगा पक्की बात है शरीर का वियोग होने से धन से सत्ता से यश अपयश से सबसे योग हो जाएगा लेकिन जिससे कभी भी योग नहीं होता वह आत्म देव से योग करने के लिए मनुष्य शरीर है इसीलिए कहते हैं 100 काम छोड़कर भोजन हजार काम छोड़कर स्नान कर लो लाख काम छोड़कर सत्कर्म आदि कर लो कोटि तवा हरि भजे करोड़ काम छोड़कर हरि का ज्ञान हरि का ध्यान अभी इस माहौल से जो तुम्हारी उन्नति हो रही है बाहर की तराजू इस उन्नति का मूल्यांकन नहीं
कर सकते अभी जो माहौल है औद्योगिक नगर अहमदाबाद धापी वाला तभी भी तुम्हारा जो मन शांत है और इतनी ऊंची तात्विक बात सुन रहे हो इसके संस्कार जो पढ़ रहे हैं व मौत का बाप भी छीन नहीं सकता अशांत कुत सुखम अशांत को सुख का और शांत आत्मा को दुख का इस प्रकार के जो संस्कार है गहरे उतरते जाए जसे अभ भी बैठे हो ऐसा दो एक दो घंटा शाम को एक दो घंटा सुबह एक आध घंटा दोपहर ओ कुल मिलाकर एक बहर रोज ध्यान हो जाए तीन घंटे तीन घंटे जप हो जाए तीन घंटे
सत्संग हो जाए तीन घंटे सत पुरुषों के देवी कार्य सेवा तो जल्दी से जल्दी साक्षात्कार कर सकते बाकी का कमाने खाने आ घंटे गए 12 घंटे इसमें लगे 12 घंटे सोने कमाने में अगर बाहर की कमाई नहीं करना है दुकान धंधे पर नहीं जाते रहते तो फिर तो उनके लिए साधन भजन और सेवा सेवा भी एक प्रकार का साधन है और साधन भी अपनी आत्म सेवा है तो उसकी प्रगति जल्दी हो जाती हम थोड़ा थोड़ा सत्संग करते थे और घर में भी रहते थे तो दुकान में भी कभी ध्यान देना तो ऐसी प्रगति नहीं हुई
जितना गुरु जी के चरणों में जाकर रहे और सेवा भी किया वो भी कि तो प्रगति जल्दी होती आत्म लाभ के बिना कोई भी वस्तु मिलेगी तो छूट जाएगी ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगा तो अंत में रोना ही पड़े जब पढ़ते तो भी उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति का पढ़ने के पहले ईश्वर में शांत हो पढ़ते समय बीच-बीच में शांत हो और पढ़ने के आखरी में जीव तालो लगाकर स्मृति कर ले हसते खेलते परीक्षा तो पास और भगवान में आगे मैं आत्मा लाल दाढी की दाढी बाबा का बाबा कुछ नहीं करेते खाली बैठे रहते तो
कितना अच्छा लग रहा आत्म विश्रांति मिल रही है ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओम ओम ओम ओम ओ ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम प्रभु ओम ओम ओम प्यारे ओम ओम ओम मेरे ओम ओम ओम आनंद ओम ओम ओम माधु ओम ओम हरि ओम [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] प्रभु ओम ओम प्यारे ओम ओम ओम मेरे ओम ओम ओम ओम रामा ओम आनंद है भगवन नाम से पावन हो रहा है तन मन जीवन ओम ओम आन ओ ओम ओम माधुर्य ओम ओ प्रभु ओ
चारे ओम मेरे ओम हरि ओम जय हो [संगीत] [संगीत] आनंद है लंबा स्वास लो [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] फिर से गहरा श्वास लो लो लो लो खूब श्वास भरो भरो भरो और भरो और थोड़ा मैं ईश्वर का हूं ईश्वर मेरे हैं ईश्वर आनंद स्वरूप है चैतन्य मेरे अंतरात्मा बस [संगीत] ओम ओम ओम ओम हरि ओम ओम ओम शिवा ओम ओम ओम शंभू ओम ओम ओम आत्मा ओम ओम ओम परमात्मा ओम ओम ओम प्यारे ओम ओम ओम ओम जय [संगीत] [संगीत] हो ओम ओम ओम मेरा बोले रोम रोम ओम ओम ओम मेरा रू मे रोम रोम ओम
ओम ओम [संगीत] प्रभु ओम ओम ओम प्यारे ओ ओ ओ ओम ओम ओम रामा ओम ओम ओम ओम ओम ओम श्यामा ओम ओम ओम ओम ओम ओम शिवा ओ ओम ओम ओम ओम ओम गुरु ओ ओम ओम ओम ओम ओम हरि ओ प्रभु ओ ओम रामा ओम ओ आनंद है हम प्रभु के प्रभु हम हरे संसार स्वपना आत्मा परमात्मा अपना ओम ओम ओम हरि ओम ओम ओम ओम ओ ओम ज ओम ओम ओ ओम ओ ओम शिव ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम शन ओ ओम ओम ओम ओम ओम
शिवा ओ ओ ओ ओ ओम ओम गुरु ओम ओम ओम ओम ओम ओम रा ओम ओम ओ ओम ओम ओम प्यारे ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओओओओ नंद देवा ओ ओम ओ ओ ओ माधुर्य देवा ओ ओम ओ ओ शक्ति देवा ओ ओ ओ ओ भक्ति देवा ओम ओम ओ मुक्ति देवा ओम ओम ओ ओम ओ ओ ओ ओ [प्रशंसा] [संगीत]