मेरा नाम महा नूर है अफान से मेरी मुलाकात एक शादी की तकरीब में हुई थी मुझे वैसे शादी ब्याह में जाने का कोई ज्यादा शौक नहीं था मगर यह शादी मेरी दोस्त की थी उसने बहुत प्यार से मुझे बुलाया था और फिर मैं उसे इंकार कैसे कर सकती थी जब भी मैंने जाने की हामी भर ली थी मन्नत से मेरी काफी पुरानी दोस्ती थी हम कॉलेज में एक साथ थी और फिर उसके बाद यूनिवर्सिटी भी हमने साथ ही पढ़ी थी इसलिए हमारी काफी अच्छी दोस्ती थी उसकी शादी उसके कजन से हो रही थी मंगनी तो
उसकी काफी पहले की हुई हुई थी और अब पढ़ाई पूरी होने के बाद उसकी शादी रखी गई थी जहां मेरा जाना लाजमी करार दिया गया था सारी शॉपिंग मैंने खुद उसके साथ करवाई थी और अपने लिए भी दो-तीन जोड़े खरीद लिए थे आज उसकी मेहंदी की रस्म थी अम्मी का कहना था कि वह बस बारात के फंक्शन में ही साथ चलेंगी अभी मैं अकेली ही चली जाऊं मैंने अपनी तैयारी की थी और बाबा मुझे छोड़ आए थे वहीं मेरी नजर एक लड़के पर पड़ गई जो बार-बार मुझे ही देख रहा था मुझे समझ नहीं आई
कि वह इस तरह से मुझे क्यों देख रहा था अक्सर ऐसी तकरी बात में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो लड़कियों को देखते हैं मगर उनके देखने के अंदाज से अंदाजा हो जाता है कि वह किस नजर से देख रहे हैं जबकि उस लड़के के देखने का अंदाज अजीब या बुरा नहीं था मैंने उसकी आंखों में अपने लिए इज्जत और एहतराम देखा था जबी उसका देखना शायद मुझे बुरा नहीं लग रहा था वह बहुत ज्यादा ख खूबसूरत था फंक्शन में मौजूद बहुत सारी लड़कियों की नजरें उस पर थी कोई उसे देखकर सरगोशियां में बातें करती
तो कोई उसके पास जाकर उससे बात करने की कोशिश करती मगर वह किसी से भी ज्यादा बात नहीं कर रहा था वो तो जैसे अपनी ही किसी दुनिया में गुम था बस कभी-कभी नजर उठाकर मुझे देखता और फिर अपने फोन में लग जाता सारे फंक्शन में ही मैंने उसे नोट किया था वह अचानक उठा और एक आखिरी नजर मुझ पर डालकर वहां से चला गया था उसके बाद वह मुझे कहीं नजर नहीं आया था मतलब वह अपने घर वापस जा चुका था मैं भी फिर अपनी दोस्तों के साथ बातों में लग गई थी और इसी
तरह वक्त का पता ही नहीं चला था कि काफी रात गुजर गई थी मन्नत और उसकी अम्मी के कहने पर मैं वहीं रुक गई थी और सोचा था कि सुबह ही बाबा को कहूंगी कि वह मुझे लेने आए अब इतनी रात में वह कहां आते मुझे लेने यही सोचकर मैंने अम्मी को बता दिया था कि मैं आज रात यहीं रुकने वाली हूं मन्नत के साथ और सोचा था कि आज की रात है बातें भी करेंगे बस जो आधी रात बज गई थी व सारी बातों में ही गुजरी थी अगले दिन बारात का फंक्शन था फंक्शन
रात का था इसलिए अभी मैंने घर जाने का सोचा था और बाबा को फोन किया था कि वह मुझे लेने आ जाएं कुछ ही देर गुजरी थी जब बाबा मुझे लेने आ गए थे जबकि मन्नत का कहना था कि मैं यहीं रुकूं और उसके साथ ही पोलर जाऊं मगर मुझे अभी घर जाना था इसलिए मैं उसे मजरत करती उसके घर घर से निकल आई थी बाहर अब्बा मेरा ही इंतजार कर रहे थे उनके साथ घर आ गई थी मगर सारा वक्त वही इंसान मेरी आंखों के सामने रहा था उसका देखना मैंने कॉलेज यूनिवर्सिटी हर जगह
से तालीम हासिल की थी और हर जगह ही मेरा लड़कों से सामना हुआ था मगर मुझे कभी किसी में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी हालांकि एक दो लोगों ने अपनी पसंदी दगी का इजहार भी किया था मगर मैं कोई जवाब नहीं दिया करती थी कभी मैंने किसी को अपने जहन पर सवाल होने ही नहीं दिया था अपने काम से काम रखती थी मगर वह इंसान एक ही दिन में क्यों मुझे बार-बार याद आ रहा था उसका ख्याल मेरे दिमाग से जा ही नहीं रहा था खैर उसे एक तरफ करती मैं घर आई थी और रात
के फंक्शन की तैयारी करने लगी थी अम्मी और अब्बा भी मेरे साथ जा रहे थे हम लोग तैयार होकर घर से निकल आए थे और कुछ ही देर में शादी हाल पहुंच गए थे वहां आकर अम्मी और बाबा सबसे मिलने मिलाने में मसरूफ हो गए थे मैं भी अपनी दोस्तों को ही तलाश कर रही थी जब मेरी नजर आज फिर उसी लड़के पर गई जो कल मुझे देख रहा था आज भी वह अपने इर्दगिर्द से बेखबर मुझे ही देख रहा था मुझे डर था कि कोई देखकर गलत ना समझे इसलिए मैं फौरन वहां से हट
गई मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से मेरे मां-बाप की इज्जत पर कोई भी हर्फ आता आज तक मैंने उनकी इज्जत पर कोई आंज नहीं आने दी थी कभी किसी लड़के से बात तक नहीं की थी मैं फौरन ही अपनी जगह जह से हटी थी और बाकी लोगों की भीड़ में मिल गई थी उसके बाद मैंने दोबारा उसकी तरफ नहीं देखा था इसी तरह सारा फंक्शन पूरा हुआ था और फिर हम घर की तरफ चल पड़े थे इस सारे वाक्य को काफी दिन गुजर गए थे उसके बाद मुझे वोह लड़का कभी नजर नहीं आया
था मैं भी अब उसे भूल ही गई थी मगर कभी कभार उसकी याद आ जाया करती थी उसका वो देखना मुझे याद आया करता था वक्त गुजरता गया था और फिर एक दिन कुछ लोग हमारे घर मेरे रिश्ते के लिए आए थे हमारे लिए वह लोग अनजान थे आज से पहले कभी उनको नहीं देखा था ना गली में ना ही कहीं और मगर अम्मी और बाबा ने उनको अंदर बिठाया था और बातचीत की गई जब उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरी दोस्त की शादी में देखा था मुझे और अपने बेटे के लिए पसंद किया था उस
वक्त मुझे मालूम नहीं था कि उनका बेटा कौन था मगर फिर जब बात कुछ आगे बढ़ी तो पता चला कि उनका बेटा वही लड़का था जिसे पूरी शादी में मैंने नोट किया था तो उसी ने रिश्ता भेजा था मुझे कुछ-कुछ समझ आने लगी थी अच्छे लोग थे अम्मी और बाबा को लड़का भी अच्छा लगा था तो उन्होंने हां कर दी थी मुझे भी इस रिश्ते से कोई तराज नहीं था वो लड़का जाने क्यों मुझे अच्छा लगा था जब भी मैंने भी हां कर दी थी और फिर इस तरह मेरी आफा से शादी हो गई थी
वो बहुत अच्छा इंसान था मेरी सोच से भी कहीं ज्यादा दिल का अच्छा और नरम मिजाज इंसान था मैं खुश थी कि वह मुझे वह मिला था वह मेरा बहुत ख्याल करता था रोज रात को मुझे समंदर किनारे ले जाया करता था हम वहां पर काफी वक्त गुजारते थे बहुत सारी बातें करते एक दूसरे के बारे में जानते थे सब कुछ ठीक और अच्छा था मगर एक चीज कुछ अजीब सी थी एक जगह पर मट्टी कुछ काली-काली सी थी मेरे शौहर वहां जाकर कुछ लिखते और फिर मुस्कुराने लगते थे मेरे पूछने पर बात को टाल
देते मैं भी ज्यादा कुछ पूछती नहीं थी हम दोबारा से अपनी बातों में लग जाया करते थे रोज ही ऐसा होता था व एक कोने में जाते जहां मट्टी कुछ काली सी थी वहां कुछ लिखते और फिर मुस्कुराने लगते थे मगर मेरे पूछने पर कुछ नहीं बताते थे और फिर चार दिन बाद मेरे शौहर का इंतकाल हो गया था उसके इस तरह से अचानक चले जाने का सदमा बहुत ज्यादा था काफी दिन तक मैं अपने होशो हवास में नहीं रही थी एक अच्छा इंसान मेरी जिंदगी में आया और कुछ ही दिनों में वह मुझसे दूर
हो गया था वह बहुत अच्छा था वो कह से मुझे छोड़कर जा सकता था कुछ दिन इसी तरह गुजरे थे मैं हर वक्त उसे याद करती थी कभी उसकी चीजें देखती कभी उसकी और अपनी शादी की तस्वीरें देखती और फिर रोने लगती थी मुझे उससे मोहब्बत थी उसके जाने के बाद भी वह मोहब्बत कम नहीं हुई थी काफी दिन बाद मैं अपने होशो हवास में आई थी मगर अभी भी दिल उसके जाने का मानता ही नहीं था लगता था जैसे वह अभी आ जाएगा वो गया ही नहीं है मुझे छोड़कर आ जाएगा वो कहीं ना
कहीं से मगर वह मेरा ख्याल ही था जाने वाले कहां वापस आते हैं वह तो चले ही जाते हैं हमें तन्हा और अकेला छोड़कर हमारे ऊपर क्या गुजरेगी कहां सोचते हैं एक रात मुझे अपने शोहर की बहुत याद आई और मैं चुपके से घर से निकल आई थी मुझे याद था तो बस इतना कि वोह मुझे समंदर किनारे लेकर जाया करता था मैं भी चुपके से अपने घर से निकल कर समंदर किनारे आई थी उसे याद करते-करते मुझे वह जिस जगह लेकर आया था मैं वहीं आ गई थी और आकर बैठ गई थी काफी देर
इसी तरह बैठे-बैठे गुजरी थी और फिर अचानक मेरी नजर उसी जगह पर गई जहां मेरा शोहर जाकर कुछ लिखता था और फिर मुस्कुराने लगता था मैं भी वहीं गई थी और अपने शोहर का नाम लिखने लगी थी फिर अचानक कुछ सोचकर मैंने वो मट्टी खोदने शुरू कर दी थी और यह देखकर मेरी जान निकल गई थी कि अंदर तो मेरे शौहर की घड़ी मौजूद थी जो मैंने उसे तोहफे में दी थी वो घड़ी तो उसे बहुत ज्यादा पसंद थी वो तो उसे हमेशा अपने पास ही रखता था तो फिर वह यहां कैसे आई थी क्या
वह यहीं कहीं मौजूद था मगर वह कैसे आ सकता था वो तो मुझे छोड़कर जा चुका था तन्हा वो भी हमेशा हमेशा के लिए मैं उस जगह से उठकर वापस जाने के लिए जैसे ही पलटी थी मेरी नजर वापस उसी जगह पर गई थी जहां से मुझे व घड़ी मिली थी अब वहां कुछ और भी चमक रहा था मतलब वहां पर कुछ और भी मौजूद था मैंने झुककर गौर से देखा तो समझ नहीं आई और फिर मैंने हाथ बढ़ाकर उस चीज को उठाया था वो भी एक घड़ी थी मगर वह किसी मर्द की नहीं थी
उसे देखकर लग रहा था कि यह किसी औरत की थी उसका डिजाइन और साइज से अंदाजा हो रहा था कि वह किसी औरत की ही थी मगर वह मेरी तो नहीं थी फिर किसकी थी उस घड़ी की हालत देखकर लग रहा था कि उसे काफी वक्त से यहां पर छुपाया गया था वो नहीं बिल्कुल भी नहीं लग रही थी मट्टी में पड़े रहने से वह खराब हो चुकी थी मैंने उसे गौर से देखा और फिर हाथ में पकड़ लिया दोनों घड़ियां मेरे हाथ में थी मैं उनको लेकर घर आ गई थी और उन दोनों घड़ियों
को संभाल कर रख दिया था कुछ दिन इसी तरह और गुजर गए थे मैं इस सारे वाक्य को भूलने लगी थी कुछ दिन तो मैंने सोचा था कि वह घड़ी आखिर थी किसकी मगर फिर सोचा कि शायद किसी की गुम हो गई हो गिर गई होगी जबी जमीन में दब गई होगी इसमें कोई बड़ी बात तो नहीं थी ना ही इतना सोचने वाली कोई बात थी मैं ख्वा मख इतना सोच रही थी इसलिए अब मैंने सोचना छोड़ दिया था और अपने आप को घर के कामों में लगा लिया था मेरे अम्मी और अब्बा मुझे मिलने
आए थे उनका कहना था कि मेरे शौहर के जाने के बाद अब मेरा यहां कुछ नहीं था इसलिए वह मुझे अपने साथ लेकर जाने के लिए आए थे मगर मैं वह घर कैसे छोड़कर जा सकती थी वहां अगर वह नहीं था तो क्या हुआ उसकी यादें तो मौजूद थी ना और मेरे पास तो अब बाकी की जिंदगी गुजारने के लिए यही यादें ही तो थी मैं कैसे यहां से जा सकती थी मैंने जाने से साफ इंकार कर दिया था अम्मी ने बहुत कहा और अब्बा ने भी समझाने की कोशिश की थी मगर उस वक्त मैं
कुछ समझने की हालत में थी ही कहां और जब अब्बा ने देखा कि उनका कहना बेकार है मैं उनके साथ नहीं जाऊंगी तो उन्होंने अम्मा से कहा कि वह मुझे अभी यहीं रहने दें कुछ वक्त गुजर जाए फिर वह मुझे अपने साथ ले जाएंगी मेरी सास ने भी अम्मी और अब्बा से कहा कि वह मुझे अभी यहीं छोड़ जाएं शायद उनको भी अभी मेरी जरूरत थी इसलिए अम्मी और अब्बा मुझे वहीं मेरे ससुराल ही छोड़ गए थे और खुद वापस घर चले गए थे कुछ दिन लगे थे मुझे संभलने में और फिर मैंने खुद को
मजबूत बनाया था मेरे शोहर का एक छोटा भाई भी था जो कि कुछ साल पहले दिल के मर्ज की वजह से इस दुनिया से चल बसा था और फिर उसके जाने के बाद वह अकेला ही अपने मां-बाप के पास रह गया था उसके भाई की इस तरह मौत ने उनके मां-बाप को बहुत बड़ा सदमा दिया था जिसकी वजह से वो लोग बहुत दुखी और गमगीन रहने लगे थे मेरे शौहर ने हर मुमकिन कोशिश की थी उनको इस सदमे से निकालने की और फिर जब हमारी शादी हुई थी उस वक्त उन्होंने मुझसे सिर्फ एक वादा लिया
था कि मैं उनके मां-बाप का ख्याल इसी तरह रखूं जैसे अपने मां-बाप का रखती थी मेरे शोहर ने मुझे अपने छोटे भाई और फिर अपने मां-बाप की जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बताया था और उस दिन के बाद से मैंने सोच लिया था कि मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगी कि इनको खद खुश रख सकूं इनको दुख से निकाल सकूं मेरी सास एक अच्छी खातून थी वह बहुत कम बोला करती थी मगर मुझसे जब भी बात करती प्यार से करती थी और अब मेरे शोर के जाने से तो वह बिल्कुल ही टूट गई थी मेरी सास
और ससुर दोनों ही चुप-चुप रहने लगे थे वो ना तो किसी से कोई बात करते थे और ना ही अपना ख्याल रखते थे इसलिए मुझे उनकी खातिर हिम्मत करनी थी मैंने अपना वादा निभाया था मुझे उसके जाने के बाद भी अपना उससे किया हुआ वादा निभाना था और मैंने ऐसा ही किया था मैं अपने घर नहीं आ गई थी मैं वहीं उनके साथ ही रहती थी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती थी कि उनका जितना हो सके ख्याल रख सकूं उनके सामने मैंने कभी खुद को कमजोर पड़ने नहीं दिया था मगर ऐसा नहीं था कि
मुझे कभी अपने शोहर की याद नहीं आई थी मुझे वो हर पल हर लम्हा याद आता था कभी ऐसा नहीं था कि कोई लम्हा उसकी याद से गाफिल गुजरा था मैं रात रात भर कम में उसकी चीजों को देखकर रोती और फिर कब रोते-रोते मैं सो जाया करती थी अब तो यही जिंदगी थी ऐसे ही शायद सारी जिंदगी गुजरने थी अम्मी और अब्बा आया करते थे मुझसे मिलने और मिलकर वापस चले जाया करते थे अब वह मुझे अपने साथ चलने का नहीं कहते थे क्योंकि वह जानते थे कि मैं उनके साथ नहीं जाऊंगी इसलिए वह
मुझे कहकर ना मेरा मूड खराब करना चाहते थे और ना ही वह मायूस होना चाहते थे जब भी वह खामोश ही रहते थे और बस मिलकर चले जाया करते थे मेरी सास मुझे कुछ ना कहती थी उनका तो कहना था कि मैं चाहूं तो यहां रहूं और अगर चाहूं तो अपने घर जा सकती हूं उनको इस बात से कोई ऐतराज नहीं था मगर मैं अपनी खुशी से उनके साथ रह रही थी मुझे उनके साथ रहना अच्छा लगता था मेरे अपने मां-बाप से ज्यादा उनको मेरी जरूरत थी इसलिए मैं उनके साथ रह रही थी और अब
यही मेरी जिंदगी का मकसद था क्योंकि अगर मैं उनको छोड़कर चली जाती तो वह जीते जी मर जाते उनके पास जीने की क्या वजह बची थी और अब अगर मैं भी छोड़ जाती तो वह क्या करते जब भी मैं उनके पास रहती थी और उनको छोड़ने का सोच भी नहीं सकती थी मैं उनको अपने मां-बाप ही समझती थी और हर तरह से उनका ख्याल रखने की पूरी पूरी कोशिश किया करती थी वोह अब पहले से कुछ बेहतर थे मेरे होने से वह जीने लगे थे कभी-कभार मेरे साथ हंस भी लिया करते थे हम लोग एक
साथ बहुत ज्यादा खुश तो नहीं थे मगर पुर सुकून जरूर थे वो मुझसे प्यार करते थे उन्होंने मुझे अपनी बेटी ही समझा था और अब भी वो मुझे अपनी बेटी ही बनाकर रखे हुए थे बेटे चले गए थे तो क्या हुआ एक बेटी तो थी ना उनके पास मेरी सूरत में और यही वो बात थी जिसने उनको जिंदा रखा हुआ था एक दिन मैं अपने कमरे में कुछ तलाश कर रही थी जब मेरी नजर मेरे शोहर की अलमारी पर गई थी उसके जाने के बाद मैंने कभी उसको खोला नहीं था एक दिन खोला था और
देखकर वापस बंद कर दिया था आज दिल कर रहा था कि उसकी चीजों को देखूं इसलिए मैंने उस अलमारी को खोला था और उसके कपड़े देखने लगी थी साथ ही साथ मेरी नजर उसके बाकी सामान पर भी गई थी उसके परफ्यूम और बाकी चीजें भी मौजूद थी जब मुझे वहां एक घड़ी मिली थी और वो घड़ी बिल्कुल वैसी ही थी जैसी मुझे उस रात समंदर के किनारे से मिली थी मगर वो किसी औरत की मालूम होती थी और यह मेरे शौहर की थी मगर थी वो दोनों एक ही जैसी क्या यह कोई इत्तेफाक था या
कुछ और था मुझे नहीं पता था मैंने वह घड़ी हाथ में ली और अलमारी को बंद कर दिया था मैंने वही घड़ी जो मुझे वहां से मिली थी उसे और अपने शोहर की घड़ी को एक साथ रखा था और वोह दोनों एक ही जैसी थी ऐसा लग रहा था जैसे वो एक ही साथ खरीदी गई थी और एक ही जगह से खरीदी गई थी लेकिन अगर ऐसा था तो वो फिर ये किसकी घड़ी थी कौन थी वो यही सवाल मेरे दिमाग में सबसे पहले आया था मगर यह इत्तफाक भी हो सकता है यही सोचकर मैंने
उन दोनों को साथ ही दराज में रख दिया और अपने काम में लग गई थी मेरे कमरे के साथ ही मेरे शोर की एक छोटी सी लाइब्रेरी थी उनको किताबों का बहुत शौक था वह अपने फ्री वक्त में किताबें पढ़ा करते थे काफी दिन से वहां की सफाई नहीं हुई थी इसलिए मैंने सोचा था कि आज वहां की सफाई कर देती हूं मेरा वहां बहुत कम ही जाना होता था मुझे किताबों से कोई ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी इसलिए मैं वहां कम ही जाया करती थी आज भी सफाई करने की गर से मैं वहां गई थी
और किताबें उठा उठाकर साफ कर रही थी कि अचानक एक किताब जैसे ही मैंने उठाई थी तो उसमें से कुछ गिरा था क्या गिरा था मुझे नहीं पता था मुझे लगा था कि जैसे किताब का कोई वर्क नीचे गिर गया था मगर जब मैंने देखा तो हैरत से मेरी आंखें खुली की खुली रह गई थी क्योंकि वो कोई और पेपर नहीं था वो एक तस्वीर थी मैंने उसे उठाकर देखा तो वो तस्वीर किसी लड़की की थी वो लड़की कौन थी पहला सवाल यही मेरे जहन में आया और फिर एक के बाद एक कई तसवीर मुझे
उस लड़की की मिली थी मैंने वह सारी तसवीर इकट्ठी कर ली थी और सोचा था कि अपनी सास से इसके बारे में पूछूंगी और मैंने ऐसा ही किया था मौका देखते ही मैंने अपनी सास को वो तसवीर दिखाई थी और उनसे पूछा था कि वो लड़की कौन थी पहले तो वो इन तस्वीरों को मेरे हाथ में देखकर खामोश हो गई थी फिर उन्होंने मुझसे ही सवाल किया था कि मुझे यह कहां से मिली थी उनके पूछने पर मैंने बता दिया कि यह सब मुझे मेरे शोर की किताबों से मिली थी कुछ देर वह खामोश रही
थी और फिर बोली थी कि यह उनकी एक दोस्त की बेटी थी मेरे शोहर के लिए इसका रिश्ता आया था मगर उन्होंने इंकार कर दिया था उस वक्त मेरी सास ने ही दिखाने के लिए तस्वीरें उनको दी थी जो शायद वह अपनी किताबों में ही रखकर भूल गए थे मुझे उनकी बात पर हैरत हुई कि शादी के लिए तो एक तस्वीर ही दिखाई जाती है एक ही काफी होती है इतनी सारी सारी तस्वीर कौन देता है मगर उस वक्त मैं खामोशी रही थी उनसे कोई भी और सवाल मैंने नहीं किया था और वह सारी तसवीर
मेरी सास ने मुझसे लेकर अपने पास ही रख ली थी मैंने भी सब उनको दे दी थी वैसे भी मुझे क्या करना था अगर मेरा दिल उनकी बात को मान भी लेता मगर मेरा दिमाग इस चीज को मानने से क्यों इंकार कर रहा था कि बात कुछ और ही थी इस सबके पीछे जैसे उन्होंने कहा था वैसा कुछ भी नहीं था मगर वह क्यों मुझसे झूठ बोले हो सकता है ऐसा ही हुआ हो वह रखकर भूल गए होंगे और फिर शायद उन्होंने कभी वह किताब खोली ही ना हो यह भी तो मुमकिन था मैंने अपने
आप को हर उस तरीके से समझाया था जिससे किसी को समझाया जा सकता था फिर दो एक जैसी घड़ियां क्या वह भी इत्तफाक था और फिर मेरे शोहर का उस जगह जाकर मुस्कुराना क्या वह भी सब इत्तफाक ही था इतनी सारी चीजें इत्तफाक तो नहीं हो सकती थी कोई बात तो थी जो इन सब ने मुझसे छुपाई हुई थी थी और वह क्या थी यह मुझे खुद जाना था मुझे यकीन था मेरी सास मुझे सबके बारे में कुछ नहीं बताएगी और उनसे अब मजीद कुछ पूछना भी ठीक नहीं था खुद ही इस कहानी को पूरा
करना था इसके पीछे का राज और वजह जानकर मैंने अपने कमरे की एक-एक चीज इधर से उधर करके देखी थी मगर कुछ और नहीं मिला था यही सोचकर मैंने लाइब्रेरी की भी किताबें देखी और तकरीबन हर जगह जहां से कुछ मिल सकता था मगर मुझे कहीं भी कुछ कुछ नहीं मिला था और मैंने इन सब बातों को अपना वहम समझकर छोड़ दिया अब ना तो मैं ऐसा कुछ सोचती थी और ना ही कुछ तलाश करने की कोशिश करती थी सब कुछ अपना वहम और ख्याल समझकर भूल गई थी दिन गुजरते जा रहे थे और अब
हम लोग अपनी जिंदगी की तरफ कुछ हद तक वापस आ गए थे मैं अपनी सास सुसर के साथ खुश थी उनकी खिदमत करती थी और वह भी बदले में मुझसे बेटियों की तरह मोहब्बत करते थे और ढेरों दुआएं दिया करते थे घर के काम का आज में भी दिन गुजर जाया करता था फिर भी रात को भी नींद नहीं आती थी तो मैं अपने शोर की लाइब्रेरी में जाकर किताबें पढ़ने लग जाती थी मुझे अब भी किताबें पढ़ने का शौक हो गया था और रात देर तक मैं किताबें पढ़ती रहती थी जब तक मुझे नींद
ना आती और फिर पढ़ते-पढ़ते कब आंख लग जाती कुछ पता ही नहीं चलता था इसी तरह दिन में भी पढ़ने के लिए कोई किताब ढूंढ रही थी जब मेरी नजर एक किताब पर पड़ी थी वह किताब नहीं थी बल्कि एक री थी मैंने उसे उठाकर देखा तो वह मेरे शौहर की थी उसी की लिखाई थी उसका लिखा हुआ मैं सब कुछ एक तरफ करती उससे वहीं बैठकर उसे पढ़ने लगी थी जिसमें उन्होंने अपने माज के बारे में कुछ लिखा हुआ था वह उससे बहुत ज्यादा मोहब्बत करते थे वह थी ही मोहब्बत के काबिल तो क्या
ना की जाती उससे मोहब्बत वह बहुत ज्यादा खूबसूरत थी सिर्फ शक्ल से ही नहीं दिल से भी और जो लोग दिल से खूबसूरत होते हैं उनकी तो बात ही अलग होती है वो भी अलग अलग थी सबसे अलग या फिर उसे लगती थी महबूब हमें सबसे अलग ही लगता है उसकी तो हर बात ही अच्छी और प्यारी लगती है उसे भी लगती थी वो उसकी जिंदगी थी जिसके बगैर वह जीने का सोच भी नहीं सकता था सिर्फ व ही नहीं वो भी तो उससे प्यार करती थी उतना ही जितना वह करता था शायद उससे भी
ज्यादा वह तो उसके लिए सब कर सकती थी सब छोड़ सकती थी वो उसकी जिंदगी का नूर थी जिसके आने से उसकी जिंदगी में रोशनी आई थी अफान का छोटा भाई जब इस दुनिया से गया उस वक्त वो यूनिवर्सिटी में पढ़ता था अपनी जान से प्यारे भाई के जाने के बाद वह बिल्कुल अकेला रह गया था उसका भाई ही तो सब कुछ था उसके लिए और वह अपनी हर बात उसी से तो करता था वोह अफान का दोस्त भी था और भाई भी उसके होते हुए उसे किसी और की जरूरत नहीं पड़ी थी और फिर
इस तरह उसके चले जाने से सबसे ज्यादा अफान की तो जिंदगी मुतासिर हुई थी व अकेला रह गया था उसका भाई नहीं दोस्त भी चला गया था जभी वो चुप रहने लगा था किसी से ज्यादा बात नहीं करता था और ना ही कहीं जाता था बस यूनिवर्सिटी से घर और घर से यूनिवर्सिटी यही थी उसकी बेरंग जिंदगी जिसे नूर ने आकर रोशन किया था उसकी जिंदगी में रंग भरे थे उसे फिर से जिंदगी की तरफ गामजीन सिखाया था वो दोनों यूनिवर्सिटी में ही मिले थे अफान उसका सीनियर था वो नई आई थी जिसे यहां के
माहौल और लोगों का पता नहीं था इसीलिए वो हर बार अफान से मदद मांगती थी किसी भी काम में और अफान उसकी मदद कर दिया करता था यह सोच कर के वह नई आई है और ऊपर से छोटी और बेवकूफ भी थी फिर इस तरह उन दोनों की दोस्ती हो गई थी नूर अपनी बेतुकी बातों से अफान को खुश रखती थी वह उसके साथ खुश रहता था वो उसे अच्छी लगने लगी थी फिर आहिस्ता आहिस्ता यह पसंदी कीी मोहब्बत में बदल गई थी दोनों ही एक दूसरे से प्यार करने लगे थे व कभी कभार समंदर
के किनारे जाया करते थे है उसे अपने और अफान का नाम रेत पर लिखना बहुत पसंद था जब भी वहां जाती ऐसा ही करती थी जबकि अफान को उसकी इस बात प कोई हैरत नहीं हुई थी कि वह हर बार ऐसा क्यों करती थी उसने अफान की साल गिरह पर उसे तोहफा दिया था घड़ी दी थी और खुद भी वैसी ही घड़ी उसने ली थी जो कि वह पहन कर रखती थी और अफान की मोहब्बत की निशानी थी कुछ लोग ऐसे होते हैं वह भी ऐसी ही थी और फिर एक दिन उसे क्या हुआ कि
उसने अपनी घड़ी वहां जमीन में दफन कर दी थी और कहा था कि अगर कभी वह उसके साथ ना हुई तो वह यहां आ जाया करें वो उसे यहां मिला करेगी और उसके बाद वह उसी जगह पर दोनों के नाम लिखा करती थी सब कुछ ठीक था वो उससे मिल सकती थी मगर शायद किस्मत को यह मंजूर नहीं था उसके घर वाले इस रिश्ते से राजी थे और अफान के घर वाले भी राजी थे उनकी मंगनी हुई थी और वह दिन बहुत खूबसूरत और खुशनसीब था उसने जिसे चाहा था उसे पा लिया था वह उसे
मिल गई थी और उसे यही लगा था मगर वह गलत था वह उसे कहां मिली थी अभी हां वह उसके नाम हुई थी अ मगर अभी मिली तो नहीं थी अभी उनका मिलना बाकी था और वह मिलना अधूरा ही रह गया था उनकी शादी होने से पहले ही एक कार हादसे में वह उसे छोड़कर जा चुकी थी वह हमेशा-हमेशा के लिए उसे छोड़ गई थी एक बार फिर उसने किसी बहुत अपने को खोया था उसका जीना उसे फिर से तोड़ गया था वह चाहकर भी ुद को दोबारा से जोड़ नहीं सकता था उसे देखकर उसके
मां-बाप भी बुरी तरह मुतासिर हुए थे उसके जाने के बाद वह अकेला समंदर पर जाया करता था और अपना उसका नाम उसी जगह पर लिखा करता था और उसे आज भी याद था वह उसे कभी भूली ही नहीं थी या तो तुम्हें करता जब भूलता वो तो उसे कभी एक लमहे के लिए भी नहीं भूली थी अगर वो उससे इतनी मोहब्बत करता था तो उसने मुझसे शादी क्यों की थी वह तो मुझसे मोहब्बत करता था मगर यहां तो कुछ और ही लिख खा था अपने शोर की डायरी पढ़ने के बाद मुझे यह ख्याल आया कि
उसने तो मुझसे पसंद की शादी की थी मैं तो उसकी पसंद थी अगर वह उससे इतनी मोहब्बत करता था तो मुझसे मोहब्बत का क्यों कहा था इन सब बातों से मैं बुरी तरह उलझ चुकी थी सांस लेना मुश्किल हो रहा था मैं कमरे से बाहर आकर खड़ी हो गई थी उनसे मुझे पता चला था कि वह तस्वीर उसी लड़की की थी जो मेरी सास ने रिश्ते का कहकर बात डाल दी थी मगर उन्होंने ऐसा क्यों किया था वो तो मुझे सब सच बता सकती थी मगर उन्होंने मुझसे यह बात छुपाई थी क्या उसको छुपाने के
पीछे कोई बड़ी वजह थी या फिर कुछ और था और उसका जवाब वही दे सकती थी अब मेरा इरादा उनसे सच जानने का था इसलिए मैं वहां से सीधी उनके पास आई थी और उनसे यह सब पूछा था उनका कहना था कि हां वह उसी की तस्वीरें थी उन्होंने मुझसे इसलिए झूठ बोला था कि वह नहीं चाहती थी कि मुझे यह बात पता चलती मुझे दुख होता यह जानकर कि अफान किसी और से मोहब्बत करता था इसलिए उन्हो ने मुझसे यह सब छुपाया था मगर उनका यह कहना था कि उसने मुझसे शादी अपनी मर्जी से
की थी उसका कहना था कि उसे मैं पसंद थी और वह मुझसे शादी करना चाहता है जबी वोह लोग उसके कहने पर हमारे घर रिश्ता लेकर आए थे तो क्या उसकी पसंद बदल गई थी मुझे देखकर क्या उसकी मोहब्बत इतनी कम थी कि किसी और को देखकर खत्म हो गई थी मगर मेरी सास का कहना था कि वह ऐसा नहीं था सब लोग उसे शादी के लिए मजबूर करते थे मगर वह इंकार कर दिया करते था उसका कहना था कि वह शादी नहीं करेगा उसे सबसे ज्यादा मेरा नाम अच्छा लगा था मानूर क्योंकि उस लड़की
का नाम भी मानूर था मेरी सास का कहना था कि अफान को मुझ में वह दिखाई देती थी उसे लगता था मैं उसी के जैसी हूं इसलिए उसने मुझसे पसंद की शादी की थी और इसीलिए वह मुझसे इतना प्यार करता था उसे लगता था कि उसे उसकी नूर वापस मिल गई है वो सच कह रही थी शायद ऐसा ही था उसे नूर मिल तो गई थी मगर जिंदगी ने साथ छोड़ दिया था और अब वह मुझे अकेला छोड़ गया था मुझे सब कुछ सच जाने के बाद भी उससे इतनी ही मोहब्बत थी जितनी के पहले
मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उसकी मोहब्बत कोई और थी और मुझे बस उसका नेमल बदल समझा गया था मैं तो उसमें भी खुश थी कि चलो उसने मुझे इस काबिल तो समझा था कि मुझे अपनी पसंद मानता था और मेरे लिए तो यही बात काफी थी मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी उसने मुझसे सब कुछ छुपाया जरूर था मगर उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी पूरी अदा की थी व एक अच्छा शौहर था और उससे भी ज्यादा अच्छा वह एक इंसान था मैं दिल से उसकी इज्जत और कदर करती थी और करती
रहूंगी मेरी सास ने और ससुर ने सोच लिया था कि वो अब मजीद मेरी जिंदगी खराब नहीं होने देंगे उन्होंने मुझे अपनी बेटी माना था और इसलिए वो मुझे अपना फर्ज समझते थे उनका कहना था कि वह चाहते हैं कि मैं शादी कर लूं मगर मुझे शादी की जरूरत नहीं थी मैं खुश थी अपनी जिंदगी में मुझे और कुछ नहीं चाहिए था सब कुछ था मेरे पास मगर उनका कहना था कि वह कब तक जिंदा रहेंगे और फिर मैं क्या करूंगी किसके साथ रहूंगी कोई ना कोई तो सहारा होना चाहिए ना अपने मां-बाप के साथ
भी मैं कितना वक्त रह सकती थी जब तक वह जिंदा थे बस उस वक्त तक और फिर उसके बाद क्या होता मेरी जिंदगी की यही फिक्र उनको परेशान रखती थी वह मुझे किसी मजबूत सहारे को सौंपना चाहते थे जो हमेशा मेरी हिफाजत करता और वह हिफाजत एक शोर से बढ़कर और कोई नहीं कर कर सकता था उनकी बात ठीक थी मैं मानती थी मगर किसी से भी शादी करना मेरे बस में नहीं था मगर उनकी खुशी की खातिर मैंने हां कर दी थी और फिर उन्होंने अपने ही खानदान में अपने किसी करीबी घराने में मेरी
शादी करवा दी थी वहां सब लोग अच्छे थे मेरा ख्याल रखते थे और मेरा शौहर वो भी अच्छा था उससे मेरी फिक्र थी मेरा ख्याल था मैं भी उसके साथ खुश रहने लगी थी मगर पुरानी सब बातों को भूल नहीं सकती थी मैं अफान के अम्मी और अब्बा से भी इसी तरह मिलने जाया करती थी जैसे अपने मां-बाप से मिलती थी और वह भी मुझे बेटी की तरह ही प्यार और मान देते थे वह खुश थे उनका कहना था कि वह मुझे खुश देखकर खुश रहते हैं और मैं अपने शोहर के साथ समंदर किनारे जाया
करती थी और एक कोने में पड़ी मट्टी पर कुछ लिखकर मुस्कुराने लगती थी