मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है वह मन यदि विषय आसक्त होता है तो बंधन का कारण बनता है और विषयों से रहित होता है तो मोक्ष का कारण बनता है बंधन और मुक्ति कोई लोक लोका में देवी देवता बैठकर हमारे लिए नहीं बनाते हैं लेकिन हमारे पास जो शरीर और परमात्मा के बीच का जो सेतु है मन वही बंधन और मुक्ति का अधिकारी बनता है आज आदमी समझते हैं कि सबको खुश करो लोका अनुरंजन करो लोकों को राजी रखो वोट लेना है तो लोगों को राजी रखो विषय भोग चाहिए तो लोगों
को राजी करो और हिक वाहवा चाहिए तो लोगों को राजी कर करो लोका अरंजनम में गति चाहिए तो लोगों की सेवा करो जय राम जी राजी करना एक बात है सेवा करना दूसरी बात है राजी करना जैसे मूर्ख बच्चे को राजी करना आप फटाक से भी राजी कर देते हैं लेकिन सेवा नहीं है वो बच्चे को पोलस लगाकर भी राजी कर देते हैं तो आजकल उन किताबों की बड़ी बिक्री है कि दूसरे को वश कैसे करना दूसरे को राजी कैसे करना दूसरे से काम कैसे लेना ऐसे पुस्तक परदेश में छपते हैं और अपने देश में
भी उसका अनुवाद होता है और हजारों लाखों की संख्या में वह बिकते हैं तत्वज्ञान की नजर से देखा जाए तो य शोषण का प्रचार करने के पुस्तक है जय राम जी की लोगों को पोलस कैसे लगाना ऑर्गेनाइजेशन पावर कैसे बढ़ाना लोगों से काम कैसे लेना तो लोगों से काम लेकर भोग के ऊंचे ऊंचे शिखर बांधना और आप फस मरना और लोकों का समय शक्ति बर्बाद करना यह पुस्तक का एम हो गया तो लोका अरंजनम पुस्तकों का मैं नाम नहीं ले रहा हूं लेकिन ऐसे पुस्तक भी मेरे सुनने देखने में आए तो यह पुस्तक अभी बड़े
तेजी से बिकते हैं क्योंकि आदमी का दृष्टिकोण बहुत छोटा हो गया दूसरों का उपयोग करने की वृत्ति दूसरों का उपयोग करके मन माना भोग भोगना यह हल्के विषय व्यक्ति की मांग है हल्का जो विषय है वह दूसरों का उपयोग करके विषय भोग भोगना चाहेगा लेकिन जो धार्मिक विषय है वह दूसरों की सेवा करके भोग भोगना चाहेगा फिर भी हल्के विषय को तो अशांति रहती है लेकिन उत्तम विषय को भी परम शांति तो नहीं मिलती है क्योंकि भोगों में परम शांति का कोई गुंजाइश नहीं है जय जय तो कैसे विषय भोग भोगना कैसे विश्व विख्यात होना
कैसे प्रसिद्ध होना और कैसे फैक्ट्री चलाना और कैसे लोगों से काम लेना इस प्रकार के प्रेरणादाई जो पुस्तक है उनकी बड़ी भुरी भुरी प्रशंसा होती है और लाखों की संख्या में बिकते हैं तो रंजन करने वाले व्यक्ति विषय भोग में कुशल हो सकते हैं विषय भोग भोग सकते हैं लेकिन मुक्ति उनसे कोस दूर हो जाएगी और जब तक मुक्ति नहीं मिली तो बंधन है और बंधन वाला कितना भी अपने को सुखी माने बेवकूफी के सिवा और कोई सुख नहीं जय राम जी [प्रशंसा] की पराधीन स्वपने सुख नाही तो लोका लोका अरंजनम नहीं है तो लोकों
की वाहवाही चाहिए तो लोकान रंजन करो अथवा लौकिक विषय विकारों का भोग चाहिए तो लोकान रंजन करो अगर धर्म चाहिए तो लोकों की सेवा करो तो धर्म अ विरुद्ध कामो अस्म धर्म के अविर अपनी कामना पूरी करो तो सेवा करो लेकिन कामना पूरी करना भी परमार्थ नहीं है मन चाहे कामना तृप्त करना यह तो हेवान है लेकिन धर्म के अवलंबन लेकर कामना पूरी करना यह भी कोई परमार्थ नहीं है परमार्थ तो यह है कि जिस मन में कामनाएं उत्पन्न होती है उस मन को विवेक से देखकर अपने मन को अपना शत्रु ना बनने देना अपने
मन को अपना मित्र बनाना यह परमार्थ है मन वव मनुष नाम कारण बंध मोक्ष हमारा मन ही बंधन का कारण है और हमारा मन ही मुक्ति का कारण है अगर मन में हिक विषय पकड़ने की इच्छा है हिक वासना तृप्त करने की इच्छा है तो हमारा मन हमारा शत्रु है और मन में नश्वर पदार्थों के विकार और वासना नहीं है तो वही मन हमारा आत्म ज्ञान के तरफ चलता है और लब्ध ज्ञानम पराम शांति आत्म ज्ञान मिला तो परम शांति मिली इच्छित पदार्थ मिला तो क्षणिक हर्ष मिलेगा क्षणिक हर्ष मिलेगा और हर्ष की क्ण ण
णण करते हर्ष बढ़ जाए तो जितना जीवन में हर्ष का हिस्सा है उतना ही शोक होता है तो आज के मानव को हिक जगत का आकर्षण ने ऐसा घेर लिया कि दूसरों का शोषण कैसे किया जाए और दूसरों पर हुकूमत कैसे किया जाए ऐसे जो लेखकों के किताब है वह आज के मानवी को प्रभावित कर देते और लाखों की संख्या में बिकते हकीकत में दूसरों का शोषण करके या दूसरों पर हुकूमत चलाकर आज तक पूर्ण कोई सुखी हुआ हो ऐसा हमने देखा सुना इतिहास में नहीं अगर आराम चाहे तू दे आराम खलकत को सता करर
गैर लोगों को मिलेगा कब अमन तुझको ये कलयुग नहीं कर जुग है एक हाथ ले एक हाथ दे शक्कर खिला शक्कर मिले टक्कर खिला टक्कर मिले नेकी का बदला नेक है बद को बदी देख ले इसे दुनिया मत समझ भैया यह सागर की मज धार है औरों का बेड़ा पार कर तो तेरा बेड़ा पार वैदिक संस्कृति के अनुसार देखा जाए तो मनुष्य के मन में सुख की लिप्सा रहती है सुख की लिप्सा हिक इंद्री सुख पाकर सुखी होने की जो लिप्सा है वही मनुष्य की योग्यता को नाश करती है तो सुख देने की लिप्सा को
मिटाने के लिए सुख लेने की आकांक्षा को मिटाने के लिए सुख देना शुरू कर दे और जो सुख देना शुरू करता है तो उसी का मन उसका मित्र बन जाता है और सुख लेना शुरू करता है तो उसी का मन उसका शत्रु बन जाता है मन एव मनुष नाम कारण बंध मोक्ष अगर दुनिया से आपके इंद्रियों के द्वारा आपने सुख लेने पर जोर दिया तो आपका मन आपका दुश्मन हो गया और शरीर से बुद्धि से मन से दूसरों को सुख देने की कोशिश किया तो आपको सुख लेने की वासना सुख देने की वासना में बदल
जाएगी और सुख देने की भावना मात्र से सुख स्वरूप श्री हरि का अंदर से स्वाद आना शुरू हो जाएगा तो आपका स्वतंत्र सुख प्रकट होगा और जो स्वतंत्र सुख प्रकट होता है उसका मन अमनी भाव को प्राप्त हो जाता है उसका मन शुद्ध तत्व में स्थिति करने लगता है तो लोका अरंजनम नहीं है कई बोलते हैं कि वर्ण आश्रम में जैसा अपना कुल धर्म हो नियम हो ऐसे जीना चाहिए वह तो ठीक है अच्छा है यह सामाजिक व्यवस्था के ढंग से तो अच्छा है लेकिन परमार्थ कुछ और चीज है कितना भी अपने कुटुंब परिवार का
पालन पोषण नियम करो लेकिन मन अगर परमार्थ में नहीं है तो तुमने बाप बनकर बेटे के साथ कर्तव्य निभाया पिता बनकर पुत्र के साथ कर्तव्य निभाया और पति बनकर पत्नी के साथ कर्तव्य निभाया जमाई बनकर ससुरा के साथ कर्तव्य निभाया और ससुरा बनकर जमाई के साथ कर्तव्य निभाया जीव बनकर ईश्वर के साथ कर्तव्य निभाया और पड़ोसी बनकर पड़ोसी के साथ कर्तव्य निभाया तो कर्तव्य निभाने का धन्यवाद या सुख समय की धारा में मिला और चला गया जब करता मरता है तो हजारों हजारों से कता ने अपने को कुछ कुछ मानकर पिता के आगे पुत्र माना
पुत्र के आगे पिता माना पत्नी के आगे अपने को पति माना भाई के आगे अपने को भाई माना ईश्वर की मूर्ति के आगे अपने को जीव माना तो कर्ता ने कई मान्यताएं अपने ऊपर आरोपित की और उन मान्यताओं के अनुसार कर्ता ने कई कर्म किए और उन कर्मों का परिणाम जो सुख दुख धन्यवाद आदि था वह भी समय की धारा में समाप्त हो गया मृत्यु के समय करता अनाथ रह जाता है बाप होकर बेटियों से कर्तव्य निभाया जमां से कर्तव्य निभाया लेकिन कर्ता को याद रहना चाहिए बेटियां तेरी नहीं है आ छोड़यो मारी छ छोड़यो
तारी नथी तो कर्ता अपने को कुछ कुछ मानकर और जिस समय कर्ता अपने को जैसा मानता है ऐसा उसका कर्तव्य आकर खड़ा हो जाता है और समय की धारा में कर्ता का आयुष्य और कर्ता का कर्तव्य और कर्ता के कर्तव्यों का परिणाम समय की धारा में खत्म हो जाता है समझते समय की धारा में मैंने बाप होकर बेटे से कर्तव्य निभाया बेटे को पढ़ाया लिखाया लाड़ दिला दी चलो लेकिन समय की धारा ने तो बेटा और लाड़ी जुदा कर दिया और हम तो वैसे के वैसे रह गए अथवा उनको छोड़ के मर गए मैंने अपनी
बेटी मानी उसको पढ़ाया लिखाया चार बेटियां मानी अपनी बेटियों को पढ़ाया लिखाया उनको जमां के घर पहुंचा दिया जब जमाई आए तो मेरा कर्तव्य था कि जमाई को स्वागत करा ये सब किया लेकिन ज आ जमाई के मित्र आए खा पी के गए हारू ससुरा जीी हारा क पति पनी ना पव हम नाम कर प गा द गया पती ग हारू कर गया पती ग प अने अंदर ना द्वार मा जवा माटे न कई मलयो नहीं नहीं नहीं नहीं आज का आदमी इंद्र जगत में इतना उलझा है कि बाहर के व्यवहार को तो बस अच्छी
तरह से निभाना चाहता है लेकिन जिससे वर होता है उस मन को अच्छा करने में वह कोशिश नहीं करता और जिससे मन उठता है उस अच्छे में अच्छे अपने आपकी खबर आज के आदमी को नहीं और सब खबर रखता है किलो यो माणस केवा किलो विकास केवा आजना युगन घणो विकास बाहर की दृष्टि से देखा जाए तो विकास हो रहा है लेकिन आध्यात्मिकता की दृष्टि से देखा जाए ना तो पतन हो रहा है जीरो रहे अध्यात्मिकता में यह कर्तव्य है यह कर्तव्य है इस्लाम खतरे में धर्म खतरे में फलाना खतरे में लेकिन तू अपने आप
को खतरे में रखा यह भी तुझे पता नहीं जिस वक्त मन में जो धारा आई उसमें बह चला जिस वक्त तुम्हारे मन में जिसने जैसी धारा भर दी ऐसा अपने को मानकर उसी धारा में बह चले आज के कर्ता को अपने स्टैंड का पता नहीं अपनी हकीकत का पता नहीं अपने मूल घर का पता नहीं इसलिए कर्ता ने हर जन्म में न जाने कितने कितने अपने सिर पर कर्तव्य लाद दिए कितने कितने कर्तव्य निभाए और कितने न निभा सका वह चुभते रहे और मरते समय उनकी चुभन लेकर करता फिर दूसरी जगह जन्मा तो यह करता
कौन है कि मन ही है मन अगर इस संसार को सत्य मानकर इसमें से सुख लेने की कोशिश करता है तो समझो उसको दुख ही दुख मिलेगा आज तक संसार से पूरा सुख किसी को नहीं मिला हम जिस दिन यह बात समझ जाएंगे कि संसार सुख देने में समर्थ नहीं है और संसार सब दुख मिटाने में समर्थ नहीं है संसार सब दुख मिटाने में समर्थ नहीं है यह समझते ही दुख हारी श्री हरि का ध्यान लगना शुरू हो जाएगा दुख हारी श्री हरि दुख दूर कर लेंगे संसार पूर्ण सुख देने में समर्थ नहीं है यह
बात समझते ही कर्ता अपने सुख स्वरूप की खोज करके गोता मारे तो अभी अभी सुखी हो सकता है जगत केव छे न विचार करसो नहीं दुनिया कैसी है उसका विचार मत करना देखने वाला मन किस वक्त कैसा है देखने वाला मन जिस वक्त जैसा है उस वक्त उसके लिए वैसी है एक बाबा जी बैठे थे गांव के बाहर उनका छोटा सा आश्रम था कोई पथिक वहां से पसार हुआ य गांव में फूल झाड़ आदि दिखते हैं और नहर भी पसार होती है गांव के खेत्र से मुझे लगता है य गांव सुखी है हमारे वहां जरा
धंधा बंधा कम है तो मैं यह गांव में रहूं तो कैसा रहेगा यह गांव के लोग कैसे हैं बाबा जी ने कहा तू जिस गांव में रहता था वहां के लोग कैसे थे उसने मुंह चढ़ाते हुए डेढ़ शेर इमली खाते हुए नींबू चाटते हुए कहा कि वह तो ऐसे हैं ऐसे हैं ऐसे हैं भर मार निंदा करने लगा बाबा ने कहा भैया यह गांव के लोग भी ऐसे ही है यहां तेरा बसेरा नहीं होगा जैसे उस गांव के लोग थे ना वैसे के वैसे उससे भी सवाय मिलेंगे या तो बड़े दुष्ट थे बड़े स्वार्थी थे
बड़े नालायक थे ऐसे थे बस आमली खाई और नींबू खाया उनके विषय में समझ गए ना आप लोग शिष्य सुन रहा है कि बाबा जी तो गांव के लोगों की प्रशंसा करते और इसको बोला कि य यहां के भी ऐसे ही है थोड़ी देर के बाद दूसरा आदमी आया उसने पूछा कि महाराज जी मैं ये गांव में रहना चाहता हूं और आपको अनुभव होगा तो कृपा करके बताओ कि गांव के लोग कैसे हैं बाबा जी ने पूछा कि तुम जिस गांव में रहते थे वह गांव के बोले व तो बड़े सज्जन है महाराज वह तो
बड़े सज्जन है वे तो सत्संगी हैं धर्मात्मा है उनका स्वभाव तो क्या कहूं बस परहित परायण है मत भाषी है कम बोलते हैं अनावश्यक बोलते नहीं बराड़ा पड़ते नहीं ज्यादा झगड़ते नहीं सड़कें बंद करते नहीं बड़े श से जीते हैं टेबल पर बैठकर समाधान को मानते हैं और व गांव के मुखिया बखिया भी ऐसे दोनों पक्ष के एक दूसरे को समझने की कोशिश करते हैं सत्ता का दुरुपयोग नहीं करते लेकिन सत्ता का सदुपयोग करके एक दूसरे की सेवा में सलगन है हमारे गांव के लोग ऐसे हैं बोले तो यह गांव के लोग भी ऐसे ही
उनसे भी अच्छे सवाए शिष्य चकित हो गया कि दो घंटे पहले बोला कि गांव के लोग ऐसे है नट है फला फलाना है और अभी बाबा जी कहते हैं कि अच्छे हैं सज्जन है परोपकारी है मितभाषी है देशी है संयमी है इंद्रिय निग्रह है मनो निग्रह करते हैं साधु संतों का सत्कार करते हैं ये उन्हीं गांव के लोगों ने कुटिया बना कर दी उन्हीं गांव के लोगों ने मंडप बनाया उन्हीं गांव के लोगों ने सब कुछ किया गांव के लोग बड़े सज्जन [संगीत] है बाप जी वो आदमी तो गया बाप जी से पूछा कि बाप
जी आप झूठ बोलना कब से सीखे बोले हम झूठ बोलना नहीं सीखे आदमी का जैसा मन होता है वह जहां भी जाएगा ऐसा ही उसको वातावरण मिल जाएगा आपके मन में जैसे विचार आते हैं उन्हीं विचारों के लोग आपके मित्र बन जाएंगे आपके मन में जैसी मान्यताएं हैं ऐसी मान्यता के अनुरूप व्यवहार करने वाले लोग आपके इर्दगिर्द मिल जाएंगे आप समझेंगे लोग लुचे लुचे तो बिल्कुल लुचे लोग आमंत्रित हो जाएंगे और आपसे लुचाई का व्यवहार करेंगे और आप समझेंगे सज्जन है सब में ईश्वर है तो आप में ईश्वर देखने वाले लोग आपके पास आ जाएंगे
जय राम जी की तो जैसा तुम्हारे मन में दृढ़ चिंतन होता है वातावरण सूक्ष्म जगत के वातावरण में से भी ऐसा ही दे देवत्व यक्ष गंधर्व किन्नर और मनुष्य जात उसी प्रकार के लोग आपके तरफ आकर्षित हो जाते यह तो हुई व्यावहारिकता लेकिन परमार्थ क्या है के लोका अरंजनम नहीं है धार्मिकता भी परमार्थ नहीं है मन से विषय वासना का अभाव और निर्विक मन की वृत्ति जो है वह परमार्थ है तो यहां कहते हैं मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है वह मन यदि विषय सक्त होता है तो ब धन का कारण
बनता है और विषयों से रहित होता है तो मोक्ष का कारण बनता है जिस जिस आदमी को जहां जहां सुख का एहसास होता है वॉलीबॉल खेलते समय क्रिकेट देखते समय मैच देखते समय अथवा सुंदर भजन गाते समय या कोई भर्त काम करते समय भोजन बनाते समय या भोजन खाते समय फिल्म देखते समय या फिल्म मि में शूटिंग करते समय अथवा महाराज फिल्म का रील उतारते समय जिस जिस वक्त आनंद आता है या मजा आता है उस वक्त जाने अनजाने उन व्यक्तियों का मन कुछ अंशों में एकाग्र होता है जब जब एकाग्र होता है तब तब
उस विषय में उस कार्य में आनंद आता है मजा आता है मन की एकाग्रता में दो शक्तियां छुपी है एक तो आनंद और दूसरा सर्जन की क्षमता जितना मन एकाग्र होता है उतना उसमें खुशी आती आनंद आता है और उतना ही सर्जन का सामर्थ्य आता है उसम तो जो कार्य आपको रुचिकर है उसमें आपको आनंद आता है तो रुचिकर है तो मन वहां लग जाता है मन लग जाता है तो अनजाने में कुछ परसेंटेज एकाग्र हो जाता है जैसे मान लो कि एक घंटा में हजार संकल्प करने वाला मन है लेकिन आपको अपने रुचि के
अनुसार कोई काम मिल गया तो व 900 संकल्प विकल्प होंगे य कल्पना है अनुमान 900 हो सकते हैं 800 भी हो सकते 700 भी हो सकते हैं यह दृष्टांत है तो आपको मजा आएगा और जिस कार्य में आपकी रुचि नहीं जिस धर्म में जिस गुरु में जिस विचारों में आपकी रुचि नहीं आप एक जगह पर हजारों आदमी बैठे हैं लेकिन जिनकी इस आध्यात्मिक तत्व विचार में योग में रुचि है उनको प्रवचन से जो आनंद आएगा वह आनंद नए नए व्यक्ति को नहीं आएगा तो जब जब मन के अनुकूल घटना घटती है तो मन के संकल्प
और विकल्प कम होने लगते हैं और आनंद आता है अब दूसरे पहलू पर चले तो अनुकूल वेदन सुखम प्रतिकूल वेदन दुखम अनुकूलता को हमने सुख माना और प्रतिकूलता को हमने दुख माना तो अनुकूल और प्रतिकूल यह सुख और दुख के सर्जक है और जब विषयों में लगेगा तो कभी अनुकूलता मिलेगी कभी प्रतिकूलता मिलेगी सतत अनुकूलता कहीं नहीं मिलेगी और सतत प्रतिकूलता कहीं नहीं मिलेगी तो कभी सुख और कभी दुख तो सुख और दुख की थपेड़े खाते खाते मन क्षीण होता जाएगा मन का सामर्थ्य एकाग्रता की क्षमता नाश होती जाएगी इसीलिए अनुकूलता का या प्रतिकूलता का
जो सुख दुख है उसको पकड़े नहीं उसको देखें अनुकूलता आई और सुख मिला तो विषय में अनुकूलता आई और सुख मिला तो उस सुख को मिला हुआ जाने जो मिला हुआ जानोगे तो उसमें आसक्ति नहीं होगी और य याद रहे कि जो मिली हुई चीज है वह अपनी नहीं है परिस्थितियों की है तो मिली हुई चीज सदा नहीं रहती लेकिन मन को देखने वाला सदा रहता है तो मिली हुई घटना मिली हुई वस्तु मिला हुआ पदार्थ सदा नहीं रहता लेकिन मिला बिछड़ा जिस से महसूस होता है उस मन को देखने वाला सदा रहता है मन
को देखने वाला सदा रहता है वह मैं कौन हूं उसका अगर खोज करें तो अपने आप को पाले और मुक्ति का द्वार खुल [प्रशंसा] जाए मनुष्य के मन दुधारी तलवार जैसा है मनुष्य की मांग दुधारी है एक तरफ मन मनुष्य चाहता है कि मैं दिव्य बनू अच्छा बनू मुक्त रहूं स्वतंत्र रहूं यहां भी सुखी और यह देह पढ़ने के बाद भी सुखी रहूं दूसरे तरफ मनुष्य चाहता है कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन जैसा मेरे मन में ऐसा होना चाहिए तो विषय विकार के तरफ भी झुका रहता है और दिव्य होने के तरफ भी
झुका रहता है किसी गांव में देहातों में पुराने देहातों की कल्पना करो जहा आईना पहुंचा नहीं अरिसा पहुंचा ही नहीं तो वक्र मुन मुंह वाला आदमी दूसरे के मुंह को वक्र काय देखता है तो जो आईने में जिसने कभी नहीं देखा वह दूसरे की दाढ़ी मछ अथवा दूसरे के चेहरे पर छोटा सा तिल भी उसे दाग दिखेगा अगर आईना दिख जाए तो फिर पता चलेगा कि अपने चेहरे पर क्याक है ऐसे मनुष्य दोष दूसरे का देख और गुण अपना देखता है मनुष्य का मन अगर आयना बन जाए तो दूसरों के दोष जैसे देखता ऐसे अपने
दोष देखने लग जाए और दूसरों के गुणों की जैसे बेपरवाही रखता है ऐसे अपने गुणों की बेपरवाही रखने लग जाए तो मनुष्य का मन जल्दी से शुद्ध होने लगता और मुक्ति का कारण बन जाता है साधक को हमेशा अपना किया हुआ किसी ने अपकार किया है वह भूल जाए और अपने उपकार किया है वह भूल जाए मन शुद्ध होगा साधक हमेशा तीन बातों को सिरो धार करें वेद के वचनों को माता-पिता और गुरुओं के वचनों को और अपनी गलती बताने वाले के वचनों को अपनी गलती को शिरो उधार करें साधक ऊंचा उठ जाएगा अपनी गलती
क्षमा करने में देर नहीं लगती और दूसरे की गलती बड़ी देखने में देर नहीं लगती कई बार सुनाई वह बात कि पतियों का बंडल गिर पड़ा और बुद्धू हलवाई ने देखा कि व छह मासिक पेपर गणित में चार इतिहास में पांच भूगोल में तीन समाजशास्त्र में जीरो गुस्से आ गया लड़के की बची पकड़ी कि सातवा धोरण मा हाऊ परिणाम छ मासिक परीक्षा में तू सु समझे तू क्या समझता है लड़के की फेंट पकड़ के ठसा उठाया लड़का रोया बोले पप्पा यह पेपर तो ऊपर से गिरे हैं और पुराने हैं इस पर नाम तुम्हारा लिखा है
मेरा पेपर मेरे पास है वो क्रोध कहां गया पूछ वो शिक्षा करने का फोर्स कहां गया जो ठसा चला था अढ़ाई सेर का पकड़ी गई थ वो कहां गया अपनी गलती देखी वह अपने आप शांत हो गया ऐसे ही अध्यात्म विद्या कहती है कि दूसरी आकृति में दूसरी बडियो में जब तुम अपने को देखने का आदत डालोगे ना तो तुम्हारा क्रोध भय विकार सब शांत होता जाएगा द्वैत ऐसा कोई दुर्गुण नहीं है जो द्वैत भाव से पैदा ना होता हो और ऐसा कोई सद्गुण नहीं है जो अद्वैत ज्ञान से प्रकट ना होता हो इसलिए जीवन
में अद्वैत ज्ञान की आवश्यकता है यही परमार्थ है लोका अरजन परमार्थ नहीं विषय विकार चाहे तो लोका अरजन करो धर्म का अनुष्ठान करना है तो लोगों की सेवा करो और मोक्ष पाना है तो मन को निर्विक करो भोगी अपने मन में भोगों को भरता है भोगी भी तीन प्रकार के होते हैं उत्तम मध्यम और कनिष्ठ कनिष्ठ भोगी तो ना एकादशी देखेगा ना पूर्णिमा देखेगा ना अपना देखेगा ना पराया देखेगा कैसे भी करे कैसे भी आए फिर चाहे छल का कड़ का कपट का हिंसा का अवलंबन लेकर भी भोग भोगे कैसे भी करके हैप्पी रहो हैप्पी
में से होकर हिपी वाद चला कैसे भी करके अगर कोई हैप्पी रह सकता हो तो हिपी लोग खुश होने चाहिए लेकिन ज्यादा परेशान है कुछ भी गमे तेम करो गमे ते खाऊ पड़े गमे ते करू पड़े गमेते कड़ कपट छल दगा बाजी करीने आपने मौज करो एवा विचार थी जे लोको जीवे छ ने कनिष्ठ भोगी कवाय हल्का भोगियों केवा ने पशु कवा जो ने पशु नहीं साथ सरखा है तो पशु नाराज थ जाए कभी-कभी पशु भी नाराज हो जाते होंगे पशु कहते हैं कि हम तो अपने पुराने कु कर्मों का फल भोकर ऊंचे उठ रहे
हैं और यह अपने मनुष्य जन्म को बर्बादी की तरफ ले जाकर नीचे जा रहा है हमारी बराबरी कैसे करते हैं और हमें कोई रूखा सूखा टुकड़ा फेंक के झूठा दे देता है हम खाते उसके घर की चौकी रखते वो खड़ा में है तो हम खड़ा तक पहुंचाने को जाते और रात को वहीं सो जाते हैं खेतर में खड़ा में माल आया है और खेडुत सोया है तो कुत्ता भी सोता और कोई अनजान ढोर आया है आदमी आया तो कुत्ता भकता है व खड़ा में सोया हुआ आदमी जगेगा कुत्ता को जोड़ा मारेगा जूता मारेगा पत्थर मारेगा
फिर भी उसका भोंकना चालू रहेगा वो तब तक भकता रहेगा जब तक अनजाना आदमी मालिक के खटिया पर आया नहीं और मालिक के साथ बातचीत किया और मालिक का आवाज सुना कि मालिक का परिचित है तब कुत्ता चुप रहेगा नहीं तो भकता ही रहेगा लेकिन कनिष्ठ भोगी तो मालिक का भी शोषण कर लेगा जिसका टुकड़ा खाया है जिसके वह राह है उसका भी गला नोच के सुखी रहने की कोशिश करेगा वह कनिष्ठ भोगी है मध्यम भोगी वह है कि जियो और जीवने दो आप भी सुखी आपने मेरा उपकार किया तो मैं आपका तो नहीं बिगाड़ू
लेकिन इसका बिगाड़ हूं आप आड़ मत आओ मेरा काम होने दो तमार सु जाए उत्तम भोगी यह है के शास्त्र मर्यादा के अनुसार यहां के भोगों को भोगे लेकिन देखेगा कि यहां का धन वैभव यही भोग के शरीर नाश हो जाएगा इसकी अपेक्षा उस धन का शक्ति का दान पुण्य और सदुपयोग करे ताकि स्वर्ग में भी भोग मिले यह उत्तम भोगता है यहां के भोग अल्प है इसलिए थोड़ा संयम करके परलोक में सुखी हो इस भावना से जो सेवा करेगा अथवा दान पुण करेगा वोह उत्तम भोगी माना जाता है लेकिन ऐसे उत्तम भोगी को भी
परम शांति तो नहीं मिलती क्योंकि उस भोगी के अंदर भी भोग भोगने की इच्छा है यहां के भोग नहीं तो स्वर्ग के भोग लेकिन भोग भोगने की जब तक मन में इच्छा है महाराज तब तक मुक्त