तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन कोई इंसान नहीं है। कोई दुश्मन तुम्हारे खिलाफ साजिश नहीं कर रहा। कोई दुनिया तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं कर रही। सच तो यह है कि जिस चीज ने तुम्हारे सबसे बड़े सपनों को रोका है, वह हर दिन तुम्हारे साथ उठती है। [संगीत] हर दिन तुम्हारे साथ सोती है और हर फैसले में तुम्हारे साथ मौजूद रहती है। लेकिन खतरनाक बात यह है कि ज्यादातर लोग उसे दुश्मन समझते ही नहीं क्योंकि वह दुश्मन उनके अपने दिमाग [संगीत] के अंदर छिपा होता है। एक पल के लिए सोचो। कितनी बार तुमने कुछ बड़ा
करने का फैसला किया। लेकिन कुछ दिनों बाद तुम्हारी सारी आग ठंडी [संगीत] पड़ गई। कितनी बार तुमने खुद से वादा किया कि अब जिंदगी बदलनी है। लेकिन फिर वही पुरानी आदतें तुम्हें वापस खींच ले गई। कितनी बार तुमने सोचा कि बस एक मौका और मिल जाए तो सब ठीक कर दूंगा। लेकिन मौका आया और तुम तैयार ही नहीं थे। सवाल यह नहीं है कि तुम्हारे पास टैलेंट कितना है? सवाल यह भी नहीं है कि तुम्हारी किस्मत कैसी है? असली सवाल कुछ और है। ऐसा क्या है जो इंसान को खुद अपनी ही क्षमता से दूर कर
देता है? [संगीत] ऐसा क्या है जो एक मजबूत इंसान को कमजोर महसूस करवाता है? और ऐसा क्या है जो लाखों लोगों को पूरी जिंदगी [संगीत] व्यस्त रखता है लेकिन कभी आगे बढ़ने नहीं देता। आज जो सच तुम सुनने वाले हो वो शायद असहज लगे। क्योंकि यह कहानी दुनिया को बदलने की नहीं है। यह कहानी खुद को देखने की है। और यकीन मानो जब इंसान पहली बार खुद को सच में देख लेता है तब उसकी पूरी जिंदगी बदलना शुरू हो जाती है। लेकिन असली खेल यहां से शुरू होता है। क्योंकि जो चीज तुम्हें रोक रही है
वो तुम्हारी कमजोरी नहीं [संगीत] बल्कि तुम्हारी सबसे बड़ी अनदेखी हुई आदत है। और आगे जो होने वाला है वो शायद तुम्हारी सोच हमेशा के लिए बदल देगा। चैप्टर एक तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन तुम्हारे अंदर रहता है। क्या होगा अगर मैं तुमसे कहूं कि तुम्हारी जिंदगी में जितनी भी लड़ाईयां चल रही हैं उनमें से ज्यादातर लड़ाईयां बाहर नहीं बल्कि अंदर चल रही हैं। और उससे भी डरावनी बात यह है कि तुम उनमें से कई लड़ाईयों को पहचानते [संगीत] तक नहीं। तुम सोचते हो कि तुम्हारी समस्या पैसे की है। तुम सोचते [संगीत] हो कि तुम्हारी समस्या समय
की है। तुम सोचते हो कि तुम्हारी समस्या किस्मत की है। लेकिन सच्चाई [संगीत] अक्सर इन सब से अलग होती है। क्योंकि बहुत बार इंसान की सबसे बड़ी समस्या उसकी परिस्थितियां नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी समस्या उसका अपना दिमाग होता है। एक ऐसा दिमाग जो उसे हर दिन हजारों बातें बताता है। [संगीत] कुछ बातें सही होती हैं। लेकिन बहुत सी बातें झूठ होती हैं। और सबसे खतरनाक बात यह है [संगीत] कि हम उन झूठों को सच मान लेते हैं। एक लड़का था मिडिल क्लास परिवार से। उसके सपने बहुत बड़े थे। वो कुछ बनना चाहता था। अपने
परिवार की जिंदगी बदलना चाहता था। लेकिन हर बार जब वह कोई नया काम शुरू करता कुछ दिनों बाद उसका उत्साह खत्म हो जाता। फिर वह खुद को समझाता शायद मैं इतना टैलेंटेड नहीं हूं। शायद मेरे बस की बात नहीं। शायद दुनिया में सफल लोग अलग पैदा [संगीत] होते हैं। धीरे-धीरे यह विचार उसके अंदर घर बनाने लगे और एक दिन उसे लगने लगा कि यही सच है। लेकिन असली सच कुछ और [संगीत] था। वो अपनी क्षमता से नहीं हार रहा था। वो अपनी सोच से हार रहा था। और यही वह सच है जो इंसान बहुत देर
से समझता है। जिंदगी में ज्यादातर लोग इसलिए नहीं हारते क्योंकि उनके पास क्षमता नहीं होती। [संगीत] वे इसलिए हारते हैं क्योंकि उनके दिमाग ने पहले ही हार मान ली होती है। जब दिमाग हार [संगीत] जाता है तो शरीर कोशिश करना बंद कर देता है। जब विश्वास टूट जाता है तो अवसर भी [संगीत] बेकार लगने लगते हैं। जब इंसान खुद को छोटा मान लेता है तो दुनिया की कोई [संगीत] ताकत उसे बड़ा महसूस नहीं करा सकती। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि यहां एक सवाल पैदा होता है। अगर हमारा दिमाग ही हमें नुकसान पहुंचा रहा
है तो फिर ऐसा क्यों होता है? आखिर हमारा अपना दिमाग हमारे खिलाफ क्यों काम करता है? इसका जवाब मानव मनोविज्ञान में छिपा है। तुम्हारा दिमाग तुम्हें [संगीत] सुरक्षित रखना चाहता है। महान बनाना नहीं। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन सच यही है। दिमाग का पहला काम तुम्हें जीवित रखना है। इसलिए जब भी तुम कोई बड़ा कदम उठाने की कोशिश करते हो वो डर पैदा करता है। वो शक पैदा करता है। [संगीत] वो तुम्हें जोखिम से दूर रखना चाहता है। नई नौकरी, नया बिजनेस, नया सपना, नई शुरुआत। हर चीज उसे खतरे जैसी लगती
है। और वो तुम्हारे कान में धीरे से कहता है मत करो। कहीं असफल हो गए तो मत करो। लोग क्या कहेंगे? मत करो। अभी सही समय नहीं है। और धीरे-धीरे यह आवाज इतनी सामान्य लगने लगती है कि इंसान उसे अपनी असली सोच समझ बैठता है। लेकिन असली खेल यहां से शुरू होता है। [संगीत] क्योंकि हर सफल इंसान और हर असफल इंसान के बीच सबसे बड़ा फर्क टैलेंट का नहीं होता। फर्क इस बात का होता है कि वह अपने दिमाग [संगीत] की आवाज को कितना कंट्रोल कर पाता है। एक बार एक पत्रकार को एक पुरानी फाइल
मिली। फाइल के ऊपर सिर्फ एक शब्द लिखा था अधूरा। उसे लगा यह किसी पुराने केस की फाइल होगी। लेकिन जब उसने उसे खोलना शुरू किया तो अंदर किसी अपराध की रिपोर्ट नहीं थी। वो अलग-अलग लोगों की निजी डायरी के पन्ने थे। हर पन्ने पर एक जैसी कहानी थी। किसी ने बिजनेस शुरू नहीं किया क्योंकि उसे [संगीत] डर था। किसी ने प्यार का इजहार नहीं किया क्योंकि उसे रिजेक्शन का डर था। किसी ने अपना सपना छोड़ दिया क्योंकि उसे [संगीत] लोगों की राय का डर था। सभी लोग अलग थे लेकिन उनकी हार का कारण एक ही
था। उन्होंने अपने डर की आवाज को सच मान लिया था। पत्रकार पूरी रात उन पन्नों को पढ़ता रहा और फिर उसे एक बात समझ आई। इंसान की जिंदगी को बर्बाद करने के लिए हमेशा किसी दुश्मन की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी सिर्फ एक गलत विश्वास ही काफी होता है। सोचो कितनी चीजें हैं जो तुम करना चाहते थे लेकिन कभी की नहीं। कितनी बार तुमने खुद को रोका। कितनी बार तुमने खुद से कहा अभी नहीं बाद में सही समय आने दो। लेकिन वह सही समय कभी नहीं आया क्योंकि समस्या समय की नहीं थी। समस्या उस आवाज की
थी जो तुम्हारे अंदर बैठी हुई थी। और यही वजह है कि आत्म जागरूकता इतनी जरूरी है। जब तक तुम अपने विचारों को देखना नहीं सीखोगे तब तक तुम उनके गुलाम बने रहोगे। ज्यादातर लोग अपने विचारों को सच मान लेते हैं। लेकिन बुद्धिमान लोग अपने विचारों को सिर्फ विचार मानते हैं। दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। अगर तुम्हारे मन में यह विचार आए कि तुम असफल हो जाओगे, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम सच में असफल हो जाओगे। अगर तुम्हारे मन में यह विचार आए कि लोग तुम्हें पसंद नहीं करते तो इसका मतलब यह
नहीं कि यह सच है। विचार सिर्फ बादलों की तरह होते हैं। वे आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन समस्या तब होती है जब [संगीत] हम हर बादल को अपना आसमान समझ लेते हैं। और आगे जो होने वाला है वह शायद तुम्हारी सोच बदल देगा। क्योंकि जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब इंसान पहली बार अपने दिमाग को देखना शुरू करता है। [संगीत] उसे मानना नहीं उसे देखना। जब वह समझता है कि हर डर सच नहीं होता। हर शक वास्तविक नहीं होता। हर भावना स्थाई नहीं होती। तब उसके अंदर एक नई ताकत जन्म
लेती है और वही ताकत इंसान को साधारण [संगीत] से असाधारण बनाती है। उस दिन से वह परिस्थितियों का शिकार नहीं रहता। वह अपने जीवन का निर्माता बनना शुरू कर देता है। लेकिन ज्यादातर लोग यहां सबसे बड़ी गलती कर देते हैं। वे सोचते हैं कि बदलाव एक दिन में होगा नहीं। बदलाव धीरे-धीरे होता है। जैसे रात धीरे-धीरे सुबह में बदलती है, [संगीत] वैसे ही इंसान की सोच धीरे-धीरे बदलती है। पहले वह अपने डर को पहचानता है। [संगीत] फिर वह उसे चुनौती देता है। फिर वह उसके बावजूद कदम उठाता है और आखिर में वही डर उसकी ताकत
बन जाता है। याद रखो तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कोई इंसान नहीं, कोई परिस्थिति नहीं, [संगीत] कोई समस्या नहीं। अगर तुम अपने दिमाग को समझ नहीं पाए तो वही तुम्हें रोक देगा। और अगर तुमने उसे समझ लिया तो वही तुम्हें वहां तक पहुंचा सकता है जहां आज तुम्हारी कल्पना भी नहीं पहुंचती। [संगीत] क्योंकि असली लड़ाई दुनिया से नहीं खुद से है। और जो इंसान खुद को जीत लेता है उसे हराना लगभग असंभव हो जाता है। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि [संगीत] अगले अध्याय में हम उस अदृश्य जाल को समझेंगे जिसमें फंसकर सबसे बुद्धिमान लोग
भी अपनी जिंदगी के गलत फैसले लेने लगते हैं। और शायद वहीं तुम्हें अपने कई पुराने सवालों का जवाब भी मिल जाए। चैप्टर दो जब दिमाग तुम्हें धोखा देना शुरू करता है। क्या तुम्हें कभी ऐसा महसूस हुआ है कि तुम पूरी मेहनत कर रहे हो। फिर भी जिंदगी वहीं की वहीं खड़ी है? तुम कोशिश करते हो, प्लान बनाते हो, सपने देखते हो। लेकिन हर बार कुछ ऐसा होता है जो तुम्हें पीछे खींच लेता है। और धीरे-धीरे तुम्हें लगने लगता है कि शायद समस्या दुनिया में है। लेकिन क्या होगा अगर मैं कहूं कि कई बार दुनिया तुम्हें
नहीं रोकती। तुम्हारा अपना दिमाग तुम्हें रोकता है और उससे भी खतरनाक बात यह है कि वह ऐसा करते समय तुम्हें एहसास तक नहीं होने देता। दिमाग का सबसे बड़ा खेल यही है। वो झूठ को सच जैसा दिखाता है और सच को इतना साधारण बना देता है कि इंसान उसे नजरअंदाज कर देता है। एक बात हमेशा याद रखना इंसान जैसा दुनिया को देखता है वैसी दुनिया वास्तव में होती नहीं। वह सिर्फ उसकी मानसिक व्याख्या होती है। दो लोग एक ही घटना देखते हैं। एक अवसर देखता है, दूसरा खतरा। एक सीख देखता [संगीत] है, दूसरा अपमान। एक
शुरुआत देखता है, दूसरा अंत। घटना एक ही होती है लेकिन कहानी अलग-अलग बन जाती है। और [संगीत] यही वह जगह है जहां दिमाग का धोखा शुरू होता है। एक कॉलेज [संगीत] छात्र था। पढ़ाई में अच्छा, मेहनती लेकिन बेहद चुप। क्लास में सवाल जानता था फिर भी हाथ नहीं उठाता था। उसे हमेशा लगता था कि अगर उसने कुछ गलत बोल दिया तो [संगीत] लोग उसका मजाक उड़ाएंगे। सालों तक उसने खुद को रोके रखा। वो समझता रहा कि लोग उसे जज कर रहे हैं। [संगीत] लेकिन एक दिन उसने हिम्मत करके अपने एक दोस्त से पूछा। क्या सच
में लोग मेरे बारे में इतना सोचते हैं? उसका दोस्त हंस पड़ा और बोला सच कहूं? ज्यादातर लोगों को खुद की जिंदगी से ही फुर्सत नहीं है। उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ वो जिन नजरों से डरता रहा वे नजरें कभी उसकी तरफ थी ही नहीं। और यही वह सच है जो इंसान बहुत देर से समझता है। हमारा दिमाग अक्सर हमें यह महसूस कराता है कि पूरी दुनिया हमें देख रही है। जबकि हकीकत में हर इंसान अपनी ही लड़ाई लड़ रहा होता है। [संगीत] इस साइकोलॉजी को स्पॉटलाइट इफेक्ट कहते हैं। इंसान को लगता है कि
उसकी हर गलती सबको दिखाई दे रही है। लेकिन वास्तव में लोग [संगीत] उतना ध्यान देते ही नहीं जितना हम सोचते हैं। और इसी भ्रम की वजह से लाखों लोग अपनी जिंदगी के सबसे [संगीत] बड़े मौके खो देते हैं। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि यह तो सिर्फ शुरुआत है। दिमाग का दूसरा धोखा इससे भी ज्यादा खतरनाक है। यह धोखा तुम्हारे भविष्य को चुरा सकता है। सोचो तुम किसी काम में एक बार असफल हुए। फिर दो बार, फिर तीन बार। धीरे-धीरे तुम्हारा [संगीत] दिमाग एक निष्कर्ष निकालता है। मैं इसके लायक नहीं हूं। मैं नहीं [संगीत]
कर सकता। मेरे बस की बात नहीं। और फिर वो तुम्हारे सामने पुराने [संगीत] सबूत रखने लगता है। देखा था पहले भी असफल हुए थे। अब भी हो जाओगे। लेकिन यहां एक बहुत बड़ा खेल चलता है। दिमाग उन घटनाओं को ज्यादा याद रखता है जो उसके पुराने विश्वास को सही साबित करें। अगर तुम खुद को कमजोर मानते हो तो दिमाग तुम्हारी सारी कमजोरियां याद रखेगा। अगर तुम खुद को बदकिस्मत [संगीत] मानते हो तो दिमाग तुम्हारे सारे दुर्भाग्य याद रखेगा। अगर तुम खुद को असफल मानते हो तो दिमाग तुम्हारी सारी असफलताएं गिनाएगा। लेकिन तुम्हारी सफलताओं को नजरअंदाज
कर देगा। यही कंफर्मेशन बायस है और [संगीत] यही वह जाल है जिसमें फंसकर इंसान अपनी पहचान गलत बना लेता है। वह अपने अतीत [संगीत] की कुछ घटनाओं को पूरी जिंदगी की सच्चाई समझ बैठता है। लेकिन असली खेल यहां से शुरू होता है। क्योंकि अब मैं तुम्हें उस कहानी पर वापस लेकर चलता हूं जिस पत्रकार की फाइल हमने पिछले अध्याय में देखी थी। उसने उन डायरियों को पढ़ना जारी रखा। हर पन्ने पर उसे एक नया इंसान मिला। लेकिन एक अजीब समानता भी मिली। सभी लोग खुद को कम आंकते थे। एक लड़की थी बेहतरीन कलाकार लेकिन उसने
कभी अपनी पेंटिंग दुनिया को नहीं दिखाई। उसे लगता था कि लोग हसेंगे। एक लड़का था जिसके पास शानदार बिजनेस आईडिया था। लेकिन उसने कभी शुरुआत नहीं की। उसे लगता था कि वह फेल हो जाएगा। एक आदमी था जो सालों से नौकरी से नफरत करता था। लेकिन कभी छोड़ नहीं पाया। [संगीत] उसे लगता था कि बाहर उससे भी बुरा होगा। पत्रकार ने महसूस किया इन लोगों को दुनिया ने नहीं रोका। इनकी कल्पनाओं ने रोका, इनके डर ने रोका, इनके [संगीत] दिमाग ने रोका। और तभी उसे फाइल के आखिर में एक लाइन मिली जिसने उसकी पूरी सोच
[संगीत] बदल दी। उस लाइन में लिखा था इंसान अपने वास्तविक डर से कम और [संगीत] अपने कल्पित दर से ज्यादा हारता है। वह देर तक उस वाक्य को देखता रहा क्योंकि उसे एहसास हो गया था यह सिर्फ उन लोगों की कहानी नहीं थी। यह लगभग हर इंसान की कहानी [संगीत] थी। शायद तुम्हारी भी क्योंकि अगर तुम ईमानदारी से सोचो तो तुम्हारी जिंदगी में भी ऐसे फैसले होंगे जो तुमने [संगीत] डर की वजह से नहीं लिए। ऐसे मौके होंगे जो तुमने खो दिए। ऐसे सपने होंगे जो सिर्फ इसलिए अधूरे रह गए क्योंकि दिमाग ने पहले ही
हार मान ली थी। लेकिन यहां एक सवाल पैदा होता है। अगर दिमाग हमें धोखा देता है तो उससे बचा कैसे जाए? [संगीत] जवाब उतना मुश्किल नहीं जितना लगता है। पहला कदम है अपने हर विचार पर विश्वास करना बंद करना। सिर्फ इसलिए कि कोई विचार तुम्हारे दिमाग में आया है। इसका मतलब यह नहीं कि वह सच है। जब तुम्हारा दिमाग कहे तुम नहीं कर सकते तो तुरंत पूछो। सच में या सिर्फ डर बोल रहा है? जब दिमाग कहे सब लोग जज करेंगे तो पूछो। क्या मेरे पास इसका कोई सबूत है? जब दिमाग [संगीत] कहे अभी सही
समय नहीं है तो पूछो। या फिर मैं सिर्फ टाल रहा हूं। यही सवाल इंसान को आजाद करना शुरू करते हैं। [संगीत] क्योंकि सवाल जागरूकता पैदा करते हैं और जागरूकता हर मानसिक कैद की चाबी है। लेकिन ज्यादातर लोग यहां सबसे बड़ी गलती कर देते हैं। [संगीत] वे अपने विचारों से बहस नहीं करते। वे उन्हें आदेश की तरह मान लेते हैं और फिर पूरी जिंदगी उन्हीं आदेशों के हिसाब से जीते रहते हैं। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है। उनकी हिम्मत खत्म हो जाती है। उनकी पहचान सिकुड़ जाती है। और एक दिन वे खुद को वही मान
लेते हैं जो उनका डर उन्हें बताता रहा। लेकिन तुम ऐसा मत करना क्योंकि तुम्हारा दिमाग एक शानदार सेवक है। लेकिन बहुत खतरनाक मालिक। अगर तुमने उसे कंट्रोल नहीं किया तो वो तुम्हारी जिंदगी कंट्रोल करेगा। और अगर तुमने उसे समझ लिया तो वही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि अगले अध्याय में हम उन आदतों का पर्दाफाश करेंगे जो हर दिन [संगीत] चुपचाप तुम्हारी ऊर्जा, तुम्हारा फोकस, तुम्हारा आत्मविश्वास और तुम्हारा भविष्य खा रही हैं। और यकीन मानो [संगीत] उनमें से कुछ आदतें शायद अभी इसी वक्त तुम्हारी जिंदगी का हिस्सा हैं।
चैप्टर तीन वो आदतें जो चुपचाप तुम्हारा भविष्य खा रही हैं। जिंदगी हमेशा एक बड़े धमाके के साथ बर्बाद नहीं होती। बहुत बार जिंदगी धीरे-धीरे टूटती है। [संगीत] इतनी धीरे कि इंसान को पता भी नहीं चलता। कोई एक दिन अचानक असफल नहीं बनता। कोई एक दिन अचानक कमजोर नहीं बनता। कोई एक दिन अचानक अपनी क्षमता नहीं खो देता। यह सब छोटी-छोटी आदतों से शुरू होता है। ऐसी आदतें जो देखने में मामूली लगती हैं। लेकिन समय के साथ वे इंसान का पूरा भविष्य खा जाती हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि यह आदतें दुश्मन की तरह नहीं
आती। यह दोस्त बनकर आती हैं, आराम बनकर आती हैं, मनोरंजन बनकर आती हैं और कभी-कभी तो खुशी बनकर भी आती हैं। लेकिन इनके पीछे की साइकोलॉजी और भी खतरनाक है। क्योंकि यह तुम्हारी जिंदगी को एक बार में [संगीत] नहीं थोड़ा-थोड़ा करके खत्म करती हैं। कल्पना करो एक आदमी हर दिन सिर्फ 1% पीछे जा रहा है। उसे कोई फर्क महसूस नहीं होगा। लेकिन एक साल बाद वह वहां पहुंच जाएगा जहां से वापस आना मुश्किल होगा। यही आदतों का खेल है। छोटे फैसले, बड़े परिणाम और ज्यादातर लोग यहां सबसे बड़ी गलती कर देते हैं। [संगीत] वे बड़े
सपनों पर ध्यान देते हैं, लेकिन छोटी आदतों को नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें लगता है कि सफलता किसी बड़े अवसर से आएगी। जबकि सच्चाई यह है कि सफलता अक्सर उन छोटी चीजों से बनती है जिन्हें कोई [संगीत] देखता भी नहीं। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि अब बात करते हैं उस [संगीत] आदत की जिसने लाखों लोगों का फोकस चुरा लिया है। तुरंत मिलने वाला सुख इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन। [संगीत] दिमाग को सबसे ज्यादा क्या पसंद है? वही चीज जो तुरंत अच्छा महसूस कराएं। फोन स्क्रॉल करना, नोटिफिकेशन [संगीत] चेक करना, बिना वजह वीडियो देखते रहना, गपशप, तुलना
और लगातार मनोरंजन। समस्या यह नहीं कि यह चीजें मौजूद हैं। समस्या यह है कि यह धीरे-धीरे तुम्हारे दिमाग को ट्रेन [संगीत] कर देती हैं कि हर चीज तुरंत मिलनी चाहिए। और जब दिमाग तुरंत इनाम पाने का आदि हो जाता है तब लंबी मेहनत उसे सजा जैसी लगने लगती है। यही वजह है कि लोग सपने तो बड़े देखते हैं [संगीत] लेकिन लगातार काम नहीं कर पाते। क्योंकि सफलता धीरे मिलती है जबकि मनोरंजन तुरंत मिलता है। एक छात्र [संगीत] था उसका सपना था बड़ी परीक्षा पास करना। उसने किताबें खरीदी, टाइम टेबल बनाया, नोट्स तैयार किए। लेकिन हर
बार पढ़ाई शुरू करने से पहले वो सिर्फ 5 [संगीत] मिनट फोन देखने बैठता। फिर 10 मिनट, फिर 30 मिनट, फिर 1 घंटा। धीरे-धीरे दिन खत्म हो जाता और उसे लगता आज मूड नहीं था। कल से शुरू करूंगा। यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा और परीक्षा के दिन उसे समझ आया [संगीत] उसका दुश्मन कठिन परीक्षा नहीं थी। उसका दुश्मन वो छोटी आदत थी जिसे उसने [संगीत] कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। और यही वह सच है जो इंसान बहुत देर से समझता है। जिंदगी [संगीत] अक्सर बड़ी गलतियों से नहीं छोटी अनदेखी आदतों से बर्बाद होती है।
लेकिन असली खेल [संगीत] यहां से शुरू होता है। क्योंकि एक और आदत है जो और भी ज्यादा खतरनाक है। और उसका नाम है लगातार तुलना। कंपैरिजन। आज का इंसान पहले से ज्यादा दुखी क्यों है? जबकि उसके पास पहले से ज्यादा सुविधाएं हैं। क्योंकि आज वह अपनी जिंदगी कम और दूसरों की जिंदगी ज्यादा देखता है। किसी की नई कार, किसी की नौकरी, किसी की सफलता, किसी का रिश्ता, किसी का शरीर, किसी की लाइफ स्टाइल धीरे-धीरे तुलना एक जहर बन जाती है जो आत्मविश्वास को अंदर से खा जाती है। तुम्हारा ध्यान अपने रास्ते से हटकर दूसरों के
रास्ते पर चला जाता है। और जिस दिन इंसान अपना रास्ता भूल जाता है, उसी दिन उसकी प्रगति रुक जाती है। इसी बीच पत्रकार उस रहस्यमई फाइल के अगले हिस्से तक पहुंच चुका था। अब उसे एक नए व्यक्ति की डायरी मिली। वह एक युवा संगीतकार था। बेहद प्रतिभाशाली लेकिन अंदर से टूटा हुआ। डायरी में लिखा था मैं संगीत से प्यार करता हूं। लेकिन हर बार जब किसी और को सफल देखता [संगीत] हूं तो खुद से नफरत होने लगती है। मैं अभ्यास कम और तुलना ज्यादा करता हूं। मैं सीखने से ज्यादा साबित करने की कोशिश करता हूं
और शायद इसी वजह से मैं आगे नहीं बढ़ पा रहा। पत्रकार कुछ देर तक उस पन्ने को देखता रहा क्योंकि यह सिर्फ उस संगीतकार की कहानी नहीं थी। यह पूरी पीढ़ी की कहानी थी। एक ऐसी पीढ़ी जो हर दिन हजारों लोगों की जिंदगी देखती है और फिर अपनी जिंदगी को कम समझने लगती है। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि सबसे खतरनाक आदत अभी बाकी है और वो है टालना। प्रोक्रास्टिनेशन। [संगीत] बहुत लोग सोचते हैं कि वे आलसी हैं। लेकिन अक्सर वे आलसी नहीं होते। वे डरे हुए होते हैं। क्योंकि टालने के पीछे हमेशा आलस
नहीं होता। कई बार डर होता है। असफलता का डर, रिजेक्शन का डर, गलती करने का डर। इसलिए इंसान काम शुरू ही नहीं करता क्योंकि जब तक उसने कोशिश नहीं की तब तक वह खुद को यह कह सकता है अगर कोशिश करता तो सफल हो जाता। यह दिमाग का बहुत चालाक बचाव तंत्र है। वह तुम्हें असफलता से बचाने के लिए कार्रवाई से दूर रखता है। लेकिन उसका परिणाम और भी खतरनाक होता है। धीरे-धीरे अवसर खत्म होने लगते हैं। आत्मविश्वास गिरने लगता है और इंसान अपनी ही नजरों में छोटा होने लगता है। याद रखो अधूरा काम हमेशा
दिमाग में बोझ बनकर रहता है। इसलिए कार्रवाई हमेशा डर से बेहतर होती है। भले छोटी ही क्यों ना हो। लेकिन ज्यादातर लोग यहां सबसे बड़ी गलती कर देते हैं। वे [संगीत] प्रेरणा का इंतजार करते हैं। जबकि सफल लोग कारवाई करते हैं। फिर प्रेरणा खुद पैदा हो जाती है। [संगीत] पहले कदम के बिना कोई रास्ता नहीं खुलता। पहले प्रयास के बिना कोई आत्मविश्वास नहीं आता। पहली असफलता के बिना कोई परिपक्वता नहीं आती और [संगीत] पहली शुरुआत के बिना कोई बदलाव नहीं आता। पत्रकार ने फाइल का अगला पन्ना खोला और वहां सिर्फ एक वाक्य लिखा था। तुम्हारा
भविष्य तुम्हारे बड़े फैसलों से कम और रोज दोहरा जोहराई जाने वाली आदतों से ज्यादा बनता है। वह देर तक उस वाक्य को देखता रहा क्योंकि उसे एहसास हो चुका था कि इंसान की किस्मत अचानक नहीं बदलती। वह [संगीत] धीरे-धीरे बदलती है। हर दिन, हर चुनाव, हर आदत के साथ और शायद तुम्हारी जिंदगी भी इसी नियम पर चल रही है। आज जो आदत छोटी लग रही है, वही कल तुम्हारा भविष्य बनेगी या बर्बाद करेगी। फैसला तुम्हारा है लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि अगले अध्याय में हम उस शक्ति के बारे में बात करेंगे जो एक
साधारण इंसान को असाधारण बना देती है। वही शक्ति जो बिखरे हुए लोगों को पीछे छोड़ देती है। वही शक्ति जो सपनों को हकीकत में बदलती है और उसका नाम है फोकस। लेकिन फोकस सिर्फ ध्यान लगाने का नाम नहीं उसके पीछे एक ऐसी साइकोलॉजी छिपी है जो शायद आज तक [संगीत] तुम्हें किसी ने प्ले नहीं बताई। चैप्टर चार फोकस की ताकत और बिखरे हुए लोगों का सच। अगर मैं तुमसे पूछूं कि इस दुनिया की सबसे कीमती चीज क्या है? तो शायद तुम पैसे का नाम लोगे। कुछ लोग समय कहेंगे, कुछ लोग अवसर। लेकिन सच इन सबसे
अलग है। क्योंकि पैसे खोकर वापस कमाए जा सकते हैं। अवसर खोकर नए अवसर बनाए जा सकते हैं। यहां तक कि कई गलतियों को भी सुधारा जा सकता है। लेकिन एक चीज है जो एक बार बिखर गई तो इंसान धीरे-धीरे अपनी पूरी क्षमता खोने लगता है। और उस चीज का नाम है फोकस। आज की दुनिया में सबसे बड़ी गरीबी पैसों की नहीं है। [संगीत] ध्यान की है। क्योंकि आज हर चीज तुम्हारा ध्यान चुराने के लिए लड़ रही है। तुम्हारा फोन, तुम्हारी स्क्रीन, [संगीत] तुम्हारी नोटिफिकेशन, तुम्हारे आसपास के लोग, तुम्हारे डर, तुम्हारी इच्छाएं और सबसे ज्यादा तुम्हारे
अपने विचार। यही वजह है कि पहले से ज्यादा जानकारी होने के बावजूद पहले से कम लोग अपने सपनों तक पहुंच पा रहे हैं [संगीत] क्योंकि जानकारी बड़ी है लेकिन एकाग्रता घट गई है और यही वह सच है जो इंसान बहुत देर से समझता है। सफल लोग हमेशा ज्यादा बुद्धिमान नहीं होते लेकिन वे अक्सर ज्यादा केंद्रित होते हैं। वे जानते हैं कि किस चीज को ना कहना है और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। सोचो [संगीत] सूरज की रोशनी पूरे दिन धरती पर पड़ती है लेकिन उससे आग नहीं लगती। वहीं अगर उसी रोशनी को
एक लेंस के जरिए एक बिंदु पर केंद्रित कर दिया जाए तो वही रोशनी आग पैदा कर देती है। इंसान का दिमाग भी बिल्कुल ऐसा ही है। बिखरा हुआ दिमाग गर्म तो होता है लेकिन केंद्रित दिमाग दुनिया बदल देता है। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि फोकस का दुश्मन सिर्फ बाहरी दुनिया नहीं है। फोकस का सबसे बड़ा दुश्मन अंदर छिपा होता है और उसका नाम है मानसिक शोर, मेंटल नॉइज़। कभी ध्यान दिया है? तुम किसी काम पर बैठते हो लेकिन दिमाग कहीं और चला जाता है। पुरानी यादें, भविष्य की चिंता, किसी की कही हुई बात,
कोई पुरानी गलती, कोई अधूरी इच्छा और कुछ ही मिनटों में तुम्हारा पूरा ध्यान टूट जाता है। यही मानसिक शोर है और ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी इसी शोर के अंदर बिताते हैं। उन्हें लगता है कि वे काम कर रहे हैं। लेकिन वास्तव में उनका दिमाग लगातार भटक रहा होता है। एक युवा एथलीट था। उसका सपना राष्ट्रीय स्तर पर खेलना था। टैलेंट था, मेहनत भी थी, लेकिन परिणाम नहीं आ रहे थे। उसने कोच से [संगीत] पूछा, "मैं बाकी खिलाड़ियों से पीछे क्यों हूं? कोच ने सिर्फ एक सवाल पूछा, जब तुम [संगीत] अभ्यास करते हो तो तुम्हारा
पूरा दिमाग अभ्यास में होता है या कहीं और? लड़का चुप हो गया क्योंकि उसे जवाब पता था। उसका शरीर मैदान में होता था, लेकिन उसका दिमाग कभी भविष्य में, कभी सोशल मीडिया में, कभी लोगों की राय में, और कभी अपनी असुरक्षाओं में भटकता रहता था। उस दिन उसे समझ आया [संगीत] समय देना और पूरी तरह उपस्थित होना दो अलग चीजें हैं और यही वो अंतर है जो साधारण और असाधारण लोगों के [संगीत] बीच दिखाई देता है। लेकिन असली खेल यहां से शुरू होता है क्योंकि अब हम उस पत्रकार की कहानी पर लौटते हैं जिसकी रहस्यमई
फाइल धीरे-धीरे एक गहरे रहस्य का रूप ले रही थी। उसने अगला दस्तावेज खोला। इस बार डायरी किसी वैज्ञानिक की थी। वर्षों तक रिसर्च करने वाला एक व्यक्ति जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा एक ही लक्ष्य को दिया था। डायरी में लिखा था लोग प्रतिभा की बात करते हैं। लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि मैंने कितनी चीजों को मना किया। उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि मैंने कितने आकर्षण छोड़े, कितनी पार्टियां छोड़ी, कितने आसान रास्ते छोड़े। क्योंकि हर महान उपलब्धि की कीमत ध्यान होती है। पत्रकार कुछ देर तक उस वाक्य को पढ़ता रहा। फिर उसने
अगले पन्ने पर नजर डाली। वहां लिखा था जब तुम हर चीज पाना चाहते हो तब अक्सर कुछ भी नहीं पा पाते क्योंकि ऊर्जा सीमित है, ध्यान सीमित है, जीवन सीमित है और इसी वजह से चुनाव जरूरी [संगीत] हैं। पत्रकार की आंखें धीरे-धीरे खुल रही थी। उसे समझ आने लगा था कि जिंदगी में असफलता हमेशा गलत दिशा में जाने से नहीं आती। कई बार हर दिशा में जाने की कोशिश से भी आती है। आज लाखों लोग इसी जाल में फंसे हुए हैं। वे सब कुछ बनना चाहते हैं। सब कुछ सीखना चाहते हैं। सब कुछ करना चाहते
हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] लेकिन परिणाम यह होता है कि वे किसी एक चीज में गहराई तक नहीं जा पाते और धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास टूटने लगता है। [संगीत] क्योंकि उन्हें लगता है कि वे प्रगति नहीं कर रहे। जबकि असली समस्या उनकी क्षमता नहीं उनका बिखराव होता है। याद रखो हर हां के पीछे एक छिपी हुई [संगीत] ना होती है और हर ना के पीछे एक छिपी हुई हां। जब तुम किसी महत्वपूर्ण लक्ष्य को हां कहते हो तो तुम्हें कई आकर्षणों को ना कहना पड़ता है। यही फोकस की कीमत है और यही फोकस की शक्ति
भी। लेकिन ज्यादातर लोग यहां सबसे बड़ी गलती कर देते हैं। वे प्रेरित तो हो जाते हैं लेकिन प्रतिबद्ध नहीं होते। प्रेरणा भावना है। प्रतिबद्धता निर्णय है। प्रेरणा आती जाती रहती है। प्रतिबद्धता रास्ता बनाती है। जिस दिन इंसान यह अंतर समझ लेता है, उस दिन उसकी पूरी जिंदगी बदल सकती है। क्योंकि फिर वह मूड का इंतजार नहीं करता, वह कारवाई करता है। वह परिस्थितियों का इंतजार नहीं करता। [संगीत] वह दिशा तय करता है। वह भाग्य का इंतजार नहीं करता। वह अपनी ऊर्जा [संगीत] को एक जगह केंद्रित करता है और फिर धीरे-धीरे असंभव दिखने वाली चीजें संभव
होने लगती हैं। पत्रकार ने फाइल का अगला पन्ना खोला और वहां सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी। [संगीत] बिखरा हुआ इंसान हमेशा व्यस्त दिखाई देता है। केंद्रित इंसान हमेशा आगे बढ़ता दिखाई देता है। उसने उस वाक्य को कई बार पढ़ा क्योंकि उसे एहसास हो चुका था कि पूरी फाइल का रहस्य धीरे-धीरे खुल रहा है। हर डायरी, [संगीत] हर कहानी, हर व्यक्ति उसे एक ही दिशा में ले जा रहा था। अपने ऊपर नियंत्रण और शायद यही वह शक्ति [संगीत] थी जिसकी तलाश हर इंसान कर रहा था। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि अंतिम अध्याय [संगीत] में
वह सच सामने आने वाला है जो इन सभी कहानियों को जोड़ता है। वो सच [संगीत] जो डर को हराता है, आदतों को बदलता है, फोकस को मजबूत करता है और इंसान को उसकी असली ताकत से मिलवाता है। क्योंकि आखिरकार सबसे बड़ी जीत दुनिया को हराने में नहीं होती। [संगीत] सबसे बड़ी जीत खुद को जीतने में होती है और अगले अध्याय में यही रहस्य पूरी तरह सामने आने वाला है। चैप्टर [संगीत] पांच जिस दिन तुमने खुद को जीत लिया जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ज्यादातर लोग पूरी जिंदगी दुनिया को बदलने की कोशिश करते
रहते हैं। लेकिन खुद को बदलने की कोशिश बहुत कम लोग करते हैं। कोई परिस्थितियों को दोष देता है। कोई किस्मत को, कोई लोगों को, कोई समय को। और कुछ लोग तो पूरी जिंदगी यह मानकर जी लेते हैं कि उनके साथ जो हुआ वही उनकी पहचान है। लेकिन एक दिन ऐसा आता है जब इंसान को एक बहुत [संगीत] कड़वा सच स्वीकार करना पड़ता है कि उसकी सबसे बड़ी जेल बाहर नहीं अंदर थी। उसके डर, उसकी आदतें, उसके भ्रम, [संगीत] उसके बहाने, उसकी कमजोर सोच, यही उसकी असली कैद थी। और जिस दिन इंसान यह देख लेता है,
उसी दिन उसकी आजादी शुरू होती है। याद करो हमने शुरुआत कहां से की थी? हमने उस दुश्मन की बात की थी जो इंसान के अंदर रहता है। फिर हमने देखा कि दिमाग कैसे झूठ को सच बनाकर पेश करता है। फिर हमने उन आदतों का पर्दाफाश किया जो धीरे-धीरे [संगीत] भविष्य को खा जाती हैं। फिर हमने समझा कि फोकस कैसे साधारण इंसान को असाधारण बना सकता है। लेकिन इन सभी अध्यायों के पीछे [संगीत] एक ही मूल सत्य छिपा था। अगर इंसान खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकता तो वह किसी भी चीज पर नियंत्रण नहीं रख सकता।
लेकिन असली खेल यहां से शुरू होता है। क्योंकि अब सवाल यह नहीं है कि तुम्हें क्या समझ आया? [संगीत] सवाल यह है कि तुम क्या बदलोगे? ज्ञान सुनना आसान है, परिवर्तन कठिन है। वीडियो देखना आसान है, कारवाई करना कठिन है। सपने देखना आसान है, उनके लिए संघर्ष करना कठिन है। और यही वह जगह है जहां ज्यादातर लोग पीछे [संगीत] छूट जाते हैं। वे प्रेरित तो हो जाते हैं, लेकिन बदलते नहीं। वे समझ तो जाते हैं, लेकिन लागू नहीं करते। और कुछ ही दिनों में सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं
हुई। क्योंकि पत्रकार की रहस्यमई फाइल का अंतिम हिस्सा अभी बाकी था। उसने आखिरी दस्तावेज खोला [संगीत] और पहली बार उसे किसी डायरी का पन्ना नहीं मिला। वो एक पत्र था जिस पर कोई नाम नहीं [संगीत] था। कोई तारीख नहीं थी। कोई पहचान नहीं थी। सिर्फ कुछ शब्द लिखे थे। पत्र में लिखा था अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो शायद तुम भी मेरी तरह किसी समय अपने ही दिमाग के कैदी रहे हो। मैंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा डर में बिताया। मैंने मौके खोए, रिश्ते खोए, [संगीत] साल खो दिए क्योंकि मुझे लगता था कि एक
दिन मैं तैयार हो जाऊंगा। लेकिन सच यह है कोई भी [संगीत] कभी पूरी तरह तैयार नहीं होता। एक दिन मुझे समझ आया कि मैं जिंदगी नहीं [संगीत] जी रहा था। मैं सिर्फ इंतजार कर रहा था सही समय का, सही अवसर का, सही आत्मविश्वास का। और इसी इंतजार में मेरी जिंदगी गुजर रही थी। उस दिन मैंने फैसला किया डर रहेगा फिर भी आगे बढूंगा। अनिश्चितता रहेगी फिर भी आगे बढूंगा फिर भी आगे बढूंगा और उसी दिन मेरी जिंदगी बदलनी शुरू हुई। पत्रकार उस पत्र [संगीत] को पढ़कर देर तक चुप बैठा रहा। क्योंकि उसे महसूस हुआ कि
पूरी फाइल का सार एक ही वाक्य [संगीत] में छिपा था। जिंदगी उन लोगों की नहीं बदलती जो इंतजार करते हैं। जिंदगी उन लोगों की बदलती है जो कदम उठाते हैं। चाहे डर के [संगीत] साथ ही क्यों ना उठाएं। पत्रकार ने फाइल बंद की लेकिन उसके अंदर कुछ खुल चुका था। उसे समझ आ गया था कि इंसान की असली ताकत उसके हालात में नहीं होती उसके निर्णयों में होती है। उसकी परिस्थिति में नहीं [संगीत] उसकी प्रतिक्रिया में होती है। उसकी प्रतिभा में नहीं उसकी निरंतरता में होती है। और शायद यही वह जवाब था जिसकी [संगीत] वह
तलाश कर रहा था। लेकिन अब मैं तुम्हें एक आखिरी सवाल पूछना चाहता हूं। अगर आज से 5 साल बाद तुम्हारी जिंदगी बिल्कुल वैसी ही रही जैसी अभी है। तो क्या तुम सच में खुश रहोगे? क्या तुम इस बात से संतुष्ट रहोगे कि तुमने अपने सपनों को सिर्फ सोचा लेकिन कभी उनके लिए लड़े नहीं? क्या तुम यह स्वीकार कर पाओगे कि तुम्हारे अंदर क्षमता थी लेकिन तुमने उसे [संगीत] इस्तेमाल नहीं किया। क्योंकि समय बहुत तेज भागता है। आज जो कल लगता है वह कुछ साल [संगीत] बाद बीता हुआ जीवन बन जाता है। और सबसे बड़ा पछतावा
असफल होने का नहीं होता। सबसे बड़ा पछतावा कोशिश ना करने का होता है। यही वह सच है जो इंसान बहुत देर से समझता है। लोग असफलता से कम टूटते हैं। अधूरे सपनों से ज्यादा टूटते हैं। लोग हार से कम दुखी होते हैं। काश कोशिश की होती [संगीत] इस विचार से ज्यादा दुखी होते हैं। इसलिए आज फैसला करो। छोटा सही [संगीत] लेकिन फैसला करो। एक आदत बदलो। एक डर का सामना करो। एक कदम उठाओ। एक बहाना खत्म करो। क्योंकि जिंदगी अचानक नहीं बदलती। जिंदगी [संगीत] छोटे फैसलों से बदलती है। हर दिन, हर चुनाव, हर कार्यवाही के
साथ। और याद रखो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान वह नहीं जो दूसरों को नियंत्रित कर ले। दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान वो है जो अपने मन को नियंत्रित कर ले। क्योंकि [संगीत] जिसने खुद को जीत लिया उसे हराने के लिए दुनिया के पास कुछ नहीं बचता। और शायद यही वह पल है जहां तुम्हारी पुरानी [संगीत] कहानी खत्म होती है और तुम्हारी नई कहानी शुरू। अब फैसला तुम्हारे हाथ में है। तुम फिर वही इंसान बने रहोगे या वो इंसान बनोगे जिसकी क्षमता का इंतजार तुम्हारी जिंदगी सालों से कर रही है। क्योंकि आखिर में किस्मत नहीं बदलती।
[संगीत] पहचान बदलती है। और जब पहचान बदलती है तो पूरी जिंदगी बदल जाती है। यही अंतिम सच है। और [संगीत] यही तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति भी। और अब इस वीडियो को खत्म करने से पहले मैं चाहता हूं कि तुम कुछ सेकंड के लिए अपनी पूरी [संगीत] जिंदगी को अपने सामने देखो। उन सपनों को देखो जिन्हें तुमने टाल दिया। उन मौकों को देखो जिन्हें तुमने डर की वजह से छोड़ दिया। उन दिनों को याद करो जब तुम [संगीत] जानते थे कि तुम्हें क्या करना चाहिए। लेकिन फिर भी तुमने कुछ नहीं किया। सच यह है कि जिंदगी
किसी एक बड़े फैसले से नहीं बदलती। जिंदगी उन छोटे फैसलों से बदलती है जिन्हें कोई नहीं देखता। [संगीत] जब तुम सुबह उठते हो और बहाने की जगह जिम्मेदारी चुनते हो। जब तुम डर के बावजूद कदम बढ़ाते हो, जब तुम आसान रास्ते की जगह सही रास्ता चुनते हो, तब धीरे-धीरे तुम्हारी पहचान बदलने लगती है। और जब पहचान बदलती है तो किस्मत भी बदल जाती है। याद रखो [संगीत] एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब तुम अपने अतीत की तरफ मुड़कर देखोगे और उस दिन तुम्हारे पास सिर्फ दो विकल्प होंगे। या तो गर्व होगा कि तुमने कोशिश की
या पछतावा होगा कि तुम सिर्फ सोचते रहे। समय कभी रुकता नहीं। जिंदगी कभी इंतजार नहीं करती और सपने कभी खुद चलकर हकीकत नहीं बनते। उन्हें तुम्हारे कदमों की जरूरत होती है। तुम्हारे साहस की जरूरत होती है। तुम्हारे फैसलों की जरूरत होती है। इसलिए जब यह वीडियो खत्म हो तो सिर्फ प्रेरित मत होना। एक फैसला लेना क्योंकि प्रेरणा कुछ घंटों में खत्म हो जाएगी। लेकिन एक सच्चा फैसला तुम्हारी पूरी [संगीत] जिंदगी बदल सकता है। हो सकता है आज कोई तालियां ना बजाए। हो सकता है आज कोई तुम्हें नोटिस ना करे। हो सकता है आज तुम्हारी मेहनत
का कोई परिणाम ना दिखे। लेकिन यकीन मानो हर महान कहानी की शुरुआत उसी दिन हुई थी जिस दिन किसी इंसान ने खुद से कहा था अब और नहीं अब [संगीत] मैं बदललूूंगा। और शायद तुम्हारी जिंदगी का वह दिन आज ही हो। क्योंकि दुनिया को तुम्हारे बहानों की नहीं तुम्हारी क्षमता की जरूरत है और तुम्हारी क्षमता अभी भी तुम्हारे अंदर इंतजार कर रही है। सवाल सिर्फ इतना है क्या इस बार तुम उसे जगाओगे या फिर एक और साल, एक और सपना और एक और मौका खामोशी में खो जाने दोगे? [संगीत] ओम