नमस्कार मैं रवश कुमार वफ काउंसिल में हिंदू सदस्य हो सकते हैं लेकिन क्या आप हिंदू बोर्ड में किसी मुसलमान को सदस्य बनने देंगे सुप्रीम कोर्ट ने सीधा-सीधा सवाल पूछ दिया सरकार से आज सुप्रीम कोर्ट में वफ कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी जिसे करीब 72 सांसदों नागरिकों व्यक्तियों और संगठनों ने दायर किया है कोर्ट ने कहा कि जब कानून पास होता है तो एडमिशन के स्तर पर कोर्ट कानून पर रोक नहीं लगाता अब इसकी सुनवाई 17 अप्रैल को होगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज वफ कानून की सुनवाई के दौरान सरकार
से कानूनी आधार पर जो प्रश्न पूछे लगा नहीं कि सरकार के पास कोई संतोषजनक जवाब था जिस तरह से सरकार संसद के भीतर विश्वास के साथ दावा कर रही थी और अपने सही होने का पक्ष रख रही थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज उन्हीं सवालों को लेकर जो विपक्ष की तरफ से उठाए गए थे सरकार को खूब घेरा केंद्रीय वफ काउंसिल में हिंदू सदस्यों को लेकर चीफ जस्टिस संजीव खन्ना जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने सवाल पूछे चीफ जस्टिस ने यह सवाल कर दिया कि आप बताइए व काउंसिल में हिंदुओं को सदस्य
बना रहे हैं क्या आप हिंदू बोर्ड में मुसलमानों को सदस्य बनाने की इजाजत देने के लिए तैयार हैं जस्टिस कुमार ने पूछ दिया कि हमें उदाहरण तो दीजिए कि क्या तिरुपति बोर्ड में भी गैर हिंदू हैं हिंदुओं के दान कानून के मुताबिक कोई भी बाहरी बोर्ड का हिस्सा नहीं हो सकता जस्टिस विश्वनाथन ने पूछा कि हिंदू एक्ट कहता है कि चैरिटेबल ट्रस्ट की देखरेख हिंदू करेगा तब सॉललीिसिटर जनरल तुषार मेहता कहते हैं कि मैं कोई भी उदाहरण नहीं दे रहा जबकि कोर्ट ने साफ-साफ पूछा कि आप उदाहरण दीजिए कि क्या हिंदू बोर्ड में मुसलमान सदस्य
हो सकता है इसी सवाल को लेकर संसद में कितनी बहस हुई विपक्ष के सदस्यों ने बार-बार पूछा कि कानून का यह कैसा पैमाना है कि मुसलमानों की धार्मिक संपत्ति से संबंधित काउंसिल में दो हिंदू सदस्य होंगे लेकिन हिंदुओं के मठ मंदिर के प्रबंधन में कोई दूसरे धर्म का नहीं हो सकता क्या यह बराबरी का सिद्धांत है जब वहां नहीं होगा तो यहां क्यों रख रहे हैं सत्ता पक्ष से दलील दी जाती रही कि वफ कर देने के बाद संपत्ति धार्मिक नहीं रह जाती व का मामला संपत्ति का है धार्मिक नहीं है यह कहते रहे जबकि
विपक्ष कहता रहा कि यह धार्मिक मामला है जिस तरह से कानून हिंदुओं के धार्मिक मामले में होने चाहिए वैसा ही कानून मुसलमानों के धार्मिक मामले में होने चाहिए तो सरकार की तरफ से कहा जाता रहा कि वक्त का मामला धार्मिक नहीं है 17 अप्रैल को देखना है कि सरकार गैर मुस्लिम सदस्यों के बारे में अदालत को अपने जवाब से संतुष्ट कर पाती है या नहीं याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील राजीव धवन कपिल सिब्बल अभिषेक मनोज सिंघवी चंद्र उदय सिंह और हुजैफा अहमदी दलील पेश कर रहे थे कपिल सिब्बल ने कहा कि वफ कानून संविधान
के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है यह अनुच्छेद हर धार्मिक समुदाय को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता देता है तब सरकार कैसे तय कर सकती है कि वफ केवल वही कर सकता है जो पिछले 5 साल से इस्लाम का पालन कर रहा है राज्य कैसे तय कर सकता है राज्य कौन है तय करने वाला कि मैं मुसलमान हूं या नहीं और इसलिए वफ बनाने के योग्य हूं या नहीं अगर मैं जन्म से मुसलमान हूं तो मैं क्यों करूंगा जो मेरा पर्सनल कानून है वही तो लागू होगा यह सब दलील कपिल सिब्बल दे
रहे थे उन्होंने कहा कि हम उस प्रावधान को चुनौती देते हैं जिसमें कहा गया है कि केवल मुसलमान ही वफ बना सकते हैं एक और वरिष्ठ वकील हैं चंद्र उदय सिंह उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 26 को देखते समय इसमें अंतर करना चाहिए कि धार्मिक क्या है और धर्मार्थ क्या है हुजैफा अहमदी ने कहा कि वफ कानून की धारा तीन आर इस्लाम के पालन पर जोर देती है इससे उनका मौलिक अधिकार प्रभावित होता है राजीव धवन ने कहा कि इस्लाम की जो अपनी व्यवस्था है उसके खिलाफ है या कानून अभिषेक मनु सिंघवी ने अनुच्छेद 32 पर
जोर देने की बात की कहा व कानून इसलिए बनाया गया है कि लोग सरकारी अधिकारी के पास दौड़ते रहे सरकार की तरफ से सॉललीिसिटर जनरल तुषार मेहता कहते रहे कि कानून पर विचार विमर्श हुआ है संसद की संयुक्त समिति बनाई गई है और कितने लाख लोगों के सुझाव मांगे गए सब पर विचार हुआ उसके बाद कानून लाया गया जो इस वक्त कोर्ट के सामने पेश है जिस पर सुनवाई चल रही है लेकिन कोर्ट की तरफ से जो सवाल उठाए गए उस पर तुषार मेहता पहले दौर में संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए देखते हैं 17 अप्रैल
को क्या जवाब देते हैं एक बड़ा सवाल और था वफ बाय यूजर का कई लोग इस पहलू को ठीक से समझ नहीं पाते चीफ जस्टिस संजीव खन्ना के सवाल से यह मसला और साफ होता है सरल तरीके से होता है चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने पूछा कि वफ कानून से वफ बाय यूजर क्यों हटाया गया मान लीजिए अगर कोई मस्जिद 14वीं और 15वीं सदी से है वफ की जमीन पर बनाई गई है लेकिन उसके पास कोई रिकॉर्ड तो है नहीं ऐसे में अभी तक क्या होता था वफ बाय यूजर के तहत मान लिया जाता था
कि मस्जिद है 14वीं सदी से है 15वीं सदी से है तो वफ की जमीन है अब अगर सरकार दावा करने लग जाए कि अब मेरी जमीन है तो क्या हो जाएगा कोर्ट का यह सवाल था चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कहा इससे तो गंभीर स्थिति पैदा हो जाएगी चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने पूछा कि ऐसी संपत्तियों को आप कैसे रजिस्टर करेंगे उनके पास क्या दस्तावेज होंगे वफ बाय यूजर मान्य किया गया है अगर आप इसे खत्म करते हैं तो समस्या होगी संसद में बहस के दौरान इस मुद्दे पर भी खूब सवाल उठे विपक्ष के सदस्यों
ने सरकार से आग्रह किया कि जगह-जगह पर वक्त की जमीन को लेकर बवाल हो जाएगा तरह-तरह के दावे होंगे ऐसा मत कीजिए अशांति फैल जाएगी लेकिन सरकार ने संतोषजनक जवाब आज कोर्ट में नहीं दिया 17 अप्रैल को देखते हैं कि इस पहलू पर सरकार की तरफ से क्या ठोस जवाब आता है और अदालत उससे संतुष्ट होती है या नहीं वफ बाय यूजर के मसले पर सरकार की तरफ से सॉललीिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें रजिस्ट्रेशन करवाना होगा किसी ने उन्हें ऐसा करने से नहीं रोका 1995 के कानून में भी यह अनिवार्य था कपिल
सिब्बल ने कहा कि यह इतना आसान मामला नहीं है वफ सैकड़ों साल पहले किया गया है क्या आप 300 साल पुरानी संपत्ति की वफ डीड मांगेंगे इस तरह तो रजिस्ट्रेशन नहीं होने पर मुतव्ली को जेल जाना पड़ जाएगा इस पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कहा जो उपयोग चल रहा है यानी जो चला आ रहा है वही माना जाएगा उन्होंने कहा कि कानून में साफ लिखा है कि कलेक्टर का फैसला कोर्ट के दायरे में आएगा कलेक्टर का फैसला कोर्ट से ऊपर नहीं है इसका मतलब यही हुआ वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा वफ बाय
यूजर हटाने से एक झटके में सब कुछ खत्म हो जाएगा यानी जिस जमीन पर सदियों से मस्जिद है जिसे वफ बाय यूजर के नियम के तहत मान्यता मिल जाया करती थी अब उस पर कोई भी दावा कर देगा सरकार का हो सकता है फिर इसके वफ होने पर ही सवाल उठेगा इस्तेमाल के आधार पर आप नया वफ घोषित नहीं कर पाएंगे क्योंकि नए कानून के अनुसार सदियों से इस्तेमाल हो रहा है या काफी नहीं होगा जमीन का दस्तावेज पेश करना होगा सिब्बल और सिंघवी दोनों ने कहा कि राम जन्मभूमि के फैसले में इस मान्यता को
स्वीकार किया गया है क्या आपने फैसले के उस हिस्से को अब हटा दिया है यह बड़ा सवाल था सुप्रीम कोर्ट ने आज कोई फैसला नहीं दिया है लेकिन चीफ जस्टिस की बेंच की तरफ से जो सवाल उठे उससे लगता है कि संसद के बाद सरकार को यहां भी संतुष्ट करना आसान नहीं होगा चीफ जस्टिस ने कह दिया कि कलेक्टर का फैसला कोर्ट के दायरे में आएगा इस पर कपिल सिब्बल ने वफ कानून को चैलेंज करते हुए कहा कि इसमें सरकार का अवसर होगा यही अपने आप में असंवैधानिक है सरकार यह घोषित कर सकती है प्रॉपर्टी
उनकी है लेकिन इसकी कोई समय सीमा नहीं आप कह रहे हैं विवाद की स्थिति में एक अफसर जांच करेगा जो सरकार का होगा यह असंवैधानिक है इसका मतलब यही हुआ कि जो सरकार का होगा वह हमेशा सरकार का ही पक्ष लेगा अगर मामला लंबे समय तक चल जाता है तो कितने समय तक लोग इंतजार करेंगे ठीक है कि यह मामला कोर्ट में जाएगा कलेक्टर के आदेश को चुनौती दी जा सकती है लेकिन अगर कलेक्टर पंच बन जाएगा तो वह सरकार का ही पक्ष पक्ष लेगा और यह मामला लंबे समय तक खींचा जा सकता है एक
पहलू था कि किसी संरक्षित विरासत के बारे में की गई घोषणा अब बेअसर हो जाएगी सिब्बल ने इस आधार पर भी चुनौती दी कि अगर किसी वफ की जमीन को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित कर दिया तो उस पर वफ का अधिकार खत्म हो जाएगा इस बात पर चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा तर्क सिब्बल के पक्ष में ही जाता दिखता है अगर ऐतिहासिक इमारत घोषित होने से पहले ही वह वफ घोषित हो गई है तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा वह संपत्ति वफ की ही रहेगी आपको इस पर चुनौती नहीं देनी चाहिए केवल तभी चुनौती
मानी जा सकती है जब यह कहा जाए कि संरक्षित घोषित होने के बाद उसे वफ नहीं माना जा सकता है जामा मस्जिद समेत सभी ऐतिहासिक इमारतें संरक्षित रहेंगी तो एक और बड़े पहलू पर कोर्ट की राय से नजरिया साफ हो जाता है वफ की बहस दिलचस्प मोड़ ले रही है इसके कानूनी पहलू पर नजर रखिए चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने बंगाल के मुर्शिदाबाद की हिंसा पर भी नाराजगी जताई और कहा कि जब मामला कोर्ट के सामने है तब यह सब नहीं होना चाहिए था वक कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 72 याचिकाएं दायर हुई हैं
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोहित्रा राजद सांसद मनोज कुमार झा समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्ग कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी आम आदमी पार्टी के नेता अमानुल्लाह खान ने चुनौती दी है इसके अलावा एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स जमीयत उलेमा-ए हिंद अंजुम कादरी तैयब खान सलमानी मोहम्मद शफी ने भी याचिका दी है और छह बीजेपी शासित सरकारों ने भी कानून के समर्थन में याचिका दायर की है हरियाणा राजस्थान मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ असम और महाराष्ट्र इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना जस्टिस पीवी संजय कुमार और
जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ कर रही है इस पूरी बहस की रिपोर्टिंग से यही साफ होता है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने कुछ बड़े सवाल तो हैं और गंभीर सवाल हैं मुसलमानों के धार्मिक कार्य से जुड़े बोर्ड में गैर मुस्लिम सदस्य क्यों होने चाहिए क्या हिंदू बोर्ड में मुसलमान हो सकते हैं दूसरा सवाल है व बाय यूजर का एक और सवाल है 5 साल से इस्लाम का पालन करने वाला ही वक्फ कर सकता है या क्यों जरूरी है और बड़ा सवाल यह भी है कि अलाल औलाद का वफ करने से पहले बेटियों को हक देना
होगा इस पर सिब्बल ने तर्क दिया कि यह तय करने वाला राज्य यानी स्टेट कौन होता है इस्लाम में वसीयत मरने के बाद लागू होता है उससे पहले हस्तक्षेप नहीं कर सकते सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 26 सेकुलर कानून है यह सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है तो 17 अप्रैल की बहस का इंतजार कीजिए और YouTube पर रवश कुमार ऑफिशियल देखते रहिए नमस्कार मैं रवीश कुमार