वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम एक शब्द एक मंत्र है। एक ऊर्जा है। एक स्वप्न है। एक संकल्प है वंदे मातरम ये एक शब्द मां भारती की साधना है मां भारती की आराधना है वंदे मातरम एक शब्द हमें इतिहा इतिहास में ले जाता है। यह हमारे आत्मविश्वास को हमारे वर्तमान को आत्मविश्वास से भर देता है और हमारे भविष्य को यह नया हौसला देता है कि ऐसा कोई संकल्प नहीं। ऐसा कोई संकल्प नहीं जिसकी सिद्धि ना हो सके। ऐसा कोई लक्ष्य नहीं जो हम भारतवासी पा ना सके। साथियों वंदे मातरम के सामूहिक गान का
यह अद्भुत अनुभव यह वाकई अभिव्यक्ति से परे हैं। इतनी सारी आवाजों में एक लय एक स्वर, एक भाव, एक जैसा रोमांच, एक जैसा प्रवाह। ऐसा तारतम्य, ऐसी तरंग इस ऊर्जा ने हृदय को स्पंदित कर दिया है। भावनाओं से भरे इसी माहौल में मैं अपनी बात को आगे बढ़ा रहा हूं। मंच पर उपस्थित कैबिनेट के मेरे सहयोगी गजेंद्र सिंह शेखावत दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी, अन्य सभी महानुभाव भाइयों और बहनों आज हमारे साथ देश के सभी कोने से लाखों लोग जुड़े हुए हैं। मैं उनको भी मेरी तरफ से वंदे मातरम से
शुभकामनाएं देता हूं। आज 7 नवंबर का दिन बहुत ऐतिहासिक है। आज हम वंदे मातरम के 150 वें वर्ष का महा उत्सव मना रहे हैं। यह पुण्य अवसर हमें नई प्रेरणा देगा। कोटि-कोटि देशवासियों को नई ऊर्जा से भर देगा। इस दिन को इतिहास की तारीख में अंकित करने के लिए आज वंदे मातरम पर एक विशेष कॉइन और डाक टिकट भी जारी किए गए हैं। मैं देश के लक्षावधि महापुरुषों को मां भारती के संतानों को वंदे मातरम इस मंत्र के लिए जीवन खपाने के लिए आज श्रद्धा पूर्वक नमन करता हूं और देशवासियों को इस अवसर पर बहुत-बहुत
शुभ बधाई देता हूं। मैं सभी देशवासियों को वंदे मातरम के वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं भी देता हूं। साथियों हर गीत हर काव्य का अपना एक मूल भाव होता है। उसका अपना एक मूल संदेश होता है। वंदे मातरम का मूल भाव क्या है? वंदे मातरम का मूल भाव है। भारत मां भारती की शाश्वत संकल्पना वो संकल्पना जिसने मानवता के प्रथम पहर से खुद को घटना शुरू कर दिया। जिसने युगों युगों को एक एक अध्याय के रूप में पढ़ा। अलग-अलग दौर में अलग-अलग राष्ट्रों का निर्माण अलग-अलग ताकतों का उदार नई नई
सभ्यताओं का विकास शून्य से शिखर तक उनकी यात्रा और शिखर से पुनः शून्य में उनका विलय बनता बिगड़ता इतिहास दुनिया का बदलता भूगोल भारत ने यह सब कुछ देखा है। इंसान की इस अनंत यात्रा से हमने सीखा और समयसमय पर नए निष्कर्ष निकाले। हमने उनके आधार पर अपनी सभ्यता के मूल्यों और आदर्शों को तराशा। उसे घड़ा। हमने हमारे पूर्वजों ने, हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने, हमारे आचार्यों ने, भगवंतों ने, हमारे देशवासियों ने अपनी एक सांस्कृतिक पहचान बनाई। हमने ताकत और नैतिकता के संतुलन को बराबर समझा और तब जाकर भारत एक राष्ट्र के रूप में वो
कुंदन बनकर उभरा जो अतीत की हर चोट सहता भी रहा और सहकर भी अमर अमरत्व को प्राप्त कर गया। भाइयों बहनों भारत की संकल्पना उसके पीछे की वैचारिक शक्ति है। उठती गिरती दुनिया से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व बोध की उपलब्धि और लयबद्ध लिपिबद्ध होना, लयबद्ध होना और तब जाकर के हृदय की गहराई से अनुभवों के निचोड़ से संवेदना की असीमता को प्राप्त कर करके वंदे मातरम जैसी रचना मिलती है। और इसलिए गुलामी के उस कालखंड में वंदे मातरम इस संकल्प का उद्घोष बन गया था और वो उद्घोष था भारत की आजादी का मां भारती के
हाथों से गुलामी की बेड़ियां टूटेगी और उसकी संताने स्वयं अपने भाग्य की भाग्य विधाता बनेगी। साथियों गुरुदेव रविंद्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था बंकिम चंद्र की आनंदमठ केवल उपन्यास नहीं है। यह स्वाधीन भारत का एक स्वप्न है। आप देखिए आनंद मठ में वंदे मातरम का प्रसंग वंदे मातरम की एक एक पंक्ति के बंकिम बाबू के एक एक शब्द के उसके हर भाव के अपने गहरे निहितार्थ थे निहितार्थ है यह गीत गुलामी के कालखंड में रचना तो जरूर हो गई उस समय लेकिन उसके शब्द कुछ वर्षों की गुलामी के साए में कभी भी कैद नहीं
रहे। वह गुलामी की स्मृतियों से आजाद रहे। इसलिए वंदे मातरम हर दौर में हर कालखंड में प्रासंगिक है। इसने अमरता को प्राप्त किया है। वंदे मातरम की पहली पंक्ति है। सुजलाम सुखलाम मलय शीतलाम सलाम मातरम अर्थात प्रकृति के दिव्य वरदान से सुशोभित हमारी सुजलाम सुफलाम मातृभूमि को नमन। साथियों यही तो भारत की हजारों साल पुरानी पहचान रही है। यहां की नदियां, यहां के पहाड़, यहां के वन, वृक्ष और यहां की उपजाऊ मिट्टी यह धरती हमेशा सोना उगलने की ताकत रखती है। सदियों तक दुनिया भारत की समृद्धि की कहानियां सुनती रही थी। कुछ ही शताब्दी पहले
तक ग्लोबल जीडीपी का करीब एक चौथाई हिस्सा भारत के पास था। लेकिन भाइयों बहनों जब बंकिम बाबू ने वंदे मातरम की रचना की थी। तब भारत अपने उस स्वर्णिम दौर से बहुत दूर जा चुका था। विदेशी आक्रमण आक्रमणकारियों ने उनके हमले लूटपाट अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियां उस समय हमारा देश गरीबी और भूखमरी के चंगुल में करार रहा था। तब भी बंकिम बाबू ने उस बुरे हालात के स्थितियों में भी चारों तरफ दर्द था, विनाश था, शोक था। सब कुछ डूबता हुआ नजर आ रहा था। ऐसे समय बंकिम बाबू ने समृद्ध भारत का आह्वान किया क्योंकि
उन्हें विश्वास था कि मुश्किलें कितनी भी क्यों ना हो भारत अपने स्वर्णिम दौर को पुनर्जीवित कर सकता है और इसलिए उन्होंने आहान किया वंदे मातरम। साथियों गुलामी के उस कालखंड में भारत को नीचा और पिछड़ा बताकर जिस तरह अंग्रेज अपनी हुकूमत को जस्टिफाई करते थे। इस प्रथम पंक्ति ने उस दुष्प्रचार को पूरी तरह से ध्वस्त करने का काम किया। इसलिए वंदे मातरम केवल आजादी का गान ही नहीं बना बल्कि आजाद भारत कैसा होगा। वंदे मातरम ने वह सुजलाम सुफलाम सपना भी करोड़ों देशवासियों के सामने प्रस्तुत किया। साथियों आज ये दिन हमें वंदे मातरम की असाधारण
यात्रा और उसके प्रभाव को जानने का अवसर भी देता है। जब सन 1875 में बंकिम बाबू ने बंग दर्शन में वंदे मातरम प्रकाशित किया था। तो कुछ लोगों को लगता था कि यह तो केवल एक गीत है। लेकिन देखते ही देखते वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता संग्राम का कोटि कोटि जनों का स्वर बन गया। एक ऐसा स्वर जो हर क्रांतिकारी की जबान पर था। एक ऐसा स्वर जो हर भारतीय की भावनाओं को व्यक्त कर रहा था। आप देखिए आजादी की लड़ाई का शायद ही ऐसा कोई अध्याय होगा जिससे वंदे मातरम किसी ना किसी रूप से
जुड़ा नहीं था। 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने कोलकाता अधिवेशन में वंदे मातरम गाया। 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ। यह देश को बांटने का अंग्रेजों का एक खतरनाक एक्सपेरिमेंट था। लेकिन वंदे मातरम उन मंसूबों के आगे चट्टान बनकर के खड़ा हो गया। अंगाल के विभाजन के विरोध में सड़कों पर एक ही आवाज थी। वंदे मातरम। साथियों बड़ी साल अधिवेशन में जब आंदोलनकारियों पर गोलियां चली तब भी उनके होठों पर वही मंत्र था, वही शब्द थे। वंदे मातरम। भारत के बाहर रहकर आजादी के लिए काम कर रहे वीर सावरकर जैसे स्वतंत्र सेनानी वो जब आपस
में मिलते थे तो उनका अभिवादन वंदे मातरम से ही होता था। कितने ही क्रांतिकारियों ने फांसी के तख्त पर खड़े होकर भी वंदे मातरम बोला था। ऐसी कितनी ही घटनाएं इतिहास की कितनी ही तारीखें इतना बड़ा देश अलग-अलग प्रांत और इलाके अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग उनका आंदोलन लेकिन जो नारा जो संकल्प जो गीत हर जबान पर था जो गीत हर स्वर में था वो था वंदे मातरम। इसलिए भाइयों बहनों 1927 में महात्मा गांधी ने कहा था वंदे मातरम हमारे सामने संपूर्ण भारत का ऐसा चित्र उपस्थित कर देता है जो अखंड है। श्री अरविंदों ने
वंदे मातरम को एक गीत से भी आगे उसे एक मंत्र कहा था। उन्होंने कहा एक ऐसा मंत्र है जो आत्मबल जगाता है। पिकाजी कामा ने भारत का जो ध्वज तैयार करवाया था उसमें बीच में भी लिखा था वंदे मातरम। साथियों हमारा राष्ट्रध्वज समय के साथ कई बदलावों से गुजरा। लेकिन तब से लेकर आज तक हमारे तिरंगे तक देश का झंडा जब भी फाड़ता है तो हमारे मुंह से अनायास निकलता है। भारत माता की जय। वंदे मातरम। इसलिए आज जब हम उस राष्ट्र गीत के 150 वर्ष मना रहे हैं तो ये देश के महान नायकों के
प्रति हमारी श्रद्धांजलि है और ये उन लाखों बलिदानियों को भी श्रद्धा पूर्वक नमन है जो वंदे मातरम का आह्वान करते हुए फांसी के तख्त पर झुलते हुए जो वंदे मातरम बोलते हुए घोड़ों की मार सहते रहे जो वंदे मातरम का मंत्र जपते हुए बर्फ की सिल्लियों पर अडीग रहे। साथियों आज हम 140 करोड़ देशवासी ऐसे सभी नाम अनाम गुमनाम राष्ट्र के लिए जीने मरने वालों को श्रद्धांजलि देते हैं। जो वंदे मातरम कहते हुए देश के लिए बलिदान हो गए। जिनके नाम इतिहास के पन्नों में कभी दर्ज नहीं हो पाए। साथियों हमारे वेदों ने हमें सिखाया
है माता भूमि ही पुत्रो अहम पृथ्वी। अर्थात यह धरती हमारी मां है। यह देश हमारी मां है। हम इसी की संताने हैं। भारत के लोगों ने वैदिक काल से ही राष्ट्र की इसी स्वरूप में कल्पना की। इसी स्वरूप में आराधना की। इसी वैदिक चिंतन से वंदे मातरम ने आजादी की लड़ाई में नई चेतना फकी। साथियों राष्ट्र को एक जियो पॉलिटिकल एंटिटी मानने वालों के लिए राष्ट्र को मां मानने का विचार है भरा हो सकता है। लेकिन भारत अलग है। भारत में मां जननी भी है। और मां पालनहारिणी भी है। अगर संतान पर संकट आ जाए
तो मां संहारकारिणी भी है। इसलिए वंदे मातरम कहता है अब केनए तबले बहुबल धारिणी नमामि तारिणी रिपुल वारिणी वंदे मातरम वंदे मातरम अर्थात अपार शक्ति धारण करने वाली भारत मां संकटों से पार भी कराने वाली और शत्रुओं का विनाश भी कराने वाली है। राष्ट्र को मां और मां को शक्ति स्वरूपा नारी मानने का यह विचार। इसका एक प्रभाव यह भी हुआ कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम स्त्री पुरुष सबकी भागीदारी का संकल्प बन गया। हम फिर ऐसे भारत का सपना देख पाए जिसमें महिला शक्ति राष्ट्र निर्माण में सबसे आगे खड़ी दिखाई देगी। साथियों वंदे मातरम आजादी के
परवानों का तराना होने के साथ ही इस बात की भी प्रेरणा देता है कि हमें इसे आजादी की रक्षा कैसे करनी है। अंकिम बाबू के पूरे मूल गीत की पंक्तियां है। तम ही दुर्गा दस प्रहरण धारिणी कमला कमल दल बिहारिणी वाणी विद्या दायिनी नमामि तम नमामि कमलाम अमलाम अतुलम सुजलाम शुभलाम मातरम वंदे मातरम अर्थात भारत माता विद्या दायिनी सरस्वती भी है, समृद्धि दायिनी लक्ष्मी भी है और अस्त्र-शस्त्रों को धारण करने वाली दुर्गा भी है। हमें ऐसे ही राष्ट्र का निर्माण करना है। जो ज्ञान विज्ञान और टेक्नोलॉजी में शीर्ष पर हो जो विद्या और विज्ञान की
ताकत से समृद्धि के परी शीर्ष पर हो और जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर भी हो। साथियों बीते वर्षों में दुनिया भारत के इसी स्वरूप का उदय देख रही है। हमने विज्ञान और टेक्नोलॉजी की फील्ड में अभूतपूर्व प्रगति की है। हम दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरे। और जब दुश्मन ने आतंकवाद के जरिए भारत की सुरक्षा और सम्मान पर हमला करने का दूसाहत किया तो पूरी दुनिया ने देखा नया भारत मानवता की सेवा के लिए अगर कमला और विमला का स्वरूप है तो आतंक के विनाश के लिए 10 प्रहरण धारणी दुर्गा भी बनना जानता
है। साथियों वंदे मातरम से जुड़ा एक और विषय है जिसकी चर्चा करना उतना ही आवश्यक है। आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम की भावना ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया था। लेकिन दुर्भाग्य से 1937 में वंदे मातरम के महत्वपूर्ण पदों को उसकी आत्मा के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। वंदे मातरम को तोड़ दिया गया था। उसके टुकड़े किए गए थे। वंदे मातरम के इस विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बो दिए थे। राष्ट्र निर्माण का यह महामंत्र इसके साथ ये अन्याय क्यों हुआ? यह आज की पीढ़ी को भी जानना जरूरी
है क्योंकि वही विभाजनकारी सोच देश के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है। साथियों, हमें इस सदी को भारत की सदी बनाना है। यह सामर्थ्य भारत में है। यह सामर्थ्य भारत के 140 करोड़ लोगों में है। हमें इसके लिए खुद पर विश्वास करना होगा। इस संकल्प यात्रा में हमें पथ भ्रमित करने वाले भी मिलेंगे। नकारात्मक सोच वाले लोग हमारे मन में शंका संदेह पैदा करने का प्रयास भी करेंगे। तब हमें आनंद मठ का वह प्रसंग याद करना है। आनंद मठ में जब संतान भवानंद वंदे मातरम गाता है तो एक दूसरा पात्र तर्क वितर्क करता है
वह पूछता है कि तुम अकेले क्या कर पाओगे? तब वंदे मातरम से प्रेरणा मिलती है। जिस माता के इतने करोड़ पुत्र पुत्री हो उसके करोड़ों हाथ हो वो माता अबला कैसे हो सकती है आज तो भारत माता की 140 करोड़ संतान है उसके 280 करोड़ भुजाएं हैं। इनमें से 60% तो से भी ज्यादा तो नौजवान है। दुनिया का सबसे बड़ा डेमोग्राफिक एडवांटेज हमारे पास है। यह सामर्थ्य इस देश का है। यह सामर्थ्य मां भारती का है। ऐसा क्या है जो आज हमारे लिए असंभव है? ऐसा क्या है जो हमें वंदे मातरम के मूल सपने को
पूरा करने से रोक सकता है? साथियों आज आत्मनिर्भर भारत के विजन की सफलता मेक इन इंडिया का संकल्प और 2047 में विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ते हमारे कदम देश जब ऐसे अभूतपूर्व समय में नई उपलब्धियां हासिल करता है तो हर देशवासी के मुंह से निकलता है वंदे मातरम मातरम। आज जब भारत चंद्रमा के साउथ पोल पर पहुंचने वाला पहला देश बनता है। जब नए भारत की आहट अंतरिक्ष सुदूर कोने तक सुनाई देती है तो हर देशवासी कह उठता है वंदे मातरम। आज जब हम हमारी बेटियों को स्पेस टेक्नोलॉजी से लेकर स्पोर्ट्स तक में
शिखर पर पहुंचते देखते हैं। आज जब हम बेटियों को फाइटर जेट उड़ाते देखते हैं तो गौरव से भरा हर भारतीय का नारा होता है वंदे मातरम। साथियों आज ही हमारे फौज के जवानों के लिए वन रैंक वन पेंशन लागू होने के 11 वर्ष हुए हैं। जब हमारी सेनाएं दुश्मन के नापाक इरादों को कुचल देती है। जब आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवादी आतंक की कमर तोड़ी जाती है। तो हमारे सुरक्षा बल एक ही मंत्र से प्रेरित होते हैं और वो मंत्र है वंदे मातरम। साथियों मां भारती के वंदन की यही स्पिरिट हमें विकसित भारत के लक्ष तक ले
जाएगी। मुझे विश्वास है वंदे मातरम का मंत्र हमारी इस अमृत यात्रा में मां भारती की कोटि-कि संतानों को निरंतर शक्ति देगा, प्रेरणा देगा। मैं एक बार फिर सभी देशवासियों को वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं और देश भर से मेरे साथ जुड़े हुए आप सबसे धन्यवाद करते हुए मेरे साथ खड़े होकर के पूरी ताकत से हाथ ऊपर करके बोलिए वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम बहुत-बहुत धन्यवाद