जय लक्ष्मी मैया की हे लक्ष्मी माता मेरे घर को हमेशा भरा पूरा रखना भले ही मैंने आपको 56 भोग नहीं चढ़ा रहा मगर कम से कम यह घी के लड्डू ही स्वीकार कर लो साहूकार पूजा की थाली सजाकर बोलता है अरे राजू इधर आ जरा तुझे कितनी बार समझाया है कि सिर्फ एक ही लड्डू लाना है महंगाई इतनी बढ़ गई है और तू बेफिजूल के खर्चे कर रहा है घी का एक लड्डू ₹ का आता है ₹ का इसे मैं दो दिन में आधा आधा भोग लगता हूं आज तू दो लड्डू क्यों लाया है मालिक
हलवाई के पास छुट्टे पैसे नहीं थे तो उसने रप के दो लड्डू दे दिए अरे यह सब कस्टमर को ठगने के नुस्खे हैं जितना बोलूं उतना ही लाया कर अब मैं तेरी तनख्वा से पा रुपए काट लूंगा मैंने दो लड्डू नहीं मंगाए थे यह तू खुद लाया है इसकी सजा तुझे भुगतनी होगी पर पर मालिक तभी दरवाजे पर एक भिखार आती है भैया जी मेरी मदद कर दो मेरी बेटी बहुत बीमार है और दवाइयों के लिए पैसे तक नहीं है मैं बहुत गब हूं मालिक कुछ पैसे दे दो आपका बहुत उपकार होगा चल हट यहां
से रोज सुबह-सुबह कहां-कहां से यह भिखारी आ जाते हैं जब खर्चा ना उठा पाओ तो बच्चे पैदा ही क्यों करते हो तेरा बच्चा मरे या जिए मुझे इससे क्या मतलब कहीं और जाकर पैसे मांग यहां कोई धर्मशाला नहीं खोल रखी है मैंने हां साहूकार पूजा पर ध्यान लगाते हुए तो मैं कहां था हम हां लक्ष्मी मां को लड्डू का भोग लगा रहा था अरे यह लड्डू तो जमीन पर गिर गया लगता है आज लक्ष्मी मां को भोग नहीं लगा पाऊंगा कोई बात नहीं यह गिरा हुआ लड्डू मैं ही खा लेता हूं देवी लक्ष्मी यह सब
देख रही थी और साहूकार के इस क्रूर व्यवहार से नाराज हो गई साहूकार बहुत निर्दय बहुत स्वार्थी है मैं यहां अब और नहीं रुक सकती देवी लक्ष्मी साधारण श्री के रूप में पैदल मार्ग पर चले जा रही थी तभी उन्हें वहां पर बैठा हुआ एक नाव वाला मिला भाई साहब क्या आप मुझे नदी पार करवा सकते हैं मुझे जल्दी से अपने स्थान पर लौटना है लेकिन मेरे पास देने के लिए कोई धनराशि नहीं है हां बहुत जल्दी में लग रही हैं कोई बात नहीं आप मुझे पैसे बाद में दे देना मैं आपको अभी नदी पार
करवा देता हूं वैसे आप रहते कहां हैं मैं नदी पार पहाड़ों पर रहती हूं नाव वाला मन ही मन सोचता है आज सुबह से एक भी सवारी नहीं मिली काम चलाना मुश्किल हो रहा है घर का राशन भी खत्म हो गया है और बच्चों की स्कूल की फीस भी सर पर है उधर जैसे ही देवी लक्ष्मी नाव में बैठी अचानक नदी के पानी में कमल खिल उठे नाव वाला यह देखकर हैरान हो गया अरे यह क्या आपके स्पर्श से नदी के जल में कमल खिल गए हैं लक्ष्मी मां नाव वाले के मन में चल रही
व्यथा समझ लेती है यह नाव वाले को देखो इसके जीवन में धन की कमी है इसके बावजूद इसके मन में उदारता भरी हुई है और दूसरी तरफ वो सेठ जिसके पास सब कुछ होते हुए भी वो इतना लालची है बेटा तुम बहुत उदास दिखाई दे रहे हो अपने मन की बात मुझसे कहो मैं बहुत गरीब हूं मां परिवार का गुजारा मुश्किल से कर पाता हूं मेरी पत्नी और एक बेटा है आज सुबह से ही सवारी की तलाश में हूं पर कोई नहीं मिला मेरे बेटे की स्कूल की फीस भरनी है समझ नहीं आ रहा कि
पैसे कहां से लाऊं बेटा चिंता मत करो सदैव अच्छे कर्म करते रहो इंसान के जीवन में अच्छे कर्म ही उसका साथ देते हैं देखना तुम रे दुख के दिन जल्द ही दूर हो जाएंगे माता नदी का किनारा आ गया अब आप आराम से उतर जाइए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया मैं अब चलती हूं जैसे ही देवी लक्ष्मी नाव से उतरी नाव अचानक सोने का हो जाता है यह देख मोहन की आंखें खुली की खुली रह जाती हैं अरे यह कैसे हो गया मेरी नाव मेरी नाव सोने की हो गई यह कोई साधारण औरत नहीं यह तो स्वयं
देवी लक्ष्मी थी मां मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई मैं आपको पहचान नहीं पाया मुझ माफ कर दो मां मुझे माफ कर दो मोहन जैसे ही अपनी आंखें बंद करता है वह बूढ़ी औरत उसे देवी लक्ष्मी के रूप में दिखाई देती है पुत्र तुमने निस्वार्थ भावना से मेरी मदद की तुमने मेरी परीक्षा में सफलता पाई है जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है उस पर मेरी कृपा हमेशा बनी रहती है मांगो तुम्हारी जो भी इच्छा हो मां मुझे बस इतनी शक्ति देना कि मैं मेहनत करके अपने परिवार का पालन पोषण कर सकूं और आपका आशीर्वाद
सदैव तेरे परिवार पर बना रहे आज से मैं स्वयं तुम्हारे घर में निवास करूंगी तुम्हारे घर में हमेशा धन और शांति बनी रहेगी तथास्तु मोहन जब आंखें खोलता है तो अपने सोने के नाव पर सोने से भरी के थैली पाता है अब देवी लक्ष्मी की कृपा से नाव वाले मोहन की गरीबी दूर हो गई और उसका जीवन खुशियों से भर गया दूसरी ओर देवी के घर से चले के बाद सेठ का घर दरिद्र आ गई उसकी सारी धन संपत्ति खत्म हो गई महिमापुर नामक गांव में मनमोहन नाम का एक धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था जो नियम
से पूजा पाठ करता था उसके घर के पास एक पीपल का पेड़ था जिस पर वह रोज पानी डालता था उस पेड़ पर मां लक्ष्मी का निवास था जो ब्राह्मण की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी सहायता करने का निश्चय करती है एक दिन लक्ष्मी जी एक कन्या के रूप में मनमोहन के समक्ष प्रकट होती है मनमोहन ने अचानक पेड़ से एक कन्या को उतरते देखा तो उसे आश्चर्य हुआ बेटी तुम कौन हो यहां क्या कर रही हो मेरा नाम विभा है पिताजी तुमने मुझे पिता कहा पर मैं तो तुम्हारा पिता नहीं हूं मेरा इस दुनिया
में कोई नहीं है मैं आपको रोज पीपल पर पानी चढ़ाते पूजा पाठ करते देखती हूं इसलिए आपको पिता कहां है पिताजी क्या मैं आपके घर चल सकती हूं मनमोहन उसकी बात सुनकर सोच में पड़ गया और मन ही मन बोला मैं इसे अपने घर कैसे ले जा सकता हूं मेरे तो पहले ही छह बेटिया हैं किसी तरह रूखा सू खा खाकर गुजारा करना पड़ता है इसे घर ले गया तो क्या खिलाऊंगा यह कैसे वह सब खा पाएगी विभा हर दिन वही प्रश्न करती लेकिन मनमोहन उसकी बात अनसुनी कर लौट आता इस कारण मनमोहन का खाना
पना छूट गया और उसका स्वास्थ्य गिरने लगा उसकी पत्नी पुष्पा ने देखा कि वह परेशान है और ठीक से भोजन नहीं कर रहा है सुनो जी आप कुछ दिनों से परेशान दिखाई दे रहे हैं ठीक से भोजन भी नहीं करते हैं कौन सी चिंता आपको खाई जा रही है पुष्पा मैं जब भी पीपल पर पानी चढ़ाने जाता हूं पीपल के पेड़ पर से एक कन्या उतरती है वह मुझे बड़े प्यार से पिताजी कहकर बुलाती है और साथ आने का आग्रह करती है पर मैं उसे कैसे अपने साथ ला सकता हूं जबकि मेरे यहां इतना अभाव
है इसके लिए परेशान होने की क्या बात है हमारी छह बेटियां हैं वह आएगी तो सात हो जाएंगी उसने आपको पिताजी कहा है तो वह हमारी बेटी हो गई ऐसे भी बेटियाओं अपना भाग्य लेकर आती है आप उसे कल घर ले आइए एक व्यक्ति के आने से कोई अनर्थ नहीं हो जाएगा बेटी तुम रोज आग्रह करती हो आज मैं तुम्हें अपने घर लेकर चलता हूं मनमोहन विभा को अपने घर लेकर आया विवाह के घर में कदम रखते ही ब्राह्मण का भाग्य बदलने लगा उसे अधिक मात्रा में भिक्षा मिलने लगी पुष्पा इस कन्या के आने से
मेरी भिक्षा में बहुत वृद्धि हुई है पहले जहां एक कटोरा अनाज मिलता था अब बोरी भर अनाज मिल रहा है यह विभ तो मानो लक्ष्मी का अवतार है पर वह कहां है सारी बेटियाओं तो बाहर खेल रही वह रसोई में भोजन तैयार कर रही है मना करने पर भी नहीं मानती मैंने कहा आग से हाथ जल जाएंगे पर उसे कोई परवाह नहीं सबका भोजन वही बना रही है तब तो मैं हाथ धोकर आता हूं विभा के हाथ की गर्म गर्म रोटियां खाऊंगा इधर विभा भोजन बना रही थी विभा जिस चीज को हाथ लगाती उसकी मात्रा
बढ़ जाती उसने ढेर सारा स्वादिष्ट भोजन तैयार किया और सब मिलकर खाने बैठे विभा तुम्हारे हाथ में तो जादू है भोजन करके मन तृप्त हो गया तब एक रोटी और ले लीजिए पिताजी और थोड़ी दाल भी सब भोजन करके उठे ही थे तभी पुष्पा का भाई माधव वहां आ गया माधव भैया आप इस वक्त यहां आप बैठिए मैं पानी लेकर आती हूं इधर कुछ काम से आया था इसलिए सोचा तुमसे मिलता चलूं सिर्फ पानी से काम नहीं चलेगा मैं तो भोजन भी करूंगा बहुत भूख लगी है क्यों नहीं आप बैठिए तो सही पुष्पा के चेहरे
पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई पड़ने लगी क्योंकि रसोई में भोजन बचा नहीं था विभा ने मां के चेहरे को पढ लिया क्या बात है मां आप परेशान दिखाई पड़ रही हैं विभा तेरे मामा आए हैं वे भोजन करना चाहते हैं पर रसोई में तो कुछ बचा नहीं है उन्हें क्या खिलाएंगे आप चिंता ना करें सब प्रबंध हो जाएगा विभा ने रसोई में जाकर छुटकी बजाते ही भोजन बना लिया और माधव को परोस दिया माधव ने पेट भरकर भोजन किया और कुछ देर में चला गया रा त हुई तो विभा सोने जाने लगी मां दिया
जलाकर कोठरी में रख दो मैं वहीं सोंगी पर तुम तो छोटी हो अकेली कैसे सोगी मां चिंता मत करो मुझे कुछ नहीं होगा मुझे डर नहीं लगता विभा मां को समझाकर सोने चली गई आधी रात में विभा के रूप में लक्ष्मी देवी ने उठकर कोठरी के चारों तरफ नजर घुमाई उनकी दृष्टि फिरते ही पूरी कोठरी हीरे जवाहरात सोने चांदी और अनाज के मटको से भर गई अब वह अपने असली रूप में आ कर कोठरी से बाहर जाने लगी उनके पदचाप से मनमोहन की नींद खुल गई आंखों के सामने प्रत्यक्ष लक्ष्मी जी को खड़ा देखकर वह
उनके पैरों में गिर पड़ा आप लक्ष्मी का रूप धारण कर मेरे घर में रही और हमें पता तक ना चला आप हमें माफ कर दीजिए नहीं पुष्पा भी उठ गई हमसे कुछ अपराध हुआ हो तो क्षमा कीजिए नहीं कोई भूल नहीं हुई तुम दोनों ने तो मेरी बहुत सेवा की मैं तो तुम लोगों से बहुत प्रसन्न हूं तुम रोज मेरी भक्ति पूजा अर्चना करते थे तभी तो मैं खुश होकर तुम्हारे घर आई तुम लोग तो सबकी भलाई करते हो मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा तुम्हें जीवन में धन दौलत की कोई कमी नहीं होगी तुम
लोग शांति से जीवन यापन करो यह कहकर देवी लक्ष्मी अदृश्य हो गई लक्ष्मी देवी अपने भक्तों पर हमेशा कृपा करती है