उमा राम स्वभाव ज जाना इसने उस परमात्मा राम का स्वभाव जाना फिर उसका भजन किए बिना उसे रहा नहीं जाएगा वोह परमात्मा ऐसे सत स्वरूप है ज्ञान स्वरूप है कर्म के नियामक है कर्म के प्रेरक है कर्म के फल दता है और पतियों के पति है और अपने आत्म स्वरूप में बैठे आप उन्हे पति ना मानो फिर भी वो पति है स्त्री तो बोलती डावर्स दे दो चलो आप हमारे पति नहीं है लेकिन वो पतियों के पति से आप डायवर्स भी नहीं ले सकते चलो हम तुम्हारी बात नहीं मानते तुम्हारी प्रेरणा की कोई जरूरत नहीं
आप मनमानी करो फिर देखो थप्पड़ खाते हो उसकी प्रेरणा झक मार के मानते हो आप उसको पति उसके उसका पति पना से मुकर नहीं सकते वो ऐसा पति है आप उसके गुरु पन का त्याग नहीं कर सकते हो बाह्य गुरु का त्याग करके दूसरा गुरु कर सकते हो लेकिन वह परमेश्वर गुरुओं का भी गुरु है ईश्वर का भी ईश्वर है ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती माता सभी का वह माताओं की माता है पिता का पिता है उसे आत्मा ब्रह्म कहते हैं उसका कोई पिता नहीं उसकी कोई माता नहीं उसका कोई पति नहीं फिर भी भक्तों के
भाव को संपन्न करने के लिए वह किसी का बेटा बन जाता है किसी का सेवक बन जाता है किसी का सखा बन जाता है दिखने भर को है जैसे अर्जुन का सेवक बन गए सखा बन गए दिखने भर को थे अर्जुन की आज्ञा भी मान लेकिन फिर भी अर्जुन का भी वह पति है आखिर अर्जुन शरण में पड़े जिसमें मेरा कल्याण हो गई परीक्षित कथा सुनते सुनते एक सवाल उभार लाए के सुखदेव जी महाराज को प्रार्थना की के भगवान महादेव विरक्त भूत्र माते उनके पास कोई संपदा नहीं लेकिन उनके भक्त उनके आराधना करते तो ऐश्वर्य
संपद आ जाती और भगवान विष्णु लक्ष्मी पति है ऐश्वर्य के भंडारों के भंडार उनके एक पलक मात्र में लहराते ते लेकिन विष्णु के भक्त विष्णु की पूजा करने वाले दरिद्र पाए जाते और शिव को मानने वाले धना हो जाते ऐश्वर्य वान हो जाते सुखदेव जी ने कहा कि यही सवाल तुम्हारे दादा युधिस्टर ने भी पूछा था भगवान शिव जागृत स्वप्न सुषुप्ति इन तीनों के अहंकार के अधिष्ठाता तीनों गुणों के और भगवान नारायण विशुद्ध सत्व में इसलिए जो उनकी उपासना करते हैं तो उनको ऐश्वर्य मिलता है और भगवान कहते जो मेरी उपासना करते उनका ऐश्वर्य चिनक
में स्वयं मिलने के लिए उनको विघ्न बाधाओं में डाल परिपक्व करता हूं अपना आप दे देता हूं जिसको ईश्वर चाहिए उसको अहि ऐश्वर्य की विशेष वासना ही नहीं रहती और जिसको अहि वासना चाहे व निर्वासन शिव का चिंतन करे और जिसको ईश्वर चाहिए निर्वासन स वासनिक से पार नारायण का चिंतन करें अथवा तो पतियों का पति जो विष्णु होकर बैठा है और शिव होकर बैठा है वही मेरा आत्मा परमात्मा है उसमें डूबे तो फिर जैसा भी प्रारब्ध हो ऐश्वर्य का प्रारब्ध हो तो ज्ञानी के जीवन में ऐश्वर्य आ जाएगा पक्कड़ साय का प्रारब्ध हो तो
फक्कड़ शही आ जाएगी जैसे सुखदेव जी फक्कड़ शही प्रारब्ध वाले सुख त्यागी कृष्ण भोगी जनक राघव नरेंद्रा वशिष्ठ कर्म निष्ट सर्वेशम ज्ञानी नाम समान मुक्ता सुखदेव जी त्यागी कृष्ण तो द्वारकाधीश जनक मिथिला नरेश राम अयोध्यापति वशिष्ठ जी कर्म निष्ठ है सुख त्यागी कृष्ण भोगी जनक राघव नरेंद्र वशिष्ठ कर्म निष्ट सर्वे शम ज्ञानी नाम समान उस पतियों के पति परमात्मा में विश्रांति पाई तो सामर्थ्य आएगा लेकिन विश्रांति का भोगी ना बने सामर्थ्य असमर्थ को जो जानता है वह कौन है मैं कौन हूं इसको खोजे अग गहरे जाए आम आदमी के लिए हम कह देते कि 10
माला रोज जपना 10 प्राणायाम करना लेकिन इसी जन्म में पतियों के पति से आत्मदेव से ईश्वर से मिलना हो तो फिर गांधी जी के ना गांधी जी रात को जग जाते तो फिर उनका मानसिक जप चलता दिन में भी प्रार्थना करते कामकाज से फग होते तो राम की शांति में पतियों के पति में गोता मार देते तभी मोहनलाल बापू जी हो गए जो सबके बाप से मिलते हैं शांत भाव से वो बापू जी बनते नहीं तो बेटा जी रह जाते जहां पर सण पिर जो जहा पिरन संधी पचार तिन बिनी धार कादर शल कखे ना
करे या तो उस परमात्मा की लीला को निहारो गहराई या तो फिर परमात्मा में शांत और उस पतियों के पति को अपने आत्म रूप में देखो काम बन जाएगा आपका तो मंगल होगा आपका सानिध्य लेने वालों का मंगल होने लगेगा मंगला नाम पि मंगलम मंगलो को तीर्थों को भी तीर्थ देने वाला सामर्थ्य उस साधक में आ जाएगा तीर्थ बन जाएगा वो तीथ को तीर्थ देने वाला जैसे ज्ञानेश्वर महाराज तीर्थों को तीर्थ देने वाले हम उसी में डूबेंगे उसी में शांति पाएंगे ओम ओम वह पति आनंद स्वरूप है वह पति ओम स्वरूप है वह पते आत्मा
स्वरूप है ओम शांति [संगीत] ओम ओम शांति ओम ओम आनंद ओम नमो भगवते वासुदेवाय नारायण आनंद माधुर्य सभी नाम उस पति [संगीत] के भजता प्रीति पूर्वक जो मुझे भजता है प्रीति पूर्वक ददा मि बुद्धि योगम तम ओम आनंद ओम नमो भगवते वासुदेवाय ये पति का नाम [संगीत] है नारायण ये पति पति का नाम है विश्व पति का नाम [संगीत] है ईश्वर के ईश्वर का नाम है देवों के देवों का नाम है ओम आनंद ओम प्रभु आप प्रीति करते जाओ ना मायों के पति तो है लेकिन भाइयों के भी जो पति है देवताओं के भी जो
पति है पहलवानों के भी जो पति है और पहलवानों के पतियों के पति जो है अखाड़ा पतियों के भी पति सभापति के भी पति हम उसमें शांत हो रहे शाबाश मूरख हदय न चत मूरख ढोल पशु और ना न के बिना नहीं सुधारते वो पतियों का पति ना जाने क्या क्या करके सुधार [संगीत] है ओम आनंद ओम नमो भगवते [संगीत] वासुदेवाय अष्टदल कमल नारियों का झुंड हृदय कमल मुरझाया हुआ पड़ा होता है का साधक जब गुरु मंत्र जपता है प्राणायाम करता है प्रीति पूर्वक जब करता है तो धीरे धीरे हृदय कमल खिल जाता है जैसे
कमल जल में रहते जल से ऊपर ऐसे वो साधक संसार में रहते हुए संसार के दुखों से आकर्षणों से ऊपर उठ जाता है उसका चि मधुर शांति आनंद ओम आनंद प्रभु गोविंदा वासुदेवा आनंद देवा माधुर्य देवा प्रभु जगतपति सभापति हों के पति लोक पतियों के [संगीत] पति तेरी जय हो तेरा कोई पति नहीं पालते थ पति ही सबका पालन पोषण पाद तिथ पति पतन से बचा ने वाले पति तो सच सचमुच में पति था हमारा दाढ़ी मछ वालों का हम पतन के रास्ते जाते तो तू रोकता था दिल में धड़कने बढ़ाता था जो पतन से
रोके व पति जो पालन पोषण की प्रेरणा दे पाले पोशे व पति दुनिया के पतियों के पति ईश्वर के ईश्वर देवों के देव मारा वालड़ा मेरे प्यारे आनंद देवा माधुर्य देवा शांति देवा ओ प्रीति देवा पति हाड मास के शरीरों के पति पन तो देख लिए लेकिन तू तो विश्व पति है पतियों का पति है पति का शरीर त पति है जब तक तेरी चेतना है नहीं तो फिर मुर्दा बेचारा सभापति भी तब तक सभापति है जब तक तेरी सच्चे पति की चेतना है लोकपति भी तब तक लोकपति जब तक तेरी चेतना और सूज बूझ
नहीं तो लोकपति भी मुर्दा ओ सच्चे पति हम जान गए पिया को पहचान गए रे हो मेरे पति मारा वालड़ा [संगीत] आनंद देवाय माधुर्य [प्रशंसा] देवाय होय [संगीत] होए ग्वाल और गोपियां कहती कि धरा का विषय विकारों का तो सुख हमने देख लिया स्वर्ग का अमृत नहीं चाहिए धरा का अमृत नहीं चाहिए हमें अपना अधरा मृत का पान करो धरती धरा जो धरा का ना हो वो अधरा मृत का पान कराओ पति ने कहा अच्छा बंसी बजाऊंगा जो पात्र होंगे वे सुन पाएंगे और उनको ही पिलाऊंगी का निमित्त किया शरद पुनम की [संगीत] रात वैसे
ही मन खिलने की रात सभी पर्मों से विशेष पुण विशेष आनंद अलाद बरसाने वाली शरद पूर्णिमा की रात पसंद की बंसी बजाई और उस ओमकार को बंसी के द्वारा फूंकार और निगाहों से अपना आनंद बरसाया और ग्वाल गोपियां अधरा मृत का पान करने लगे कोई डोलने लगे कोई गहराई में खो गए नाचने लगे कोई चुप्पी में खो गए तो कोई आद में उत्सव मनाने लगे अपनी भावनाओं का कईयों की आंखों में विर के आंसू तो कईयों के चित में आनंद का उल्लास कईयों की मति की गति गति दता में ही डूब गई तो कईयों की
[संगीत] मति मत मता तरों से पार होकर मति के रस में तृप्ति का एहसास करने [संगीत] लगी तेरी बंसी में गजब का जादू हे जगतपति तेरी प्रीति में जगत का [संगीत] जाद गाय चारा चरना भूल गई और कान खड़े बछड़े दूध पीना भूल गए और निहार रहे गोपी जो इंद्रियों के द्वारा रस को पीने की कला जाने उसे गोप और गोपी कहते योगी तो समाधि करके गुफ पीता है आत्म रस लेकिन वे बंसी बचते ही सभी गोपिया हो गए गोपी इंद्रियों के द्वारा पी रही है उस परमेश्वर मस्ती को परमेश्वर शांति को गोपियों में सरलता
थी पुजवा का अहम नहीं था हम गुरु बने हम विशेष बने हमारे चेले चपा हो ऐसी जिसकी वासना है वह भगवान से दूर फेंका जाता है फि उनकी खुशी वासना का रूप ले लेती उनकी सरलता कपट का रूप ले लेती उनका सहज आत्म सुख दूसरों की खुशामद का गुलाम बन जाता है वो कितना आदमी लाचार है कि किसी की खुशामद से अपने को सुखाए किसी की मेहरबानी पर अपना सुख टिका हो कोई धन दे कोई मान दे कोई वस्तु दे और फिर हम सुखी रहे व आदमी कितना कंगाल है गोपियां ऐसी कंगाल से पार थी
उनका समर्पण था अपने सतगुरु के प्रति सत्य स्वरूप में वे अपना अहम मिटाने में तैयार हो गई थी तू तेरा उरांगन दे दे में अमृत की वर्षा कर दूं तू तेरा अहम दे दे मैं मेरा पति स्वभाव का रस भर दूं जगतपति ने भर दिया रस लख लख प्यारिया भर भर पिए चढ़े न मस्ती नैन एक बूंद उस पति की मस्त करे दिन रहन आनंद है माधुर्य है खुशखबरी है सिंहस्थ महा सिंहस्थ परम सिंहस्थ का फायदा मिल [संगीत] प्राचीन काल में इसीलिए लोग आते थे कि ऐसे महापुरुष मिल जाए जो जगतपति के साथ खेलते हो
और हमें भी जगतपति के रस से रसा कर दे पुण्य लाभ करके फिर सत्संग लाभ ध्यान लाभ अमृत लाभ करते थे व देवदान वाला कुंड तो व तो मंथन से और झगड़े से बटा था लेकिन यहां तो ध्यान और भजन और प्रीति से हर दिल में छलका या जाता है यह वह कुंभ [संगीत] है स्वर्ग का अमृत तो पुण्य नाश करता है और सागर का अमृत तो कलह के बाद पीने को मिलता है सत्संग अमृत में जो पतियों के पति का प्रसाद है वो तो शांति भक्ति और प्रीति वालों को में पिलाया जाता [संगीत] है
निगरा होता हीय का अंधा खूब करे संसार का धंधा पड़े नरक की खान सुन लो चतुर सुजान निगरा नहीं रह य सगुर साधक इस अमृत के अधिकारी होते हैं ओम ओम आनंद ओम ओम [संगीत] माधुर्य तुम ये बोल दो कि है भोजन हे व्यंजन तुम्हारे बिना हमारा शरीर दुर्बल हो सकता है लेकिन हमारे बिना तुम सड़ जाओगे बदबू से भर जाओगे हमें तुम्हारी इतनी गुलामी नहीं आवश्यकता जितनी तुम्हें हमारी जरूरत है तुम व्यंजनों के या भोजन के दास नहीं हो भोजन भी तुम्हारा दास होना चाहिए तुम जगत की वस्तुओ के दास मत बनो जगत की
वस्तु भी तुम्हारी दास तभी उनकी कीमत है अगर तुम उनको स्वीकार नहीं करते हो तो उस भूमि की कीमत क्या जब तुम उसको महत्व देते हो तो रुप गज की भूमि 100 रप हजार रप दोज और 5000 और 100 हज के गज की हो जाती अगर खरीदार नहीं तो उस भूमि की कीमत क्या अभी तुम नहीं हो तो फिर सिंहस्थ की एक खे कक जमीन की कीमत क्या थी व 00 हजार रुप भीगा लाख रुपए बजा 8 हजार का भीगा इतने का भीगा अभी आए तो अनमोल हो गया तो क्योंकि तुम्हारा पति का चैतन्य का
स्वभाव ही ऐसा है कि जिसको स्वीकार करता है वह बांस भी कन्हैया ने स्वीकार किया तो बंसी अनमोल हो [संगीत] गई कोई जानता नहीं था लेकिन तुमने खरीद कर अनमोल बना दिया है बस तुम उसी के हो जाओ वो तुम्हें ले ले तुम्हारे मन को खरीद ले तुम्हारी मति को खरीद ले तुम्हारा पति तुम अनमोल हो [संगीत] जाओगे ओम आनंदम ओम आनंदम ओम माधुर्य ओम ओम ओम ओम आनंदम ओम नंदम ओम माधुर्य ओम ओम [संगीत] ओम ओम आनंदम ओम आनंदम ओम माधुर्य ओम ओम ओम ओम आनंदम ओम आनंदम ओम आनंदम ओम ओम ओम ओम आनंदम
ओम आनंदम ओम आनंदम ओम ओम ओम ओम माधुर्य ओम माधुर्य ओम माधुर्य ओम ओ [संगीत] ओम ओम नमो भगवते वासुदेवा वासुदेवाय आनंद देवाय आनंद देवाय माधुर्य देवाय माधुर्य देवाय ओम नमो भगवते वासुदेवा दुखी हम नहीं हुए दुखी मन हुआ उसको हमने देखा सुखी हम नहीं हुए सुखी भी मन हुआ उसको हमने देखा हम तो असंग रहे दुख आए सुख आए बीमारिया आई तंदुरुस्ती हे गुरु कृपा तुमने निहाल कर दिया तेरा बदला क्या चुका है गुरु कृपा मां त मेरे हृदय में सदा निवास [संगीत] करियो ओम नमो भगवते वासुदेवाय इष्ट देवाय इट देवाय आनंद देवाय आनंद
देवाय माधुर्य देवाय देवा ओम नमो भगवते [संगीत] वासुदेवाय गीता में भगवान ने कहा प्रसादे सर्व दुखा नाम हानि रसोप जायते प्रसन्न चेत सोयास बुद्धि परते उस आत्मा परमात्मा के प्रस साथ से सारे दुखों का अंत हो जाता है और बुद्धि उस परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाती है तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठित उसकी प्रज्ञा मना मति परमात्मा शांति में परमात्मा ज्ञान में प्रतिष्ठित हो जाती फिर उसकी प्रज्ञा को मन घसीट के इंद्रियों के हवाले और संसार के दुखों में नहीं ले जाता उसी उसकी प्रज्ञा निर्लेप रहती है और मन प्रज्ञा के अनुरूप चलता है और इंद्रिया संयत
रहती है वो जीते जी दुखों से परेशानियों से मुक्त रहता है विघ्न बाधा और व्यवहार में होते हुए भी अपने चित्त में पीड़ा का वह अनुभव नहीं करता ऐसे पुरुष के लिए अष्टावक्र संहिता में लिखा है कि तस्य तुलना के न जाए थे उस धीर शिव स्वरूप ब्रह्म ज्ञानी महापुरुष की तुलना तुम किससे करोगे उस महापुरुष के हृदय का जो प्रसाद है उस प्रसाद से अपने चित्त को एकाकार करना अथवा जो उद्देश्य है उस उद्देश्य के लिए उनसे एकाकार होना तो उस उद्देश्य की पूर्ति हो जाएगी जैसे एकलव्य धनुर विद्या का उद्देश्य लेकर गुरु मूर्ति
का ध्यान करता है और धनुर विद्या में इतना निशान बाज हो गया कि भकते हुए कुत्ते के मुंह में सात बा छोड़ दिए बाण के ऊपर लीरी बांध दी जैसे मुंह डबल रोटी हो गया भर गया कुत्ता ना भोक सकता है ना उसको चोट लगती अर्जुन ने जब देखा तो अर्जुन दंग रह गया गुरु ने एकलव्य को अर्जुन को दिया हुआ वचन के कारण एकलव्य को कहा कि तेरा गुरु कोने बोले गुरु जी आपने आश्रम में रहने से मना की मैंने मन ही मन आपको गुरु मान लिया यहां कीय मूर्ति बनाई है आपका एक आकार
ध्यान करता हूं आप धन और विद्या के परात है तो आपकी विद्या मुझे प्रेरणा मैं ऐसा सख तो गुरु किया तो दक्षिणा तो दे भाई बोले गुरु जी आज्ञा कीजिए बोले तुम्हारे दाए हाथ का अंगूठा दे एक लव्य गया कुटीर में भील था धड़क से अंगूठा काट के पत्ते पर बढ़ के पत्ते पर लाकर धर दिया आंखों में आंसू है हृदय में भाव क्या अंगूठा काटने की पीड़ा हो रही नहीं व तुझे बोले गुरु जी नहीं अंगूठा की पीड़ा इतनी नहीं है पीड़ा यह हो रही है कि गुरु जी के काम में पूरा नहीं आया
खाली थोड़ा सा अंगूठा काम आया भगवान राम और कृष्ण आते तो भी गुरु के काम आने के लिए सेवा करते मैं अभागा केवल अंगूठा ही दे पाया पूरा मुझे गुरु ने नहीं स्वीकारा गुरु का हृदय पसी जा बेटे धनुर विद्या में तो अन को मैंने वचन दिया था कि तू अद्वितीय होगा लेकिन तू ध्यान मू मूलम गुरु मूर्ति में इतना आगे बढ़ा कि अर्जुन तेरे आगे नन्हे हो गए तो मैं अपने वचन की रक्षा के लिए तेरे सेय कठोर दीक्षा मांगी बेटा भले धनुर विद्या में अर्जुन आगे है लेकिन गुरु और शिष्य की परंपरा में
संत महात्मा जहां भगवान की चर्चा करेंगे वहां तेरी ख्या करेंगे पुत्र तू इतना अमर हो गया तो उस गुरु के वचन को अभी भी देखो कितना बल मिला तो यह गुरुओं का वचन सामर्थ्य कहां से आता है जो गुरुओं का गुरु परमात्मा देव है उस परमात्मा में जो टिकते हैं जो इस मंत्र के अर्थ में विश्रांति पाते हैं उनका बोला हुआ वचन प्रकृति में पत्थर पर लकीर हो जाता है शरीर में ऐसे ऐसे केंद्र है जहा जिन केंद्र पर आप थोड़ा सा स्थित होकर संकल्प करो तो संकल्प अकाट्य हो जाए शरीर में ऐसे केंद्र है
अभी विज्ञानियों को मिल रहा है विज्ञान अब योग विद्या के तरफ खोज कर रहा है उन्होंने कहा कि यह स्टमक का माइंड है पेट का मस्तक है सूर्य केंद्र हमारे ऋषियों ने तो लाखों वर्ष पहले कहा मुला स्व अधिष्ठान केंद्र जो है मणिपुर केंद्र है ऊर्जा का केंद्र है कितना भी पेट की खराबी हो शरीर की गड़बड़े हो यह वह हो पांच सात तुलसी के पत्ते चबा के खा लो घूंट भर पानी पी लो थोड़ा लेटे फिर घूमे फि फिर लेट जाओ दोनों नथु से शवास लो होठों को सीटी बजाने की अवस्था में रख के
जैसे ऐसे करते [संगीत] ऐसे ऐसे ठ कर दी दोनों नथु से श्वास लिया लेटे लेटे शरीर को शिथिल कर दिया और लेटे लेटे शवास लिया इतना लिया इतना लिया के फिर से नाभी केंद्र तक भर गए दोनों हाथों की उंगलियां आमने सामने नाभि के और कोनिया धरती पर पड़ी आपने श्वास भरा और और आप भावना करें कि मेरा सूर्य केंद्र जागृत पेट का जो मस्तक जैसा है मुख्या है वह हमारा सबल हो 10 सेकंड ऐसा किया विचार रोगों को दोषों को सारी तमाम बीमारियां पेटों पेट से ही तो सार शरीर में पसार होती है तो
जो दोष है पेट में बीमारियों के कण है रा है उसको उखाड़कर हम वायु के द्वारा बाहर फेंक रहे फिर मुंह के द्वारा आप निकाले सूक्ष्म नजर रखेंगे तो कुछ दिनों के बाद उस रोग के कणों के रंग भी आपको देखेंगे आजकल तो कैमरा डेवलप हुए हैं फोटो में भी वह आपके रोग के रंग दिखाई देते उसके मेरा में गिलियन फोटोग्राफी उसी समय आपका फोटो निकालकर बता सकती है कि आपके शरीर के कौन से कौन से रंग रोम कुपो से निकल रहे हैं आपको कौन सा रोग हो सकता है या है अथवा आपका प्रभाव कैसा
है किलियन फोटोग्राफी के द्वारा भी अनुमान कर रहे हैं ऐसे लोग मेरे पास आए थे कलकाता में बड़ा आग्रह किया कि बापू आपका फोटो लेने दो इतने लोग आपके पीछे हैं तो क्या रहस्य है तो हमने दिया उनको तो उन्होंने बताया कि फलानी आ ऐसा सब वो कुछ सब सराना करने लगे होता रहता है तो आप जब जब करते हैं तो आपकी ऊर्जा रा सात्विक होती है आपके अंदर ईश्वरीय चुंबकत्व जागृत होता है रोग प्रतिकारक शक्ति जागृत होती है अनुमान शक्ति जागृत होती है समाज शक्ति जागृत होती शौर्य शक्ति जागृत होती तो हर मंत्र का
अपना प्रभाव है जैसे टेलीफोन सेल्यूलर आपके पास इतना सा है और 10 नंबर है लेकिन उस नंबरों को भिन्न-भिन्न ढंग से दबाने से भिन्न-भिन्न जगह पर भिन्न-भिन्न एरिया भिन्न-भिन्न कंट्री भिन्न-भिन्न दुकान ऑफिसर कार्यालय में आदि में घंटी बजती है जब छोटा सा सेल्यूलर के नंबर घुमाने की रीत अगर आप जानते हो तो दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए मित्र से बात कर सकते हो ठीक मंत्रों का भी ऐसा है कि आप उसकी विधि जानो तो ब्रह्मांड में अपने इष्ट के साथ आप संबंध स्थापित कर सकते हो उसमें संदेह करना काफर काम है मूर्ख
का संशय नहीं करना चाहिए मंत्र जप में चार बातें अगर आपके पास हैं तो आप बड़े धनी है बाहर से कंगाल व्यक्ति दिखता हो फिर भी महा धनी एक तो उसको श्रद्धा जितनी जोरदार उतना फायदा जोरदार दूसरी तत्परता तीसरा संयम और चौथी एकाग्रता जितने अंश में है उतना वह व्यक्ति मंत्र जगत का अद्भुत फायदा लेने का अधिकारी है श्रद्धा तत्परता संयम और एकाग्रता उसके साथ मंत्र विज्ञान को जानने वाला महापुरुष मिल जाए उस महापुरुष की भी साधना में गति हो और वह महापुरुष जब आपको मंत्र दीक्षा दे तो अपने परब्रह्म परमात्मा में और उन केंद्रों
में गोता मार के फिर मंत्र दे तोवह मंत्र चेतन हो जाता है जैसे केबल तो बहुत है न पावर हाउस के थंबे से जुड़ा हुआ छोटा सा केबल भी आपके घर के सभी साधनों में जान भर देता है फ्रिज पानी ठंडा करता है गेजर गर्म करेगा पंखा हवा फेंके तो लाइट प्रकाश देगी एंपलीफायर आवाज पहुंचाएगा केवल पावर हाउस से जुड़ा हुआ केवल होना ऐसे ही पावर हाउसों का पावर हाउस जो परमात्मा है उस परमात्मा विषय जिसने साधना की और अपने जो सात केंद्र हैं वो जागृत किए हैं या कुछ यात्रा की है ऐसे पुरुष के
द्वारा आपको गुरु दीक्षा मिल जाए और आपके अंदर यह चार चीजें हैं श्रद्धा श्रद्धा के बिना तो पंडाल में पहुंचना ही असंभव है जय राम जी की दूसरी तत् परता तीसरी एकाग्रता और चौथा संयम तो आप 40 दिन में आपको इतना आप ऊंचाइयों को छुए कि आपको लगेगा कि धत तेरे की 40 साल की जिंदगी में वह नहीं मिला जो 40 दिन में मिल जाए ऐसा आपके अंदर घुटने दुखने लगे और आंखें कमजोर होने लगे उसके पहले कान बहरे होने लगे उसके पहले सत्य का संग सुन ले परमेश्वर का ध्यान कर ले टोपन दास की
बह जैसी दीक्षा शिक्षा पाकर हजारों लाखों जन्मों के पहले भी तुम थे और इस शरीर के बाद भी तुम रहोगे इस ज्ञान को आत्मसात कर ले तो कितना अच्छा होगा कुटुंबी शमशान में छोड़ा है उसके पहले कोई गुरु आपके मन को आपके अंतर आत्मा में ले जाए तो कितना अच्छा होगा सब कुछ छोड़कर मरना पड़े उसके पहले सब कुछ जिसका है उसके साथ आपका नाता जोड़ दे ऐसी घड़ियां ला दे भगवान और गुरु तो कितना अच्छा होगा सुबह का बचपन हंसते देखा दोपहर की मस्त जवानी शाम का बुढ़ापा ढलते देखा रात को खत्म कहा कहानी
खत्म हो जाए उसके पहले मनुष्य जीवन का फल फलित हो जाए तो कितना अच्छा मनुष्य जीवन का फल रुपया झगड़ा करके मर जाना उसकी चिंता में यह नहीं है दो पांच बेटे बेटी और जवाई करके मर जाना यह मनुष्य जीवन का फल नहीं है थोड़ा मरने वाले शरीर की प्रसिद्धि और फोटो छपवा के मर गए तो यह कोई मनुष्य जीवन की बहादुरी नहीं है जो तुम नहीं थे उसी शरीर का फोटो है और जो शरीर नहीं रहेगा उसी का फोटो कब तक रहेगा भाई साहब व्यवहार में कोई करता है छपता है छपा है तो ठीक
है लेकिन यह फोटो वाला मैं नहीं हूं आईने में आप दिखते हैं तो आईने में दिखते तो आप सामने खड़े उसके पहले आप आईने में नहीं होते और आप हट जाते तभी भी आईने में नहीं है और अभी भी आप आईने में नहीं है क्या ख्याल है अगर आप तो थोड़ी बहुत तो बुद्धि रखते हैं सब लोग आप जो आईने में दिखते थे आप नहीं आए उसके पहले आईने में थे क्या आप नहीं थे अभी आप खड़े तभी भी सचमुच आईने में है क्या नहीं आप हट जाएंगे तो आईने में रहोगे क्या नहीं बस ऐसे
ही यह चित्र रूपी शरीर रूपी आईने में आप देख रहे हैं आप पहले भी नहीं थे बाद में भी नहीं रहेंगे अभी भी इस आईने से न्यारे हो यह तो बदलता रहता है बचपन बदल गया भाई साहब किशोर अवस्था बदल गई शादी के दिन बदल गए मंगनी का उत्साह बदल गया और शादी करने जा रहे थे पता है ना शादी के दिन माना बस सुख का सूर्य लहरा रहा है घोड़े पर जा रहे बग्गी में जा रहे दूसरे पैदल रुमाल य मानो वाह वाह कोई किल्ला जीतने जा रहे वर घोड़ो बहुत सुंदर बात है गुजराती
में वर घोड़ो वर घोड़ा वर घोड़ा मांडवे गया और घोड़ा गाड़ी खींच कर लेया और सारी जिंदगी घसीटते घसीटते थक गया वर घोड़ा वर मिट गया और घोड़ा बनकर गाड़ी ले आया बेचारा माइया तुम भी व दिन याद करो बैंड बाजे सुने मेहंदी रची में लाडो लाडी आनी दो शहजादी आनी दो तुम समझते थ अब जाएंगे ससुराल बड़े गहने गांठे ये वो विनोद वाह वा लाडी ये ऐसा जरा यू कर दे जरा यू कर दे य य कर दे सु लग रही हू अभी क्या हाल है मौसी नाक टेढ़ा हो गया आंखें अंदर घुस गई
गाल दब गए गोडे दुख रहे क्या यंग पर्सन से लाइफ इ फुल ऑफ जॉय बट वाइस पर्सन से लाइफ फुल ऑफ सारो जवान समझते जिंदगी खूब मजा लेने की लेकिन अनुभव को पूछो क्या हाल है अरे बाबा अकेले थे तो मज थेय आई तब से मुसीबत में लेकिन लेने को तो तू ही गया लाला मंगनी तो तू ही स्वीकार कर रही थी लाली आखिर क्या हुआ कह रहा है आसमा यह समा भी कुछ नहीं रो रही है शबन में यह निजार कुछ नहीं जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानुष झाड़ उनकी कब्र पर
है और निशान कुछ भी नहीं जिनकी नौबत से गूंजते थे सदा को आसमान राजाधिराज महाराज अन दता गौ ब्राह्मण पति पाल फलाना आ रहे है सावधान तीसमार का वो कहां गए उनके महल कहां गए और उनकी हड्डियां कहां गई और उनका छत्र और चमर कहां गया ओ हो वो तो छत्र च और उनका शरीर गायब लेकिन दूसरे बोले छत्र चय हमारा और हम है देख लो हमारा साई ठट भैया अरे हमको जानते हो हम कौन है हम फलाने राजा हम फलाने हैं भैया हम अच्छी तरह से जानते बाबा तुम जंगल में और मैं पहली बार
आया हूं आप मुझे कैसे से अच्छी तरह जानते बेटा पानी की बूंद से धी बिगिनिंग हुई थी पानी के बूंद पिता के पानी के पेशाब की जगह से पानी की चिकनी बूंद से तेरी शुरुआत हुई है और मुट्ठी भर राख में तेरा अंत होगा और बीच का तेरा दादा नहीं संभाला बाप नहीं संभाला तो तू कब तक संभालेगा आई नो वेरी वेल व्हाट यू थिंक इन योर माइंड तुम क्या समझता तुम्हारे मन में हम जानता है तेरे को बोले बाबा मैं राजा हूं यहां का मही पति हूं मही पति है लेकिन एक पानी की बूंद
से शुरू हुआ है राग की मुट्ठी में पूरा हो जाएगा उसके पहले अहंकार छोड़कर प्रभु के प्यारों से कुछ सीख ले कुछ पा ले सच्चे पादशाह के पास आा तू कच्चा पादशाह है बेटे अपने को मौत आकर सब छुड़ा दे उसके पहले सब जिसका है और सब जिससे माना जाता है उस पिया को खोज ले भैया तेरा तो मंगल होगा तेरी मी निगाह और तेरे मीठे वचन सुनने वाले का हृदय कमल खिल जाएगा पुण्य आत्मा हो जाएंगे पवित्र आत्मा हो जाएंगे तू अपना मन उस दिलभर के साथ बांधना सीख ले बस फिर चाहे तू मकान
कर मिनिस्टर बन राजा बन कोई फर्क नहीं पड़ता एक बार अपना दिल दिल बर से बांधना सीख ले बस मेरे सारे सत्संग का प्रयासों का यह उद्देश्य होता है कि आपका शरीर तंदुरुस्त कैसे रहे आप जान लो आपका मन प्रसन्न कैसे रहे और दिल भर से कैसे बंदे ये मान लो जान लो और आपकी बुद्धि में बुद्धि दता का प्रकाश चम चम चम के बास मौत के बाद कोई आत्मा अथवा कोई परिस्थिति या प्रकृति आपको जिस किसी के शरीर में दबोच ना दे आप अपने नाथ के साथ संबंध जोड़कर फिर जाइए अनाथ होकर मत मरिए
चाहे तुम किसी जाति के हो किसी मजहब के हो किसी पंथ के हो किसी व्यवसाय को हो मुझे तुम्हारे से कुछ लेना नहीं है ना तुम्हारी दक्षिणा चाहिए ना तुम्हारी वा वाई चाहिए ना तुम्हारा पैसा चाहिए ना तुम्हारा कोई मजहब में हम विघ्न डालना जिसको मान लेकिन ये चीजें तीन आप मेरी मान लो आपका शरीर स्वस्थ रहे मन प्रसन्न रहे और जुड़ जाए उस अल्लाह के साथ ईश्वर के साथ गड और बुद्धि में बुद्धि दता का प्रकाश मिलता है बस ओ ओ ओ ओ ओम ओ ओम करते जाओ और डूबते जाओ अपने ओम स्वरूप परमात्मा
की शांति में अशांत को सुख कहां और शांत को दुख कहां तुम्हारे रक्त के कण और नसीब मति और गति पावन हो रही अब सोच विचार से क्या लेना पावन प्रभु का नाम प्रभु के सुख सामर्थ्य में हमारे को ले जा रहा है अंतर्मुखी से अहंकार को ढीला कर दो तेरी मर्जी पूर्ण हो ईश्वर के हवाले कर दो अपने को हे गुरु कृपा त हमारा अब पथ प्रदर्शन करना हे गुरु कृपा त मेरे हृदय में सदा रहना हे गुरु कृपा तू मेरी तन से मन से मति से रक्षा करना हे मुजा गुरु सच्चा साईं सच्चा
पादशाह कच्चे पातशाह तो करोड़ों बार मिले और मर गए लेकिन सच्चा पातशाह अगर बराबर मिल गया और लगे रहे तो सच्चे पादशाह सच्चा सुख देने चतुराई मत करना प्रीति में डूबते जाओ प्रा में खोते [संगीत] जाओ सुंदर अमृत वेला [संगीत] है मधुर शांति है प्रभु प्रीति है प्रभु [संगीत] प्रसाद मंगल [संगीत] [संगीत] घड़िया बीन का आवाज सुनकर जहरी सांप अपना क्रूर स्वभाव भूल जाता है तो ओमकार की बंसी सुनकर हमारा मन अपनी पाप और ताप और क्रूरता बोलकर ओम स्वरूप ईश्वर में रसमय हो जाए यह तो स्वाभाविक है आनंद है हो गए प्रभु के हवाले
गुरु की कृपा हम गहरी शांति और साधना में डूबा रही [संगीत] है अपने आप प्राण शक्ति सूक्ष्म होती जाएगी बल जागृत हो जाएगा निर्बल केवल राम यही तरीका है निर्बल प्राण शक्ति को बलवान बनाना निर्मल निर्बल साधना को सबल बनाना निर्बल जीवन को सबल बनाना निर्बल के बलराम यही तो है रोम रोम में रमने वाला प्रभु राम का साधन जो कुछ होता है भीतर से प्राण शक्ति सूक्ष्म करने को होने [संगीत] दो शुद्धि प्रयोग हो रहा है प्रभु मय जीवन हो रहा [संगीत] है दुनिया भर के चमत्कार इस प्रभु कृपा के आगे दो कोड़ी के
हो जाते हैं पानी पर चलना धरती में गाड़ दो दूसरी जगह निकलना अथवा धरती में गाड़ दो और महने के बाद निकलना वह सारे चमत्कार इस साधना के आगे बोने हो जाते बोने ये प्राण शक्ति और आत्मिक शक्ति की महिमा देख लो ईश्वरी सत्ता [संगीत] की जितना स्नेह और जितना समर्पण उतना ही अंदर [संगीत] परिवर्तन बहुत बढ़िया शाबाश ओ ओओ रामा राम राम [संगीत] राम गुरु गुरु गुरु [संगीत] गुरु हरे हरे हरे हरे [संगीत] ओम ओ ओ ओ कौन कहता है कि रंग नहीं चढ़ता देखो साधकों का बेड़ा तरता [संगीत] भाई लख प्यानिया भर भर
पिए चढ़े न मस्ती नैन एक बूंद गुरु कृपा की मस्त करे दिन रन हे गुरु कृपा तू मेरे हृदय को छोड़कर कभी मत जाई हो मीरा कभी हंसती है कभी रोजती है कभी नाचती है कभी पागलों की नाई चीखती है मीरा की मस्ती को निगरे लोग क्या जाने मंसूरी मस्ती को लोग बेचारे क्या जाने [संगीत] कृष्ण कहते हैं वाणी गदगद हो जाती है कभी हंसता है कभी रोता है कभी उद उद्ग करता है कभी नाचता है ध ऐसा मेरा भक्त त्रिभुवन को पवित्र करने वाला होता है यह भागवत में लिखा है भगवान कृष्ण के वचन
वाग गद गदा द्रव यस्य चितम अभी तुम्हारा चित्त द्रवित हुआ है हसती कुचित कभी कभी हंसी आएगी रुद भक्षणम कभी रुदन भी आएगा उद गायति कभी गीत भरेंगे वि नृत्य कभी नृत्य उ भरेगा लज्जे नृत्य च मद भक्ता है भक्ति युक्त भुवन पुना ऐसी मेरी सच्ची भक्ति से युक्त होने वाले भक्त उनको छूकर जाने वाली हवाएं भी भवनों को पावन करती है वातावरण को मधुरता देती है गुरु कृपा की महिमा अपरंपार है राम आए तो भी गुरु के चरणों में मथा टेकते हो मैं कृष्ण आया तो भी गुरु कृपा में मथा टेका साधक गुरु कृपा
से पावन हो रहे हैं हे गुरु कृपा मातेश्वरी [संगीत] देवेश्वरी हे करुणा मई तुम हमारे हृदय में सदा रहना कलयुग के दोषों से हमारी य मधुमय साधना छूट ना जाए अगर साधना को विघ्न आता है तो ओम नमो सर्वार्थ साधनी स्वाहा बस विघ्न गए और प्रभु का आनंद और प्रभु के दीवाने रहे ओ ओ ओ [संगीत] ओ रामा रामा रामा [संगीत] रामा हरि हरि हरि [संगीत] हरि ओ ओ ओ [संगीत] ओ आनंद आनंद आनंद आनंद माधुर मधु मधुर [संगीत] माधुर्य ओ आत्मा का आनंद उभर रहा है मधु स्वरूप परमेश्वर की मधुरता हृदय को मधुर कर
रही है तू तेरा और आंगन दे दे मैं अमृत की वर्षा कर दूं ओ ओ आ ओ [संगीत] ओ रामा रामा राम [संगीत] रामा हरि हरि हरि हरि शिवा शिव शिव शंभो शिव शिव शिव [संगीत] शंभो हे भोले जल्दी प्रसन्न होने वाले महाराज भी जल्दी हो जाए प्रसंग भी जल्दी हो जाए देवी खूब देवे शिवा शिव शिव भोले शिव शिव शिव [संगीत] शंभो हे प्यारे ए महाकाल ए मधुरता देने वाले महाकाल ओ ओ देवाधि देव ओ प्यारे प्यारे ओ बोले बाबे ओ बाबू ओ बाबू बाबू बाबू बाबू बाबू बाबू तेरी नगरी में कोई खाली रहेगा
क्या पिला दे अपनी भांग ध्यान की भांग पिला रहा है व भोले यही है भुवन भंग भवनों के आकर्षण को भंग करने वाली भगवत रस को ही सच्ची भांग बोलते हैं नशे नशेबाज व वनस्पति की भांग में फसे हैं भोलेनाथ जो भांग पीते हैं वही पिला रहे हैं अभी शिव शिव शिव शंभो शिवा शिवा शिव शंभो तो ऐसी भांग में मस्त रहता है अब पता चला यह गुरु कृपा से भोले बाबा भांग पीते लेकिन वो भंग जैसी नहीं यह आत्म रस की भांग पीते थे बाबा हम तो पह जानते ही नहीं थे यह भी गुरु
कृपा के ज्ञान से पता चला कि तुम्हारी भांग कितनी प्यारी है भंग बसुरी सुरा पान उतर जाए प्रभात नाम नश में नान का छका रहे दिन रात यह तो दिन रात मस्त कर ऐसी भांग पीते हो भोले बाबा तुम पीते हो और पिलाते हो ना जय हो महाकाल ओ प्यारे प्यारे [संगीत] शिवा शिवा शिवा शंभो भोले भोले भोले शंकर कैसे प्यारे लगरे कैसी भांग है तेरी ओ रस दाता बो बो बबो रे बोल हरी मैं तो कुर्बान जावा पता ही नहीं था कि इतना खजाना खुलता है हे गुरु कृपा हे गुरुदेव तुम्हारी गत मति तुम
ही [संगीत] जानी सतगुरु जेडो शान ठो ब को दे हम हजारों जन्म के पिता मिले माताएं मिले बंधु मिले लेकिन गुरुदेव तुम्हारे जसा कोई ना मिला ईश्वर ने तो जन्म दिया कर्म बंधन से लेकिन तुम हमारे कर्मों को काटकर मुक्ति का प्रसाद जो शिवजी पान कर रहे हैं विष्णु पान कर रहे हैं वह हम साधारण कलयुग के जीव वह आत्म रस की भांग पी रहे हैं ओहो गुरु बरा तारणहारा मे प्यारे