की मांग है सदा सुखी रहना और सदा सुखी रहने के लिए वह सब कुछ करता है शादी करता है विवाह करता है जवाई करता है सासरा करता है चोरी करता है खुशामद करता है त्याग करता है सब इसीलिए करता है कि मैं सदा सुखी रहूं शांति और सदा सुख यह दो ही जीवन की मांग है ध्यान से सुनना ज्वेलर होकर भी सुख शांति चाहता है और लकड़ हरो होकर भी सुख शांति चाहता है तोत कितना भी कुछ करके करोड़ों करोड़ों अरबों अरबों लोग हैं धरती पर उन सबकी बुद्धि उनकी सबकी संपदा मिलकर भी एक व्यक्ति
को वास्तव में सुखी और शांत नहीं कर पाई आज तक तो कहां जाए प्रचार बहुत है उपदेश बहुत है अपने अपने सिद्धांत बहुत है लेकिन सब जैसे पीत्वा मोहम मदिरा संसार भूतो उन्मत मोह मदिरा प के पूरा संसार उन्मत हो रहा है सुख और शांति ही चाहिए अशांति किसी को पसंद नहीं दुख किसी को पसंद नहीं फिर भी सारे के सारे लोग अशांत हैं और दुखी चुनाव लड़कर जीतने वाले भी अशांत रहते हैं कुर्सी होने पर दुखी रहते और चुनाव हारने वाले भी अशांत और दुख से ही बिचारे जूझते रहते चुनाव में ना जाने वाले
व्यापारियों की भी हालत है गृहस्थ हों की भी भल भलो की तो क्या कोई उपाय है कोई रास्ता है कोई तरीका है हां उपाय है रास्ता है तरीका है और सुख शांति देने वाला कोई है वह कहां है व बोले तुम्हारे साथ है तुम्हारे पास है और सदैव तुम्हारा परम हितेश कितनी भी मानसिक मनवांछित वस्तुएं मि जाए व्यक्ति मिल जाए फिर भी अंदर से अधिक सुख की और शांति की ललक बनी रहती है वह तुम्हारा हितेश अंदर अंतर प्रेरक है तुम अच्छा कुछ काम करते हो परोपकार का तो तुम्हें सुख और शांति की हल्की सी
अंदर से मस्ती मिलती और श्रेयस करते हो तो जब प्रेयस स्वार्थ करते हो तो स्वार्थी काम में सफल होने के बाद भी बाहर की तो खुशी मिलती लेकिन अंतर आत्मा डकता है किसी को उल्लू बना लिया अच्छा हो गया मजा आ गया लेकिन अंदर से मु कहती है कि यार धोखा तो हुआ चलो देखा जाएगा तो वासना और पाप संस्कार सुख शांति के लिए गलत करवाते तो वो टोकता है वासना और पाप संस्कार सुख शांति के लिए अगर सही करवाते हैं तो अंदर से वह बल देता है सत बुद्धि देता है तो जहां सुमति वहां
संपत्ति नाना जहां सत बुद्धि होती है वहां अनेक प्रकार की सुख शांति बढ़ाने वाली संपत्ति आती तो सुमति कैसे मिले कि ईश्वर को अपना मान ईश्वर को अपना [संगीत] मान े सुमति मिलेगी ईश्वर को अपना नहीं मानेंगे तो देह को अपना मानेंगे धन को अपना मानेंगे कड़ कपट को अपनी चतुराई मानेंगे और वह कड़ कपट और देह से सुख शांति का कोई संबंध ही नहीं कबीरा य जगह आए के बहुत से कीने मीत जिन दिल बांधा एक से वे सोए [संगीत] निश्चिंत जिसने उसे एक से दिल बांधा वो निश्चिंत सोय और उस एक से दिल
मानने के लिए शरीर की आवश्यकता नहीं उस सुख शांति के भंडार से संबंध जोड़ने में आपका शरीर धन सत्ता दो कोड़ी की भी माना नहीं रखती सत्ता की धन की शरीर की आवश्यकता नहीं उस चैतन्य स्वरूप ईश्वर से संबंध जोड़ने में आप अकेले काफी है शरीर ना हो तभी भी शरीर के बाद भी आपकी प्रीति होती तो उसी के लोक में पहुंचते हैं जय राम जी और इधर उधर प्रीति होती तो इधर उधर भटकते हैं बैल बनते हैं राजा नृग क्रिकेट बन गया राजा अजगर बन गया तो मानना पड़ेगा कि सुख और शांति के खोज
खोज में प्राणी गलत तरीकों का उपयोग करते करते गलत योनियों में जा भटकता है जा गिरता है और सही तरीके का उपयोग करते करते सही सुख शांति तक पहुंच जाता है यही राम और रावण का जीवन यही कृष्ण और कंस का जीवन है यही बुद्धु और बुद्ध का जीवन कई बुद्धु राजा सुख शांति के लिए एक पर एक रानिया लाए एक पर एक भोग विलास किए अंत में दुखी अशांत होकर मर गए लेकिन सिद्धार्थ सुख शांति अंतर आत्मा में उस रास्ते पहुंचकर बोध को प्राप्त हो गए और उनके स्मरण से उनके पंथ से और लोग
भी कुछ अंश में कुछ नान कुछ करे जा रहे तो सभी की मांग है सुख और [संगीत] शांति तो ईश्वर को अपना माने और उसमें थोड़े सुबह शांत होकर बैठे रहे उसके नाम का स्मरण कर तू ही मुझे सत बुद्धि देगा जहां सच्चा सुख और शांति तू सत प्रेरणा देना तो आप उस सुख और शांति के दाता में थोड़े शांत होते जाए उसके नाम का स्मरण करते थोड़े अंदर सुखी होते जाए फिर प्रेरणा पाकर निर्णय करिए यह व्यवहार में सफल होने की कुंजी है सफलता का मतलब वाहवाही नहीं है सफलता का मतलब मनोवांछित वस्तु नहीं
है सफलता का मतलब है कि आपका जीवन श्रम रहित चिंता रहित आलस्य रहित सुख शांति के करीब आगे बढ़ा तो आपका कर्म कर्म योग हो गया आपके जीवन में श्रम अधिक पड़ा और अंतरात्मा का संतोष सुख शांति नहीं मिला तो आप कर्म भोग के चक्कर में गिर रहे तो मूर्ख आदमी के कर्म उसको फंसाने वाले होते हैं और आजकल के बुद्धिमान के कर्म भी मूर्खता से कम नहीं है मूर्ख वह नहीं कि जो अनपढ़ है मूर्ख वह है कि उद्देश्य की पूर्ति के विपरीत कर्म करके उद्देश्य से दूर चला जाता है हालांकि शराबी जुआरी मसारी
बाज जेब कतरा चाहते तो सुख और शांति ऐसे ही करप्टेड आदमी भी सुख शांति चाहता है धन लाच रिश्वत लेकर आराम से जिएंगे लेकिन व आराम उसके भाग्य में नहीं क्योंकि वह धन के आय का तरीका ही गलत अंतरात्मा का गला घोट कर बाहर की चीजों पर भरोसा रखकर सुख शांति चाहता है तो जितना बाह्य भरोसा होगा सुख शांति का उतना वह आदमी मूर्ख माना [संगीत] जाएगा ना भी विद्वान श्री कृष्ण ने ऐसे व्यक्तियों को विमु व आईपी कोटा के मूर्ख कहा विशेष मूर्ख विमु नानु पश्यति पश्यंति ज्ञान चक्षु वि मुड लोक मुझे नहीं जान
सकते मु सुख स्वरूप को शांत स्वरूप को आत्म स्वरूप को वि मुड लोक नहीं जान सकते पश्यति ज्ञान चक्षु सा जिनको गुरुओं का ज्ञान है कर्म करने का ज्ञान विचार करने का ज्ञान है वेही मुझ अंतरात्मा सुख शांत स्वरूप को समझ पा उस सुख और शांत स्वरूप को ठीक से समझ गए फिर अर्जुन तू घोर युद्ध करेगा तभी भी तुझे कर्म बंधन नहीं लगे अर्जुन ने सवाल किया कि आप तो बोलते भाई इस त्याग करके ईश्वर में आना सर्वोपरि है आप तो सन्यास को महत्व देते हो और फिर मेरे को युद्ध में किम कर्मण घोरे
माम नियोजक शवा अब आप समझते कि परमात्मा सुखी ही सार है और सब कुछ त्याग करके ईश्वर में आना ही सार तो फिर युद्ध जैसे घोर कर्म के तरफ मेरे को क्यों प्रेरित करते श्री कृष्ण ने बताया कि करने की जो आसक्ति किए बिना आदमी नहीं रहता तो आसक्ति अपने सुख के लिए नहीं समाज की सेवा के लिए आपके शरीर का उपयोग कर करिए और ईश्वर से प्रेम करने के लिए आप अपना उपयोग करिए तो शरीर समाज की सेवा करके अपने स्वार्थ के कामों से बचने के लिए निस्वार्थ कर्म करिए स्वार्थ के काम आपको सुख
शांति से दूर ले जाते हैं निस्वार्थ कर्म आपको सुख शांति के तरफ लेने ले जाने में मदद करे तो करने की शक्ति है तो आप सत्कर्म करिए जिन कर्मों से बहुत लोगों का हृदय कमल खिले बहुत लोगों का अज्ञान मिटे बहुत लोगों के हृदय में सुख शांति का मार्ग प्रशस्त हो इसमें आप निमित बनिए तो आपका रास्ता कर्म करने का रास्ता कर्म योग हो [संगीत] जाएगा तो कर्म को आप योग बना दीजिए कर्म तो के बिना कोई रह नहीं कर्म तो करने ही पड़ते कर्मों से शरीर बना है कर्मों से पलता है तो कर्म करने
पड़ते तो कर्मों से कर्म कटे ऐसे कर्म करना कर्म योग है और कर्मों से कर्म जाल बढ़े यह कर्म भोग है तो शरीर सुख शांति के लिए व्यर्थ है जो शरीर से सुख शांति चा तेर कंडीशन मकान हो गाड़ी हो आराम से रहे बीमार हो जाएगा मुडा पक जल्दी आएगा शांत पड़े हैं सोए हैं दिन में भी दो घंटा एक घंटा सोता हूं बीमार पड़ेगा बेटे शरीर सुख शांति के योग्य नहीं शरीर तो कर्म के योग्य है थकान मिटाई तो थोड़ा विश्राम के योग है लेकिन सुख शांति ऊंची चीज है नींद हल्की चीज नींद शरीर
के अवयवों को आराम देती है लेकिन जब ईश्वर का संबंध जोड़कर आप शांत आत्मा होकर ईश्वर की प्रीति के लिए कर्म करते तो आप सुख शांति के करीब होते जाएंगे आपके दर्शन से आपके वचनों से औरों की गहराई में भी सुख शांति की थोड़ी बहुत किरणें पहुंचेगी आप का हृदय संत हृदय होने लगेगा संत हृदय नवनीत समाना जैसे मक्खन स्निग्ध होता है कोमल होता है ऐसे ही आपके हृदय में सुख शांति लेते जाओगे आपको तो लाभ होगा लेकिन आपसे मिलने वालों को भी जैसे मक्खन को छुआ तभी भी कुछ ना कुछ चिकनाहट ठंडक आ जाती
तो कितनी बड़ी ऊंची उपलब्धि है तो मार्गदर्शक है और वह आपका है अपना है उसके साथ अपना संबंध जोड़िए कि मैं प्रभु तुम्हारा हूं और मेरे द्वारा ऐसे आप कर्म करवाओ जिससे आप मेरे हृदय में प्रकट हो तो शरीर को सुख शांति में सहायक कर्मों में लगाना कर्म योग अपने को भगवान के भक्ति में सु में प्रसन्नता में लगाना भक्ति योग है शरीर और वस्तुओं के साथ आपका पहले संबंध नहीं था जन्म के पहले मरने के बाद नहीं रहेगा अभी भी मिट रहा है बचपन के खिलौने का संबंध अभी कहां है 10 साल पुराने यार
दोस्ता रों 20 साल पुराने मित्रों संबंधियों रेलवे में जो मिले थे या और जगह मिले थे कहां है वैसा संबंध तो ये संबंध जो है संपादक संबंध जन्म जात [संगीत] संबंध यह तो बनते रहते बिगड़ते रहते लेकिन जीवात्मा का परमात्मा के साथ शाश्वत संबंध है उस संबंध की स्मृति बनाए रखो कर्म के पहले कर्म के बीच-बीच और कर्म के बाद अंतरात्मा से ओम प्रभु सत बुद्धि तो इससे आसानी से आप संसार सागर से तर जाएंगे आपको कर्म दबाए नहीं चिंता सताएगी नहीं रोग आपका गला घूंट नहीं महाराज बड़े-बड़े संत महात्मा भी रुग्ण हो गए राम
कृष्ण को अंतिम समय तो कैंसर ने हाड पिंजर कर दिया महावीर को भी पेचिस की बीमारियों ने सताया था रमण महा ऋषि को कैंसर ने सताया था आप तो बोलते आपको रोग सताएंगे [संगीत] नहीं राम नाम की औषधि खरी नियत से खाए अंग रोग व्याप नहीं महा रोग मिट जाए अंग रोग होवे नहीं ऐसा नहीं लिखा तुलसीदास ने कितनी सूक्ष्मता रखी अंग रोग तो प्रारब्ध वेग से अथवा खानपान की गलती से होगा जैसे कोई एक दिन खाता है दिन नहीं खाता कभी चार दिन नहीं खाता कभी दो दिन नहीं खाता कभी छ महीना नहीं खाता
तो उसकी जठरा की ऐसी स्थिति हो जाएगी तो पेची होना है तो महावीर ने 12 साल में 365 बार ही खाया था तो शरीर के धर्म तो संत के शरीर को लगते हैं हमने पहले लापरवाही से खानपान रखा तो हमको तो बीमारी हो गई बुखार हुआ और ऐसा जोर पकड़ा कि मौत के बिल्कुल द्वार तक पहुंच गए थे फिर हम कमरे में रात को चले गए और पूछा कि तेरी मर्जी हो तो अभी आए और ठीक करना है तो डॉक्टरों के बस का नहीं तू ही बता दे उसकी उस परमेश्वर की सत्ता की शरण चले
गए शांत हो के व हमारा जो सेवक था उसको मैं बताया कि अभी तो चुपचाप रहना किसी को बताना नहीं और सुबह जो किसी को बोल बता देना कि ऐसा ऐसा यहां कुछ ना हो आडंबर बापू जी को शांति से हम जा रहे हैं लेकिन तो अभी यही रहे किसी को खबर मत करना सुबह दरवाजा खोल लेना ऐसा करके हम कमरे में गए थे आप समझ गए बात रवाना होने को गए थे तो फिर उससे जो कुछ हमको करना था आखिरी विदाय स्वास बास लेना रोकना यहां से श्वास निकालना चलो अब नहीं हो था आत्महत्या
तो करनी नहीं है अब तो शरीर तो ठीक नहीं हो रहा है ना जी रहे ना मर रहे अब तेरी क्या मर्जी तू डॉक्टर बन बोले नारायण वैद्य जानवी औषधि गंगा तो जल औषधि है और मैं वैद हूं व जैसा प्रेरणा देता है खानपान की बिल्कुल स्वस्थ पहले से स्मार्टनेस आ गई जब वो जिलाना चाहता है और आप उसके ग से नजी होकर आप निर्णय लेते तो आपका स्वास्थ्य भी बढ़िया हो जाता और प्रारब्ध वेग से कभी घटिया भी हो जाएगा तभी भी मैं बीमार हूं ऐसा भूत नहीं लगेगा बीमार है तो शरीर है और
मरता है तो शरीर है चिंता करता है तो मन है इन सब से आपका परम हितेश और आप अलग इस बात पर जितना अधिक ध्यान जाएगा और व्यवहारिकता आएगी उतना आप सुख शांति ईश्वर के करीब हो जाओगे [संगीत]