घने जंगल के बीचोंबीच एक विशाल काय बरगद का पेड़ खड़ा था इस पेड़ की शाखाओं पर दिन भर कई प्रकार के पक्षियों का चहचहाना सुनाई देता था जंगल के तमाम पक्षी इस बरगद पर विश्राम करने आते थे और कुछ ने तो इसे अपना स्थाई निवास बना लिया था बरगद की छाव में रहते हुए वे अपार सुख का अनुभव करते थे जब हम किसी जगह या व्यक्ति के साथ लंबे समय तक रहते हैं तो हमें उनसे लगाव हो जाता है यही हाल इन पक्षियों का था जिन्हें बरगद से गहरा प्रेम हो गया था एक दिन जंगल
में भयंकर सूखा पड़ गया कई वर्षों से बारिश नहीं हुई थी और पेड़-पौधे सूखने लगे बरगद भी पानी के अभाव में सूखने लगा और पक्षियों ने धीरे-धीरे उसे छोड़ना शुरू कर दिया अंततः जब बरगद पूरी तरह सूख गया और उसकी शाखाएं टूटकर गिरने लगी तो वहां रहने वाले सभी पक्षी दूसरे स्थानों पर चले गए केवल एक बूढ़ा गिद्द ही वहां रह गया उसने देखा कि उसके सभी साथी पक्षी पेड़ छोड़कर चले गए हैं कुछ पक्षियों ने उससे भी चलने को कहा लेकिन उसने इंकार कर दिया बूढ़े गिद्ध ने सोचा मेरा जन्म इसी पेड़ पर हुआ
है मैं इसी पर बड़ा हुआ हूं इस पेड़ ने मुझे जीवन के सारे सुख दिए हैं आज जब यह पेड़ संकट में है तो मैं इसे छोड़कर कैसे जा सकता हूं यह पेड़ मेरे लिए माता-पिता जैसा है मैं इस पेड़ को छोड़कर नहीं जाऊंगा चाहे कुछ भी हो जाए जो लोग अपने माता पिता को बुढ़ापे में छोड़ देते हैं वे बड़े स्वार्थी होते हैं गिद्ध ने निश्चय किया कि वह मरते दम तक इस पेड़ का साथ नहीं छोड़ेगा समय बीतता गया और पेड़ दीमक से ग्रसित होकर और भी कमजोर हो गया लेकिन गिद्ध फिर भी
उसे नहीं छोड़ा वह दिन में अपना भोजन ढूंढने के बाद शाम को उसी सूखे हुए पेड़ पर लौट आता था कई दिन इसी तरह बीत गए जो पक्षी पेड़ को छोड़कर चले गए थे उन्होंने सोचा किध काका अभी भी उस सूखे पेड़ पर रह रहे हैं वे सब उसे समझाने के लिए वापस आए और उससे बोले किद्द काका यह पेड़ अब मर चुका है इसे छोड़कर किसी सुरक्षित जगह पर चलिए यह पेड़ कभी भी गिर सकता है और आपकी जान भी जा सकती है लेकिन गिद्ध ने कहा भाइयों यह पेड़ मेरे माता-पिता के समान है
मैं इसी पर बड़ा हुआ हूं और इस पेड़ ने मुझे जीवन के सारे सुख दिए हैं मैं इसे इस कठिन समय में नहीं छोड़ सकता यह मेरी सबसे बड़ी खुदगर्जी होगी गिद्द की बातें सुनकर पक्षी निराश हो गए और लौट गए वे इंद्र के पास गए और सारी बात बताई इंद्र ने पक्षियों की बात सुनकर गिद को समझाने का निर्णय लिया इंद्र ने गिद्ध से कहा हे गिद्र यह पेड़ अब बहुत कमजोर हो चुका है इसकी शाखाएं गिर चुकी हैं और इस पर एक भी हरा पत्ता नहीं बचा है अगर यह पेड़ गिर गया तो
आपकी जान भी जा सकती है इसलिए इसे छोड़कर किसी सुरक्षित जगह पर चले जाइए हे भगवान जब मेरा जन्म हुआ था मेरे माता-पिता मुझे इसी पेड़ पर छोड़ गए थे मैं इस पेड़ पर बड़ा हुआ हूं और इसी पर रहते-रहते बूढ़ा हो गया हूं आज जब यह पेड़ संकट में है तो मैं इसे छोड़कर कैसे जा सकता हूं मैं मरते दम तक इस पेड़ का साथ नहीं छोडूंगा इंद्र गिद्ध की निष्ठा देखकर प्रसन्न हो गए और बोले मैं तुम्हें वरदान देना चाहता हूं बताओ तुम्हें क्या चाहिए हे भगवान मुझे वरदान नहीं चाहिए इस पेड़ को
वरदान दीजिए ताकि यह फिर से हरा भरा हो जाए और इसकी आयु बढ़ जाए इससे हजारों पक्षियों का भला होगा इंद्र ने की बात मान ली और पेड़ को फिर से हरा भरा बना दिया पूरे जंगल में बारिश हो गई और जंगल के सभी पेड़ पौधे फिर से हरे भरे हो गए जो जीव जंतु जंगल छोड़कर चले गए थे वे फिर से लौट आए सभी पक्षी बरगद पर आकर चह चहा लगे और गिद्ध काका की सेवा करने लगे इस प्रकार गिद्ध ने अपने जीवन के आखिरी दिन सुख पूर्वक बिताए हमें भी इस कहानी से यह
सीख मिलती है कि हमें अपने अपनों का बुरे वक्त में कभी साथ नहीं छोड़ना चाहिए विशेषकर अपने माता-पिता का वे हमारे जीवन दाता हैं और हमें पालने पोस में उन्होंने जो कठिनाइयां सही हैं उनका बुढ़ापे में सहारा बनना हमारा कर्तव्य है बहुत समय पहले की बात है समुद्र के किनारे एक छोटी सी गौरैया अपने घोंसले में रहती थी एक दिन उसने दो अंडे दिए सुबह होते ही उसने सोचा मैं जल्दी से दाना चुकने जाती हूं तब तक मेरे अंडे यहां सुरक्षित रहेंगे किसी को नहीं पता कि मैंने दो अंडे दिए हैं गौरैया दाना चुगने चली
गई उसे दाना चुगने में शाम हो गई लेकिन जब वह वापस आई तो उसने देखा अरे मेरे अंडे कहां गए यहां तो कोई भी नहीं है उसने देखा कि समुद्र हंस रहा है गौरैया ने पूछा समुद्र क्या तुमने मेरे अंडे लिए हैं तुम हंस क्यों रहे हो मुझे सच सच बता दो मेरे अंडे कहां है तुमने ही मेरे अंडे चुराए हैं मेरे अंडे वापस करो समुद्र ने जवाब दिया नहीं मैंने तुम्हारे अंडे नहीं लिए मैं क्यों तुम्हारे अंडे लूंगा मुझे तुम्हारे अंडे चुराकर क्या मिलेगा मुझे नहीं पता तुम तुम्हारे अंडे कहां है मुझे परेशान मत
करो खुद ही ढूंढ लो अपने अंडे समुद्र की बात सुनकर गौरैया को गुस्सा आ गया उसने कहा अगर तुमने मेरे अंडे वापस नहीं किए तो मैं तुम्हें पूरा सुखा दूंगी एक मां की ताकत को तुम नहीं जानते मां अपने बच्चों पर कोई आंच नहीं आने देती समुद्र हंसते हुए बोला तू मुझे सुखाए गी तू गौरैया चल ये कोशिश करके देख ले गौरैया गुस्से में अपनी छोटी सी चोंच में समुद्र का पानी भरती और किनारे पर उड़ेल देती पास से गुजरते हुए एक चिढ़ा ने पूछा अरे गौरैया बहन आज तुम दाना चुगने नहीं आई और तुम
यह क्या कर रही हो गौरैया ने जवाब दिया मैं समुद्र का पानी सुखाकर अपने अंडे वापस लूंगी तुम जाओ मुझे अपना काम करने दो चिढ़ा ने कहा पर गौरैया बहन यह कार्य असंभव है इस तरह तुम समुद्र का पानी नहीं सुखा पाओगी गौरैया दृढ़ निश्चय के साथ अपने कार्य में लगी रही जब वह थक जाती तो थोड़ी देर रुककर फिर से काम में जुट जाती इस कार्य में गौरैया को कई दिन हो चुके थे भूखी प्यासी गौरैया की तबीयत खराब होने लगी यह देखकर सभी पक्षी चिंतित हो गए यह गौरैया अगर इसी तरह भूखी प्यासी
इस कार्य में लगी रही तो अनर्थ हो जाएगा हमें गरुण देव के पास चलकर सहायता मांगनी चाहिए सभी पक्षी मिलकर गरुण देव के पास गए गरुण देव ने पूछा क्या बात है सब ठीक तो है आज सभी पक्षी एक साथ मेरे पास आए हैं पक्षियों ने बताया गरुण देव एक छोटी गौरैया अपनी जिद पर अड़ी है और इतने विशाल समुद्र का पानी सुखाने का प्रयास कर रही है इसी वजह से उसका स्वास्थ्य भी गिर रहा है कृपया उसकी मदद कीजिए गरुण देव समुद्र तट पर गौरैया के पास गए और बोले गौरैया मेरी चोंच थोड़ी बड़ी
है क्या इस कार्य में मैं तुम्हारी कुछ सहायता करूं नहीं गरुण देव आप मेरी वजह से परेशान मत होइए यह मेरी लड़ाई है मैं इसे खुद लडूंगी मुझे कोई मदद नहीं चाहिए गरुण देव ने सो बच्चों की वजह से यह चिड़िया किसी की नहीं सुनेगी इसके लिए अंडों को ढूंढने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कोई कार्य नहीं है मुझे भगवान श्री हरि के पास जाना होगा और उनसे विनती करनी होगी गरुण देव भगवान विष्णु के पास गए और प्रार्थना की हे नारायण आपकी जय हो कृपया हमारी सहायता कीजिए एक नन्ही गौरैया समुद्र का पानी सुखाने की ठान
बैठी है जो कि संभव नहीं है उसका स्वास्थ्य भी गिर रहा है पक्षीराज गरुण मैं इस गौरैया के दृढ़ निश्चय से बहुत प्रसन्न हूं हे समुद्र देव आप पीछे हट जाइए और गौरैया को उसके अंडे लेने दीजिए आज एक मां अपने बच्चों की रक्षा के लिए कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार है इसलिए मैं गौरैया के साथ हूं आपको पीछे हटना होगा और गौरैया के अंडे उसे लौटाने होंगे समुद्र ने भगवान विष्णु की आज्ञा मानी और पीछे हट गया गौरैया ने खुशी-खुशी अपने अंडे निकाल लिए समुद्र ने कहा गौरैया मुझे माफ कर दो आज
तुम्हारा विश्वास जीत गया गौरैया ने गर्व से कहा मैंने कर दिखाया मेरे अंडे मुझे वापस मिल गए नारद तुम तो हमेशा भ्रमण करते रहते हो कोई ऐसी घटना बताओ जिससे तुम चौक गए हो प्रभु मैं अभी-अभी जंगल से आ रहा हूं वहां मैंने एक अद्भुत घटना देखी एक गाय दलदल में फंसी हुई थी और उसे बचाने वाला कोई नहीं था तभी वहां से एक चोर गुजरा उसने गाय को फंसा हुआ देखा लेकिन रुका नहीं उल्टे उसने गाय पर पैर रखकर दलदल पार किया और आगे बढ़ गया कुछ दूर जाकर उसे एक सोने का सिक्का मिल
गया भगवान विष्णु मुस्कुराते हुए पूछे फिर क्या हुआ नारद थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु भी गुजरा उसने गाय को बचाने की पूरी कोशिश की पूरे शरीर का जोर लगाने के बाद उसने गाय को बचा लिया लेकिन जैसे ही वह आगे बढ़ा एक गड्ढे में गिर गया और उसे चोट लग गई प्रभु यह किस प्रकार का न्याय है नारद जो हुआ वह सही हुआ चोर की किस्मत में उस दिन खजाना लिखा था लेकिन उसने पाप किया इसलिए उसे सिर्फ एक ही सिक्का मिला वहीं साधु के भाग्य में उस दिन मृत्यु लिखी थी परंतु
उसने गाय को बचाकर अपने पुण्य बढ़ा लिए और उसकी मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई इंसान के कर्म ही उसका भाग्य तय करते हैं अब नारद मुनि को सारा माजरा समझ आ गया था प्रभु अब मुझे समझ में आया हमें हमेशा अपने जीवन में अच्छे कर्म करते रहना चाहिए उसका फल हमें किसी ना किसी रूप में अवश्य मिलता है बिल्कुल नारद यही जीवन का सच्चा मार्ग है प्राचीन समय में राजा जनक की पुत्री सीता से जुड़ी अनेक कथाएं प्रसिद्ध हैं एक ऐसी ही कथा है जिसमें एक तोते ने माता सीता को श्रीराम से
वियोग का श्राप दिया जिसके कारण गर्भावस्था के दौरान माता सीता को श्रीराम से दूर रहना पड़ा एक दिन की बात है जब छोटी सीता अपनी सहेलियों के साथ बगीचे में खेल रही थी बगीचे के एक पेड़ पर तोते का एक जोड़ा बैठा था और वे आपस में बातें कर रहे थे इस युग में राम नामक एक प्रतापी राजा होंगे और उनकी अद्वितीय पत्नी सीता होंगी श्रीराम सभी राजाओं को अपने अधीन कर लेंगे और देवी सीता के साथ 11000 वर्षों तक राज करेंगे धन्य है श्री राम और धन्य है सीता यह सुनकर सीता का ध्यान उस
ओर गया अपने विवाह की बात सुनकर वह उत्सुक हो गई और उस तोते से पूरी कथा सुनने की इच्छा की उन्होंने अपनी सहेलियों से तोते को पकड़कर लाने को कहा सहेलियों ने तोते को पकड़कर सीता के पास लाया सीता ने प्यार से पूछा तुम कौन हो और कहां से आए हो तुम जिस राम और सीता की बात कर रहे थे उसकी जानकारी कैसे मिली हम वाल्मीकि ऋषि के आश्रम के पेड़ पर रहते हैं उन्होंने रामायण नामक एक सुंदर काव्य लिखा है और उसे अपने शिष्यों को पढ़ाते हैं हम भी उसे सुनते हैं और इसी कारण
हमें यह कथा याद हो गई है अच्छा तो तुम श्री राम और माता सीता के बारे में बहुत कुछ जानते होगे हां थोड़ा बहुत मुझे और बताओ श्रीराम महा ऋषि विश्वामित्र के साथ अपने तीन भाई भरत लक्ष्मण और शत्रुगन के साथ मिथिला आएंगे और भगवान शिव के धनुष को तोड़कर देवी सीता से विवाह करेंगे श्रीराम के तीनों भाइयों का विवाह भी मिथिला में होगा तोते की बातें सीता को बहुत प्रिय लगी तुम्हारी बातें मुझे बहुत अच्छी लग रही हैं श्री राम के गुणों के बारे में कुछ और बताओ सीता की उत्सुकता देखकर मादा तोता समझ
गई कि यह जनक नंदिनी सीता ही है फिर भी उसने बिना इसका एहसास दिलाए कहा श्री राम के रूप और गुणों का वर्णन जितना किया जाए कम है वे हर प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त हैं जनक नंदिनी सीता धन्य है जो श्री राम के साथ हजारों वर्षों तक रहेंगी परंतु तुम कौन हो जो यह सब सुन रही हो जिसे तुम जनक नंदिनी सीता कहती हो वह मैं ही हूं श्री राम ने मेरे मन को मोह लिया है जब वे मिथिला आकर मुझसे विवाह करेंगे तभी मैं तुम्हें छोडूंगी तुम मेरे महल में सुख पूर्वक जीवन बिताओ
हम वन में रहने वाले पक्षी हैं और स्वच्छंद विचरण पसंद करते हैं महल में हमें सुख नहीं मिलेगा मैं गर्भवती हूं और अपने बच्चे को जन्म देने के बाद वापस आ जाऊंगी पेड़ पर बैठे उसके पति तोते ने भी सीता से विनती की हे जनक नंदिनी उसे छोड़ दो वह गर्भवती है और महल में नहीं रह सकती दोनों तोते सीता से उन्हें छोड़ने की मिन्नतें करते रहे परंतु सीता अपनी जिद पर अड़ी रही तोते की पत्नी का वियोग असहनीय हो रहा था और वह क्रोधित हो गई उसने श्राप देते हुए कहा गर्भावस्था में मुझे तुम
अपने पति से अलग कर रही हो इसलिए मैं तुम्हें श्राप देती हूं कि गर्भावस्था में तुम्हें भी अपने पति से अलग होना पड़ेगा इतना कहकर मादा तोता राम-राम कहकर मर गई थोड़ी देर बाद नर तोता भी पत्नी के वियोग में मर गया कहा जाता है कि यही तोता अगले जन्म में धोबी बना और उसके लांछन के कारण ही माता सीता को श्री राम से दूर होना पड़ा था