[संगीत] [हंसी] [संगीत] संकेत जी नासिक महाराष्ट्र से राधे राधे महाराज जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी पिछले काफी महीनों से आपको सुन रहा हूं जब सुनता हूं तब प्रश्नों के उत्तर आसानी से मिल जाते हैं पर कभी-कभी परिस्थिति ऐसी उत्पन्न होती है कि जैसे हार का सामना कई बार करना पड़ता है तो आत्मविश्वास कम हो जाता है इत्यादि आपको ही नहीं करना पड़ता सबको करना पड़ता है पर आत्मविश्वास कम हो जाना नहीं होता है ये कायर पुरुष का लक्षण है हारने पर एक जोश पैदा होता है कि अबकी
बार तो मैं परास्त हो गया लेकिन अबकी बार ऐसा उठूंगा कि ये मुझे परास्त नहीं कर पाएगा आप भगवान के अंश है इस बात को समझिए परास्त होना या विजय होना ये खास बात नहीं है लेकिन आत्म उत्साह टूट जाना यह खास बात है आज हम विजय हुए हैं तो कल हम पराजित भी हो सकते हैं बहुत बड़ा योद्धा है काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर अगर हम आज हारे हैं तो कल विजय भी हो सकते क् हम भगवान के अंश हैं भगवान का भजन करते हैं सत शास्त्र का श्रवण करते हैं सत धर्म में
चलते हैं हार हो गई तो निराशा नहीं आत्मविश्वास नहीं टूटना चाहिए आत्मविश्वास टूट गया तो रह क्या गया हमारे पास फिर कुछ नहीं रह गया हरने पर एक जोश आता है अबकी बार चूक गया अबकी बार नहीं चुकू फिर चूक गया अबकी बार चूक गया आपने एक दिन वह ऐसा महात्मा बन जाएगा एक दिन व ऐसा विजय हो जाएगा हर दोषों पर वि आत्मविश्वास टूटा तो रह क्या गया आत्म विश्वास तो हम जिंदगी भर नहीं तोड़ेंगे मरते सांस तक हम कोशिश करेंगे किसको हराए गे आप हमारी बात को समझ रहे हो हजार बार हारने के
बाद भी हम ताल ठोकेंगे कि हराए तुम्हें तब विजय मिलती है इसमें यह तो सोचना ही नहीं कि हार गया तो विजय कैसे में हार तो बड़े बड़ों को होती है बड़े बड़ों चूक हो जाती है बड़े बड़े पहलवान चूक जाते हैं हाथ मिलाया दाव में फंस गए तो उससे कमजोर वाला उसको मार दिया फिर ये तो त्रिभुवन विजय है काम क्रोध लोभ मोह ये कोई हमारे तुम्हारे ऊपर विजय थोड़ी त्रिभुवन विजेता है और परम पद प्राप्त किया जाता है इन्हीं विजेताओं को परास्त करके तो वो बल कौन सा है भगवान का आश्रय गुरु चरण
सेवन गुरु कृपा बल नाम इन्हीं से हम इत्र विजेता काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर पर विजय प्राप्त करते हैं आत्म बल तो बिल्कुल नहीं नष्ट कर खेल में उत्साह बढ़ना चाहिए हारने पर उत्साह टूट जाए वो कच्चा खिलाड़ी सुख दुखे समय कृत्वा लाभा लाभ जया देव सुख में दुख में लाभ में हानि में जय में पराजय में सभान भाव रख करके हमें खेल में कूद पड़ना है अरे नहीं हमारी जब गंदा आचरण अपना फल देता है तो मैं हार जरूर गया लेकिन मैं राधा राधा रटता हूं शास्त्र स्वाध्याय करता हूं संत संग करता हूं
एक जगह में हार गया तो क्या मेरा जीवन नष्ट हो जाएगा क्या यह नाम नष्ट हो जाएगा क्या ये सदाचरण नष्ट हो जाएंगे असद आचरण तो नष्ट नहीं हुए उनको भोगना पड़ रहा है तो सदाचरण कैसे नष्ट हो सकते हैं मुझे उत्साहित होना है एक बार चुक गया फिर गिर फिर उठूंगा फिर गिरंगा फिर उठूंगा ऐसे करते करते मैं इतना मजबूत हो जाऊंगा कि कहां गिर गया किस कारण से गिरा ये मैं कमी पकड़ पाऊंगा और निकल जाऊंगा और सच्ची बात है बच्चा गिरना तभी तक है जब तक अहंकार है इस मार्ग में और जब
अहंकार नष्ट हो गया तो कोई गिरा ही नहीं सकता है जब तक आहम होता है कि मैं लड़ सकता हूं तब तक हारना है और जब ऐसे हो जाता है ऐसे कौन होता है आत्म समर्पण कौन करता है बलहीनता है तो महाबल उसको स्वीकार कर लेता महाबल है भगवान गुरुदेव फिर उसको कोई सुनेरी मैने निर्बल के बलराम निर्बल के बलराम और जिसके बल भगवान उसे सीम की आप सके को तासु बड़ रखवार रमा पति जासु जिसके रखवार भगवान है उसको ये संसार प्रपंच ये नाना प्रकार की निंदा स्तुति घृणा ये सब यही भरा हुआ है
आगे बढ़ो हारना नहीं हारना नहीं अंदर से हारना नहीं बाहर से अगर हार हो जाती है तो कोई बात नहीं खिलाड़ी ही हारता है दौड़ने वाला ही गिरता है गिरा हुआ पड़ा है वोह क्या गिरेगा इसलिए अच्छे बालको हो आगे बढ़ो निराशा नहीं होनी चाहिए उदासी नहीं होनी चाहिए और जिद्दी स्वभाव बना एक बार हार गया तो मैं अपने को इतना पुष्ट करूंगा कि हारू नहीं फिर हार गया तो फिर आजकल क्या होता है आत्म बल आत्म उत्साह नष्ट हो जाता है स्कूल में हार गए परीक्षा में फेल हो गए बच्चे आत्महत्या के लिए तैयार
हो गए आत्म बल हीन होने के कारण तो हो गया किसी ने ब्लैकमेल किया हो आत्महत्या के लिए तैयार हो गए किसान की फसल नष्ट ई आत्महत्या के लिए तैयार हो गए कहीं हम हार गए तो हम अरे ऐसे हमें छोटी मोटी बातों में हम अपने अमूल्य जीवन को नष्ट कर देंगे नहीं आज अगर अभी आप अपनी मृत्यु स्वीकार कर ले कि मैं मरा तो आप लाखों को भयभीत कर सकते हैं तुम्हें देख के लोग भयभीत हो जाएंगे क्योंकि केवल तुम सोच लो ना एक ही बार तो मरना मैं मरा अब देखता हूं कौन मेरे
सब भयभीत होने लगेंगे यह आदमी मूडियम इतने कमजोर क्यों बनते हो ऐसे काम क्रोध लोभ ड़ की तरह बच्चों को डरवा हैं ज्ञानियों को नहीं जिनको सच्चा ज्ञान हो गया भगवत मार्ग पति को जानते ये पूछ दबाक भाग जाते अगर ऐसा ना होता तो संत जन कभी भगवान को प्राप्त नहीं कर पाते और संत का वही स्वरूप होता है जो शास्त्रों में वर्णन है संत पेंट शर्ट में भी हो सकता है संत बच् भी हो सकता है ऐसा नहीं श्री सुखदेव जी 16 वर्ष के है ना और बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि खड़े होकर उनका स्वागत कर
रहे हैं पाच वर्ष के ध्रु जी है अटल पदवी प्राप्त की पाच वर्ष के प्रहलाद जी सबसे बड़े महापुरुष हुए नहीं तो ऐसा नहीं हो सकता कि हम पीले पहने हैं तो संत हैं आप बनियान शर्ट पे हो तो आप संत नहीं नहीं संत लक्षण होते हैं भगवान संतों को प्राप्त देखो विभीषण से कह रहे तुम सरी के संत प्रिय मोरे अब विभीषण जी कौन सा वेस रखे राज मंत्री है और रावण के भाई हैं उनका हृदय संत भगवान हृदय की बात को देखते हैं हृदय से कभी नहीं हारना चाहिए यह तो पक्का समझ लो
य हम सबके लिए प्रार्थना करते हैं कि किसी भी परिस्थिति में हारना स्वीकार मत करो आत्मबल को क्षीण कर देना यह बड़ी हाल होगी और बाहर हम हार गए तो आज नहीं तो कल जीत जाएंगे जीत जाएंगे आप खेल में देखो ना कहीं परास्त होता है तो कहीं विजय कप लेकर आता है कि भा हम जीत गए होता है कि नहीं आप देखो ना ट लीला में देखो संसार में तो तुम भगवत मार्ग के पति को हारना नहीं परिस्थिति तो आती है किसके जीवन में परिस्थिति नहीं आती किसके जीवन में संघर्ष नहीं आता भारी से
भारी कष्ट भोगने पर भी अपमान निंदा तिरस्कार धर्म में चल रहा है तो कम से कम अगर कोई कह दे वाह भाई वाह तो एक उत्साह मिलता है ना नहीं वह और उसको गाली देगा धर्म पर चल रहा है सत्य पर चल रहा है उसको गाली मिलेगी निंदा मिलेगी अब चल जैसे कोई नंगे पैर चल रहा है तो कांटे बिखेर देगा अब चल ऐसा है परमार्थ की परीक्षा और अगर पैर रख दिया कांटे पे तो कांटा नहीं होगा कूल होगा इस मार्ग पर चलने वाले के मार्ग में जो कांटे बिछाए जाते हैं बिछाने वाले के
लिए तो त्रिशूल का काम करेंगे लेकिन जो पग रख देता है उसके लिए फूल है हां जो ता को काटा बवे ताहि बवे तो फूल अपना कर्तव्य अपना धर्म और जो ही कदम रखा तो तुमको फूल के फूल है वा को है त्रिशूल उसको भोगना पड़ेगा इसलिए बहुत अरे बहुत कठिन मार्ग है इसलिए तो लोग विषयों में भ्रमित हो जाते हैं कि बहुत कठिन मार्ग और सह गए तो आप निकल गए माया से मुक्त हो गए परमानंद की बाढ़ आ गई मृत्यु का भय नहीं भक्तों का जब शरीर छूटता है तो जानते हो कैसे मृत्यु
होती है जैसे हाथी के गले से बड़े हाथी के फूलों की छोटी बाला टूट जाए तो पता भी नहीं चलता ऐसे कब मर गया नहीं तो जन्मत मरत दोष दुख होए शास्त्र वर्णन तो हमें इस मृत्यु के भय से पार होना है हमें काम क्रोध पर विजय प्राप्त करनी इसलिए हमें उत्साह हीन उत्साह हीन हुआ तो सब मर गया सबसे ब बात है जीते आज डिप्रेशन में लोग क्यों हो रहे हैं पाप आचरण कर रहे हैं उत्साही हो रहे हैं आनंद है नहीं अंदर तो बस सोच सोच सोच सोच सोच करके सोच खोखला होते चले
जा रहे हैं नहीं हमें उचित सोच करनी है हमें उत्साह प्राप्त करना है हमें हर समय प्रसन्न रहने की कला सीखनी है मनुष्य जीवन यार ऐसे सब रुपए के लिए परेशान हम कहते क्या रुपए में आनंद है आप विचार कर देखो रुपए में आनंद है नहीं यार अगर रुपए में आनंद होता तो रुपए वाले आनंदित हो जाते ना लेकिन नहीं आनंदित है भाई नहीं आनंदित है बहुत मतलब आप बहुत बड़ा भ्रम है यह कि हमें रुपया मिल जाए हमें अमुक सामग्री मिल जाए हमें अमुक मिल जाए तो मैं सुखी हो जाऊं नहीं हो सकते तुम
सुखी जब तक भगवान नहीं मिलेंगे जब तक भगवान नहीं मिलेंगे कोई सुखी नहीं हो सकता पक्का समझ लो रुपया कोई खास बात नहीं है खास बात है नाम जप और विचार विचार से सुख प्राप्त होता है जब कोई निंदा करे जब कोई विघ्न डाले तो तुम तुरंत समझ जाओ कि अब हमारी भूमिका बदलने वाली है मुझे प्रश्न का उत्तर देना है तुम गाली दो मैं मुस्कुरा के निकलता हूं तो आध्यात्मिक की भूमिका बदल जाएगी हमारी बात समझ लो और ये बड़े बड़ों को सामने गाली सहना पड़ा है सामने भगवान जब अवतरित हुए थे स्वयं समझा
रहे हैं दुर्योधन को समझ में आ रहा है क्या वो मान ही नहीं रहा भगवान को भगवान नहीं मान रहा है भगवान समझा रहे सब तो हम तो भगवान के दास है हमारी बात सबकी समझ में कैसे आ जाएगी यह कभी सोचे ना कि हम सत मार्ग में चल रहे तो हमारी बड़ाई हो घर वाले प्रतिकूल हो जाएंगे पड़ोसी प्रतिकूल हो जाएंगे बगल से ही निंदा होने लगेगी अब चलो अगर छोड़ के बैठ गए तो फिर असली हार हो गई और अगर आप चल गए भगवत मार्ग में तो जीत जाओगे यह भगवत मार्ग है बहुत
कठिन मार्ग है बहुत क मतलब बहुत कठिन मार्ग है म बस यही कठिन को झेल जाए तो परम पद मिल जाता है परम पद मिल जाता कदम कदम पर परीक्षा कदम कदम पर विपरीत उसकी जो सच्चाई से चल रहा है झूठे चलोगे ड्रामा करके तो हलवा पूड़ी खाओगे मौत से रहोगे अगर सच्चाई से चले तब फिर प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा हो जाता है प्रश्नवाचक संसार का इतना विचित्र स्वरूप है कि किसी को कभी भी राजी नहीं किया जा सकता है किसी को राजी नहीं किया जा सकता परमार्थ में चलने पर इतना तो होता है क्या दो
सपोर्ट तो कर दे कि वाह भाई वाह शाबास क्या बात है तुम ऐसा चल रहे हो तो मन उत्साहित हो जाए लेकिन नहीं नहीं वो तुम्हें गिराना चाहेगा तुम्हारी निंदा करेगा तुम्हारा अपमान करेगा तब तुम्हें चलना है चल के तब तुम्हें दि ला है इसलिए बच्चा आत्म बल तो तोड़ना ही मत कभी आत्म बलवान रहो विजय हमारी इसलिए अवश्य होगी क्योंकि हम भगवान की शरण में और हम भगवान के अंश हैं अगर यह शरीर छूटा तो दूसरा शरीर पाएंगे तो भी हम भगवान का भजन करके भगवान की प्राप्ति करेंगे हम एक बार इस माया प्रपंच
से निकलेंगे जरूर और यह आशा तो छोड़ दो कि तुम्हें कोई सपोर्ट करेगा सब भक्तों से कह रहे सबसे कह रहे हैं सपोर्ट केवल भगवान करेंगे दूसरा कोई सपोर्ट नहीं कर सकता आप आप जी खोल कर के हृदय खोल के रख दो तो भी विश्वास नहीं करेगा यह संसार ऐसा है वह बोलेगा व अपनी चाल से बोलेगा अपने ढंग से बोलेगा बहुत विचित्र है बहुत विचित्र प्रियंक पटेल जी लंडन से राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज श्री जी कृपा से 2024 के प्रारंभ में मोबाइल के द्वारा आपका सत्संग एवं एकांतिक वार्तालाप सुनने का सौभाग्य
प्राप्त हुआ महाराज जी आपके वचन अनुसार जैसे ही धन मार्ग में बढ़ने की कृपा हुई प्रतिकूलता एं आगमन हुआ वर्तमान स्थिति में प्रतिकूलता एं बढ़ती हुई नजर आ रही है और श्री जी की कृपा से प्रारब्ध का शय हो रहा है आपकी कृपा से निरंतर नाम जप का और साधन का एवं आपकी आज्ञा पर चलने का प्रयत्न कर रहा हूं ऐसी स्थिति में मन क मन बार बार मोह और आशाओं से प्रतिकूलता देने वाले कार्यों की तरफ गिराने की कोशिश करता है गुरुजी ऐसी परिस्थिति में निष्काम भाव से धैर्य गवाए बिना प्रतिकूलता हों से लड़कर
आगे कैसे बढ़ा जाए अगर मन में कामना और मोह जैसे भाव प्रकट होते हैं तो ऐसे में विवेक कैसे आए मन में जो कामनाएं हैं व अज्ञान के कारण मोह के कारण है मोह को अज्ञान कहते हैं अविद्या कहते हैं मोह गए बिन राम पद होई न दृढ़ अनुराग मोह मूल बहु शूल प्रद त्याग होतम अभिमान भजो राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ये मोह बहुत दुख देने वाला है अज्ञान अज्ञान के कारण ही कामनाएं पैदा हो र हैं मैं शरीर हूं यही मान कर के हमारी नेत्र इद्री रूप देखना चाहती जने इद्री भोग भोगना चाहती
रसेंद्र स्वाद लेना चाहती इसी तरह इंद्रियों के गुलाम हम हो चुके हैं क्योंकि हम अपने को देह मान लिए देह भाव के कारण ही हमारी दुर्दशा हो गई है यही अज्ञान है अब इसी का नाश करने के लिए अध्यात्म है साधन को हरि भजन है क सत्संग सहाय साधना तो है कि निरंतर मैं नाम जप करूं और सहायता है सत्संग की भगवत बोध संपन्न महापुरुषों के जब हम वचन सुनते हैं तो उनके वचनों के द्वारा हमारे अज्ञान का नाश हो जाता है हमारी कामनाएं बहुत जन्म जन्मांतर से बढ़ी हुई है दुर्वासना मम सदा परिकर शयत
अब ये एक दिन दो दिन के भजन में तो नष्ट होने वाली नहीं है ये बड़ा भारी युद्ध है हमारा मन विषयों में जाएगा उसको हमको खींच खींच कर भगवान में लगाना है अगर विजय होने की भावना है तो कष्ट सहना सीखो ता स्थिति क्सव भारत सहनशील जो बन गया वही जीत गया इस मार्ग में और जो टूट गया तो फिर भोग वासना उसे परास्त कर देती हैं है कुछ नहीं एक भ्रम है भ्रम अज्ञान अविद्या बड़े-बड़े ज्ञान की बातें बारने वालों को भी भ्रम पटक देता है यह भ्रम कोई ऐसा भ्रम नहीं है चार
दिन भजन करो या चार ग्रंथों को पढ़ लो तो तुम्हारे भ्रम का नाश हो जाएगा जा सु कृपा सब ब्रम मिट जाई गिरजा सोई कृपाल राई आर्त भाव से भगवान को जो सच्चाई से भजते हैं पुकारते हैं तो उनकी कृपा से जो ज्ञान होता है उससे जड़ चेतन ग्रंथि का भेदन हो जाता है तो बहुत प्रबल भगवान की अविद्या से भ्रम हो गया है य जा कृपा सब भ्रम मिट जाए यह इतनी प्रबल है ज्ञानी नाम चेतास देवी भगवती हिसा बलादास मोहाय महामाया प्रति ज्ञानियों की बुद्धि को भ्रष्ट कर दे ऐसी प्रबल है तो फिर
औरों की तो बात क्या तो नाम जप कीजिए सत्संग सुनते रहिए जहां जहां मन गलत जाए कल हम एकांतिक में एक बात बताई थी कि हमें मन के साथ हर समय विपरीत ही नहीं रहना उसको दुलार भी करना है दुलार नहीं करोगे तो वश में नहीं होगा और दुलारे करते रहोगे तो भ्रष्ट कर देगा नष्ट कर देगा दोनों बातें हमको यह देखना जब वह गलत मांग कर रहा है तब नहीं मानना और जब सही मांग कर रहा है तो उसकी पूर्ति कर देना आप वृंदावन आए हो मन की ही मांग से मनने मांग की चलो
यार वृंदावन चलते हैं बाबा के पास बैठ के सुनते हैं तो आप इतनी दूर से यात्रा करके आ गए ना अगर मन राजी नहीं होता तो आप आ ही नहीं सकते थे मन ने आपको सपोर्ट किया तो तो आप मन को सपोर्ट कीजिए जहां सही है कह रहा है कि आज यार हम अमुक चीज पाना चाहते हैं हां हां बिल्कुल अगर हमारे पास सामर्थ्य है हम आपको खरीद के लाते हैं भगवान का भोग लगाते हैं और पवा हैं आपको फिर इसके बाद वो गलत संकल्प करता है तब उसको डांट लगाते नहीं नहीं नहीं अब चाहे
मर जाऊं पर ऐसा नहीं करूंगा वो तुम्हारे बिना कुछ कर नहीं सकता मन घबरा जाता है जो कच्चा साधक होता है अरे हमारा मन ऐसा कुछ नहीं कर सकता वो केवल भय दिखा रहा है केवल प्रलोभन दिखा रहा है आप केवल स्वीकृति मत करो नहीं नहीं नहीं अ कुछ नहीं कर पाएगा एक काम करेगा अपने आप जलेगा और उसकी जलन को तुम दृष्टा भाव से सहो तुम मन नहीं हो कहते ना आज मन में बहुत अशांति है तो मन ही तो अशांत है ना तो अशांति के आचरण किए तो इसलिए जल रहा है जलने दो
अभी थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा ये आमा पाइन अनिस येय आने जाने वाली वृत्तियां है कभी सुखद कभी दुखद ये कोई टिकाऊ नहीं है टिकाऊ तो जब होगी जब भगवत साक्षात्कार हो जाएगा इसलिए नाम जप करो सत्संग सुनते रहो घबराने की जरूरत नहीं जहां जहां मन गलत जगह जाए उसे हटाकर प्रभु के चरणों में लगाओ और बलवान बनो जो नहीं करना चाहिए वह नहीं करूंगा और जो करना है उसमें सादर सपोर्ट दे दो मन का इसी तरह धीरे से मन को जब अधीन किया जाता है तो यह इसका एक बहुत बड़ा गुण है मन
का यह जो कुछ पकड़ता है जल्दी छोड़ना नहीं जानता है इसमें अगर विषय हमने पकड़ा दिया तो देखो जन्म जन्मांतर हो गए व नहीं छोड़ पा रहा अगर हमने भगवान को पकड़ा दिया तो भगवान को भी नहीं छोड़ेगा इसको पकड़ना आता है छोड़ना नहीं आता इसको छुटा पड़ेगा जो जो पकड़ा दिया जैसे आपने कुछ भजन पकड़ाया तो आपका साथ दे र है ना भजन में अब अगर उतना भजन हम भी कहे छोड़ दो आपसे तो आप नहीं छोड़ पाओगे एक बार एक संत के पास उनके शिष्य गए बोले 12 साल से जो आपने गुरु मंत्र
दिया व हम जप रहे हमें कोई लाभ तो नजर आ नहीं रहा बड़े महापुरुष थे तो उन्होंने कहा ठीक है हम तुम्हें अपनी कसम देते हैं तो हमें गुरु मानते हो बोले जी यह मंत्र जो है 24 घंटे तुम ना जपना फिर इसके बाद आना हम तुम्हें ऐसा मंत्र देंगे कि तुम्हें ज्यादा लाभ मिल जाएगा कहा जी अ पूर्वा अभ्यास 18 साल का और गुरु ने कहा कि जपना नहीं है तो जो इस सीढ़ उतरे म व बार वो दौड़ के लौट के आए चरणों में लट गए बोले महाराज यह नहीं हो सकता कि मंत्र
छोड़ दे अब वो तो बोले यह प्राप्त हुआ 18 साल में यह 18 साल में प्राप्त हुआ है कि मेरी कसम खवाने पर भी तुम मंत्र नहीं छोड़ सकते हो क्यों मन ने पकड़ लिया अब नाम मंत्र पकड़ लिया तो उद्धार होने में क्या दे रही म हम बोले राम कृष्ण हरि राधा हमारे प्राण निकल गए तो हम भगवान को प्राप्त हो गए अंता मति सगति तो चिंता नहीं करनी और दूसरी बात है कि जैसे लोग को सोचते हैं कि हम दो दिन चार दिन नाम जप करें करोड़पति बन जाए ऐसा नहीं है बहुत जन्मों
के हमारे पाप जमा है नाम जपते जपते जब वह पाप नष्ट होते हैं पाप ही हमें दुख देते हैं तब हमारे अंदर आनंद की प्रक अंदर के आनंद से रुपया में आनंद है हम कह रहे हैं आपको कमरे में बंद कर दे आसपास नोट जमा कर दें कितने घंटे आप उन नोट के बीच में जी पाओगे चिल्ला चिल्ला के कहोगे कि सब नोट हटा दो मुझे पानी पिला दो सब नोट हटा दो मुझे भोजन कर सब नोट हटा मुझे ल शंका कर लेने दो सब नोट हटा दो मुझे थोड़ा खुला कर दो मतलब रुपया थोड़ी
जीना है रुपए से भोग सामग्री मिलती है भोग सामग्री के लिए रुपया प्रिय और इंद्रिया भोगों में लगी इसलिए भोग सामग्री प्रिय है और सच्ची बात यह है कि आनंद बाहर नहीं आनंद अंदर है और जब आपको अंदर का आनंद मिल जाएगा तो बाहर की कामनाए शांत हो जाएंगी निज सुख बिन मन होई की थिरा जब अंदर आनंद मिलता भगवद आनंद मिलता है ये सब छिछोरापन खत्म हो जाता है ये जो भटकना है ना छोटे-छोटे भोगों में जैसे निर्मल मृदु शांत जलाशय के प्राप्त होने के बाद छोटे-छोटे गड्ढों की याद नहीं आती ऐसे भगवता अंद
की स्फूर्ति होने पर हर इंद्रिय हर मन परम शांत हो जाता है बड़े भाग्यशाली हो बच्चा जो इस कलिकाल में तुम ऐसे विषय बाहुल्य समाज के बीच में रहते हुए तुम भगवत भजन करना चाहते हो तुम भगवत प्राप्ति करना चाहते हो हा भगवान तुम्हारे साथ है खूब अच्छे से भजन करो और इसी जन्म में परम सुख प्राप्त करो नहीं आप कम से कम यह देख लिया तो यह भी तो देखो मनुष्य तो वही है ना बोले सब कुछ देखा है सब कुछ नहीं देखा अभी सब कुछ तब देखे माना जाएगा जब तुम प्रभु को देख
लोगे क्योंकि अनंत ब्रह्मांड प्रभु में वास करते हैं प्रभु को देख लिया सबको देख लिया प्रभु को लिया सब कुछ पा लिया प्रभु को जान लिया सब कुछ जान लिया जिसके जानने के बाद कुछ जानना बाकी नहीं रहता जिसके पाने के बाद कुछ पाना बाकी नहीं रहता आखिरकार वह क्या आनंद है हमें देखना चाहिए ना तो हिम्मत करके चलो कोई भी कार्य सरल नहीं है पहली बात समझ लो किसानी सरल है क्या नौकरी सरल है क्या क्या सरल है हमें बताओ कोई भी कार्य सरल है क्या तो भगवत प्राप्ति कैसे सरल हो जाएगी भगवत प्राप्ति
इसीलिए कठिन मानी गई है कि सब जगह से वृत्तियों को हटाकर प्रभु में लगाना सबसे कठिन काम है हैले तो सरल कौन सा काम कोई सरल काम तो नहीं है आप हमें बताओ क्या सरल काम कोई सरल काम नहीं अरे भाई सबको मेहनत करनी पड़ रही सब कोई अपने दिमाग को लगा रहा है लेकिन दिशा गलत है इसलिए आनंद का अनुभव नहीं हो रहा अगर यही दिमाग प्रभु की तरफ लगाकर धर्म पूर्वक कार्य करो अभी आनंद की अनु हम ये नहीं कहते कि आप करोड़पति बन जाओगे लेकिन जो अरबपति करोड़पति को भी सुख नहीं वो
आपको प्राप्त हो जाएगा जो ब्रह्मा आनंद है भगवता आनंद है प्रेमा आनंद है यही हम चाह रहे हैं नहीं हमें कोई प्यार करे नहीं लगता कोई ऐसा प्यार करे जो सिर्फ मुझे प्यार करें अपने लिए मुझे ना प्यार करें मेरे लिए मुझे प्यार करें ऐसा कोई त्रिभुवन में नहीं है बला कोई वो केवल भगवान है अगर कोई हमसे प्यार करता है तो हम उसके लायक हैं कहीं ना कहीं तभी व हमसे प्यार करता है जिस दिन उसके लायक नहीं रह जाएंगे उस दिन वो हमारी तरफ देखेगा मैं नहीं कोई भी हो तब यह अनुभव की
बात कह रहा हूं संसार के हर क्षेत्र को भगवान ने दिखा दिया उसी अनुभव से बोलते हैं एक मात्र भगवान ऐसे हैं जो हर स्थिति में तुम्हें प्यार करेंगे और संसार का कोई प्यार करने वाला तब तक प्यार करेगा जब तक कुछ स्वार्थ की पूर्ति हो रही और जिस दिन उसके स्वार्थ की पूर्ति नहीं हुई या तुमसे अच्छा मिल तुम्हे छोड़ देगा संसार का प्यार झूठा संसार का सुख झूठा सच्चिदानंद भगवान का सुख सुख है इसलिए धैर्य पूर्वक चलो मन को सत्संग की बातों से समझाकर बुझाकर प्रलोभन देकर आनंद का उसे भगवान की तरफ लगा
अशोक दास जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोट नुमान महाराज जी हम पिछले 17 साल से धाम में वास कर रहे हैं कभी अगर वृंदावन से बाहर जाना पड़े तो हमेशा मन उचा होने लगता है और जहां जहां भी जाते हैं वहां मन नहीं लगता हम सुकून हमें वृंदावन में ही आकर मिलता है महाराज जी ऐसा क्यों होता है क्योंकि आप पर कृपा है आप पर लाडली ज की कृपा है हमें लगता है धीरे-धीरे आना जाना बंद करो जब आना जाना बंद तो आना जाना बंद पता नहीं कब सांस छूट
जाए तो जो कुछ ऐसा कुछ हो तो कर लो समेट लो और अखंड वृंदावन वास करो आपका मन भी राजी हो जाएगा और ये बहुत बड़ी उपलब्धि हो जाएगी देखो आप अपने लोग संत भेष में हमारा कोई कर्तव्य नहीं हमारा एक ही कर्तव्य भगवान की प्राप्ति तो देखो हमारे भजन में अगर कहीं चूक हो गई कि हमारा अखंड सुमिरन नहीं चल रहा तो भजन के चार सोपान है धाम नाम रूप और लीला हमारा लीला चिंतन नहीं हो रहा हमारा रूप ध्यान नहीं हो रहा माना हमसे नाम जब भी छूट गया अधिक कष्ट के कारण लेकिन
हम धाम में है तो धाम से भगवत प्राप्ति हो जाएगी वृंदावनी प्रभाव सुन अपनो ही गुण देत जैसे बालक मलिन को मात गोद भर लेत अगर यहां इस रज में हम छटपटाते हुए प्राण त्याग दिया तो मुझे प्रिया जो मिल जाएंगी भगवान मिल जाएंगे पक्की बात है तो अब सबको तो सौभाग्य है नहीं अब अपने लोगों को भगवान ने सब ऋणों से मुक्त करके एक मार्ग दे दिया हमें लगता है अभी तक जो जगत मंगल के लिए संत जन बाहर जाते हैं संतों का उद्देश्य होता है कि नाम रूप लीला कीर्तन भगवत चर्चा करके भूले
हुए लोगों को भगवान में लगाना तोब बहुत हो गया वृद्धावस्था का समय है अब आमरण वृंदावन वास अब शरीर छूटेगा वृंदावन में किसी भी स्थिति में वृंदावन से बाहर नहीं जाएंगे मन भी नाच पड़ेगा और जीवन का लाभ मिल जाएगा अच्छा क्या भरोसा कहां स्वास टूट जाए किस स्थिति में तो इसलिए मन अशांत हो जाता है क्योंकि आपका मन भागवत है संसार तो है नहीं तो इसलिए हमें लगता है अपने को नियमावली में आ जाना चाहिए भाई अभी तक जो हुआ सो हुआ अब अखंड वृंदावन बास शशांक दुबे जी नोएडा से राधा बल्लभ श्री महाराज
जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मोह खत्म हो जाना ही अगर भगवत प्राप्ति है तो भगवान के प्रति जो मोह है अगर वह भी खत्म भगवान के प्रति मोह नहीं होता भगवान के प्रति प्रेम होता है मोह कहते हैं माया कृत अविद्या भ्रम को जैसे हमें मोह हो जाता है कि मेरी स्त्री है ये मेरा पुत्र है नहीं कोई किसी का वही सच्चिदानंद भगवान सब अंश उसका विराजमान है और कर्मानुसार शरीर से संबंध बना इसे मोह कहते हैं जो भगवान से होता है उसे अनुराग कहते हैं प्रेम कहते हैं और जो संसार
के व्यक्ति वस्तु स्थान से होता है उसे काम कहते हैं राग कहते हैं मोह कहते हैं आसक्ति कहते हैं समझ आप हा तो मोह का मतलब है अविद्या अविद्या का नाश हो जाना तो भगवान से मोह थोड़ी होता भगवान से अनुराग होता है प्रेम होता है जो अनुराग प्रतिक्षण बढ़ता रहता है प्रेम का स्वरूप क्या प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम का स्वरूप क्या है कामना रहित अनुभव स्वरूपम सूक्ष्म तरम दिव्य प्रेम दिव्य है और मोह जो पार्थिव को लेकर होता है पार्थिव पांच भौतिक वस्तु से देखो हिरण के बच्चे से मोह हो गया भरत जी को तो
अगला जन्म हिरण का होना पड़ा भगवान से मोह थोड़ी होता है प्रेम होता है भगवान कभी सुना है कि भगवान से मोह करो कभी ऐसा नहीं कहा गया कहा गया भगवान से प्रेम करो भगवान में मन को जब लगाओगे तो प्रेम होगा अच्छा संसार में प्रेम जो कहा जाता है वह राग होता है वो काम होता है वो मोह होता है और भगवान से जो होता है सच्चिदानंद से जो होता है उसे प्रेम कहते हैं सच्चिदानंद से प्रेम होता है और संसार पांच भौतिक माया कृत वस्तु व्यक्ति स्थान से मोह होता है राग होता है
आसक्ति होती कामना होती आप सोच पा रहे हां भगवान से तो प्रतिफल प्यार बढ़ाना है अनुराग बढ़ाना है अगर उनके प्रति हम सरल भाषा में कहते हैं कि हमें भगवान से बहुत मोह हो गया है तो शब्द का ज्ञान नहीं रखता इसलिए मोह बोल रहा है वो भगवान से प्यार की बात कर रहा है कि हमें भगवान से प्रेम हो गया है तो संसार में तो प्रेम होता ही नहीं है संसार में कहां प्रेम प्रेम का जो अर्थ है प्रेम का अर्थ होता है जैसे मैं आपसे प्यार करूं तो सिर्फ आपके सुख का चिंतन करूं
कि आपको कैसे सुख मिलेगा मैं ऐसे बोलू मैं ऐसे बैठूं मैं ऐसे चलूं मेरी ऐसी चेष्टा हो कि आप मेरे से प्रसन्न रहे आपको सुख मिले ऐसा कहां सोचा जाता है आपसे मुझे कैसे सुख मिलेगा यह सोचा जाता है संसार में ये नहीं सोचा जाता है कि मैं आपको बहुत प्यार करता हूं तो छुपी हुई बात है कि मैं आपसे कुछ पाना चाहता हूं इसीलिए कहते हैं कि भाई हम आपसे बहुत प्यार करते हैं यह जता करके हम अपनी वासना पूर्ति करना चाहते हैं तो काम हो गया राग हो गया आसक्ति हो गई मोह हो
गया जहां भगवान को हमसे कुछ नहीं चाहिए भगवान को हमसे कुछ चाहिए क्या वो तो पूर्ण है सच्चिदानंद है वो सब कुछ प्रकट किए उनको क्या चाहिए उनसे जब हम प्रेम करते हैं तो हमारी चाहत नष्ट हो जाती है जितनी असद वासना सब भस्म हो जाती है जब भगवान की तरफ हम चलते हैं तो सारी कामनाएं धीरे-धीरे छूटने लगती हैं और जब हम संसार की तरफ चलते तो कामनाए बढ़ने लगती हैं जब हम भगवान की तरफ चलते हैं तो ना शरीर अच्छा लगता है ना शरीर के संबंध ही अच्छे लगते हैं लेकिन जब संसार की
तरफ चलते हैं तो शरीर अच्छा लगता है शरीर संबंधी अच्छे लगते हैं बड़ा उल्टा है आप देखो ना इस मार्ग को देखो जब हम भगवान की तरफ सच्चाई से चल दिए तो फिर कुछ अच्छा नहीं लगता विषय भोग निद्रा हासी जगत प्रीति बहु बात और जब संसार की तरफ चलते तो यही अच्छा लगता है तो संसार की तरफ गंदा काम है राग है मोह है अविद्या है जो हमें बार-बार दुख क्लेश अशांति देती है भगवान की तरफ सुख शांति और अमृत पद की प्राप्ति होती है वो प्रेम है अगर कोई अज्ञान की दशा में बोल
भी दे कि मुझे भगवान से मोह तो उस मोह का अर्थ प्रेम है और इधर बोल भी दे की प्रेम तो उसका अर्थ मोह है अज्ञान है काम है राग है आसक्ति समझ गया पलवल से ज स्थिति में उस आस्था को उस विश्वास को बनाए रखने व भी ऐसा होता परिस्थिति ऐ हो जाता है जब तक हमारे अंदर सत्संग के वचन एकत्रित नहीं है तब तक हम लड़ कैसे सकते हैं सोचो जैसे परिस्थिति आई तो इस परिस्थिति में लड़ने के लिए यह शब्द है ये विचार है और उस विचार को संग्रह करने के लिए नाम
जप है नाम जप से हमारी बुद्धि पवित्र होगी और पवित्र बुद्धि में संत वाणी विराजमान होगी तो भगवान और भगवान के भक्तों की वाणी में इतनी सामर्थ्य है कि हर परिस्थिति से उभार लेते हैं देखो हर परिस्थिति से उभरने का एकमात्र उपाय भगवत वचन है संत वचन है नहीं तो अर्जुन जी की जब परिस्थिति बिगड़ी कार्पण दोष प्रत स्वभावा प्रमित धर्म समू चेता तो भगवान ने गीता जी का उपदेश किया उसी उपदेश से उनको पुनः नया पावर मिला नई सामर्थ्य मिली नए विचार मिले तो ऐसे ही हम भगवान के वचनों से भरपूर जो संत के
वचन होते हैं उनको जब अपने दिमाग में बैठा लते हैं तो हर परिस्थिति का उनके अंदर काट होता है हर परिस्थिति का काट होता है इसलिए नाम जप करो और सत्संग सुनो अपने आप आपके अंदर विचार आने लगेंगे जिससे आप उस परिस्थिति से उभर जाएंगे आप फसगे नहीं राहुल गुप्ता जी राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी नाम जप फल स्वरूप अनुभूति के पश्चात मन भ्रमित और व्यथित हो जाता है कई शंकाएं आ जाती है निरंतरता फिर नाम का जप का फल का अनुभव कहां हुआ क्षणिक कुछ एहसास होता है और फिर अचानक नहीं
अभी क्षणिक पे नहीं बूंद देखो हमारी जन्मों की प्यास ओस के चाटने से नहीं बुझेगी हमको छक के पीना पड़ेगा इसलिए उठते बैठते चलते फिरते देखो एक डॉक्टर पर विश्वास कर लोगे हरि नीली पीली दवाएं जब देता है टेबलेट तो हम कभी संशय नहीं करते कि हरी क्यों है भैया हरी की जरूरत क्या है नीली हम नहीं खाएंगे पीली नहीं खाएंगे ऐसा नहीं बोलते जो दवा देता है हम खा लेते हैं तो संत सदगुरुदेव शास्त्र पर विश्वास करो कि नाम के समान कोई साधन नहीं है हम कहते हैं हमारा तो प्राण धन जीवन धन राधा
नाम है आपको जो प्रिय हो राम कृष्ण हरि शिव जो भी नाम प्रिय हो आप उस नाम को निरंतर जपो अगर आपका मंगल ना हो जाए आपकी कामनाएं पूर्ण ना हो जाए पर उसके लिए इंतजार करो जैसे किसान आदमी खेती बो करके फिर इंतजार करता है वो जगती है फिर उसका सेवन करता है चार छ महीने लगते हैं तब फसल तैयार होती है तो ये तो भागवत की फसल है इसके लिए इंतजार करो ये पहले तुम्हारे पापों का नाश करेगी अनर्थ का नाश करेगी तब तुम्हारे अंदर आनंद आएगा तो संशय किस बात का होता है
कि पता नहीं फल मिले कि ना मिले मोह हो ग मतलब ये मेरी केवल मोह है जस में जो विचार कर रहा हूं वही व्यक्त हो रहे हैं उ सब कुछ देखो इसको एक विश्वास से आप चलो संत सदगुरुदेव का आश्रय क्यों लिया जाता है उनकी बातों पर विश्वास किया जाता है अब जैसे आप वृंदावन आए हो अब वो कह रहे आपको सेवा कुंज निधिवन रंगनाथ जी अमुक अमुक जगह दर्शन कराएंगे तोब आप हर गली के मोड़ प को कहां लिए जा रहे हो अरे पता नहीं तो वो आदमी फिर कहे जाओ अच्छा तुम जहां
जाना जाओ ऐसे ही जब संत तुम्हें गाइड कर रहे हैं कि तुम नाम जप करो श मंगल हो जाएगा कोई संशय नहीं करना तो मान लो आपको उनकी बात पर अगर विश्वास नहीं होगा तो फिर भटकना पड़ेगा आप शास्त्र हैं उनका स्वाध्याय करके देखो सब आज का सत्संग जो सुना हो तो आज के सत्संग में श्री तुकाराम जी क्या कह रहे थे सब साधनों का सार मुझे राम कृष्ण हरि ये गुरुदेव ने दे दिया नाम दे दिया इसी से सब कुछ प्राप्त हो गया बोले जब हमारे गुरुदेव ने कृपा नहीं की हमें गुरुदेव नहीं मिले
थे तब हमारी साधना से ऐसा हम था कि जैसे वो उदाहरण दे रहे थे कि जैसे मोट से पानी खींचकर मोट माने गांव में एक चमड़े का बहुत बड़ा थैला जैसा होता था उससे कुआ से पानी उसे पुर कहते थे उसे घसीट के फिर खेतों में सीच व बोले दिन भर सींचने पर 10 पाच हाथ 100 हाथ सीता था लेकिन गुरु कृपा और नाम जप बोले गंगा की धारा से जैसे ऐसे क दो कुछ मिनट में पूरा खेत उ फार में आ गया बोले तुकाराम जी कहते हैं कि जब गुरु ने मुझे नाम दिया राम
कृष्ण हरि और मैं उनके बताए मार्ग पर चला तो मैं ऐसे निहाल हो गया जैसे गंगा की धारा से कनेक्शन हो गया विश्वास करो बात मानो बोले अब राधा राधा कहते हैं पता नहीं इससे लाभ मिलेगा कि नहीं मिलेगा अरे भाई कोई एक महान गुप्तस है यह राधा नाम आप जप करके देखो अच्छा यह बताओ अपने लोगों ने जीवन दिया है तो क्या हम पार्टी बंदी में जीवन देंगे क्या क्या किसी अंधविश्वास में जीवन देंगे क्या हम किसी पक्षपात में जीवन देंगे क्या तुम तो कम से कम गृहस्थ धर्म में जी रहे हो भोगों को
भोग रहे हो संसार को देख रहे हो और फिर राधा नाम जपना चाहते हो हमारा तो जीवन है अगर धोखा होता तो मैं ऐसे क्यों फसता आप विचार करके देखो ना इसका मतलब है कि कोई ऐसा स्वाद है जिसको आपने नहीं लिया तो अब हमारी बात मान लो तो आपको स्वाद वो मिलने लगेगा पर बात मान के खाओगे दवा तभी सदगुरु वैद्य वचन विश्वासा संजम यह न विषय क आसा सदगुरु के रूपी वैद्य के वचनों रूपी औषधि पर विश्वास कर ले तो बात बन जाए अब अगर विश्वास ना करोगे तो फिर भटकना पड़ेगा हित ध्रुव
जो विश्वास है तब सुधरे बात नात माया पंथ में फिरे जो टक्कर खात आप समझो राधा नाम के बल से सबफ सह रहे हैं राधा नाम के बल से सब आनंद की अनुभूति हो रही है राधा नाम हमारा जीवन हमारा प्राण हमारा सर्वस्व है आप उसको पकड़ लो तो आप फिर खुद देख लोगे सब कुछ स्वयं हरि जो नाम जप करते हैं वह है राधा लाभ अब ये कि पता नहीं फल मिलेगा नहीं थोड़े दिन खा के तो देखो राधा नाम सुधार सम रसी तुम जिस तुमहे बहला थोड़ा राधा राधा राधा राधा अरे यहां का
पत्ता पत्ता राधा राधा बोलता है ये ब्रज वृंदावन है यहां तो यहां का सर्वस्व राधा राधा राधा तो जहां भी हो राधा राधा रटो ग तो हरि की कृपा प्राप्त हो और सबसे बड़ी बात अपने कर्म संस्कारों को मिटा पाना बहुत कठिन है और एक श्लोक राधा सुधा निधि का है कि अनु लिख्या नंता न पित प राधान मधुपति महा प्रेमा विष तो परम देयम बम सति तव कम श्री राधे गण नामा मृत रसम महिम ना का समाम इस प्रसत दस मन साम जिसने बोला राधा राधा राधा तो लाल जो उसका रजिस्टर ही फाड़ देते
हैं जन्म जन्मांतर के जो हम हमारे पाप कर्म जमा है ना रजिस्टर और अनु लिख्या कभी दोबारा लिखेंगे नहीं क्योंकि राधा नाम जापक है अनु लिख्या अनंता अनंत अपराध और फिर महान करुणा शल प्रभु सोचते हैं मेरी प्रिया जू का राधा नाम इसलिए लिया इसको क्या दूं तो माया तो देंगे नहीं तो आप अपना प्रेम अपनी अधीनता मैं उसके अधीन हो जाता हूं इसलिए विश्वास करो महापुरुषों ने जो स्वाद चखा है वो बड़ा दुर्लभ यह समय है जो अपने बाहरी लोगों को भी राधा नाम राधा रूप राधा महिमा सुनने को मिल रही नहीं भाई यह
गुण विषय वृंदावन का है बाहर का नहीं बाहर नहीं कोई जानता इस विषय को यह तो आज कृपा हुई है कि देश विदेश और पूरा प्रांत सब जान रहे राधा नाम राधा राधा राधा राधा रट रहे ये लाडली जो कृपा करके ये विस्तार करवाना चाहती थी इसलिए हुआ नहीं ये यह रस और यह उपासना और यह रूप यह यद वृंदावन मा गोचर महो यन शति कम शरो प्यारो ढम क् मते नयु सुका नाम ध्यानम यत प्रेमा मृत माधुरी रसमय यन नित्य कै सरकम तद द्रुप परिवेट मेव नैनम लला मानम मम इसका अर्थ है कि जो
रस त्रिभुवन में वेदों में भी नहीं है रस वृंदावन में है यद वृंदावन मात्र गोचर म हो उस रस समुद्र का सार है श्री प्रियाज जो केवल वृंदावन की कृपा से ही देखने में आ सकती दूसरा कोई उपाय नहीं यहां की रज का सेवन रा के रसिंग और यहां के बृजवासन में सामर्थ्य है कि राधा रस की प्राप्ति के लिए लालसा पैदा कर दे और राधा रस की प्राप्ति करा दे बोले बड़े-बड़े महापुरुषों में भी क्षमता नहीं कि हमारी किशोरी जी की महिमा को जान जाए प्यारो उडम क्मत सु काद नाम ध्यानगुरू पम परिवेट में
नैनम लोला मानम मेरे नेत्र ललचा र है कि मैं ऐसी किशोरी जू ऐसे लाल जू को कब देखूं ये वृंदावन का रस है खूब आनंद पूर्वक जपो बड़ी कृपा है लाडली जू की कि यह रस थोड़ा उफान मारा तो दूर-दूर तक छिटका इसीलिए सब कोई नहीं समझ पाता है अब जै लोगों का प्रश्न होता है कि भागवत में तो राधा नाम राधा नाम उच्चारण कर देते तो सुखदेव जी जानते थे समाधि में हो जाते हो सात दिन में परीक्षित का उद्धार करना है इसीलिए बोले नहीं बस घुमा कर के उन्होंने कहा कि कोई एक ऐसी
गोपी है ऐसी सखी है जिसकी आराधना स्वयं श्री कृष्ण करते हैं और उसको लेकर के हो गए हैं अनया राध तो नम भगवान हरि ईश्वरा ईश्वर के ईश्वर भगवान हरि जिनकी आराधना करते हैं यह वह गोपी है जिसको लेकर गए भागवत में इतना संकेत करते कौन श्री लाडली जो पर राधा नहीं बोला क्योंकि राधा बोलते ही उनकी प्रेम समाधि लग जाती है सात दिन में में परीक्षित जी का उद्धार करना है इसलिए एक बार वि रादा नहीं बोला हरिराम व्यास जी ने एक पद में लिखा है परम धन राधा नाम आधार इस पद में लिखा
है कि श्री यात श्री सुख प्रकट क्यों नहीं जान सार को सार परम धन रा क्योंकि उनकी समाधि लग जाती ये परम धन है परम है और राधा नाम जप करके स्वयं आप अनुभव करो राधा राधा राधा रटो और फिर आगे देखो और ये कोई मतलब छलावा थोड़ी है वृंदावन प्रिया प्रीतम यह कोई छलावा थोड़ी कोई छल थोड़ी कोई कपट थोड़ी है देखो दो विभाग हैं एक है भगवान का राज दरबार जो गीता भागवत वेद महिमा गाते हैं जैसे सूत मागत बंदी जन राजा का यस गाते हैं ना और एक है उनका प्रेम खेल जो
राज दरबार वाले भी नहीं जानते वेद भी नेति नेति कहता है हमारे प्रभु का जो प्रताप है रूप है गुण है वय है बल है ऐश्वर्य है ज्ञान है जितनी महिमा यह सब राज दरबार की है लेकिन यह जो वृंदावन महल है यह प्रेम है उनका प्रेम खेल है अब जो राजा जरा सा भृकुटी टेढ़ी कर दे तो प्रांत के प्रांत नष्ट करवा दे वही राजा जब महल में जाता है और उसकी प्राण प्रिया अगर भृकुटी टेढ़ी कर दे तो घुटने पर हो जाता है समझ रहेला अब यह बात सबकी समझ में थोड़ी आएगी वही
राजा जो दरबार में बैठ है जब भकूट टेढ़ी करता है तो प्रांत के प्रांत नष्ट करवा सकता है वही जब महल में जाता है और सुनने को मिला क्या बात है आज वो यहां बहुत शांति दिखाई दे रही बोले महारानी तो मान भवन में है कदम आगे नहीं बढ़े कदम आगे बढ़ क्या हुआ क्या मेरे से कोई गलती हो गई किससे गलती हो गई क्या हुआ अब वहां जाके फिर जो प्रेम की वो चर्चा चकि सब कोई अधिकारी नहीं है आप इससे थोड़ा हम प्रकट लीला में वर्णन करते हैं महाराज दशरथ चक्रवर्ती सम्राट ऐसे बलशाली
की देव राजेंद्र भी उनकी भुजाओं का सहारा लिया तभी तो वरदान दिया वो बड़ा प्रसंग है लेकिन जेही महल में प्रवेश करते हैं कके जी के यह उत्साह सुनाने के लिए कि कल हम प्रातः काल अपने लाडले राम को राज्याभिषेक करेंगे यह सुनकर ककी को बहुत प्रसन्नता होगी देखा तो सब शांत क्या बात है बोले महारानी कोपन महाराज की वहां जब गए तो उन्होंने कहा ऐसे मलिन भेष धारण करके कोप भवन में तुम्हें ले देखो तुम्हें खुशखबरी सुनाता हूं कल अपने लाड़ले राम को मैं राज्याभिषेक दूंगा उनका और वह प्रीति का बल देखो इतना प्रेम
क के जी से है व कहते हैं मैं तुम्हारे चरण स्पर्श करता हूं आप पढ़ के देख लीजिए अभी अभी भेजता हूं दूतों को और सुबह ही भरत की व राजगद्दी दे दूंगा पर मेरे प्राण प्यारे राम को 14 वर्ष का बनवास ना दे नहीं तो मैं जी नहीं सकता अब उस समय की स्थिति को आप विचार करिए वो महाराज चक्रवर्ती है कि जाते हीय कहा था कि अगर किसी देवता ने अपराध कर दिया तो उसकी भुजा काटने में मैं समर्थ हूं वही विकल्प तो एक लोकवन तुमको प्रेम की यह तो महा प्रेम महा प्रेम
मतलब इस वृंदावन के प्रेम को समझने के लिए पहले राज दरबार का परिचय प्राप्त करें प्रथम सुने भागवत भक्त मुख भगवत बानी और फिर प्रभु से जब अनुराग हो श्री कृष्ण प्राण प्यारे लगने लगे फिर श्री कृष्ण की कृपा से उनके प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप राधा का तब परिचय प्राप्त होता है इसीलिए बाहरी लोग राधा को क्या समझते हैं राधा तत्व को जानने श्री किशोरी जो अरे बड़े-बड़े महापुरुष जिनकी चरण रज चाहते हैं वो महारानी जो है हमारी वो मतलब बाहर के लोग तो जानते नहीं ना बाहर तो राजा का प्रताप ही जानते हैं इसलिए
खूब नाम जप करो इसी से परम मंगल है अजय जी अमृतसर से श्र राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी जब कभी भी भजन करते हुए शुद्ध भाव से किसी भी नकारात्मक विचार को मन में लाए हुए हमारे अंदर आते हैं तो ठाकुर जी माया के प्रभाव से हमें विचलित कर देते हैं और मन एकाग्र नहीं हो पाता क्या क्या कर महाराज जी ठाकुर जी नहीं चाहते कि हमें भक्तों की श नहीं नहीं नहीं ठाकुर जी तो ठाकुर जी अगर चाहते नहीं तो आपको मानव देह क्यों देते ठाकुर जी आपका परम
मंगल चाहते हैं पर यह जो मन ठाकुर है यह बहुत जन्मों से भोगों में लगा हुआ है बहुत जन्मों से तो उसके संस्कार पड़े हुए हैं जब हम नाम जप करते हैं भजन करना चाहते हैं तो संस्कार उसमें निकलते हैं जब नाम जप करते हैं तो संस्कार निकलते हैं वो जब निकलते हैं तो उनको निकलना ना समझकर समझते हैं आ रहे हैं तो हम विचलित हो जाते हैं यदि हम विचलित ना हो तो बिल्कुल वो डिलीट होने जा रहे हैं जैसे कोई भी मैसेज डिलीट होना होता अपने सामने आता है ना तो ऐसे इसका क्रम
है मन का जैसे हम नाम जप करेंगे तो इसकी पूरी चिप खाली होगी जैसे भगवान ने रामचरित महाराजस में कहा निर्मल मन जन सो मोहि पावा स्पष्ट कह रहे मुझे कौन प्राप्त कर सकता है बोले जिसका मन निर्मल हो गया तो मल क्या है काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर इनके द्वारा जो चेष्टा एं हुई है जन्म जन्मांतर में व हमारे मन में संस्कार भरा हुआ है जैसे एक छोटी चिप में 350 घंटा 500 घंटा का प्रवचन भर जाता है तो भगवान ने मन रूपी चिप ऐसी बनाई कि अनंत जन्मों के संस्कार इसमें भरे अब
पूरा हमें डिलीट करना है तो अब काम के मानो एक लाख मैसेज हो तो हम बोले राम या राधा वो डिलीट हुआ फिर वही मैसेज फिर डिलीट हुआ फिर वही मैसेज काम का अब बार बार बार तो आदमी थक जाता है कि ये वही काम वही बकाया व काम नहीं है जो नाम जब से डिलीट हो गया वोह तो नष्ट हो गया अनंत जन्मों के संस्कार भड़े इसीलिए इस मार्ग में वही चल पाता है जो सत्संगी है हिम्मत करो जब मन गलत बातों में जा रहा है तो व जा नहीं रहा है उसमें जो गलत
बातें हैं नाम जप करते समय व निकल रहे हैं हमको धैर्य रखना चाहिए वो निकल रहे हैं आनंदित हो वो निकल गए वो निकल गए राधा राधा राधा राधा तो आनंद का अनुभव होने लगेगा आप डर जाओगे कि बहुत गंदी बातें आ रही है छोड़ दोगे तो फिर हार जाएंगे हम फिर मन जीत जाएगा फिर मन विषयों में ले जाएगा इसलिए हमें डरना है हमने भी तो देखा है इनको तो इनसे लड़ना पड़ा है मन कभी-कभी हम हंसी में कह देते हैं कि जैसे लोग पीएचडी अन्य अन्य करते हैं हमने मन की पीएचडी की है
क्योंकि ब पन से इसी पर नजर रखा है इसी को देखा है इसी को पढ़ा है इसी को समझा है इसमें उबना नहीं हमें धैर्य पूर्वक नाम पर दृष्टि रखनी राधा राधा राधा अब वो गलत निकल रहा है हमको य नहीं देखना कि मन बड़ा भाग रहा है बहुत गंदी बातें कर रहा है बड़ा गंदा चिंतन हो रहा है अरे नहीं नहीं जब हम भजन नहीं करते थे तब गंदा इतना नहीं होता था आप देखो अब क्यों गंदा हो रहा है क्योंकि अब भजन कर रहे हैं तो गंदी गंदी बातें जो जमा थी मन में
वो निकल रहे हैं जैसे किसी सरोवर में कछुआ और सब ये हो और जब गजराज घुसेगा तो सब बाहर निकलेंगे नाम गजराज जो ही अंदर प्रवेश करता है तो सारे विकार भागते हैं अब साधक समझ नहीं पाता कि भाग रहे हैं तो घबरा जाता है कि इतनी गंदी बात क्यों आ रही है अब हम तो चा भी नहीं कर रहे फिर भी इतनी गंदी बात क्यों आ रही तो वो ऊब जाता है नहीं ने की जरूरत नहीं बहुत बढ़िया हो रहा है अब हमारा मन खाली हो रहा है निर्मल होता चला जा रहा है नाम
जपने के प्रभाव से देखो कहीं ना कहीं आप खुद अनुभव करो भगवान की चर्चा सुनकर आपके आंसू आ रहे हैं भगवान की बात सुनकर आप और आपको अब संसार की वो बातें जो मन पहले राजी रहता था अब अच्छा नहीं लगता तभी तो प्रश्न हुआ ना इसका मतलब मन काफी हिस्से में निर्मल हो चुका है हमको डट के और भजन करना पूरा जहां निर्मल हो गया तहा भगवान का साक्षात्कार हो जाता है जहां मन निर्मल हुआ वहीं भगवान का साक्षात्कार हो जाता है जब हमारी भगवान की चर्चा में भगवान की बातों में आंसू निकलने लगे
तो जान ले कि अब धीरे-धीरे निर्मलता की तरफ मन जा रहा है जब हम भजन करने लगे हमारा मन रुदन करने लगे हां किशोरी हा लडली तब समझे कि अब बिल्कुल नजदीक आ गए हम पर उस समय भी उसमें वो मैसेज है काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर के वो फिर निकलेंगे तो आपको लगेगा अभी तो आनंद आ रहा था अ गंदा क्यों मन सोच रहा है सोच नहीं रहा वो उसके अंदर बसे हुए वो निकल रहे बहुत हम जब कह रहे हैं एक छोटी सी चिप में 350 घंटा का प्रवचन आ सकता है तो
मन तो भागवत खला इसके में कितने जन्मों के संस्कार है देखो कितनी ऐसी बातें हैं जो व्यर्थ की भरी हुई है आप स्वप्न में देखते हैं ना यह सब मन का खेल है स्वप्न में भी जो चल रहा है ना व सब मन का खेल है ऊट पटांग की बातें बे मतलब की बात यह सब भरी है उसमें यह भजन के द्वारा खाली होंगे जहां मन निर्मल हुआ तो निर्मल जन मन सो मोहि पावा मोही कपट छल छिद्र ण भावा भगवान कह रहे सारे दो दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं इसी नाम जप करने आप धैर्य
पूर्वक जपते रहिए बहुत कृपा है आप पर नाम जप करते रहे हां बहुत कृपा है भगवान की जो प्रभु के लिए रुदन करे जो प्रभु के लिए यह मन बर्दाश्त ना करे कि जो मन की बुरी बातें हैं अब अच्छा नहीं लगता ये बड़ी कृपा है नहीं तो संसार जानबूझ कर के देख रहा है गंदी बातें कर रहा है गंदी बातें अब भजन का प्रभाव देखो को गंदी बातें स्पूर्ण भी बर्दाश्त नहीं होती देखो भक्त का हृदय कितना पवित्र होने लगा अब स्फुरण भी बर्दाश्त नहीं होता क्रिया और सोचने की बातें जाने स्फुरण भी बर्दाश्त
नहीं होता तो जैसे-जैसे मन निर्मल होता जाएगा वैसे-वैसे निर्विकार होता चला जाएगा हमें डरना नहीं घबराना नहीं ये विकार नष्ट हो रहे हैं जो संस्कार बसे हुए दुर्वासना मम सदा परिकर श अंती दुर्वासना हमारे चित्त में बसी व हमें घसीटते है और नाम जब हम जब करते हैं तो दुर्वासना को नाम भगाता है तो जब निकलती दुर्वासना तब दिखाई देती है जैसे इस गेट से कोई आवे तो दिखाई देगा जावे तो दिखाई देगा अब वो जा रहे हैं वो आ नहीं रही वासना क्योंकि नाम चल रहा है तो आ कैसे सकती है जी राधा राधा
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