एक बोइंग 747 जिसमें ऑनबोर्ड थे 524 लोग। 24,000 फीट्स पर अचानक जहाज की टेल हवा में अलग हो जाती है। फ्लाइट क्रू के पास ना कंट्रोल्स बचे थे ना ही डायरेक्शन। केबिन में ना था ऑक्सीजन और ना ही एयर प्रेशर। लेकिन उसके बावजूद वह अगले 45 मिनटों तक जहाज को हवा में कैसे रखते हैं? यह कहानी है इंसानी हौसले, इंजीनियरिंग फेलियर और एक ऐसी फ्लाइट की जिसमें किसी किस्म का कंट्रोल नहीं बचा था और वह फ्लाइट थी जापान एयर 123 zम टीवी की वीडियोस में एक बार फिर से खुशामदीद। नाजरीन 12th अगस्त 1985 को जापान
एयरलाइन का एक बोइंग 747 टोक्यो के हनीदा एयरपोर्ट पर खड़ा पैसेंजर्स को ऑफब कर रहा था। ठीक 1 घंटे के बाद इसे दोबारा से टेक ऑफ करके ओसाका जाना था। हजारों लोग रोजाना टोक्यो से ओसाका का सफर करते हैं। पर आज का दिन कुछ एक्स्ट्रा ही बिजी था। क्योंकि जैपनीज हॉलिडे सीजन ओबॉन के लिए लोग अपने-अपने होमटाउंस जा रहे थे। हनीदा एयरपोर्ट पर जहाज की सफाई के बाद जापान एयर 123 में 509 पैसेंजर्स और 15 क्रू मेंबर्स ऑन बोर्ड हुए। क्रू के लिए यह एक रूटीन की फ्लाइट थी। पर पैसेंजर्स को इल्म नहीं था कि
जिस जहाज में वह सफर करने जा रहे हैं, वह बरसों पुरानी एक कमजोरी का शिकार है। एक ऐसा हौलनाक मसला जिसका ना पायलट्स को इल्म था ना ही फ्लाइट इंजीनियर को। बिजी शेड्यूल की वजह से इस खास बोइंग 747 की यह आज की सिक्स्थ फ्लाइट होने वाली थी। तीन कॉकपेट क्रू की बात की जाए तो इसमें 49 इयर्स के कैप्टन मासामी टाकाहामा फ्लाइट को लीड करेंगे जिनका टोटल 12,000 घंटों का एक्सपीरियंस था। फर्स्ट ऑफिसर 39 इयर्स के यूटाका ससाकी थे। जिनकी कैप्टन के लिए प्रमोशन होने का प्रोसेस ऑलरेडी चल रहा था और यह फ्लाइट उनकी
प्रमोशन के लिए सबसे अहम थी। इनका टोटल 3900 घंटों का एक्सपीरियंस था। थर्ड कॉकपिट क्रू में 46 साल के फ्लाइट इंजीनियर हिरोशी फकुडा थे। जिनका काम पायलट सीट्स के पीछे बैठकर जहाज के टेक्निकल मसलों पर नजर रखना था। कॉकपेट क्रू की काबिलियत देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि 509 पैसेंजर्स की जान बिल्कुल महफूज़ हाथों में मौजूद है। पर क्रू की तरह क्या यह जहाज भी इस काबिल है कि नहीं? इसका अंदाजा थोड़ी ही देर में हो जाएगा। शाम के 6:04ों पर जापान एयर 123 के दरवाजे बंद किए गए और पायलट ने जहाज को रनवे
15 एल तक टैक्सी करना शुरू किया। टोक्यो से ओसाका तक यह बहुत छोटी फ्लाइट होने वाली थी। सिर्फ 1 घंटे और 12 मिनट। यानी जब तक जहाज अपने क्रूजिंग एलटीट्यूड 24,000 फीट पर पहुंचेगा, उसी वक्त उसे नीचे उतारने की तैयारी शुरू की जाएगी। टोक्यो में मौसम बिल्कुल साफ था। लेकिन आज के दिन जापान में कई थंडर स्टॉर्म्स उभर रहे थे। जिसकी वजह से पायलट को हिदायत दी गई थी कि वो टोक्यो से डायरेक्टली ओसाका तक नहीं बल्कि ओशन के ऊपर से होकर जाएंगे। अब रनवे 15 एल पर जापान एयर 123 टेक ऑफ के लिए बिल्कुल
तैयार थी। 6:12ों पे कंट्रोल टावर से परमिशन मिलने के बाद पायलट ने जहाज के थ्रस्ट लीवर्स ऊपर किए और कामयाबी से टेक ऑफ कर गया। यहां तक जो कुछ भी हुआ वह बिल्कुल नॉर्मल था। पर टेक ऑफ के ठीक 12 मिनटों के बाद सगामी बे के ऊपर जहाज के अंदर एक पुर इसरार आवाज आती है और साथ ही सबसे पीछे टेल वाले हिस्से में एक सुराख हो जाता है। जो पैसेंजर्स अभी तक अपने घर जाने की खुशी में बहुत एक्साइटेड थे उनकी एक्साइटमेंट पलक झपकते ही खौफ में बदल जाती है। क्योंकि सुराख होने की वजह
से केबिन में शोरशराबा शुरू हो गया और लूज पड़ी हुई चीजें तेजी से उस सुराख की तरफ खींचने लगती हैं। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि यह आईडिया लगाना भी मुश्किल था कि आखिर हुआ क्या है? यह आवाज इतनी ज्यादा थी कि इसको कॉकपिट में भी सुना गया। कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर में यह आवाज कुछ इस तरह महसूस हुई। यहां पे यह जानना जरूरी है कि जैसे-जैसे प्लेन एटीट्यूड पे जाता है, तो बाहर की हवा पतली होने लगती है और ऑक्सीजन लेवल भी कम हो जाता है। इसको काउंटर करने के लिए केबिन के अंदर आर्टिफिशियल
प्रेशर भरा जाता है जो लगभग जमीन के एटमॉस्फेरिक प्रेशर के बराबर होता है। जिसका मतलब यह कि 24,000 फीट्स पे बाहर प्रेशर कम और केबिन के अंदर प्रेशर ज्यादा होता है। और यह ज्यादा एयर प्रेशर केबिन की दीवारों पर लगातार अंदर से जोर लगा रहा होता है। प्लेन का कैबिन पूरी तरह एयर टाइट रखा जाता है ताकि यह आर्टिफिशियल प्रेशर किसी भी तरह से लीक ना हो सके। पर अगर केबिन का कोई छोटा सा भी हिस्सा कमजोर होगा तो एयर प्रेशर उस जगह को फाड़कर एक सुराख पैदा कर सकता है। जिसकी वजह से केबिन का
आर्टिफिशियल प्रेशर खत्म हो जाएगा और पैसेंजर्स की तबीयत बिगड़ सकती है। इसके अलावा ऑक्सीजन लेवल कम होने की वजह से सांस लेने में दुश्वारी भी हो सकती है। जापान एयर 123 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। पर अभी तक दोनों पायलट्स को इसका इल्म नहीं। कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर में उनको आपस में बात करते सुना गया जिसमें कभी उन्होंने लैंडिंग गियर दरवाजे के टूटने की बात की तो कभी उनको लगा कि शायद यह आवाज इंजन में से आई है। पर हकीकत यह थी कि फ्यूज लार्ज का सबसे पिछला हिस्सा जहाज से अलग हो चुका था
और साथ ही वो रडर को भी ले उड़ा। फ्यूज लार्ज की टेल फट जाने की वजह से अब केबिन में प्रेशर मेंटेन नहीं हो पाएगा। पर रडर जो टेल पर लगे इस हिस्से को कहते हैं, इसके अलग होने का मतलब है कि जहाज अब दोनों पायलट्स के कंट्रोल से बाहर जाने वाला है। रडर का काम जहाज की योर मूवमेंट को कंट्रोल करना होता है। कोई भी जहाज जब टर्न लेता है तो इस मूवमेंट को रोल मूवमेंट कहा जाता है। नोज अप या नोज डाउन करने की मूवमेंट को पिच कहते हैं। जबकि हॉरिजॉन्टली नोज की डायरेक्शन
लेफ्ट राइट होने को योर मूवमेंट कहा जाता है। सिंपल अल्फाज़ में कहा जाए तो जापान एयर 123 करीब 24,000 फीट्स पे रडर ना होने की वजह से ना सही से टर्न कर पाएगी और ना ही लैंडिंग करते वक्त अपने आप को रनवे से अलाइन कर पाएगी। पर इससे भी ज्यादा खतरे की बात यह है कि दोनों पायलट्स को रडर निकल जाने की कोई खबर नहीं। जहाज अब पहले की तरह स्टेबल नहीं रहा और वह अपने आप लेफ्ट राइट झूलने लगता है। जिसको कंट्रोल करना ऑटो पायलट के बस की बात नहीं थी। नीचे जमीन पर एक
शख्स ने जहाज की मूवमेंट को देखकर कुछ गड़बड़ महसूस की और एक फोटो खींच ली। इस फोटो में साफ-साफ नजर आ रहा है कि रडर का हिस्सा टेल से गायब है। दोनों पायलट्स अभी तक कुछ समझते कि केबिन क्रू को अनाउंसमेंट करते सुना गया जो पैसेंजर्स को अपनी सीट पर बेल्ट बांधकर बैठने की हिदायत दे रहे थे। उधर कॉकपिट में मौजूद कैप्टन को मामला गड़बड़ लगा तो सबसे पहले उन्होंने ट्रांसफॉर्डर की फ्रीक्वेंसी 703 पर रख दी जो कि एक यूनिवर्सल डिस्ट्रेस सिग्नल है। यानी अब तमाम कंट्रोल टावर्स को पता चल जाएगा कि जापान एयर 123
इमरजेंसी सिचुएशन में है। कैप्टन ने फैसला किया कि जहाज को वापस टोक्यो में लैंड किया जाए। पर क्या प्लेन ऐसा करने के काबिल भी है या नहीं? सबसे पहले उन्होंने कंट्रोल टावर को इमरजेंसी सिचुएशन के बारे में बताया और वापस टोक्यो लैंडिंग की परमिशन मांगी। कंट्रोल टावर ने कैप्टन को 90° टर्न लेकर टोक्यो में लैंड करने की परमिशन दे दी। फर्स्ट ऑफिसर जो कंट्रोल्स पर बैठे थे, उन्होंने प्लेन को राइट की तरफ मोड़ा ठीक 40° के एंगल में। पर दोनों पायलट्स यह देखकर मजीद खौफजदा हो गए कि प्लेन का एंगल 40° से काफी ज्यादा था।
इस मौके पर कैप्टन को चिल्लाकर फर्स्ट ऑफिसर को बोलते सुना गया कि बैंक एंगल कम करो। पर एंगल किसी सूरत कम नहीं हुआ। को पायलट ने बार-बार कोशिश की पर प्लेन उसके किसी भी इनपुट का जवाब नहीं दे रहा था। इतने में फ्लाइट इंजीनियर ने दोनों पायलट्स को बताया कि हाइड्रोलिक प्रेशर तेजी से कम हो रहा है और देखते ही देखते हाइड्रोलिक प्रेशर जीरो पे आ गया। यही वह पॉइंट था जब कॉकपेट में मौजूद तीनों क्रू मेंबर्स को पता लग गया कि प्लेन अब उनके कंट्रोल से बाहर निकल चुका है। जिनको पता नहीं तो उनको
बताते चलें कि प्लेन के जितने भी कंट्रोल्स होते हैं जिसमें लेफ्ट राइट टर्न के लिए लगे एलरॉन्स पिच के लिए एलिवेटर्स स्पीड कम करने के लिए फ्लैप्स इन सबको फ्लाइट के दौरान खासतौर पर जब 1000 किमी पर आर की विंड सामने से लग रही हो हाथ से हिलाना नामुमकिन होता है। इसीलिए इनको हाइड्रोलिक प्रेशर की मदद से मूव किया जाता है। और जापान एयर 123 की जो टेल टूटी थी, वह अपने साथ कुछ हाइड्रोलिक पाइप्स को भी फाड़ चुकी थी। यही वजह थी कि अब जहाज का पूरा हाइड्रोलिक प्रेशर भी खत्म हो गया और कॉकपेट
के कंट्रोल्स किसी शो पीस की तरह रह गए। 24,000 फीट्स की बुलंदी पर जापान एयर 123 कई मसलों का शिकार हो चुकी थी। केबिन प्रेशर खत्म हो चुका था। ऑक्सीजन मास्क निकल आए। हाइड्रोलिक प्रेशर खत्म होने की वजह से इसके कंट्रोल्स नाकारा हो चुके थे। और सबसे खतरे की बात यह कि अब पैसेंजर्स और पायलट्स को लो प्रेशर की वजह से हाइपोक्सिया होने लगा। हाइपोक्सिया उस कंडीशन को कहते हैं जब बॉडी में ऑक्सीजन लेवल कम हो जाने की वजह से कंफ्यूजन हो जाती है। फैसले करना मुश्किल हो जाता है। मूवमेंट्स स्लो हो जाती हैं और
यहां तक कि इंसान बेहोश भी हो जाता है। इतने में केबिन क्रू को ऑक्सीजन मास्क लगाने की अनाउंसमेंट करते सुना गया अगस्त को जो भी हुआ [संगीत] अब जापान एयर 123 बुरी तरह रोल मूवमेंट करके पैसेंजर्स को डरा रही थी। दोनों पायलट्स के पास अब सिर्फ एक ही चीज के कंट्रोल्स बचे थे और वो है इंजन के कंट्रोल्स। कैप्टन ने सिर्फ इंजन के कंट्रोल्स को इस्तेमाल करके प्लेन को रोल मूवमेंट से निकालने की कोशिश की। अगर जहाज को राइट टर्न करवाना है तो फिर लेफ्ट साइड के इंजंस की पावर बढ़ानी होगी और अगर लेफ्ट टर्न
कराना है तो राइट साइड के इंजंस की पावर बढ़ानी होगी। इसी तरह रोल मूवमेंट में जब जहाज राइट की तरफ बैंक करेगा तो सिर्फ राइट इंजंस की पावर एक खास वक्त तक बढ़ाकर उसे दोबारा सीधा किया जा सकता है। इसी तरीके को इस्तेमाल करते हुए पायलट्स ने जहाज की रोल मूवमेंट पर काफी हद तक काबू पा लिया। अब उनका मिशन सिर्फ एक ही था कि जहाज को जल्द अस जल्द टोक्यो एयरपोर्ट पर वापस लैंड करवाया जाए। पर उससे पहले जहाज को जमीन के करीब लाना होगा ताकि केबिन में प्रेशर बढ़ सके। इस काम के लिए
वैसे तो एलिवेटर्स काम आते हैं जो अब हाइड्रोलिक प्रेशर ना होने की वजह से बेकार पड़े थे। लिहाजा कैप्टन ने लैंडिंग गियर डाउन करने का आईडिया दिया। लैंडिंग गियर जहाज में एक्स्ट्रा ड्रैग पैदा करता है जो स्पीड को कम कर सकता है। पर यह लैंडिंग गियर भी हाइड्रोलिक प्रेशर से ही खुलते हैं। लिहाजा कैप्टन ने लैंडिंग गियर को अपने ही वजन पर खोलने का इरादा किया और खुशकिस्मती से वह खुल भी गए। अब 6:45ों पर जापान एयर 123 ऑटसुकी नामी शहर के ऊपर एक गोल चक्कर लगाता है और उसका एल्टीट्यूड 24,000 फीट से 13,500 फीट
हो जाता है जो कि पायलट्स की एक बड़ी कामयाबी थी। केबिन में प्रेशर और ऑक्सीजन दोनों बेहतर हो जाते हैं। पर खतरा अभी तक टला नहीं। उनको यहां से राइट टर्न लेकर टोक्यो की तरफ जाना था। पर सिर्फ इंजन कंट्रोल्स के जरिए प्लेन को टर्न करना पायलट्स के लिए बहुत मुश्किल पैदा कर रहा था। अगर वह इंजन का थ्रस्ट बढ़ाते तो प्लेन की नोज काफी ऊपर हो जाती जिससे स्पीड भी कम हो रही थी और अगर स्पीड ज्यादा कम हुई तो प्लेन इंस्टॉल करके जमीन पर गिर सकता है। ना चाहते हुए अब जहाज जापान के
पहाड़ी इलाके में दाखिल हो गया। कम एल्टीट्यूड पर बिना कंट्रोल्स के जहाज को टोक्यो की तरफ मोड़ना एक इंपॉसिबल टास्क लग रहा था। 6:48ों पे कैप्टन को फर्स्ट ऑफिसर को यह बोलते सुना गया कि राइट टर्न करो आगे पहाड़ है। [संगीत] पर शायद सिर्फ इंजन कंट्रोल्स की मदद से इतने बारीक टर्न लेना पॉसिबल नहीं था। इस वक्त कॉकपेट में तरह-तरह के अलार्म्स बजते हुए भी सुने गए। ना चाहते हुए भी जहाज टोक्यो से बहुत दूर माउंटेन रेंज के ऊपर सिर्फ 6,800 फीट्स पे आ चुका था। कुछ ही मिनटों के बाद 654 PM पे कैप्टन की
बौखलाहट उसकी आवाज से अच्छी तरह जाहिर हो रही थी। और फिर फाइनली 2 मिनट के बाद कॉकपिट में कुछ इस तरह की आवाजें रिकॉर्ड हुई। जापान एयर का तैयारा टर्न करते वक्त कम एल्टीट्यूड की वजह से एक पहाड़ से जा टकराया। इस हादसे में सिर्फ चार लोग जिंदा बच सके जो केबिन के सेंटर में लेफ्ट साइड पर बैठे थे। बाकी तमाम क्रू और पैसेंजर्स की जाने इस हौलनाक हादसे की नजर हो गई। इन्वेस्टिगेशन में मालूम पड़ा कि 7 साल पहले लैंडिंग करते वक्त इसी जहाज की टेल रनवे से टकराई थी। उसके बाद कई हफ्तों तक
जहाज रिपेयरिंग के लिए ग्राउंड रहा और बोइंग के टेक्नशियंस इस पर रिपेयरिंग का काम करते रहे। इन्वेस्टिगेशन में मालूम पड़ा कि टेक्नशियंस ने टेल की स्प्लाइस प्लेट गलत तरीके से इंस्टॉल की थी। इन्वेस्टिगेटर्स ने कैलकुलेट करके बताया कि यह फौ्टी रिपेयर कैबिन को सिर्फ 11,000 साइकिल्स तक प्रेशराइज कर सकती है। जबकि जापान एयर 123 इसी कंडीशन में 12,500 साइकिल्स मुकम्मल कर चुका था और इत्तेफाक से आज ही के दिन यह प्रेशर बर्दाश्त नहीं कर पाया। इस हादसे के बाद इन्वेस्टिगेटर्स ने चार मुख्तलिफ पायलट्स को फ्लाइट सिमुलेटर में उसी सेम सुरते हाल से गुजारा। पर चारों
पायलट्स ने प्लेन क्रैश कर दिया। और कोई भी पायलट प्लेन को उतनी देर हवा में नहीं रख सका जितनी देर जापान एयर 123 हवा में रहा। यह काफी हैरानी की बात है क्योंकि सिमुलेटर में बैठे पायलट्स के पास दो बहुत बड़े फायदे थे। एक तो उन्हें पहले से पता था कि मसला क्या है और दूसरा उनके जेहन में यह सुकून था कि उनकी जान नहीं जाएगी। इन कंडीशंस को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि जापान एयर 123 के दोनों पायलट्स ने आखिरी दम तक जहाज को कंट्रोल करने की बेहद कोशिश की और उसे
45 मिनटों तक हवा में ही रखा। उम्मीद है ZM टीवी की यह वीडियो भी आप लोग भरपूर लाइक और शेयर करेंगे। आप लोगों के प्यार भरे कमेंट्स का बेहद शुक्रिया। मिलते हैं अगली शानदार वीडियो में।