जिस अविभाज्य चैतन्य को जीने की इच्छा होती है शरीर में नाम रख दिया जाता है जीव फिर राग द्वेष हर्ष शोक यह इसका स्वभाव बन जाता है जैसे दारू पीने से दारुड़िया स्वभाव भांग खाते खाते भांगेरी स्वभाव बन जाता है ऐसे अज्ञान के संग से ना समझी को पकड़ते पकड़ते ना समझी का स्वभाव बन जाता है गीता ना समझी मिटाने आई है गीता अज्ञान मिटाने आई है गीता का एकाद श्लोक का पाठ भगवन नाम कीर्तन सत्पुरुष का दर्शन करोड़ों तीर्थ करने का फल देता है भगवान शिव कहते हैं पार्वती को के पार्वती गीता के सात
में अध्याय का महात्म जरा सुन लो पाटली पुत्र नगर में शंकु करण नाम का ब्राह्मण था वैश्य वृति से धंधा रोजगार से ने खूब पैसे कमाए करोड़ों करोड़ों अशरफ का वह मालिक हो गया [प्रशंसा] [संगीत] था एक शादी दूसरी शादी तीसरी शादी भी उसकी समाप्त हुई चौथी शादी करने को गया जब तक जीवन में भीतर का रस नहीं तब तक काम का आकर्षण विकारों का आकर्षण वासनाओं का आकर्षण नहीं मिटता और जब तक वासनाओं आकर्षण नहीं मिटता तब तक भीतर का रस भी नहीं आता वासनाओं का आकर्षण मिटाते जा और भीतर का रस पाते जाओ
भीतर के रस को बढ़ाते जाओ और आकर्षण को हटाते जाओ नाविक नाव को लेता जाए और नाव नाविक को ले भागते जाए इस ऐसे ही ढंग से यात्रा होती [संगीत] है उस शंकु करण ब्राह्मण को सत्संग का अभाव था वह साधु संत और सत्कर्म में समय नहीं दे पाता था मंत्रियों को भोज देता था मंत्री लोग सुन ले मंत्रियों को खिलाने पिलाने में मंत्रियों के [संगीत] साथ अपना यश टने में उसने अपने धन का कुछ व्यय करा न वास्ता मिटाने के लिए नहीं अत आत्मा की शांति पाने के लिए नहीं आपि तो वासना में उलझने
के लिए उसकी प्रवृत्ति होती थी अहंकार मिटाने के लिए नहीं अहंकार को सजाने में उसकी प्रवृत्ति होती थी कर्म ऐसे करो कि कर्मों के कांटे को कांटे से निकालने की कला सीख लो कर्मों से कर्मों के बंधन को काटो कर्मों से कर्म के बंधन बढ़ाओ मत ऐसा गीता का और शास्त्रों का उपदेश है कर्म को कर्म बंधन मत बनाओ कर्म को कर्म योग बनाओ कर्म के बिना तो कोई रह नहीं सकता तो करना ही है तो बांधने वाले कर्म तो बहुत हो गए अब कर्म बंधन से छूटने वाले कर्म करने चाहिए लेकिन इस प्रकार का
सत्संग नहीं मिलेगा तो जीव वही करता आएगा मन को जो अच्छा लगा वोह तो पतंग भी करता है ह दिए में जल मरता है मन को जो अच्छा लगता है व मछली भी कुंडे में फस मारती है अच्छा लगता और चिपकती है मास को भवरे को सुगंध अच्छी लगती है और कमल में फस मरता है मन को जो अच्छा लगे वही अच्छा है ऐसी बात नहीं वास्तव में जिन्होंने अच्छे में अच्छे पर ब्रह्म तत्व का अनुभव किया है ऐसे पुरुषों के अनुभव और सत्य शास्त्र जिसे अच्छा बताते हैं उस अच्छाई का महत्व जब तक यह
प्राणी समझता नहीं तब तक कल्पित अच्छाई समझकर अपने को खाई में फेंकता रहता है परदेश में माई ले आई अपने बेटे को महाराज आशीर्वाद करो ऐसी सी गोलियां खाता है ड्रग्स की सारा दिन बड़ा होशियार था पढ़ा खा था बड़ा तेजस्वी था महाराज लत लग गई और वो टेबलेट खाता है ब्राउन शुगर का उपयोग करता है महाराज ने कहा बोलो कैसा भाई क्या चाहते हो बोले ओहो वंडरफुल वंडरफुल छत देख रहा है वंडरफुल भाई क्या वंडरफुल ओ ब्राउन शुगर वंडरफुल टेबलेट वंडरफुल महाराज तुम भी खाया करो बहुत मजा आएगा महाराज ने कहा अब इसको मैं
समझाऊं कि यह मुझे ही समझाने लग गया है जब हीन मति बन जाती है हीन स्वभाव बन जाता है हीन आवश्यकताएं बन जाती तो समझते कि इनको पाना ही धर्म है इनको पाना ही कर्तव्य है और यह वंडरफुल है इसलिए अपनी मति को ऊंचा बनाइए परखने की शक्ति बढ़ाइए जहां जो काम होता है वहां वैसा स्वभाव बन जाता है जहां जैसा चिंतन होता है वहां वैसा स्वभाव बन जाता है जहां जैसा चिंतन होता है वहां ऐसा परिणाम बन जाता है यूरोप में किसी आदमी को मृत्यु दंड देना था प्रयोग किया गया उसको कहा तुझे शौक
देकर नहीं मारेंगे केवल इंजेक्शन लगाकर मारेंगे इंजेक्शन कोई विश् वाली नहीं होगी खाली इंजेक्शन भोंक के रक्त बहेगा रक्त बहते बहते बहते तू मर जाएगा उसके आंखों पर पटरी बांध दी गई सुला दिया गया दोनों हाथों में जरा सा सुई भोक दी और फिर छोटी सी ट्यूब से सादा गर्म पानी की धार कर दी गई उसको कह दिया गया कि तेरा गर्म गर्म खून की धार निकल रही है खून बह रहा है बह रहा है काफी बह रहा है ओहो बह रहा है उस मुजरिम ने ऐसा चिंतन किया कि सचमुच में खून बह रहा है
बह रहा है बह रहा है अरे बोले बहुत बह गया अब तो बचा भी नहीं ऐसे संस्कार डाले और वो मुजरिम व मर गया खून का दो बूंद भी नहीं बहा था जब चिंतन से मृत्यु हो सकती है तो चिंतन से जीवन को लॉन्ग लाइफ भी किया जा सकता है जो चिंतित व्यक्ति होते हैं उनका अन्न ठीक से नहीं पचता है और विष बन जाता है जो भयभीत व्यक्ति है उनके साथ भी यही हाल होता है करीब करीब ठीक त्रिशंकु की वो दशा हुई चौथी औरत लेने गए थके मांदे कहीं रात को रहे और सांप
ने काटा सब सांप जहरी नहीं होते सांप काटा सांप काटा वे मर गए शिव कहते पार्वती सुनो मरकर प्रेत मरने के बाद परिक्रमा करनी पड़ती भटकना पड़ता है उतना समय तो प्रेत होता है जब पिंड दान करते तब दूसरा पिंड मिलता है उस प्रेत को पिंड दान विंद्र दन तो मिले नहीं कर्म की गति ऐसी थी जहां चाह होती वैसे ही वैसी जगह आदमी पहुंचता है लाखों लाखों करोड़ों करोड़ों असरफ गड़ी है मैं उनकी रक्षा कैसे करूं सर्प बनने का सुपर्णा हुआ और उस समय पाकर सांप बना सांप की योनि में बड़ा दुखी हुआ त्रिम
को एक दिन अपने पुत्रों को स्वपना दिया कि मैं बड़ा दुखी हूं अमुक जगह पर धन गड़ा है और मैं सांप होकर उसकी रखवाली करता हूं मेरी सद्गति के लिए कुछ करो और फिर न धन के तुम मालिक हो जाओगे मजला लड़का आया फावड़ा खुदा लेकर व खोदने लगा सर्प के शरीर ने व अपना अंत भाग शरीर से भाव शरीर से बेटों को प्रेरणा दी बेटे को बजले को कि तुम क्या करते हो मूर्ख पहले मेरी सद्गति का कुछ करो फिर मैं बताऊंगा कहां खोदना है कहां धन है मेरी बाप भी खोदने को क्यों आ
गए हम नहीं जानते आपकी सद्गति कैसे हो तब शंकु करण ने बताया गीता के साथ में अध्याय का पाठ मेरे श्राद्ध के समय गीता के साथ में अध्याय का पाठ करके उस पाठ का फल मुझे अर्पण करो जो पवित्र संयमी ब्राह्मण है गीता के साथ में अध्याय का पाठ करते हैं उनको बुलाकर भोजन करा उनको दक्षिणा दो और उनका आशीर्वाद लो हे उमा इस ज्ञान योग का फल जब शंकु करण के हवाले हुआ तो उसको देव देही [संगीत] मिली गीता का ज्ञान पाकर शंकु कर्म की तो सद्गति हुई सद्गति मतलब मुक्ति नहीं प्रेत योनि से
ऊंची गति सात्विक लोकों की गति उसको सद्गति बोले पुत्र अच्छे संस्कार वाले थे धन को कुआ बावड़ी पोखरा खुदवाने में लगाया और धन का कुछ हिस्सा वृक्ष लगवाने में लगाया और बाकी के धन को धर्म युक्त भोगने लगे जिनमें अच्छे संस्कार नहीं है और देव योग से किसी निमित आ जाते हैं उनकी हारी हुई बाजी भी जीत में बदल जाती है इसलिए संस्कारों की बड़ी भारी महिमा है भगवान कृष्ण कहते हैं कि जिनके संस्कार उचित नहीं है उत्तम नहीं है ऐसे लोगों की क्या गति होती है ऐसे लोगों का क्या स्वभाव होता है वो जान
लो और उनसे बचने का यत्न करो आसुरी संपदा वालों का आसुरी संस्कार वालों का कैसा स्वभाव होता है गीता के नौवे अध्याय के बवे श्लोक में और 13 में श्लोक में दवी स्वभाव वालों का वर्णन आता है जिनकी सब आशाए व्यर्थ होती है सब शुभ कर्म व्यर्थ होते हैं कारी श्लोक है सब आशाए जिनकी व्यर्थ होती है सब शुभ कर्म जिनके व्यर्थ होते हैं शुभ कर्म बोल रहा [संगीत] हूं जिनकी सब आशाएं व्यर्थ होती है सब शुभ कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात जिनकी आशाएं कर्म और ज्ञान सब फल देने
वाले नहीं होते ऐसे अविवेकी मनुष्य सत फल पाए बिना ही आशाएं कर्म और ज्ञान सत फल देने वाले नहीं होते ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी राक्षसी और मोहिनी प्रकृति का आश्रय लेते हैं मोहिनी स्वभाव का आसुरी स्वभाव का राक्षसी स्वभाव का आश्रय लेते हैं विद्युत तो वही की वही लेकिन इंस्ट्रूमेंट अलग तो फिर पानी उबाले बर्फ नहीं बना सकेगा स्लाटर हाउस में कनेक्शन दे दिया तो वहां कतल करेगा सत्संग नहीं सुना सकेगा सत्ता स्वरूप में ईश्वर तो जो कहते हो लेकिन भाव का अलग-अलग आश्रय अलग-अलग फल अलग-अलग स्वभाव अलग-अलग योनि सृष्टि वै चित्र इससे दिखता है
[संगीत] मोगा सा मोघ कर्मणो मोघ ज्ञाना बचेत साहा राक्षस आसुरी चैव प्रकृति मोहिनी माशिता जिनकी हिक जगत के भोग भोगने की आशा तीव्र है और पीछे मुड़कर भी नहीं देखते हैं कि परिणाम क्या होगा तमो गुण के आधीन होकर वासनाओं के शिकार बनते हैं उनको आसुरी प्रकृति वाला कहा है तमो गुण की प्रगड़ा होती है जो सुख के लिए खुद मरते हैं वे आसुरी स्वभाव वाले लेकिन अपना सुख दूसरे को हानि करने के लिए कूद मरते हैं उसे राक्षसी स्वभाव कहा और तनिक भी रुक नहीं पाते उससे भी और गहरा उसमें प्रगट होते हैं उसे
मोहिनी प्रकृति कहा भगवत विमुख आसुरी राक्षसी और मोहिनी प्रकृति का आश्रय लेते हैं अंतर आत्मा की शांति को जिनको महत्व नहीं है शांति धन से बड़ी है शांति सत्ता से बड़ी है शांति सौंदर्य से बड़ी है शांति अष्ट सिद्धियों से बड़ी है शांति स्वर्ग से बड़ी है उस आत्म शांति से जो विमुख है ऐसे लोग आसुरी भाव से राक्षसी भाव से और मोहिनी भाव से आक्रांत हुए उनके सारे शुभ अशुभ कर्म व्यर्थ हो जाते सत फल नहीं देते कभी कभार दिखाने के लिए शुभ कर्म करते भी हैं लेकिन उद्देश्य भगवान नहीं होता है उद्देश्य शांति
नहीं होती है उद्देश्य अंतर आत्मा के विकास का नहीं होता तो उनके सत्कर्म भी व्यर्थ का फल दे देते हैं थोड़ी देर की वाहवाही दे दिया शांत हो गए थोड़ी देर की खुशामद खोरी दे दिया बस शांत हो गए उनके कर्म लेकिन जो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए सत्कर्म करते हैं सत्य को पाने के लिए सत्कर्म करते हैं वे देवी संपदा के लोग होते हैं उनको साधु स्वभाव वाला कहो ऐसे पुरुषों के द्वारा किसी की हानि नहीं होती और आसुरी प्रकृति वालों के द्वारा किसी का लाभ नहीं होता वह जिससे भी मित्रता करेंगे दोस्ती करेंगे
मिलेंगे उसका भी भोग के कारण शोषण करेंगे पत्नी को तो बहुत प्यार करते हैं लेकिन पत्नी का कल्याण हो इसलिए प्यार नहीं करते हैं मेरे साथ क्लब में नाचे और मेरे दोस्त के साथ बस्त पर जाकर सोए य क्या पत्नी का आदर है कि पत्नी का शोषण है समझदार लोग समझ सकते हैं सोच सकते हैं उन विचारों का कसूर नहीं है उन विचारों को कृष्ण कहते हैं आसुरी भाव राक्षसी भाव और मोहिनी भाव उनके चित्त को पकड़ रखा है अहिल्या भाई ने अपने बेटे के कु आचरण पर रुष्ट होकर उसे मृत्यु दंड सुना दिया कैसा
राज्य किया उस इंदौर की रानी ने मालवा में अहिलिया भाई हो गई अभी तक लोग उसके तटस्था गाते हैं वो भगवान की भक्त थी और संतों के प्रति उसको आस्था थी वो राज्य तो करती थी लेकिन अपने ऊपर मोहिनी या राक्षसी या आसुरी भाव को सवार नहीं होने देती थी दैवी भाव में जीने के लिए उपासना भी करती थी और शिव की पूजा भी करती [प्रशंसा] थी भवति सम्मोहा कामना की पूर्ति अगर नहीं होती है तो जित में क्रोध पैदा होता है और क्रोध से बुद्धि सम्मोहित हो जाती है लोभ से समोह हो जाता है
तो जिनका आसुरी स्वभाव है मोघ सा मोघ कर्मण मोघ ज्ञाना वि चत साहा राक्षस आसुरी चैव प्रकृति मोहिनी शता जिनकी सब आशाएं व्यर्थ होती है सब शुभ कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात जिनकी आशाएं कर्म और ज्ञान सत फल नहीं देते हैं व्यर्थ होते हैं समझ लेना श्लोक तो मैंने उच्चारण कर लिया उसका अनुवाद भी मैंने तुमको सुना दिया लेकिन व्यर्थ का मतलब ये नहीं कि जो भगवान को नहीं मानता है उसके सब कर्म व्यर्थ हो जाते हैं व्यर्थ हो जाते फिर भी नहीं होते हैं और नहीं होते फिर भी
हो जाते हैं उनका सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है उनके सारे कर्म व्यर्थ हो जाते हैं उनके सारे सत्कर्म व्यर्थ हो जाते हैं अर्थात वो उनके सत्कर्म सत्य को न देकर थोड़ा सा स्वर्ग का सुख दिया और फिर कर्म नष्ट हो गए वही का वहीं पहुंच गए थोड़ा सा संसारी कर्मों में प्रयत्न किया और वस्तु मिली वस्तु को भोगा अंत में जिस शरीर ने भोगा वह शरीर शमशान में चला जाता है कब्रस्तान में गड़ जाता है और भोग के पदार्थ यहां चले गए उनके हाथ तो कुछ नहीं आया इस लक्ष्य में समझना है व्यर्थ ऐसा
नहीं कि ईश्वर को नहीं मानता है वह धंधा करेगा तो एक पैसा भी नहीं कमाए अथवा मंदिर में जाएगा या मस्जिद में जाएगा तो उसको कुछ नहीं मिलेगा नहीं मिलेगा लेकिन मिलेगा लेकिन वो आसुरी भाव के सना के गुलाम होकर ऐसा ही मांगेंगे कि नष्ट हो जाता है सत फल नहीं देता है जो अपने काम आए वह फल नहीं मिलता है शरीर के काम आए उतने फल को भोग भोग के फिर बेचारे रेते रह जाते हैं स्वामी राम तीर्थ राम तीर्थ नहीं बने थे तीर्थ राम थे कॉलेज में पेपर देने जाते एग्जाम के पेपर में
लिखा होता किसी 10 प्रश्नों में से आठ का उत्तर लिखिए किसी आठ में से से पांच का उत्तर लिखिए किसी छह में से चार का उत्तर लिखिए किसी चार में से तीन का उत्तर लिखिए वे पेपर लिखकर नीचे लिख देते ताजा कलम 10 के 10 सही है कोई आठ चेक कर लो पांच के पांच सही है सही है कोई तीन चेक कर लो चार चेक कर लो सात के सात सही है कोई भी पांच चेक कर लो और सब के सब सही मिलते हैं मैनेजमेंट ने बुलाकर कहा कि तुम्हारी इतनी मेमोरी है तुम रोज ध्यान
करते हो तुम्हारा सात्विक स्वभाव है है तुम यूरोप चले जाओ और वहां से बढ़िया डिग्री ले आओ तुमको बढ़िया मकान मिलेगा बढ़िया नौकरी मिलेगी नौकर मिलेंगे चपरासी मिलेंगे तुम ठाट से रहो बोले मेरी बढ़िया बुद्धि है और बढ़िया डिग्री ले आऊ आपको मेरे लिए सहानुभूति है धन्यवाद लेकिन बढ़िया बुद्धि है तो क्या व्यर्थ में कमा दू बोले नहीं व्यर्थ में नहीं तुम्हें तो यह सुविधा मिलेगी बोले सुविधाएं भोग करर आखिर तो शरीर व्यर्थ हो जाएगा सुविधाए मिल जाए बड़ा साहब बन जाऊंगा आखिर तो जिसको सुविधा और जिसके नाम का बड़पन है वह तो मिट्टी में
मिलने वाला है तो क्या मेरी बढ़िया बुद्धि व्यर्थ चीजों में खर्च होंगा नहीं बढ़िया बुद्धि है तो बढ़िया में बढ़िया तत्व को पाने में लगाना चाहिए क्या मेरी बढ़िया बुद्धि ब्रिटिश शासन की गुलामी करने के लिए नहीं सारे जन्मों की गुलामी मिटाकर परमात्मा से एक होने के लिए मेरी बढ़िया बुद्धि का उपयोग [प्रशंसा] करूंगा उसका मतलब यह भी नहीं मैं कहता हूं कि आप लोग कलेक्टर बैठे हैं अब रिजाइन करके बाबाज बन जाओ यह मेरा आग्रह नहीं है नेता लोग बैठे हैं या एक्टर लोग या कोई कुछ कोई भी बैठे हैं उद्योगपति मेरा कहने का
तात्पर्य है कि आपका लक्ष्य आप जो काम करते हैं लक्ष्य विनाशी लक्ष्य मत बनाओ लक्ष्य अविनाशी बनाओ शरीर विनाशी है इस विनाशी शरीर के लिए विनाशी भोजन चाहिए विनाशी वस्त्र चाहिए विनाशी आवास चाहिए लेकिन ये तुम्हारे लिए नहीं चाहिए शरीर के लिए चाहिए शरीर के लिए जितना चाहिए आवश्यकता वह आराम से पूरी होती है लेकिन नखरे करके वासना बढ़ा बढ़ा के अपना घात मत करो अपने लिए भी समय लाओ जैसे गाड़ी के लिए पेट्रोल चाहिए हम स्वीकार करते हैं ऑयल चाहिए पानी चाहिए स्वीकार करते हैं टायर ट्यूब चाहिए स्वीकार करते हैं लेकिन गाड़ी के मालिक
के लिए भी तो चाहिए ऐसे शरीर के लिए जो चाहिए वो तो थोड़ा बहुत करो भले करो मना नहीं लेकिन अपने आ को परमात्मा से मिलाने के लिए आपको शांति की मांग है आपको मुक्ति की मांग है आपको अंतर रस की मांग है अन्न वस्त्र और आवास ये आपके घोड़े की मांग है अथवा आपके इस शरीर रूपी गाड़ी की मांग है अन्न आवास और वस्त्र यह शरीर की मांग है मुक्ति शांति और प्रसन्नता यह आपकी मांग है आपकी मांग नहीं पूरी करोगे तो शरीर की मांग चाहे कितनी भी ढेर हो जीवन भर अन्न वस्त्र आवास
की व्यवस्था जिनके पास है ऐसे लोगों को भी मैंने अशांत पाया दुखी पाया रॉक्स फेलर के पास बहुत सारा धन था 18 साल की उम्र में उसने मिलियन डॉलर कमा दिखाए 21 साल की उम्र में तो बहुत सारे धन का वो स्वामी बन गया था स्टैंडर्ड वैक्यूम कंपनी का मालिक बन गया था और और भी उसकी आवश्यकता बढ़ती गई भूख बढ़ती गई धन मिलने से आदमी धनवान होता है यह बुद्धिमान लोग नहीं मानते हैं धन मिलने से कोई कोई धनवान होता है बाकी के लोग तो कंगाल हो जाते हैं धन की और भूख बढ़ जाती
है साधारण आदमी को तो 2000 से तृप्ति हो जाती है लेकिन जिसके पास 2 लाख है उसको 2000 की भूख नहीं उसको फिर 10 लाख की भूख हो जाती जिसके पास 10 लाख है उसके पा उसको 50 लाख की भूख हो जाती है जिसके पास 50 है उसकी फिर दो 5 लाख से भूख नहीं मिटती है उसकी भूख फिर करोड़ों की हो जाती है और जिनके पास करोड़ों है फिर उसकी भूख महाराज 100 करोड़ों की हो जाती है भूख बढ़ती जाती है जब तक अंतरात्मा का सुख नहीं मिला तब तक ये वासना जीवात्मा को अंधा
की तरफ ले जाती है रॉक्स फेलर का हाल यही हुआ 50 52 साल की उम्र में रॉक्स फेलर इतना भयभीत चिंतित और बीमार हो गया कि फैमिली डॉक्टरों ने और दूसरे कंसल्टिंग करने वालों ने सबने मिलकर एक ही शब्द सुना दिया कि इस प्रकार तुम्हारा जीवन रहेगा तो विथ इन सिक्स मंथ छ महीने के अंदर आप मर जाएंगे रक्स फेलर फिर कोई उपाय बोले हम तो उपाय नहीं जानते आपको चिंता इतना सारा धन है और भी चाहिए चाहिए तो उसी चिंतन में रहते हैं और चला ना जाए उसका भय भी रहता है नश्वर चीजों को
जितना आप कट्ठा करते हैं उतना भीतर से आप टेंशन को भी क्रिएट करते नश्वर चीजों का सदुपयोग करो कठी होती है तो होने दो और उपयोग में आती है तो आने दो लेकिन उसके पीछे अपने को आप तंग मत करो अपने को आप सताओ मत अपने को खपा मत आप धनवान बनिए धनंजय बनिए लेकिन धन के गुलाम मत बनिए ये पुष्पों की माला मेरी है इसका क्या पुरावा कि चाहे मैं इसका उपयोग करूं चाहे किसी को दे दूं मैं इसका स्वामी हूं लेकिन मैं इसको रख रख के संभाल संभाल के मर जाता हूं तो मैं
इसका गुलाम हो गया ऐसे धन का उपयोग किया अपने लिए सत्य के लिए सत तो धनवान है लेकिन धन को रख रख के संभाल संभाल के चिंता और टेंशन कर कर के मर गया हो तो धन का दास हो गया धन का चौकीदार मरा है धनवान थोड़े मरा [प्रशंसा] है रॉक्स फलर के साथ यही हाल हुआ किसी सज्जनों ने सीख दी जो लोभ है लोभ को मिटाना है तो दान करना सीखो लोभ मिटते तुम्हारी चिंता मिटने लगेगी लोभ मिटते ही तुम्हारा भय मिटने लगा लगेगा लोभ मिटते तुम्हारी अशांति मिटने लगेगी और फिर प्राकृतिक सौंदर्य देखो
खुली हवाओं में घूमो खेलो जो पक्षी किलोल करते हैं उनको देखो अभी खाया है कल के लिए उनके पास कोई सामान नहीं वो भी हंसते खेलते जीत सकते हैं और तुम्हारे पास तो वर्ष खा सके तबी भी तुम्हारी अभी भूख है जिसने अनुराग का दान दिया उससे और मांग लजा नहीं अपनापन भूल तू शांति पा यह पि का बहाग सुहाता नहीं अब देख पियो घर श्याम ढले मिट क्यों उसमें मिल जाता नहीं जुगता है चकोर पिया की याद में अंगार फरियाद किसी को सुनाता नहीं अब सीख ले शांति का मंत्र नया अब सीख ले मौन
का मंत्र नया यह वासना का तांडव सुहाता नहीं खपे खपे खपे एक होती है आवश्यकता दूसरी होती है इच्छा आवश्यकता तो साधारण हाथ पैर चलाने से पूरी हो जाती है रोटी कपड़ा आवास लेकिन इतना बढ़िया आवास चाहिए इतना बढ़िया वरायटी चाहिए इतना बढ़िया टिप टॉप चाहिए कितना भी बढ़िया बने फिर भी मन रुके नहीं और को देखेगा वहां फिर रोना चालू लेकिन नीचे वालों को भी तो देख जो बिचारे एक कमरे में जी रहे हैं एक झोपड़े में जी रहे हैं उनको भी तो देख आवश्यकता है थोड़ी मेहनत से पूरी हो जाती लेकिन इच्छाएं तो
महाराज जितनी बढ़ाते जाओ जितनी पूरी करते जाओ उतनी और बढ़ती जाती है और उन इच्छाओं के गुलाम होने से आदमी आसुरी भाव का आश्रय ले लेता है फिर राक्षसी भाव बन जाता उसका क्रुद हो जाता है जरा जरा देर में डिप्रेसेंट टेंपर्ड हो जाता है यह आसुरी भाव का फल है जय राम जी की सज्जन शिरोमणि स्वामी विवेकानंद का दीदार करके रॉक्स फेलर का जीवन बदल गया और खपे खपे खपे नहीं अब लो लो जो अपने पास है छोड़कर मरू इससे अपने हाथों से उसका सत उपयोग करना शुरू हुआ ईश्वर की प्रीति अर्थ करना शुरू
हुआ बहुजन हिताय बहुजन सुखाया अपनी वस्तु का अपने धन के भंडार का सद उपयोग करना शुरू किया रॉक्स फेलर लिखता है जो मैं 55 साल के अंदर अंदर मरने वाला था मैं 93 साल तक जिया यह केवल मेरे जीने का ढंग बदलने का फल है दवाइया मुझे नहीं जिला सकती थी भागवत में तो आता है जो अति दुष्कर्मी है वे अकाल मारते हैं और आज के मनोवैज्ञानिक कहते हैं जो बड़े ऑफिसर या बड़े पद से रिटायर होते हैं और उनके पास सत्संग या समझ नहीं है तो वे लोग भी अकाल मरते हैं क्योंकि बड़े अफसर
थे सब लोग खुशामद करते थे सब ऑर्डर चलता था अब घर में रिटायर हो गए कोई पूछता नहीं हाय रे क्या यह जिंदगी हाय रे क्या ये जिंदगी इससे तो मर जाए इससे तो मर जाए मर जाए मर जाए कि उनके संकल्प उनको जल्दी मौत ले आकर दे देते ऐसा मनोवैज्ञानिकों का कहना है तुम मरने के लिए नहीं जन्मे हो तुम परेशान होने के लिए नहीं जन्मे हो अथवा गृहस्थ की बैलगाड़ी खींचते खींचते पुराने बैल हो जाओ और पड़े रहो घास का टुकड़ा खाते रहो इसलिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है तुम्हारा जन्म हुआ है मुक्त
होने के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है आनंदित होने के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिए इस बात को याद रखो आसुरी स्वभाव से मोहिनी स्वभाव से राक्षसी स्वभाव से अपने आप की रक्षा करो बचाओ आसुरी स्वभाव से बचना है तो महाराज वासनाओं की अति अति वेग वासना वालों की संगति ना करो अथवा अति वेगम वासना को पकड़ो मत दुकान में घर में समाज में जाओगे हजार हजार चीजें दिखेगी हजार हजार इच्छाएं हो जाएगी लेकिन आप विवेक की तराजू से कौन सी इच्छा करना चाहिए ऐसा मिल जाए फिर क्या ये
पालू एक तरफ तो होता है कि चौट पाटी प गए चाट खा लू दूसरे तरफ होता है कि दूध पिया है तीसरे तरफ होता है कि नहीं नहीं चार नहीं फलाना खाऊ चौथा खाऊं डिंगना खाऊ मन ना जाने खाने की कितनी कितनी वासना कर लेता है देखने की कितनी कितनी वासना कर लेता है कैसे कैसे बनने की वासना कर लेता तो एक साथ वासनाओं का पैदा कर लेता है और उन वासनाओं के झुंड में एक आथ पूरी होती है तो दूसरी खड़ी है दूसरी पूरी है तो तीसरी खड़ी है और उनको पूरी करो तो 10
50 100 और आ जाती है वासना पूरी करते करते जीवन नष्ट हो जाता है लेकिन वासना तो अधूरी अधूरी रह जाती है तो अब क्या करें क्या वासना पूरी ना करें रो रो के मर जाए ना रो रो के भीना मरो और वासना पूरी करते करते करते आसुरी भाव मोहिनी भाव और भाव के गुलाम भी मत बनो तो क्या करें जो आवश्यकता है उसको पूरा करो और जो वासना है उसको निवृत करो वासना पूरी करने में तो गुलामी है पराधीनता है लेकिन वासना निवृत करने में स्वाधीनता है और विश्रांति मिलेगी वासना निवृत्ति में स्वाधीनता है
वासना निकाल देना आपके हाथ की बात है वासना पूरी करना व्यक्ति के हाथ की बात नहीं उसमें प्रारब्ध भी चाहिए समाज भी चाहिए सरकार भी चाहिए फलाना भी चाहिए तभी ये वासना पूरी होती लेकिन पूरी नहीं होती गहरी होती है मानो मुझे कोई बढ़िया जगह देखने को पिकनिक प्लेस देखने को मिल गई हा अच्छी जगह पिकनिक प्लेस देखने की इच्छा थी इच्छा हां पिकनिक प्लेस मैंने देखा तो क्या मेरी इच्छा मिट गई नहीं इच्छा होगी कि मिसेस को भी ले आऊं और फलाने दोस्त को भी बताऊं पूरी नहीं हुई और गहरी हुई फलानी जगह बहुत
सुख है फलानी जगह बहुत अच्छा है तो क्या यहां अंधेरा है फलानी जगह का सुख फलानी जगह का सदुपयोग कर लेकिन सत्य में आने के लिए यत्न कर ना जगह की गुलामी कर ना वस्तु की गुलामी कर ना व्यक्ति की गुलामी कर ना परिस्थिति की गुलामी कर तू गुलाम होकर मरने के लिए नहीं आया तू स्वामी होकर अमर होने को आया है इस बात को बार-बार विचार करो जैसा बनना चाहते हो ऐसा रोज विचार करो जैसा होना चाहते हो बीमार आदमी को उचित है कि बीमार आदमी रोज अपने सामने जो तंदुरुस्त फोटो देखे तंदुरुस्त व्यक्ति
हो प्रसन्न व्यक्ति हो उसका फोटो देखे और मैं तंदुरुस्त हो रहा हूं मैं प्रसन्न हूं ऐसा चिंतन करें तो बहुत सारी टेबलेट जो टॉनिक है वो काम नहीं करेगी इतना उसका चिं शरीर के कणों में काम कर सकता आचार्य विनोबा भावे को अल्सर की बीमारी हो गई ी अच्छे अच्छे दो डॉक्टर आए उन्होंने सारा खानपान लिखा क्या क्या खाते हो गिन गिना के कहा कि आप 1200 कैलोरी खाते और काम बहुत करते हैं भूदान यज्ञ में इतना सारा चलते हैं आप 2200 कैलोरी यूज करते हैं और 1200 खाते इसलिए आपको यह बीमारी विनोबा ने कहा
चलते तो पैर है इसमें पेट को अलसर क्यों हु बोले नहीं आपका खुराक बहुत कम है आप ज्यादा खाइए विनोबा ने कहा जो खाता हूं वो पछता नहीं तो ज्यादा कैसे खाऊंगा बोले महाराज आप ये लीजिए ये विटामिंस लीजिए फलाना कीजिए ठीक है बोले अशुद्ध ये आहार लेकर मैं स्वस्थ होना नहीं पसंद करूंगा बोले महाराज नहीं तो फिर आप छ महीने के अंदर हमारे बीच नहीं होंगे मतलब मर जाएंगे विनोबा जी ने लिखा भूमिपुत्र में कि जिन डॉक्टरों ने मुझे कहा था छ महीने में मर जाओगे वो डॉक्टर बेचारा दो साल के बाद मर गया
और दूसरा डॉक्टर 6 साल के बाद मर गया मैं तो अभी भी लेख लिख रहा हूं और जीवित हूं मैंने क्या किया यह भी सुन लो डॉक्टरों को रवाना कर दिया और मैं शांत होकर बैठा दैवी स्वभाव का आश्रय लेते संत लोग सज्जन लोग पेट पर हाथ घुमाया हे पेट देवता जय राम जी की हे पेट देवता तू क्यों बीमार है शांत हुए तो अंदर से आवाज आया स्फना हुआ आकाशवाणी बोल दो अंतःकरण में अवकाश है वहां से जो उठता है हदय में आकाशवाणी हुई कि तुम एक साथ ठास के खाते हो इसलिए मेरा बुरा
हाल हुआ विनोबाजी लिखते थे कि मैंने अपना जो खोराक खाता था उसको 17 हिस्सों में बांट दिया थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा खाता और मैं बिल्कुल ठीक हो गया हूं तो आसुरी भाव होता जो आए वो खा लो जो आए वो कर लो लेकिन जो आए वो खा लो जो आए वो फिर भी साहब की हालत तो वैसी की वैसी नहीं नहीं सात्विक खाओ सात्विक क्रिया करो फिर प्रार विवेक से मनवाड़ रहता है तो उसकी फिक्र अपने में मत आओ मानदा या बीमार शरीर है दुखी सुखी मन होता है लेकिन मेरा सच्चिदानंद के साथ सनातन संबंध
है मैं दृष्टा साक्षी चैतन्य आत्मा का ध्यान कर रोगी आदमी निरोग व्यक्ति के चित्र को देखे रोग होने की कल्पना करें अशांत आदमी प्रसन्न वदन शांति में रहने वाले पुरुषों का चित्र देखे दुखी आदमी अपने से भारी दुखियों को देखकर अपने चित्त में कह कि चलो फिर भी ठीक है इनको तो हमारे से भी ज्यादा दुख है हम सुखियां को देखते हैं लेकिन सुख भी स्वपना है दुख भी बुलबुला है सुख स्वपना दुख बुलबुला दोनों है मेहमान दोनों बतन दीजिए जो भेजे भगवान ऐसा करके अपने को दुख के दबाव से बचा ले और सुख के
आकर्षण से बचा ले दवी संपदा हो जाएगी यह तीनों स्वभाव के सिर पर पैर रख लेगा और विजय बन जाएगा उपनिषदों में शास्त्रों में एक राजा की बात आती है उस राजा ने बहुत सारे भोग भोगे लेकिन संतोष नहीं हुआ बूढ़ा हो गया अपने पुत्रों से जवानी ली पुत्र की जवानी लेकर फिर भी भोग भोगने लगा विवेक जगा के दिन बीत रहे अभी तक मेरी वासना तो नहीं मिटती ययाती ने पुत्र की ली हुई जवानी वापस दे दी और चला गया विरक्त होकर जंगल में तप करने ऐसे आदमी जब लगते ने तो साइड बदलते तो
वनवे ट्राफिक या तो भोग में गिरते तो पूरे भोग में और जब भोग की नश्वरता जानते हैं योग में चलते तो फिर पूरे तप में चल पड़ते हैं में ट्रैफिक जैसा है उनका तो हम लोग बीच गए हैं थोड़ा भोग थोड़ा योग उस बीच में लटकते त्रिशंकु जैसा ना पापियों में ना ब्रह्म ज्ञानियों में बीच में जमा उधार जमा उधार जमा उधार यति राजा ने भोग की तुच्छ से एकदम सतर्क हो गया वैराग्य हो गया खूब व्रत तत्वास उपवास आदि किए और ऐसा तप तपा कि महाराज उसकी जब मृत्यु हुई तो उसका स्वर्ग आरोहण हुआ
स्वर्ग में भी साधारण देवता नहीं इंद्र देव के सिंहासन पर बैठने का अधिकार उसका हो गया और इंद्र नहीं चाहते थे कि यह मनुष्य और मेरे साथ आकर बैठे देवता तो बन गया लेकिन हर राजा प्राइम मिनिस्टर चाहेगा चाहे कोई मित्र हो लेकिन कोई पोस्ट दे उसी पर रहे मेरी कुर्सी पर तो प्राइम मिनिस्टर भी नहीं आने देगा दोस्त को जय राम जी की तो इंद्र कैसे आने देगा उसके पास तपो बल इतना सारा था कि वो ब्रह्म लोक में भी जाना चाहे तो विचरण करके जा आ सकता है इंद्र नहीं चाहते थे कि जब
जहां कहीं से घूम घाम के आ जाए और मेरे साथ आकर बैठे इंद्र ने आईडिया लगाई कि ययाति तुम्हारा तप गजब का है तुमने ऐसा तो क्या तप किया था ऐसा तो क्या शुभ कर्म किया था ऐसा तो क्या दान किया था आप अपना दान का शुभ कर्म का वर्णन करिए यति को आसर भाव में घटने की टेक्निक लड़ाई य कता तप ओ चांद्रायण व्रत रखने वाले ऋषि तो एक आद दो होंगे और जीवन में एक आद रखा होगा मैंने डजन चांदण व्रत रखे एक दिन में एक ग्रास दूसरे दिन में दूसरा ग्रास तीसरे दिन
में तीन ग्रास चौथे दिन में चार ऐसे 15 दिन हो तो 15 ग्रास फिर 14 13 12 उसको चांद व्रत करते मैंने कई चांद र कई कछ व्रत रखे कई अमुक व्रत रखे गाय को जव खिला दी और जव जब गाय के गोबर में आए उन्हीं जव को चुनकर उसकी रा बनाकर जरा सी ले ली और उसको भी फिर छोड़ दिया मैंने तो ऐसा ऐसा व्रत किया ऐसे ऐसे तप करे कि बड़ा बड़ा तपस्वी नहीं कर सकता बड़ा बड़ा जोगी भी नहीं कर सकता है बड़े-बड़े संतों से भी मैं बहुत आगे था जब संतों के
और बड़े-बड़े तपस्वी के विषय में अटस उसने अहम में आकर बोल दिया इंद्र ने कहा बस बस बहुत हो गया तुम्हारा पुण्य नष्ट हो गया अब तुम्ह गिरा दिया जाएगा मैं इसीलिए तुमको पूछा था तुम रोज आकर टप के बैठ जाते थे लेकिन तुम्हारे पास पुण्य पचाने की कोई अटकल नहीं है जाओ जही से आए हो उसी धरती पर तुमको फेंक दिया जाता है लेकिन फिर भी मेरे साथ कुछ क्ण तुम बिताते थे मैं एक सहयोग कर सकता हूं तुम जहां चाहो उस इलाके में मैं तुम्हें भेज सकता हूं बोलो तो राजा के घर बड़े
सम्राट के घर बड़े धना के घर तुम्हें भेजू बोले नहीं नहीं मैं बस जाता हूं कथा कहते कि उस ती को गिरा दिया गया इंद्र ने कहा कहां गिर बोले जहां अच्छे संत बैठे जहां गिर और फिर चढ़ चढ़ के तुम्हारे तक ना पहुंच ना नीचे गिरा र ना तुम्हारे तक पहुंच जहां फिर कभी ना गरू ऐसी जगह पर गिरा हो जहां ऋषि आत्म चर्चा कर रहे थे शिब ऋषि अष्टक ऋषि वसु ऋषि और प्रतर दंत ऋषि उस वन में गिराया ऋषियों का योग बल ऐसा था ऋषियों ने कहा अरे ययाति राजा गिर रहे हो
हम तुम्हारे लिए अपने संकल्प योग बल से स्वर्ग बनाकर दे सकते हैं व बोलता है नहीं स्वर्ग से भी पतन होता और वहां भी ईर्ष रहती महाराज मुझे आपके चरणों में आने दो यह अति राजा उन चार शिबी अष्टक वसु और प्रत दंत ऋषियों के यहां उतरे और उनके चरणों में बैठकर वासनाओं को मिटाकर निर्वासन नारायण तत्व का साक्षात्कार करके सदा के लिए जीवन मुक्त हो [प्रशंसा] गए मोघ सा मोघ मोघ ज्ञाना वित सा राक्षस आसुरी चव प्रकृति मोहिनी शता जिनकी सब आशाएं व्यर्थ होती है उसका मतलब यह नहीं के पढ़ता है मैं पास हो
जाऊंगा तो ना पास होगा नहीं पास भी होगा नौकरी भी मिलेगी पैसा भी कमाए अंत में देखो तो व्यर्थ अपने लिए कुछ नहीं हुआ यह आशय है पढ़ो कमाओ नौकरी करो लेकिन आशा एक ऐसी बनाओ कि सत्य की प्राप्ति हो जाए अंतर आत्मा का सुख आ जाए वैसा मतलब नहीं कि जिनको अंतरात्मा का सुख मिलावे नौकरी धंधा नहीं करते या कमाते नहीं खाते नहीं या घूमते नहीं क्या मूंगे मूंगे बैठे रहते हम देखो खाते भी हैं घूमते भी हैं यह पुष्पों से देखो सम्मानित भी होते कोई घाटा लगता है क्या जय राम जी की जो
लोग कावे दावे कड़ कपट बेईमानी करके यह चीजें चाहते उनके पास ये चीजें आती है तभी भी हृदय में वह शांति आनंद नहीं है लेकिन यह ईश्वर को चाहने से जो शांति आनंद है ये चीजें खिंच खिच के आती है उपयोग करो ना करो तुम्हारी मौज है यह तुम्हारी दास है और तुम इनके स्वामी बन जाते हो ऐसा जीवन जियो स्वामी बनने का जीवन दियो गुलाम होकर जिए तो क्या जिए वस्तुओं के लिए तुम नहीं हो तुम्हारे लिए वस्तु है शरीर के लिए तुम नहीं हो तुम्हारे लिए शरीर है पैसों के लिए तुम नहीं हो
तुम्हारे लिए पैसा है गाड़ी के लिए तुम नहीं हो तुम्हारे लिए गाड़ी है आज तो हम गाड़ी के लिए बन गए गाड़ी को जरा पंचर अरे एक दिन तो पूरा छोड़ के जाना पड़ेगा अभी ट्रेनिंग मिल रही है कभी पंचर हुआ कभी एक्सीडेंट हुआ कभी पेट्रोल खत्म हुआ कभी कुछ खत्म हुआ यह खत्म होने वाली चीजें अपना परिचय दे रही है जो खत्म नहीं होता उधर के तरफ तेरी आंख खोल रही है परेशान क्यों होता है निश फिकर रहो क्या करें बेटों को तो इतना पाला पोछ लेकिन मेरा बेटा तो ऐसे ही ऐसे अच्छा होता
तो आसक्ति होती थोड़ा ऐसा वैसा है तो सावधानी करता है तो सावधान हो फिर बेटा भी ठीक हो जाएगा बेटे का बाप भी ठीक हो जाएगा लेकिन जब बेटे का प्रॉब्लम ले लेकर अपने को प्रॉब्लम प्रॉब्लम के दलदल में गिरा देते हैं पत्नी का प्रॉब्लम लेकर पति का प्रॉब्लम लेकर किसी का प्रॉब्लम लेकर सोच सोच के अपने को प्रॉब्लम की खान बना देते हैं प्रॉब्लम मेकर मत बनो आप प्रॉब्लम क्रिएट करने वाले मत बनो प्रॉब्लम मेकर मत बनो प्रॉब्लम को उखाड़ के फेंको और परमात्मा रस मेंक बनो परमात्मा आनंद में करर बनो परमात्मा ज्ञान में
करर बनो एक गीता का ज्ञान है संतों का अनुभव वचन है आपके संस्कार विचारों के संस्कार रक्त में व्याप्त हो जाते हैं और साथ विचार इतने गहरे व्याप्त हो जाते जैसे आप पवित्र गंगा तीर्थ में गंगोत्री य यमनोत्री उधर नहाते हो तो आनंदित होते हो उलसत होते हो लेकिन जहां ग गंदगी है जहां दुराचार है जहा वैशा ग्र है यहां शराबी क बाब है वहां अगर जाते तो आपका मूड अपने किस्म का हो जाता है गीता प्रेस गोरखपुर के जय दयाल गोविंद का कलकाता में कि बड़े सेठ की कोठी में ठहरे थे रात भर उनको
नींद नहीं आई बड़ा सेठ था जिसको आजकल बड़ा बोलते वह बड़ा सेठ वास्तव में बड़ा सेठ तो मैं उसको बोलता हूं जिसके पास धन होने के साथ-साथ साधु सेवा सज्जनता और नम्रता है पुण्य में जो बड़ा है वह मेरी नजर में बड़ा सेठ है लेकिन पाश्चात्य जगत के चश्मे से जो बड़ा देखता है ऐसे बड़े सेठ की कोठी में रहते पाश्चात्य जगत में बड़ा सेठ उसको बोलते चाहे कितने के गले घोटे हो चाहे कितना अनर्थ किया हो अभी उसको धन के ढेर है चाहे क्लबों में नाचता हो और औरत बदलता हो लेकिन पैसा बहुत है
तो बड़ा सेठ है जय राम जी की लेकिन भारत के संत उसको बड़ा नहीं मानते जिसके पास चरित्र का धन है जिसके पास सेवा का धन है जिसके पास नम्रता का धन है जिसके पास सदाचार का धन है और जिसके पास संसारी भी धन है वो सेठ है संसारी धन कम भी है लेकिन चरित्र का धन है उसको हम बड़ा सेठ मानते हैं तो पाश्चात्य जगत के हिसाब वाले बड़े सेठ के एक मकान में रहे रात भर नींद नहीं आई प्रभात को चक्कर काट रहे थे इतने में माली आ गया 5 बजे बोले सच बताओ
यह सेठ की जो कोठी खाली रहती है इतना बाग बगीचा तो इस कोठी में सेठ तो रहते नहीं तो क्या होता है बोले बाबा जी मेरी नौकरी चली जाएगी बोले मैं तुम्हारे सेठ को नहीं बताऊंगा बता दे खाली बोले यहां इतवार इतवार को सेठ आते हैं उनके दोस्त भी आते हैं कभी एक नाइट उनके दोस्त आते हैं अपनी कुछ और व्यक्तियों को लेकर य मजलिस होती है कुल मिलाकर जिसको आजकल पार्टी बोलते चिकन पार्टी फलानी पार्टी ऐसा होता है पदार जी समझ गए जहां अशुद्ध कर्म हो है वहां शुद्ध स्वभाव वाले को नींद तक नहीं
आती उन्होंने सेठ को बुरा ना लगे नौकर की नौकरी ना छूटे उन्होंने बिस्तर गोल किया क्यों क्यों जा रहे बोले नहीं मेरे को कोई जरूरी काम है दूसरी जगह जाकर ठहरे जब बुरा काम करने वाले मकान भी बुरी खबर दे सकता है ऐसे अच्छा काम जिस धरती पर होता है वह वायुमंडल भी बहुत दिन तक बना रहता है एक दो दिन तक नहीं साल दो साल तक नहीं कई वर्षों तक अच्छे लोगों की हाजरी का प्रभाव अच्छा वायुमंडल भी वातावरण में रहता है अभी के विज्ञानी बोलते हैं कि हम जो भी विचार लोगों को देते
चाहे अच्छे विचार देते चाहे बुरे विचार देते हैं उन विचारों का प्रभाव वायुमंडल में बना रहता है जब इन यंत्रों के द्वारा टीवी और रेडियो के द्वारा अच्छे बुरे विचारों का प्रभाव वायुमंडल में बहुत समय तक पड़ा रहता है तो मंत्रों के द्वारा ध्यान के द्वारा हरि कीर्तन के द्वारा और कथा के द्वारा जो अच्छा वातावरण का वायुमंडल में संचय करते हुए मानव जाति का कितना हित करते होंगे कितना मंगल करते [प्रशंसा] होंगे आप सिनेमा थिएटर में जाओ किसी नए सखड़ आदमी को ले जाओ व भी कॉलर ठीक करने लगेगा बफ गुलाम बनाने लगेगा कुछ
ना कुछ गाना गाने लगेगा गाना नहीं आएगा तो ऐसा तो करेगा क्योंकि वहां के वाइब्रेशन ऐसे और किसी सखड़ आदमी को यहां पिक्चर वाले को इधर ही ले आओ तो उसका ये सारा एक्टिंग चली जाएगी हरि ओम हरि ओम राम राम हरि ओम ऐसा ऑटोमेटिक होगा क्योंकि स्वभाव कु भाव सबके अंदर पड़े हैं सशु जैसा वातावरण मिलता है ऐसा वे क्रिएट होते हैं और स्वभाव क्रिएट होते होते जाएंगे तो कु भाव नष्ट हो जाएंगे और आदमी दैवी संपदा का धनी बन जाएगा अगर कु भाव मिलते रहे तो कु भाव क्रिएट होते होते दैवी संपत्ति दब
जाएगी और आसुरी संपत्ति का जोर पकड़ेगा इसलिए विवेकानंद बोलते थे कि जो छोटी जाति के लोग हैं वे ऊंची जाति वालों के लिए वैर भाव का प्रचार ना करें और लेख ना लिखे अपी तो ऊंची जाति वालों में जो गुण है वोह उनके अपने अंदर लाए इन्हीं में उनका कल्याण है और ऊंची जाति वाले उनको गले लगाए और ची जाति वाले अपने में हीन भाव न लाए अपितु अपने अंदर ऊंचा ज्ञान और ऊंचा प्रेम लाए ना कि सवर्णों के प्रति द्वेष की आग फैलाने वाले लेख लिखकर किताब लिखकर समाज में विद्रोह करके अपना और देश
का राष्ट्र का विनाश करें ऐसा हमें कभी नहीं करना चाहिए सबको एक दूसरे से सहयोग मिले ऐसे लेख और ऐसे उपदेश होने चाहिए जातिवाद का जहर नहीं फैलना चाहिए देश में जय राम जी की अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए कुछ सज्जन जातिवाद का ऐसा ऐसा जहर फैला देते हैं कि महाराज आपको क्या बताए ऐसे सज्जनों के लिए मैं एक छोटी सी घटना बताता हूं दो भाई आपस में किसी कारण से लड़े जमीन जहागीर के नाते मुख दमे बाजी हुई और कोर्ट में केस गया बड़ा भाई जीत गया छोटा भाई अपील करने जाने वाला था बड़े
भाई को पता चला कि जीत तो मैं गया हूं कल अब छोटे के मन में क्या है जांचे गया छोटे के पास बोले भाई देख मैंने सुना है तू अपील करता है अपील करो चाहे ना करो मैं कैसे जीत गया हूं ठीक है यह संपदा यह जमीन और यह चीजें ना मैं ले जाऊंगा ना तुम ले जाओगे बीच का कोई रास्ता य मेरी जो पांच एकड़ मेरे से फतवा में जमीन आई हु मैं आपके अर्पण करता हूं छोटा कहता है कि तुम इतना दिन केस लड़े और फिर अर्पण करते बोले क्या करें कि हम लोग
लड़ लड़ के संपत्ति लेते हम लोग तो छोड़कर मरेंगे लेकिन हमारे आने वाली पीढ़ी में एक दूसरे के प्रति जलसी बनी रहेगी एक दूसरे परिवार को काटते रहेंगे से क्या होगा हम जहर का बीज ना बोए भले मेरी पांच एकड़ जमीन और इतनी जायदाद या इतना ये चीजें आपके हवाले हो जाए लेकिन हमारी पीढ़ियों का विनाश ना हो तुम्हारे बच्चों का और मेरे बच्चों का बुद्धि भ्रष्ट ना हो इसलिए हमें गले लगना चाहिए छोटा कहता है कि बड़े भैया मेरी गलती हुई मैंने मुक्त में बाजी की बड़ा कहता है नहीं मेरी गलती हुई मैंने उदारता
नहीं दिखाई छोटा कहता है आपकी तो उदारता थी ना थी मैं किसी के चढ़ाने पर आपकी निंदा करने लगा इसलिए आप कठिन हो गए वो एक दूसरे से समा याचना करते करते गले लगते हैं आसुरी स्वभाव देवी स्वभाव में बदल गया ऐसे ही कोयला जैसे हिरे में बदल जा सकता है ऐसे दुष्ट स्वभाव को भी दैवी स्वभाव में बदला दिया जा सकता है लेकिन हम और दुष्टता करें फलानी जाति वाले नीची जाति वाले नीचे हैं तो यह हमारी दुष्टता है नीची जाति वाला बोले फलानी वास्तव में नीची जाति ऊंची जाति है मानवी रेखाए हैं मेरे
से जो पूछो और मेरे वर्षों पहले प्रवचनों की कैसेट से देखो तो असली जाति क्या है कि आपकी जात परमात्मा की जात से जुड़ी है वह आपकी जात है यह शरीर की जात है कि ब्राह्मण क्षत्रिय फलाना फलाना आप अपनी जात को आदर कीजिए और फिर व्यापारी जात है साधु की जात है ये व्यवहार के लिए भले थोड़ी देर चलाइए वास्तव में आप ज्ञान का आश्रय लीजिए जय राम जी की मनुष्य जाति तो है जय जय मन सासी विती मनुष्य जो मन से जोड़ दे उसको मनुष्य बोलते तो मन से अपने को जोड़ दे परमात्मा
के साथ मन से अपने को जोड़ दे सत् कर्मों के साथ मन से अपने को जोड़ दे सत्य स्वरूप ईश्वर के साथ तेरा तो भला होगा तेरे संपर्क में आने वाले का भी भला होगा संत ने लिखा है कबीर जी ने पड़ पड़ पत्थर भ पढ़ पढ़ पत्थर भ भया लिख लिख भया है चोर लिख लिख भया है चोर पढ़ पढ़ पत्थर भया पढ़ पढ़ पढ़ पत्थर भया लिख लिख भया है चोर लिख लिख भया है चोर जा पढ़नी ते साहिब मिले जा पढ़नी ते साहिब मिले वो पढ़नी कछु और वो पढ़नी कछु और पढ़
पढ़ के पत्थर दिल बन गए अपनी अकल हुशरी को शरीर की वासना भोग भोगने में लगा सामने वाले को रोटी मिलती कि नहीं मिलती उसके बच्चों को पढ़ाई मिलती कि नहीं मिलती उनको बीमारी के समय औषधिया ठीक जीवन जीने का ज्ञान मिलता है कि नहीं पढ़ पढ़ के स्वार्थी बन गए तो पत्थर दिल बनाया और लिख लिख के ऐसा एडजस्टमेंट कर है कि महाराज सब माल अपने पास चोर बन गया पड़ पड़ पत्थर बया कठोर दिल हो गया और लिख लिख के भाई खाता हिसाब संभाल संभाल के एडजस्टमेंट करने की टेक्निक सीख सीख के चोर
बन गया इनकम टैक्स की चोरी खाली चोरी नहीं और भी बहुत सारी चोरी हो जाती है जय राम जी की पड़ पड़ पत्थर भया पड़ पड़ पत्थर भया लिख लिख भया है चोर लिख लिख भया है चोर जा पढ़नी दे साहिब मिले पढते साहिब मिले वो पढ़नी कछु और वो पढ़नी कछु और हरि ओम विवेकानंद बोलते उन्नति का उपाय छोटी जाति वाले बंधु यह समझ ले उन्नति का उपाय संघर्ष या उनके उन सवर्णों के खिलाफ लेख लिखना या लोगों को बहका यह उन्नति का उपाय नहीं है आपि तु संस्कृत के ज्ञान को संस्कृति को अपने
जीवन में लाना सुसंस्कृत ज्ञान अपने जीवन में बढ़ना बढ़ाना यह उन्नति का उपाय है किसी को ऊंचा देखकर जलना और उनकी टांग खींचना इससे हमारी उन्नति नहीं होती चाहे हम सवर्ण हो चाहे किसी जाति देश के हो किसी को देखकर जलने से उन्नति नहीं होती है अपितु जहां से उसकी उन्नति हुई उस तत्व में आप भी प्रवेश करके उन्नत हो जाइए मैंने सुनी थी वो कहानी कि बीरबल के आगे अकबर ने एक लकीर खींच के दिखाया कि इस लकीर को छुए बिना छोटी करके दिखाओ बुद्धिमान बीरबल ने उस लकीर के पास में लंबी लकीर खींच
के दिखा दी और लंबी लकीर खींचने से वो लकीर छोटी हो गई ऐसे दूसरे को काट पीट के या दूसरे में मार काट के संस्कार बढ़ाकर आप कुर्सी पर हो आ गए बड़े बन गए नहीं लेकिन आपके लोगों में बड़ा ज्ञान दीजिए बड़ी प्रेरणा दीजिए बड़ा साहस और बड़ी शक्ति और सदाचार दीजिए और और लोगों को बड़ा बनाइए तो फिर उनसे भी आप बड़े हो जाएं तो हमें आनंद है हमें इंकार नहीं है जय राम जी बोलना पड़ेगा