एक फकीर्त है जून उनका केला था शिविर मलिक गोपालक मॉडर्न होम थीम को तो मिटाना तो सीबी साल भर भिक्षा मांग गुरु ने पूछा अब क्या-क्या हाल है जो घर नहीं मलिक अच्छा तो ऐसा करो गांव में जो जहां गंदगी और सफाई करो बंदगी मिल जाए शांति गुलाम है और बंदगी चाहता है अल्लाह से यह मिल जाए वह मिल जाए अभी कुछ बन्ना चाहता है गुलाम जो फिर से भिक्षा मैंगो भिक्षा मांगता ले आता बैक जाता थोड़ा बहुत उसके लिए हवा लेकर चौथ साल पुराना ना हक से बन बैठा था अब तुम्हारे काफी आप हैं
लेकिन इस की भाषा नहीं थी और क्या चाहता है सुनकर चलते प्रदेश अध्यक्ष की स्थिति बयान करना यह बात कौन हो तो लंबा पद गया तुम क्या चाहते हो क्या बाबू जी मैं फलानी जगह से आया बापू जी ने पूछा क्या चाहते हो तो ऐसा प्रश्न हो और पूछे वाले गुरु को उत्तर समझ में आए उसे ढंग से सच्चाई से देना चाहिए [संगीत] लोको में नाम हो जाए यह परमार्थ नहीं हो तो ईश्वर से दूर है ज्यादा कब ईश्वर के करीब पहुंच गया था अब क्या चाहता है अच्छा अब तो अपने को क्या मानता धरती
पर छोटे से छोटे भीख मांगे दिखने में उनसे भी मैं गया बेटा लेकिन वह अपने अहंकार को विलय करने की एक अवस्था थी गौरांग पहले तो शास्त्रार्थ करते दूसरों को हारने में मजा मानते थे मैं कुछ विद्वान हूं अच्छे-अच्छे विद्वानों को बम बुलाने में उन्हें मजा आई थी मजा बड़े-बड़े पंडितो को अपनी बुद्धिमता से हर देते लेकिन जब भागवत भक्ति का रंग लगा और हम गला फिर कोई पुस्तक करने के बदले उनके चरणों पर गिर जाते हैं अहंकार क्या-क्या रूप लेट है क्या क्या करवाते लेट है पहले संसार ही था तो अभी त्यागी बन गया
पहले भोगी था तभी त्यागी पहले ग्रस्त तत्व की साधु बन गया पहले साधारण था तो अभी सत्संग करने वाला बन गया अपने फोटो ए रहे हैं अपना नाम ए रहा है नानू पशांति जो मेरी माया में भी मूड चैतन्य स्वरूप परमात्मा को पूरा नहीं जानते रामकृष्ण परमहंस छोटी बस्ती में जाते हैं की ठाकुर हरिजन की बस्ती में छोटे लोगों की बस्ती में जाते मंजर उगवरी करते साफ सफाई करते किसी ने एक बार पूछ ही लिया रामकृष्ण या फिर क्यों करते हैं मेरे को ऐसा कभी आता है की मैं अच्छा हूं मैं अच्छा यह रामकृष्ण देव
को अथवा या राजा भरतरी को अहंकार में खेल खिलाएं ऐसी बात नहीं सभी को खेल खिलता की हमने आज तक घर तो छोड़ लेकिन करते हैं लोगों को सत्संग सुनते हैं उनकी दी हुई चीज वास्तु पर शादी फिर कान पड़ा दो कर ठोकी अपने को मैंने अपना अभी तक मौजूद है तो जो कुछ शादी के बाद तुरंत चले थे तो वह अंगूठी अंगूठी जो कुछ थोड़ा बच्चे [संगीत] सोसाइटी में भिक्षा मांगने गए तो पहले द्वारा पर थे लेकिन जब दीक्षा मांगने को किसी के द्वारा पर खड़े हुए और भाई ने सुने दो कर तब पता
चला की अपने गए नहीं अपन मौजूद हैं अपने अभी गए के द्वारा लेकर रोटी बना रही थी 2:00 बजे और पहले फूल करने मुझे पहले रोटी पर कैसे आकर धमक कैसे आंखों में ए गई इसको पहले रोटी चल चल अपने तो आत्मा है सुख दुख में समय लेकिन जब अपमान हर चोट हुई तो हमने मां को क्या हाल है देख ले मजा लेकिन विपरीत अवस्था दूसरे दिन गए तो लोगों को एक दूसरे का गाना दूसरे दिन तो लोग कोई खीर बनाकर तैयार है कोई मालपुआ कोई कुछ तीसरी दिन भी यही हुआ फिर तो बड़ा करमंडल
भर देते थे रास्ते में भिखारी को बांट कर थोड़ा सा अपने लिए रख लेते फिर देखा क्या इसमें भी व भाई हो रही है थोड़ा सा खाता हैं फिर वह भी छोड़ क्या-क्या खेल करने पड़े ऐसे ऐसे करें जरा सुना दे तब देखें [संगीत] फकीर जुनैद ने अच्छी अपने हम को बाली देना अपने हम को ठीक ढंग से विसर्जित करना यह सबके बस आएगा [संगीत] अहंकार क्या-क्या रूप ले बैठता है जय में कैदी बैठा है वह भी नया कैदी घुसता है जेलर उसको रखा बरम दिन कितने साल की सजा है 6 महीने वाले तू हमारे
साथ हमें 20 साल से 12 साल से र रहे हैं बरामदे में लगा है बरामदे में अपना चटाई 2 दिन का मेहमान आए 6 महीने हम तो 12 साल हो गए हैं अभी 6 साल और रहने वाले 18 साल सजा भोगनी का क्या रूप लेट अकेले में पूजा पाठ करते हैं तो घर में कोई धार्मिक मेहमान आया तो अहंकार खेल करेगा पूजा भट्ट जाएगी हर कोई नास्तिक आदमी आया तो अहंकार खेल करेगा पूजा को घाट लगा बिल्कुल सीधी बात जय राम जी अपेक्षा चलते हैं गाड़ी चलते हैं ऑटो रिक्शा चलते हैं अथवा बैलगाड़ी चलते अपने
रंग से कोई देखने वाला नहीं तो अलग ढंग से चलते हैं जब गांव में घुसता है बैलगाड़ी वाला तो बैलों का दौड़ते है उसकी पूनम बैलगाड़ी चलने में भी कोई देखें तो अच्छा लगेगा अपने कोई घंटी बजाने का भी होरन बजाने का भी अहंकार कुछ परिचित पहचान वाले मिल गए बड़ा विचित्र है वो दूसरों की बात ही गया कबीर जी ने कहा चलो चलो सबको कहे चलो भाई संसार में कोई सर नहीं ईश्वर की तरफ चलो चलो सबको कहे बिरला पहुंचे कोई माया कामिनी बेचे घाटी धोए रुपए पैसे मिल गए अथवा तो कोई ही हूं
करने वाली चमचियां चमचे मिल गए इस में उलझा गए गए ईश्वर प्रताप करें माया कामिनी बेचेगा के दूर या तो रुपए पैसे की लालच या तो फिर स्त्री पुरुष के आकर्षण में फैंस जाएगा हिम्मत करें उससे उठाकर्षण से बाहर निकाल जाए कभी तो पक्का होगा नहीं तो ईमानदारी से चलने वाला हो तो गुरु एक से एक बढ़िया कोर्स देकर पर करने में फाटक से लेकिन इतनी हिम्मत पूछकर के चलाना पड़ता है मैं यह करूं मैं यह ना करूं तो आपका अहंकार अहंकार है और मां के दास हो आप माया के दास हो भगवान की भक्ति
करते समय प्रार्थना करना पड़ता है और क्या करें भगवान का ज्ञान हूं मैं ऐसा हूं मैं वैसा हूं मैं मैं अरे मूर्ख तू सोच तो सही एक पानी की बूंद से तो तेरी यात्रा शुरू हुई और रख की मुट्ठी में तो तेरे शरीर की रयात्रा पुरी हो जाएगी इसमें मैं मैं क्या लेकर घूमता है भगवान बुद्ध के चरणों में कोई साधु होने को जाता तो शांति अपने को जाता तो बुद्ध कहते हैं अच्छा विकसित बन्ना है तीन महीने शमशान में जाकर सहयोग तो अपने मां को बताओ की यह मानो मेरा ही शरीर है उसका सुंदर
है नाक बढ़िया है रोज बॉडी को देखते सजाते आईना देखते हैं उसकी ये हालात हो रही है तो उसके साथ साथ यह जो जीव जीवन तो का हम है ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ तब तक बाधित होता ही नहीं डर किसको लगता है आत्मा को लगता है की शरीर को लगता है डर हमको लगता है चिंता किसको होती है कुछ ऐसा हो जाए वैसा हो जाए कौन चाहता है शरीर चाहता की आत्मा चाहता है बहुत अच्छा लगा आत्मा को लगा के हम शरीर को मजा नहीं आया की शरीर को मजा नहीं सुरक्षित रखना और सब
कुछ करो लेकिन ऐसा हम को मत तोड़ो क्योंकि यही तो बने बैठे हैं अपन तो राज्य के राजपाल कित की संत मेजी के दर्शन करने राजपाल आपसे मिलन चाहता हूं लगे अहंकार कर दिया की मैंने अपने राजपाल होने का परिचय दिया सॉरी सॉरी फिर दिन वाणी में लिखा की मैं आपका दास सेवक चरणों में सर झुकना की प्रार्थना समिति चाहता है कृपा करके मुझे अपने दर्शन से पवन करें की धर्म का पहले पाठ श्रद्धा और नम्रता मेरे को सीखने को मिली और वह अपने जीवन में श्रद्धा और नम्रता के सदगुण से इतना प्रसिद्ध हुआ दृष्टांत
संत लोग दे देते तो हम तो है यह तो बड़ा खतरा करता है लेकिन एक श्रद्धा और नम्रता सदगुण है आते का गोल पिंड बना दिया फिर गणपति की आकृति करती गुड का बना दिया दिन भर उसके आगे का झुकी क्यों अहंकार को झुकना के लिए तो है जो झूलेलाल का है या गणपति का है शिवा जी का है और देवी देवताओं के फोटो या चित्र हैं उनके दंडवत करना है प्रणाम करना है क्या है यह सारे का सर अहंकार को गैलन की व्यवस्था है अगर आप अहंकार गैलन के लिए देवी देवताओं की मूर्तियां बनाते
हैं नाचते हैं गेट और बाद में गणेश चतुर्थी से चलकर पूनम तक फिर इस गणपति की मूर्ति पानी में भा देते कोई नाराजगी होते भगवान आपका अहंकार गलत है तो हमारी मूर्ति बनाकर बिगाड़ दो कोई हरकत नहीं तुम्हारा अहंकार है की शरीर चाहता है ऐसी कौन सी चीज है की जो आत्मा की नहीं है परमात्मा की नहीं सरिता जाए तो परमात्मा पैसा कामना नहीं चाहता अहंकार पैसा कामना चाहता है बड़ा होने का बड़ा होने का भी अहंकार कोई मटका है अथवा अहंकार है अद्भुत महिमा है इतना बड़ा राज पाठ सब छोड़ कर चले गया राज्य
के एक जंगल में कुटिया में नहीं बनाई गुफा में रहते हैं अरोड़ा या सब इतने ऊंचे कोठी के त्यागी महात्मा बने हैं महाराज क्या बताएं 24 घंटे में एक बार गुफा से बाहर आते सर नीचे रखते नासागर्दृष्टि रखते हैं हालात निरंजन तो कर घर घूमते परीक्षा मिली फिर अपनी गुफा में चले जाते वे भले उनके प्रभु भले 24 घंटे के बाद फिर एक बार निकाल नहीं बहुत कुछ खाता हैं महाराज कुछ नहीं खाता त्यागी हैं इस प्रकार की यश को खूब खाता मैं कुछ भी नहीं बस जरा संगोछा लोक एन जान वरना अर्थ लपेटा भिक्षा
लेकर जा रहे थे मछिंद्रनाथ धीरे-धीरे उनके पीछे लगे हां चलते चलते मच्छर नाथ ने उनको जरा धक्का मार दिया तुम साधुओं के भी ऐसा करते हो लेकिन नहीं चलते हो अगर कुछ महीने पहले तुम ऐसे अंधे होते तो तुमको पता चल जाता की किसको तुमने टक्कर मेरी लेकिन अब क्या करूं मैं त्यागी हो गया हूं मैं जब राजा था उसे समय तुम इतनी हिम्मत नहीं कर सकते हो बोले महाराज अब धक्का मार के तुम मेरे को क्रोधी नहीं बना सकते अब मैं समझ गया आपको मैं पहचान गया आप मेरे को क्रोध दिलाना चाहते हैं मच्छरदानी
का बेटा क्रोध नहीं आता अभी जिसको क्रोध नहीं आता वो मौजूद है अभी वो मारा नहीं तब तक ईश्वर खान अनुभव नहीं होगा आप अगर उसे अहंकार को ईश्वर में मिलन मिटाने के लिए तैयार नहीं होते हैं तो गुरु कितना कुछ उपदेश करें कितनी कुछ शक्ति बात करें कितना कुछ कृपा करें प्यार करें लेकिन आम कुछ एन कुछ अधूरा र जाता है अपनी और से अपने हमको मिटाने के लिए तुलना पड़ता है तो साल भर जो भिक्षा मैंगो समान क्या है साल भर जो ना घरों में जुगाड़ी झाड़ू निकालो जो साल भर गंधक बैच गंधक
बेचे हो फिर इन गंधक लो गंधक और जो पैसे आए वह बेट आखिर कर साल ये किया तब कहानी वो अहंकार पकड़ में आया की यही दशा भांग का है फिर विश्रांति मिले परमात्मा प्रताप हुई तो हमारे और भगवान के बीच अहंकारी तो है जीवात्मा कर में वासनाएं भारी है मेरे पास इतनी डिग्रियां है बुद्धि की योग्यता हरण कर के टाइम में वकील हूं मैं डॉक्टर मेरी डिग्री है अब अनंत ब्रह्मांड नायक ईश्वर के साथ तुम एक हो शक्ति इतनी योग्यता लेकिन अहंकार ने डेरा बना दिया लेकिन इसको ईश्वर में विलय करना है यह बात
में राजी नहीं होती इसलिए साड़ी पूजा पाठ ध्यान भजन अल्प फल दे के शांत हो जाते हैं महान थाली स्वर प्रताप का अहंकार मिटाए बिना नहीं होता कुछ अनुकूल हुए गुरुजी प्रसन्न हुए तो मजा आया गुरुजी जरा आंख कढ़ी किया व्यवहार करना पड़ता है क्या पता क्या उल्टा लेने ऐसे रूठ जाए कहानी देर ना जाए की जैसे गुरु को अपने हाथ पैरों से अपने वेस्टन से पूछना नहीं पड़ता की हम तुमको कैसे रखें अहंकार के वाश है क्या पता नहीं मानेगा तो सच्चा समर्थ सतगुरु और ईश्वर प्रताप की लगन हो तो देर किस बात की
है ईश्वर प्रताप की लगन लगे नहीं देता उनका कुछ बने की मुसीबत है उसे बना रहा हूं और साधन भजन करते-करते ध्यान कैसी ऊंचाई आई उसे समय डर ग जाता है किसको डर लगता है की अहंकार करने को होता है तो डर लगता है उसको चना छोड़ देते राजा भरतरी बड़ा इतना सर राज था वो रखना मांगते रोटी एक जगह जलेबी हो रही थी महाराज थोड़ी जलेबी दे रहे चल रहे हैं बड़ा है साधु का बच्चा जलेबी खाने का शौक नहीं गया जलेबी खाना है तो वहां मजदूरी काम हो रहा है आज भी दिन भर
कोई मजदूरी करें तो 1 किलो जलेबी तो कमेगा और क्या करेगा तलाव के किनारे अभी तो मां मेरे को स्वाद का गुलाम बनाया मेरे को मेरे अहंकार मेरे मां लेख जलेबी एक हाथ में जलेबी दूसरे हाथ में गोबर का को लेकर मां को लटकती लटकती जलेबी फेक दे पानी में और गोबर का को दाल देंगे साड़ी जलेबी पानी में चली गई एक आखरी बच्ची मां कहता तो भूख लगी इतना तो खाने दो बोले अभी तक तो नहीं गया हम कर मिटाना बड़ा ऊंचा काम है अहंकार मिट्टी गया तो ईश्वर हो गया और क्या है अपार
ईश्वर माना जाता है वह योगी दूसरे योगी हैं जिनको ऋद्धियां सिद्धियां आई है हालांकि वैसे अभिव्यक्ति का व्यक्ति विशेषज्ञ नहीं मित वह तो थोड़ी दिन चमक करके खुश हो जाएंगे मुक्ति मुक्ति नहीं होती ये कर सकते हो कर सकते हैं विश्वामित्र ने क्या क्या किया बाजार बना ले अपना ज्वार बना ले मक्का बना दिया ब्रह्मा जी ने बनाई चावल बनाई तो हमने बाजार बना दिया लेकिन विश्वामित्र भी व्यक्तित्व में है ब्रह्म ऋषि भी खाने के लायक नहीं रहे हो जो सुना नाम करूं दुनिया में कौन चाहता है नाम रखा गोविंद गोविंद की जगह पर जुगनू
नाम रखते तो जुगलोन का नाम करो अपना नाम करो तो उनका नाम टिकता भी नहीं जब तक यह अहंकार बना रहा ऐसे लोगों का नाम टिकता ही नहीं चाहे बड़ी-बड़ी मकान पर इस पटलों पर अपना नाम तोक के चले जा लेकिन इतना आधार से टिकेगा नहीं 5:25 साल 100 साल बाद लेकिन बुद्ध का महावीर का कबीर का नानक जी का मीरा का और होगा जिनका अहंकार पूर्ण मित वे पूर्ण महापुरुषों की दुनिया निराली होती एक पानी की बूंद पिता को उसे इतना अपने को जोड़ दिया के पास इस शरीर को मेहमान इस की तंदुरुस्ती अपनी
तंदुरुस्ती इस की बीमारी अपनी बीमारी इस की मौत अपनी मौत मानते और है विद्वान पढ़े लिखे अकाल का उपयोग ही नहीं हुआ कल को तो उलझा दिया सीधी बात है वकील हैं हम डॉक्टर हैं हम संत हैं हम क्या है ये अहंकार देख नहीं देता है पर पढ़ने बना कर घूम रहा है नानक जी कहते हैं मां तू ज्योति सरूप अपना मूल पहचान संत कहते हैं और उनका वचन पाठ कर लेते भी बन जाते हैं ऑपरेशन भी बन जाते हैं क्या क्या बन जाते हैं उसकी छठ पर आवाज ए रही थी इब्राहिम ने कहा कौन
छठ पर दौड़ रहा है किसकी जरूर हुई है सम्राट की छठ पे जो बोले हम जरा अपना ऊंट खोज रहे बिल्कुल का सम्राट की छठ पर और ऊंट खोज रहे ये आदमी कोई पागल मालूम होते हो मैं बिल का सम्राट और मेरी छठ पर ऊंट खोजना वाला कौन हो तुम बोले इब्राहिम औरतें के हारमोंस चाटने चूसने से अगर सुख हो सकता है बैठकर अहंकार सजाने में अगर सुख हो सकता है तो चमरा सम्राट की छठ पर ऊंट भी तो हो सकता है तब तक तो फकीर रावण हो गए सुबह राजकाज में बैठे लेकिन वही बात
रिपीट होती है मस्तक शरीर से चिपक के अगर सुख टिक सकता है तख्त पर अंकर सजाने से अगर सुख टिक सकता है तो सम्राट की छठ पर ऊंट भी हो सकता है लेकिन मां में वही बात रिपीट है इतने में वह भी आवाज वाला फकीर कोई रूप लेकर टांग पर टांग चड्ढा कर बैठे हैं उनको बोलो की कोई सर आया नहीं है रात भर है ठीक से बैठे हो इस राज दरबार में तुम्हारे पहले कोई था की नहीं था बोले हमारे थे मुजरा भोले महाराज तुमने तो हद कर दी सराय है तो अब तुम ही
सराय मेरा हो हम ये चले गजब हो गया मिल्क का सम्राट मिल्क का राज्य छोड़कर भारत चलाया और उसने साधु की दीक्षा ले जंगल में जाता लड़कियां करता 6 पैसे में लड़कियां बिकती कर पैसे पांच पैसे अपने लिए खर्च करता रोटी और खजूर खाता कभी एक पैसा कभी दो पैसा बचत कट्ठे होते हैं उन पैसों का वह भंडारा कर देता साधु बाकी का जो साधन भजन बताया गया करते हैं लेकिन अंदर में अभी तक आत्मा परमात्मा एस में तो सुख नहीं टिक सकता हूं अहंकार में तो सुख नहीं दिखे सकता लेकिन अल्लाह तो सुख स्वरूप
है भगवान तो अभी सुख हो क्यों नहीं मिलता संत ने कहा अभी भी तो मौजूद है पहले मिल्क का सम्राट था तो अभी अपने पसीना का खाने वाला मौजूद है अपना पसीने का खाता हूं बाकी का बचत है वो भंडारा करता हूं यह जो भंडारा करने वाला और पसीने का खाने वाला है वही तो अर्चन है ईश्वर के रास्ते पगले तो बोले बाबा जी अब तुम मिटा बोले भाई मेरे बस का नहीं है कोई समर्थ ब्रह्म यानी संत वो खोज बिक का सम्राट इब्राहिम खोजने खोजने खोजने अभी बेस हुए पहले बेस नहीं थी पैदल जाना
पड़ा हरिद्वार से यात्रा करते करते र वाला रातों का फिर आगे चले ऋषिकेश पहुंच वहां से कुछ आगे जैसे आजकल अपन ब्रह्मपुरी कहते हैं रामदेव से भी रहे थे वशिष्ठ महाराज विमान रहते कुछ समय पहले उसे इलाके में पहुंच एक संत के चरण महाराज अगर सुख टिक सकता तंदुरुस दिया सजावट में अगर सुख टिक सकता है तो छठ पर ऊंट भी टिक सकता है पहले राजमहल में राहत था सता था तो अभी कहानी झोपड़ी में सता हूं पहले सोनी और चांदी के बर्तनों में खाता ठाकर में खाता हूं लेकिन अहंकार गया है आप मेरा अहंकार
ले लो बाबा चौक का खेल नहीं है महाराज बच्चों का खेल तो नहीं लेकिन जैसे तैसे भी आप कृपा करिए लाखों करोड़ में कोई मिलता है महाराज आपने अरे तो देगा तब ना अच्छा जो महाराज जी के अकेला मत आना जिसको तू छोड़ना चाहता है पहुंचे हुए संत के दर्शन उसे ईश्वर से और अल्लाह से हमें दूर करने वाला जो हम का रहे हैं वह अलविदा लगा फकीर के रहमत बरसेगी तब बात हुई पहुंच गया महाराज महाराज गुफा से बाहर है अच्छा ए गया बोलो शैतान को लाया उसे बदमाश को लाया ईश्वर से दूर अल
से दूर करता है उसको लाया हूं कहां है दिखाओ मैं अब खजूर और रोटी खाता हूं मैं मैं भीतर राहत तो तू जानता है तब तक जान नहीं दूंगा राहत है कौन कहता कौन है खुद फकीर की दांत में भी करुणा कृपा भी थी बोलकर भी ऐसे महापुरुषों का दमन नहीं छोड़ना चाहिए प्याज की परेड हटाते हटाते प्याज को कोट जो तो क्या मिलेगा केले कथ्थर दिखेगा प्याज टिकेगी पढ़ने हैं अपने कपोल कल्पित अहंकार ने परेशान किया सत्ता तो इस सर्वेश्वर के अहंकार मां बैठा है सत्ता तो मेरे शाश्वत परमात्मा तत्व ऐसे करते करते अहंकार
की पढ़ने हैं तो पानी की स्थिति हो गई ऐसे परमात्मा में स्थित हो भगवान सूर्य उदय हुआ है नेत्रों में धन्यवाद हर्ष के आंसू चेहरे पर ब्रह्म लक्ष्मी इब्राहिम मिलकर के सम्राट नहीं जा सकते गुरुदेव [संगीत] आगे बच्चन नहीं चला उपनिषद कहती माटी एन रखें जो माटी लाखे सोमेश्वर दफा यह विचार सागर का वचन [संगीत] वो कृपा करके बुद्धि में है प्रकट होकर बुद्धि को उसे मैं कर देता है जैसे अग्नि लोहे में प्रविष्टि हो जाए सहमति से सत्य स्वरूप हो जाए प्रीतम भारतवन ठग सके इच्छा नहीं था लेते हुए भी नहीं लेट देते हुए
भी नहीं देता आत्मा नाम ना दीक्षित ही आत्मा को परमात्मा को भी नहीं चाहता ऐसा होता है वह तो कोई है बस कोई मत करना ब्रह्म ज्ञानी मुक्त जगात का डाटा फिर तो उसकी माटी से जरा सा किसी के लिए उसके चित्र में मीठी नजर हो तो खुशहाल हो जाएगा जरा सा ज्ञानी के चित्र में उसके प्रति थोड़ा होना तो उसकी खबर पद जाएगी वैसा महापुरुष ब्रह्मा ज्ञानी मुक्त भगत का डाटा मोक्ष और भोग देने वाला डाटा बन व जय को जन्म मरण दे डेयर साधना की शरण पड़े जिसको संसार के जन्म मरण से प्राण
चाहिए मूर्ति के शरण पड़े देवी देवता के चरण पड़े ऐसा नहीं आया [संगीत] अपने परमात्मा स्वरूप को जान हुए महापुरुष ही आपका दुख सदा के लिए इसकी महिमा है की ब्रह्मविता का दर्शन करने जैन एक-एक कम एक-एक यज्ञ करने का फल होता है उनके चरणों में वचन सुन तो वो भक्ति योग बंता है वहां करने देगा तो जान नहीं दूंगा खोपड़ी तोड़ दूंगा [संगीत] गुरु को शिष्य के साथ स्मूथ व्यवहार करना पड़े तो शिष्य का दुर्भाग्य है योग्यता है गुरु को संभल के व्यवहार करना पड़ता है किसको दुख ना होगा इतना खड़ा हूं घर की
जल्दी दुख हो जाएगा उल्टा रहेगा तो गुरु को तो सब कुछ राहत है अगर उसे समय वह सोचा की यह कैसे हो सकता है और कुत्ते तो कुत्ते हो मॉम कैसे हो सकता है इतनी मेरे को परेशानी में आर्टिकल करके दूसरी चिट्ठी लिखना युक्ति करके चलते तो गुरु बोलते हैं अच्छा बेटा जो तेरी मर्जी का अपने अंग से भटकती रहते और क्या करते हैं ठीक है बटन के अनुसार हो ही जाता है ईश्वर तक पहुंचे नहीं सकता विशेषता बनी रहे तुम सैया में ऐसा हो वैसा वैसा ईश्वर तक नहीं भूल सकता कुछ एन कुछ बना
रहना ईश्वर तक नहीं लहर भी बनी रहे और सागर भी हो जाए हम मिटाने को राजी हो जाएगा क्योंकि मूर्ति तो हम घर मिठाई लेकिन वो साक्षात जिनके हृदय में परमात्मा प्रकट हुआ वह तो अहंकार प्रभाव करेंगे इसलिए उधर जान में डर लगता है जागृत मंदिर के पास जान में अथवा दिल खोलना में डर लगता मूर्ति के आगे तो बोल दो मैं काम ही में क्रोधी ले लो भी मैं जानकारी में पापी जैसा तैसा हूं तेरा हूं ऐसा लोग भगवान के आगे करके जाते हैं बाहर कोई का दे है काम ही क्रोधी पापी अकारी इधर
आओ फिर देखो उसकी क्या खबर होती मैंने यह गुना की मंदिर से गया भगवान बड़ा विलक्षण खिलाड़ी है फिर भी डरने की जरूर नहीं है महसूस ईश्वर को अपने की प्यास भर जाए सावधान हमको सजाने के रास्ते ना लगे और ऐसा होता है की थोड़ा बहुत त्याग तपस्या हुआ तो हम सजना चालू हो जाएगा ईश्वर ईश्वर की जगह पर है गुरु गुरु की जगह पर है मेरा प्रोग्राम बढ़िया होना चाहिए की अहंकार में उसकी गार्डन पकड़ ली अच्छी तरह से ए गए उसकी छोटी फिर उसकी श्रद्धा और गुरु की कृपा हो तो हम घर का
आज से छोटी चुडा देता तो रक्षा करें नहीं तो तो गया हो तो वो तो गया वापस नहीं लोट सकता ब्रह्मा कैसे बनेगा ईश्वर साक्षात्कार कर ही नहीं सकता हवा हवाई होती करने वाले शरीर की सुविधा मिलती है आपको क्या मिला आज के सत्संग के कैसे बार बार सुनने योग्य ऐसा मुझे लगता है नारायण नारायण ओम शांति ओम [संगीत] हरि [संगीत] हरि ओम [संगीत] [हंसी] [संगीत] तत्वताओं के सॉन्ग से जैसा अमृत मिलता है वैसा फिर समुद्र से भी नहीं मिलता वह जो देवताओं की सेवा से भी नहीं मिलता माधुरी और मस्ती तत्वता परमात्मा प्राप्त महापुरुषों
से जो सुख मिलता है शांति मिलती है ज्ञान मिलता आदि अंत जिसका नहीं उसे अनंत का प्रकाश जो मिलता है वैसाक्षी सागर के अमृत के पास नहीं स्वर्ग के अप्सराओं के पास नहीं है यश गंधर्व और कीनन के पास नहीं है राम जी मैं 14 लोक में विचारण किया जाता है उसे परमात्मा सुख का उनको पता नहीं उन गंधर्वों को देखकर ढूंढते फिरते लेकिन जो सुख स्वरूप है उसका उनको पता नहीं इसलिए उनको मेरा देखा है श्री देवता लोग भी स्वर्गीय सुविधाओं में मकान बनाऊंगा अब यह करूंगा वह करूंगा वह करूंगा निर्धन रहने में सुख
है एन धनवान होने में राम जी कहानी सच्चा सुख नहीं देगा और बड़े-बड़े संतो से भी विचार विमर्श के और शास्त्रों का अध्ययन किया कहानी विश्वास ऐसे योगी शक्ति दिखाकर दूसरों की वह भाई थोड़ी देर लिया लेकिन शक्ति संचय करने में 12 साल गए दिखाने में 12 घंटे गए और वह मिली 12 मिनट साहू जी कुछ भी नहीं रहा क्या मैं कुछ मनु यह ईश्वर से अलग जो अपना अस्तित्व बनाने की कोशिश है ईश्वर से अलग होकर अपनी कोई विशेषता प्रकट करने की कोशिश है यही व्यक्ति का व्यक्तिगत दोष है और समाज का समाजीकरण यह
व्यक्ति का व्यक्तिगत दोष और समाज का सामाजिक दोष कुछ बन जाए अपन महान बन जाए फलाने बन जाए जब तक कुछ बनोगे तो किसी से तो अलग बनोगे बनेगा तो बिगड़ेगा और जान का तरीका [संगीत] जिनके भाग्य के भजन के बल के भाग्य भालू असद दीपक ठाकुर बढ़िया है उनके हृदय में यह ज्ञान का दिया प्रकाशित होता है सब संसार हुआ लेकिन ज्ञान स्थिति नहीं हुई व्यवहार में नहीं आया राम जी जैसा शरीर नहीं राम जी जैसी सच्चाई नहीं हो रामजी जैसा अयोध्या का राज्य आपके पास नहीं है लेकिन राम जी के गुरु जी जो
राम जी को सुना रहे हैं वही आज तुमको सुनने का सौभाग्य मिल रहा है ये भी ऊंची बात हां तो वशिष्ठ जी का रहे राम जी को है राम जी जिसके हृदय से सब अर्थो की आस्था नष्ट हुई है क्या बात सिर्फ अर्थो की आस्था सारे जो जगत के शब्द अर्थ है उनके आस्था जिनके हृदय से चले गए [संगीत] भवानी नहीं होती शब्द सारे शब्द अर्थ रहित हो जाता से सब अर्थो की आस्था नष्ट हुई है वह मुक्त और उत्तम उदाहरण चित्र पुरुष मुक्त रूप परमेश्वर हो जाता है और उत्तम से उत्तम पुरुषों से चर्चाओं
का त्याग करें इससे उत्तम पद अपने योग्य कोई नहीं जो कुछ देखने योग्य है वह मैंने सब देखा है और दसों दिशाओं में मैं ब्रह्म हूं कई जान यथार्थ दर्शी दृष्टि आए हैं और कितने है अपडे संयुक्त भी देखें पर सभी यही यातना करते हैं इससे भिन्न कुछ नहीं करते सारे ब्रह्मांड का राज्य करें अथवा अग्नि और जल में प्रवेश करें पर ऐसे ऐश्वर्या से संपन्न होकर भी आत्म लाभ के बिना शांति प्राप्त नहीं होते पृथ्वी का नहीं पूरे ब्रह्मांड का राज्य मिल जाए रात में शांति मिली तो ब्रह्मांड के राजा कभी आप का आप
आत्मलाभन परम लाभ हम ना विद्यतें हाथ में लाभ से कोई परम लाभ नहीं आत्मा लभर परम लाभ विद्यार्थी आत्मा ज्ञान परम ज्ञान आत्मा सुख हाथ परम सुखम निधि वैसा आत्मसुकी बड़ी है महिमा जिसको हो गया वह तो धानभागी हो जाता है उसका सेवक भी कोई काम नहीं [संगीत]