कि यह तेंदुओं को हेंद्र यह आर्म होल हेयर यतेंद्र यादव मनोबोध धेर्य तंजावुर हनुमान ओम जी मुनीमों साहब प्रणाम ओं शहर-शहर विगत वर्ष ब्यूरो ढोल ढूंढ झाल बयां को घोड़ों बिगडते छाप भयंकर क्रोध ढोल कि यह शदाणन अध्यन आधा मुखेड़ योर सदा मुद्दई व सांझा लिए भगवान बोलते हैं जिसकी इंद्रियां मन और बुध्दि अपने वश में हैं जो मोक्ष परायण है तथा जो इच्छा भय और क्रोध से सर्वथा रहित है मुनि सदा मुक्त ही है उस मणि को मनन करने वाले को मुनि बोलते हैं जो आत्मा परमात्मा विषय का मन करता है अपने देश के
ना होने का और अपने आत्मा होने का जो मन करता है निगुरा आदमी अध्यात्मिक मन नहीं कर सकता है प्राथमिक को तत्वज्ञान में रुचि नहीं हो सकती है अनिद्रा आदमी को अपने जीवन का मूल्य पता ही नहीं होता है निगुरा चाहे अपनी दुनिया में कितना भी बड़ा हो लेकिन अध्यात्मिक जगत में घास काटता है बेचारा ऐसे निदरेष लोगों को सावधान करने के लिए कबीर जी ने कहा निगुरा होता ही का अंधा खूब करे संसार का धंधा यह मुद्दा बने मेहमान सुन लो चतुर सुजान उबरा नहीं रहना बुरे का नहीं कोई ठिकाना कौन से गर्भ में
जाकर पड़े कोई पता नहीं निभा निगुरे का नहीं कोई ठिकाना चौरासी में आना-जाना यह मुद्दा बने मेहमान सुन लो चतुर सुजान नुगुरा नहीं रहना भगवान राम के भी गुरु थे वशिष्ठ महाराज भगवान कृष्ण के गुरु थे हिंदी पनीर विवेकानंद के गुरु थे रामकृष्ण रामकृष्ण के गुरु थे तोतापुरी मेरे गुरुदेव के भी गुरु थे कि शिवानंद स्वामी जी कि कबीर के गुरु थे स्वामी रामानंद जी महाराज राम अवतार ने भी शुरू किया कृष्णावतार ने भी शुरू किया है आज का आदमी ऐहिक थोड़ा नॉलेज पा लेता है यह कुछ वस्तु पा लेता है तो अपने को ज्ञात
गए यहां यदि मानता है उस बेचारे मनुष्य को खबर ही नहीं है कि जीवन कितना कीमती है और कितनी सारी संभावनाएं हैं भीतर की यात्रा में तो भगवान कहते हैं कि जिसकी इंद्रियां मन और बुद्धि अपने कहने में चलाने की कला मिलेगी तभी तो चलाएगा गुरु का ज्ञान और सहयोग मिलता तभी तो मन वास होता है इंदिरा आवास होती है कि मुनि मोक्ष या मुनि मोक्ष अपणा ऐसा मुनि मोक्षरूप ही है मरने के बाद मुक्त हो गया ऐसा नहीं अब भी वह मुक्त स्वरूप है विदेश या भय क्रोध अ यह सदा मुक्त व्यवस्था हां यह
सदा मुक्त एवं शुभ माना वाह मनन करने वाला मुझे सदा मुक्त है भक्त तो मरने के बाद स्वर्ग में जाता है स्वर्गीय मुक्ति पाता है अथवा तो इष्ट के लोक में जाएगा सायुज्य मुक्ति सालों के मुख्य अतिथि स्वामी प्रेममूर्ति शाहरुख से मुक्ति ऐसे वक्त के भी बहन जो भगवान को मानते उन भक्तों के भी गुरु होते हैं और जिज्ञासु के भी गुरु होते हैं और जिज्ञासु का उपवास से देव ब्रह्मा नेता होता है भक्तों का उपास्य देव भगवान होता है तो वहां से देव के लोग में जाएंगे और फिर उपास्य देव उनको तत्त्वज्ञान का उपदेश
दे तब वह यात्रा करेंगे और जो ब्रह्मविद्या का उपदेश पाकर यही मननशील मुनि हुआ है वह यहां इसी जन्म में जीते जी राजा जनक की नाईं कभी यकीन आए रामकृष्ण देव की नाईं सुलभ और स्वयंप्रभा की नाईं यही मुक्ति का अनुभव कर लेता है भगवान के भक्त ध्रुव को भगवान का दर्शन हुआ गुरु प्रार्थना करता है तो मैं माता च पिता तमेव भगवान बोल ते दारू अब मांग ले कुछ चाहिए वह भगवान जब तक आप नहीं मिले तो चाहते अभी कोई चाह नहीं रही है कि भगवान ने कहा कि अटल पदवी की इच्छा से तूने
तब किया है तुझे अटल पदवी मिलेगी गुरु बोलता है अब अटल पद भी क्या भगवान अटल पदवी क्या है मैं कौन हूं और आपका वास्तविक स्वरूप क्या है कि यह मुझे गांधी जी भगवान बोलते हैं अगर पूछेगा तो सब पोल खुल जाएगा मांगने वाला देने वाला दिलाने वाला ध्रुव मैं तेरे पर संतुष्ट हूं और क्या चाहिए दो बोलते भगवान में अपनी मति से मांग कर फस जाऊंगा मेरी मति अपनी सीमित है आप जो उचित समझे वही दीजिए कि भगवान के तक रुक जाओ तुझे सतगुरु मिलेगा तुझे संत मिलेंगे भगवान का दर्शन करने के बाद गुरु
को संत मिले ऐसा भगवान ने आशीर्वाद दिया है वामदेव और दत्तात्रेय उनको कुछ काल के बाद मिले हैं दोनों अपने अनुचरों को लगा रखा था कोई सख्त पद को पाया हुआ जो जीते जी मुक्त वह ऐसा कोई पुरुष आ जाए तो मुझे दर्शन लाभ कराने के लिए सूचित करना तो घूमते-घूमते वामदेव दत्तात्रेय आदि संत प्रसार हुए हैं दूर उनका पूजन करने जाता है थे heart-throne को कहता कि मैंने आज तक जो अटल पदवी और कुछ पाया है वह सब अर्पण करता मुझे आप परमपद का उपदेश दीजिए दत्तात्रेय बोलते हैं यह अटल पदवी राज्य तेरा तो
संभाले झंझट में नहीं चाहिए अटल पद भी मैं तो कल पक्का एक हिस्से में है जब वहां पर ले होगा तो यह तारा नहीं रहेगा तो थे जैसे चांद और सितारे में रहेंगे तो तेरा ही तरह तारा कब तक रहेगा इसलिए ध्रुव अटल पदवी तो तेरे को मुबारक हो हम तो अटल तत्त्व का साक्षात्कार किए हुए हमें कोई आवश्यकता नहीं है माया का जो पसारा है वह सब डालने वाला है माया का प्रसारण नष्ट हो पाए फिर भी जो नहीं डालता वही आत्मा परमात्मा अटल है उसको जानने से सब जाना जाता है उसको जान लिया
तो कुछ जानना बाकी नहीं रहता उस को पा लिया तो कुछ पाना बाकी नहीं रहता और उसमें 3 मिनट के लिए स्टे मिल गई तो फिर जीते जी मुक्ति है ग्रुप पर कृपा करके दत्तात्रेय वामदेव ने आत्माओं को देश वर्ष आया तो भगवान कहते हैं यतेंद्र ये मनो बुद्धिं मुनि मोक्ष अ पर आएगा बिगडते इच्छा भय क्रोध अ यह सदा मुक्त एवं कि इसके इंद्रियां मन और बुद्धि अपने वश में है जो मोक्ष प्राण है तथा जो इच्छा भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है का बंधन होता है इच्छा
वास्तव से और इच्छा-वासना होती है सुख के लिए सुख पाने की इच्छा से आदमी सम वस्तुओं संभालता है वाली संभालता है सुख की लालच से और दुख भी वैसे ही आदमी बेचारा बन जाता है जिसको सदगुरु मिल गया उसका सुख स्वरूप आत्मा के ध्यान का प्रसाद जग जाता है सूख की लालच काटने लगती है जो सूखी लाल अच्छा अतिथि बंदूक का भय भी अपने लगता है और बुद्धि में प्रकाश भी बढ़ जाता है तीन प्रकार का ज्ञान होता है एक होता है इंद्रिय जन्य ज्ञान इन रीजनिंग ज्ञान दूसरा होता है बुद्धिजन्य गया है है तो
इंद्रियजन्य और बुद्धि ज्ञान इन दोनों गानों को देखने वाला स्वरूप का ज्ञान साक्षी स्वरूप परब्रह्म परमात्मा का वह तत्वज्ञान तो आदमी साधारण आदमी इन रीजन ज्ञान से प्रभावित होते हैं और जो विशेष हैं पुण्यात्माएं बुद्धिशाली है वह बुद्धिगत ज्ञान का आदर करते हैं जो बुद्धिगत ज्ञान का आदर करता है वह परिणाम का विचार करता है और जो बुध फिक्त ज्ञान का आदर नहीं करता वह परिणाम का विचार नहीं करता है वर्तमान में फिसल जाता है जैसे पशुओं ने देखा बकरे ने देखा हरा ग्लास ढूंढना पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा किसका है नहीं सोच डिवेलप कारण मारेगा
पड़ी थप्पड़ फिर दर्द हो तो फिर lbw करार मारेगा आगे पीछे का नहीं सोचें तो जो आगे पीछे का नहीं सोचते उनको पशु बोलते हैं तो बहुत जोर से कहने खबर न थी पटेल भाषा में कहा गया बजे मुझे तो जो आगे चेक नहीं सोचते हैं और ग्राहकों के जिंदगी खत्म कर देते हैं वह संसार दुनिया में भले बुद्धिमान देखें लेकिन अध्यात्मिक नजर से उनको इंद्रियगत ज्ञान ने दबा रखा है उनकी बुद्धि में अध्यात्मिकता का आकर्षण नहीं है तो एक होता है इंद्रियगत ज्ञान दूसरा होता है बुद्धिगत गया तीसरा होता है तत्व का ज्ञान स्वरूप
का आत्मा का अ है तो पशु-पक्षी और साधारण तुच्छ मती के लोग इंद्रियगत ज्ञान में उन छह बुद्धिगत ज्ञान का प्रभाव नहीं है आपने देख लिया मैं लपक पड़े बुद्धि उसी प्रकार हस्ताक्षर कर लिया मैंने सुन लिया लपक पड़े ना आपने सुन लिया है लपक पड़े और परफ्यूम है या गंदी चीज है यह क्या है हनी करेंगे फायदा नहीं लपक पड़े तो जो जरा-जरा बात में लपक पड़ते हैं रस नाक कान ऐसे लोगों की इंद्रियां वश में नहीं है लेकिन जो मननशील है ऐसा मुनि मोक्ष परायण उसकी इच्छाएं विगत हो जाती पसार हो जाती है
कि आप यह का यह लेकिन इच्छा-वासना का गुलाम होकर नहीं चाहिए का यह एक होता है घोड़े की पूंछ पकड़कर यात्रा करना और दूसरा होता है लगाम पकड़कर जाता करना तो घोड़े की पूंछ पकड़कर जो यात्रा होती है वह यात्रा करने वाले की बुरी दशा कर देती घोड़े की लगाम जिसके हाथ में उसकी यात्रा सही होती है ऐसे मन जहां ले जाए वह भक्त ए रहना इंद्रियां जहां ले जाइए वहां लपकते रहना है ऐसी यात्रा वाले आदमी सारे जिंदगी बेचारे हैं बस सीटें जाते थक जाते जिंदगी भर परिश्रम करते जिंदगी भर देख सकते हैं फिर
भी अंदर से देखो तो ठनठनपाल कहां तो आत्मा का आनंद आकाश को भी व्यक्ति प्राय ऐसा चिदाकाश स्वरूप परमात्मा और कहां दो रोटी के पीछे मर गए कुछ नहीं दो रोटी कमाल यह दो Maggi बना लिया दो गाड़ी बना ली दो फैक्ट्री बना ले दूर कर दिया बस अनाथों कर मारे बैल हो गए घोड़ा हो गए अथवा घर में प्रवेश नहीं मिला नाली में बह गए ऐसे निर्भर लोगों के जीवन की कोई वर्तमान जीवन का कोई शत्रु नहीं कि चतुर गुप्त व है कि सत्यस्वरूप ईश्वर के नाते कुछ करें सत्यस्वरूप ईश्वर को पाने हुए महापुरुषों
का सदृश बनकर कुछ असली कमाई करें तब तो जिंदगी का सदुपयोग नहीं तो सदुपयोग अ जो तु चीजों के लिए जिंदगी खत्म कर दे ऐसा आम आदमी मुनि नहीं फैलाता मुनिवर है जो मन करता है ब्रह्मवेत्ताओं की बात को भगवान की बात का मन करता हर मोक्ष का अनुभव करने के रास्ते चलता है उसे मुनि कहते हैं तो इंद्रियगत ज्ञान बुद्धिगत ज्ञान और इन दोनों का प्रकाशक स्वरूप का ज्ञान मन बदल इन हिंदी में बदलती है बुद्धि बदलती है फिर भी जो देख रहा है उसका ज्ञान तो इंद्रियगत ज्ञान और बुद्धि का ज्ञान दो ज्ञान
में सारा संसार डाल रहा है मैं इसमें तीसरा पक्ष है जो इंद्रियगत ज्ञान भी रखता है और बुद्धिगत ज्ञान का भी कभी-कभी आदर करता है उसको साधक पक्ष बोलते हैं है तो साधक को इंद्रियों का ज्ञान का आकर्षण रहता है और बुद्धि से विवेक भी करते के इसमें कोई शहर नहीं एक हम रहते ऐसे भोगियों के बीच है कोई सार नहीं कोई सार नहीं करते भी जाते हैं कहते भी जाते सोचते भी जाते और करते भी वही है जो कोई शहर नहीं था 10 दिन पहले कर आज भी वही किया जो साफ नहीं दिख रहा
है फिर भी वही का वही के जार है इसीलिए साधक के जीवन में द्वंद रहता है अज्ञानी मूर्ख के जीवन में बेवकूफ इसे थोड़ी शांति रहती है और ब्रह्मवेता को पूरे ज्ञान के लिए कारण शांति और साधु भी चेहरे को धो रखता है जरा भी धर्म न च मे प्रॉब्लम जाना में आधा चम्मच समय नियुक्ति सॉफ्ट इस साधक तो वह दोनों में रहता था मित्रों ने कहा कि सुअर किचन में मज़े ले रहा है नश्वर बच्चे कोई प्रॉब्लम नहीं इससे तो तुम पर ऐसे सॉलिड इसकी वजह से मशहूर हो जाते तो अच्छा था तो सोक्रेट्स
ने का के बेवकूफ सूअर होने की वजह मुझे दोनों में सुकरात होना अच्छा है क्योंकि एक दिन निर्धनों परमात्मा का साक्षात्कार मैं कर सकूंगा वह नहीं करेगा तो बेवकूफी से जो मजे में रहता है बेवकूफी से जो संतुष्ट है उसकी अपेक्षा शांत आदमी अच्छा है कि कैसे महाराज बड़े शांत सब 40 देशों में घूमना और 50,000 डालना बुलाया सब डोनेशन कर दिया कहीं पर दो कपड़ा लेकर गंगोत्री जाएंगे आप बस आप मुझे सर्च करेंगे नींबू रहोगे क्या जीना जो जो गुरु मिले वहां से मनमाना नहीं और सच्चा कोई ब्रह्म पिता गुरु मिलता नहीं तो जी
के क्या करना है शांत हुए आत्महत्या करने की नौबत तक आ गए लेकिन तो शायद में आत्महत्या करता है तो संसार नहीं मिलता है इसलिए करता है और जिज्ञासु को आत्महत्या करने का विचार आता है कि गुरु नहीं मिलता परमात्मा नहीं मिलता तब ऐसा विचार है विवेकानंद को भी विचार आया भटकते भटकते देखा के कुछ कहीं संतोष ने मिलता है तुम जी के क्या करना हाथी के है वस्तुओं का फल फूलों का अन्न का हाथ बनाना है हैं जो हम खाते किसी ने किसी के हाथ से किसी ने किसी के मुंह से छुड़ाई हुई चीज
हैं चाय अन्हो फल हो चाहे दूध हो बछड़े के मुंह से छुड़ा कर अपने तक पहुंचता है फल पक्षों के मुंह से अन्य पक्षों के मुंह से छुड़ा कर अपने तक पहुंचता है तो फिर यह फल अन्न खाकर खातिरा बनाना जीवन में अगर कोई उद्देश्य नहीं और उद्देश कुर्ती का कोई सदगुरु नहीं मिलता तो जी के क्या करना तो विवेकानंद हो चले गए आत्महत्या करने को वह पावर बेवकूफ लड़के जो केरोसिन छिड़ककर आत्महत्या करते वह अलग बात है विवेकानंद जैसे आदमी खूब घूमते हैं कहीं बुद्धि का ज्ञान का आदर करते हैं इंद्रियों के विकारों में
नहीं है लेकिन बुद्धि का ज्ञान से परे ले जाने वाले सदगुरु नहीं मिलते तो फिर उनको भी जी कर क्या करना है स्वभाव आता है तो जंगल में चले गए कोई भूखा शेर का पेट भरेगा तो गए तो शेर के आगे तो शेर ने खाया नहीं पैसे यह महाराज भी जा रहे थे ना इन थे आत्महत्या कर लें जब कोई सदगुरु नहीं मिलता आप में शांति नहीं मोक्ष का रास्ता नहीं मिलता तो जी कर क्या करना तो ऋषिकेश में किसी ने बताया कि अहमदाबाद आश्रम में जाओ इधर आ गए थे यहां से सूरत आ गए
होली की सीरीज में अब तक से गाड़ी कुछ ईश्वर के रास्ते जरा भाग रही है चल नहीं विभाग रही है कि भगवान कृष्ण ने कहा मैं यज्ञ से तप से व्रत से होम से हवन से इतना वश नहीं होता हूं शुद्ध जितना में सत्संग सेवा सोता हूं इसलिए शिव को प्राप्त नगर के सत्संग साधना चाहिए सत्संग करना चाहिए सत्पुरुषों का सानिध्य पाना चाहिए सत्पुरुषों के द्वारा कुछ दिशा मिल जाए दिशा में जाए उसके अनुसार उसको अपनी यात्रा करनी चाहिए नहीं तो यह इंद्रियां जीव को घसीट ले जाती है पांच तो इंद्रियां है जी हां रख
बंद करो तो दृश्य जाकर पांचवां हिस्सा गायब कान बहरे हो जाए तो पांचवां हिस्सा होगा हेल्प नाक में कुछ गड़बड़ हो जाए तो संबंधित सारी गाय ऐसे सूखा रोग हो जाए तो स्वाद जगत गया है लेकिन यह पांचवा जो जगत है पांचों इंद्रियों से जो लुट यह विषय दिखते हैं इनको कितना भी भोग इंद्रियां शिथिल हो जाएगी मन में वासना बंध जाएगी अवधि भी शरीर कमजोर हो जाएगी लेकिन जो संयम करता है उनकी इंद्रियां अस्तर सतीश रहती है मन तेजस्विता बुद्धि में भी आध्यात्मिक तेज पाने की क्षमता बढ़ती है ऐसा पुरुष व मोक्ष परायण होता
है और आगे चलकर वह जीते जी मुक्ति का अनुभव कर लेता है कि उद्दालक ऋषि का पुत्र श्वेतकेतु गुरुकुल में पढ़ने गया श्वेतकेतु पिता के आगे आकर खड़ा हुआ टूट जैसा पिता ने देखा यह गुरुकुल से पढ़ कर आया है लेकिन अभी पढ़ाई इसकी उचित नहीं हुई पड़ने से तो आदमी को विनम्र होना चाहिए केवल इंद्रियगत ज्ञान के जगत की बात पड़ा है वास्तविक में मति शुद्ध हो बदमस्ती में प्रकाश मिले ऐसा ज्ञान नहीं पड़ा अब शुरू होकर खड़ा है पिताजी मेरे जानकार नहीं है और मैं चार वेदों का जानकार हूं पुराणों का जानकार हूं
ग्रंथों का जानकार हूं ऐसा अहंकार लिए हुए श्वेतकेतु के चेहरे पर से आरुणि जान गए है अरुण रेखा के पुत्र तू पढ़कर है उल्हास पिताजी तो अच्छा तो ऐसा कौन है जिसको ऐसा क्या चीज है जिस चीज को जानने के बाद कुछ जानने की जरूरत नहीं पड़ती जिसको पाने के बाद पाना नहीं रहता है लुट लो वो बोले यह तो हमने नहीं सीखा है कि मलिक फिर कैसे था एक रा दाणा सेओ कुछ एक विनोदी घटना है किसी चेले ने गुरु की सेवा क्या कुछ साल से लार सेवा क्या फिर पैर में खुद लौटाइए गुरु
महाराज कुंभ का मेला हो रहा है हरिद्वार में मेरे को जैसा दीजिए मैं कुंभ का मेला घूम लिया है सेवा तो बहुत साल कि आपकी महाराज अब थोड़ा घूमना भी चाहिए ना महाराज अनदेखा कर रहे चलो ठीक है जाओ बेटा भोले बाबा जी मैं कहां मांगता फिरूंगा ऐसा कुछ दीजिए ना रिद्धि-सिद्धि दीजिए बाबा जाऊं तो कुछ मेरे को मिला करें बाबा निकालने आप कुछ भोज-पत्र बाबा ने एक लकीर खींच कर दे दिया जाए तो गम में थे मोस्ट ₹1 तो अभी तलाक का निर्माण से यह व करें चांदनी औरों कटलेट या ना ऐसी हम जो
दो मैं जय श्री कृष्ण ₹1 तो जय मिल जाया करेगा तो है तो क्या मिल गया कभी दो दिन में एक साथ मिला कभी 5 दिन का एक साथ में गए करीब मैंने का rs.30 उसको मिला कुंभ का मेला को घुमा यात्रा बात रख घूमते-घूमते वह गिरनार पहुंचा गिरनार में किसी योगी के दर्शन हुए योगेश ने पूछा कैसा खाता पिता कैसे बोले गुरु महाराज ने एक खड़ा कर दिया लेकिन अब महंगाई का जमाना है मुसाफिरी में खर्च करना पड़ता है तांगे वाले को देना पड़ता है बाबूजी उन्होंने तो एक खड़ा कर दिया आप भी सिद्ध
योगी आप कुछ तय करें तो मेरा कुछ जरा गुजरा ठीक हो बाबा ने पूछा कि एक बड़ा कर दिया है तुम्हारे गुमराह कर दिया गल्ला मंडी लगा दी अब तो रोज के ₹10 मिलते हैं और दोस्तों पर मिलता था मैं आ गया अब मंदिर में भोग वासना थी तो होगी को भोग मिलता है तो सुखी होता है भक्तों को भक्ति मिलती तो सुखी होता है और जिज्ञासुओं को तत्वज्ञान का सत्संग मिलता तो सुखी होता है और ब्रह्मवेता को ब्रह्मानंद मिलता है तो परमात्मा झाल हो तो हर रमेश को से की रखना चाहे कोई भी मिले
लेकिन वह अंदर से ब्रह्मानंद लेता रहता सदा सुखी रहता है सदा समाधि संत की आठ पहर आनंद इंद्रियगत बुद्धिगत ज्ञान से परे आत्मज्ञान में पहुंचा है महापुरुष सदा समाधि समय तक कोई ठोस पहल आनंद अक्ल ममता को उपजा गिनें इंद्रपुर अंक इंद्रधनुष या फिर अंत हर शिष्य ने गुरु से वह चीज नहीं ले शिष्य ने गुरु से केवल रुपया मांगा रुपया इंद्रियगत ज्ञान का कृष्ण ऐसे ब्रह्मवेत्ता सदगुरु मिले रुपयों मांग रहा है कि शाम मूर्ख है विश्व सम्राट मिला यार बोले चवन्नी देखे सिंगदाना हमारे क्या मांगा टट्टू सिंह ए कि आत्म-साक्षात्कारी पुरुष मृगा संसार की
छोटी-छोटी हैं मेरे महबूब मेरे बच्चे बच्चा देंगे और आम लोगों को भगवान की दया से कुछ नहीं होता तो मुसीबत में रहते हैं क्योंकि मुसीबत नहीं हो रही इसलिए मुसीबत मुसीबत नहीं हो रही है इसलिए मुसीबत में है में बहुत पसारा मत करो कर थोड़े किया इस बहुत पसारा जिन किया वे भी गए निराश कभी जिन्हें ठीक है साईं इतना मांग भूख जो नौ कोटि सूख समाय मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा ना जाए कोई पसंद आए तो साधु संतों भक्तों की सेवा का प्रसंग है तो उसमें मेरा हाथ ना रुके बस मैं
भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाए भक्तों समुद्र जाए हर है 21 डे कॉमेडी लगे ₹10 मिलने लगे कभी कहीं थोड़ा-बहुत भंडार अभी कर लेता होगा मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा ने रेखा के साथ दवाई करते भाई भंडारा करने वाला अब ऐसा कोई दूसरा भी शामिल जाए कि मंडी और कर लो लो कि शिवा शिवा कांत नहीं होता बिना बुद्धि के व्यक्ति बिना ख्याल इच्छाओं का अंत नहीं होता है इच्छा गहरी उठ जाती हैं आप लोग तो नहीं मिलता तो फिर नहीं रुकेगा और मेरा लोग बोलते हैं कि मिलने से हम
धनवान आदमी धनवान हो गया लेकिन शास्त्र के अनुसार निधन हो गया निधन हो गया पहले तो उसको 500 500 5000 5000 तो फिर लाख की लाख 25 लाख की गई 5 लाख 25 25 लाख तो 50 लाख उसकी की बढ़ती जाएगी भीतर से बाहर से अंदर से भूख बढ़ती गई अगर नहीं होता है हुआ है थे फोर्स स्टेशन सेवा तो किया गुरु से एक बड़ा करवाया फिर दूसरे महाराज ने मिंडी कर दिया 10 मिलने लगे अब भूख और बड़ी कोई जॉब मिल गए महाराज खिलाने जो भी नहीं मीडियम कर दिया बाबा जी आपके गांव आए
हो आपको तो और कुछ नहीं कहता खाली एक मिनी कर दो ना आप तो सिद्ध पुरुषों को लेकर किया हुआ बोलेगा भी किया है मंडी बेटियां 1 मिनट कर दो बाबा बाबा ने कर दिया बेटा सो रुपया मिलेगा आज कोई मिल गया कोई 500 दे दिया मैंने तीन हजार टन आता है तो उसके साथ दो अंक का दोस्त भोग वासना का दोस्त अपने में विशिष्ट और दूसरे में हीनता का दोस्त और अपने होंठों में राग द्वेष के सबंध 642 सदन में और 16 गुण अगर 16 गुण का फायदा तो 64 दोस्त धन के धनवान का
गला दबा देते हैं रैबिट हल कर देते थे ने मति अकुंठ मर्डर कर देते हैं कि हो मति मंद हो गया कि गुरु महाराज की इतनी सेवा किया तो एक खड़ा कर दिया आप तो सौरव या रोज मिलता है जाऊंगा गुरु महाराज को कहूंगा कि तुम्हारे एक बड़े से तो मेरे को सौ-दो सौ रुपये मिला होगा ले लो होने दो ₹100 हम स्वतंत्र रहे अहंकार के दोस्त ने कहा कि गया गुरु के पास बोले गुरु महाराज गुरु ने देखा के पहले जैसी नम्रता भी नहीं यात्रा करके तो विनम्र होना चाहिए लेकिन कब जब बुद्धिगत ज्ञान
का आदर करेगा तब इंद्रियों के ज्ञान का आदर करेगा तो खटिया पलटन हो जाएगा कई लोग जानते कि यात्रा करें एकांत में रहे लेकिन जब बुद्धि के विकास नहीं है विवेक तीव्र नहीं है तो यात्रा करने निकलते गुरु के आश्रम से फिर भटकते रहते हैं खड़िया पलटन साधु अपने गुरु के द्वार पर टिक नहीं पाएंगे क्योंकि गुरु के द्वार में जाना तो अनुशासित होना पड़ता है भटकते रहते तो कोई अनुशासन ने कइयों को सदगुरु नहीं मिलता है इसलिए विचार है जिज्ञासु घूमते हैं और कई तो क्वेश्चन को सदगुरु चाहिए ही नहीं फिर भटकते रहते सुलभता
मिले बीड़ी मिल है चाहे मिले बढ़िया भंडारा में ले पहले तो फिर भी व्यक्ति नहीं होता तो वे लोग साधु साधु साधु साधु संतों की करें उसको फकीर फकीर को साधारण चीज का नाम फ़क़ीर सब्सक्राइब करें उसका नाम फ़क़ीर के लिए बेहद मैदान में से 69 फकीर फकीर तो भगवान का रूप होता है फकीर भगवान का भी गुरु होता है फकीर को नहीं पड़ता है कुछ लोग तो ऐसा करके निकाल कर अपने को प्रॉब्लम साबित करते हैं लेकिन सच्चे फकीर बोलते हैं भगवान नहीं हम तो संत ही है भगवान भी सच्चे बकरों के शिष्य बनने
में राज प्रसन्नता अनुभव करते हैं श्री रामचंद्र जी वशिष्ठ फकीर के शिक्षित है सांदीपनि फकीर के शिक्षक है श्री कृष्ण चंद्र जी की है जिसको अपने शुद्ध स्वरूप में संशय नहीं उसका नाम फकीर फकीर के पास पहुंचा है वह मंद मति बोले महाराज महाराज जी द्वारा प्राप्त समूह वहां बरसों सेवा करें तमे मने एक लो कार्यालय फ्राई कर दिया अब उसे से तो मेरे को मिले होंगे तो मैं आपको यह 251 वापस करता हूं वेट करता गुरु की सेवा और भटक जाएगा तो मिलता है आपने कर दिया और 2 मिनट अच्छा पूरी करें हम अपना
लेते गुरु ने एक ब्रूस ली है का कार्य अब से जाता है तो सब जगह मिंडी धक्के-धक्के मिनट एक मिनट इन हिंदी की क्या वैल्यू होता है अ हाइट से ही जीवन में एक राधिका आत्मदेव है आंख यूपी गोलक भी मिंडी है और नाक के भिड़े ना के ही नासा पूर्वी मिडिया है कान की भी मंडियां है जब आत्मा रूपी एक रहा डिसकनेक्ट हो जाता है शरीर तो इन मंदिरों की जो हालत होती है श्मशान में वह सब जानते हैं ऐसे ही उसके कार्य की हालत दो चम्मच इसीलिए कबीर ठीक है एक कहते हैं सब
होता है कहते हैं सब होता है सबसे एक ना होए कबीरा यह जड़ाए गए बहुत से की ने अमित जिंदल बांधा एक से वे सोएं निश्चय जहां कसरत के तू की मात्रा कसरत के पिता ने पूछा व्रत के बोलता मैं तो कुछ नहीं जानता है कि ऐसा तो एक और ऐसा कौन सा है जिसको जानने से सब जाना जाता है बोले जा अपने आचार्यों से सीखे हो वह जितना जानते थे सब सिखा दिया है है तब पिता रूनी ने कहा उद्दालक मुनि ने के पुत्र अभी तुझे बहुत जानना बाकी है बहुत सीखना बाकी है यह
लिए इस जगत का ज्ञान नॉलेज पढ़कर है और अकड़ लेकर आया है वह ज्ञान अकड़ अकड़ वालों को नहीं मिलता है है तब क्षेत्र के तू कुछ तो पिता के ब्लड के संस्कार थे कुल के संस्कार थे गुरुकुल के थोड़े संस्कार थे सावधान हो गए पिताजी फिर आप जानते तो आपकी बताने की कृपा करिए पिता ने कहा कि पुत्र यह जो तू अपने कुश युद्ध के तो मानता है है कि आपने कोई दुश्मन मानता है है कि यह सारी मान्यताएं मन और बुद्धि तक की है कि आर्य मन और बुद्धि कि विभाग में है इस
स्टेज में है मैं मनोमन यह सब प्रकृति की चीजें हैं कि ऐसा करके चुप हो गए आरुणि श्वेतकेतु बैठे हैं कि हे पिता जी ओ हां मैं समझ नहीं पाया था का विस्तार से समझाने की कृपा करें बोले तू तो बोलती है मैं सब पढ़कर आया क्या पढ़ा तो वह कम है तेज मैं यह भी नहीं जानता तो देख हम जो अन्न खाते हैं उस अन्य से मन बनता है अपने पिता से अनुसंधान की रक्षा चाव नहीं समझा तो जा उ कि पुरस्कर 15 दिन फिर समझेगा 15 दिनों तक उपवास किया जो हम दवाइयां दोस्त
थे दूर हुई 15 दिन के बाद हूं पिता के चरणों में प्रणाम करके पूछता है कि क्या आज्ञा है बोले वह जो वेद पढ़ कर आया उसकी रिचा तो वह मेरे को तो आप समझ में नहीं रहा इस उम्र में नहीं रहा तो अमन है जाओ भोजन करो भोजन करो आराम करो फिर आओ आराम करके फिर है बोले अब बोलो फिर चाहे बोलने लगा लें कैसे कि हनुमान प्राण है ना अ को अन खाना बंद कर दिया तो देखो अमन कि 15 क्लास की शांत हो गई एक ही चला रहे हैं काले होने की मां
की सारी कम्युनिकेशन हो गई देख बेटा आदमी जो अपना खाता ना उसका तीन हिस्सा बनता है एक हिस्सा सुजामल बन जाता है मध्य हमेशा मांस बनता है और सुख में हिसाब से मन बनता है आदमी जो पानी पीता है उसका स्थल हिस्सा प्रेशर बनता है मध्य हमेशा रात में मिश्रित होता है आ उत्तम हिस्सा से वाणी बनती है ऐसे गियर दिखाता है तो वर्क शक्तियां आती है के नेत्रों को शक्ति मिलती हैं सूत्रों को शक्ति मिलती है तो यह खुराक के साथ तरीके से सूक्ष्मा हिस्से से तुम्हारे शत्रु केंद्रीय नेतृत्व री अधीन संचालित होती है
मन इंद्रियों और मस्ती चलती है मध्यम ने से तुम्हारा मांसपेशी वाला शरीर पुष्ट होता है और कनिष्ठ हिस्सा रोज बाहर चला जाता है आ जाओ जो सुना है उसको पक्का करो मनन करो और मनन करके दूसरे दिन आया अब पिता को पिता नहीं देखता है पिता को गुरु नहीं देखता है पिता को सतगुरु से देखता है गुरु को तो हम गुरुकुल में गुरुओं से तो बहुत सीखा लेकिन अभी जो सीखा है इससे कुछ स्थित केतु के चेहरे पर मस्ती पर कोई अध्यात्मिक तेज छाया है प्रकाश हुआ क्या रे मेरे घर में ही मेरे उंगलियां थे
मेरे घर में ही मेरे पीर थे अब मैं भटक रहा था पिता की गुरु की नहीं पूजा की इस व्रत के तुम्हें जब पुत्र पिता समझता है तब तक आत्म साक्षात्कार नहीं कर सकता है पिता में जब गुरु वृद्धि होती है सदगुरुदेव होती है पूज्य बुद्धि होती है गुरु गोविंद दोनों खड़े किसके लागूं पाय बलिहारी गुरुदेव की गोविंद दियो दिखा दो कि तब्बू के खजाने का अधिकारी होता है गुरु उद्दालक ने आरुणि उद्दालक मुनि ने हु देश का आरंभ किया कि बेटा यह सारा जगत परमात्मा से ओतप्रोत है हे गुयस विल बी एक कख एक
तिल भी भगवान की सत्ता के बिना नहीं हो सकता है और एक तेल को भी अ कि अगर बुद्धिपूर्वक देखो तो भगवान में हैं और भगवान उसमें हैं एक मच्छर में भी देखो तो भगवान है उसमें हर वह भगवान में है मतलब एक चीज समझ में नहीं आता मुझे देख श्वेतकेतु मधुमक्खियां कई फूलों से कई फलों से कई वृक्षों से कई जलाशयों से वह शहद खींच कि आत्मा मिठास ले जाती है और मिठास जगह बन जाती है तो पता नहीं चलता कि कौन से फल क्या है कौन से फूल का है कौन से जला शेट्टी
कौन सी मिठास है वह शहद में ओत-प्रोत हो जाती है ऐसे लोगों के अंदर जो चेतना देखती है ज्ञान दिखता है आनंद देखता है यह केवल बुद्धि से सोचकर विचार के अनुमान करके भगवान की शक्तियों का भगवान के होने का भगवान के इंदई दलों को देखकर ही भगवान के होने का पता लगाते-लगाते आदमी भगवान के होने का साक्षात्कार करता है हुआ था जाओ आज का पाठ प्रख्यात स्वत्व आरंभ करता है पाठक का करता है रात बिताता है प्रभात कुमार धोकर ध्यान आसन प्राणायाम आदि करके नियम गुरु के चरणों में आता है गुरु की पूजा करता
है वंदन करता है अर्चना करता है और प्रार्थना करता के गुरुदेव पिता को गुरु की नहीं पूछते हुए हैं इस क्षेत्र के तोड़ ब्रह्मा विद्यालय को बैठता है के पिता ने कहा कि देखे तो कि एक में सब है सब में एक कुछ समझे वो बोले यह वाक्य वाक्य समझा अर्थ भी शायद समझ जाऊंगा लेकिन इसको ठीक से बुद्धि योग हो जाए ऐसी कृपा कीजिए उद्दालक प्रसन्न हुए कृषि श्रमिक जिज्ञासा है समझने की प्यास है देखो वटवृक्ष उसका आटा तोड़ कर दो है बट वृक्ष का फल तोड़ने यह लो फल फल फल तो उसमें से
एक निकालो है कि यह दोस्त बीच बीच को तोड़ो बीच थोड़ा इसमें कुछ दिखता है पत्ते देखते हैं अहमियत देती है डालें देखते हैं मूल दिखता है उनके पिताजी इस पर कुछ नहीं बोले अच्छा इसमें कुछ दिखता नहीं फिर भी से पूरा वटवृक्ष छुपाई ना इसको बहुत देंगे वटवृक्ष होगा ना और उस वटवृक्ष कितने ऐसे भी होंगे और उन वीडियो से कितना होगा बोलो कि कितना एग्जाम गिनती कर सकते हो तो ले नहीं तो जैसे वटवृक्ष के बीच में पूर्व वटवृक्ष छुपा है और वटवृक्ष में झटके भी छुपे हैं ऐसे जगत में परमात्मा छुपा है
परमात्मा में सारे छुट्टियां पड़ी तालियां बजाई लेकिन साक्षात्कार नहीं किया तुमने है कि यह तो सुनने का पुण्य मिला और मजा मिला है एक मच्छर में भी चेतना और ज्ञान पीढ़ी में भी अकल है पेट भरने तक नियुक्त किया है और शक्कर कि है कि जानती हैं ना यह ज्ञान कहां से आया सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म इतना सूक्ष्मातिसूक्ष्म ओं बैक्टीरिया ज्ञान होता है अपना खाने का क्या खाना क्या बना खाना यह ज्ञान उस ब्रह्म क्या है परमात्मा क्या है वह एक अंश विकसित हुआ है मनुष्य में कितना चारण स्पांसरशिप विकसित होता है ब्रह्मवेत्ताओं में दर्शन से
विकसित होता है आ साक्षात्कारी महापुरूषों और ज्योति साधना करते हुए गुरु आज्ञा में रहते तो अच्छा अनुसार और विकसित होता है भाग विकल है तो ऐसे पुरुष भगवान माने जाते हैं भगवान वेदव्यास भगवान पॉवर भगवान कृष्ण भगवान राम प्रतिदिन भगवान राम कृष्ण अवैध व्यवसाय आए तभी उसी भगवान में है अबे कभी भी उसी भगवान में और उबले हुए तो भी उसी भगवान है ऐसा ज्ञान और बहुत कहते सुना सीखा आप पता चला कि यह तो पिता के रूप में साक्षात परब्रह्म परमात्मा का ही रूप है आ जाऊं श्वेतकेतु सुनता है समझता है त्यों-त्यों उद्दालक की
महिमा उद्दालक में बड़प्पन का दर्शन होता है वह पहले थे वह मेहनत शिक्षक इमरती जितनी विकसित होती है उतने ही गुरु का महिमा जानता है के क्षेत्रों जहाज का पाठ पूरा हुआ पक्का का के दूसरे दिन फिर अलार्म सेट किए तू आया पिता की पूजा की गुरु किन है ये देख को एकदम का नमक डाला है ना अ में नमक डाला प्यार नमक डाला है तो तेरे को क्या पूछना है वो बोले भगवान सर्वत्र है सब में हैं तो दिखे तो नहीं कैसे देखा जाए बोले देखा नहीं जाता है बेटा जो भी देखा जाएगा सब
माया है यह अनुभव का विषय है माया भी भगवान का दर्शन तो होंगे माया विशेष वेतन का तो दर्शन हो गए दृष्टि लेकिन माया विशिष्ट चैतन्य जिससे चैतन्य है वह सुसाइड करने का दर्शन इन दिनों से नहीं होगा वह गोचर जहं लगि मन जाई सो सब माया जानू भाई है कि श्रीकृष्ण ने आरंभ का हाल है यदि दम मनसा चक्षु व्यायाम सम्रद्धि भी न श्रम ग्रहण अवधि माया मनोभाव जो मन इंद्रियों से और चक्षुओं से कानों से सुनाई दिखाई पड़ता है वह सब माया है और पूजा एकांत माया से पर मुझे कृष्णतत्व में मिल जाए
तो फिर कभी बिछड़ने का दुर्भाग्य तरह को नहीं आएगा साथ में तो कोई आया नहीं साथ में कोई जाएगा नहीं लेकिन जोश कभी साथ छोड़ता नहीं उसमें मुझे कृष्ण तत्व का अनुसंधान कर बद्रिका आश्रम में भगवान कृष्ण ने उद्धव को बिजली गया आत्म साक्षात्कार करने के लिए तो आत्मा तो सर्वत्र वह तरह के बेटा अनुभव करने के लिए सूक्ष्मतम चाहिए अब सुख मुक्ति इंद्रियों को संयत करेगी इंद्रियों का आकर्षण कम होगा तब वह मत विशुद्ध होगी और शुद्ध तत्व का उपदेश मिलेगा तब उसमें टिकेगी तो वह मति ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाएगी परमात्मा का अंश में
उन्हें बहुत लें और पिताजी शब्दों से तो मैं समझ गया लेकिन कुछ प्रैक्टिकल पुरुष नमक डाला यह मक्खन आ जाता पानी का इकलौता लेना है प्लेस में डाल दे दो मैं अपने कमरे में रख सुबह इसको ले आना है कमरे में रखा सुबह ओ ले आया वह गलत बोलते हैं तो नमक डाला कह डाला था और इसी लोटे में निकाल हो वह बेचारा भोला श्वेतकेतु हाथ घुमा घुमा कर थक गया नमक डाला तुम था ही नहीं तेरे कमरे में कोई आया तो नहीं था पहले नहीं नमक डालना कहा गया कि जी पिताजी नमक डाला तो
नहीं दिखता है ले बेटा इसमें घुल मिल गया घुलमिल गया वह आंखों से तो नहीं देता फिर भी मिल गया है यह तो समझेगा मानेगा और यहां अच्छा अब यह पानी को चखो तो यहां पर खरा है नमक घुलमिल गया है सच्ची बात है पिताजी अच्छा यह पानी को 15 बर्तनों में बार तो 15 कटोरी में भाषण दिया अब एक कटोरी एक कटोरी का पानी दूसरी 10 कटोरी में आधा चम्मच नमक डाल दो डाल दिया उस आदमी का दसवां हिस्सा अपने मुंह में डालो दो ए आर रहमान का दसवां समूह में डाला था रिव्युस में
खरास है ने कहा है कि पिताजी उन नमक ऐसा पानी से घुलमिल गया कि वह प्रोत दसवां हिस्सा क्या बीसवां हिस्सा भी करें तभी भी उसकी असर है आए इससे ही वह चैतन्य ब्रह्मांड में ऐसा भी मिल गया बेटा कि मच्छर में पीढ़ी में खटमल में भी उसका ज्ञान और चेतना है और खटमल नौकरी मर जाता है फिर विवा का स्वरुप ज्ञान और चेतना नहीं मरती कि फिर दूसरा शरीर धारण कर लेती है ऐसे आत्मा की अमरता और सर की नश्वरता का ज्ञान गुरु ने दिया शिक्षक और वह यान महत्व महायान और उसे भी अनुभव
है वह चैतन्य परब्रह्मा परमात्मा और महान् से भी महान् है छोटे से छोटा है इतना है कि राई का दाना भी उसके आगे सुमेरु पर्वत जैसा लगता है और बड़े में बड़ा ऐसा है कि हिमालय भी उसकी गहराई जैसा भी नहीं लगता है इतना वह बड़ा है ब्रह्मांड को व्याप रहा है वह परमात्मा आकाश को भी व्याघ्र ऐसा आत्मा-परमात्मा दत्तात्रेय बोलते उस परमात्मा के स्वरूप को अपने गांव स्वरूप को छोड़कर लोग यह आदमी चार पैसे की चिंता में वही आदमी चार बच्चों की चिंता में अहंकार या विचार पैरों की कुर्सी की चिंता में हर विषय
आदमी विषय विकारों में अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं उनको नष्ट होने से बचाने के लिए भगवत गीता का श्लोक आज का कहता है यह केंद्रीय मंत्री एवं बोधि और यदि इन जाण मुनीर मोक्ष अप्राप्य और ईपीएफओ कि विगत इच्छा भय क्रोध ढोल मिनट ऐशा फालतयानो क्रोधो योर सदा मुक्त अमेज़न सॉल्व लुटेरे है जिसकी इंद्रियां मन और बुद्धि अपने वश में है जो मोक्ष परायण है तथा जो इच्छा भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह मुनि सदा ही मुफ्त है ओम ओम कि इन कथाओं से आप यह जरूर लेंगे कि अपने मन को इंद्रियों
के पीछे ना बहने दे मन को बुद्धि कि आपके में चलाएं और बुद्धि प्रभावशाली तब होगी जब हम प्रभावशाली पुरुषों का प्रभावशाली गुमशुदा और प्रभावशाली इसे प्रभावशाली परमात्मा का संघ हम आदरपूर्वक करेंगे उनकी बातें आदरपूर्वक बनेंगे उनके हाथों आगाह आदत पूर्व आदर पूर्वक नमन करेंगे तो हमारी स्मृति में अधार्मिक प्रभाव रहेगा और मन सैयद रहेगा इंद्रियां कुपथगामी ना होकर सुपथ दामिनी होगे तो हमें भी आज के श्लोक के अनुसार विगत इच्छा इच्छा चली जाएगी वासना के चला जाएगा क्रोधी चला जाएगा और मुख पर आए सदा मुक्त व्यवस्था ऐसा अनुभव हमको फिर बाहर के व्यवहार में
तो अपने जैसा आश्रम दिखेगा लेकिन अंदर में न भाए होगा ना क्रोध होगा सदा मुक्ति का रस जीते जी अनुभव होगा उर्स योग ओम ओम लुट लो आज तुम्हारे घर की शांति किसी का बंगला देखकर किसी की गाड़ी देखकर कि किसी खिलाड़ी या बच्चे देखकर हर की नौकरियां हल्का मन इच्छा करता है कि मुझे गाड़ी ऐसी मिल जाए लाडी ऐसी उम्मीद है बच्चे से हो गया है अब हम ऐसा हो जाए लेकिन जिसकी बुद्धि सत्संग घर के साथ नगर के सत्यस्वरूप परमात्मा की कथा श्रवण करके जिसकी बुद्धि कुछ शब्द पद के तरफ चली है वह
सोचता है कि इनको गाड़ी है वह है फिर क्या हो गया अंत में क्या हजारों गाड़ी वालों में भी मैं तो वह नहीं संसार की इच्छा नहीं करता वह टू दा लकिन लुट विशुद्ध कैसे दिन कब आएंगे मेरे को संसार का आकर्षण रहेगा ऐसे दिन कब आएंगे कि सुख-दुख में मैं संभाल लूंगा ऐसे दिन कब आएंगे इंदौर के मान और अपमान की चोट मुझ तक नहीं पहुंचेगी ऐसे भोजन का भार आएगा कि मैं जीवन मुक्त पुरुषों की नायक संसार का चिन्ह ऐसे दिन कब आएंगे कि मैं अपने स्वभाव में निश्चिंत नारायण स्वभाव जब का यह
लोग भी सुधार कैसे चिंता व्यक्त की और बंदूक ना वह सोचता कैसे दिन कब आएंगे कि हमें पेट की बेटी का ब्याह शादी और जन्म हो जाए हमारी सूचिका कैसे दिन कब आएंगे इस कुर्सी से भी कोई बड़ी कुर्सी मिल जाएंगे वीरवार रात सैमसंग A7 का पाएंगे कि भगवान का अनुरोध और दीदार हो जाए लेकिन था भक्तों को जब सब संग मिलता है मुट्ठी में सब तो पड़ता है तो हम तो सोचते कि पर वह पूछा बूंद उद्धरण सूर्पनखा के आगे भी खड़े थे भगवान आ जाए तो क्या लेकिन भगवान जैसा चाहते हैं समझ प्रयोग
ऐसे क्षमता में अभी जो अंतर्यामी भगवान है उसका अनुभव करके जिससे भगवान भगवान है महापुरुष महापुरुष है उस महान परमेश्वर स्वरूप का साक्षात्कार करने की तीव्र इच्छा होती है उत्तम भाजपा को उत्तम जिज्ञासु ऐसे कितने का पाएंगे कि कर्म करते हैं हुए भी मैं अपने अखरता भाव में स्थित राहु का या ऐसे दिन कब आएंगे कि वह करा दें मेरे मन उछल पड़ेगा ना चेतन का यज्ञ किन्नर भ्रम हो मेरा अपना देखो मिलन चमकाया प्रसिद्ध कपड़ा लेंगे कि गुरु की दृष्टि से मेरी दृष्टि में भगवान की दृष्टि से मेरी दृष्टि मिले गुरु को गुरु को
जो ब्राह्मी दृष्टि मिली है ग्रुप को और भगवान को जो ब्राह्मी दृष्टि है उन्हें दृष्टि में मैं अपनी दृष्टि मिलाकर जगत को भ्रम हो हाथों स्वभाव होने जरूर देख करो जगत को परिवर्तित एक के अनुसार उसके अलार्म स्थितियों का जैसे इन नमक वाले पानी एक कण कण में निमक विस्तृत होता है ऐसी जगत के कण-कण में जगदीश्वर मिश्रित हो उदाहरण के उद्देश से स्विफ्ट के तो ज्ञान के हुआ था हम कब होंगे ज्ञात गया ऐसे महाबलशाली दिन कब आएंगे को सुनें कि राधे कृष्ण की ज्योति कम लगने लगे काम करो उपाय कुंठा से अपने चित्रों
को सुरक्षित करने की सतगुरु की दिशा कब मिलेगी ऐसे दिन कब आएंगे कोई सदगुरु महापुरुष वह अपना गुरु मानकर हम निश्चिंत नारायण खेड़ा स्थित जाएंगी पवित्र भक्त के हृदय में ऐसे विचार रखे हैं [संगीत] कि सुंधा व्रत और संयम विनायक की जिंदगी स्टेरिंग आर ब्रेक बना की गाड़ी कैसी है और सब ग्रुप बनाकर जिंदगी एग्जाम बिना अधिकार है इन चेन्नई हो प्रेमी हो प्रेमिका खूब हो दो ब्रेक हो जाए दो स्टोरी हो जाए प्रेगनेंसी नहीं तो किसी काम कर रही है एंजिन तो है ब्रेक और स्टेप नहीं है तो बिखरने के चाहेंगे इसलिए बोलते हो
अध्यात्मिक शक्ति रूपी इंजिन रूप मंत्र दीक्षा दे देते हैं साथ-साथ में संयम का स्टेरिंग और बड़े ग्रुप इस ट्रिक भी बार-बार सुनाते रहते हैं जतेंद्रीय मनो बुद्धिं मुझे कुनै कितना करके अपनी इंद्रियों को व्यर्थ जगहों से वापस हटाना साल तक तो संसार में जा रहा है कि यह शहर सादकपुर मुझे तेरी श्रद्धा पर भरोसा है एवं शुभ तो संसार में जाएगा संभल-संभल कर कदम रखना है यह मोह के दलदल में कंडीशनर जाना विकारों के कांटों से अपने पैर छील मत लेना एक साधारण आदमी के साथ अपने अ थे कंपटीशन करके साधारण जिंदगी मत उजाड़ना [संगीत]
संसार-पटी है यह बालों को अपना चाहती चलाती है सिर्फ मैं तुझे संसार में घर लौटने की इजाजत दिखाओ मुझे तेरी श्रद्धा पंग देशभक्ति पर तेरे छोटे-मोटे व्रत और नियम पर भरोसा है तो समय-समय पर सत्संग का सहारा लेना एकांत का सहारा लेना सत्कर्म का सहारा लेना कि तक का सहारा लेना जब का सहारा लेना क्योंकि तेरे साथ पांच संधू लगे हैं अलग तू अकेला है तुझे युगों से यह शत्रु दबोचते हैं वर्षा कभी काम ने तेरी कमर तोड़ी है तो कभी लोगों ने तेरा दिल धड़काया कभी मोहन ने तुझे मार मारा तो कभी अहंकार ने
तुझे उद्विग्न आख्या यह सादा [संगीत] ब्लुटूथ अपने इन क्षेत्रों से जूझता चूसता कि 84 लाख जन्मों से भटक रहा है कि आप इन दोस्तों को पटाकर तो विजेता हो जाए ऐसी भगवान की ओर सद्गुरु की इच्छा है लुट की कॉलेज चैनल के इन थे पुत्र-परिवार अभी तेरे पास नहीं है ऐसे इस जन्म की भी यह चीज़ें है एक दिन तेरे से छूट जाएगी इसलिए इन चीजों के लिए ज्यादा चिंतित ना हो ना भाई बिना होना आकर्षित न होना परिचय मिल भी जाए साधना किया है तो यह चीजें स्वभाविक आने भी लग जाए तो इनका हम
कार मत करना साथ आप अगर सुख सुविधा या है तो इनको इस वर्ष के तहखाने में बांटकर प्रशांत करके उसका उपयोग करना इबादत है आज है तो अब वतन ध्यान और त्याग के बल से उपयुक्त कर्मों से Bigg Boss बाधाओं को त्यागकर से जीता जाता है और सुविधाओं को सत उपयोग केवल से वितरण के बल से सुविधाओं के प्रभाव को आ जाता है तेरे को युक्तियां कुंजियां दे रहा हूं जब जिस-जिस ताले को जो-जो कुंजियां कप्तानी पड़े तो उपयोग करना अपने हृदय के ताले खोल लेते रहना है तहत कि वे कुछ खाते रहना मैं राकेश
को बढ़ाते रहना परमेश्वर ध्यान और भक्ति का हुई नियम बना लेना कोई पवित्र जगह घर में सुरक्षित कर लेना 25 ताजे फूल धूप दीया करके उस जगह 52 रखना अपने इष्टदेव गुरुदेव के प्रति बैठ जाना समय और उसकी मूर्ति के सामने एक टब 5 मिनट तू देखना फिर कंठ में उनका ध्यान करना तुझे वह परिणाम देते रहेंगे हैं ये दुनिया के अंगों में आखरी लग जाने तो तू सावधान न है ना कोई संगी साथी ऐसा जो जीवन में साथ चलें कि उन्हें शिष्य ऐसा कोई संगी नहीं जो तेरो जीवन में साथ चलेगा तेरे साथ तो
तेरा सक्षम चलेगा तेरा सत्कर्म चलेगा और दिल तूने जो ब्रह्म ज्ञान पाया है वहीं तेरी रक्षा करेगा पुत्र [संगीत] है ना कोई संगी साथी ऐसा जो जीवन में साथ चले कि इन मेलों में रखकर इन महफिलों में रहकर आखिर तुम अकेले चलोगे युक्त अमित तुम्हें श्मशान में ले जाएंगे [संगीत] चित्रपट सुलाएंगे [संगीत] मेरे दोस्त तुम्हें अग्नि देखकर वापस लौट जाएंगे दुश्मन खुशियां मनाएंगे दो सांस विवाह एंगुलर है लेकिन तुम्हें तो अकेला जाना पड़ेगा शमशान की अर्थी पर कि अग्नि का भोग अखिलेश देना पड़ेगा [संगीत] मैं तेरे शरीर को अग्नि भोगले कि शरीर को अग्नि भस्मीभूत
कर लें उसके पहले से है तू श्री कृष्ण के ज्ञान अपनी से तू सतगुरु की ज्ञान अपनी से अपने दोनों को चला सकते हैं आप अपनी वासना उपक्रमों को जला देना था [संगीत] श्रवण को अच्छा तू सावधानी के शिखर तो सावधानी की शिखर यात्रा करना आत्म शिखर पर चढ़ना आत्म प्रकाश में जीना है आत्मा-परमात्मा ध्यान में आगे बढ़ना आ एक साथ दबंग-2 अपने जीवन में धंधा चलाने वाले कोई न कोई देख रख लेना कोई न कोई व्रत रख लेना कोई न कोई नियम रख लेना ताकि यह पांच शत्रुओं दे जब सताए तो कभी तेरा संयम
रक्षा करें तो कभी जब तेरी रक्षा करें तभी नियम तेरी रक्षा करें तो कभी अंतर्यामी नारायण तेरी रक्षा करें तभी गुरु की प्रेरणा तेरी रक्षा करें तू जा रहा है संसार रूपी करता है डिलीट मार हम इस सामने किसी को पूर्ण सुख नहीं दिया है इस संसार ने किसी को छुड़ाने मेरे सतगुरु ने राम कबीर व सत साहेब इसलिए संसार में मोहब्बत मत करना संसार का सदुपयोग करना है और परमात्मा को प्रेम करना है जब व्यक्ति में और प्रेम यज्ञ में तो अपना समय लगाना प्रेम करने योग्य आत्मा-परमात्मा गुरुदेव हैं और कि तुम नहीं करता
है पूर्वक प्ले करना कि परमात्मा को शेयर करना परमात्मा का जप करें तो प्यार से करना परमात्मा का ध्यान करें तो प्यार से करना रूपन मंगा श्रवण करें तो प्यार से करना मनन करना है इस संसार तो ठीक है तुम्हारे लिए शीतल बंगाल जल हो जाएगा तो कई पिताओं के शरीर से गिरा तो कई माताओं के गर्भ में लटका है लुट चैनल तक मित्रों को संभाला कई जन्मो तक वस्तुओं को सबसे पहला इस जन्म में भी तु संभाल हमारी मना नहीं लेकिन हमारी प्रार्थना है तो हमारे सत्संग को भी सम्हल हमारे हरिनाम को संभालना हमारे
हरिप्रसाद को संभालना उससे बड़ा पानी भरना बढ़ाना [संगीत] लुट न कोई संगी साथी ऐसा जो जीवन में साथ चलें हैं शमशान तक के साथ यह तेरे लकड़ी ढेर चलते कोई तो हाथ में से चले जाएंगे भी कोई श्मशान तक पहुंच गए फिर जाएंगे कोई अग्नि लेकर चले जाएंगे तो कोई चिन्ह समापन तक खड़े रहेंगे फिर अपने अपने काम में लग जाएंगे तेरे लिए कौन रोता रहेगा सदा अगर दो दिन रोया भी तो तुझे काला शत्रु खुशी मना लेंगे मित्र शोकसभा मना लेंगे लेकिन हे साधक परम मित्रों परमात्मा है परमात्मा का ज्ञान है वह घर तेरे
साथ होगा तो तुम मुक्त हो जाएगा नहीं तो हजारों जन्मों से तूने अग्निदान लिया है लेकिन ब्रह्म ज्ञान का आप जिस जगह न मिली वह जन्म सफल कर लेना ना कोई संगी साथी ऐसा जो जीवन में साथ चले इन उल्लुओं मेरा कहा तुम अकेले चलो वे अकेले हो जाओ अन्न हाथों कर संसार से जाना पड़े ऐसा दल श्रवण को कर्मठ ना पड़े उस पर पहले तुम अपने नाथ को अपने आत्मदेव को अपने गुरुदेव को तात्विक रूप से मिलने का यह रास्ता है टेस्ट जान लेना कि अब दुबारा की सीमा के गर्भ में भटकना लटक नाम
मत नहीं दोबारा किसी देव यह सूर्य योनी में पशु या पक्षी और निर्मल मंतव्य दानव योनि में जाना नहीं है और अब तो परमात्मा को पास है परमात्मा आए हो जाना है दो और कभी Bigg Boss करो तो उसको प्रार्थना करना है नाहक तैनात सुरक्षा रक्षा कर अक्षता वृक्ष बताव कि रक्षमाह वृक्षारोपण है तो अपने अंतर्मन की रक्षा करना अगर तू स्वयं न कर सके तो भगवान को प्रार्थना करना कि प्रभु त्राहिमाम रक्षमाम रक्षमाम पे मरा कानूड़ा भगवान ने मैं तुम्हें मशीनी रक्षा कर दे तुम्हारी भक्ति रक्षा कर दें मर इस आदमी रक्षा करते हैं
मैं तुम्हें गिरफ्तार कर जेल महाप्रभु मनोविकारों पर रहते हैं तू मने पहनकर बाड़े छे मनमोह बड़े छह माह रे तारा सुनिधि चौहान अतिथि देता तुम्हारा हाथ पकड़ जी प्रभावती रुकनुद्दीन अधूरा [संगीत] झाला लुटेरा ढोला अरोड़ा के खेल में और [संगीत] प्रार्थना करते करते तुम्हारा हृदय पिछले तुम्हारा मन होगा तभी प्रार्थना करते करते करते करते हैं कि अग्नि जलाकर अपने पापों व तापों को संस्कारों को मिटाना कि अधिक पुस्तक पढ़ते पढ़ते हैं कोई अच्छी बात रख दो फिर आगे मत पड़ न वही बोलता मांगना दो घड़े कभी जप करते-करते ध्यान लग जाए तो उसी घड़ी में
परमात्मा में गोता मार न एहसास तक देवता एवं शुभ दुनिया में बड़े-बड़े उद्योगों की अपेक्षा दक्षिण परमात्मा में विश्रांति पाना अनंत गुना हितकारी रहेगा तेरा दुनिया ना मोटा मोटा उद्योगों करता है बे अमृत भगवान ना नुव्वे नुव्वे शांति स्वामी नित्यानंद - फिर पत्थर से तने मारा वाला महोदय दादा उतारे साधना मे रक्षा करते उसने घर जाने ना * 50 ऐ [संगीत] लुट निषेध अधिनियम की तक ना अरे ना अपनी प्रभात मां रे नाम नाम सें तिरे नाम जरूर शरीर वजह से जरूर और 620 अन्य उपस्थित अमेज़न दर्ज सब्सक्राइब तो स्वास्थ्य पधारें शरीर को जल से
शुद्ध रखना हर मन को संयम शुद्ध करते रहे हो अजय को कर दो [संगीत]