आदमी जन्मदिन मनाते हैं कि मैं एक साल का हो गया आज दो साल काया ये पाच साल का साई और मेरा 18वां साल हो गया 18 वर्ष नथे अरे दिन दिन दिन छज रहा है 18 साल का तो बड़ा नहीं हो गया 18 साल आयुष्य में कम हो गए त मौत के तरफ नजदीक हुआ 50 वर्ष का हो गया कि बहुत नजदीक हो गया 50 वर्ष धूप में बाल सफेद नहीं किए नहीं नहीं लेकिन मौत के तरफ बाल सफेद किए लाला तुमने ओ ओम ओम तो संसार जलती आग है जो सरकने वाला शरीर है इसमें
यदि मैं बुद्धि किया जो मिटने वाला संसार है उसमें यदि आसक्ति की तो फिर महाराज अशांति राग द्वेष ईर्षा यह सब आएगा तो जब अशांति हो तो शांत विचार करो राग आए तो वैराग्य के विचार करो इंद्रियों की लोलुपता का विचार आए तो मन को समझाओ श माना मन को रोकना दम माना इंद्रियों को रोकना सही बात तो ऐसी है जहां जहां तुम्हारी इंद्रियां जाती है जहां-जहां तुम्हारा मन जाता है वहां वहां से उसको दम लगाकर अपने आत्मा में स्थापित करो तो जन्म मरण का गम मिट जाएगा जहां जहां तुम्हारी इंद्रियां मन को ले भागती
है वहां वहां से इंद्रियों को और मन को विवेक द्वारा तुम दम लगाकर भी लौटा के ले आओ आत्मा में तो सही अर्थ तो है लगाओ दम मिटे गम गम कौन सा मिटेगा दम लगाना इंद्रियों और मन को रोककर आत्मा में स्थिति होने और गम कौन सा मिटेगा कि बार-बार जो जन्म मृत्यु के चक्कर में हम जा रहे हैं वह गम मिट जाएगा बात तो सीधी है लेकिन लोग जब सीधी ले तब तो सीधी होती है सीधी बात को भी लोग टेढ़ अर्थ ले लेते हैं थोड़ा सा तंबाकू डालते हैं थोड़ा सा गोली डालते हैं
थोड़ा सा चरस डालते हैं थोड़ा कुछ डालते हैं बोले लगाओ दम मिटे गम मिटे गम नहीं तो जीवन बर्बाद बड़े गम है मिटे गम नहीं है लाला लगाओ दम मिटे गम दम का मतलब है इंद्रियों क्म माना मन को रोकना है तब माना इंद्रियों को समदम आदि सुधा को पियो अब मन को कैसे रोके लाला जी बाबा जी मन को रोकना तो चाहते हैं लेकिन ध्यान नहीं लगता मन रुकता नहीं है भाई आदत पुरानी है घोड़ा फास्ट है तो एकाएक रुकेगा नहीं इसलिए इसको साइड दे दो जरा सा लगाम थोड़ा घुमा दो एकदम रोकोगे तो
पहले के पहरे के पैर जोना आगे के ऊंचे हो जाएंगे और तुम गिर पड़ोगे एकदम आम जैसे शिवाजी महाराज नी ज कोटक कदवा ले एकदम कद तो एकदम घोड़े को तो रोकना मुश्किल है घोड़े को एकदम रोको मत और एकदम छोड़ो मत घोड़े के जो बाग डोर है उसको थोड़ा सा लगाम को एक तरफ ढीला छोड़ दो और दूसरे तरफ खींच दो तो क्या होगा कि राउंड घूम के वहीं पहुंचेगा जहां से चला था हां कह दो ना ईमानदारी से और रोकोगे तो वही वही नहीं रोकेगा 10 20 कदम आगे रुकेगा लेकिन तुम्हारे पास युक्ति
है तो लगाम थोड़ा घुमाओ ग ना थोड़ा अटकल से जैसे आदमी वो ट्राय देने जाता है ना आरटी में तो आठा बना दे पास हो जाता है स्टेरिंग इस प्रकार का कर दो तो वहीं का वही अथवा गोल राउंड बना दो जीरो बनाना हो उस प्रकार का स्टेरिंग करोगे वहीं का वहीं वल घूमेगा उतने ही उतने में ऐसे ही तुम अपने मन का स्टीयरिंग जान लो कैसे उसको घुमाया जाता है फिर घूम फिर के वही आएगा उसको पता भी नहीं चलेगा कि कौन सा उस्ताद मुझे चला रहा है युक्ति से मुक्ति होती है लड़ाई से
मुक्ति नहीं होती है पहलवानी से मुक्ति नहीं होती है मुक्ति कहा गया युक्ति से मुक्ति लेकिन उस युक्ति को छोड़कर हम लोग परिश्रम कर रहे हैं कोई उपवास कर रहा है कोई नंगे पैर चल रहा है कोई खाना छोड़ रहा है कोई घर छोड़ रहा है कोई पत्नी छोड़ रहा है पत्नी छोड़ सकते हो लेकिन पत्नी का चिंतन नहीं छूटता घर छूटता है लेकिन घर का चिंतन नहीं छूटता धन छूटता है धन का चिंतन नहीं छूटता है देह छूट जाता है लेकिन देह का चिंतन नहीं छूटता है चिंतन छोड़ना मुख्य है वस्तु छोड़ना मुख्य नहीं
है ओम ओम विषय को विष समान छोड़ दो विषय को विष समान छोड़ दो का अर्थ ये नहीं कि तुम खाना पीना छोड़ दो देखना छोड़ दो सुघना छोड़ दो यह करो होता है छूटेगा कब शरीर है तो सब होगा ज्ञानी महापुरुषों का भी खाना पीना जीना मरना हंसना रोना सब होता है हम लोगों का भी होता है लेकिन हम लोगों का होता है तो बस नैन का चैन चुरा के चला जाता है और नींद हराम हो जाती है जरा सा अनुकूल मिल गया हा हाहा गुलाब तो के क्या श्रीनगर के गुलाम ओहो चश्म शही
नैन का चैन चुराकर ले गए वोह चश्मा देखो बढ़िया से बढ़िया देखो लेकिन आखिर सोचो कि आखिर यह सब दिखने वाला है जो दृश्य है वह अनित्य है वो मिथ्या है तो जो दिखा है वह भी मिथ्या है कभी ना कभी नाश हो जाएगा जिन आंखों ने देखा वह भी जल जाएगी और जिस वृत्ति ने देखा वोह वृत्ति भी बदल जाएगी लेकिन मेरा सच्चिदानंद परमात्मा नहीं लेगा ओम शांति ये तुमने घोड़े को लगाम जरा टेढ़ी कर ली देखा तो सही सब किया लेकिन कैसे आ गए अपने घर में तो देखा फिर सुना कोयल जैसा आवाज
है क्या महाराज ऐसा सुंदर आवाज है बढ़िया बढ़िया बढ़िया लेकिन आवाज जिस कंठ से निकला वो कंठ प्रकृति का है और जिन कानों ने सुना वो भी प्रकृति के है थोड़ी देर एक दूसरे के उसकी वृत्ति और अपनी वृत्ति उसका गीत और अपना श्रोत दोनों मिले जरा मजा आ गया लेकिन मजा आकर चला गया यह मजा तब आया जब मैं था मेरा चैतन्य था मैं तंदुरुस्त था प्रसन्न था तब मजा आया तो मजे का आधार मैं हूं शिवो हम सचिदानंद हम तुम गीत सुनो फिर लेकिन गीत सुनक धड़ाका कर दो के शिवो हम सच्चिदानंद हम
गीत का साक्षी हो हम महाराज तुमने खाया भोजन बहुत बढ़िया बढ़िया नी दा खूब उका खूब खूब उका पछ उकड़ तो ट क्या क्या खबर आपे के क्यों उकड़ खादा प न कलाकार बैठी र साकरिया लाडू का धान एक था ब्राह्मण देव वो चले गए हरिद्वार हरि के द्वार तो जाना ही चाहिए सबको देखो ह के द्वार जाना दिल्ली के आगे जो हरिद्वार है वो तो ठीक है लेकिन हरि के द्वार तो बाई हरिद्वार वो है और भीतर हरिद्वार तुम्हारा दिल है दिले तस्वीरें हैं यार जब की गर्दन झुका ली तब मुलाकात कर ली ऐसा
हरिद्वार उस हरिद्वार में तो ब्राह्मण देव नहीं गए लेकिन वहां हरिद्वार गए जहां पंडा लोक होते हैं जहां आत्मा होता है वह हरिद्वार नहीं पंडा लोकों के हरिद्वार में गए तो पंडा लोकों ने कहा कि आपको जो प्रिय चीज हो उसका त्याग करो क्योंकि विषय का त्याग करना ही तो तीर्थ में स्नान करने का फल है तीर्थ में तुम्हारा स्नान तब फला कि जो तुमको अत्यंत प्रिय चीज है उसका तुम त्याग कर दो तो ब्राह्मण गए कि हमको तो ब्राह्मणों को तो लड्डू प्यारे होते अच्छा मैं लड्डू छोड़ देता हूं लड्डू छोड़ के तो आए
लेकिन लड्डू बाहर से छोड़ के आए भीतर से छूटे नहीं विषयों का चिंतन तब तक नहीं छूटता जब तक परमात्मा का चिंतन ईमानदारी से नहीं होता परमात्मा का सुख जब तक नहीं मिलता तब तक विषय का सुख तुम छोड़ने को करोगे तो बेईमानी से छोड़ोगे अंदर से याद करोगे जैसे ब्राह्मण ने किया था तुम उसी के पड़ोसी हो उसी के भाई हो हम लोग सब तो ब्राह्मण ने महाराज क्या करा कि व लड्डू छोड़ के आए घोषणा कर दी पत्नी को बच्चों को कह दिया कि मैं तीर्थ नाया और पंडे के आगे मैंने श्राद तर्पण
वर्पण करते समय उन्होने कहा कि कुछ छोड़ो प्रिय वस्तु तो प्रिय तो ब्राह्मण को तो मधुर प्रिय होता है मैंने वो लड्डू छोड़ दिए पत्नी ने कहा संभालना खाना मत बोले मैं तो छोड़ के आया हूं अब नहीं खाऊंगा लड्डू पत्नी हंस पड़ी बोले तुम क्या लड्डू छोड़ोगे हम सब समझती बोले तू क्या समझती है आखिर तो मेरी पत्नी है मेरे जितना तू नहीं समझती कहीं हुआ पड़ोस में कहीं बारा मासी कुछ हुआ होगा भंडारा हुआ और ब्राह्मण देव गए पत्नी पास में बैठी है वो इंतजार कर रही कि अब क्या हो रहा है तो
लड्डू पतरा में आ गए ब्राह्मण बोलता दो रख दे ओम ओम ओम चावल भी ले लिए जो कुछ भंडार में बट र था ले लिया और पंडित कहता कि मैं ब्राह्मण हूं कोई जैसा तैसा आदमी नहीं हूं मैं बाधा करता हूं और बाधा मैं कभी तोड़ता नहीं हूं लड्डू रखवा दिए कहता मैं बाधा कभी तोड़ता नहीं बाधा रे बाधा मारी मां लाडू पर थी उतरी ने दाल ऊपर जा लड्डू से हटाकर थोड़ी देर के लिए दाल पर रख दिया और लड्डू कर दिए फिट अब अंत में दाल भात खाना होता है के बाधारी बाधा मारी
मां ज्या थी आवी त्या थी जा ज थी आवी त्या पाछी ने पाछी जा ले लाडू नी बाधा चालू छ पण लाडू न चिंतन छूटू नथी लाडू न भोग छूट नथी कदाच य लाडू न खाए बाधा करी दीी अने लाडू ने अडे प नहीं चता मन बाधा करले नथी ता बाकी ह सारा रे तो वधारे खाता ने के मैं नता खाता मैं छोड़ी दे तो त बे मार ददा तो वाध होतो तो लड्डू का चिंतन तो हो रहा है ना तो जब लड्डू का चिंतन हो रहा है तो ये बोलते हैं विषयों को तजो विष
समान जैसे तुम विष का चिंतन नहीं करते हो कि अच्छा था बढ़िया था चलो छोड़ दिया हमने नहीं पिया लेकिन तुम जरा पी लेते जरा हम ले आएंगे कभी काम आएगा विषय को विष को आप ऐसा नहीं कहते कि अभी मैंने नहीं पिया तो फिर पी लूंगा थोड़ा काम आ जाएगा तो उसके समान विषयों को तुम भूल जाओ ओम ओम ओम आर्ज समा संतोष समदम प सुधा दिन रात्रे जीवन में आर्ज लाओ क्षमा लाओ किसी ने कुछ कह दिया उस बात को पकड़ के अशांत मत हो किसी ने कोई गलती कर ली किसी ने कुछ
हो गया तो उसको पकड़ पकड़ के ऐसा वैसा नहीं क्षमा जैसे गंगा तिनका बहाने देर करते हो लेकिन तुम क्षमा करने में देर मत करो तो ज्ञान हो जाएगा क्षमा बड़न को होत है छोटन को उत्पात मान होते मानी लो भैला तो मान पर त क्यों ने आवे के पहला केव तने के बस मारो स्वभाव तमारो स्वभाव एम कवान मारो स्वभाव मोज करान हालो कौन थाके जय जय शमा बड़न को होत है छोटन को उत्पात विष्णु को क्या घटी गयो जो भृगु है मारी लात जीवन में क्षमा लाओ क्षमा लाना तो सही भीतर से तो
क्षमा रखना लेकिन व्यवहार में हो ना तो यदि तुम्हारे से कोई कर्जा ले जाता है कोई कुछ ले जाता है कोई चीज ले जाता है तुम बोलो के बापू क शमा राखो फबा जवा थने ब जा तो जीव मुश्किल थ ज फफा खवानो ओम ओम ओम पुराणिक कथा है कि एक बार कोई नाग निकला नाग को देख कर व देहाती बच्चे भाग गए ऐसा प्राय होता रहता था एक बार बच्चे भागे भागे लंबी-लंबी स्वांस लेते लेते भाग रहे थे तो नारद ने पूछा क्या बात है बोले साप निक छ हमने करवावे छ हैरान हैरान कर
द दो तो सांप को जाकर नारद जी ने कहा कि तेरे को तो भगवान ने देख सर्प योनि में भेजा है तू जरा शांत हो जरा क्षमा सीख लेगा तो भगवान की सया बन जाएगा शिव जी का श्रृंगार बन जाएगा यह मनुष्य जन्म तो नहीं लेकिन यह जन्म कोई बुरा नहीं है तेरे अंदर विष है लेकिन तू जीवन अमृत का बना ले तो अमृत स्वरूप परमात्मा तेरे को अपना शया बना देंगे पागल अब मेरा तो शिष्य बन जा मंत्र दे दिया शांति दई नारद जी ने मंत्र दिया और सर्प ने शिष्य होना स्वीकार कर दिया
महाराज अब तो सर्प शीतल शांत हो गया बाहर निकले तो भी य फफड़ा ना मारे किसी को डंक ना मारे बच्चों ने देखा कि अब तो कुछ करता नहीं है तो कुछड़ी को हाथ लगाया तो कुछ नहीं हो धीरे धीरे इधर उधर हिलाया तो कुछ नहीं करे बोला तो कर तो नथ तो आंधी चाकण जो वछ तो फिर तो उसका सोटा बनावे ऐसा वैसा करे सर्प बिचारा खाने को बाहर कभी निकले तो देखे तो उसकी मजाक करे मस्करी करे उसको एकदम एकदम चिन्न में तो सर्प तो दर में ही दर में बिर में ही बिरम
उनांग बठ हो बाहर ही नहीं निकले रत घूमते ममते 12 महीने के बाद आए तो पतले दुबले सड़े गले अंदर दर में पड़े थे नारद ने कहा बाहर आएए बोले चला नहीं जाता बोले बोले क्यों बोले आपने उपदेश दिया हैने तब से मैंने डंक मारना लड़ाई झगड़ा सब छोड़ दिया है तो मेरे को खाने पीने के लिए बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया आपका मंत्र जपता हूं बोले मंत्र जपता है तो मैं तो तुझे भगत बनाने को कहा था तू तो भगत बन गया भगत जगत को ठग है भगत को ठगे ना कोई एक बार
जो भगत ठगे तो अखंड यज्ञ फल होई मैं तो तेरे को महा भक्त बनाना चाहता था मैंने डंक मारने का मना किया था तेरे को फफरा मारने का थोड़ा किया था फफड़ा लगा ता वो पहले भाग जाता तो अपना जीवन जी लेता तो भक्ति की रक्षा करने के लिए भी युक्ति चाहिए ज्ञान की रक्षा करने के लिए युक्ति चाहिए तंदुरुस्ती की रक्षा करने के लिए युक्ति चाहिए ऐसे ही संसार सागर से पार होने के लिए भी युक्ति चाहिए युक्ति से मुक्ति होती तो तुम्हारा मन चला गया कहीं चित्र देखा फिर देखो कि इस चित्र में
स्याही है और पर्दा है सिनेमा की बातें हैं इन सिनेमा की बातों में वास्तविक घट नहीं उन्होंने झूठ मुठ अदाए की उसको सत्य मान के लोग घूमे तो घूमे तू क्या घूमेगा एक बार देख ले चल जान छुड़ा हरि ओम तत्सत आदू गप सप राणा छोड़ो राय की ये मन वश करने का उपाय है कीमिया है घोड़े की लगाम जरा सा टे आप भोजन कर रहे हैं पाना स्वाहा पाना स्वाहा व्याना स्वाहा उदान स्वाहा समाना स्वाहा पांच प्राण हवी कर दे मैं अन्न खाता हूं नहीं तुम बोलो प्राणों को आहुति दे रहा रहा हूं मैं
भोजन करता हूं भोजन में अच्छा स्वाद होना चाहिए कढ़ी और खिचड़ी कढी में हरी मिर्च होनी चाहिए हरी आई तो क्या और काली आई तो क्या लाल आई तो क्या खाएंगे थोड़ी देर के लिए पानी लाज बा चि पियो नाक से में रोटली फसाई आप फस लेकिन ये जिसमें फसी और जो फसा दोनों नश्वर इन दो ों को देखने वाला मेरा राम जो है शाश्वत है ऐसे शरीरों ने कई बार खाया कई बार खोराक पुराना हो गया शरीर भी पुराने हो गए लेकिन मैं कभी पुराना नहीं हुआ अज हूं अविनाशी हूं शांत स्वरूप हूं मैं
निर्लेप हूं शीतल हूं शुद्ध हूं बुद्ध हूं शिवोहम सच्चिदानंद अह आत्मा हम शांत रूपो हम इस प्रकार का यदि तुम विचार करोगे तो जैसी मति ऐसी गति तुम जैसा चिंतन करते हो ऐसा हो जाते हो हाड मास का शरीर तुम नहीं हो लेकिन चिंतन करने से पक्के हो गए तुम सिंधी गुजराती पंजाबी नहीं हो लेकिन सुना है चिंतन किया तो पक्के हो गए ओ पंजाबी ओ सिंधी बाबा ए मारवाड़ी कटे जाओ हो तुम ओ कान खड़े हो जाएंगे सच पूछो तो मारवाड़ी पना कहीं है नहीं सुन सुनकर पक्का हो गया झूठ मूठ में सुनी हुई
बात सच्ची लगती है तो जो सत्य स्वरूप तुम्हारा च तन्य है वेद कहता कि उसको तुम यदि सुनकर याद कर लो अपना स्वरूप तो बेड़ा पार हो जाएगा तो अष्टावक्र गीता में एक इतना ओज है इसका विचार करने मात्र से जीवन में उत्साह आनंद प्रेम छलकने लगता है जीवन में क्रांति आने लगती है इधर उधर की बात नहीं करते सीधा साक्षात्कार छोटी मोटी बातें तो बहुत सुनने की जगह हैं आपके यहां पर आए इतना दूर आए अष्टावक्र जैसा जनक जैसा संवाद सुनने को मिलता अब छोटी मोटी रेलगाड़ी में क्या बैठना पूरा रॉकेट में बैठो के
बस अठा थ अठा अष्टावक्र गीता को जो लोग समझते हैं जो लोग विचार करते हैं उनके प्राणों में उनके मन में उनके जीवन में उनकी चाल में एकदम नई रोशनी आने लगती है य अष्टावक्र गीता सब लोग तो संस्कृत में नहीं पढ़ सकेंगे इसलिए भोला बाबा ने छंदों में गाई और आश्रम की समिति ने इसको ब्रह्म रामायण के रूप में छपवा दी तो ब्रह्म रामायण के रूप में छपवा तो जो मोक्ष है तू चाहता वि सम विषय तज ताय पहला ही उत्तर है अष्टावक्र गीता का दूसरा श्लोक और छंद की भी पहली छंद है हम
लोग सब साथ में गाएंगे जो मोक्ष है तू चाहता विष सम विषय तज तारे आर्जव शमा संतोष समदम प सुधा दिन रात रे संसार जलती आग है इस आग से जट भाग कर आ शांत शीतल देश में हो जा अजर हो जा हम जो मोक्ष है तुम चाहता वि सम सजता करे आद समा संतोष तम की सुदा े संसार जल की लाग है इस लाग से जग पाग अशांत शीतल देश में हो जा अज हो कोई श्रीनगर या कश्मीर को शीतल शांत देश नहीं कहा तुम्हारी चित्त की गहराई जो है ना वो शीतल और शांत
देश है अष्टावक्र के जीवन में आता है व आठ ही महीने के थे और ज्ञान को उपलब्ध हो गए थे बुद्ध के जीवन में आता है कि वह माता के गर्भ से जन्मे सात कदम चल दि और उनको थोड़ा प्रकाश की बात आ गई सनातन सत्य चार क दिए माता के गर्भ से जन्म और चल दिए सात कदम और कहा कि जीवन दुख पूर्ण है इसका उपाय भी है दुख मुक्ति की खोज और मु हो भी सकती है लाउस जो थे वह 80 साल के जन्म में माता के गर्भ में रहे 80 साल पैदा हुए
तो बाल सफेद हो गए बाल सफेद होकर पैदा होना बच्चे का कोई बड़ी बात नहीं लेकिन 80 साल तक माता के गर्भ में थे यह कहानी है अर्थात 80 साल तक 80 साल की उम्र में वो नन्ने मुन्ने थे जैसे माता के गर्भ के बच्चे को कोई चिंता नहीं होती खानपान की सब माता के नाभि के द्वारा हो जाता है ऐसे लाउस के जीवन में कोई विषयों का चिंतन नहीं था सहज में जीवन जी लेते थे ऐसा भी अर्थ कोई लोग लगाते हैं जीसस पैदा हुए तो पिता के साथ वृंदा चल वाते थे लकड़ी उठाते
थे लेकिन जब छोड़ दी बात को विषयों का चिंतन छोड़ गया और भगवान का चिंतन करने लग तो योग में उपलब्ध हुए योग योग को उपलब्ध हुए योग की शक्तियां पाकर जब अपने देश में आए तो लोगों ने स्वागत में उनका उनके स्वागत में शहर को सजाया था और जब लोगों का अधिक चिंतन होने लगा और वही लोग दुश्मन हो गए तो जीसस को क्रॉस पर चढ़ाया गया जब क्रॉस पर चढ़े तो जीसस कह रहे कि हे मेरे मालिक मैंने लोगों को क्या क्या दिया और लोग बदले में क्याक देते जीसस मरियम के पुत्र हो
गए फिर दूसरी घड़ उनका चिंतन छूट गया और परमात्मा का चिंतन किया कि हे प्रभु तेरी मर्जी पूर्ण हो यह क्या करते हैं इसकी मुझे परवाह नहीं लेकिन तू जिसमें संतुष्ट है वो होने दो तो दो मिनट पहले जीसस तो मरियम के पुत्र थे जब ईश्वर में एकता कर ली अंतर्यामी से तादात में कर लिया तो जीसस ईश्वर के पुत्र हो ग और आज तक पूजे जाते हैं तो तुम्हारा जिसका जहां चिंतन होता है वहां तुम होते हो तो शीतल शांत देश तो आत्मा है यदि तुम आत्मा का चिंतन करते हो तो क्रॉस पर चढ़ते
हुए तुम्हारे अंदर शीतलता होती है और यदि तुम मित्र और शत्रुओं का और अपने और परायो का चिंतन करते हो तो महाराज तुम एयर कंडीशन में होते हुए भी अंदर से ना जाने कितनी कितनी हॉट कंडीशन में होते हो एक सूफी फकीर हो गए पंजाब के तरफ निर्मल स्वामी उनका नाम वह बोलते हैं कि ब्रह्मज्ञानी के द्वार का कुत्ता होना भी भला है साधक होना शिष्य होना तो ठीक है कुत्ता होना भी भला न जाने कभी ना कभी वो ब्रह्म विद्या तुम हजम कर लोगे आदर होगा ऐसी जगह हजार हजार मिलेगी लेकिन ब्रह्म वेता के
पास गुरु के पास आदर न भी हो सम्मान ना भी हो तुम्हारी बात काट दी जाए तुम्हारे को चोट कर दी जाए फिर भी आप उसमें बुरा मत समझना आपको चोट होती नहीं है आपकी मान्यता को होती है आपके देह अभिमान को होती है आदमी जब सुरक्षित होता है अपने को सुरक्षित जगह पर ले जाता है वहीं उसका पतन होता है जापान में एक बूढ़ा आदमी वृक्ष पर लोग को चढ़ाया करता था सीधे वृक्ष पर ट्रेनिंग देता था एक नवयुवक उस वृक्ष पर चढ़ने को गया न था उत्साहित चढ़ गया आखिरी छोर को आखरी डाली
को पहुंच गया बूढ़ा आंखें मुनकर बैठा है साथियों से गप सप लगा रहा है वह जवान इतना चढ़ा कि व आखिरी एकदम पतली डाली वहां पहुंचा है देखा कि बूढ़ा बड़ा निश्चिंत है मैं खतरे की जगह पर हूं फिर वो कुछ संभाल नहीं ले रहा है और जवान को नीचे उतरना था धीरे-धीरे नीचे उतर के आया करीब नीचे उतरना 20 फीट बाकी रह गया तो बूढ़ा ने एका एक झांका बोला संभाल के उतरना खूब ख्याल करके उतरना व युवक समझ कैसे पागल है जब खतरे की जगह थी जहां संभालने की जरूरत थी वहां तो आदेश
दिया नहीं वहां तो आंख मुनकर बैठ गए गप्पे सप्पे लगाने बैठ गए देखते हुए भी अनदेखे हो गए देखते थे फिर भी मुंह घुमा लेते थे अब जब पृथ्वी के करीब आया हूं गिरने का क्या नजदीक आ गया हूं एकदम भूमि को छूने के करीब हूं और बोलते कि सावधान ना और उतरा और आकर बुढे को कहा कि आप पागल तो नहीं हो गए जहां शिखर पर था जहां खतरा था वहां तो आपने कहा नहीं सावधान और बिल्कुल नजदीक आ गए और आपने कहा कि सावधान संभल के उतरना नहीं तो चोट लग जाएगी संभल के
उतरो धीरे धीरे उतरो जहां से संभलने को था वहां कह देते बूढ़े ने कहा कि मैं बहुत पुराना आज मुद गार हूं जहां संभलने का होता है जहां खतरा होता है ना तो आदमी अपने आप संभलता है जहां खतरा होता है ना अपने आप सतर्क रहता है और जहां खतरा कम हो जाता है तो उसे तसल्ली होती है अब कोई खतरा नहीं और वही दुर्घटना घटती है जय राम जी की तो जहां तुम्हें पुचका जाता है जहां तुम्हें इधर उधर किया जाता है वहां वही दुर्घटना घटती है देह अभिमान की वहीं जगत की आसक्ति और
वासना और वाह वाह भाई डाया भाई कवा जीवन पूरा हो जाता है और जहां तुम को सतर्क किया जाए जहां तुम्हें चोट कर दी जाती है वहां तुम अपने आप संभलते हो कि देखो ऐसी कोई गलती ना हो जाए देखो ऐसा कुछ ना हो जाए आप खूब संभलते हो वहा जहा खतरा होता है तो सदगुरु के द्वार पर सदा खतरा ही होता है खतरा उस लिए होता है कि संभले जाओ श्री राम सतगुरु कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं होता ओम ओम ओम कथम ज्ञानम न ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है मुक्ति कैसे होती है वैराग्य कैसे
प्राप्त होता है इस प्रश्नों का उत्तर मेरे आगे कहो प्रभु अष्टा वकर सोचते हैं कि लपट नहीं है मूड नहीं है मूड होता तो प्रणाम तक नहीं करता मूड होता तो जिज्ञासा नहीं करता विषय होता तो यज्ञ याज्ञ के बारे में पूछता होम हवन के बारे में पूछता स्वर्ग नरक के बारे में पूछता इधर क्या हो गया उधर क्या हो गया यहां वहां की खबरें पूछता लेकिन य आत्मा की खबर पूछता है ज्ञानी भी नहीं है ज्ञानी को असं भावना विपरीत भावना नहीं होती ज्ञानी को संदेह नहीं होता जैसे भगवान के नितांत प्यारे भक्त को
क्रोध नहीं होता तुकाराम संत कीर्तन करते थे एक दुर्जन उनके कीर्तन में इसीलिए जाया करता था कि कुछ बोले ऐसा कुछ बोले ताकि इनकी मैं निंदा कर सकूं अफवा उड़ा सकू कीर्तन में बोलना नहीं होता है बोलना तो सत्संग में ही होता है तुकाराम तो कीर्तन में मस्त रहते थे बार-बार आते आते उसने कोई मौका नहीं पाया एक [संगीत] बार कुछ मौका मिल गया उसके खेत में भैंस चले ग भैंस की खूब पिटाई की उसने तुकाराम को भी खूब गालिया दी दूसरे दिन सत्संग में नहीं आया कीर्तन में नहीं आया तुकाराम उठे और पड़ोसी उस
मित्र को जाकर प्रणाम किया कि कल भैंस आ गई आपके खेत में मुझे क्षमा कर देना आप मेरे से नाराज हो सकते लेकिन प्रभु से तो नाराज मत होइए चलिए कीर्तन में तो चलिए नाथ ऐसी क्षमा होती है महापुरुषों को भक्तों को साधकों को शम और दम भी ऐसा होता है कि बैठे हैं परमात्मा के ध्यान और चिंतन में घड़ी रख दी है एक घंटे तक बैठे रहेंगे तो जो संकल्प क्या उस संकल्प को तोड़ना मत जब संकल्प को तोड़कर आप उठ जाते हैं तो आपका तन और मन आपके ऊपर प्रभाव डाल देता है जितना
संकल्प किया उतना संकल्प तक बैठने का ही रखो चाहे मन लगो चाहे ना लगो चाहे ध्यान लगो चाहे ना लगो तो मन समझ जाएगा किसी मर्द के हाथ में आया हूं अब मुझे आत्मा में बैठना ही पड़ेगा जिस चीज को छोड़ दिया है उसको ब्राह्मण की नाई मत छोड़ना कि बाधारी बाधा लाडू पर थी उतरी ने दाल ऊपर जान दाल ऊप थी उतरी भात ऊपर जान भात ऊप थ उतर कचुंबर ऊपर जा अने हती नी त्या जा करीने अपने विषय वासना को पूछने के लिए यह कमजोरी मत अंदर भरने देना अष्टा होकर जवाब देते हैं
पूछते हैं कि ज्ञान कैसे होता है कैसे प्राप्त होता है मुक्ति कैसे होती है वैराग्य कैसे होता है तो अष्टावक्र कहते हैं मुक्ति मिसी तात विषन विश्वत ज विषयों को विष समान छोड़ते क्षमा आर्ज दया संतोष इस प्रकार की पियूष को तो पी बोला बाबा ने इनका अनुवाद करते हुए कहा जो मोक्ष है तू चाहता जो मोक्ष है तू चाहता विश् सम विषय तज तारे विश् सम विषय तज तारे आरज समा संतोष सम समा संतोष समदम प सुधा दिन रात रे प सुधा दिन रात रे संसार जलती आग है इस आग से जट भागकर संसार
जलती आग है इस आग से जल भाग कर अशांत शीतल देश में हो जा अजर हो जा अमर आ शांत शीतल देश में हो जा अजर हो जा अमर शांत शीतल देश में हो जा अजर हो जा अमरत शीतल देश में हो जा अजर हो जा जब जब संसार का चिंतन हो शत्रु का चिंतन हो किसी मित्र की याद सताती हो किसी धन की तड़फ सताती हो तो अपने चित्त को समझाओ शांत शीतल शश में ले आओ शत्रु हार भी गया तो अंत में क्या मिल भी गया तो क्या धन हो भी गया तो क्या
ते थी सुनेट छ आखिर कब तक यह सब कब तक इस प्रकार की तुम यदि विवेक वती बुद्धि का उपयोग करोगे तो शीतल देश में जल्दी से आ सकोगे नहीं तो जगत को रिझा रिझा जीवन पूरा हो गया धन को कमाते कमाते कई निर्धन रह गए यश को एकत्रित करते करते कई आप यश को उपलब्ध हो गए लाउस कहता था कि मुझे यश का भय नहीं क्योंकि मैं यश नहीं चाहता मुझे निर्धनता का भय नहीं क्योंकि मैं धन नहीं चाहता मुझे मौत का भय नहीं क्योंकि मैं जीवन नहीं चाहता जिसने असली जीवन पा लिया वो
जीवन क्या चाहेगा अडी मास के शरीर को जलाने की जिसे इच्छा नहीं मरने की जिसे ख्वाहिश नहीं मित्रों से जिसे कोई लगाव नहीं शत्रुओं से जिसे कोई नफरत नहीं ऐसा आदमी जल्दी से जल्दी शांत शीतल देश में पहुंच जाता है जब जब अशांति हो जब जब खिन्नता हो समझ लेना कि तुम अशांत देश में गए हो