मैं आपसे एक सवाल पूछता हूं। जवाब जुबान से नहीं दिल से देना है। अगर आज अभी इसी लम्हे आपकी आमदनी का वाहद जरिया बंद हो जाए। आपकी नौकरी खत्म हो जाए, दुकान बंद हो जाए या जो भी आपका जरिया आमदन है वो खत्म हो जाए तो आप कितने दिन गुजार सकते हो। आपको कोई तनख्वाह नहीं मिलनी, कोई पैसा कहीं से नहीं मिलना। तो आप मुझे बताएं कि आप अपनी बचत से कितने दिन गुजार सकते हैं। 7 दिन, 15 दिन, 30 दिन, एक साल। अक्सर लोगों का जवाब इससे भी छोटा होता है और यही वो जगह
है जहां असल मसले की जड़ छुपी है। मसला यह नहीं कि तुम कम पैसे कमाते हो। मसला यह है कि तुमने कभी पैसा बनाया नहीं। तुमने हमेशा पैसा वसूल किया है। इस बात को जरा ध्यान से समझना। किसी और ने एक सिस्टम बनाया और तुम उस सिस्टम के अंदर एक पुर्जा बन गए। काम करते रहे और फिर महीने के आखिर में तुम्हारे हाथ पर एक फिक्स रकम रख दी गई। तुम्हारी सैलरी 12 साल तुम स्कूल गए। 4 साल तुमने कॉलेज में पढ़ाई की। लेकिन किसी ने एक घंटा भी यह नहीं सिखाया कि पैसा बनता कैसे
है। 1936 में अमेरिका और यूरोप ग्रेट डिप्रेशन की जद [संगीत] में थे। इकॉनमी तबाह हो रही थी। बैंक्स बंद हो रहे थे। लोग लाइनों में खड़े होकर मुफ्त रोटी ले रहे थे। और हर तरफ मायूसी थी। एक ही बात थी कि अब कुछ नहीं हो सकता। और उसी जमाने में एक आदमी एफसी मैनेकर ने एक किताब लिखी और उसका नाम था $1000 वेज़ टू मेक $1000। $1000 कमाने के 1000 तरीके। उस वक्त ये किताब मजाक लगती थी। उस वक्त में जब लोगों के पास खाने के पैसे ना हो। लोग भूख से मर रहे हो और
वहां पर डॉलर कमाने के हजार तरीके बताना एक मजाक ही लगता है। मगर उस किताब ने एक ऐसी बात कही जो आज 90 साल के बाद भी अपनी जगह पर खड़ी है। पैसा कमाना किस्मत नहीं एक हुनर है और हर हुनर सीखा जा सकता है। अगर तुम्हें इस किताब की अहमियत का अंदाजा लगाना है तो यह बात जान लो कि वारेन बफर्ड ने यह किताब 7 साल की उम्र में अपने शहर की लाइब्रेरी से ली। वही वारेन बफर्ड जो आज दुनिया के चंद अमीर तरीन लोगों में शुमार होते हैं। और उन्होंने कहा था कि इस
किताब ने मेरी सोच की बुनियाद रखी। आज मैं तुम्हें इस किताब के सात असूल दूंगा। ना फलसफा ना सुनहरे ख्वाब बस सीधे सात ऐसे असूल जिन पर तुम आज से अमल कर सकते हो और सातवां उसूल आखिर में है क्योंकि वही सबसे भारी है बाकी छह असूल तुम्हें रास्ता दिखाएंगे और सातवां उसूल तय करेगा कि तुम उस रास्ते पर चलोगे या नहीं। असूल नंबर एक हर शिकायत के पीछे एक बिल छुपा होता है। जरा अपने आसपास कान लगाकर सुनो। लोग सारा दिन क्या बात करते हैं? शिकायत, बिजली का बिल बहुत आ गया। अच्छा कारीगर मिलता
ही नहीं। बच्चे का रिजल्ट खराब आ गया। सामान तो मंगवा लिया मगर पहुंचाने वाला कोई नहीं। आम आदमी यह शिकायतें सुनता है और खुद भी शिकायत में शामिल हो जाता है। मनेकर कहता है शिकायत सुनो। मगर शिकायत करने वाले को मत देखो। यह देखो कि उस तकलीफ को खत्म करने के लिए यह आदमी पैसे देने को तैयार है या नहीं। जहां जितनी शदीद और मुसलसल तकलीफ होती है, वहां उतना ही अच्छा कारोबार छुपा होता है। इत्तेफाकिया यानी कभी कबभार होने वाली तकलीफ एक प्रॉब्लम है। लेकिन रोजाना की तकलीफ कारोबार है। एक मिसाल देखो। हमारे शहरों
में हजारों करियाना स्टोर्स हैं। उनका सबसे बड़ा नुकसान क्या है? उधार, एक पुरानी कॉपी, टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई, आधे नाम याद ही नहीं। आधे सफे फट गए और साल के आखिर में दुकानदार को खुद पता नहीं होता कि उसका कितना पैसा फंसा हुआ है। अब सोचो अगर तुम्हें मोबाइल चलाना आता है सिर्फ मोबाइल। कोई बड़ी डिग्री नहीं तो तुम उन दुकानदारों के पास जाकर कह सकते हो चाचा आपकी उधार की कॉपी मैं मोबाइल पर डाल देता हूं। हर गायक का नाम, रकम, तारीख, पैसे। महीने के आखिर में आपको एक लिस्ट दे दूंगा कि किससे क्या लेना है।
और महीने के आपसे ढाई हजार लूंगा। 20 दुकानें, हर दुकान पर हफ्ते में आधा घंटा, सरमाया कितना लगा। तकरीबन ज़ीरो। कोई भी फ्री एप्लीकेशन डाउनलोड कर लो या एक सॉफ्टवेयर बनवा लो और वह मोबाइल जो पहले से तुम्हारी जेब में है। अब यहां पर आती है एक गलत सोच जो लोगों को काम नहीं करने देती और वो सोच है कि लोग खुद क्यों नहीं सीखते? लेकिन दुरुस्त सोच क्या है? लोग इसीलिए तो पैसे देते हैं कि उन्हें खुद ना सीखना पड़े। तुम्हें कोई नई इजात नहीं करनी। तुम्हें बस अपने कान खुले रखने हैं। असूल नंबर
दो पहले हां इकट्ठी करो फिर सरमाया लगाओ। यह असूल शुरू में उल्टा लगेगा। मगर इस पूरी किताब का सबसे महंगा सबक है। हम लोग कारोबार इस तरतीब से शुरू करते हैं। पहले पैसा लगाओ, फिर सामान खरीदो, फिर दुकान सजाओ, फिर बोर्ड लगवाओ और आखिर में जाकर पता चले कि ग्राहक तो है ही नहीं। अब गाय का इंतजार करो। तब तक बचत खत्म, उधार सर पर और हौसला टूट चुका होता है। मैनेकर कहता है तरतीब उल्टी करो। पहले ग्राहक फिर सामान। एक मिसाल लो। फर्ज करो तुम्हें दुकानों के बोर्ड्स और फ्लेक्स प्रिंटिंग का काम शुरू करना
है। अब आम आदमी क्या करेगा? 4 लाख की मशीन के पीछे भागेगा। जगह किराए पर लेगा। बिजली का कनेक्शन लेगा। और जहीन आदमी क्या करता है? वह पहले मोबाइल में 10 नमूने बनाता है। फिर बाजार में निकलता है। 15 दुकानदारों से मिलता है। जिनका बोर्ड पुराना हो चुका है। उन्हें दिखाता है। आपका बोर्ड नया बना दूं। इतने में तीन लोग हां कर देते हैं। आधी रकम एडवांस लेता है। अब वह क्या करता है? उसी शहर में जो पुराना प्रिंटिंग प्रेस पहले से मौजूद है। वहीं से काम करवा लेता है। और अपना मुनाफा रख लेता है।
मशीन बाद में आएगी तब जब इतने ऑर्डर्स होंगे कि मशीन अपनी कीमत खुद निकाल ले। गलत तरीका पहले बनाओ फिर बेचने की कोशिश करो। दुरुस्त तरीका पहले बेचो फिर बनाओ। याद रखो खाली जेब से कारोबार शुरू नहीं होता। कारोबार ग्राहक की हां से शुरू होता है और यह कोई नया ख्याल नहीं है। आज दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां पहले आर्डर लेती हैं। बाद में प्रोडक्शन शुरू करती हैं। मनेकर ने यह बात 1936 में कह दी थी। असूल नंबर तीन वक्त मत बेचो। नतीजा बेचो। जब तुम नौकरी करते हो तो हकीकत में तुम क्या बेच रहे हो?
अपने दिन के 8 घंटे और मसला यह है कि [संगीत] दिन में 24 घंटे ही होते हैं। इसका मतलब है कि तुम्हारी कमाई पर एक लिमिट लगी हुई है। तुम चाहे जितनी भी मेहनत कर लो उस लिमिट से ऊपर नहीं जा सकते। आठ नहीं तो 10 घंटे काम कर लोगे और ज्यादा भी करो तो 12 घंटे कर लोगे। मगर फिर भी लिमिट तो है ना। मगर जब तुम अपनी महारत बेचते हो तो तुम घंटों की कैद से आजाद हो जाते हो। फर्क समझो एक उस्ताद स्कूल में छह पीरियड्स पढ़ाता है और महीने की फिक्स सैलरी।
छह पीरियड उसकी ज्यादा से ज्यादा हद है। और दूसरा उस्ताद वही मजमून एक बार अच्छी तरह रिकॉर्ड कर लेता है। पूरा कोर्स बना लेता है और फिर उसे बेचता है। वही एक रिकॉर्डिंग 100 तालिब्मों तक पहुंचती है और फिर 200 तक 500 तक उसने मेहनत एक बार की। मगर वह मेहनत अब बार-बार बिक रही है। या मोबाइल ठीक करने वाले को देखो। एक वो है जो सुबह से रात तक मोबाइल खोलता रहता है और दूसरा वो है जो पांच लड़कों को सिखाता है और फीस भी लेता है और वही पांच लड़के बाद में उसके लिए
काम भी करते हैं। पहला मजदूर है और दूसरा उस्ताद दोनों का हुनर एक है। लेकिन सोच मुख्तलिफ है। अब तुम कहोगे कि भाई मेरे पास तो कोई महारत नहीं। जरा रुको। क्या तुम्हें एक्सेल आता है? क्या तुम डिजाइन बना लेते हो? क्या तुम वीडियो एडिट कर लेते हो? क्या तुम अच्छी अंग्रेजी लिख लेते हो? क्या तुम्हें ईआई टूल्स को इस्तेमाल करना आता है? क्या तुम किसी मजमून को आसान अल्फाज में समझा सकते हो? जो चीज तुम्हें मामूली लगती है वो किसी और के लिए मुश्किल है। और जो किसी और के लिए मुश्किल है उसकी कीमत
होती है। अपनी महारत को एक शक्ल दो। एक नाम दो और फिर उसे बेचना सीखो। असूल नंबर चार। नया ग्राहक महंगा है, पुराना ग्राहक सोना है। यह असूल सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया जाता है। और यही सबसे ज्यादा पैसा बनाता है। मैनेकर लिखता है, एक नया ग्राहक ढूंढने में जितनी मेहनत लगती है, उससे कहीं कम मेहनत में तुम उसी पुराने ग्राहक को दोबारा बेच सकते हो। सोचो नया ग्राहक तुम्हें जानता नहीं। तुम पर भरोसा नहीं करता। उसे कायल करना पड़ता है। पुराने ग्राहक ने तुम्हें पहले ही आजमा लिया है। उसे सिर्फ याद दिलाना है। मगर हम
लोग क्या करते हैं? सौदा किया, पैसे लिए और ग्राहक को भूल गए। और अगले दिन फिर नए कस्टमर की तलाश में धक्के खा रहे होते हैं। एक मिसाल देखो। एक आदमी खालिस शहद और देसी घी बेचता है। अब आम आदमी क्या करेगा? जिसने खरीद लिया, खरीद लिया बस। लेकिन जहीन आदमी क्या करता है? वो एक रजिस्टर रखता है। हर खरीदार का नंबर और यह कि उसने क्या लिया था। फिर सर्दियों से पहले वो हर एक को एक पैगाम भेजता है। भाई नया शहद आ गया है। सर्दी शुरू होने वाली है। रमजान से पहले फिर पैगाम।
देसी घी तैयार है। उसे नए कस्टमर को ढूंढने की जरूरत ही नहीं पड़ती। उसके 100 पुराने कस्टमर एक साल में तीन बार खरीदते हैं और हर खुश कस्टमर अपने साथ दो नए लेकर आता है। तो इस असूल का नाम है नए कस्टमर को हासिल करने से ज्यादा अहम पुराने कस्टमर को रोकना है। अपने साथ जोड़कर रखना है। आज दुनिया के हर बड़े कारोबार की रीड की हड्डी यही एक असूल है। पांचवा असूल छोटा शुरू करो मगर नक्शा बड़ा रखो। हमारी सबसे बड़ी रुकावट पैसा नहीं अना है। हम सोचते हैं जब तक बड़ी दुकान ना हो,
बड़ा बोर्ड ना हो, दो मुलाजिम ना हो तब तक शुरू करने का क्या फायदा? लोग क्या कहेंगे? और इसी लोग क्या कहेंगे? [गला साफ़ करने की आवाज़] में पूरी जिंदगी निकल जाती है। मैनेकर का फार्मूला सीधा है। शुरुआत छोटी रखो मगर नक्शा बड़ा रखो। एक आदमी पोल्ट्री फार्म खोलना चाहता है। अब वो 5 लाख का इंतजार कर रहा है। 5 साल से इंतजार कर रहा है। अभी तक इंतजार कर रहा है। और दूसरा आदमी अपने घर की छत पर 50 मुर्गियां रख लेता है। 6 महीने में उसे पता चल जाता है कि खुराक कितनी लगती
है। बीमारी कब आती है? अंडे कहां बिकते हैं? मुनाफा कहां से निकलता है? और अगले साल वो 200 मुर्गियां कर लेता है। और तीसरे साल उसका अपना फार्म है। फर्क पैसे का नहीं था। फर्क यह था कि एक ने सीखना शुरू कर दिया और दूसरा सोचता रह गया। और याद रखो छोटा काम दरअसल सीखने की फीस है। यह फीस तुम्हें किसी ना किसी मोड़ पर देनी ही पड़ेगी। सवाल सिर्फ यह है कि तुम यह फीस 50 मुर्गियों से दोगे या 5 लाख से? और अगर कोई तुम्हारे छोटे काम का मजाक उड़ाए तो बहस मत करो।
बस मुस्कुरा दो क्योंकि उसे सिर्फ तुम्हारी आज की हालत नजर आ रही है और तुम्हें अपने मुस्तकबिल का नक्शा नजर आ रहा है। असूल नंबर छह कीमत पर मत लड़ो। वैल्यू पर जीतो। जो लोग सिर्फ पैसे के पीछे भागते हैं। पैसा उनसे दूर भागता है और जो लोग वैल्यू क्रिएट करने पर तवज्जो देते हैं, पैसा खुद उनके पीछे आता है। सुनने में यह थोड़ी सी फलसफियाना बात लगती है। मगर इसका मतलब बिल्कुल प्रैक्टिकल है। लोग उसे पैसा देते हैं जो उनकी जिंदगी आसान बनाता है। दो दर्ज़ियों की मिसाल ले लो। पहला दर्जी कपड़े सीकर थमा
देता है। पैसे लेता है और काम खत्म। दूसरा दर्जी कपड़े सीकर देता है और साथ में एक छोटी सी बात कह देता है। भाई यह कपड़ा पहली बार ठंडे पानी में धलवाइएगा वरना सुड़ जाएगा और कस्टमर का नाप अपने मोबाइल में सेव कर लेता है ताकि अगली बार उसे दोबारा आने की जरूरत ना पड़े। क्या उसने इस चीज के इजाफी पैसे मांगे? नहीं। मगर अगली बार तुम किसके पास जाओगे? जब तुम्हारा दोस्त कहेगा कोई अच्छा सा दर्जी बताओ तो तुम किसका नाम लोगे? यही वैल्यू है और यह सिर्फ कारोबार पर लागू नहीं होती, नौकरी पर
भी होती है। जो मुलाजिम बिल्कुल उतना ही काम करता है जितने के उसे पैसे मिलते हैं, वह सारी उम्र एवरेज रहता है। और जो मुलाजिम मसले के साथ हल भी लेकर आता है। वह तरक्की पाता है। जिस दिन तुम एक सहूलत से बढ़कर एक भरोसा बन जाते हो, उसी दिन तुम्हें [संगीत] अपनी कीमत की सफाई नहीं देनी पड़ती। असूल नंबर सात आइडिया नहीं मुस्तकिल मिजाजी अमीर बनाती है। अब ये आखिरी असूल है और ये सब पर भारी है। इस किताब में खानदान का जिक्र है। नीड खानदान। डिप्रेशन के दिनों में इनका सब कुछ खत्म हो
गया था। बाप की नौकरी गई। जमा पूंजी खत्म और दो बच्चे कॉलेज की उम्र को पहुंच चुके थे। उन्होंने बहुत सोच विचार के बाद एक कारोबार का मंसूबा बनाया। अमीर लोगों के लिए एक खास मशरूब तैयार करना। खूब सोचा, खूब मंसूबा बनाया और वह मंसूबा बुरी तरह नाकाम हो गया। फिर एक दिन उनके एक जानने वाले किसान ने उन्हें टमाटरों का एक बड़ा डब्बा बेच दिया। इतने टमाटर कि घर में इस्तेमाल ना हो सके। मां ने सोचा जाया करने से बेहतर है कि जूस बनाकर पड़ोसियों को दे दूं। पड़ोसियों को वो जूस इतना पसंद आया
कि लोग खुद मांगने लगे। अब यहां पर गौर करो। जिस आईडिया पर उन्होंने महीनों सोचा वो नाकाम हो गया और जो आईडिया हादसाती तौर पर हाथ आया वो चल गया। मगर असल कमाल यह नहीं था। असल कमाल यह था कि जब नया रास्ता खुला तो उन्होंने पुराने मंसूबे को मुकम्मल तौर पर छोड़ दिया और अपनी सारी तवानाई सिर्फ एक चीज पर लगा दी। और फिर भी रास्ता आसान नहीं हुआ। उनका मयार खराब हुआ तो उन्होंने एक अच्छी क्वालिटी वाले काशदकार से शराकत कर ली। घर के बर्चीखाने से काम ना चला तो उन्होंने एक छोटा सा
कारखाना लगा लिया। सबको बेचने की कोशिश नाकाम हुई तो उन्होंने देखा कि कौन खरीद रहा है और सिर्फ उन्हीं पर फोकस किया। कदम बे कदम नाकामी दर नाकामी। [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। और वो खानदान जो कभी फाकों के करीब था आहिस्ता-आहिस्ता खुशहाल हो गया। यही इस पूरी किताब का निचोड़ है। दुनिया में आइडियाज की कभी कमी नहीं रही। आज तो तुम्हारे मोबाइल में रोजाना 50 आईडियाज आते हैं। तुम उन्हें महफूज़ करते हो, लाइक करते हो और आगे बढ़ जाते हो। मगर महीने के आखिर में जेब वहीं की वही।
क्यों? क्योंकि आईडिया जमा करना आसान है। लेकिन एक आईडिया पर टिक जाना मुश्किल है। अमीर लोग इसलिए अमीर नहीं होते कि उनके पास कोई गैर मामूली ख्याल था। वो इसलिए अमीर होते हैं कि वो एक आम से ख्याल पर इतनी देर तक टिके रहे। उन्होंने इतनी मेहनत की वो एक आम ख्याल गैर मामूली बन गया। अब आखिरी बात और यह जरा थोड़ी कड़वी है। जब मनेकर ने यह किताब लिखी थी। तब ना इंटरनेट था, ना मोबाइल, ना सोशल मीडिया, ना एआई। लोगों के पास मालूमात तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं था। उसने फिर भी कहा
कि हजार तरीके मौजूद हैं। और आज तुम्हारे हाथ में एक ऐसा आला है जिससे तुम दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर किसी भी आदमी को अपनी सर्विज बेच सकते हो। मालूमात का हसूल फ्री है, टूल्स फ्री हैं और रास्ता खुला है। तो अगर आज भी तुम्हारी जेब खाली है तो वजह हालात नहीं है। वजह यह है कि हम बेहतरीन वक्त का इंतजार कर रहे हैं और बेहतरीन वक्त कभी नहीं आता। जो आदमी मुकम्मल तैयारी का इंतजार करता है, वह दरअसल नाकामी के खौफ को तैयारी का नाम दे रहा होता है। तुम्हारे पास अब सात
असूल हैं। एक उठाओ सिर्फ एक और आज से शुरू कर दो। एक असूल जिस पर अमल हो जाए उन सात से ज्यादा कीमती है जो सिर्फ सुने गए हो। और अगर तुमने आज फैसला कर लिया है तो नीचे कमेंट्स में लिखो। मैं शुरू करता हूं। और जिंदगी में हर रोज कुछ नया सीखो, नया सोचो, नया करो, लर्न करो। ओम