भारत का एकमात्र ऐसा देवी मंदिर जहां माता को साल में तीन दिन मासिक धर्म आता है और इस दौरान आसपास की नदी और तालाब का पानी भी खून की तरह लाल हो जाता है क्या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है या फिर यह देवी मां का चमत्कार आखिर क्यों इस मंदिर में माता की मूर्ति की जगह योनि की पूजा की जाती है क्या है इसके पीछे का रहस्य और इस जगह पर ऐसा क्या खास है कि पूरे देश के तांत्रिकों का यहां मेला लगता है और इसे वशीकरण काला जादू और तंत्र मंत्र करने वाले तांत्रिकों
का गढ़ माना जाता है सबसे चौकाने वाली बात क्या सच में इस मंदिर में कभी मानव बलि दी जाती थी क्या यह बस एक कहानी है या इतिहास की सच्चाई आखिर ऐसी कौन सी वजह है कि कामाख्या मंदिर के कपाट खुलने से पहले हर दिन देवी के लिए एक पशु की बलि दी जाती है इस प्राचीन परंपरा का क्या रहस्य है यह शक्तिपीठ और भी खास तब बन जाती है जब देवी 10 महाविद्याओं के साथ विराजमान होती है आखिर यह 10 महाविद्याओं कौन सी हैं और उनकी ताकत क्या है कामाख्या देवी के ऐसे कई अनसुलझे
रहस्य और इतिहास आज हम इस डॉक्यूमेंट्री में उजागर करने वाले हैं तो हमारे साथ बने रहिए क्योंकि आज आप जानेंगे कुछ ऐसा जो शायद आपने पहले कभी नहीं सुना होगा [संगीत] [संगीत] भारत के असम राज्य के गुवाहाटी में स्थित कामाख्या मंदिर एक ऐसा स्थल है जहां शक्ति उपासना अपने सबसे रहस्यमय और अनूठे रूप में प्रकट होती है यह मंदिर 51 शक्ति पीठों में एक प्रमुख स्थान रखता है जहां देवी कामाख्या की पूजा योनि रूप में की जाती है जो सृजन और मातृत्व का प्रतीक है नमस्ते दोस्तों आज हम आपको ले चलेंगे एक ऐसे रहस्यमय स्थान
पर जहां भक्ति तंत्र मंत्र का मिलन होता है क्या है इस मंदिर के निर्माण का इतिहास ऐसा क्या हुआ था कि मां कामाख्या ने असम के राजवंश को शाप दे दिया जिससे सदियों बाद भी उनका मंदिर में प्रवेश निषिद्ध है और आखिर क्यों मां ने अपने सबसे प्रिय पुजारी का ही सिर काट दिया इन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूंढने के लिए जुड़े रहिए हमारे साथ क्योंकि आज का यह सफर आपको भक्ति श्रद्धा और तंत्र की एक नई दुनिया में ले जाएगा तो चलिए मां कामाख्या के इस अद्भुत रहस्य को जाने जिसे सदियों से गुप्त रखा
गया [संगीत] है कामाख्या मंदिर के मूल निर्माण का उल्लेख इतिहास में नहीं मिलता और कोई ऐसा रिकॉर्ड भी नहीं है जिससे पता चल सके कि मूल कामाख्या मंदिर कब बना था लेकिन मंदिर और देवी को लेकर कई किवदंती यां और लोक कथाएं मौजूद हैं प्राचीन ग्रंथ कालिका पुराण के अनुसार भगवान शिव का विवाह माता सती से हुआ था परंतु माता सती के पिता राजा दक्ष भगवान शिव को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे जिससे वह इस विवाह से बेहद नाराज थे राजा दक्ष जिन्हें हिमालय का राजा भी कहा जाता था उसने एक यज्ञ का आयोजन किया
जिसमें सृष्टि के सभी देवी देवता को आमंत्रित किया था परंतु उसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया और ना ही अपनी पुत्री माता सती को बुलाया माता सती अपने पति की अनुमति के बिना ही अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई वहां उन्होंने देखा कि उनके पिता भगवान शिव का अपमान कर रहे हैं यह अपमान माता सती से सहन नहीं हुआ और यज्ञ के हवन कुंड में ही कूदकर उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी जब भगवान शिव को इसकी जानकारी मिली तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए और माता सती की देह को लेकर तांडव
नृत्य करने लगे इससे पूरी सृष्टि संकट में आ गई और सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए श्री श्री विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 अंगों को अलग कर दिया जो धरती के विभिन्न स्थानों पर गिर गए जिस स्थान पर माता सती की योनि गिरी वहीं माता कामाख्या मंदिर का निर्माण हुआ इसके बाद भगवान शिव समाधि में चले गए इस बीच तारकासुर नामक दैत्य ने घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से असीम शक्तियां प्राप्त कर ली और तीनों लोकों में आतंक मचाने लगे देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी ने उन्हें
बताया कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही तारकासुर का अंत कर सकता है महादेव उमानंद पर्वत पर समाधि में लीन थे और उनकी समाधि भंग करने का कार्य कामदेव को सौंपा गया कामदेव ने शिवजी पर बाण चलाया जिससे उनकी समाधि टूट गई क्रोधित शिव ने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस कर दिया कामदेव की पत्नी रति और अन्य देवी देवताओं ने शिव से कामदेव को पुनः जीवन दान देने की प्रार्थना की शिव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कामदेव को जीवन दान तो दे दिया लेकिन उनका सुंदर रूप वापस नहीं आया तब कामदेव और
रति ने प्रार्थना की कि हे महादेव हमें ऐसा जीवन ना दे जिसमें सौंदर्य ना हो इस पर शिव ने उन्हें शर्त रखी कि नीलांचल पर्वत पर सती के जनन अंग पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करना होगा कामदेव ने शिव की शर्त स्वीकार की और नीलांचल पर्वत पर कामाख्या मंदिर का निर्माण प्रारंभ किया इस कार्य में उन्होंने भगवान विश्वकर्मा की सहायता ली जिन्होंने मंदिर की भव्य संरचना बनाई कामदेव ने इस मंदिर में भैरव और 64 योगिनी की मूर्तियां भी स्थापित की उनकी तपस्या और भक्ति का फल स्वरूप उन्हें अपना पुराना सुंदर रूप भी पुनः प्राप्त
हो गया मंदिर को मूलतः आनंद अख्या नाम दिया गया इसके साथ ही जहां शिवजी समाधि में लीन हुए थे उस स्थान पर उमानंद भैरव मंदिर की स्थापना की गई ऐसा कहा जाता है कि जो भी भक्त कामाख्या मंदिर के दर्शन करने आता है उसे उमानंद भैरव के दर्शन भी अनिवार्य रूप से करने होते हैं लेकिन आगे बढ़ने से पहले इस वीडियो को एक लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिए क्योंकि यह आपके लिए एक सेकंड का काम है लेकिन इससे हमारी काफी बड़ी मदद होती है एक अन्य कथा के अनुसार एक समय ऐसा था
जब मां कामाख्या के मंदिर के ऊपर असुर राजा नरकासुर का राज था शुरू में नरकासुर मां कामाख्या का एक बड़ा भक्त था परंतु समय के साथ शक्ति की लालसा में उसने मां कामाख्या से विवाह का प्रस्ताव रख दिया मां ने उसे मना नहीं किया बल्कि एक शर्त रखी उन्होंने कहा अगर तुम मुझसे विवाह करना चाहते हो तो नीलांचल पर्वत की चोटी तक एक सीढ़ी का निर्माण एक ही रात में कर दो और याद रखना जैसे ही सुबह मुर्गा बांग देगा तुम्हारा काम पूरा हो जाना चाहिए नर का सुर ने यह चुनौती स्वीकार कर ली उसकी
विशाल सेना ने रात में सीढ़ी बनाना शुरू किया और वह काम पूरा करने के बहुत करीब था लेकिन मां को आभास हो गया कि वह अपना लक्ष्य पूरा करने वाला है इसलिए उन्होंने अपनी शक्ति से मुर्गे को जल्दी बांक देने के लिए प्रेरित किया मुर्गे की आवाज सुनते ही नरकासुर को लगा कि वह असफल हो गया और वह अधूरी सीढ़ी छोड़कर अपने महल लौट गया थोड़ी ही देर बाद उसे एहसास हुआ कि उसे मां ने चतुराई से धोखा दिया है क्रोधित नरकासुर ने मां की भक्ति का मार्ग बंद करने की ठान ली और इस सीढ़ी
को वहीं छोड़ दिया आज भी कामाख्या जाने वाले भक्त उस अधूरी सीढ़ी को देख सकते हैं जिसे मैकलोच पाठ कहा जाता है जहां मुर्गे ने बांग दी थी और नरकासुर ने उसे मार डाला उस स्थान को कुकुरा काटा के नाम से जाना जाता है कुछ समय बाद महर्षि वशिष्ठ मां कामाख्या के दर्शन के लिए आए लेकिन नरकासुर की सेना ने उन्हें रोक दिया महर्षि ने नरकासुर से कहा तुम्हें अंदाजा नहीं है कि तुम किस सिद्ध के सामने खड़े हो लेकिन नरकासुर ने मां कामाख्या की भक्ति को बाधित करने का अपना निर्णय नहीं बदला तब महर्षि
वशिष्ठ ने नरकासुर को श्राप दिया कि उसका वध भगवान विष्णु के अवतार द्वारा होगा और मां कामाख्या हमेशा के लिए इस क्षेत्र को छोड़कर चली जाएंगी नरकासुर ने जब भागकर मां कामाख्या के मंदिर में देखा तो मां की योनि पीठ अदृश्य हो चुकी थी महर्षि वशिष्ठ के श्राप के अनुसार मां इस क्षेत्र को सदा के लिए छोड़ गई थी नरकासुर के वध के बाद मां को वापस बुलाने के लिए महर्षि वशिष्ठ को फिर से बुलाया गया महर्षि ने कहा अब मां की कृपा प्राप्त करने के लिए यहां केवल वामाचारी पद्धति अपनाई जाएगी इसी श्राप के
कारण कामा मंदिर में आज वामाचारी पद्धति और बलि प्रथा का प्रचलन है जिससे मां कामाख्या की उपासना की जाती है कुछ विद्वानों का मानना है कि मूल कामाख्या मंदिर का निर्माण चौथी पांचवीं सदी में हुआ था जबकि कुछ का मत है कि यह सातवीं या आठवीं सदी का है लेकिन मंदिर का मौजूदा इतिहास हमें मुख्य रूप से कोच राजवंश के समय से ही मिलता है कोच राजाओं ने 1515 से 1635 तक असम पर शासन किया और राजा विश्व सिंह पहले कोच राजा थे वह हिंदू धर्म के संरक्षक और शिव तथा दुर्गा के उपासक थे उन्होंने
कामाख्या की पूजा की परंपरा को पुनः जीवित किया और इसके लिए बनारस से ब्राह्मणों को बुलवाया 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में कामरूप के राजाओं के बीच कई युद्ध हुए जिनमें राजा विश्व सिंह विजय हुए और संपूर्ण कामरूप के एक छत्र राजा बने युद्ध के दौरान बिछड़ चुके अपने भाई और साथियों की खोज में वह नीला चल पर्वत पहुंचे थककर एक वटवृक्ष के नीचे विश्राम करते समय एक वृद्धा ने उन्हें बताया कि वह टीला एक जागृत स्थान है इस पर राजा विश्व सिंह ने मन्नत मानी कि यदि उनके बिछड़े हुए भाई और साथी मिल जाते हैं
तो वह यहां एक स्वर्ण मंदिर का निर्माण करेंगे की मन्नत पूरी हुई और उन्होंने मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ किया खुदाई के दौरान कामदेव के मूल कामाख्या पीठ का निचला भाग प्रकट हुआ और उसी के ऊपर मंदिर का निर्माण हुआ स्वर्ण मंदिर के स्थान पर राजा विश्व सिंह ने हर ईंट में एक रत्ती सोना रखवाया कहा जाता है कि राजा विश्व सिंह ने सन 1533 में कामाख्या मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था माना जाता है कि की राजा विश्व सिंह के मृत्यु के पश्चात बंगाल के मुगल सूबेदार सुल्तान सुलेमान करानी के एक मुस्लिम जनरल काला पहाड़
ने कई मंदिरों के साथ-साथ कामाख्या मंदिर भी तुड़वा दिया था उसके बाद सन 1565 में कोच राजा नर नारायण और उनके भाई चिल्ला राय ने मिलकर इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया नर नारायण ने अपनी प्रजा को देवी की भक्ति और म मर निर्माण के लिए प्रेरित किया इस पुनर्निर्माण कार्य में मंदिर के पौराणिक और धार्मिक महत्व को बनाए रखने का प्रयास किया गया इस निर्माण में नीला चल शैली का वास्तु शिल्प अपनाया गया जो आज भी यहां देखा जा सकता है 17वीं शताब्दी में अहोम राजा सुति फा और गदाधर सिंहा जैसे कई अहोम राजाओं ने
इस मंदिर के संरक्षण और सौंदर करण में अपना योगदान दिया अहो राजाओं ने मंदिर के आसपास के क्षेत्रों को भी विकसित किया और मंदिर के लिए कई धर्मार्थ कार्य किए सन [संगीत] [संगीत] विशेष ध्यान दिया और इसे संरक्षित करने का कार्य किया इस प्रकार कामाख्या मंदिर का इतिहास असंख्य पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं से भरा हुआ है और यह स्थान शक्ति तंत्र और भक्ति का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है दोस्तों आपसे एक विनम्र अनुरोध है अगर आपको हमारी मेहनत अच्छी लगी हो तो कृपया वीडियो को लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिए आपका समर्थन ही
हमारी प्रेरणा है दोस्तों अगले चैप्टर में हम जानेंगे कि अंबू वाची मेले के दौरान माता के पीरियड्स के समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल क्यों हो जाता है क्या यह एक चमत्कार है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण [संगीत] है अंबु वाची मेला विश्व के सभी तांत्रिकों मांत्र कों और सिद्ध पुरुषों के लिए यह पर्व हर वर्ष एक वरदान के समान आता है इस अद्वितीय पर्व में देवी भगवती का रजस्वला उत्सव मनाया जाता है पौराणिक शास्त्रों के अनुसार सतयुग में यह पर्व 16 वर्ष द्वापर में 12 वर्ष त्रेता युग में सात वर्ष में एक बार
और कलयुग में प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है अंबु वाची मेला का नाम दो शब्दों अंबू और बांची से बना है जहां अंबू का अर्थ है पानी और बांची का अर्थ है उत् फुलन या खिलना अंबू वाची मेला कामाख्या मंदिर का सबसे महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट पर्व है जो हर साल जून के महीने में मनाया जाता है यह मेला देवी के मासिक धर्म का प्रतीक है जिसे देवी की सृजनात्मक और प्रजनन शक्ति के रूप में माना जाता है धार्मिक मान्यता के अनुसार इस समय देवी रजस्वला होती हैं और मंदिर के गर्भगृह को तीन दिनों के लिए बंद
कर दिया जाता है इस अवधि में मंदिर में किसी भी प्रकार की पूजा नहीं होती और मंदिर के कपाट बंद रहते हैं इस अवधि के दौरान मंदिर के भीतर जमीन पर एक सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है और मंदिर के कपाट भक्तों के लिए बंद कर दिए जाते हैं तीन दिन बाद जब कपाट फिर से खुलते हैं तो कहा जाता है कि यह कपड़ा पूरी तरह लाल और गीला हो चुका होता है इस कपड़े को अंबुबाची वस्त्र या रक्त वस्त्र कहा जाता है और इसके छोटे-छोटे टुकड़े भक्तों को प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं
लोग इसे अपने घर के पूजा स्थल पर आदर पूर्वक रखते हैं लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पूरे साल भक्त यहां आते रहते हैं परंतु इन तीन दिनों में उनकी संख्या हजारों से बढ़कर लाखों तक क्यों पहुंच जाती है वैज्ञानिकों के अनुसार असम के पानी में लौह तत्व की मात्रा अधिक होती है जिससे पानी का रंग हल्का लाल दिखाए देता है और यही लौह तत्व ब्रह्मपुत्र नदी के पानी में भी पाए जाते हैं दूसरा कारण नीलांचल पर्वत की संरचना को माना जाता है जो असल में सिनेबार यानी मरक्यूरी सल्फाइड से बना हुआ
है सिनेबार का रंग गहरा लाल होता है और मानसून के दौरान जब ब्रह्मपुत्र का जल स्तर बढ़ता है तो नदी के तल में स्थित इस सिनेबार के कण ऊपर आ जाते हैं जिससे पानी का रंग लाल हो जाता है लेकिन एक प्रश्न यह उठता है कि यदि यह भूगर्भीय कारणों से होता है तो फिर यह घटना केवल अंबु वाची के इन तीन दिनों में ही क्यों घटित होती है असम में मानसून का आगमन अंबु वाची से पहले हो चुका होता है लेकिन ब्रह्मपुत्र का जल लाल केवल इन्हीं तिथियों पर क्यों होता है क्या यह देवी
का चमत्कार है या फिर विज्ञान के लिए आज भी एक पहेली है अंबु वाची के तीन दिनों के दौरान असम के कामाख्या मंदिर में तंत्र साधना का विशेष महत्व होता है इन दिनों मंदिर में तंत्र मंत्र काला जादू और वशीकरण से मुक्ति जैसी प्रक्रियाएं बड़ी मात्रा में की जाती है यहां देवी को प्रसन्न करने के लिए मुख्य रूप से नर बकरों भैंसों और कबूतरों की बलि दी जाती है मादा पशुओं को बलि से दूर रखा गया है जो यहां की एक विशिष्ट परंपरा है इस अनुष्ठान के कारण मंदिर परिसर में हर ओर लाल रक्त का
दृश्य दिखाई देता है और यहां का एक और अद्भुत रहस्य मंदिर के गर्भगृह में स्थित योनि आकार के पत्थर से हर समय पानी का बहाव होता रहता है आज तक इस जल स्रोत का कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं मिला है लेकिन इसे देवी की कृपा का प्रतीक माना जाता है भक्त इस पानी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और इसे पवित्र मानते हैं विश्व विख्यात कामाख्या मंदिर जो विश्व का एकमात्र महासिद्ध पीठ माना जाता है इसकी महिमा अनंत और अद्वितीय है देवी ग्रंथ कुला वर्ण तंत्र और महा भगवती पुराण में वर्णित एक विशेष मान्यता
बताती है कि कलयुग में यदि कोई भक्त यहां स्वयंभू सिद्ध पीठ पर गंगा नदी का पवित्र जल लाकर चढ़ाता है और फिर उसमें से कुछ जल महानदी ब्रह्मपुत्र में प्रवाहित करता है तो उसे वाजपेयी मेले के चौथे दिन जब देवी का रजस्वला समाप्त होता है मंदिर के कपाट फिर से खुल जाते हैं उस समय भक्तों का सैलाब उमड़ता है देवी का अभिषेक उनका श्रृंगार और विशेष पूजा अर्चना की जाती है इसके बाद भक्तों को देवी का दर्शन करने का अवसर मिलता है और प्रसाद स्वरूप एक विशेष वस्त्र प्रदान किया जाता है जिसे अंबुबाची वस्त्र कहा
जाता है दोस्तों आपको क्या लगता है कि अंबुबाची मेले के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल क्यों हो जाता है इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है या चमत्कार अपना तर्क कमेंट में जरूर लिखें ताकि दूसरे लोग भी आपकी राय जान सके अगले दो चैप्टर में हम जानेंगे कि माता ने अपने पुजारी का सिर क्यों काट दिया था और राजा को अपने वंश के संहार का श्रा क्यों दिया साथ ही हम कामाख्या में तांत्रिक अनुष्ठानों पशु बलि और मानव बलि के ऐतिहासिक पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा [संगीत] करेंगे कामाख्या मंदिर की पौराणिक में कोच राजवंश
और देवी का दिया हुआ श्राप एक महत्त्वपूर्ण और रहस्यमय स्थान रखता है यह कथा हमें सदियों पहले ले जाती है जब कोच राजवंश का शासन असम के अधिकांश हिस्सों में फैला हुआ था और मंदिर का मुख्य संरक्षक यही राजवंश था कोच वंश के राजा नर नारायण देवी के परम भक्त थे और उनके मंदिर में उनकी आस्था अटूट थी राजा का विश्वास था कि देवी उनकी हर प्रार्थना सुनती है और उन्हें शक्ति प्रदान करती हैं राजा नर नारायण प्रतिदिन कामाख्या मंदिर में देवी के दर्शन करने के लिए जाते थे उस समय मंदिर के मुख्य पुजारी थे
केंदु कलई जो देवी के परम भक्त माने जाते थे कहा जाता है कि केंदु कलई की भक्ति इतनी गहरी थी कि देवी स्वयं उनके सामने प्रकट होती थी और उनकी प्रार्थना को सुनती थी केंदु कलई देवी के प्रति अपनी आस्था और पूजा में इतने लीन रहते कि उन्हें देवी की अदृश्य उपस्थिति का एहसास होता था एक दिन एक दुखी मां अपनी मृत बच्ची को लेकर केंदु कल के पास आई वह आशा में डूबी हुई थी कि शायद देवी की कृपा से उसकी बच्ची को जीवन मिल सके शुरुआत में केंदु कलई ने इसे असंभव बताया क्योंकि
मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित करना किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं थी लेकिन उस मां की आस्था इतनी गहरी थी कि उन्होंने केंदु कलई से मां से एक बार प्रार्थना करने का अनुरोध किया केंदु कलई ने उस मां की विश्वास और श्रद्धा को देखकर देवी से प्रार्थना करने का निश्चय किया उन्होंने उस बच्ची को अपने हाथों में उठाया और मां कामाख्या की पवित्र शिला पर रख दिया उन्होंने गहरे भाव से मां से प्रार्थना की हे मां अगर आपको उचित लगे तो कृपा करके इस बच्ची को जीवन दान दें उनकी प्रार्थना का चमत्कार हुआ मां
कामाख्या ने उस बच्ची को जीवन दान दिया और वह पुनः जीवित हो उठी यह चमत्कार पूरे नगर में फैल गया और आखिरकार राजा नर नारायण तक भी पहुंच गया जब राजा ने सुना कि केंदु कलई मां के इतने बड़े भक्त हैं कि उनकी प्रार्थना से मृत भी जीवित हो उठते हैं तो राजा नर नारायण की इच्छा जागी कि वे स्वयं मां का साक्षात दर्शन करें लेकिन यहां एक गढ़ सत्य था स्थानीय भक्त जानते थे कि रात के समय जब मंदिर के कपाट बंद हो जाते थे केंदु कलई मां की विशेष पूजा करते थे इस पूजा
के दौरान वे अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर मां का आह्वान करते भजन गाते मंत्रों का उच्चारण करते और मां साक्षात प्रकट होती थी राजा नर नारायण के अत्यधिक दबाव और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पण के कारण केंदु कलई अंततः राजा को गर्भगृह के एक छिद्र से मां के दर्शन करने का एक उपाय सुझा हैं केंदु कलई ने कहा कि जैसे ही वे मां की स्तुति शुरू करेंगे राजा उस छिद्र से मां के दर्शन कर सकते हैं उस रात केंदु कलई ने मां की स्तुति करना शुरू किया और मां कामाख्या प्रकट हो गई लेकिन शीघ्र ही
मां को यह आभास हो गया कि उनके साथ छल हुआ है देवी को राजा की छुपी उपस्थिति का आभास हो गया और देवी को इस अनादर और छल का गहरा अपमान महसूस हुआ मां कामाख्या ने क्रोधित होकर राजा नर नारायण को श्राप दिया कि उनके वंश का कोई भी सदस्य यदि इस क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश करेगा तो उनका संहार हो जाएगा देवी के इस श्राप से भयभीत होकर राजा नरनारायण ने उस क्षेत्र को छोड़ दिया और आज भी उनके वंशज जब कामाख्या क्षेत्र से गुजरते हैं तो अपनी आंखें ढक लेते हैं या छत्र
का उपयोग करते हैं ताकि मां कामाख्या के दर्शन की गलती ना हो इस घटना का प्रभाव केवल राजा पर ही नहीं केंदु कलई पर भी पड़ा कुछ कथाओं के अनुसार देवी ने केंदु कलई का सिर धड़ से अलग कर दिया जबकि अन्य कथाओं में बताया गया है कि मां ने उन्हें पत्थर की मूर्ति में बदल दिया दोनों ही कहानियां मां के क्रोध और केंदु कलई के प्रति उनके अनोखे संबंध का प्रतीक है यह कहानी हमें मां कामाख्या की अपार शक्ति भक्तों की गहरी आस्था और उनके द्वारा दिए गए श्राप की गुढ़ होता का एहसास कराती
है कामाख्या मंदिर का यह श्राप और इसके पीछे की यह कथा आज भी क्षेत्र के लोगों और कुछ बिहार के राजवंश के लिए गहरी आस्था और श्रद्धा का प्रतीक [संगीत] है कामाख्या मंदिर तंत्र साधना और बलि प्रथा का केंद्र माना जाता है यहां का माहौल और देवी का स्वरूप तांत्रिकों के लिए एक ऐसा स्थल बनाता है जहां वे देवी की शक्ति और कृपा का आह्वान करते हैं ऐसा कहा जाता है कि कामाख्या मंदिर के कपाट खोलने से पहले हर रोज एक बकरे की बलि दी जाती है इसके बाद ही मंदिर के द्वार भक्तों के लिए
खोले जाते हैं और पूजा अर्चना की जाती है यह प्राचीन परंपरा मंदिर की तांत्रिक साधना और देवी के प्रति श्रद्धा का महत्त्वपूर्ण अंग मानी जाती है बलि प्रथा इस मंदिर का एक अभिन्न हिस्सा है यहां देवी को प्रसन्न करने के लिए नर पशुओं की बलि दी जाती है जिनमें मुख्यतः बकरों भैंसों और कबूतरों की बलि चढ़ाई जाती है यह एक प्राचीन तांत्रिक परंपरा है जिसमें मान्यता है कि देवी को पशुबली अर्पित करने से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं यहां की विशेष बात यह है कि मादा पशुओं की बलि नहीं
दी जाती केवल नर पशुओं का ही चयन किया जाता है हम आपसे एक सवाल करना चाहते हैं क्या बेगुनाह पशुओं की बलि देना सही है या यह केवल अंधविश्वास का प्रतीक है अपने विचार तर्क के साथ कमेंट में जरूर लिखें चलिए देखते हैं कितने लोग इस विषय पर गहराई से सोचकर अपनी राय सांझा कर पाते हैं बलि की इस प्रक्रिया के लिए मंदिर में एक विशेष कक्ष बनाया गया है जहां भक्त इस अनुष्ठान का दर्शन करने का प्रयास करते हैं मान्यता है कि जो भक्त बली चढ़ते हुए जानवरों का सिर कटते हुए देखता है वह
पूरे साल खुशहाल और सुरक्षित रहता है बलि के साथ-साथ यहां वशीकरण पूजा का भी महत्व है जिसके लिए मंदिर के पत्थरों को कामिया सिंदूर या वशीकरण सिंदूर के नाम से बेचा जाता है इस सिंदूर को शक्ति का प्रतीक माना जाता है और लोग इसे अपने जीवन में सफलता पाने के लिए उपयोग करते हैं इतिहास और किंवदंतियों में कामाख्या मंदिर से जुड़ी मानव बलि की कहानियां भी प्रचलित हैं कुछ पुरानी कथाओं के अनुसार तांत्रिक साधक यहां मानव बलि देकर देवी को प्रसन्न करने का प्रयास करते थे हालांकि आधुनिक समय में मानव बलि की यह प्रथा समाप्त
हो चुकी है और इसे केवल एक पौराणिक कथा माना जाता है 19 जून 2019 को कामाख्या मंदिर परिसर में जॉय दुर्गा मंदिर की सीढ़ियों पर एक 66 वर्षीय महिला का सिर कटा शव एक कंबल से ढका हुआ पाया गया था यह घटना आधी रात को भूतनाथ मंदिर में पूजा के बाद शुरू हुई जहां से सभी लोग पहले कामाख्या मंदिर गए और फिर बगुला मंदिर के पास स्मशान घाट पहुंचे पीड़िता को बाद में जय दुर्गा मंदिर ले जाया गया जहां पूजा के दौरान शराब और मांस का सेवन किया गया पीड़िता को इस बात का अंदाजा नहीं
था कि यह पूजा उसकी बलि के लिए की जा रही है पूजा की एक विशेष रस्म के बाद उसका सिर कुल्हाड़ी से काट दिया गया आधुनिक युग में भी मानव बलि जैसी घटनाओं का सुनकर स्तब्ध होता होती है सोचिए कितनी ऐसी घटनाएं होंगी जो कभी सामने नहीं आ पाती अगर आपके क्षेत्र में भी ऐसी किसी तांत्रिक मानव बलि की घटना हुई हो तो हमें कमेंट में जरूर बताएं ताकि समाज में फैली अंध श्रद्धा के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके कामाख्या मंदिर जहां देवी कामाख्या के साथ साथ 10 महाविद्याओं का भी निवास माना जाता है
मान्यता है कि इस पवित्र स्थल पर देवी शक्ति के विभिन्न रूपों के दर्शन होते हैं तंत्र शास्त्रों के अनुसार यह 10 महाविद्या देवी की शक्ति के भिन्न-भिन्न रूप हैं जो तंत्र साधना में विशेष महत्व रखती हैं यह 10 महाविद्या हैं काली तारा शोड़ी भुवनेश्वरी भैरवी छिन्नमस्ता धूमावती बगलामुखी मातंगी और कमला यहां तांत्रिक अनुष्ठान और विशेष पूजा के माध्यम से इन महाविद्याओं का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है आख्या में देवी की कृपा और महाविद्याओं का आशीर्वाद प्राप्त करना हर तांत्रिक साधक का एक विशेष लक्ष्य होता है क्योंकि यह स्थान तंत्र साधना के उच्चतम
स्तर का प्रतीक है यदि आप 10 महाविद्याओं के रहस्यों पर आधारित एक पूरी डॉक्यूमेंट्री देखना चाहते हैं तो हमें कमेंट में बताएं हम अपनी अगली वीडियो में 10 महाविद्याओं की ताकत और रहस्यों के बारे में विस्तार से बताएंगे तो दोस्तों यह था कामाख्या देवी और उनके मंदिर का पूरा इतिहास और रहस्यों से भरा सफर आपको हमारी यह वीडियो कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं और चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें जल्द ही मिलते हैं एक नई डॉक्यूमेंट्री के साथ तब तक के लिए धन्यवाद जय हिंद जय भारत [संगीत]