कि भगवान श्री राम जंगल में गए कौशल्या मां को दुख हुआ था है और भरत भाई से थोड़ी उपराम हो रही थी कौशल्याजी भारत को पता चला कि हां यह मेरे से नाराज है इसका कारण मां को किसी ने संस्कार डाल देंगे इसके पीछे भारत का हाथ है कि तुम भरत खूब बोलते थे कौशल्या जी को के मेरा हाथ नहीं है और फिर भी कौशल्या जी का मन कि भारत के लिए इतना स्नेह से है में संपन्न नहीं हुआ है कि आखिर एक दिन भरत ने कहा कि हां यह कि मैं सपने में भी विचार
नहीं कर सकता हूं कि श्री राम बन जाए और मैं राज्य का इसके पीछे मेरा कोई हाथ नहीं है आपको इस बात का विश्वास में कैसे दिलाओ अगर मेरा इसमें तनिक भी हाथों तो मुझे माघ मास के स्नान का पुण्य ना मिले कार्तिक मास के स्नान का पुण्य ना मिले थे है बैसाख मास के स्नान का पुण्य नाम लें अ हूं कौशल्या जी ने कहा बस-बस मुझे संतोष हो गया माघ मास के स्नान के पुण्य की कसम खा रहे हैं है तो इसका मतलब तुम्हारा हाथ नहीं है अब मेरा मन मा यन गया है पुराणों
में कथा आते है कि ब्राह्मण का जीवन भर उसने धन कमाया है जो अपने नियम अधिनियम का की परवाह किए बिना अ कि बुढ़ापा आया अब रेखा के परलोक में तो िदन साथ नहीं देगा और इतने में एक दैव योग से चोर ले गए उधर तो धर्म के दुख से दुखी हुआ है है और बुढापे में अब मैं क्या करूं कि इतने में उसे एक सिलेक्ट स्लॉट का एक चरण हाथ लग गया कि माघ मास के स्नान से व्यक्ति की सद्गति स्वर्ग की प्राप्ति होती है है तो उसने महावीर क्वेश्चन शुरू किया नव दिन स्नान
के दसवें दिन तो ट्रांस से शरीर कृष्ण हो गया और मर गया और दूसरा कोई उसने पुण्य नहीं किया था लेकिन माघ कृष्ण के पुण्य के प्रभाव से बॉस वर्गों को गया ऐसी कथा दी जाती है कि यह तीर्थ स्नान की महिमा है ये तीन प्रकार के होते हैं कि एक हफ्ते स्थावर तीर्थ अपनी जगह पर के लिए हरिद्वार है काशी है प्रयोग है कि सेतु बंध रामेश्वर है और भी गंगोत्री-यमुनोत्री इनको आस्था वृत्त बोलते हैं कि दूसरे तीर्थों होते हैं चलते-फिरते संत उनको जंगम तीर्थ होते हैं ओम श्री कृष्णा ने कहा कि स्थावर तीर्थों
में रहने से नियम पहल करुण स्नान आदि करने से समय पर्ण बीतने के बाद आदमी को सुख-शांति देते प्रभाव होता है लेकिन जज संगम तीर्थ है चलते-फिरते संत संत जाम बैठते और सच समझा होता है वह तीर्थ दिवस है तो बहुत जंगम तीर्थक शहद में पावन करते हैं हैं तो एक स्थावर तीर्थ हुए दूसरे हुए जंगम तीर्थ जिनको जंगम तीर्थ मिल जाता है वह स्थावर टिप्स की परवाह नहीं करते चल जाता है जिनको सत्संग रूपी तीर्थ में जाने का अवसर मिल गया वह बाहर के तीर्थों में नवीनताएं तभी भी उनको नहाने का लाभ हो ही
जाता है कि तीसरे तीर्थों होते हैं सत्य तीर्थं शमा तीर्थं सर्वोच्च तीर्थं न ध ये दानव तीर्थं ध्यानं तीर्थम् ध्यानं तीर्थम् भगवत ध्यान भी एक पवन पावन तीर्थ है भगवत ज्ञान भी एक तीर्थ है अहंकार छोड़े बिना जरूरतमंद को तन से मन से विचारों से से में मदद रुको ना यह दान भी तीर्थ है यह सत्य भी तीरथ हम ब्रह्मचर्य ब्रह्मतीर्थ संयम रखना और इंद्रियों को विकारों से बचाना ए बीर्थ तो एक अतिरिक्त हुए जंगम तीर्थ स्थान मूर्ति संगम तीर्थ और सत्य समान अधीन स्मरण आगे इन अध्यात्मिक तीर्थ है तो माघ मास में इन तीनों
तीर्थों में नहीं ना सके तो दो तीर्थों में सत्संग में जब मैं ध्यान की संभावनाओं वायु न लगे इस वर्दी ना हो जाए सिर दर्द ना हो जाए तो नहाना चाहिए गंगा में जमुना में ऐसा गणपति हटकर के नहीं कि तुम महीना भर माघ मास का स्नान नहीं कर सकते हैं है तो एकादशी से लेकर अगली पूर्णिमा तक यह चार दिन दुबई स्नान करते हैं तो उसका मैंने बरखेड़ा में स्नान का प्रभाव पुण्य फल प्राप्त होता है ऐसा भी आता थोड़ा सा पढ़कर सुना दो माघ मास के स्नान का प्रारंभ पौष की पूर्णिमा से होता
है कि भारतीय संवत्सर का ग्यारहवां चंद्रमास और दसवां सौरमास माघ कहलाता है इस महीने में मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा होने से इसका नाम माघ पड़ा धार्मिक दृष्टिकोण से इस मास्क का बहुत अधिक महत्व है इस मास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पाप मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं माघ मास में माघ मास में एक टाइम भोजन करने से दूसरे दलों में धनवान कुल में जन्म लेगा अभी टाइम भोजन करने से क्या होगा कि वह सही मार्ग मांस धीरे-धीरे गरम होगा तो स्वस्थ भी रहेगा मैं तो सर तो कौन बनेगा से ज्यादा खाएगा
तो आदर्श उत्तम भोग है कि यह स्वास्थ्य के साथ-साथ पुण्य लाभ की व्यवस्था है अपने अ यहां पर वह मैं व्रतों में आ में आग मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से उपासक को राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है कि जिन मनुष्यों को चिरकाल तक स्वर्ग लोक में रहने की इच्छा हो उन्हें माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर अवश्य स्नान करना चाहिए कि माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहां कहीं भी जल हो वह गंगाजल के समान होता है माघ मास
की महिमा है जहां भी पानी है कि साबरमती में हो जाए नर्मदा में वह कहीं तो गंगाजल माना जाता कि शायद आपके घर में होगा हमने हार्ड करके ना लोग सूरत कि प्राचीन काल में नर्मदा के तट पर सुरथ नामक एक ब्राह्मण निवास करते थे वे समस्त वेद-वेदांगों धर्म शास्त्रों पुराणों के ज्ञाता थे साथ ही उन्होंने तर्क शास्त्र ज्योतिष गज विद्या अश्व-विद्या मंत्र-विद्या शास्त्र सांख्यशास्त्र योग शास्त्र और 64 कलाओं का भी अध्ययन किया था वे अनेक देशों की भाषाओं और लिपियों भी जानते थे और इतना सब होने के बाद भी भगवान में प्रीति नहीं और
धन में आज शक्तियों ने से बुढ़ापे में लड़खड़ा गए फिर नव दिन स्नान किया और 10 मिनट उठकर मर कर स्वर्ग की प्राप्ति की कि अगर इतनी विद्याओं के साथ अथवा सुरेश जैसे ही रहते बिना विद्यार्थियों और गुरु मिल गए होते तो वह ब्राह्मण एक बहुत ऊंची करती हो बात कि सत्संग की महिमा की बहुत जरूरत है है जो एक जगह पर पड़े रहते हुए उन्हें स्थावर तेज कहते हैं और जो चलते-फिरते सत्संग के द्वारा लोगों का मंगल करते हैं उन संतों को जंगम तीर्थ कहते हैं है और सत्य शर्मा आशू चाैधरी यह अध्यात्मिक तीव्र
है कर दो [संगीत]