हमें पता भी नहीं चलता इस प्रकार गुरुदेव सूक्ष्म अति [संगीत] सूक्ष्म हमारी यात्रा करा रहे [संगीत] हैं अंत वाहक शरीर पर चढ़े हुए कई जन्मों के संस्कार और निवृत होते जाते [संगीत] हैं वाणी के उपदेश से भी मौन का उपदेश और मौन रहकर संकल्प से गुरु लोगों की विशेष कृपा हमारे भीतर काम करती हमें उस समय पता भी नहीं होता कि मन से कितना लाभ होता है [संगीत] और उन गुरुओं की सूक्ष्म कृपा कैसे काम करती है उसका प्रारंभ में हम लोगों को पता भी नहीं होता वह हजारों मील दूर होने पर भी काम करती
है नजदीक होने पर भी काम करती है उनकी कृपा बोलने पर तो काम करती ही है लेकिन मौन में भी जब होते हैं तो वि काम करती है मौन के संकल्प की अपेक्षा बोलने का संकल्प कम सामर्थ्य वाला होता है मौन की आत्म वृति मौन में बैठकर आत्मा का शांत होने की अपेक्षा बाहर के क्रिया कलाभ छोटे हो जाते हैं सूक्ष्म परते उतारने के लिए सूक्ष्म साधनों की जरूरत पड़ती है और वह घटनाए मौन में शांति में घटती है शिष्य जब आगे बढ़ता है तब उसे ख्याल आता है कि कितना सारा परिवर्तन हुआ मंत्र गुरु
निषिद्ध गुरु वर्ण अक्षर गुरु कारण आख गुरु सब गुरु का बयान हम लोगों ने गुरु गीता में सुना बाद में यह भी सुना जला नाम सादर राजा यथा भवति पाव गुरु नाम दत सवे सदगुरु परम जो सत्य स्वरूप परमात्मा तत्व का बोध दे शत्र ब्रह्म निष्ट स् स्वरूप में जग है उन पुरुषों की प्राप्ति अति कठिन है ऐसे सदगुरु लोग मिलते हैं तो हमारा आमूल परिवर्तन हो जाता है दे ध्यास गलने लगता है चित सत पद में विश्रांति पाने लगता है जैसे मां मां बालक को कभी पुकारती है कभी खिलवाड़ खिलाती है कभी डांट है
कभी दम काती है कभी किसी ढंग से कभी किसी ढंग से उसका लालन पालन करती है वोह तो मां की अपनी प्रकृति है लेकिन गुरु सज्जाद स्वरूप में स्थित जो महापुरुष है वे लोग भी हमको कभी किसी रूप से कभी किसी ढंग से हमारा लालन पालन आंतरिक लालन पालन करते हैं और उनका पूर्व आयोजित कोई प्रोग्राम नहीं होता कि यह करना है वो करना है जिस वक्त जिस कारण क्रिया कलाप से हमारा उत्थान होता होगा उस समय वे परम गुरु हमारे से उस प्रकार का व्यवहार करेंगे और उस ढंग से हम पर बरसते हैं जैसे
चतुर वैद्य डॉक्टर अपनी निगाह में पेशेंट को रख के किस वक्त कौन से डोज की और किस इलाज की जरूरत है करते हैं ऐसे ही हमारे आंतरिक स्वास्थ्य प्राप्ति के लिए बाहर की तंदुरुस्ती बिगड़ती तो दवाई गोलियां इंजेक्शन ऑक्सीजन ऑपरेशन आदि करना पड़ता है लेकिन भीतर की जो सदियों की पुरानी लड़ थड़ा तंदुरुस्ती है युगों का जो रोग है जन्म मरण का उस रोग को निवारण करने के लिए वे परम गुरु भिन्न-भिन्न प्रकार की औषधि उपचार संयम या छूट छाट का उपयोग करते हैं और साधक की जैसी प्रकृति होती है उस वक्त उस साधक को
गुरु उसी प्रकार के भास हैं और हर एक साधक के अपने संस्कार हैं अपनी योग्यता अयोग्यता है अपनी मान्यता और पकड़े हैं और अपनी देखने की दृष्टि है अपनी सोचने की दृष्टि है हर साधक अपने सदगुरु के प्रति अपने ढंग का आदर मूल्य अहो भाव अथवा लड़ थड़ा की श्रद्धा आदि हुआ करते हैं साधक जब प्रारंभ ऐसे ब्रह्म बताओं के श्री चरणों में आता है उस समय जो उनको देखता है और उनकी योग्यता मापता है वो अपने ढंग की होती है छोटी सी साधक जो जो सं तत्व के नजी जाता है जो जो साधक पर
सदगुरु की कृपा बरसती है सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं और जो जों बुद्धि साधक की शुद्ध करते हैं गुरुदेव जो जो साधक का अंतःकरण शांत होता है जो जो साधक के तन और मन के विकार क्ण होने लगते हैं त्य उसकी बुद्धि शुद्ध होती है और त्यों ही सतगुरु का महत्व व समझता जाता है जब साधक में रजो तम फिर से आ जाता है तो उसके जीवन में महत्व का सदगुरु के सानिध्य का सदगुरु के उपदेश का प्रभाव थोड़ा सा हिल जाता है लेकिन जब सतोगुण बढ़ता है तो फिर उसके चित में सदगुरु तत्व का
वोह शुद्ध विशुद्ध संचार निखरने लगता है चतुर साधक रजो तमो गुण बढ़े नहीं उसकी सावधानी रखता है अगर रजो तम गुण आ जाता है तो सतर्क होकर गुरु निर्दिष्ट मार्ग से उस रजो तमो गुण को वो क्षीण करता है दबाता है जोज साधक सजा रहता है गुरु की कृपा अनिवार्य है लेकिन साधक का पुरुषार्थ भी अनिवार्य है सूर्यनारायण की कृपा अनिवार्य है खेती होने के लिए लेकिन किसान की सजगता भी अनिवार्य है किसान का परिश्रम और किसान की सजगता अनिवार्य है तब खेती फलती है ऐसे ही गुरुदेव की कृपा अनिवार्य है लेकिन साधक का साधन
भजन में उत्साह और पुरुषार्थ भी अनिवार्य है और किया हुआ साधन भजन की हुई सात्विकता की हुई आध्यात्मिक यात्रा कहीं बिखर ना जाए उसकी सजगता भी साधक के लिए अनिवार्य है अभी नन्हे मुन्ने पौधे हैं अभी खेत उभरा है उसकी रक्षा कर नहीं तो बकरे घ ढक उसे कुचल देंगे नष्ट कर देंगे अथवा तू सिंचाई नहीं करेगा खात पानी का ख्याल ना रखेगा तभी भी खेत लहला से इंकार कर देगा ऐसे ही साधक तू अपने दिल के खेत में ब्रह्म विद्या की सिंचाई करता रहना जिससे आत्म ज्ञान का फल लगे और यह सिंचाई तब तक
तू करता रहना बाहर तब तक बनाता रहना सजगता से बाढ की निगरानी करते रहना जब तक तुझे वो अमृत पद की प्राप्ति ना हो ये संसार कंटीला मार्ग है जैसा हरा खेत होते ही ढोर ढकड़ आ जाते हैं छोटे मोटे जीवाणु भी आ जाते हैं किसान फिर दवाइयां छाट है अकेली दवाइयों से भी खेत की रक्षा नहीं होती साथ में बार को भी सुरक्षित करता है मजबूत करता है बाढ और दवाइयों से भी पर्याप्त काम नहीं होता है खेत को पानी भी देता है और खाद आदि भी देता है चार पैसे का अनाज पाने के
लिए वह सब प्रकार की सावधानी रखता है साधक विश्व नीयता को पाने के लिए तू भी सावधान रहना भैया जगत नीयता को पाने के लिए तू भी सा सावधान रहना तू भी अपनी संयम की बाढ़ करना तो भी साधना के भिन्न भिन्न प्रकारों की सिंचाई करते रहना और साथ में देखना कि कहीं मान बढ़ाई अथवा दुख सुख के बाहर के थपेड़े आकर तेरे इस साधन रूपी खेत को तो उजाड़ नहीं रहे हैं और तू जब जब मौका मिले एकांत में जाना एकांत वास करना अल्प देखना अल्प सुनना अल्प बोलना बाकी का समय तो अपनी उस
खेती का ख्याल करना जैसे किसान घर छोड़कर खेत में ही खाट डाल देता जो जो खेत उभरता है दाने लगते हैं डोड़े लगते हैं त्यों त्यों किसान अपनी जवाबदारी अधिक महसूस करता है ऐसे ही प्रारंभिक साधक भले ही जवाबदारी ना महसूस करें साध्य को पाने के लिए सुरक्षा की बार ना करें लेकिन जो कुछ चार कदम चल पड़े हैं और जिन्हें वह आत्म ज्ञान का फल लगा हुआ महसूस हो रहा है जिनको शांति प्रेम और आनंद का एहसास हो रहा है जिनको युगों की थकान मिटने का एहसास हो रहा है जिनके दिल भर में जिनके
दिल में उस दिलभर दाता की उस ब्रह्म वेता की सूक्ष्म करुणा कृपा तरंगित हो रही है जिनका सूक्ष्म जगत में सूक्ष्म साधना में प्रवेश हुआ है जो केवल बाहर के उपदेशों से ही नहीं लेकिन अंतर मन से अंतर यात्रा से पवित्र हुए हैं ऐसे साधक घर से खटिया हटाकर खेत में खटिया डाल देते हैं जैसे किसान घर की खटिया लाकर खेत में डाल देता है खेत की सुरक्षा करने के लिए ऐसे ही बाहर के लोकाचार का चिंतन की खटिया हटाकर ब्रह्म चिंतन के खेत में अपनी खटिया रख देना आत्म चिंतन के खेत में आत्म प्रीति
के खेत में अपनी खटिया धर देना ताकि उठना भी खेत में बैठना भी खेत में चलना भी खेत में और सोना भी खेत में हो जाता है जो खेत लह लाता है फल देने के करीब होता है ों किसान घर पर जाने का टाइम कम कर देता है खेत में ही भोजन मंगा लेता है ऐसे ही साधक तू भी अपना खानपान रहन सहन साधन मय बना दे किसान चार पैसे के धान के लिए इतनी कुर्बानी करता है ऐ मेरे प्यारे वत्स मित्र साधक भैया तू तो अनंत अनंत ब्रह्मांड नायक रूपी आत्म ज्ञान के फल को
पाने के लिए सजक रहना क्योंकि तेरी मोड़ी किसान की अपेक्षा बहुत ऊंची है तेरा प्राप्ति का लक्ष्य किसान से अनंत गुना बे माप ऊंचा है इसलिए तू साव न ना तू हजारों माइल दूर होगा तभी भी तू याद रख तेरे गुरु की कृपा तेरी साय में रहेगी शिष्य कहता है कि गुरुदेव मुझे अनुभव है जब जब मैं थका हूं निराश हुआ हूं हताश हुआ हूं क्षण भर में ही आपकी स्मृति लाकर थोड़ा ही अंतर में आपकी और आया हूं तो वहीं से आश्वासन मिला है मार्ग मिला है प्रेम मिला है पुछ का मिला है गुरुदेव
जब मैं फिसला हूं मन मानी की है तब तब तुम्हारी डांट मिली है तुम्हारी कड़ी नजर दिखी है और जब जब मैं तुम्हारी करुणा कृपा के अनुकूल चला हूं तब वही कड़ी नजर मीठी मधुर नजर हुई है तुम्हारी कड़ी नजर भी हमारे घड़ तर के लिए है और तुम्हारी मीठी निगाह भी हमारे घड़ तर के लिए है तुम्हारा बोलना भी हमारे कल्याण के लिए है और तुम्हारा चुप होकर सूक्ष्म मदद करना भी हमारे कल्याण के लिए है इस प्रकार की अब अनुभूतियां हो रही है हे ब्रह्म वेता गुरुदेव हे आत्म रामी मेरे सदगुरु तुम न
जाने किसकिस प्रकार हमारा लालन पालन करते हो न जाने किस किस प्रकार तुम्हारा कोई पूर्व आयोजन नहीं लेकिन हर अदा हर अंगड़ाई हर इल चाल चाहे फिर हाथ की एक्शन हो चाहे निगाहों की नैनों की छटाई हो चाहे बोलना हो चाहे चुप होना हो हम लोगों को न जाने किस किस रूप में वह रहस्यमय अंगड़ाइयां मिलती है लटका करता ब्रह्म हमारे जीवन में अपना ब्रह्म भाव अपना ब्राह्मी अनुभूति का अमृत सिंचन करता है उन ब्रह्म बताओं को बाद की एक क्षण का प्रोग्राम नहीं होता है फिर भी वे सुचारू रूप से हमारा घर तर करते
हैं सुचारु रूप से हमारा संचालन करते हैं क्योंकि वे सुचारु त में स्थित है और वह परमात्मा ऐसा ही है जिसने उसकी करीबी का एहसास किया है जिसने उसम अपने आप को प्रतिष्ठित कर दिया है अपने आप को मिला दिया है ऐसे ब्रह्म बताओ य हर चेष्टा बड़ी रहस्यमय होती है प्रारंभ में हम समझे चाहे ना समझे हम पा सके हजम कर सके चाहे ना कर सके लेकिन उनकी हर चेष्टा बड़ी रहस्यमय होती है छोटी सी छोटी उनकी चलने फिरने बोलने खाने पीने देखने के ढंग की भी चेष्टा हमारे लिए नितांत कल्याणकारी और घडतर स्वरूप
होती है ऐसे जो परम गुरु लोग हैं ऐसे जो ब्रह्म वेता है उन ब्रह्म वेता का बयान हम लोगों के जीवें ताकत नहीं हम लोगों के शब्दों में ताकत नहीं उन ब्रह्म वेता महापुरुषों की उस घडतर लीला का शिल्पी तो पत्थर में से मूर्ति बनाता है भगवान बनाता है लेकिन ऐसे ब्रह्म वेता विरोध करने वाले प्रतिक्रिया करने वाले बलवा पुकारने वाले मन बुद्धि के मनुष्य को ब्रह्म बनाता है पत्थर से मूर्ति बनाना आसान है क्योंकि वो शंका नहीं करेगी फरियाद नहीं करेगी घर नहीं भागेगी लेकिन यह साधक तो घर भी भागेगा दुकान में भी भागेगा
सुकर्म में थोड़ा चलेगा तो कुकर्म में भी भागेगा चिंता में भी गिरेगा तो अहंकार की और भी दौड़ करेगा और कभी-कभी अपने गुरु के प्रति भी उसके चित्त में ना जाने कैसे कैसे विचार उठेंगे और न जाने कैसे कैसे खिसकने के तरीके खोजे और कैसे कैसे बचाव के तरीके खोजे पत्थर को मूर्ति बनाना आसान है लेकिन यह चलता पुर्जा कलयुग का चंचल चित रखने वाला मानव को महेश्वर के अनुभव में प्रतिष्ठित करना कितना कठिन है वोह अति कठिन कार्य सहज में स्वाभाविक स्व रचित मनोरंजन के भाव से जिन परम गुरुओं के द्वारा यह कार्य संपन्न
होता है ऐसे गुरुओं को समझने के लिए है साधक हे मेरे मन त अथाज अथानाकोत्तई अथाज अथान अथातो को पाने का दृढ़ निश्चय रखेगा तभी तुम ऐ साधक तभी तो उस अथान भव के दाताओं को पहचान पाएगा उनको समझ पाएगा जितना जितना तू परमात्मा के लिए लालायित रहेगा उतना उतना त परमात्मा के प्यारों को पहचान पाएगा उतना उतना तू परमात्मा के प्यारों के निकट हो पाएगा हे मित्र हे भैया हे वत्स जो विकारों के प्यारे हैं जो परिवर्तित पदार्थों के प्यारे हैं उनके प्रभाव से त बचना जो परमात्मा के प्यारे हैं और जो तुझे परमात्मा
में प्रतिष्ठित होकर ही चैन की नींद लेना चाहते हैं जो तुझे परमात्मा पद में विश्राम कराने के लिए तत्पर है तू उनको सहयोग करना तू हाना कानी मत करना तू इंकार मत करना तू फरियाद मत करना तू टकने के इलाज मत करना तू फिसलने की अपनी पुरानी आदत को मत पकड़ना हे मेरे साधक हे भैया जीवन तेरा कितना कीमती है वोह ब्रह्म बता जानते हैं और तू कितना तुच्छ चीजों में गिर रहा है वो भी वे जानते हैं जैसे नन्ना मुन्ना बालक अपनी विष्ठा में खेलता है और सुख मानता है अंगारों को पकड़ने के लिए
लात होता है बिच्छू और सांप से खेलने को लालायित होता है उस अबोध बच्चे को पता ही नहीं कि अभी उनके विसिले डंक तुझे त्राहिमाम करा देंगे अभी उन विषय विकारों के डंक और अभी वह मल मूत्र विष्ठा में तू खेलने को लालायित हो रहा है वह तुझे बीमार कर देंगे बेटे तेरे दिल की तंदुरुस्ती को बिगाड़ देंगे बच्चे अंगारों से तू खेलने को जा रहा है लाला तू तो मक्खन मिश्री खाने को आया है मिट्टी में खेलने को नहीं आया गोब में खेलने को तू नहीं आया हजारों 8484 लाख जन्मों तक तू लाला खेला
है इन गोबर में इन कंकड़ पत्थरों में इन पति और पत्नी के तुच्छ विकारी संबंधों में तू खेला है तू बकरा बना है कई बार त तुच्छ बकरियों की पीछे घुमा है तूने ना जाने कितने कितने जन्मों में हल्के खेल खेले हैं अब तो तू लाला के साथ खेल अभी तो तू राम के साथ खेल अभी तो तू शिव कीना समाधि होकर स्व के साथ खेल हे प्यारे साधक अगर तू तेरे गुरु को खुश करना चाहता है तो गुरु की आज्ञा मान और गुरु की आज्ञा यही है कि गुरु जहां खेलते हैं तू वहां खेल
खेलना शुरू कर दे गुरु जहां गोता मारते हैं उसी में तू गोता मार भैया गुरुओं की जहां समझ है वहां तू अपनी वृति को पहुंचाने का प्रयास कर इस नश्वर खिलोन को पकड़कर सुख मनाएगा कब तक अंगारों की और तू भागेगा करुणामय मां जैसे समझाती है बच्चा रुक जाता है मां इधर उधर हो जाती है और बच्चा अंगारों की ओर जाता है और छू लेता है चमकते अंगारों को खिलौना समझकर छू लेता है और त्राहि माम पुकारता है फिर उसकी मां को कितना दुख होता है उस समय उस बालक को पता नहीं लेकिन मां थप्पड़
मार देती उसकी थप्पड़ मारना भी करुणा से भरी है उसका कान पकड़ना भी करुणा से भरा है उसका हाथ पैर बांध कर सजा ना भी प्यार से और करुणा से ही प्रेरित है ऐ साधक तो जब गलत रास्ते जाता है उन अंगारों और कंको में तु कदम रखता है तो गुरु रूपी माता पिता तुझे कड़ी आंख दिखाते होंगे तू एहसास भी करता होगा गुरु रूट गए हैं नाराज हो गए हैं पहले जैसे नहीं है ऐसा तुझे लगेगा लेकिन तू गौर से देखेगा कि तू पहले जैसा नहीं रहा तू अंगारों की ओर गया तू बिच्छू की
ओर गया तू सर्पों की और गया इसलिए वह तुझे पहले जैसे नहीं भास हैं तू शंका कु शंका में गया तू अपनी अल्पम से ब्रह्म बताओ गुरुओ को तोलने का दु साहस करने को गया इसलिए उन्होंने तुझे कड़ी आंख दिखाई है वो कड़ी आंख भी तेरी कल्याण के लिए है कड़ी आंख भी करुणा से भरी है ड़ी आंख भी कृपा से भरी है कड़ी आंख भी प्रेम से भरी है कड़ी आंख भी पुकार से भरी है कि तू चल चल तू ऐसा मत कर आगे चल रुक मत आगे चल गिर मत सावधान हो फिसल मत
साहस कर गद्दार मत हो तू सावधान हो कृतन मत हो तू कृतज्ञ हो इस प्रकार की उन आंखों से झलकती हुई जत को तू समझा कर गुरु नाराज है ऐसा करके तू फरियाद मत कर दुखी होकर तू संसार के कचरे में अधिक मत कूदना गुरु नाराज है तो उसे रिझाने का एक ही तरीका है कि तू फिर जहां भी हो घर में हो मंदिर में हो अरण्य में हो जहां भी हो तो फिर ध्यान शुरू कर दे फिर परमात्मा को प्यार करना शुरू कर दे तो फिर गुरुओं के अनुभव में डूबना शुरू कर दे व
कड़ी आंख दिखती हुई गुरु की गर्म आंख दिखती तेरे को उसी क्षण शीतल मिलेगी रूठे हुए गुरु उसी क्षण तुझ पर प्रसन्न हुए तुझे दिखेंगे दूसरे क्षण में तुझ पर बरसते हुए दिखेंगे वे तुझ पर बरसते ही रहे अगर तू ऐसा होना चाहता है तो तू भी उनके अनुभव में मिटता जा तू भी अपनी खटिया खेत में रखता जा तू भी अपना समय खेत में बिताता जा क्योंकि तेरा खेत लहला रहा है गुरुओं को दिखता है तेरे खेत में बुआई हुई है सिंचाई हुई है और कुछ हरा भरा भी हुआ है जैसे किसान का बेटा
खेत को देखने जाए और खेत ना देखे खेत में गधे घुस जाए और बाप देखे तो बाप को कितनी नाराजी होती है खेत में गाय भैस घुस जाए तो बाप को कितनी नाराजी होती है ऐसे ही साधक तेरी साधना रूपी खेत में तू अहंकार और वासना रूपी गधे गध को मत घुसने देना जड़ भोग आदि रूपी भैसे भैस हों को मत घुसने देना और मीठी मठी बात बोलकर अपने होकर भी जो तेरा समय खराब कर दे ऐसे गाय और बैलों को भी मत घुसने देना उन टोलो को दूर से आते जब देखता है चतुर किसान
तो पहले से बैटरी उठाता है डंडा उठ उठाता है ख खू करता है आवाज करता है हाक करता है ऐसे जब त तेरे खेत में भी कोई प्रवेश करने को हो तो तू ओम का खखार करना गर्जना करना नारायण नारायण का तू बैटरी प्रकाश कर देना गुरुदेव गुरुदेव की तू लट की छड़ी जरा खटका देना वे ढोर दूर से ही वे पक्षी दूर से ही उड़ान ले तेरा खेत चुगने को आए उसके पहले ही तू अपनी तैयारी रखेगा तो तेरा खेत बच जाएगा अरे चार पैसे के खेत के लिए इतनी तैयारी करते हैं किसान उन
किसानों को कम से कम तो गुरु मान लिया करना इस समय