सितंबर 9 1980 [संगीत] की शाम प्रशांत महासागर के बीचोंबीच लहरों का समंदर उफान पर था। आकाश में काले बादल घिरे थे और दूर कहीं बिजली की चमक उस अंधेरे को चीरते हुए निकल रही थी और यहीं कहीं समंदर की गहराइयों और तूफानों की गर्जना के बीच एक विशाल ब्रिटिश जहाज अपनी आखिरी यात्रा पर था और इस शिप का नाम था एमवी डर्बी शायर। 42 लोग, एक कप्तान और एक सफर जो आगे जाके सालों के अंतहीन सफर में बदलने वाला था। दरअसल यह कोई साधारण जहाज नहीं था बल्कि यह एक ब्रिटेन के जहाजी इतिहास का गौरवशाली
ब्रिज क्लास ओबीओ कैरियर था। जो कि इतना बड़ा था कि उसके नौ होल्ड सात मंजिला इमारत जितने थे और 10000 टन स्टील और पावर से बना यह जहाज दुनिया का सबसे भरोसेमंद अनब्रेकेबल और अनशंकेबल कारगो जहाज था। ठीक 1912 के टाइटेनिक जहाज की तरह। ऑफिशियल रिकॉर्ड्स के अनुसार यह शिप 11 जुलाई 1980 को सेपलेस क्वबक कनाडा से निकला था और इसका फाइनल डेस्टिनेशन जापान का कावासाकी शहर था और इसमें टोटल 42 लोगों के साथ-साथ 157446 टन्स आयरन ओर भी लोडेड थे। अब शुरुआती दिनों में तो यह जहाज बिल्कुल सही सलामत अपनी यात्रा पर आगे बढ़
रहा था और इसके 47 वर्षीय कप्तान जेफरी अंडरहिल भी काफी अनुभवी नाविक थे। लेकिन 9 सितंबर की रात उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि ये अडिग अचल और ताकतवर स्टील का महल टाइफून ऑर्चिड नामक तूफान की ओर बढ़ रहा था। जो कि एक ऐसा तूफान था जो कुछ ही घंटों में इस शिप के हर बोल्ट, हर वेल्ट और हर उम्मीद को निगल जाने वाला था। दरअसल कप्तान को पिछले तीन दिनों से मौसम की रिपोर्ट काफी उलझी हुई मिल रही थी। कहीं से ऐसा कहा गया कि तूफान दिशा बदल चुका है। तो
कहीं से उन्हें पता चल रहा था कि तूफान ही अब कुल मिलाकर कमजोर पड़ गया है और इसीलिए ऐसे में उन्होंने यह तय किया कि वह आगे बढ़ेंगे और फिर उस रात कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया। दरअसल इस तूफान में वो शिप रातोंरात कहीं गायब हो गया और तकरीबन छ दिनों तक इसके साथ संपर्क करने की कोशिश लगातार करने के बावजूद भी इस पर मौजूद 42 लोगों में से किसी की भी आवाज सुनाई नहीं दी और फाइनली जब 15 सितंबर को इसको लेकर मिसिंग रिपोर्ट दाखिल हुई तब तक काफी
देर हो चुकी थी क्योंकि इसके बाद ना ही सर्च टीम को इसका कोई मलवा मिला और ना ही इस पर मौज मौजूद कोई लाइफ बोट यानी कि एक विशाल काय जहाज रातोंरात समंदर में कहीं गायब हो गया और वह भी बिना एक भी निशान छोड़े। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? इतना विशाल जहाज अचानक से रातोंरात कहां गुम हो गया? आखिर उस रात उस जहाज पर ऐसी कौन सी घटना घटित हुई थी? और जहाज पर मौजूद कप्तान के साथ वो 40 से 42 लोग कहां गायब हो गए? आइए आज हम आपको इस शिप की वो
खौफनाक कहानी सुनाते हैं जो इसके गायब होने के 14 साल बाद दुनिया के सामने आई। और मैं इसे खौफनाक इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि यह कहानी लोगों की सोच से और अंदाजे से कहीं ज्यादा डरावनी और कहीं ज्यादा अमानवीय थी। दोस्तों एमवी डरबी शायर एक ब्रिटिश ओबियो यानी कि ओरबल्क ऑयल कॉम्बिनेशन कैरियर था जिसका निर्माण 1976 में श हंटरशिप कंपनी ने कराया था। यह शिप इनके ब्रिजेट क्लास सेक्स टेक्स्ट सीरीज की आखिरी शिप थी और जून 1976 में इसे सर्विस में लाया गया था। हालांकि उस वक्त पर इसका नाम एमवी डरबी शायर नहीं बल्कि
लिवर पूल ब्रिज था जो कि 1978 में बदलकर डरबी शायर कर दिया गया था। टाइटेनिक से दुगना विशाल एक 16 मंजिल इमारत जितना ऊंचा यह शिप उस वक्त पर किसी स्टील के फोर्ट से कम नहीं था। और तो और इसके स्ट्रांग बिल्ड क्वालिटी एडवांस रडार सिस्टम और गरो कंपास और रेडियो इक्विपमेंट्स की वजह से इसे उस वक्त का अनब्रेकेबल और अनशंकेबल शिप भी कहा जाता था और इसीलिए जब यह गायब हुआ तो छ दिनों तक इसको लेकर किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह समंदर में डूब जाएगा। 15 सितंबर को जब डरबी शायर जहाज
को लेकर अंतरराष्ट्रीय खोज अभियान शुरू हुआ और हवाई जहाज तथा समुद्री जहाज इसकी खोज में निकले तो उन्हें वहां केवल खाली पानी के अलावा कुछ भी नहीं मिला। ना ही कोई मलवा, ना ही कोई लाइफ बोट और ना ही किसी यात्री की लाश, और यही कारण है कि उस वक्त पर ऑफिशियल्स ने यह थ्यरी दी थी कि शायद उस तूफान में यह जहाज कहीं डूब गया था, और अब उन्हें ढूंढना नामुमकिन था। लेकिन गायब हुए लोगों के परिवारों को ऑफिशियल एक्सप्लेनेशन पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं था। उन्हें लग रहा था कि जरूर उनसे कोई ना
कोई सच छुपाया जा रहा था क्योंकि इतना विशाल शिप अचानक से बिना कोई नामोनिशान के गायब तो नहीं हो सकता था। ऊपर से इस बीच डर्बी शायर की सिस्टरशिप्स की भी घटनाएं उजागर होने लगी थी। दरअसल 1982 में लिवर पूल ब्रिज नामक सिस्टरशिप तूफान में स्ट्रेस क्रैक्स के कारण खतरे में पड़ गई। इस सुपर स्ट्रक्चर में विशाल दरारें दिखाई दी और कप्तान को क्रू को इवाकुएट करना पड़ा और फिर 1986 में कुवलून ब्रिज अटलांटिक महासागर में टूट गई। शक्तिशाली लहरों और कमजोर हल की वजह से शिप दो हिस्सों में बट गई। और इन दोनों घटनाओं
ने स्पष्ट कर दिया कि ब्रिज क्लास जहाजों में स्ट्रक्चरल डिफेक्ट मौजूद थी। यानी कि यह केवल डरवी शायर का मामला नहीं था। इस कंपनी की पूरी शिप में ही डिज़ फ्लॉस और स्ट्रक्चरल वीकनेस नजर आ रही थी। जिसको लेकर 1989 में एक जांच भी बिठाई गई। हालांकि इसके रिजल्ट्स में भी कुछ खास देखने को नहीं मिला और डर्बिशायरशिप के कंपनी को क्लीन चिट दे दी गई। लेकिन मृतक के परिवार अभी भी इस पूरे इन्वेस्टिगेशन से नाराज थे। उनके दिमाग में अभी भी उस रात का रहस्य, टाइफून ऑर्चड की गर्जना और अनसुलझे सवाल घूम रहे थे।
उन्हें ऐसा लग रहा था कि मानो सरकार उनसे कुछ छुपा रही है। पर किसी चमत्कार के इंतजार के अलावा वो और कुछ भी नहीं कर सकते थे। और यह चमत्कार हुआ साल 1994, यानी 1994 में। जब आईटीएफ की एक टीम को डरबी शायर का मलबा मिला। 14 साल पहले सितंबर 1980 के उस रात से डरबी शायर के परिवारों और नाविकों की यादों में अनगिनत सवाल और बेचैनी घर कर चुकी थी। 42 नाविक और उनके परिवारों के सदस्य समुद्र की असीम गहराई में हमेशा के लिए खो गए [संगीत] थे। और किसी ने कभी यह अंदाजा भी
नहीं लगाया था कि इतना विशाल और इतना मजबूत दिखने वाले इस जहाज की इतनी जल्दी और अकल्पनीय तरीके से मौत हो सकती है। लेकिन परिवारों की निरंतर कोशिशों और अंतरराष्ट्रीय संगठन इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन की मदद से साल 1994 एक स्पेशल टीम को वहां भेजा गया जहां जहाज आखिरी बार रेडियो पर नोटिस हुआ था। दरअसल वहां समुद्र की गहराई लगभग 4 किमी थी और इतने वर्षों के बाद किसी को उम्मीद भी नहीं थी कि डरबी शहर का कोई अवशेष मिल पाएगा। लेकिन आधुनिक तकनीक और पानी के भीतर जाने वाले रिमोट कंट्रोलोल्ड मशीनंस और सोनार इमेजिनिंग
की मदद से आईटीएफ की टीम ने केवल 23 घंटों में जहाज का मलवा ढूंढ निकाला। और यह मलबा उस वक्त सिर्फ धातु का टुकड़ा नहीं था बल्कि यह उस रात की पूरी कहानी थी जो उस खौफनाक मंजर को बयां कर रही थी जो उस रात उस शिप पर मौजूद 42 लोगों ने महसूस किया था और मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जब पहली बार विशेषज्ञों ने जहाज के आगे के हिस्से को देखा तो उनके लिए उससे भयानक दृश्य और कुछ नहीं था। दरअसल 9 सितंबर 1980 की रात एमवी डर्बी शायर बिल्कुल शांति से समंदर
की सतह पर छलांग लगा रहा था। लेकिन कुछ ही मिनट बाद अचानक से शिप में तेज हलचल होने लगी। जहाज के कप्तान को भी यह हलचल महसूस हुई और उन्होंने शिप को अच्छी तरीके से चेक किया और उन्हें उस वक्त जहाज में कोई भी कमी नजर नहीं आई। पर जैसे ही उन्होंने रेडियो पर पास के कंट्रोल सेंटर पर बात करने की कोशिश की, उनके साथ उनका संपर्क नहीं हो पाया। यानी कि जहाज में धीरे-धीरे कुछ खामियां आना शुरू हो गई थी। हालांकि कप्तान इस बात को लेकर निश्चिंत थे कि कुछ भी हो जाए पर यह
जहाज डूबेगा तो नहीं। लेकिन अगले ही पल समंदर के अंधेरे में तेज तूफान ने इस जहाज को चारों ओर से घेर लिया। जिसको लेकर ना तो इस जहाज के कप्तान तैयार थे और ना ही यह जहाज खुद। यह तूफान इतना शक्तिशाली था कि कुछ ही मिनटों में इसने जहाज के सारे कंट्रोल्स फेल कर दिए और फिर अपनी अथाह ताकत से इसने जहाज के ऊपर पानी और तेज हवा की बौछार करनी शुरू कर दी। उधर जहाज पर बैठे लोग कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे कि अचानक ही कुछ मिनटों में यह जहाज को हो क्या
गया। वो किसी तरह से अपनी जान बचाने की कोशिश में लगे थे और फिलहाल ऐसा करने के लिए उनके पास बेस्ट ऑप्शन तो यह था कि जहाज पर मौजूद लाइफ बोट्स का इस्तेमाल करें। लेकिन इससे पहले कि वो इसका इस्तेमाल कर पाते अचानक से जहाज डूबने लगा और जहाज पर लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। कुछ समंदर में छलांग लगाने लगे और कुछ ईश्वर से प्रार्थना करने लगे। पर इसी बीच 1 मिनट के अंदर-अंदर जहाज समंदर की कोख में समा गया और इस पर मौजूद लोग चीखते चिल्लाते हुए समंदर के अंदर समा
गए और फिर मदद की आस लगाए। उनकी सांसे फूलने लगी और एक के बाद एक उनकी मौत होने लगी और बस कुछ ही घंटों में जहाज पर मौजूद एक-एक शख्स मौत की नींद सो गया। दरअसल डर्बी शायर जिसका प्रचार अनब्रेकेबल शिप के नाम से हुआ था। उसके आगे का है जो कि लगभग एक टेनिस कोर्ट जितना बड़ा था। समुद्र की लहरों के दबाव में झुक कर टूट चुका था और इसके टूटने के साथ ही हजारों टन पानी तुरंत कार्गो शिप में भर गया था। जिससे कि जहाज का अगला भाग धीरे-धीरे पानी में डूबने लगा था।
और यही नहीं इसके बाद जहाज का दूसरा और तीसरा हैच भी टूट गया था। जिससे कि हवा और पानी के दबाव ने जहाज के आगे के हिस्से को पूरी तरह से कमजोर कर दिया और नीचे के टैंक और इंजन रूम भी पानी से भरने लगे थे। अब इसके बाद जहाज का अगला भाग इतना नीचे आ गया था कि अगली लहरें सीधे जहाज पर टूटने लगी। हालांकि यह बात यानी कि जहाज की ऐसी हालत हो रही है यह जहाज के कैप्टन को भी नहीं पता था। वो अभी भी इस कॉन्फिडेंस में थे कि उनका जहाज अडिग
और मजबूत है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग थी। क्योंकि इस इन्वेस्टिगेशन के दौरान एक्सपर्ट्स ने जहाज के मेटल स्ट्रक्चर में काफी सारी दरारें देखी और वो दरारें केवल लहरों के कारण नहीं थी बल्कि इसके पीछे का कारण निर्माण में की गई जल्दबाजी की गलतियां और अंतिम समय में किए गए डिज़ मॉडिफिकेशंस की वजह से थे। यानी कि रियलिटी में डरबी शायर एक अनब्रेकेबल और अनशंकेबल शिप था ही नहीं। और यही कारण है कि यह धीरे-धीरे समुद्र की ताकत के सामने हारता चला गया। इसके एक हैच के टूटने के साथ ही इसके पड़ोसी हैचेस पर एक्स्ट्रा
प्रेशर पड़ने लगा और इससे जहाज में एक के बाद एक फेलियर्स हुए और जिसने जहाज के आगे की पूरी की पूरी संरचना को ही कमजोर कर दिया। ऊपर से भारी दबाव के कारण जहाज के भीतर के हवा के टैंक भी फटने लगे और धीरे-धीरे पूरा जहाज पानी में डूबता चला गया। यानी कि डरवी शायर के सिस्टरशिप्स के साथ जो घटनाएं हुई थी, ठीक वैसी ही घटना का शिकार एमवी डरवी शायर शिप भी हुआ था। और इसीलिए इन दोनों ही घटनाओं ने कंपनी के दावों की पोल खोल दी और यह साबित कर दिया कि ब्रिज क्लास
के जहाजों के निर्माण और डिजाइन में गंभीर कमियां थी और डर्बिशा इसका केवल पहला शिकार नहीं था बल्कि इस शिप के सीरीज के सारे के सारे शिप्स में यह कमियां मौजूद थी। इसके साथ-साथ एक्सपर्ट्स ने यह भी पाया कि उस रात समुद्र में अनयूजुअली हाई वेव्स डर्विशर पर अत्यधिक दबाव डाल रही थी। जबकि हैचेस का डिजाइन केवल लिमिटेड वाटर प्रेशर को सहन करने के लिए ही डिजाइन किया गया था। और यही कारण है कि उन अनयूजुअल वेव्स ने अचानक से शिप के ऊपर प्रेशर बढ़ा दिया और यह प्रेशर शिप के मेटल बॉडी को तोड़ने लगा
और हैचेस एक के बाद एक फटने लगे। दरअसल जब एक्सपर्ट्स ने इस शिप के अलग-अलग टुकड़ों का इन्वेस्टिगेशन किया तो पाया कि जहाज के बीच और ऊपर के हिस्सों में भी दरारें और बॉडी के झुकने के निशान थे। जो कि यह साफ दर्शाता था कि यह कोई सामान्य तूफान की घटना नहीं थी। यह छोटे-छोटे डिज़ फ्लॉस और कंस्ट्रक्शनल डिफॉल्ट्स का परिणाम था जो समुद्र की शक्ति के सामने जहाज को असहाय बना दिया गया था। वहीं जब जहाज के हैच, टैंक और इंजन रूम का विस्तृत निरीक्षण किया गया तो एक्सपर्ट्स ने यह पाया कि सबसे आगे
का हैच केवल 2 मीटर पानी का दबाव सहन कर सकता था। लेकिन उस रात लहरों का दबाव इससे 10 गुना अधिक था। इस दबाव ने हैच को झकझोर कर तोड़ दिया था। जबकि दूसरे और तीसरे हैच का टूटना डोमिनो इफेक्ट की तरह हुआ था। और फिर इन तीनों हैचेस के टूटने के कारण पूरे जहाज का आगे का हिस्सा पानी में डूब गया और बढ़ते हाइड्रोस्टेटिक प्रेशर ने जहाज को अंदर से फाड़ दिया। और यही कारण है कि जांच में यह स्पष्ट किया गया कि जहाज पर मौजूद लोग कप्तान जेफरी अंडरहिल और 42 नाविक पूरी तरह
मासूम थे। वो अनुभवी थे और तूफान से निपटने के लिए सही-सही नॉटिकल प्रोसीजर्स अपना चुके थे। उन्होंने अपनी तरफ से सब कुछ किया। उन्होंने स्पीड कम की। बोको वेव्स के एंगल पर रखा। कारगो सिक्योर किया और सिस्टम्स को मॉनिटर किया। लेकिन हादसा इतनी तेजी और इतनी शक्तिशाली वेव्स के कारण हुआ कि वो कोई अच्छा और ठोस कदम नहीं उठा पाए। और यही कारण था कि किसी ने भी उस दिन डिस्ट्रेस कॉल या मेडे कॉल नहीं किया। अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे उस दिन एक झटके में शिप पर मौजूद 42 लोगों
की जान चली गई होगी। कोई शिप के मलबे के अंदर दबकर मर गया तो किसी को समुद्र ने अपने आगोश में ले लिया होगा और तो और काफी समय तक मदद की गुहार लगाते रहे होंगे कुछ लोग। लेकिन उस खौफनाक समंदर में भयंकर तूफान के आगे उनमें से किसी की भी एक ना चली होगी और वह निर्दोष होते हुए भी इस निर्मम घटना का शिकार हो गए होंगे। तो 1994 के इन्वेस्टिगेशन के बाद साल 2007 में सेलर और लेखक क्रैक बी स्मिथ ने भी उन एक्सपर्ट्स के दावों की पुष्टि की। उनके स्टडी से यह पता
चला कि उस रात जहाज को 20 मीटर ऊंचे पानी का दबाव सहना पड़ा जो कि हैच के डिजाइन लिमिट से 10 गुना अधिक था। यह दबाव इतना अधिक था कि हैचों का कोलैप्स होना निश्चित हो गया था और ऊपर से तेज गति वाली लहरों ने ट्रांजिएंट इंपल्स प्रेशर उत्पन्न किया जिन्हें गिफली पीक्स कहा जाता है और यह दबाव जहाज के स्टील बॉडी को फ्रैक्चर करने के लिए पर्याप्त थे। इसी के साथ ही स्मिथ ने यह डॉक्यूमेंट भी किया कि उस रात हाइड्रोडायनेमिक प्रेशर 5650 किलोपास्कल्स या 500 मेट्रिक टन्स प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच सकता था
और यही डरवी शायर पर हुआ। यानी कि इसमें कोई दो राय नहीं थी कि यह सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं थी बल्कि इसके पीछे शिप बनाने वाली कंपनी की कमियां भी शामिल थी। और यही कारण है कि इस इंसिडेंट के बाद सिविल क्लेम्स में मृतकों के रिलेटिव्स को कंपनसेशन दिया गया और साथ ही साथ समुद्री सुरक्षा के मानकों में भी कई बदलाव लाए गए। जैसे कि इसके बाद हैच और हल डिजाइन पर कठोर परीक्षण अनिवार्य किया गया। इसको लेकर इंस्पेक्शन प्रोसीजर सख्त किए गए और फ्यूचर ओबीओ कैरियर्स की सेफ्टी गाइडलाइंस में भी सुधार हुआ। वहीं
डरवी शायर और उस पर मौजूद लोगों की याद में कई मेमोरियल्स बनाए गए। 21 सितंबर 1980 को बीबी लाइन की जहाज कैंब्रिज शायर ने उस क्षेत्र में मेमोरियल सर्विस आयोजित की जहां डरवी शायर डूबी थी। इसके बाद 20वीं सालगिरह पर लिवर पूल इंग्लैंड में डेपुटी प्राइम मिनिस्टर जॉन पेस्कॉट की उपस्थिति में एक विशेष मेमोरियल सर्विस हुई। और फिर 30वीं सालगिरह पर भी जहाज के होमपोर्ट लिवर पूल में फैमिलीज और सी कम्युनिटीज ने भी इसे ट्रिब्यूट दिया। 15 सितंबर 2018 को इसको लेकर चर्च ऑफ आवर लेडी एंड सेंट निकोलस लिवर पूल के बगीचे में एक स्थाई
स्मारक स्थापित किया गया जो हमेशा इस घटना और वहां खोई गई 42 जानों [संगीत] की याद दिलाता रहेगा। तो दोस्तों एमवी डर्विशायर आज केवल एक जहाज नहीं रहा। आज यह सुरक्षा, सतर्कता और पर्सेंस का प्रतीक बन चुकी है। इसके लेसंस ने ना केवल नए जहाजों के डिजाइन और कंस्ट्रक्शन में सुधार किया बल्कि समुद्री जीवन और जोखिम के इंडस्ट्रीज की भी सोच बदल दी। तो, यह थी कहानी अनशंकेबल शिप एमवी डरबी शायर की। अगर आपको यह पसंद आई हो तो इसे लाइक और शेयर जरूर करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें ताकि आप ऐसे
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