क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया में सिर्फ कुछ लोग ही अमीर क्यों बनते हैं? जबकि करोड़ों लोग पूरी जिंदगी मेहनत करने के बाद भी वहीं के वहीं रह जाते हैं। असल फर्क पैसे में नहीं होता। असल फर्क होता है सोच में, आदतों में और फ्री टाइम के इस्तेमाल में। क्योंकि सच यही है आपका फ्री टाइम ही आपकी फ्यूचर लाइफ डिजाइन करता है। और आज इस वीडियो में मैं आपको 10 ऐसे पावरफुल काम बताने वाला हूं जो अगर आपने अपने फ्री टाइम में करना शुरू कर दिया तो आपकी जिंदगी सच में बदल सकती है और
आखिर में एक ऐसा बोनस दूंगा जो आपका माइंडसेट ही बदल देगा। तो बिना किसी डिस्ट्रैक्शन के इस वीडियो को अंत तक जरूर देखिए। पॉइंट एक स्किल सीखो। अगर आज अचानक आपका काम खत्म हो जाए। अगर जिस चीज पर आप अभी डिपेंड हैं वो एक पल में आपसे छिन जाए तो क्या आप फिर से खड़े हो पाएंगे या फिर आप वहीं रुक जाएंगे। कंफ्यूज्ड, लॉस्ट और दूसरों पर डिपेंड। यह सवाल सुनने में सिंपल लगता है। लेकिन इसकी सच्चाई बहुत गहरी है क्योंकि आज की दुनिया में सबसे बड़ा रिस्क यह नहीं है कि आपके पास जॉब नहीं
है। सबसे बड़ा रिस्क यह है कि आपके पास स्किल नहीं है। सोचिए एक इंसान जिसके पास 10 साल का एक्सपीरियंस है लेकिन कोई नई स्किल नहीं और दूसरी तरफ एक इंसान जिसके पास दो-ती साल का एक्सपीरियंस है लेकिन उसने अपने आप को लगातार अपग्रेड किया है। आपको क्या लगता है? आने वाले समय में कौन आगे बढ़ेगा? सच थोड़ा कड़वा है लेकिन क्लियर है आज के समय में डिग्री नहीं स्किल पैसा कमाती है क्योंकि डिग्री सिर्फ एक एंट्री देती है। लेकिन स्किल आपको वैल्यू देती है और दुनिया हमेशा वैल्यू के लिए पे करती है। टाइम के
लिए नहीं एफर्ट के लिए नहीं सिर्फ वैल्यू के लिए। अब जरा अपने दिन को ऑब्जर्व करो। जब तुम्हारा काम खत्म हो जाता है, जब तुम्हारे पास एकद घंटे का फ्री टाइम होता है, तब तुम क्या करते हो? मोबाइल स्क्रॉल, रियल्स, रैंडम वीडियोस या फिर कुछ ऐसा सीखते हो जो तुम्हें आगे ले जाए। यही वो पॉइंट है जहां डिफरेंस शुरू होता है। एवरेज और सक्सेसफुल इंसान के बीच। सक्सेसफुल लोग फ्री टाइम को फ्री नहीं मानते। वो उसे इन्वेस्टमेंट मानते हैं। हर एक घंटा जो वह सीखने में लगाते हैं, वह उनके फ्यूचर की अर्निंग बन जाता है।
यही वजह है कि वारेन बफेट जैसे लोग आज भी सीखना नहीं छोड़ते। उन्होंने एक बहुत पावरफुल बात कही थी। रिस्क कम्स फ्रॉम नॉट नोइंग व्हाट यू आर डूइंग। यानी असली रिस्क मार्केट में नहीं है। कंपटीशन में नहीं है। असली रिस्क है। इग्नोरेंस स्किल की कमी। अब एक और सच्चाई समझो। दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। जो स्किल आज वैल्यूुएबल है। हो सकता है 5 साल बाद उसकी वैल्यू खत्म हो जाए। ऑटोमेशन आ रहा है। एआई आ रहा है और यह सब उन लोगों को रिप्लेस कर देगा जो खुद को अपडेट नहीं करते। लेकिन जो
लोग सीखते रहते हैं जो खुद को अपग्रेड करते रहते हैं उन्हें कोई रिप्लेस नहीं कर सकता। क्योंकि वो सिचुएशन के हिसाब से खुद को बदल लेते हैं। अब सवाल आता है कौन सी स्किल्स सीखनी चाहिए? ऐसी स्किल्स जो फ्यूचर प्रूफ हो जो डिमांड में हो और जो आपको इंडिपेंडेंट बना सकके जैसे प्रोग्रामिंग, वीडियो एडिटिंग, कॉपीराइटिंग, पब्लिक स्पीकिंग यह सिर्फ स्किल्स नहीं है। यह अर्निंग टूल्स हैं। लेकिन इन सबके बीच एक स्किल ऐसी है जो सबसे ज्यादा पावरफुल है। फाइनेंशियल एजुकेशन क्योंकि अगर आपने पैसे कमाना सीख लिया लेकिन उसे संभालना नहीं सीखा तो पैसा आएगा भी
और चला भी जाएगा। फाइनेंशियल एजुकेशन आपको सिखाती है। पैसा कैसे काम करता है। कैसे पैसा आपके लिए काम कर सकता है? और कैसे आप धीरे धीरे फाइनेंशियल फ्रीडम की तरफ बढ़ सकते हैं। अब इमेजिन करो अगर आप रोज सिर्फ 30-60 मिनट सिर्फ इतना सा टाइम YouTube, बुक्स या कोर्सेज से कुछ नया सीखने में लगाओ तो 1 साल बाद आप वही इंसान नहीं रहोगे जो आज हो। आपकी सोच बदल जाएगी। आपका कॉन्फिडेंस बढ़ जाएगा। आपकी वैल्यू मार्केट में बढ़ जाएगी और सबसे इंपॉर्टेंट आपके पास ऑप्शंस होंगे एनडी और जिंदगी में सबसे पावरफुल चीज क्या है? ऑप्शंस।
जब आपके पास ऑप्शंस होते हैं तब आप मजबूर नहीं होते। तब आप चूज़ करते हो। तो अगली बार जब आपके पास फ्री टाइम हो तो खुद से एक सवाल जरूर पूछना। क्या मैं इसे सिर्फ टाइम पास में बर्बाद कर रहा हूं या इसे अपनी लाइफ अपग्रेड करने में लगा रहा हूं? क्योंकि याद रखो आज आप जो स्किल सीखते हो वही कल आपकी इनकम, आपकी आइडेंटिटी और आपकी पूरी लाइफ डिफाइन करती है। पॉइंट दो हेल्थ पर काम करो। अगर आपका शरीर आपका साथ नहीं दे रहा तो सच मानिए आपके सारे सपने अधूरे रह जाएंगे। आप करोड़ों
कमा सकते हैं। आप नाम, फेम, सक्सेस सब हासिल कर सकते हैं। लेकिन अगर आपकी बॉडी ही थक चुकी है। अगर आपका माइंड ही कास्टेंटली स्ट्रेस्ड और टायर्ड है, तो आप उस सक्सेस को जी ही नहीं पाएंगे। यही वजह है कि कहा जाता है हेल्थ इज रियल वेल्थ। और यह सिर्फ एक कोर्ट नहीं है। यह एक हारश रियलिटी है जिसे हम अक्सर इग्नोर कर देते हैं। हम सोचते हैं अभी मेहनत कर लेते हैं। बाद में हेल्थ देख लेंगे। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि हेल्थ बाद में ठीक नहीं होती। हेल्थ या तो मेंटेन होती है या धीरे
धीरे खत्म होती है। अब जरा ईमानदारी से सोचिए दिन के 24 घंटे में से आप अपने शरीर को कितना समय देते हैं और कितना समय मोबाइल, सोशल मीडिया और बेवजह की चीजों में चला जाता है। सच थोड़ा अनकंफर्टेबल है। हम कहते हैं टाइम नहीं है। लेकिन रियलिटी यह है कि हमारी प्रायोरिटीज गलत है। क्योंकि उसी इंसान के पास जो कहता है कि एक्सरसाइज का टाइम नहीं है। दो-ती घंटे स्क्रॉलिंग के लिए होते हैं। यही वह जगह है जहां एक एवरेज इंसान और एक डिसिप्लिंड इंसान अलग हो जाते हैं। डिसिप्लिंड इंसान अपने फ्री टाइम का एक
हिस्सा अपनी हेल्थ को देता है। वो जानता है कि यह टाइम वेस्ट नहीं है। यह सबसे पावरफुल इन्वेस्टमेंट है और इन्वेस्टमेंट भी ऐसा जिसका रिटर्न कंपाउंड होता है। आज की छोटी सी एक्सरसाइज कल आपकी एनर्जी बनती है। आज का मेडिटेशन कल आपकी क्लेरिटी बनता है। आज का डिसिप्लिन कल आपकी लॉन्ग टर्म परफॉर्मेंस बनता है। वारेन बफेट ने एक बार बहुत गहरी बात कही थी। टेक केयर ऑफ योर बॉडी। इट्स द ओनली प्लेस यू हैव टू लिव। जरा इस लाइन को समझिए। आपके पास घर बदलने का ऑप्शन है। जॉब बदलने का ऑप्शन है। सिटी बदलने का
ऑप्शन है। लेकिन बॉडी या सिर्फ एक ही है। और इसी में आपको पूरी जिंदगी रहना है। अब इमेजिन कीजिए। आप एक बहुत एक्सपेंसिव कार खरीदते हो। लेकिन उसमें कभी फ्यूल नहीं डालते। कभी सर्विसिंग नहीं कराते तो क्या होगा? धीरे-धीरे वह कार खराब हो जाएगी। चाहे वह कितनी भी महंगी क्यों ना हो। आपकी बॉडी भी वही कार है जो आपको आपकी डेस्टिनेशन तक लेकर जाएगी। अगर वही खराब हो गई तो रास्ता कितना भी अच्छा क्यों ना हो आप आगे नहीं बढ़ पाएंगे। अब हेल्थ पर काम करने का मतलब यह नहीं है कि आपको जिम में जाकर
घंटों मेहनत करनी है या फिर बॉडी बिल्डर जैसी फिजिक बनानी है। नहीं सिर्फ 20-30 मिनट की सिंपल एक्टिविटी ही काफी है। जैसे वॉकिंग, लाइट एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग, ए और साथ में 10 मिनट का मेडिटेशन। यह छोटी-छोटी हैबिट्स आपकी जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव लाती हैं। यह आपकी बॉडी को एक्टिव रखती हैं। आपके माइंड को कैल्प करती हैं और आपको पूरे दिन के लिए एनर्जी देती हैं। अब यहां एक बहुत इंटरेस्टिंग कांसेप्ट आता है। आपकी बॉडी एंटीफजाइल होती है। मतलब जब आप उसे थोड़ा स्ट्रेस देते हैं। जैसे एक्सरसाइज तो शुरुआत में दर्द होता है, थकान होती है।
लेकिन धीरे-धीरे वही बॉडी स्ट्रांग बनने लगती है। आपकी स्टैमिना बढ़ती है। आपकी इम्यूनिटी स्ट्रांग होती है और आपका फोकस इंप्रूव होता है। लेकिन अगर आप अपनी बॉडी को यूज ही नहीं करते, कोई मूवमेंट नहीं, कोई एक्टिविटी नहीं तो धीरे-धीरे वो वीक होने लगती है और यही वो साइलेंट डैमेज है जो हमें धीरे-धीरे पीछे खींचता है। अब एक और बात समझिए। सक्सेस सिर्फ हार्ड वर्क से नहीं आती। सक्सेस आती है कंसिस्टेंसी से और कंसिस्टेंसी तभी पॉसिबल है जब आपकी हेल्थ सही हो। अगर आप मेंटली एग्जॉस्टेड हो, फिजिकली टायर्ड हो, तो आप लॉन्ग टर्म में कुछ भी
अचीव नहीं कर सकते। इसलिए स्मार्ट लोग सिर्फ काम पर फोकस नहीं करते। वो अपनी एनर्जी पर फोकस करते हैं क्योंकि उन्हें पता है एनर्जी हाई होगी तो परफॉर्मेंस ऑटोमेटिकली हाई होगी। तो अगली बार जब आपके पास फ्री टाइम हो तो उसे सिर्फ एंटरटेनमेंट में वेस्ट मत कीजिए। उसमें से थोड़ा सा हिस्सा अपनी हेल्थ को दीजिए क्योंकि यह वही इन्वेस्टमेंट है जो आपको लाइफ भर रिटर्न देता रहेगा और याद रखिए वीक बॉडी स्ट्रांग ड्रीम्स को संभाल नहीं सकती। अगर आपको बड़े सपने पूरे करने हैं तो सबसे पहले अपने शरीर को मजबूत बनाना होगा क्योंकि अंत में
आपकी बॉडी ही वो व्हीकल है जो आपको आपकी सक्सेस तक लेकर जाएगी। पॉइंट तीन बुक्स पढ़ो। जरा एक पल के लिए सोचिए। अगर आपको दुनिया के सबसे सक्सेसफुल लोगों के दिमाग के अंदर झांकने का मौका मिल जाए। अगर आप उनके सालों के एक्सपीरियंस, उनकी गलतियां, उनकी स्ट्रेटजीस सब कुछ ही घंटों में सीख सकें, तो क्या आप उस मौके को छोड़ेंगे? शायद नहीं। और यही पावर होती है किताबों की। बुक्स सिर्फ कागज और शब्द नहीं होती। यह कंडेंस्ड एक्सपीरियंस होती हैं। सालों की मेहनत, फेलियर्स, सीख सब कुछ एक जगह इकट्ठा करके आपको दे दिया जाता है।
अब एक सिंपल सच्चाई समझिए। इस दुनिया में कोई भी इंसान जीरो से स्टार्ट करके सब कुछ खुद नहीं सीखता। हर सक्सेसफुल इंसान किसी ना किसी से सीखता है। और सबसे पावरफुल तरीका क्या है सीखने का? रीडिंग। क्योंकि रीडिंग आपको डायरेक्टली उन लोगों से कनेक्ट करती है जो उस रास्ते पर पहले चल चुके हैं जहां आप अभी जाना चाहते हैं। वारेन बफेट को ही देख लीजिए। दुनिया के सबसे सक्सेसफुल इन्वेस्टर्स में से एक। लेकिन वो खुद अपनी सक्सेस का क्रेडिट किसे देते हैं? बुक्स को और अपने मेंटर को। उन्होंने एक बार कहा था रीड 500 पेजेस
एवरीडे। दैट्स हाउ नॉलेज वर्क्स। इट बिल्ड्स अप लाइक कंपाउंड इंटरेस्ट। इट बिल्ड्स अप आप और जरा इस लाइन को समझिए। नॉलेज भी कंपाउंड होता है। जैसे पैसा इंटरेस्ट से बढ़ता है वैसे ही नॉलेज रीडिंग से बढ़ता है। आज आप 10 पेजेस पढ़ते हैं। कल 20 पेजेस धीरे-धीरे आपका दिमाग एक्सपेंड होने लगता है। आप चीजों को अलग तरीके से देखने लगते हैं। आपकी थिंकिंग लेवल चेंज हो जाती है। अब एक बहुत इंपॉर्टेंट बात समझिए। ज्यादातर लोग लाइफ में फेल इसलिए नहीं होते क्योंकि वह मेहनत नहीं करते बल्कि इसलिए क्योंकि वह सही डायरेक्शन में मेहनत नहीं करते
और किताबें आपको वही डायरेक्शन देती हैं। जब आप एक अच्छी किताब पढ़ते हैं तो आप सिर्फ कहानी नहीं पढ़ रहे होते। आप सीख रहे होते हैं कैसे सोचना है? कैसे डिसीजंस लेने हैं? कैसे प्रॉब्लम्स को सॉल्व करना है। आपको यह समझ आता है कि दूसरों ने किन गलतियों की वजह से टाइम, पैसा और एनर्जी खोई और आप उन गलतियों से बच सकते हैं। बिना खुद वो गलती किए। यही असली शॉर्टकट है। अब जरा सोचिए। एक इंसान है जो हर चीज खुद ट्राई करके सीखता है। इंडस्ट्रेट बाय ब्रॉपडाउन। हर बार गिरता है। फिर उठता है और
दूसरा इंसान है जो बुक्स पढ़कर पहले ही समझ जाता है। क्या काम करता है और क्या नहीं? आपको क्या लगता है? कौन जल्दी आगे बढ़ेगा? साफ जवाब है जो पढ़ता है क्योंकि वह दूसरों की लाइफ को ऑब्जर्व करके अपनी लाइफ को स्मार्ट तरीके से डिजाइन करता है। अब एक और पावरफुल बात 100 200 की एक किताब आपको ऐसी नॉलेज दे सकती है जो आपको लाखों करोड़ों कमाने की सोच दे दे। लेकिन आयरनी क्या है? लोग 500 की मूवी देखने में हेजिटेट नहीं करते। 1000 खाने पर खर्च कर देते हैं। लेकिन जब बात आती है किताब
खरीदने की तो सोचते हैं बाद में लेंगे। यही फर्क है एवरेज माइंडसेट और ग्रोथ माइंडसेट के बीच। एवरेज लोग एंटरटेनमेंट में इन्वेस्ट करते हैं। सक्सेसफुल लोग नॉलेज में इन्वेस्ट करते हैं। अब रीडिंग का मतलब यह नहीं है कि आपको रोज घंटों बैठना है। सिर्फ 20-30 मिनट डेली भी काफी है। लेकिन कंसिस्टेंसी जरूरी है। क्योंकि रीडिंग एक हैबिट है और हैबिट्स ही आपकी लाइफ बनाती हैं। धीरे-धीरे आपका वोकैबलरी इंप्रूव होगा। आपकी थिंकिंग डीप होगी। आपका कॉन्फिडेंस बढ़ेगा। और सबसे इंपॉर्टेंट आप भीड़ से अलग सोचने लगेंगे। और जो इंसान अलग सोचता है वही अलग अचीव करता है।
अब अगली बार जब आप मोबाइल उठाएं और बिना सोचे स्क्रॉल करने लगे। तो एक बार रुकिए और खुद से पूछिए। क्या यह मुझे आगे ले जा रहा है? यह सिर्फ मेरा टाइम खा रहा है क्योंकि वही 30 मिनट अगर आप एक अच्छी किताब को दे दें तो वह आपके पूरे फ्यूचर की डायरेक्शन बदल सकता है। याद रखिए एक बुक्स सिर्फ इंफॉर्मेशन नहीं देती। वो ट्रांसफॉर्मेशन देती हैं और फर्क सिर्फ इतना है। आप उन्हें पढ़ते हैं या इग्नोर करते हैं? पॉइंट चार एक्स्ट्रा इनकम बनाओ। जरा एक पल के लिए अपने आप से एक सीधा सवाल पूछिए।
क्या आप अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ एक ही इनकम सोर्स पर डिपेंड रहकर बिताना चाहते हैं? सुबह उठना, ऑफिस जाना, 8-10 घंटे काम करना और महीने के आखिर में एक फिक्स्ड सैलरी मिलना। फिर वही साइकिल, बार सालों तक। क्या यही आपकी जिंदगी का फाइनल प्लान है? अगर आपका जवाब नहीं है तो आपको एक बात अभी समझनी होगी। एक इनकम एक रिस्क है। क्योंकि जिस दिन वह इनकम बंद हुई उस दिन आपकी पूरी फाइनेंशियल स्टेबिलिटी हिल सकती है। जॉब सुरक्षित लगती है। लेकिन रियलिटी यह है कि जॉब भी गारंटेड नहीं है। कंपनी बदल सकती है, मार्केट बदल
सकता है, सिचुएशंस बदल सकती हैं। और अगर आपने सिर्फ एक ही सोर्स पर भरोसा किया है तो आप मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि स्मार्ट लोग सिर्फ एक इनकम पर डिपेंड नहीं रहते। वह मल्टीपल इनकम सोर्सेस बनाते हैं और यह कोई लग्जरी नहीं है। यह आज के समय की जरूरत है। अब जरा इमेजिन कीजिए। अगर आपकी सैलरी के अलावा आपके पास एक और इनकम हो चाहे छोटी ही क्यों ना हो तो आपकी सोच बदल जाएगी। आप डिसीजंस डर से नहीं कॉन्फिडेंस से लेने लगेंगे। आप जॉब को मजबूरी नहीं चॉइस की तरह देखेंगे। यही
असली फ्रीडम है और यही फ्रीडम आपको साइड हसल देता है। अब साइड हसल का मतलब यह नहीं है कि आपको कुछ बहुत बड़ा या कॉम्प्लेक्स शुरू करना है। आपको बस शुरुआत करनी है। छोटी इंपपरफेक्ट लेकिन रियल आज के टाइम में ओपोरर्चुनिटीज की कमी नहीं है। इंटरनेट है, स्मार्टफोन है और इंफॉर्मेशन फ्री में अवेलेबल है। फिर भी ज्यादातर लोग क्या करते हैं? इन सबका इस्तेमाल सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए करते हैं। लेकिन कुछ लोग इन्हीं टूल्स को इनकम में बदल देते हैं। YouTube, फ्रीलांसिंग, ऑनलाइन सर्विज यह सिर्फ प्लेटफॉर्म्स नहीं है। यह ओपोरर्चुनिटीज हैं जो आपकी जिंदगी बदल
सकती हैं। वारेन बफेट ने एक बहुत पावरफुल बात कही थी। इफ यू डोंट फाइंड अ वे टू मेक मनी व्हाइल यू स्लीप। यू विल वर्क अनटिल यू डाई। जरा इस लाइन को फील कीजिए। अगर आपका इनकम सिर्फ तब आता है जब आप काम कर रहे होते हैं तो आप हमेशा टाइम के बदले पैसे कमा रहे हैं और टाइम लिमिटेड है। लेकिन जब आप ऐसा सिस्टम बना लेते हैं जो आपके बिना भी इनकम जनरेट करता है तब आप असली गेम में एंटर करते हैं। यही साइड हसल का पर्पस है। धीरे धीरे आपको एक्टिव इनकम से पैसिव
इनकम की तरफ ले जाना। अब एक और सच्चाई शुरुआत आसान नहीं होगी। आपका पहला काम परफेक्ट नहीं होगा। पहली अर्निंग बहुत छोटी होगी। पहले रिजल्ट्स देर से आएंगे और यही वह स्टेज है जहां ज्यादातर लोग रुक जाते हैं। वो सोचते हैं यह मेरे बस की बात नहीं है। लेकिन जो लोग आगे बढ़ते हैं वो कंसिस्टेंसी रखते हैं। वो समझते हैं कि शुरुआत स्लो है। लेकिन ग्रोथ पॉसिबल है। हर दिन थोड़ा-थोड़ा इंप्रूवमेंट हर दिन थोड़ा थोड़ा एफर्ट धीरे। धीरे एक सिस्टम बनाता है और एक दिन वही सिस्टम इनकम जनरेट करना शुरू कर देता है। अब इमेजिन
कीजिए आपका एक छोटा सा साइड हसल जो आपने फ्री टाइम में शुरू किया था वही धीरे-धीरे इतना ग्रो हो जाए कि वह आपकी मेन इनकम को रिप्लेस कर दे। तब क्या होगा? तब आप मजबूरी में नहीं अपनी टर्म्स पर जीना शुरू करेंगे। आपको किसी के ऑर्डर्स फॉलो करने की जरूरत नहीं होगी। आप अपने डिसीजंस खुद ले पाएंगे और यही असली इंडिपेंडेंस है। लेकिन यह सब सिर्फ सोचने से नहीं होगा। इसके लिए एक्शन लेना पड़ेगा। और एक्शन का बेस्ट टाइम कब है? अभी परफेक्ट टाइम कभी नहीं आता। आपको इंपपरफेक्ट शुरुआत करनी होती है। तो अगली बार
जब आपके पास फ्री टाइम हो तो उसे सिर्फ स्क्रॉल करने में वेस्ट मत कीजिए। उसे एक सीड की तरह यूज कीजिए जो आज छोटा है। लेकिन कल एक बड़ा ट्री बन सकता है। याद रखिए एक्स्ट्रा इनकम सिर्फ पैसे के लिए नहीं होती। यह फ्रीडम के लिए होती है और वह फ्रीडम आपको कोई गिफ्ट में नहीं देगा। आपको खुद बनानी पड़ेगी। पॉइंट पांच स्ट्रांग नेटवर्क बनाओ। जरा एक पल के लिए अपनी जिंदगी को पीछे मुड़कर देखिए। आपको जो भी मौके मिले हैं, जो भी छोटे बड़े बदलाव आपकी लाइफ में आए हैं, क्या वह सिर्फ आपकी मेहनत
की वजह से आए थे? या फिर कहीं ना कहीं किसी इंसान ने, किसी कनेक्शन ने, किसी सही समय पर मिले व्यक्ति ने उसमें एक रोल प्ले किया था। अगर आप ईमानदारी से सोचेंगे तो आपको जवाब मिल जाएगा। लाइफ में सिर्फ क्या जानते हो यह मायने नहीं रखता। किसे जानते हो यह भी उतना ही जरूरी है क्योंकि नॉलेज आपको रास्ता दिखाती है लेकिन नेटवर्क आपको मौके देता है और कई बार आपकी जिंदगी का सबसे बड़ा ब्रेक आपके टैलेंट से नहीं आपके कनेक्शन से आता है। अब जरा दुनिया के सक्सेसफुल लोगों को देखिए। चाहे वह बिजनेसमैन हो,
एंटरप्रेन्य योर होम या इन्वेस्टर। उनके पास एक चीज कॉमन होती है। स्ट्रांग नेटवर्क। ऐसे लोग जो उनसे आगे हैं जो उन्हें पुश करते हैं जो उन्हें नई ओपोरर्चुनिटीज से कनेक्ट करते हैं। वारेन बफेट ने भी इस बात को बहुत क्लियरली समझा था। उन्होंने एक बार कहा था सराउंड योरसेल्फ वि पीपल हु आर बेटर देन यू। यू विल ड्रिफ्ट इन दैट डायरेक्शन। इस लाइन को अगर आप गहराई से समझें तो यह आपकी पूरी लाइफ बदल सकती है। आप कॉन्शियसली या अनकॉन्शियसली उन लोगों जैसे बनने लगते हैं जिनके साथ आप सबसे ज्यादा समय बिताते हैं। अगर आपके
आसपास ऐसे लोग हैं जो हर समय कंप्लेन करते हैं जो एक्सक्यूसेस ढूंढते हैं जो ग्रोथ के बारे में सोचते ही नहीं तो धीरे-धीरे आपकी थिंकिंग भी वैसी ही हो जाएगी। आपको लगेगा कि यही नॉर्मल है, यही जिंदगी है और यही आपकी ग्रोथ को लिमिट कर देगा। लेकिन अगर आप अपने आप को ऐसे लोगों के बीच रखते हैं जो बड़े सपने देखते हैं, जो मेहनत करते हैं, जो सीखते हैं, जो रिस्क लेने से डरते नहीं, तो धीरे-धीरे आपकी सोच बदलने लगती है। आपको नए आइडियाज मिलने लगते हैं। आपको नए पर्सपेक्टिव्स दिखने लगते हैं और सबसे इंपॉर्टेंट
आपको ओपोरर्चुनिटीज दिखने लगती हैं जो पहले कभी दिखती ही नहीं थी। यही नेटवर्क की असली पावर है। नेटवर्क सिर्फ कांटेक्ट्स की लिस्ट नहीं होता। यह माइंडसेट का एनवायरनमेंट होता है। एक ऐसा एनवायरनमेंट जो आपको या तो ऊपर उठाता है या नीचे खींचता है। अब जरा अपने फ्री टाइम के बारे में सोचिए। आप उसे कैसे स्पेंड करते हैं? अकेले मोबाइल स्क्रॉल करते हुए या उन्हीं लोगों के साथ जो आपकी ग्रोथ में कोई वैल्यू ऐड नहीं कर रहे। अगर ऐसा है तो धीरे-धीरे आप उसी कंफर्ट ज़ोन में फंस जाएंगे। जहां ग्रोथ बहुत स्लो होती है या बिल्कुल
नहीं होती। लेकिन अगर आप कॉन्शियस डिसीजन लेते हैं कि मैं अपने एनवायरमेंट को चेंज करूंगा तो आपकी लाइफ की डायरेक्शन बदल सकती है। आज के डिजिटल टाइम में नेटवर्क बनाना पहले से कहीं ज्यादा आसान है। आप ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर कनेक्ट कर सकते हैं। कम्युनिटीज ज्वॉइ कर सकते हैं। इवेंट्स अटेंड कर सकते हैं। या फिर अपने आसपास ऐसे लोगों का सर्कल बना सकते हैं जो ग्रोथ माइंडसेट रखते हैं। शुरुआत में यह अनकंफर्टेबल लगेगा। आपको लगेगा कि आप फिट नहीं हो रहे। आपको हेजिटेशन होगी। लेकिन यही डिसकंफर्ट आपकी ग्रोथ की शुरुआत है। क्योंकि ग्रोथ हमेशा कंफर्ट जोन
के बाहर होती है। अब एक बहुत पावरफुल बात आप उन पांच लोगों का एवरेज बन जाते हैं जिनके साथ आप सबसे ज्यादा समय बिताते हैं। यह सिर्फ एक कोर्ट नहीं है। यह एक साइकोलॉजिकल रियलिटी है। आपकी हैबिट्स, आपकी सोच, आपके डिसीजंस, सब कुछ आपके एनवायरमेंट से प्रभावित होते हैं। तो अगर आप फास्ट ग्रो करना चाहते हैं तो आपको अपने आसपास सही लोग रखने होंगे क्योंकि गलत लोग स्लो ग्रोथ सही लोग एज फास्ट सक्सेस। अब अगली बार जब आपके पास फ्री टाइम हो तो उसे सिर्फ अकेले वेस्ट मत कीजिए। उस टाइम को इन्वेस्ट कीजिए। ऐसे लोगों
के साथ जो आपको इंस्पायर करते हैं जो आपको चैलेंज करते हैं जो आपको बेहतर बनाते हैं क्योंकि अंत में सही लोग सिर्फ आपकी सोच नहीं बदलते। वो आपकी पूरी जिंदगी की डायरेक्शन बदल सकते हैं। पॉइंट छह कम्युनिकेशन स्किल इंप्रूव करो। जरा एक सिचुएशन इमेजिन कीजिए। आपके पास एक बहुत ही पावरफुल आईडिया है। आपने उस पर काम किया है। आपके पास नॉलेज भी है, स्किल भी है। लेकिन जब आप उसे किसी के सामने रखते हैं तो सामने वाला इंप्रेस ही नहीं होता। वो आपकी बात को सीरियसली नहीं लेता। उसे वह इंपैक्ट महसूस ही नहीं होता जो
होना चाहिए था। अब खुद से एक सवाल पूछिए। क्या सच में आपके आईडिया में कमी थी या फिर उसे बताने के तरीके में? यही वो जगह है जहां कम्युनिकेशन स्किल की असलीेंस सामने आती है। क्योंकि आज के समय में सिर्फ नॉलेज होना काफी नहीं है। आपको यह भी आना चाहिए कि अपनी बात को इस तरह कैसे रखा जाए कि सामने वाला उसे समझे भी महसूस भी करें और उस पर एक्शन भी ले। यही स्किल एक आम इंसान और एक इन्फ्लुएंशियल इंसान के बीच फर्क बनाती है। अब जरा ऑब्जर्व कीजिए। आपने ऐसे बहुत सारे लोग देखे
होंगे जो अंदर से बहुत टैलेंटेड होते हैं। उनके पास शानदार आइडियाज होते हैं। लेकिन वो उन्हें एक्सप्रेस नहीं कर पाते। और दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास एवरेज नॉलेज होती है लेकिन उनकी कम्युनिकेशन इतनी स्ट्रांग होती है कि वह हर जगह अटेंशन गैब कर लेते हैं। लोग उनकी बात सुनते हैं। उन पर ट्रस्ट करते हैं और उनके साथ काम करना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि कम्युनिकेशन क्लेरिटी देता है और क्लेरिटी ट्रस्ट बनाती है। वारेन बफेट ने कम्युनिकेशन के बारे में एक बहुत पावरफुल बात कही थी। इफ यू कांट कम्युनिकेट एंड टॉक टू अदर
पीपल इट्स लाइक विंकिंग एट अ गर्ल इन द डार्क नथिंग हैपेंस। इस लाइन को समझिए। आपके पास कितना भी नॉलेज क्यों ना हो अगर आप उसे लोगों तक पहुंचा नहीं सकते तो उसका कोई इंपैक्ट नहीं होगा। वो नॉलेज सिर्फ आपके दिमाग तक लिमिटेड रह जाएगा। अब जरा लाइफ के डिफरेंट एरियाज में कम्युनिकेशन को देखिए। जॉब में, इंटरव्यू में, मीटिंग्स में, बिजनेस में, क्लाइंट्स के साथ, टीम के साथ, पर्सनल लाइफ में, रिलेशनशिप्स में, हर जगह कम्युनिकेशन ही आपकी आइडेंटिटी बनाता है। आप कैसे बोलते हैं? कैसे समझाते हैं? कैसे अपनी बात रखते हैं? इसी से लोग डिसाइड
करते हैं। आप कॉन्फिडेंट हैं या नहीं? आप कैपेबल हैं या नहीं? आप ट्रस्टव्थी हैं या नहीं? अब इमेजिन कीजिए। अगर आप अपनी कम्युनिकेशन स्किल को इंप्रूव कर लेते हैं तो क्या बदलेगा? आप मीटिंग्स में चुप नहीं रहेंगे। आप अपने आइडियाज कॉन्फिडेंटली रख पाएंगे। आप इंटरव्यू में खुद को बेहतर प्रेजेंट कर पाएंगे। आप लोगों को कन्विंस कर पाएंगे। और सबसे इंपॉर्टेंट लोग आपको सीरियसली लेना शुरू कर देंगे। अब सवाल आता है कम्युनिकेशन इंप्रूव कैसे करें? यह कोई ओवरनाइट स्किल नहीं है। यह प्रैक्टिस से आती है। आप अपने फ्री टाइम में अपने थॉट्स को लिख सकते हैं।
खुद से बोलने की प्रैक्टिस कर सकते हैं। मिरर के सामने प्रैक्टिस कर सकते हैं। अपनी वॉइस रिकॉर्ड करके सुन सकते हैं। शुरुआत में ऑकवर्ड लगेगा। आपको लगेगा कि आप अच्छा नहीं बोल पा रहे हैं। लेकिन धीरेधीरे आपका कॉन्फिडेंस बिल्ड होगा। आप वर्ड्स को बेटर चूज़ करना सीखेंगे। आप अपने आइडियाज को स्ट्रक्चर करना सीखेंगे। और सबसे इंपॉर्टेंट आप लोगों से कनेक्ट करना सीखेंगे क्योंकि कम्युनिकेशन सिर्फ बोलने का नाम नहीं है। यह कनेक्शन बनाने का स्किल है। जब आप किसी से बात करते हैं तो सिर्फ इंफॉर्मेशन नहीं देते। आप एक फीलिंग क्रिएट करते हैं और वही फीलिंग
डिसाइड करती है कि सामने वाला आपको सुनेगा, समझेगा या इग्नोर कर देगा। अब एक और पावरफुल बात आज के टाइम में अगर आप कंटेंट क्रिएट करना चाहते हैं YouTube, सोशल मीडिया तो कम्युनिकेशन आपके लिए गेम चेंजर है क्योंकि वहां वही लोग ग्रो करते हैं जो लोगों से कनेक्ट कर पाते हैं जो अपनी बात को दिल तक पहुंचा पाते हैं और यही स्किल आपको भीड़ से अलग बनाती है। तो अगली बार जब आपके पास फ्री टाइम हो तो उसे सिर्फ कंज्यूम करने में मत लगाइए। थोड़ा क्रिएट भी कीजिए। कुछ बोलिए, कुछ लिखिए। खुद को एक्सप्रेस कीजिए
क्योंकि यही छोटी-छोटी प्रैक्टिस आपको एक ऐसा इंसान बनाएगी जिसे लोग सुनना चाहते हैं, समझना चाहते हैं और फॉलो करना चाहते हैं। और याद रखिए आपका आईडिया कितना पावरफुल है यह मायने नहीं रखता। आप उसे कितनी पावर से कम्युनिकेट करते हैं। यही आपकी सक्सेस तय करता है। पॉइंट सात सेल्फ रिफ्लेक्शन करो। जरा 1 मिनट के लिए सब कुछ रोक दीजिए। मोबाइल साइड में रखिए। आंखें बंद कीजिए और खुद से एक सीधा सवाल पूछिए। क्या मैं सच में सही दिशा में जा रहा हूं? यह सवाल सिंपल लगता है। लेकिन इसका जवाब ही आपकी पूरी जिंदगी की दिशा
तय करता है। क्योंकि सच यह है हम में से ज्यादातर लोग दिन भर बिजी रहते हैं। लेकिन प्रोडक्टिव नहीं होते। हम काम करते रहते हैं, भागते रहते हैं, थकते रहते हैं। लेकिन रुक कर यह नहीं सोचते कि हम जा कहां रहे हैं। और यही सबसे बड़ी गलती है। बिना डायरेक्शन के स्पीड आपको कहीं नहीं ले जाती। अब इमेजिन कीजिए। एक इंसान है जो दिन भर काम करता है। लेकिन उसे यह नहीं पता कि उसका गोल क्या है और दूसरा इंसान है जो थोड़ा कम काम करता है। लेकिन हर दिन यह चेक करता है कि वह
सही रास्ते पर है या नहीं। आपको क्या लगता है? कौन आगे बढ़ेगा? साफ जवाब है जो सोचता है जो रिफ्लेक्ट करता है क्योंकि सेल्फ रिफ्लेक्शन आपको क्लेरिटी देता है। जब आप अपने फ्री टाइम का थोड़ा सा हिस्सा सिर्फ खुद के लिए निकालते हैं। जहां आप अपने दिन को देखते हैं। अपने फैसलों को एनालाइज करते हैं। अपने एकशंस को समझते हैं। तभी आपको असली पिक्चर दिखाई देती है। तभी आपको समझ आता है क्या सही चल रहा है। क्या गलत हो रहा है और क्या बदलना जरूरी है। वारेन बफेट जैसे लोग भी सिर्फ काम नहीं करते। वह
अपने दिन का एक हिस्सा सोचने में बिताते हैं। उन्होंने कहा था आई इंसिस्ट ऑन अ लॉट ऑफ टाइम बीइंग स्पेंड ऑलमोस्ट एवरीडे टू जस्ट सट एंड थिंक। इस लाइन को अगर आप समझ लें तो आप रियलाइज करेंगे सक्सेस सिर्फ एक्शन से नहीं आती। सक्सेस सही डायरेक्शन वाले एक्शन से आती है और सही डायरेक्शन रिफ्लेक्शन से आती है। अब जरा अपने दिन के बारे में सोचिए। सुबह उठते हैं, काम पर जाते हैं, दिन भर बिजी रहते हैं। फिर थक कर सो जाते हैं। और अगले दिन वही रिपीट यह साइकिल चलता रहता है। लेकिन उसमें एक चीज
मिसिंग होती है। अवेयरनेस कि हम यह नहीं देखते कि हम क्या कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं और उसका रिजल्ट क्या है। यही कारण है कि आ जाए। बहुत लोग सालों तक मेहनत करते हैं। लेकिन फिर भी वहीं के वहीं रहते हैं। क्योंकि उन्होंने कभी रुक कर खुद को एनालाइज नहीं किया। अब सेल्फ रिफ्लेक्शन का मतलब यह नहीं है कि आप घंटों बैठकर ओवरथिंक करें। इसका मतलब है खुद से सही सवाल पूछना। ई जैसे आज मैंने क्या सीखा? आज मैंने कौन सी गलती की? मैं उसे कैसे सुधार सकता हूं? क्या मैं अपने गोल्स के
करीब जा रहा हूं या दूर? यह छोटे-छोटे सवाल धीरे। धीरे आपको क्लेरिटी देने लगते हैं और क्लेरिटी ही पावर है। क्योंकि जब आपको क्लियर होता है कि आपको क्या करना है तो डिस्ट्रैक्शंस अपने आप खत्म होने लगते हैं। अब एक और पावरफुल तरीका जर्नलिंग। जब आप अपने थॉट्स को लिखते हैं तो वो सिर्फ दिमाग में घूमते नहीं रहते। यहां तो क्या है वो क्लियर होने लगते हैं। आपको अपने पैटर्न्स दिखने लगते हैं। आप समझने लगते हैं। आपकी स्ट्रेंथ क्या है? आपकी वीकनेस क्या है? और सबसे इंपॉर्टेंट आप खुद को समझने लगते हैं क्योंकि इस दुनिया
में हर कोई आपको सलाह देगा। एट हर कोई आपको रास्ता दिखाएगा। लेकिन जब तक आप खुद को नहीं समझते तब तक आप किसी भी रास्ते पर सही तरीके से नहीं चल सकते। अब इमेजिन कीजिए आप एक रास्ते पर चल रहे हैं। लेकिन आपको पता ही नहीं है कि आपकी डेस्टिनेशन क्या है? तो क्या आप कभी सही जगह पहुंच पाएंगे? नहीं। क्योंकि डायरेक्शन के बिना जर्नी बेकार है और यही डायरेक्शन सेल्फ रिफ्लेक्शन देता है। तो अगली बार जब आपके पास फ्री टाइम हो तो उसे सिर्फ बाहर की दुनिया में मत खर्च कीजिए। थोड़ा समय अपने अंदर
की दुनिया को दीजिए। खुद को समझिए। अपने एकशंस को एनालाइज कीजिए। अपने गोल्स को क्लियर कीजिए। क्योंकि असली बदलाव बाहर नहीं अंदर से शुरू होता है। और याद रखिए बिजी होना आसान है। लेकिन प्रोडक्टिव होना कॉन्शियस एफर्ट मांगता है। और वह एफर्ट शुरू होता है खुद से सही सवाल पूछने से। पॉइंट आठ डिसिप्लिन बनाओ। जरा ईमानदारी से अपने आप से एक सवाल पूछिए। आप कितने दिन मोटिवेटेड रहते हैं? एक दिन, दो दिन या ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता। फिर क्या होता है? धीरे-धीरे वही मोटिवेशन खत्म होने लगती है। आपका मन काम करने से हटने लगता
है। आप एक्सक्यूसेस ढूंढने लगते हैं और फिर आप वापस उसी पुराने रूटीन में लौट जाते हैं। यही रियलिटी है। मोटिवेशन टेंपरेरी होती है। वो आती है और चली जाती है। लेकिन जो लोग लाइफ में सच में आगे बढ़ते हैं, वो मोटिवेशन पर डिपेंड नहीं करते। वो डिपेंड करते हैं डिसिप्लिन पर। क्योंकि डिसिप्लिन परमानेंट होता है। डिसिप्लिन का मतलब क्या है? इसका मतलब यह नहीं है कि आपका हमेशा मन करेगा। इसका मतलब है कि आपका मन ना करने के बावजूद भी आप काम करते हो। यही असली फर्क है। एक एवरेज इंसान और एक सक्सेसफुल इंसान के
बीच। एवरेज इंसान अपने मूड के हिसाब से काम करता है। अगर मन किया तो काम किया। अगर मन नहीं किया तो छोड़ दिया। लेकिन डिसिप्लिंड इंसान मूड के हिसाब से नहीं कमिटमेंट के हिसाब से काम करता है। अब जरा इमेजिन कीजिए। दो लोग हैं। पहला इंसान जो सिर्फ तब काम करता है जब उसे मोटिवेशन मिलती है। दूसरा इंसान जो हर दिन काम करता है। चाहे उसका मन करे या ना करे। आपको क्या लगता है? एक साल बाद कौन आगे होगा? साफ जवाब है डिसिप्लिंड इंसान। क्योंकि सक्सेस कोई एक बड़ा स्टेप नहीं है। यह छोटे-छोटे डेली
एक्शंस का रिजल्ट है। वारेन बफेट ने भी कंसिस्टेंसी और डिसिप्लिन की पावर को समझाते हुए कहा था, वी आर व्हाट वी रिपीटेडली डू। इसका मतलब साफ है। आप एक दिन में नहीं बनते। आप रोज जो करते हैं वही बन जाते हैं। एसआर इंड अगर आप रोज थोड़ा-थोड़ा इंप्रूव करते हैं तो आप ग्रो करते हैं। अगर आप रोज प्रोक्रेस्टिनेट करते हैं तो आप पीछे जाते हैं। इतना सिंपल है। अब एक सच्चाई जो एक्शंस आपको सक्सेस तक ले जाते हैं वो बोरिंग होते हैं। डेली प्रैक्टिस, डेली लर्निंग, डेली कंसिस्टेंसी। इसमें एक्साइटमेंट कम होती है लेकिन इंपैक्ट बहुत
बड़ा होता है और यही रीजन है कि ज्यादातर लोग फेल होते हैं क्योंकि उन्हें एक्साइटमेंट चाहिए। क्विक रिजल्ट्स चाहिए लेकिन सक्सेस, पेशेंस और डिसिप्लिन मांगती है। अब जरा अपने फ्री टाइम के बारे में सोचिए। जब आपके पास एकद घंटे का टाइम होता है तो क्या आप उसे रैंडमली स्पेंड करते हैं या डिसिप्लिन के साथ यूज करते हैं? डिसिप्लिन का मतलब यह नहीं है कि आप 24 घंटे काम करें। इसका मतलब है आप जो डिसाइड करते हैं उसे कंसिस्टेंटली फॉलो करें। अगर आपने डिसाइड किया है कि आप रोज एक घंटा स्किल सीखेंगे तो चाहे आपका मन
करे या ना करे आपको वो एक घंटा देना ही है। यही डिसिप्लिन है। शुरुआत में मुश्किल लगेगा। आपका मन रजिस्ट करेगा। आपको एक्सक्यूसेस मिलेंगे। लेकिन धीरे धीरे यही हैबिट बन जाती है और जब डिसिप्लिन हैबिट बन जाता है तब सक्सेस ऑटोमेटिक हो जाती है क्योंकि तब आपको पुश करने की जरूरत नहीं पड़ती। आप खुद चलने लगते हैं। अब इमेजिन कीजिए अगर आप 6 महीने तक सिर्फ डिसिप्लिंड होकर हर दिन छोटा-छोटा एफर्ट डालते हैं तो क्या होगा? आपकी स्किल्स इंप्रूव होंगी। आपका कॉन्फिडेंस बढ़ेगा। आपकी माइंडसेट स्ट्रांग होगी। और सबसे इंपॉर्टेंट आप खुद पर कंट्रोल पाना शुरू
कर देंगे। और जिस इंसान का कंट्रोल खुद पर होता है उसे कोई भी नहीं रोक सकता। तो अगली बार जब आपका मन ना करे जब आपको लगे कि आज छोड़ देते हैं उसी दिन खुद को पुश कीजिए। क्योंकि जिस दिन आपका मन नहीं करता और फिर भी आप काम करते हो वहीं से असली ग्रोथ शुरू होती है। याद रखिए मोटिवेशन आपको शुरू करवा सकती है लेकिन डिसिप्लिन ही आपको फिनिश तक ले जाता है और अंत में सक्सेस कोई मैजिक नहीं है। सक्सेस डेली बोरिंग एक्शंस जो आप लगातार करते रहते हैं। पॉइंट नाउ डिजिटल डिस्ट्रैक्शन कंट्रोल
करो। जरा अपने दिन के बारे में ईमानदारी से सोचिए। आप सुबह उठते हैं बस एक बार मोबाइल उठाते हैं और फिर पता ही नहीं चलता कि कब 10 मिनट 30 मिनट बन जाते हैं और 30 मिनट 2 घंटे में बदल जाते हैं। यही सबसे खतरनाक चीज है। डिजिटल डिस्ट्रैक्शन यह आपको एकदम से नहीं रोकता। यह धीरे-धीरे आपका समय खाता है। बिना आपको एहसास कराए। आप सोचते हो बस 5 मिनट के लिए रील्स देख लेता हूं। लेकिन सच क्या है? यह 5 मिनट नहीं होते। यह आपकी फोकस, आपकी एनर्जी और आपका फ्यूचर खा रहे होते हैं।
अब जरा इमेजिन कीजिए अगर आप रोज सिर्फ 2 घंटे ऐसे ही स्क्रोलिंग में वेस्ट कर रहे हैं तो एक साल में आप 700 प्लस घंटे बर्बाद कर रहे हैं। 700 घंटे। जरा सोचिए इन 700 घंटों में आप क्या कर सकते थे? एक नई स्किल सीख सकते थे। एक साइड इनकम शुरू कर सकते थे। अपनी हेल्थ इंप्रूव कर सकते थे। लेकिन इंस्टेड वो समय कहीं चला गया। जिसका कोई रिटर्न नहीं है। यही डिजिटल दुनिया की सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। यह आपको इंस्टेंट डोपामिन देती है। छोटी-छोटी खुशी, इंस्टेंट एंटरटेनमेंट। लेकिन बदले में आपकी फोकस पावर खत्म कर
देती है। आपका अटेंशन स्पैन छोटा कर देती है। आपको डीप वर्क करने से रोकती है और धीरे-धीरे आपको एवरेज बना देती है। वारेन बफेट ने एक बहुत पावरफुल बात कही थी। द डिफरेंस बिटवीन सक्सेसफुल पीपल एंड रियली सक्सेसफुल पीपल। ईच दैट रियली सक्सेसफुल पीपल से नो टू ऑलमोस्ट एवरीथिंग। इस लाइन को समझिए। सक्सेस सिर्फ यह नहीं है कि आप क्या करते हैं। सक्सेस यह भी है कि आप क्या अवॉइड करते हैं। और डिजिटल डिस्ट्रैक्शन वही चीज है जिसे आपको कॉन्शियसली अवॉइड करना होगा। अब एक सच्चाई। मोबाइल आपका दुश्मन नहीं है लेकिन उसका गलत इस्तेमाल आपका
सबसे बड़ा दुश्मन बन सकता है। आप उसी मोबाइल से सीख भी सकते हैं, अर्न भी कर सकते हैं, ग्रो भी कर सकते हैं या फिर उसी मोबाइल से अपना टाइम वेस्ट भी कर सकते हैं। डिसीजन आपके हाथ में है। अब जरा खुद से पूछिए जब भी आपके पास फ्री टाइम होता है, क्या आप उसे कंट्रोल करते हैं या वह आपको कंट्रोल करता है? क्योंकि अगर आप अपने अटेंशन को कंट्रोल नहीं कर सकते तो आप अपनी लाइफ को कंट्रोल नहीं कर सकते। अब सॉल्यूशन क्या है? पहला स्टेप अवेयरनेस। आपको यह समझना होगा कि आपका टाइम कहां
जा रहा है। दूसरा स्टेप बाउंड्रीज। आपको डिसाइड करना होगा कि आप कब और कितना यूज करेंगे। तीसरा स्टेप रिप्लेसमेंट। आप खाली टाइम को सिर्फ रिमूव मत कीजिए। उसे रिप्लेस कीजिए। कुछ प्रोडक्टिव से, कुछ मीनिंगफुल से। क्योंकि खाली स्पेस हमेशा डिस्ट्रैक्शन से भर जाता है। अब इमेजिन कीजिए अगर आप रोज के 2 घंटे स्क्रोलिंग से निकालकर लर्निंग में लगा दें, क्रिएशन में लगा दें, ग्रोथ में लगा दें तो 6 महीने बाद आपकी जिंदगी कितनी बदल सकती है। यही वो हिडन ओपोरर्चुनिटी है जो ज्यादातर लोग मिस कर देते हैं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चलता कि उनका
टाइम कहां जा रहा है। तो अगली बार जब आपका हाथ ऑटोमेटिकली मोबाइल की तरफ जाए। जब आप बिना सोचे स्क्रॉल करने लगे एक बार रुकिए और खुद से पूछिए क्या यह मुझे आगे ले जा रहा है या सिर्फ मुझे बिजी रख रहा है क्योंकि बिजी होना आसान है लेकिन प्रोडक्टिव होना कॉन्शियस चॉइस है और याद रखिए आपका समय ही आपकी जिंदगी है। अगर आप उसे कंट्रोल नहीं करते तो कोई और या कुछ और उसे कंट्रोल कर लेगा। इसलिए डिजिटल डिस्ट्रैक्शन को कंट्रोल करो क्योंकि वही समय अगर सही जगह इन्वेस्ट किया जाए तो आपकी पूरी जिंदगी
बदल सकता है। पॉइंट 10 एक्शन लो। जरा अपने दिमाग में आए हुए उन सभी आइडियाज को याद कीजिए। वो आइडियाज जो आपको कभी एक्साइटेड कर गए थे। कभी आपने सोचा था मैं YouTube शुरू करूंगा। मैं ऑनलाइन कुछ करूंगा। मैं अपनी लाइफ बदल दूंगा। लेकिन आज उन आइडियाज का क्या हुआ? वो कहीं खो गए क्योंकि आपने उन पर एक्शन नहीं लिया। यही सबसे बड़ा फर्क है। आइडियाज सबके पास होते हैं लेकिन एक्शन बहुत कम लोग लेते हैं और सच्चाई यह है आइडियाज की कोई वैल्यू नहीं होती। वैल्यू होती है एग्जीक्यूशन की। अब जरा इमेजिन कीजिए। दो
लोग हैं। पहले इंसान के पास 10 अमेजिंग आइडियाज हैं। लेकिन वो सिर्फ सोचता रहता है, प्लान बनाता रहता है। दूसरे इंसान के पास सिर्फ एक सिंपल आईडिया है। लेकिन वो उस पर एक्शन लेता है, छोटा शुरू करता है, गलतियां करता है, सीखता है। आपको क्या लगता है? कौन आगे बढ़ेगा? साफ जवाब है जो एक्शन लेता है क्योंकि सक्सेस सोचने से नहीं आती। सक्सेस करने से आती है। अब एक बहुत बड़ी गलती जो ज्यादातर लोग करते हैं वो वेट करते हैं परफेक्ट टाइम का। उन्हें लगता है अभी सही समय नहीं है। थोड़ा और सीख लूं थोड़ा
और तैयार हो जाऊं। फिर शुरू करूंगा। लेकिन सच्चाई क्या है? परफेक्ट टाइम कभी नहीं आता। अगर आप इंतजार करते रहेंगे तो आप सिर्फ इंतजार ही करते रह जाएंगे। वारेन बफेट ने भी अपनी जिंदगी में कभी परफेक्ट मोमेंट का इंतजार नहीं किया। उन्होंने एक सिंपल प्रिंसिपल फॉलो किया। एन इमपरफेक्ट प्लान टुडे इज बेटर देन अ परफेक्ट प्लान टुमारो। इस लाइन को समझिए। इंपपरफेक्ट एक्शन। परफेक्ट प्लानिंग से ज्यादा पावरफुल होता है। क्योंकि एक्शन आपको आगे बढ़ाता है। प्लानिंग आपको वहीं रोक कर रखती है। अब इमेजिन कीजिए। आप पहली बार कुछ शुरू करते हैं। आपकी पहली वीडियो परफेक्ट
नहीं होगी। आपका पहला काम अमेजिंग नहीं होगा। आपका कॉन्फिडेंस भी लो होगा और यही नेचुरल है। क्योंकि शुरुआत हमेशा इंपपरफेक्ट होती है। लेकिन प्रॉब्लम क्या है? लोग परफेक्शन के चक्कर में शुरुआत ही नहीं करते और यही उन्हें पीछे रखता है। अब एक सच्चाई आप क्लेरिटी एक्शन से पाते हैं। सोचने से नहीं। जब आप कुछ करना शुरू करते हैं तभी आपको समझ आता है क्या सही है क्या गलत है क्या इंप्रूव करना है लेकिन अगर आप सिर्फ सोचते रहेंगे तो आप कभी क्लियर नहीं हो पाएंगे अब जरा अपने फ्री टाइम के बारे में सोचिए जब भी
आपके पास टाइम होता है क्या आप सिर्फ कंज्यूम करते हैं वो या कुछ क्रिएट भी करते हैं क्योंकि एक्शन का मतलब है क्रिएशन कुछ बनाना कुछ शुरू करना कुछ करना चाहे छोटा छोटा ही क्यों ना हो। अब इमेजिन कीजिए अगर आप आज सिर्फ एक छोटा स्टेप लेते हैं, एक वीडियो बनाते हैं, एक स्किल सीखना शुरू करते हैं, एक छोटा प्रोजेक्ट शुरू करते हैं, तो 6 महीने बाद आप कितने आगे हो सकते हैं। लेकिन अगर आप आज भी सोचते रह गए तो 6 महीने बाद भी आप वहीं होंगे जहां आज है। यही फर्क है एक्शन और
डिले के बीच। अब एक और पावरफुल बात डर लगना नॉर्मल है। लोग क्या कहेंगे? फेल हो जाऊंगा। काम नहीं चला तो यह सब थॉट्स आएंगे। लेकिन करेज का मतलब डर का ना होना नहीं है। करेज का मतलब है डर के बावजूद एक्शन लेना। और यही सक्सेसफुल लोग करते हैं। वो परफेक्ट नहीं होते लेकिन वो एक्शन लेते हैं। बार-ब बार ए लगातार और धीरे-धीरे वही एक्शन उनकी सक्सेस बन जाता है। तो अगली बार जब आपके दिमाग में कोई आईडिया आए तो उसे इग्नोर मत कीजिए। उसे लिखिए। उस पर छोटा सा एक्शन लीजिए क्योंकि पहला कदम छोटा
होगा लेकिन वही सबसे जरूरी होगा। याद रखिए आपकी जिंदगी आइडियाज से नहीं बदलेगी। आपकी जिंदगी एक्शन से बदलेगी और वो एक्शन आपको अभी लेना है यहीं से इसी मोमेंट से। तो दोस्तों एक पल रुक कर सोचो। आपका आज का फ्री टाइम आपको ऊपर ले जा रहा है या नीचे गिरा रहा है। क्योंकि सच यह है फर्क अ लक से नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है। आप रोज क्या करते हो उससे? तो आज फैसला करो। टाइम पास नहीं लाइफ अपग्रेड करेंगे क्योंकि आपकी सक्सेस की शुरुआत आज इसी पल से हो सकती है। अगर आपको इस वीडियो से
थोड़ी भी वैल्यू मिली हो तो एक छोटा सा काम जरूर करना। वीडियो को लाइक करो। कमेंट करके बताओ आपको कौन सा पॉइंट सबसे पावरफुल लगा। और इस वीडियो को उन लोगों के साथ शेयर करो जिन्हें इसकी जरूरत है। और अगर आप ऐसे ही पावरफुल कंटेंट चाहते हो तो चैनल लीजेंड ऑफ फाइनेंस को सब्सक्राइब करना मत भूलना क्योंकि यहां सिर्फ वीडियोस नहीं बनती। यहां आपकी लाइफ अपग्रेड करने की कोशिश होती है। मिलते हैं अगले वीडियो में। धन्यवाद।