बवो ज्ञान तपसा बवो ज्ञान तपसा पूता मद भाव भागता पूता मद भाव भागता जिनके राग भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए हैं और जो मेरे ही परायण तथा मेरे ही आश्रित रहने वाले हैं ऐसे ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे भाव को प्राप्त हुए हैं साधक ऐसा चाहिए जा के ज्ञान विवेक बाहर मिलता सो मिले अंतर सबस एक इस श्लोक को गहराई से समझेंगे कि जिनके राग भय और क्रोध नष्ट हो गए हो और जो मेरे ही परायण है तथा मेरे ही आश्रित रहने वाले हैं ऐसे ज्ञान रूप तप से
पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे भाव को प्राप्त हुए हैं यहां श्री कृष्ण कह रहे हैं मेरे आश्रित उसका मतलब यह नहीं कि जो मंदिर में श्री कृष्ण की प्रतिमा है वहां जाकर मंडार ना है मेरे आश्रित श्री कृष्ण का माम जो है वही तुम्हारी गहराई में तुम्हारा माम है अर्थात कृष्ण कह रहे मेरे आश्रित मतलब तुम अपने आप में जहां कृष्ण मैं कह रहे हैं वहां जिसने अपना आश्रय उठाना है ऐसे जो ज्ञान योग से ज्ञान ज्ञान योग रूपी तप से पवित्र हुए भावना से नहीं मान्यता से नहीं यस्य ज्ञान मयम तप जो ज्ञान
संयुक्त तप है ज्ञान तप से बढ़कर दुनिया में और कोई तप नहीं यो की दृष्टि से एकाग्रता की दृष्टि से एकाग्रता बड़ा तप है लेकिन जहां पतंजलि का योग दर्शन समाप्त होता है जहां क्रिया योग समाप्त होता है वहां से ज्ञान योग शुरू होता है कल बताया था कि छह वर्ष क्रिया योग की अलग-अलग उपासना करते करते आकर गौतम थके जब थके थोड़ा विवेक जगा तो गौतम अकेले गौतम ना हुए गौतम बुद्ध हो गए भगवान बुद्ध हो गए तो पतंजलि का या और योग की यात्रा करते करते जब कषाय परिपक्व हो जाते हैं अथवा तो
ज्ञान की किरण मिल जाती है तो य स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर कारण शरीर इनके साथ का संबंध विच्छेद करके जीव अपने शिव स्वभाव को पा लेता है यही कृष्ण भाव को पाना है यह सूक्ष्मता से बात समझ श्री कृष्ण कह रहे हैं कि आश्रित रहने वाले हैं ऐसे ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे भाव को प्राप्त हुए मेरे भाव को प्राप्त हुए मतलब जिस तत्व में जिस स्व में मैं जो का त्यों हूं उसी में वे प्राप्त हुए हैं मुझसे तनिक कम नहीं हुए कोई लहर अगर ज्ञान योग में आ गई
व सागर कहता कि मेरे भाव को प्राप्त हुई कैसे मेरे भाव को प्राप्त हुई कि वह सागर हो गई वह जल राशि हो गई तो जल राशि पहले थी इसी बात को गीता का ने आगे कहा मम वांस जीव लोके जीव भूत सनातन ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन विमल सहज सुख राशि जो तुम्हारा वास्तविक जिसको तुम जीव में मैं मानते हो वह भी चेतन है जड़ मैं मैं नहीं बोल सकता है यह मंडप मैं हूं ऐसा नहीं इसे पता य क बाट मैं हूं ऐसा नहीं बोलेगा पहाड़ मैं हूं ऐसा नहीं बोलेगा जब जब मैं
हूं बोलेगा तो चैतन्य की सत्ता से ही तुम्हारा मुंह बोलेगा जी हिलेगी हिल चाल तो और जड़ पदार्थों में भी होती है लेकिन उनको अपने अस्तित्व का ज्ञान नहीं है तुम्हे अपने अस्तित्व का ज्ञान है फिर वास्तविक अस्तित्व का ज्ञान तुम्हें नहीं है तुम्हारे इर्दगिर्द जो साधन थोपे गए हैं और जो संस्कार थोपे गए हैं उन संस्कार और साधनों और वासनाओं का गुड़ गोबर करके तुम अपने को कुछ मान लेते हो है कुछ काले सफेद बाल है कुछ हार्ड मास है कुछ रक्त पुंज है कुछ च मन की चंचलता और एकाग्रता है बुद्धि का निर्णय
अ निर्णय इन सबको सत्ता तुम देते हो और मिला जुला के उसको मैं मानते हो लेकिन जो ज्ञान योग तप से पवित्र हुआ है वो ऐसा जो साधक है वो भगवान कहते मेरे भाव को प्राप्त हुआ है तो भगवत भाव को भगवत अनुभव को हम कैसे प्राप्त हो कौन प्राप्त होता है वित राग भय क्रोध जिसका राग व्यतीत हो गया भय व्यतीत हो गया क्रोध व्यतीत हो गया बालक का राग सुश पत है इसलिए व सुंदर सुहावना लगता है निश्चिंत रहता है और उसको देखकर मां-बाप की थकान भी मिटती है क्षण भर के लिए बच्चे
का राग सुश पत राग है इसलिए उसकी सहज बोलचाल हिल चाल तुतली भाषा भी मां-बाप की कुछ देर तक थकान मिटा देती है लेकिन जिन मुनीश्वर का ज्ञान योग से भय राग क्रोध चला गया है उनकी बोलचाल साधकों की जन्म मरण की थकान मिटाने का सामर्थ्य रख वितराग भय क्रोध मन मया माम उपास जिनके राग भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए हैं और जो मेरे ही परायण तथा मेरे ही रहने वाले हैं जिनके राग भय और क्रोध चलो एक एक चरण पर आए वित राग भय क्रोध जिनका राग भय और क्रोध व्यतीत हो गया
तो राग भय और क्रोध व्यतीत हो गया है तो राग भय क्रोध होता कैसे है राग होता है मिटने वाली वस्तुओं में आसक्ति करने राग होता है मिटने वाले नश्वर भोग पदार्थों को पाने की इच्छा से राग होता है अच्छा उस वस्तुओं में उस परिस्थितियों में अगर कोई विघ्न डालता है तो अपने से छोटा आदमी विघ्न डालता है तो उस पर क्रोध आता है और अपने से कोई बड़ा आदमी विघ्न डालता है तो भ होता है अथवा तो यह जो धन धान्य मान प्रतिष्ठा वैभव आदि मिला है वह हमसे छूटे ना कहीं छूट ना जाए
इस प्रकार का अंदर भय बना रहता है जो कुर्सी मिली है जो हवाई मिली है जो घरबार मिला है अथवा जो य सण भंगुर देह मिला है वह कहीं चला ना जाए इसका भय बना रहता है तो राग भय और क्रोध का उद्गम स्थान है नश्वर पदार्थों में नश्वर संबंधों में नश्वर देह इंद्रियों में शाश्वत की नाई प्रीति करने की गलती जय जय दुनिया के सारे दुख का उद्गम स्थान यही है कि परिवर्तनशील परिस्थितियों को थामने की गलती करना और इन पदार्थों को आज तक कोई थाम नहीं सका चाहे सेठ हो चाहे राजा हो चाहे
प्रजा हो चाहे साधु हो चाहे पीर ओलिया फकीर हो चाहे अवतार हो लेकिन ऐसी घड़ी आती है कि सर्वस्व छोड़ने की फर्ज सबको पड़ी ऐसा दुनिया में कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ कि मिले हुए देह को मिले हुए धन को मिली हुई सत्ता को मिले हुए मान को मिली हुई परिस्थितियों को कोई संभाल कर ले गया हो ऐसा आज तक दुनिया में कोई आया नहीं आएगा नहीं और आ सकता भी नहीं है फिर भी सब धमाधम किए जा रहे हैं फिर धमाधम क्यों किए जा रहे हैं कि अज्ञान आवृत ज्ञानम अज्ञान से उनका
ज्ञान ढक गया है इसलिए बिचारे वे बिचारे जंतु की ना वि मोहित होते हैं अज्ञान आवृत ज्ञानम तेन मो जंत वितराग भय क्रोध मन मया माम पासता तो भय राग और क्रोध चला गया त्यागी ने देखा कि सब छूट जाएगा चाहे करोड़ हो तो भी छूट जाएगा त्याग आ गया सब छोड़ गए साधु हो गए नश्वर चीजें नाश हो जाएगी उसके पहले छोड़कर साधु हो गए लेकिन मनम नहीं हुए तो मुझ में अंदर में नहीं आए तो फिर याद रहेगा कि मैंने एक करोड़ छोड़ा मैंने दो करोड़ छोड़ा मैंने पुत्र छोड़ा मैंने परिवार छोड़ा मैंने
निमक छोड़ा मैंने शाक छोड़ा मैंने अन्न छोड़ा मैंने जल छोड़ा मैंने फल छोड़ा लेकिन मनम ना हुआ तो तू अपनी मैं को ठीक रूप से नहीं जान पाएगा और ठीक रूप से नहीं जानेगा तो त्याग के बाद भी कहीं कोई गलती कर लेगा त्यागी होने की भी गलती कर लेगा इसलिए एक तो अश्वर चीजों की आस्था चित्त से विवेक बुद्धि से हटाई जाए और दूसरा शाश्वत स्वरूप में प्रीति की जाए बस दो ही काम करने हैं तुमने कितने सारे काम किए बचपन से देखो तुम कितना पढ़े कितनों की खुशामद की तुमने फेरे फेरे सासू के
पैर छुए ससुर के पैर छुए मास्टरों को रिझाया अब कृष्ण को रिझाने के लिए गुरु को रिझाने के लिए दो काम कर लो दुनिया तुम्हें रिझा फिरेगी तुम ऐसे हो जा फिर दुनिया तुम्हारी मनौती मानकर अपना काम करने लग जाएगी तुम ऐसे महान हो जाओगे केवल दो ही काम करने क्या एक तो नश्वर वस्तु को नश्वर मान लेना है जय राम जी की और शाश्वत चीज को मैं रूप में जान लेना है बस कोई ज्यादा मेहनत थोड़ी है नारायण बोलो बोलो नारायण नारायण नारायण नारायण शास्त्र सब प्रसन्न हो जाएंगे ऋषि मुनि तुम पर प्रसन्न हो
जाएंगे यक्ष गंधर्व किन्नरों को धिक्कार है जो तुम्हारी चाकरी में ना लग जाए और उन देवताओं को भी कंपटीशन करना पड़ेगा तुम्हारे काम करने के लिए तुम इतने महान हो जाओ केवल य दो बातें करो भगवान जहां ठहरे हैं भगवान चाहते तुम वहां ठहर जाओ भगवान की निगाह वो तुम अपनी निगाह बना लो ब्रह्म वेता का अनुभव तुम अपना बना लो और कोई तुम्हारे से भगवान या संत कुछ छीनना नहीं चाहते अगर छीनना चाहते हैं तो नश्वर पदार्थों में जो बेवकूफी से आस्था हो रही है वो बेवकूफी छीनना चाहते हैं और शाश्वत आत्मा भगवान पराया
लग रहा है यह पराया अपन छीन और तो बेचारे कुछ छीनना भी तो नहीं चाहते और कुछ भगवान या संत या शास्त्र तुमसे छीन हो तो मुझे बताओ मैं चलूंगा साथ में और तो नहीं छिनना चाहते सत शास्त्र हम लोगों से अज्ञान छिनना चाहते हैं और ईश्वर के विषय में पराया पन छीनना चाहते हैं ईश्वर को पराया मानकर दूर मानकर अगर भजन करेंगे नहीं तो बरकत नहीं आएगी तुझ में इतनी ताकत है तू जूते को अपना मानता है फाउंटेन पेन को अपना मानता है तो क्यों भगवान को पराया मानता है और फिर दुखी हो रहा
है अरे यार मनुष्य जन्म पाकर भी त दुखी और परेशान रहा तो बड़े शर्म की बात है दुख और परेशानी तो वे उठाए जिनके माय बाप मर गए माय बाप तेरा आत्मा तो तू ही है फिर क्यों दुखी और चिंतित होता है तो यहां आज का श्लोक हमें सीख दे रहा है भगवत गीता के चौथे अध्याय का दसवा श्लोक है मैं अपनी और से कुछ नहीं कह रहा हूं श्लोक की व्याख्या कर रहा हूं जय राम जी की वितराग भय क्रोध राग चला जाए जब जब दुख हुआ है आप गहराई से खोजें दुख किस निमित
होता है ईमानदारी से जरा गोता मार के देखि जब जब दुख होता है भय होता है या क्रोध आता है तो किस निमत आता है थोड़ा सा रुक कर देखिए जब भी भय आए क्रोध आए य दुख आए तो देखना किय क्यों हुआ आता है और आप उससे सहमत हो जाते हैं हस्ताक्षर करके चालू गाड़ी में कुदका मार लेते हैं और आपकी पुरानी आदत है चालू गाड़ी में बैठने की लेकिन अभी थामो पहले पाटिया देखो कि गाड़ी कहां जा रही है कम से कम अपना गाड़ी का नंबर तो देखो अपने घर न जाने वाली गाड़ी
भले खाली हो कोच हो ऐसी लगी हो लेकिन तुम्हारे काम की नहीं और तुम्हारे गांव जाने वाली गाड़ी में भले सीटें टूटी फूटी हो फिर भी कूद के उसी में बैठना प गाड़ी में मत बैठना पुताना गा में जती एसटी भले लग्जरी टाइप नी ना होए सीटो भले एयर कंडीशन की व्यवस्था वाली ना होए छता है पुताना गाम जती गाड़ी तरा उपयोग नहीं छ पारका गाम ल जाए ते गाड़ी तरा माटे मफत मा बहाड़े तो न कामी न कामी ने नका ए बातमा कोई ने संदेह हो तो पूछी लो अब तुम्हारा गांव क्या तुम्हारा गांव
वही है जहां जाने के बाद तुम्हारा अध पतन ना हो जहां जाने के बाद तुम्हारी थकान मिटे अपने घर जाओगे तो क्या होगा बाजार गए इधर गए उधर गए यात्रा गए यात्रा गए तो उत्साह से लेकिन भागे भी उतना तेजी से घरे ज इतनी राश पोता न घर पृथ्वी नो छेड़ो तें गमे भी दक्षिण भारत की यात्रा करो उत्तर भारत की यात्रा करो नेपाल की यात्रा करो प छव ठाक उतार विचार आ दौड़ दया घरे आ बोलो सिद्धपुर वालो सिद्धपुर पहुच मुंबई वालो मुंबई घर हम से सरट वालो रट माव है मारू घर पृथ्वी नो
छेड़ो तो यह घर वास्तव में तुम्हारा नहीं यह घर तुम्हारे शरीर का घर है शरीर की थकान मिटाना है तो चार दीवारी में आओ और तुम्हारी थकान मिटाना है तो आत्मज्ञान के घर में आओ तुम्हारा बेड़ा प उसके सिवाय और कोई उपाय आज तक सफल गया नहीं उसके सिवाय कोई उपाय आज तक सफल पूर्ण रूप से सफल गया नहीं योग वशिष्ठ का प्रसंग आता है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची और जीवों को राग भय क्रोध इच्छा द्वेष आदि से दुखी देखा जैसे पिता परिवार पुत्रों को का दुख देखकर कुछ सोच विचार करता है और
उसके लिए उपाय करता है ऐसे ब्रह्मा जी ने देखा कि जीव बिचारे दुखी हैं चलो यज्ञ होम हवन की पद्धति का प्रचार प्रसार हो ताकि जीव स्वधा स्वाह करके प्राण वायु शुद्ध करके अपने मन को थोड़ा एकाग्र करके यहां भी थोड़ा सुखी रहे और परलोक में आए स्वर्ग पाए लेकिन ब्रह्मा जी ने पाया कि इतना करने के बाद भी व्यक्ति की एकाग्रता होती है और संसार की चीजों को पकड़ता है मरते दम तक छोड़ता नहीं और स्वर्ग में आता है तो स्वर्ग को पकड़ता है ना स्वर्ग में सदा रह सकता है ना यहां सदा रह
सकता है ना नर्क में सदा रह सकता है बाहर की चीजों से आदमी सदा बं के रह ही नहीं सकता अरे मुझे सृष्ट कर्ता को भी कल्प के अंत में रवाना हो जाना पड़ता है तो मेरे उत्पन्न किए हुए जीव सदा कैसे रह सकते हैं एकदम सीधी बात है तुम रात्रि को स्वपना देखते हो और स्वपना में तुमने देखा एक सुंदर सुहावना माम दुकान है और दुकान में ग्राहक भी है और ग्राहक फोटो लेवा रहे हैं अपना हलवाई की दुकान पर मिठाई ले रहे हैं अब देखो कि उनका मिठाई लेना या फोटो लेवाना एक तब
तक जिंदा है जब तक तुम स्वपने में हो तुम्हारे स्वप्ने पुरुष तब तक जीवित है जब तक तुम्हारी स्वप्न की अवस्था है जब तुम शाश्वत नहीं तो तुम्हारा स्वपना कैसे शाश्वत और तुम्हारा स्वप्ना शाश्वत नहीं तो वो मिठाई की दुकान वाला हलवाई कब तक शाश्वत रहेगा और मिठाई की चाट पर मुह में पानी लाने वाला कब तक रहेगा समझ रहे हैं गुजराती में कह दूं तहे स्वपन जोय अने स्वपना मा आखी बाजार दुकान कॉम्प्लेन के मोड़ा पानी ला कोई भूस टवा माटे मथ कोई पिक्चर जोवा माटे धम कोने आम कोने ले कोई दे कोने का
करव कोई का जाव बधू स्वपना तमने देख देख ना देख अने ए लोना कोई जमाई होए कोई ववाई होय कोई शाला हो कोई बनेवी होय कोई ना लगन होय कोई ना कोई प्रसंग हो कोई बसना हो ब हो कि ना हो स्वपना मा होय अने बध वखते हाच लागत हो के ना लागत हो तमार स्वपन साच नथी तो लोन बेस क्या सुधी साच अ बैस हाच नहीं तो उठ क्या ज सुधी ार स्वपन एवी ते तुम्हारा बसना उठना आना जाना यह ब्रह्मा जी का स्वपना है तब तक उसमें भी जैसे चालू स्वप्ने में कई लोग
पैदा हो जाते हैं कई मर जाते हैं कई मिट जाते हैं ऐसे ही ब्रह्मा जी के चालू स्वप्ने में भी तो हम कई रवाना हो जाते देखत नैन चलो जग जाई का मांगू कछु स्थिर ना रहाई देखते देखते आंखों के देखते देखते जगत पसार हो रहा है कह रहा है आसमा ये समा भी कुछ नहीं रो रही है शबन में ये निजार कुछ नहीं जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानुष ड़ उनकी कब्र पर है और निशान कुछ भी नहीं जिनकी नौबत से गूंजते थे आसमा वे खुद बेदम हुए अब हूं नहा कुछ
भी नहीं कह रहा है आसमा यह समा भी कुछ नहीं राजाधिराज अन दता महाराज फूलों के बसा हो जाती थी महाराज सड़कें बंद हो जाती थी नगार और तुरिया के गगन गुंजा देती थी अभी देखो तो सब स्वपना हो गया फलाना वासरा आया फलाना साहब आया है फलानी लेडी आई पुलिस बंदोबस्त हो रहा अब देखो कहां गया सब सीधी सादी एकज बात हमारे जो य महा गुजरात दे धमाधम चालू वकत हा लाग इकम तिकड़म काय कराचा हम च मुंबई हमला पाईज अभी देखो तो स्वपना हो गया चाऊ माऊ सावधान जाग उठा है हिंदुस्तान अभी देखो
तो बात स्वपना हो गई अनामत विरोधी आंदोलन जिंदाबाद अभी देखो तो मुर्दा हो गया स्वपना हो गया ऐसे समय की सरीता में सारी हम लोगों की स्वप्न तुल्य चेष्टा एं सरकती जा रही है सरकती हुई चेष्टा हों को शाश्वत संभालने का जो आग्रह है वही आग्रह भय राग और क्रोध को जन्म देता है जय श्री कृष्णा जो बीत गई सो बीत गई तकदीर का शिकवा कौन करे जो तीर कमान से निकल गई उस तीर का पीछा कौन जो लाभ हुआ सो हो गया जो घाटा हो गया सो हो गया जो मान मिल गया तो मिल
गया अपमान हो गया तो हो गया कांटा घुस गया तो अब निकाल के निश्चिंत हो कांटा किसने रखा और क्यों घुसा उसकी चिंता में मत लग और निकाल के फेंक दिया तो फेंक दिया फिर कांटा लगा था मैंने निकाला था फेंक दिया उधर चिंतन मत कर तू ऐसे व्यवहार में कई कांटे आएंगे लगेंगे कई बार निकलेंगे लेकिन तू समझता जा समय की सरिता में सब बहा जा रहा है इस प्रकार का जब तू विवेक दृढ़ रखेगा ज्ञानम तप के दरवाजे पर पहुंचेगा तो तू श्री कृष्ण के भाव को प्राप्त कर लेगा जहां श्री कृष्ण मस्त
है वहीं तू पहुंच जाएगा वही उसका मतलब नहीं कि वैकुंट वही उसका मतलब नहीं कि डाकुर जी श्री कृष्ण मस्त है अपने आप में अपने आप में मस्त है इसलिए उनको देखकर सब लोग मस्त होते हैं जो अपने आप में नहीं है उसको दूसरे देखकर मस्त कैसे हो सकते हैं जो खुद खुद के घर नहीं तो व दूसरों को खुद के घर क्या पहुंचाएगा महाराज वितराग भय क्रोध मन मया माम पासता सर्वथा क्रोध जिसका नष्ट हो गया है और जो मेरे ही प तथा मेरे ही आशित रहने वाले हैं मेरे परायण माना कितना भी धन
सत्ता वस्तुएं हैं वह समझता है साधक यह सब पहले नहीं थी जन्म के पहले य वस्तुओं की मालक मेरी नहीं थी और अभी भी यह मालक नहीं के तरफ जा रही है इस प्रकार का उसका विवेक इन वस्तुओं का उपयोग करता है लेकिन इन वस्तुओं में आश्रय नहीं करता वस्तुओं में शाश्वता का मोहर नहीं लगाता लेकिन जन्म के पहले मैं था जन्म के बाद भी मैं रहूंगा जन्म के पहले यह शरीर नहीं था तो ये शरीर की वस्तुएं और संबंध कैसे मरने के बाद यह शरीर नहीं रहेगा तो इसके संबंध कहां लेकिन जन्म के पहले
और मरने के बाद जो मेरा चि घन चैतन्य कृष्ण तत्व आत्मा था उसकी जो शरण लेता है उसको मैं मानकर उसमें जो आराम करता है तृप्ति पाता है उसमें प्रतिष्ठित होकर फिर यथा योग्य व्यवहार करता है वह भगवान के आश्रित है अच्छा तो इन वस्तुओं में से इनको सबको छोड़ देवे ना तो इन सबको पकड़े ना ना छोड़ना है ना पकड़ना है इनका उपयोग करना है और हकीकत में उपयोग किए बिना कोई रहेगा नहीं उपयोग तो करते हैं लेकिन आसक्ति बुद्धि से करते हैं आस्था बुद्धि से करते हैं शाश्वत बुद्धि से करते हैं तुम घर
में रहो मना नहीं लेकिन घर में जो आसक्ति है तिजोरी में रुपए लेकिन रुपयों में जो आसक्ति आसक्ति भय देती नहीं तो थोड़े रुपए चले गए भय का का आ गए तो आ गए लायक कुछ नहीं थे मैंने सुनाई थी एक कहानी कि एक कोई जीवन मुक्त महापुरुष के कुटिया पर डाकुओं ने डाका डाला उन्होंने तो महाराज उनका जोब आगे वान था डाकुओं का महाराज हजारों लोग तुम्हारे पास आते जाते हैं आज हमारा वारा है दक्षिणा लेने का कल ही गुरु पूनम बीता है महाराज आज जो कुछ है माल दे दो बोले मैं क्या माल
उठा के दू यह देख यह मेरे ऊपर की चदरिया और नीचे की चौधरिया दोनों उतार देता हूं य कोपिन पहर के मैं बाहर जाता हूं जो कुछ चाहिए तुम्हारा अपना समझ के गठरिया बांधो अब बाबा जी तो अंदर से जीवन मुक्त थे विरक्त थे व माल ठलूक जो कुछ था सर समान शरीर की जरूरियत कपड़े बिछाना बिछाना ये कुछ बाबा जी तो टिल्ले पर जाकर नाचने लगे कि हजी नफा मा तक दिना दिन अभी नफे में तक दिना दिन उन्होंने जो कुछ सर सामान बांधना था अपनी रुचि के अनुसार देखा खा बांध एक दो फुटली
सरदार देखता कि बाबा जीी कहां चले गए कहीं पुलिस में तो नहीं गए देखा कि वो टिल्ले पर नाच रहा है कि तक दिना दिन हजी नफा मा तक दिना दिन हजी नफा मा अभी नफे में वो डके तो का सरदार गया कि बाबा जी क्या बात है अभी नफे में तो क्या यहां टिल्ले के नीचे धन गाड़ा है बोले ये भी खोद लो नहीं बाबा जी आप बताओ नफे में कैसे बोले आए थे तो कोपी नहीं थी लंगोटी नहीं थी और इतना तुम क्रूर डाका डालने का तैयारी करके आए फिर भी लंगोटी तो नफे
में रह गई यार और खाया पिया वो भी नफे में रह गया खाया पिया वो भी नफे में रह गया अनुभव किया वो भी नफे में रह गया और कोपिन तो तुम भी नहीं नोगे बाबा जी का निर्दोष प्रेम कटाक्ष पढ़ते ही व सरदार का चि बदल गया तो फिर अनुचर गठरिया खोल के वहां रख दिए माफी मांगा अरे माफी क्या हम नाराज ही नहीं है जो अपने आप ऊपर ठीक से राजी है उस पर डकेट भी राजी हो जाते हैं और जो अपने आप में राजी नहीं है ना उसकी मैम साहब भी नाराज हो
जाती है और मिस्टर भी नाराज हो जाता है मिसेस भी नाराज नारायण नारायण नारायण ना देखा अपने आपको को मेरा दिल दीवाना हो गया ना छेड़ो मुझे यारों में खुद पर मस्ताना हो [प्रशंसा] गया वित राग भय क्रोध मन मया माम उ पासता बहु ज्ञान तप साहा पता मद मद भावन भा मद भाव आगत मागत जिनके राग भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए हैं तो आप समझ गए होंगे राग भय क्रोध क्यों होता है नश्वर वस्तुओं में आसक्ति से राग भय और क्रोध होता है यह वस्तु ये पद यह अमुक मेरा बना रहे फूलों
की माला आई अथवा फूल आया चढ़ा लिया किसी ने उस स्वीकार कर लिया उसको प्रसन्नता हुई सूंघ लिया नासिका को प्रसन्नता हुई रख दिया तुमको मजा आ गया अब यह फूल रोज आता रहे ऐसा ही बना रहे और मिलता ही रहे ये मुसीबत पैदा हो गई जय जय आ गया तो आ गया मिल गया तो मिल गया हो गया तो हो गया नहीं आया तो नहीं आया वह ठीक से भोगता है आदर्श भोगता का लक्षण क्या है मूड भोगता भोगों की चिंता भोगों को संभालना भोगों को पाना और भोगों के लिए पच पच के मर
जाना यह मूड भोगता के लक्षण है आदर्श भोगता अपने आप में तृप्त रहता है भोग खींच करर आते हैं मेहरबानी करता है महर पड़ती है जाती तो भोग का उपयोग कर लेता है नहीं तो बेपरवाह हो के रहता है उसी का नाम आदर्श भोक्ता आदर्श भोक्ता माना भोग उसके पीछे मंडार हैं और मूड भोगता भोगों के पीछे भागता ऐसा नहीं कि कृष्ण खाते पीते नहीं थे अरे तुम्हारे से बहुत बढ़िया खाए पिए जिए जनक नहीं खाते थे पीते थे रहते थे तुम्हारे से बढ़िया जिए होंगे कबीर जी नहीं खाए पिए अरे बहुत बढ़िया जिए होंगे
लेकिन वे आदर्श भोगता रहे उनको पता था कि भोगों के लिए हम नहीं भोग हमारे लिए है संसार की नश्वरता के लिए मैं अपना आत्म घात नहीं करूंगा को पीठ देकर छाया पकड़ने जाते हो तो छाया कितनी जल्दी तुम्हारे हाथ आती है पता है जरा ट्राई करके देखना और छाया को पीठ देकर सूरज के तरफ भागते हो तो छाया तुम्हारे पीछे कैसा आती जो सूरज के तरफ भागता है तो छाया उसकी अनुगामी नहीं हो जाती है लेकिन जो छाया की तरफ भागता है छाया उससे दूर भागती जाती है ऐसे ही जो अपने आंतरिक सुख का
त्याग करके बाहर के छाया जैसी परिस्थितियों को थामना चाहता है और उनको पकड़ रखना चाहता है उस बेचारे की हालत ऐसी हो जाती है