श्रीनगर में पीर पंजाल माउंटेन रेंज को पार करने के बाद एक खड़ी चट्टान पड़ती है जिसे स्थानीय लोग हस्ति वंज या हस्ती वाता के नाम से जानते हैं हस्ति वंज यानी जहां हाथी मारे गए किस्सा यूं है कि 1500 साल पहले एक राजा अपने विशाल फौज लेकर पीर पंजाल को पार कर रहा था एक रोज उसने एक हाथी की भयानक चीखें सुनी हाथी एक ऊंची चट्टान से गिर गया था अब यह राजा बड़ा ही क्रूर था हाथी की चीख सुनकर उसे इ तना आनंद आया कि उसने 100 हाथी चट्टान से ढकेल में का हुक्म दे
दिया इस किस्से का जिक्र कश्मीरी इतिहासकार कलहन ने राजतरंगिणी में किया है राजतरंगिणी 12वीं सदी में लिखी गई थी इसके अलावा इस किस्से का जिक्र आईने अकबरी में भी मिलता है ये दोनों ग्रंथ जिस राजा का जिक्र करते हैं उसका नाम था मेहर कुल मेहर कुल एक हूण शासक था जिसके बारे में कलन लिखते हैं मेहर कुल के आने की खबर मिलती थी गिद्धों और कौओं से जो उसकी फौज के आगे-आगे उड़ते थे ताकि उसके द्वारा मारे गए लोगों के शवों को खा सकें नमस्ते मैं हूं निखिल और आप देख रहे हैं ऐतिहासिक किस्सों कहानियो
से जुड़ा रोजाना का कार्यक्रम तारीख जिसमें आज हम जानेंगे ों की कहानी भारत पर विदेशी आक्रमण के मामले में हमारी मेमोरी काफी पीछे जाकर भी बहुत पास छूट जाती है जबकि भारत पर दसियों बार विदेशी आक्रमण हुआ और हमेशा एक ही तरह का नहीं हुआ ईसा से पहले से विदेशी आक्रमण हो रहे हैं मसलन सिकंदर का हमला भी एक विदेशी हमला ही था सिकंदर के बाद और ग्रीक्स भी आए फिर शक आए उनके पीछे कुषण और फिर हू ों के भारत पर आक्रमण का काल था दूसरी से छठी शताब्दी के बीच अब यहां पहला सवाल
तो यही उठता है कि हूण थे कौन शक कुषण हू ये सब दरअसल मध्य एशिया के मैदानों में रहने वाले कबीले हुआ करते थे मतलब जो आपका अभी का मॉडर्न सेंट्रल एशिया है वहां के जो लंबे चौड़े मैदान हैं वहां रहने वाली ट्राइब्स इन्हें चीन के लोग बर्बेरिस जंगली कह दिया करते थे ये लोग मैदानों का इस्तेमाल चारागाह की तरह करते थे लेकिन फिर जैसे-जैसे इनकी संख्या बढ़ी जमीन कम पड़ने लगी लिहाज ये कबीले समय-समय पर या तो यूरोप की तरफ गए या फिर इधर पूरब की तरफ आ गए यानी चीन और हिंदुस्तान भारत की
तरफ ये लोग पहले तारिंग घाटी जो कि आज शिजांग प्रांत का इलाका है आगे गांधार होते हुए पीर पंजाल के रास्ते भारत में दाखिल होते थे भारत क्यों आते थे इसका जवाब बड़ा सिंपल है कि यहां नदियां थी जमीन थी जंगल थे अच्छ मौसम था आप देखिए सेंट्रल एशिया के मैदानों में इलाका बहुत है लेकिन बड़ा हार्श क्लाइमेट है हिंदुस्तान में टेंपरेट माहौल है फसलें आप उगा सकते हैं तीन सीजन में फसल ले सकते हैं बढ़िया उपजाऊ जमीन है ईसा के बाद पहली सदी से लेकर छठी सदी तक ये पूरा इलाका एक म्यूजिकल चेयर बना
हुआ था जहां पहले शक फिर कुषाण और फिर ों का कंट्रोल होता रहा भारत में सबसे पहले जो हू आए वो किदारा इट हूण कहे जाते हैं हूण एक प्रकार के नहीं थे एक कौम नहीं थे किदारा इट हूण जब भारत में दाखिल हो रहे थे उसी समय अतिला नाम का एक ण यूरोप पर आक्रमण कर रहा था यूरोप के इतिहासकार अतिला को आज भी भगवान का अभिशाप मानते हैं उसको संज्ञा देते कहने का मतलब वह बहुत क्रूर था और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बर्बाद करता था कुछ यही हाल कीद राइट
ों ने भारत में भी किया कीद आइट ों के बाद भारत में हेलाइट हो आए फिर एल्कन हो आए और फिर लास्ट में ने जक ण आए पुराणिक भारतीय ग्रंथों में ण का जिक्र अलग-अलग तरीकों से है छठी शता में वरा मेहर बृहत संहिता में श्वेत हूणों का भी जिक्र करते हैं इसी प्रकार उन्होंने उत्तर भारत में हरा हूणों का भी जिक्र किया जिससे पता चलता है कि एक ही समय में हूणों के अलग-अलग कबीले भारत में रहे यहां तक कि हूणों का जिक्र महाभारत में भी मिलता है दुर्योधन पांडवों की राजधानी इंद्र प से
लौटते हुए जिक्र करता है कि युधिष्ठिर के द्वार पर हूण और बाकी कबीले के लोग खड़े थे जो अंदर नहीं जाने दे रहे थे नकुल द्वारा एक ू राज्य को जीतने का भी जिक्र महाभारत में है इसके अलावा रघुवंश नाम के महाकाव्य में में कालिदास जब भगवान राम के पूर्वजों का जिक्र कर रहे हैं तो लिखते हैं कि कैसे राजा रघु ने वंशु नदी के किनारे बसे ण राज्य पर जीत हासिल की थी अगला सवाल उन्होने भारत पर हमला कैसे किया कारण बता दिया हमने जैसे पहले बताया सबसे पहले आए किदा राइट ह इन्हें य
नाम मिला था उनके राजा किदार से यह कबीला साइबेरिया से गांधार होते हुए भारत पहुंचा इसका जिक्र चीन की किताब द बुक ऑफ वू में मिलता है इसके अनुसार एक दूसरे कबीले के साथ तनातनी के चलते की द राइट अफगानिस्तान की तरफ आए यहां उनके राजा किदार ने अपनी फौज खड़ी की और हिंदू कुश को पार कर उत्तर भारत पर आक्रमण कर दिया किदार के पास गांधार समेत उत्तर भारत के पांच राज्यों पर कब्जा था अब आप कहेंगे कि हमको कैसे पता उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में मिले एक स्तंभ पर ों के पहले आक्रमण
का जिक्र है ये स्तंभ गुप्त काल का है जिसे सम्राट स्कंदगुप्त के समय में लगाया गया यानी कि 455 ईसवी से 467 ईसवी के बीच की बात है इसके अलावा गुजरात के जूनागढ़ में मिला एक शिलालेख इस बार बात की तस्दीक करता है कि स्कंदगुप्त ने हूणों के साथ लड़ाई की थी बहरहाल कि द राइट ों के बाद भारत में जो अगले ण आए वो थे एल्कन होण कश्मीरी इतिहासकार कलहन ने राजतरंगिणी में जिक्र किया है कि एल्कन हूणों का तुं जिना नाम का एक राजा होता था कलन ने तुं जिना को एक और नाम
से बुलाया है श्रेष्ठ सेन तुं जिना इसी श्रेष्ठ सेन तुं जिना ने उत्तर भारत में एल्कन ों का साम्राज्य खड़ा किया तुं जिना के बाद एल्कन ों के अगले राजा का नाम था तोर माण तोर माण के समय में यानी कि पांचवीं सदी में उन्होंने भारत के एक बड़े भूभाग पर अपना शासन भी जमा लिया था और इसका सबूत मिलता है मध्य प्रदेश के विदिशा में मिले एक शिलालेख से जिसमें तोर माण को महाराजाधिराज की उपाधि दी गई है इससे पता चलता है कि उन भारत में कितना अंदर तक विदिशा भोपाल के पास है साल
1974 में गुजरात के दाहो जिले में मिली तांबे की कुछ प्लेट्स में लिखा है कि तोर मांड ने गुजरात और मालवा को कैसे जीता था तोर माण के बाद हूणों का राजा बना मेहर कुल जिसका जिक्र हमने बिल्कुल शुरू में किया जिसने हाथी मरवाएगी बारे में ही लिखा गया कि उसने बौद्धों का दमन किया और भयंकर लूट मचाई चीनी यात्री सं युन ने मेहर कुल के दरबार में विजिट किया था गया था वो संग युन के लिखे अनुसार मेहर कुल के पास हाथियों की फौज थी उसके पास 700 हाथी थे हर हाथी पर 10 आदमी
बैठते थे जिनके पास भाले और तलवार होती थी यहां तक कि हाथियों के सूर्ण में भी एक किस्म की तलवार फिट की जाती थी ताकि वो दुश्मनों को मार सके ट्रेनिंग होती थी हाथी बड़ा इंटेलिजेंट जानवर है कलन ने राष् तरंगिणी में लिखा है कि मेहर कुल ने श्रीलंका कोल यानी तमिलनाडु कर्नाटक यानी कर्नाटका इन सभी को जीता था हालांकि अधिकतर इतिहासकार इससे सहमत नहीं है कि इतनी डेप्थ नहीं थी उसके कैंपेन की आधिकारिक इतिहास के अनुसार मेहर कुल का राज केवल उत्तर भारत तक सीमित था बहरहाल कहानी के इस पड़ाव में एक और सवाल
उठता है व लाजमी है कि भारतीय राजाओं ने नों को रोकने की कोशिश क्यों क्यों नहीं की की तो क्या किया इसका जवाब है कोशिश की थी ण जब हिंदुस्तान आए तो यहां गुप्त वंश के राजाओं का शासन था सबसे बड़ी ताकत वो थे गुप्त काल के बारे में आप और बेहतर तरीके से जानना चाहते हैं तो एक ऑडियो बुक आप सुन लिए गोल्डन एज ऑफ गुप्त डायनेस्टी ये आपको मिल जाएगी कहां ये एक ऑडियो बुक है और आप इसे सुन सकते हैं कुक एफएम पप पर कुक एफएम इंडिया का लीडिंग ऑडियो प्लेटफार्म है जहां
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एक वंश का राज था इनके राजा प्रकाश धर्मन ने तोर माण को एक युद्ध में हराया और और नों को पंजाब के इलाके में समेट दिया हालांकि तोर माण का बेटा मेहर कुल एक बार फिर सेना के साथ लौटा मेहर कुल का सामना हुआ प्रकाश धर्मन के बेटे यशोधर्मन से और इस युद्ध में उसका साथ दिया गुप्त वंश के शासक नरसिंह गुप्त ने नरसिंह गुप्त और यशोधर्मन के हाथों मेहर कुल की हार का जिक्र नसांग ने भी किया है चीनी यात्री नसांग ने लिखा है कि मेरकुरी कोशिश की लेकिन फिर उसका पतन होता गया 528
ईसवी के आसपास अभी से 1500 साल पहले की बात है ऑलमोस्ट इसके आसपास नों और भारतीय राजाओं के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ जिसे सोदी का युद्ध कहा जाता है इस युद्ध में मेहर कुल की हार हो गई और वो पीछे हटा वन सां के अनुसार इसके आगे मेहर कुल ने कश्मीर पर राज किया लेकिन यहां भी ज्यादा समय तक राज नहीं कर पाया कश्मीरी इतिहासकार कलहन लिखते हैं कि जिसके आने से धरती कांप उड़ती थी उस मेहर कुल का शरीर अनेक रोगों से ग्रस्त होता गया और उसने स्वयं को आग की लपटों में भस्म
कर लिया मेर कुल के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि वो था चाहे हो लेकिन उसने खुद को भारतीय परंपरा में रचा बसा भी लिया था उसने शैव परंपरा को बढ़ावा दिया कलन के अनुसार उसने श्रीनगर में मेहरे शवर नाम का एक शिव मंदिर भी बनवाया शिव के प्रति मिहिरकुल की निष्ठा इससे भी पता चलती है कि इसके द्वारा जारी किए गए सिक्कों में नंदी बना होता था मेहर कुल ने शिव परंपरा को बढ़ावा दिया लेकिन बौद्ध ग्रंथ मेरक को बहुत कोसते हैं जिनके अनुसार उसने बौद्धों का दमन किया था उनके मठ तोड़े
बहरहाल आगे बढ़ते हैं और जानते हैं कि मेहर कुल के बाद नों का क्या हुआ कलन के अनुसार मेहर कुल के बाद राजा बना प्रवर सेन जो मेहर कुल का छोटा भाई था कहानी वैसे ये भी कहती है कि मेहर कुल के जीते जी ही उसके डर से माने मेहर कुल के डर से प्रवर सेन की मां अंजना ने प्रवर सेन को एक कुम्हार के घर में छिपा के रखा था कि अगर देख लेगा तो मार देगा मीर सेन की मौत के बाद प्रवर सेन लाइम लाइट में आए बाहर आए कुमार के घर से और
तख्त पर कब्जा किया प्रवर सेन के बारे में कलन ने लिखा कि वो मेहर कुल की भाती क्रूर नहीं था उसने लोगों के भले के लिए कुछ निर्माण भी करवाया और प्रवर सेन आपु नाम का एक शहर भी बसाया कई इतिहासकार मानते हैं कि प्रवर सेन आपु ही आज का श्रीनगर हो सकता है प्रवर सेन के बाद नों का क्या हुआ लंबे समय तक इतिहासकार मानते रहे कि प्रवर सेन ों का अंतिम राजा था लेकिन फिर 1956 में हुई एक खोज से एक नई कहानी सामने आने लगी साल 1956 में भारतीय पुरातत्त्व विभाग का एक
प्रतिनिधि मंडल गया काबुल अफगानिस्तान यहां पी रतन नाथ दरगाह के पास उन्हें भगवान गणेश की एक मूर्ति मिल गई लाइव हिस्ट्री इंडिया के एक आर्टिकल में अशोक चौहान लिखते हैं कि मूर्ति काबुल से 70 किलोमीटर दूर रदेश नाम की जगह से लाई गई थी जिसके नीचे एक अभिलेख था इस अभिलेख के अनुसार महाविनायक की ये मूर्ति महाराजाधिराज शाही खिा ने बनाई थी थोड़ा और रिसर्च से बात सामने आई कि खिा नों का राजा था और प्रवर सेन का पोता था हालांकि खिा के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं मिलती है लेकिन इतिहासकारों के अनुसार खंगाला
ने अफगानिस्तान में बामियान तक अपना साम्राज्य फैलाया उसका बेटा युधिष्ठिर उसके बाद राजा बना और व ों का आखिरी राजा हुआ युधिष्ठिर को हराने वाले शख्स का नाम था प्रताप दित्य जिसने कारकोटा वंश की नीव रखी युधिष्ठिर की हार के साथ ही नों का शासन पूरी तरह खत्म हुआ इस तरह भारत में हूणों की कहानी जो लगभग दूसरी सदी में शुरू हुई थी वह 670 ईसवी में आकर खत्म हो जाती है ण इसके बाद भी हिंदुस्तान में रहे लेकिन साम्राज्य की तरह नहीं आम लोगों की तरह ों को भारत ने वैसे ही लेक लिया वैसे
ही अपना लिया जैसे उसके बाद आने वाले लोगों को अपनाया कोणों की कहानी के बाद हम आगे कोशिश करते रहेंगे कि भारतीय इतिहास की और कहानी आप तक लाते रहे आखिर में आपको एक बार फिर बता दें कुक एफएम का सब्सक्रिप्शन लेने के लिए आपको एलटी 50 का कोड यूज करना है ज्यादा जानकारी के लिए आप डिस्क्रिप्शन में दिया लिंक क्लिक कर सकते हैं इस नोट पे तारीख के इस बेहद शानदार एपिसोड को हम यहां कंक्लूजन ने लिखा है बड़ी मेहनत से मेरा भी रिवीजन हो गया और आलोक ने इसे रिकॉर्ड किया है आप देखते
रहिए द ललन टॉक [संगीत]