आपको शायद याद नहीं मेरा नाम सलाहुद्दीन सलाद नाजरीन आज हम बात करेंगे एक ऐसे महान जंगजू की कि जिसने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया और ईसाइयों के एक अजीम लश्कर को हराकर यरूशलम को फतह किया यह वाकया है 12वीं सदी का के जब शाम में सुल्तान सलाउद्दीन अपनी फौज के साथ एक मैदान में खेमा जन थे उनके खेमे के बाहर एक कम उम्र लड़की खड़ी थी जो खमे में दाखिल तो होना चाहती थी लेकिन खौफ से इसका जिस्म लरज रहा था आखिर उसने हिम्मत करके खेमे का पर्दा उठाया और डरते कांपते हुए अंदर दाखिल हुई
इसके सामने वक्त का सुल्तान बैठा था सुल्तान ने लड़की को देखा और पूछा तुम्हारे आने का मकसद क्या है लड़की ने डरते डरते कहा मैं आपसे एजाज मांगने आई हूं एजाज उस शहर का नाम है जिसे सुल्तान ने 38 दिन की लड़ाई और हजारों जानों की बानी के बाद फतह किया था हत्ता कि इस शहर के लिए सुल्तान सलाउद्दीन ने अपनी जिंदगी भी खतरे में डाल दी थी फिर भी वह इस लड़की को इंकार नहीं कर सके उन्होंने कहा अगर तुम एजाज मांगती हो तो यह इलाका तुम्हारा हुआ यह कहा और उस लड़की को बहुत
सी दौलत देकर अपने खेमे से रुखसत कर दिया सुल्तान जानते थे कि इस लड़की को उनके दुश्मनों ने भेजा है फिर भी उन्होंने लड़की की बात मान ली क्योंकि यह लड़की सुल्तान के मोहसिन नूरुद्दीन जंगी की बेटी थी वही नूरु उद्दीन जंगी जिन्होंने ख्वाब में नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि व आलि वसल्लम का दीदार किया था और आप सल्लल्लाहु अलैहि वा आलि वसल्लम की कब्र मुबारक तक सुरंग लगाने की नापाक जसारत करने वाले दो यहूदियों को कत्ल कर दिया था और जंगी की बेटी जिस सुल्तान से एजाज शहर मांगने आई थी वह भी कोई मामूली इंसान
नहीं था इसका नाम सलाउद्दीन यूसुफ था जिसे दुनिया सुल्तान सलाहुद्दीन अयूबी के नाम से जानती है हम आज आपको तारीख के इसी ना काबिले फरामोश किरदार सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी की बायोग्राफी दिखा रहे हैं सुल्तान अयूबी ने जिस तरह एजाज शहर एक लड़की के हवाले कर दिया था उन्हें अपनी सल्तनत इस तरह प्लेट में रखकर नहीं मिली थी बल्कि इसके लिए हर कदम पर जंग और जदल का सामना करना पड़ा था सलाउद्दीन अयूबी पैदायशी हुक्मरान नहीं थे बल्कि उनके चाचा शेर को नूरु उद्दीन जंगी के कमांडर थे इस हैसियत में वह अपने भतीजे को भी हर
जन में अपने साथ ले जाते थे उस दौर में इस्लामी सल्तनत कई हिस्सों में तकसीम हो चुकी थी अब्बासी सल्तनत सिर्फ बगदाद तक महदूद रह गई थी इराक और शाम के ज्यादातर इलाके खुद मुख्तार हुक्मरानों के कंट्रोल में थे जो हर वक्त आपस में लड़ते रहते थे जबकि मिस्र पर फातमी खानदान की हुकूमत थी बैतल मकद समेत फलस्तीन के कई इलाकों पर सलीबी का कंट्रोल था इन हालात में नूर उद्दीन जंगी ने शाम के बेश तर इलाकों पर कब्जा कर लिया फिर उन्होंने मिस्र की मदद के लिए फौज भेजी तो सलाउद्दीन अयूबी भी इस फौज
में शामिल होकर मिस्र चले गए उस जमाने में मिस्र की हालत यह थी कि करप्शन की वजह से फातमी सल्तनत बहुत कमजोर हो चुकी थी इख्तियार खलीफा से ज्यादा वजीर के कंट्रोल में थे इन हालात में सलाउद्दीन अयूबी जो कि अब अपने चचा शेर को की वफात के बाद फौज के कमांडर बन चुके थे उन्होंने फातमी खलीफा को हुकूमत से हटा दिया वह खुद मिस्र पर हुकूमत करने लगे मिस्र हों ने कभी इतना सखी हुक्मरान नहीं देखा था सलाउद्दीन ने मिस्र का गवर्नर बनते ही कायरा का सारा खजाना गरीब आवाम में तकसीम कर दिया और
अपने लिए फूटी कौड़ी भी नहीं रखी सलाउद्दीन अयूबी शायद मिस्र के गवर्नर की हैसियत से ही जिंदगी गुजार देते लेकिन नूरुद्दीन जंगी के इंतकाल ने उनकी जिंदगी में एक इंकलाब बरपा कर दिया साजिश दरबारियों ने जंगी खानदान की सल्तनत आपस में तकसीम कर ली जब सलाउद्दीन अयूबी ने यह सूरते हाल देखी तो उन्होंने मिस्र को एक अलग सल्तनत में तब्दील कर दिया और खुद उसके सुल्तान बन गए फिर उन्होंने जंगी के साजिश उमरा को सबक सिखाने का फैसला किया और शाम पर हमला कर दिया उनकी ख्वाहिश तो थी कि नूरु उद्दीन जंगी का बेटा उनका
साथ दे लेकिन जाहिर है वह साजिश उमरा के हाथों में खेल रहा था इसलिए सलाउद्दीन अयूबी की ओ से ना बन सकी अयूबी ने जल्द ही दमिश्क फतह कर लिया और मिस्र से लेकर शाम तक एक बड़े इलाके के हाकिम बन गए सुल्तान अयूबी रहम दिल सखी और बहादुर तो थे ही लेकिन उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उनका दिल बहुत बड़ा था वह अपने दुश्मन की खूबियों की भी तारीफ करते थे और मौका मिलता तो पुरानी दुश्मन आं फरा मोश करके अपने बदतर दुश्मनों को भी दोस्त बना लेते थे सुल्तान का एक ऐसा
ही दुश्मन था जो उनके खून का प्यासा था लेकिन सुल्तान की मेहरबानी से वही दुश्मन उनका सबसे बड़ा दोस्त साबित हुआ यह शख्स फिरका बानिया का लीडर शेख सनान था जो शाम के कला नस जाफ का हुक्मरान था यह फिरका आम इंसानों को ट्रेनिंग देकर जबरदस्त कातिल बना देता था यह कातिल फिदाई कहलाते थे फिदाई हशीश का आम इस्तेमाल करते थे इसलिए उन्हें हसन भी कहा जाता था बाद में हसन का लफ्ज इंग्लिश में असेस बन गया जिसका मतलब है खूनी कातिल यह असे सन इतने खतरनाक थे कि उनके खौफ से इस्लामी दुनिया के बड़े-बड़े
हुक्मरान कांपते थे और फिर एक दिन उन फिदाई हों को सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी के कत्ल का हुक्म मिल गया वजह यह थी कि नूरु उद्दीन जंगी के साबिक उमरा समझ चुके थे कि वह सुल्तान को उमराने जंग में नहीं हरा सकते इसलिए वह साजिशों पर उतर आए उन्होंने शेख सनान को माल और दौलत का लालच देकर इस बात पर राजी किया कि वह अपने फिदाई हों के जरिए सुल्तान को कत्ल करा दे शेख सनान मान गया और फिदाई सुल्तान के कत्ल के लिए चल पड़े फिर एक खूनी खेल शुरू हो गया पहले कातिलों का एक
ग्रुप आया जो नाकाम रहा और मारा गया फिर एक कातिल सुल्तान के खेमे में दाखिल हुआ और उनके सर पर छुरी से हमला कर दिया सुल्तान के सर पर पगड़ी थी लेकिन पगड़ी के नीचे लोहे का हेलमेट भी था 100 छुरी का वार नाकाम रहा सुल्तान के मुहाफिज ने फिदाई को कत्ल कर दिया लेकिन वह फिदाई कत्ल हुआ तो एक और आ गया वह मारा गया फिर तीसरा आया वह भी मारा गया लेकिन सुल्तान समझ गए थे कि जब तक शेख सनान का खात्मा नहीं होगा उनकी जिंदगी पर यह तलवार लटकती रहेगी चुनांचे वह एक
बड़ी फौज लेकर निकले उन्होंने सैया का मुहास कर लिया जहां शेख सनान मौजूद था लेकिन शेख सनान को इस हमले की कोई परवाह नहीं थी फिर एक रात एक अजीब वाकया हुआ जिसने सारे मामले का रुख ही बदल दिया हुआ यूं कि सुल्तान अपने खेमे में सो रहे थे कि अचानक वह नींद से जाग उठे उन्होंने देखा खेमे के चिराग बुझ चुके थे और खेमे में कोई और भी मौजूद था सुल्तान ने मुहाफिज को आवाज दी वह दौड़ते हुए आए और जब चिराग दोबारा चलाए गए सबने एक हैरत अंगेज मंजर देखा सुल्तान के बिस्तर के
करीब एक खंजर पड़ा था उसके साथ एक कागज था जिस पर लिखा था बादशाह सलामत अब हमारे रहमो करम पर है जरा होश में आइए सुल्तान बहुत हैरान हुए और उनके हुक्म पर मुहाफिज ने खेमे के गिर्द जायजा लिया तो एक शख्स के कदमों के निशानाथ कुछ दूर तक दिखाई दिए लेकिन कोई पकड़ा नहीं जा सका सुल्तान अपने दुश्मनों की दीदा दिलेरी और हैरत अंगेज जंगी सलाहियत से बहुत मुतासिर हुए उन्होंने शेख सनान को दोस्त बना लिया और ऐसा पक्का दोस्त बनाया कि वही शख्स जो सुल्तान के खून का प्यासा था वह सुल्तान के साथ
मिलकर उन्हीं के दुश्मनों से लड़ता रहा ताहम बाज मुखन यह भी कहते हैं कि उस रात सुल्तान के खेमे में कोई नहीं आया था यह वाकया बिल्कुल झूठ है वह यह भी कहते हैं कि सुल्तान के सख्त मुहास से खौफ जदा होकर शेख सनान ने खुद रहम की दरख्वास्त की थी किस्सा कुछ भी हो बहरहाल सुल्तान ने अपने बदतर दुश्मन को भी अपना इत्तेहाद बनाकर आला जर्फीले सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी के लिए साजिश उमरा या शेख सनान नहीं बल्कि फलस्तीन की सलीबी सल्तनत सबसे बड़ा चैलेंज थी सलीब ने 1099 में बैत अल मकद पर कब्जा कर
लिया था उनकी हुकूमत को एक सदी होने को आई थी लेकिन वह इलाके की बाकी सल्तनत के साथ अम्नो अमान से रहने पर तैयार नहीं थे सुल्तान ने इनसे सुलह की कई कोशिशें की क्योंकि वह सबके साथ पुरा अमन तरीके से रहना चाहते थे वह तो आपस में लड़ने वाली मुसलमान सल्तनत को भी मुत्त हैद करना चाहते थे सुल्तान को सलीब यों और मुसलमान हुक्मरानों दोनों से ही जंगे लड़ना पड़ी लेकिन हकीकत में वह दोनों ही से अमन के मुआद करना चाहते थे एक तरफ तो उन्होंने सलीब से सुला के मुआद किए तो दूसरी तरफ
मुसलमान हुक्मरानों की एक कान्फ्रेंस भी मुनक कराई इस कॉन्फ्रेंस में त पाया कि यह हुक्मरान अब एक दूसरे के खिलाफ तलवार नहीं उठाएंगे इन मुआद से सुल्तान को इत्मीनान हो गया था कि अब खि में दोबारा जंग नहीं होगी लेकिन सलाउद्दीन अयूबी के दुश्मन जल्द ही सुला के मुआद तोड़ने लगे खास तौर पर मूसल का हुक्मरान बार-बार सलीब हों के साथ मिलकर सुल्तान के खिलाफ साजिशें शुरू कर देता था सुल्तान ने मूसल के हुक्मरान को साजिशों की सख्त सजा दी और शहर का मुहास कर लिया आखिर मूसल के हुक्मरान ने भी सुल्तान से एक मुआद
के तहत अमन कायम कर लिया ता हम सलीबी अपनी ताकत के जूम में सुल्तान के साथ मुस्तकिल सुला नहीं चाहते थे चुनांचे 1177 में सुल्तान ने फौज जमा की और मिस्र से निकलकर फलस्तीन पर हमला कर दिया शुरू में उन्हें बहुत कामयाबी मिली और उन्होंने कई कले फतह भी कर लिए लेकिन उन किलों की हिफाजत के लिए काफी फौज पीछे छोड़ना पड़ी चुनांचे जब वह फलस्तीनी शहर रमला के करीब पहुंचे तो उनकी फौज आधी भी नहीं रही थी सलीब यों ने इस सूरते हाल का फायदा उठाया और 25 नवंबर 1177 को सलाउद्दीन अयूबी पर अचानक
हमला करके उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया यह पहला मौका था कि सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी को माने जंग में नाकामी हुई थी लेकिन असल सुल्तान वही होता है जो नाकामी से भी सबक सीखे इस जंग के बारे में सुल्तान ने खुद दमिश्क में अपने भाई तोरा शा को खत लिखा सुल्तान ने लिखा हम बड़ी मुश्किल से जान बचाकर आए हैं खुदा को हमसे कोई बेहतर काम लेना था जो बचा लिया सुल्तान को अपनी शिकस्त का हिसाब बराबर करने का मौका जल्द ही मिल गया यों के रमला में कामयाबी हासिल करके सलीबी यह समझने लगे
कि सुल्तान अब अपनी सल्तनत का दिफाई अल मकद के सलीबी हुक्मरान बेड व फ ने दमिश्क पर चढ़ाई कर दी लेकिन वह गलती पर था क्यों के सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी की ताकत में कोई कमी नहीं आई थी उन्हें सिर्फ वक्ती तौर पर कम तादाद की वजह से पीछे हटना पड़ा था लेकिन बैड वन फर के हमले के जवाब में अब वह अपनी पूरी फौज जमा कर चुके थे 10 जून 1179 को जब दोनों फौज आमने-सामने आई तो सलाउद्दीन अयूबी ने अपने फौजियों के सामने एक जबरदस्त तकरीर की उन्होंने कहा मुसलमान जिल्लत की जिंदगी पर मौत
को तरजीह देता है आगे बढ़ो और दुश्मन को बता दो कि मुसलमान पांव पर नहीं सीने पर जख्म खाता है चुनांचे जब जंग हुई तो सुल्तान के वफादार ने बैड व फर की फौज को जबरदस्त शिकस्त दी शिकस्त खुर्दा बेड वन ने सुला की दरख्वास्त की सुल्तान चाहते तो दुश्मन की शिकस्त और कमजोरी का फायदा उठाकर फलस्तीन को उसी वक्त दुश्मन से छीन सकते थे वह यह भी जानते थे कि दुश्मन सुलह के मुहि दे तोड़ भी सकता है लेकिन फिर भी उन्होंने रहम से काम लिया और एक बार फिर अपने बदतर दुश्मनों से सुला
कर ली लेकिन यह सुला माजी के मुआद से मुख्तलिफ थी क्योंकि यह सुला आखरी सुला थी सुला के बाद चंद साल तो सुकून से गुजर गए बेड वन फॉर 1185 तक जिंदा रहा और वह सुलह के मुआद पर भी अमल करता रहा लेकिन कड़ के मर्ज की वजह से इसकी मौत हो गई जिसके बाद बैतल मकद की सलीबी सल्तनत भी उमरा की साजिशों का शिकार होने लगी इस दौरान बैतल मकद में गाय ऑफ लिव इनन की हुकूमत आ गई कि जो मुसलमानों का खुला दुश्मन था उसने मुसलमानों के खिलाफ फिर कार्रवाइयों शुरू कर दी एक
सलीबी सरदार रेनॉल्ड ने मुसलमानों को तंग करना शुरू कर दिया यह सरदार इस हद तक चला गया कि इसने मदीना मुनव्वरा में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलि वसल्लम के रोजा मुबारक को तबाह करने का इरादा कर लिया उसने सिर्फ इरादा ही नहीं किया बल्कि इसने अपने बहरी जहाजों के जरिए अरब साहिली इलाकों पर हमले भी करवाए लेकिन सुल्तान के बहरी जंगी जहाजों ने रेनाल्ट के बहरी बेड़े को तबाह करके यह नापाक मंसूबा नाकाम बना दिया लेकिन रेनॉल्ड अपनी हरकतों से बाज नहीं आया उसने मिस्र और शाम के दरमियान सफर करने वाले मुसलमानों के काफिले
को लूटना शुरू कर दिया सिर्फ तिजार काफिले को ही नहीं बल्कि हाजियों के एक ऐसे काफिले पर भी हमला कर दिया जिसमें सुल्तान की बहन भी शामिल थी काफिले को तो लूट लिया गया लेकिन तान की बहन किसी ना किसी तरह दुश्मन से बचकर सुल्तान के खेमे में पहुंची और काफिले पर बीतने वाले जुल्म का हाल बयान किया काफिले पर जुल्म का हाल सुनकर और अपनी बहन की बेइज्जती पर गैरत मंद भाई का खून खोल उठा सुल्तान ने कसम खाई कि वह रेनाल्ट को अपने हाथों से कत्ल करेंगे बहरहाल अब सुल्तान ने अपने तमाम इत्तेहाद
और गवर्नर को खत लिखे और उन्हें कहा कि वह फौज लेकर सुल्तान की मदद को पहुंचे क्योंकि अब सलीब हों के खिलाफ का वक्त आ चुका चुनांचे मिस्र और शाम समेत कई मुसलमान मु मालिक से बड़ी तादाद में फौज दमिश्क पहुंचने लगी जिसे सुल्तान ने उस वक्त अपना दारुल खिलाफा बना रखा था सुल्तान ने फौज जमा की और सलीब के जेरे कंट्रोल शहर कि ब्रिया अलिफ टाइ बस का मुसरा कर लिया जवाब में रेनॉल्ड ने भी जंग की तैयारियां शुरू कर दी वह गाय ऑफ लिनन का गहरा दोस्त भी था इसलिए गाय भी अपनी फौज
के साथ मैदान में आ गया उसने सुल्तान अयूबी से सुला का मुहि भी तोड़ दिया कहा जाता है कि बैतल मकद पर सलीबी कब्जे के बाद से सलीब यों ने इतनी बड़ी फौज जमा नहीं की थी जो सुल्तान अयूबी के मुकाबले पर आई रेनाल्डो ने सुल्तान की तरफ पेश कदमी शुरू की सुल्तान ने सलीब यों को फैसला कुन शिकस्त देने के लिए हतीम का इलाका चिन लिया इस इलाके में पानी के चंद एक ही चश्मे थे और ज्यादातर इलाका बंजर और वीरान था सुल्तान की फौज पानी के चश्मों के पास ठहर गई जबकि सलीबी फौज
को सुल्तान तक पहुंचने के लिए 20 किलोमीटर के एक ऐसे इलाके से भी गुजरना था जहां पानी ही नहीं था कुछ सलीबी कमांडर यह कह रहे थे कि आगे बढ़ने में खतरा है क्योंकि उन्हें फौज के लिए पानी नहीं मिलेगा लेकिन गाय ने उनकी बात ना मानी क्योंकि इसे एतमाद था कि जंग में इसे कोई नहीं हरा सकता इसके इस यकीन की वजह थी सलबे आजम आट जी हां सलीब हों के पास एक बहुत बड़ी सलीब थी जिसमें लकड़ी का एक टुकड़ा नुमाया था सलीब हों का अकीदा था कि यह टुकड़ा उसी असल सलीब का
है जिस पर हजरत ईसा को रोमियो ने मसलबर्ग में लेकर गई थी और हर बार फतह हासिल की थी गाय और उसके साथी समझते थे कि सलीब आजम की मौजूदगी में यह जन भी वही जीतेंगे इसलिए उ उन्होंने रास्ते की सारी मुश्किलात को नजरअंदाज कर दिया लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी यह फौज जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई गर्मी और प्यास की शिद्दत से बेहाल होती गई चुनांचे जब यह फौज सुल्तानी लश्कर के सामने पहुंची तो थकन और प्यास से निढाल हो चुकी थी जब रात हुई तो सुल्तानी फौजियों ने सिलवियो के कैंप में घुसकर
घोड़ों की घास के गट्ठर को आग लगा दी सलीब के पास आग बुझाने के लिए पानी ही नहीं था जब कि आग की तपेश से इनकी प्यास और भड़क उठी आग और धोई की वजह से वह लोग रात भर सो भी नहीं सके अगले दिन 4 जुलाई 1187 को सुल्तान ने सलीबी फौज पर हमला किया मुसलमानों ने जहरीले तीरों की बारिश करके सैकड़ों सलीबी हलाक कर दिए फिर फौजी दस्ते आगे बढ़े और दुश्मनों पर टूट पड़े सलीबी फौज के ज्यादातर सिपाही बगैर लड़ाई के ही मैदान में जंग से फरार हो गए जो बाकी रहे में
मुकाबले की ताकत ही नहीं थी इसलिए वह आसानी से पकड़े गए सलीब ए आजम भी मुसलमानों के कब्जे में चली गई रेनाल्ट और गाय दोनों जंगी कैदी बने सलीबी लश्कर के सिपाही प्यास से हाप रहे थे सुल्तान ने उन्हें पानी पिलाने का हुक्म दिया गाय को तो ठंडा अरख गुलाब पिलाया लेकिन रेनाल्ट को बद अहदी की भरपूर सजा दी सुल्तान ने अपने हाथों से इसका सर कलम कर दिया यह देखकर गाय डर गया कि अब उसकी बारी है लेकिन सुल्तान ने इसे इत्मीनान दिलाते हुए कहा बादशाह बादशाहों को कत्ल नहीं किया करते अब सुल्तान बैत
अल मकद की तरफ बढ़े शहर का हुक्मरान तो पहले ही उनकी कैद में था उन्हें उम्मीद थी कि शहर आसानी से फतह हो जाएगा लेकिन सलीब यों ने सुल्तानी फौज का एक हफ्ते से ज्यादा अरसे तक डटकर मुकाबला किया और दोनों तरफ से भारी जानी नुकसान हुआ सुल्तानी लश्कर ने आग के गोलों की बारिश करके दीवारों में शिगा फ पैदा कर दिए सलीबी लश्कर को खौफ हुआ कि अगर मुसलमान शहर पर काबिज हो गए तो कहीं उनके बीवी बच्चों को गुलाम ही ना बना ले चुनांचे उन्होंने लड़ाई का इरादा छोड़कर सुल्तान के रहम को पुकारा
और सुल्तान ने भी इस पुकार का जवाब रहम दिल्ली से ही दिया जहां 88 बरस पहले जब सलीब यों ने कब्जा किया था तो खून की नदियां बहा दी थी लेकिन जैसे नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वा आलि वसल्लम ने फतह मक्का के मौका पर अपने बदतर दुश्मनों को मुफ कर दिया था इसी तरह फाते बैत अल मकद ने भी अपने दुश्मनों को मुफ कर दिया उन्होंने शर्त आयद की कि हर ईसाई मर्द 10 दीनार और औरत 5 दीनार अदा करें और आजादी हासिल कर ले जो ऐसा ना कर सके उसे गुलाम बना लिया जाएगा दिलचस्प
बात यह है कि सलीब यों के मजहबी रहनुमाओं ने फौरी तौर पर यह रकम अदा की और जिंदा सलामत निकल गए मजहबी रहनुमाओं का लीडर तो तो हीरे जवाहरात से लदे संदूक भी सुल्तानी फौज के सामने लेकर चला गया लेकिन इतनी दौलत दे जाने वाले अपने पीछे गरीबों को छोड़ गए थे जिनका फिद्या देने वाला कोई नहीं था यह सलीबी खौफ जदा थे कि सुल्तान के फौजी उन्हें गुलाम बना लेंगे लेकिन सुल्तान का रहम सिर्फ अमीरों के लिए नहीं था उन्होंने गरीब सलीब हों को मुफ्त आजादी बख्श दी कुछ सलीबी तो सुल्तान के सुलूक से
मुतासिर होकर इसी शहर में ठहर गए सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी की रहम दिल्ली और सुलूक का मगरिब भी तरा करता है यूं 2 अक्टूबर 1187 को बैत अल मकद पर सलाउद्दीन अयूबी का मुकम्मल कंट्रोल हो गया यानी बैत अल मकद 88 बरस बाद दोबारा मुसलमानों के कंट्रोल में चला गया सुल्तान ने गाय ऑफ लिव नन को भी आजाद कर दिया लेकिन इस शख्स ने आजादी का नाजायज फायदा उठाया और बैत अल मकद से निकलने वाले सलीब को साथ मिलाकर साहिली शहर का का मोसरा कर लिया उधर बैत अल मकद ली बियों के हाथ से निकलने पर
सारे यूरोप में कोहराम बरपा हो गया और जंग की तैयारियां होने लगी ब्रितानिया में तो सलाउद्दीन टैक्स लगाया गया था कि पैसे जमा करके सुल्तान के मुकाबले के लिए फौज जमा की जा सके यह ऐलान भी किया गया कि जो लोग सुल्तान के खिलाफ लड़ने जाएंगे उनके गुनाह मुआफ हो जाएंगे जर्मनी और फ्रांस में तो खवातीन ने अपने जेवर फरोख्त करके पैसे फौज की मदद के लिए दिए चुनांचे बितानिया का बादशा रिचर्ड जिसे शेर दिल भी कहा जाता था वह फ्रांस और जर्मनी की फौजों के साथ इक्का पहुंच गया रिचर्ड ने सलीबी लश्कर की कमान
संभाल ली थी मुसलमान और सलीबी शदीद जंग में उलझे थे इस दौरान सलाउद्दीन अयूबी बुरी तरह बीमार हो गए जिसकी वजह से मुहास पर इनकी फौज का नुकसान होने लगा सुल्तान को महफूज मकाम पर जाने का मशवरा दिया गया लेकिन उनकी गैरत ने गवारा ना किया कि वह अपने साथियों को दुश्मनों के रहमो करम पर छोड़ कर चले जाए इस दौरान रिचर्ड ने इक्का पर हमला कर दिया जबकि बीमार सुल्तान इक्का वालों की मदद को ना पहुंच सके एका शहर में मौजूद मुसलमानों ने हथियार डाल दिए सुल्तान ने रिचर्ड को पेशकश की के मुसलमान कैदियों
को छोड़ दिया जाए तो सलीब यों की सलीब ए आजम उन्हें वापस कर दी जाएगी वह रिचर्ड को कैदियों की रिहाई के लिए तावा देने पर भी तैयार थे तावा की रकम तपा गई थी और सुल्तान ने उसकी पहली किस्त भी भेज दी लेकिन रिचर्ड ने यह किस्त लेने से इंकार कर दिया उसने बहाना बनाया कि तावा के हवाले से कुछ बड़े सलीबी रहनुमाओं को एतमाद में नहीं लिया गया रिचर्ड कुछ अरसे तक तो बातचीत करता रहा लेकिन जोशीला और जल्दबाजी भी चुनांचे वह ज्यादा देर बातचीत ना कर सका उसने औरतों और बच्चों समेत 4000
कैदियों को कत्ल करवा दिया सुल्तान को इस कत्ल आम पर पर सख्त गुस्सा आया उन्होंने सलीब ए आजम दमिश्क भेज दी जो फिर कभी सलीब यों को नहीं मिली और तारीख के रिकॉर्ड से गायब हो गई आज भी किसी को यह मालूम नहीं कि यह सलीब कहां है बहरहाल रिचर्ड ने मुसलमानों का कत्ल आम करने के बाद एक और साहिली शहर जफर पर कब्जा कर लिया सलाउद्दीन अयूबी ने पीछे रहकर बैत अल मकद स में दिफाई पोजीशन ले ली रिचर्ड बैतल मकद तक पहुंचा मगर उसे फतह किए बगैर वापस चला गया सुल्तान ने जफर की
तरफ पेश कदमी की और इस मौके पर दोनों फौजों में फिर शदीद लड़ाई हुई लेकिन कोई फैसला ना हो सका इस दौरान रिचर्ड बीमार हुआ तो सुल्तान ने उसके लिए शर्बत और दवाएं भेजी और खुद भी उसकी इयाद के लिए गए रिचर्ड को अब अपने वतन की याद सता रही थी इससे यह खबरें भी मिल रही थी कि इंग्लैंड में उसके भाई जून ने इसकी हुकूमत के खिलाफ बगावत कर दी है चुनांचे उसने सलाउद्दीन अयूबी से सुला कर ली सुला के तहत जफर और इका समेत कुछ साहिली शहर सलीब यों के कब्जे में रहे उन्हें
बैतल मकद में अपने मकामा मुकद्दसा की जियारत की इजाजत भी दे दी गई यूं यह लड़ाई खत्म हुई रिच रुड इंग्लैंड वापस चला गया और रिच रुड और सलाउद्दीन अयूबी की तीन साला जंग खत्म हो गई सलीब हों की वापसी के बाद अयूबी भी बेफिक्र होकर घर वापस जा सकते थे सलाउद्दीन दमिश्क पहुंच गए लेकिन उनके दिल में एक खलिश थी सुल्तान को हज की बहुत आरजू थी लेकिन अपनी मसरूफियत की वजह से वह अब तक हज नहीं कर सके थे जब वह दमिश्क वापस पहुंचे तो उस साल भी हज पर जाने का वक्त गुजर
चुका था सुल्तान बहुत रोए और जब हाजियों का एक काफिला वापस आया तो सुल्तान उसके इस्तकबाल के लिए बहुत दूर तक गए और एक-एक हाजी से मिलकर रोए वापसी पर उन्हें बुखार हो गया शायद उन्हें सर्दी लग गई थी वह इस बुरी तरह बीमार हुए कि कोई होश ना रहा हालत यह थी कि हाफिजी कुरान उनके सरने बैठे मुसलसल तिलावत करते रहते जबकि दमिश्क के शहरी रोजाना उनकी खैरियत दरयाफ्त करने घर के दरवाजे के बाहर जमा हो जाते 4 मार्च 1193 की सुबह सुल्तान ने आंखें खोली तिलावत सुनकर मुस्कुराए फिर उनके लब हिले जैसे वह
कुछ पढ़ रहे हैं फिर उनकी रू परवाज कर गई शहर के लोग लोगों को सुल्तान की वफात का इल्म हुआ तो वह घरों से बाहर निकल आए और धाड़ मार-मार कर रोने लगे सुल्तान को दमिश्क में ही दफन किया गया सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी ने अपनी जिंदगी में हमेशा दुश्मनों से अच्छा सुलूक किया था और इंतिहा मजबूरी के अलावा कभी तलवार नहीं उठाई थी लेकिन मगरिब में कुछ लोगों ने फलस्तीन पर मुसलमानों के कंट्रोल को दिल से तस्लीम नहीं किया और इसे अना का मसला बनाते रहे 1917 में पहली जंग अजम के दौरान फ्रांसीसी और बतान
फौजियों ने तुर्की की सल्तनत उस्मानिया को शिकस्त देकर अरब खिता उससे छीन लिया हालांकि पहली जंग अजीम कोई मजहबी जंग नहीं थी फिर भी फ्रांसीसी जनरल हेनरी ग्राड दमिश्क में सुल्तान अयूबी की कब्र पर गया और उसे ठोकर मार कर बोला हम वापस आ गए आज भी कुछ लोग सुल्तान को एक ऐसे शख्स के रूप में पेश करते हैं जो गैर मुस्लिमों का दुश्मन और दूसरे मुल्कों को फतह करने का जुनून रख था जबकि हकीकत यह है कि सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी ना तो किसी के दुश्मन थे और ना ही उन्हें दुनिया की दौलत और फतुहा
से कोई गरज थी वह इन इंसानों में से थे जिन्होंने दूसरों को मुश्किलात से निकाला और जब वह दुनिया से गए तो एक बेहतर दुनिया छोड़कर गए जिसमें हम और आप अमन से रह सके अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक और सब्सक्राइब कीजिएगा अल्लाह हाफिज