[संगीत] [हंसी] [संगीत] मयंक जी राधा महाराज जी दो साल पहले तक मैं जुआ सट्टा खेलना शराब पीना सिगरेट पीना व अन्य व्य विचार में लिप्त था एक दिन धर्मपत्नी ने कहा कि पीले वाले कपड़े वाले बाबा जी हैं उनको सुनती हूं पूरा फस गए [हंसी] सब पीला बंद करवा के ये पीला शुरू राधा राधा उन्होने कहा कि मां-बाप से अलग रहना पाप है उनकी सेवा ही सब कुछ है ऐसा कुछ वीडियो देखा उस परे कुछ विचार के बाद सब छोड़ के हम माता-पिता के पास घर आ गए आपकी आज्ञा अनुसार छवि रूप में श्री जी
विराजमान कि और मैंने जुआ शराब मास सब छूट गया महाराज जी पर मैं एक सिगरेट नहीं छोड़ पा रहा महाराज जी कितनी पीते हो किसका है कितनी पीते हो महाराज जी 10 दिन में एक प आ गया 10 दिन में एक प आ ग अपने आप घृणा हो जा आप अपने आप महाराज जी वो सेवा करता हूं तो फरे वो पाखंड लगता है कि वो एक तरफ वो कर रहा हूं और एक तरफ अब आ गए हो लाइन पे जब मन घृणा कर जाए तो बस मत पीना ऐसे आपको घृणा हो जाएगी यार मैं गंदा
काम करता हूं भगवान की भी पूजा करता हूं अपने आप ठीक हो जाओगे पूजा नहीं छोड़ना वोह अपने आप छूट जाएगा ठीक है वो अपने आप छूट जाएगा आपको इतनी घृणा होगी कि अगली बार आप खुद कहोगे कि मैं छोड़ चुका हूं आप तो बहुत छोड़ चुका जब बहुत सी गंदी बातें छोड़कर कते हो 10 दिन में एक सिगरेट ऐसा बोला ना हा हां बिल्कुल नहीं ठीक हो जाओगे बिल्कुल बिल्कुल छोड़ बहुत अच्छे हो और धन्यवाद है आप अपना जीवन सुधार रहे हो आप सुखी रहो आप स्वस्थ रहो आप इसी जन्म में भगवान की तरफ
बढ़ो यही हमारी लालसा है महाराज जी जो अभी तक कर्म बन गए हैं वो कभी यह जो कर्म कर रहे हो ना नाम जप यह सब भस्म कर देगा ये सब भगवान के नाम में अपार सामर्थ है नाम सं कीर्तनम यस सर्व पाप प्रणास सारे पापों का नाश कर देगा पर ये तभी लागू होता है जब अबलो नसानी अब ना नस हो आज तक किया अब नहीं करूंगा तो नाम पीछे सफाया कर देगा और जो अ भी करते जाते हैं तो फिर प्लस होता जाता है फिर सफाया नहीं होता अबलो नसानी अब नान सयो आज
तक किया अब नहीं करूंगा अब नाम सफाया कर देगा पीछे के पापों का वो तुम्हें नहीं भोगना पड़ेगा ठीक है नाम जप करो नीलम जी गुरुग्राम से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी क्या कोई सूचक है कि जो जप हम कर रहे हैं वह पर्याप्त है या हमें और ज्यादा करना पड़ेगा तभी हमारे कर्मों का भुगतान होगा जब शवास शवास में भगवान का महा महिमा में नाम चलने लगेगा असत चिंतन बंद हो जाएगा जो पाप आचरण है वो बंद हो जाएंगे तब समझो अब पर्याप्त है तब समझो अब पर्याप्त
हमारे जीवन मुक्त होने के लिए पर्याप्त स्थिति आ गई है और जब तक यह नहीं है तब तक पर्याप्त नहीं दुर्वासना मम सदा परिक शति दुर्वासना सदा हमको खींच रही है मन इंद्रिया भोगों में जा रही है भगवान का विस्मरण है तो नरक जाने के लिए पर्याप्त है इंद्रिया कब्जे में है मन पाप का चिंतन नहीं करता शरीर से पाप आचरण नहीं होता हर स्वास भगवान का चिंतन चल रहा है मुक्त होने के लिए पर्याप्त है प्राप्ति के लिए पर्याप्त है आप लगे रहिए निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी भारत खेड़ा जी नई दिल्ली से राधे
े राधे राधे महाराज जी महाराज जी पराय देखा जाता है कि जो इंसान हर मामले में चाहे जरूरी हो या ना हो अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए तत्पर रहता है वह अपनी ही इस आदत की अक्सर अपनों से ही टकराव की स्थिति पैदा कर लेता है हर मामले में बेवजह अपनी प्रतिक्रिया देने की ऐसी आदत से कैसे निपटा जाए नाम जब ज नाम में चिंतन लगाएंगे तो वह चिंतन हमको ऐसा पावर देगा कि हम व्यर्थ में क्यों बोले किसी से आपसे कोई बात करना चाहेगा तो भी आप बात करने में खुश नहीं रहेंगे कोई बात
करने आ रहा है तो आपको लगेगा क्या बहाना मारूं जिससे इससे बात ना करना पड़े क्योंकि हमारा नाम छूट जाएगा और नाम आपको परम गति प्रदान करेगा परम आनंद प्रदान करेगा और फिर ऐसा होगा कि जब आप कोई प्रतिक्रिया देंगे नाम से तो सामने वाले को अच्छा लगेगा क्योंकि आपके अंदर आध्यात्मिक पावर है उससे जब देंगे तो उसका मंगल होगा उसका हृदय शीतल होगा इसलिए नाम जप कीजिए नाम जप से ही परमानंद की अनुभूति होती है आहार ठीक कीजिए आहार में कोई गंदा आहार नहीं होना चाहिए पे ठीक कीजिए पे पदार्थ में कोई गंदे पदार्थ
नहीं होने चाहिए और नाम जप कीजिए बहुत आनंद मिलेगा बहुत शांति मिलेगी आपको अजय वीर सिंह जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी ये कह रहे हैं कि एक संगठन से जुड़े जहां लवार शवों का अंतिम संस्कार करना मतलब इनका मुख्य सेवा रहता है महाराज जी ये ये कह रहे हैं कि काफी शवों का जब ये अंतिम संस्कार करते हैं तो जब घर आते हैं तो फिर बिना नहाए धोए हाथ पैर धो लेते हैं और सो जाते हैं क रहे कि ऐसे में ठीक है या नहीं इनके साथी भी
ऐसे हां नहीं कपड़े सहित स्नान करो जब घर आओ तो जो कपड़े ड्यूटी में पहन के गए थे धोने को डाल दो और स्नान करो नवीन कपड़े पहनो फिर शयन करो वह शौ के स्पर्श किए हुए कपड़े से तुम्हारी फिर बुद्धि ठीक नहीं रहेगी किसका प्रश्न है हां ठीक नहीं है संस्कार करो श का आपको जो सेवा मिली व करो लेकिन वो वर्दी अलग रखो कहरे रात को आते हैं थ थक जाते हैं फिर अगर आपको धोने का नहीं है तो अलग कमरे में टांग दो और जब सुबह जाओ तो वह पहन लो पवित्र कपड़े
हटा दो अपवित्र पहन वो अपवित्र माने जाते हैं सचल स्नान करना चाहिए 100 के साथ जाने के बाद वस्त्र सहित स्नान कर के घर आना चाहिए तो आप स्नान ना करें आपकी रोज की ड्यूटी है तो कपड़े उतार दिए हाथ पैर धो लिए आचमन कर लिया जल छिड़क लिया पर वह कपड़े पहन कर के नहीं सहन करना जो 100 की सेवा में लगा है नहीं उचित तो यह है कि आजकल गीजर की व्यवस्था पा मिनट में स्नान कर लीजिए वो कपड़े पानी से निकाल के रख दो दो तीन जोड़ी कपड़े रखो ऐसी व्यवस्था कर लो
और नाम जप करो ठीक है रुचिका जी कश्मीर राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोट कोटि प्रणाम महाराज जी आपने मेरी जिंदगी की राह ही बदल दी पूजा पाठ तो शुरू से ही जीवन में था लेकिन मैं जैसे एक भूल बलिया में भटक रही थी आपने संभाल के रास्ता दिखा दिया महाराज जी मेरा एक प्रश्न है कि प्रभु आखिरी वक्त हो तो जिव्या पर राम नाम और ध्यान में आप तो क्या मोक्ष मिलेगा या संत जन्म आपने कहा था कि एक संत को हिरण में आसक्ति हो गई तो हिरण का जन्म मिला हिरण हिरण
भगवत विमुख जीव है संत भगवान स्वयं कह रहे हैं सातवी भक्ति सवरी जि कह रहे सातो सम मोहिम जग देखा मोते अधिक संत कर लेखा भगवान कह मेरे से अधिक संत के प्रति भाव रखे भगवान से बढ़कर के तो जब भगवान से बढ़कर के संत है गुरुदेव है और उनका ध्यान कर रहे हैं तो भगवान की प्राप्ति होगी संत भक्त भगवान भक्ति ये कहने को चार एक है भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम बप एक इनके पद बंदन किए ना सत विघ्न अनेक भगवान का ध्यान करते हुए शरीर छोड़ना और भगवान के भक्त का ध्यान
करते हुए शरीर छोड़ना इसमें बहुत लाभ है भगवान उसके अधीन हो जाएंगे जो भगवान के भक्त का ध्यान करते हुए शरीर छोड़ रहा है भगवान सबसे पहले उद्धार करते हैं उसका जो भगवान के भक्त का चरण पकड़े होता है इसीलिए दास दासो हम ये बहुत बड़ा सूत्र है देखो गजेंद्र भगवान का भक्त है और ग्राह ने गजेंद्र के चरण पकड़े हैं तो उद्धार सबसे पहले किसका हुआ ग्राह का भगवान ने सुदर्शन जी के स्पर्श से पहले ग्राह को भगवत स्वरूप प्रदान किया फिर हाथ से पकड़कर गजेंद्र को बाहर निकाला जो भक्त का चरण पकड़ता है
सबसे पहले उसका उद्धार होता है तो इसमें कोई संशय थोड़ी कि मुख में नाम है और ध्यान में गुरु मूर्ति है तो भगवान की प्राप्ति तो गुरु ही भगवान है भगवान ही गु अभेद तत्व है गुरु और ईश्वर अभेद तत्व है अनुराग सिंह जी काशी से धे े मराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि दंड प्रणाम महाराज जी आपने साधक के लिए सेवा सुमिर व स्वाध्याय का मंत्र दिया है स्वाध्याय में अपने गीता जी राम चित मानस भागवत जी आदि ग्रंथों के अध्ययन पर बल दिया है जबकि मेरा मन नाम जप में चौरासी जी के
राधा सुदा निधि जी सेवक वाणी आदि रसो उपासना के पदों में जिसम ह वो सार्वजनिक उपदेश है आप जो है यह वृंदावन रस की तरफ मुड़ रहे हैं सार्वजनिक उपदेश में जैसे रामायण है गीता है महाभारत है भागवत है इन ग्रंथों का सार्वजनिक और जब हम रस की तरफ आते हैं तो चतुरा जी है सुधा निधि है 42 लीला है नाम जप है ठाकुर जी को विराजमान करके सेवा करना है ये मार्ग है ये प्रेम लक्षणा भक्ति का मार्ग है वो साधारण भक्ति का मार्ग है सर्वसामान्य भक्ति का मार्ग है ये उसके आगे का विषय
है तो भगवान की बड़ी कृपा है जो आपको चतुरा जी के पाठ में रुचि है जो आपको श्यामा श्याम की सेवा भावना में उनके नाम में रुचि आप इसी में चलिए सागर कसेरा जी इंदौर से राधे राधे महाराज जी महाराज जी आत्मा का स्वरूप तो सत्य चैतन्य और आनंद में कहा गया है परंतु जब वह संसार में आती है तो वह उसे अपने सत्य स्वरूप का विस्मय क्यों हो जाता है यदि आत्मा स्वयं चैतन्य स्वरूप वो आप ही है ना विस्मरण करने वाले की कोई और है वह तत त्वम अश वेद कहता है जिसे आप
वह कहके संबोधन करते हैं वह तत त्वम अ वो आप ही है तो आप अपने भूल को संभाल लीजिए जो आप अपनी भूल कर रहे हैं उसको संभाल लीजिए तो आप जीवन मुक्त हो जाएंगे आपको ही जीवन मुक्त होना है आप ही बंधन हो मन जो विषयों का चिंतन करता है और आप मन में तदा आत्म है यही बंधन का कारण है मन भगवत चिंतन करे आप मन के दृष्टा बन जाएं यह जीवन मुक्त अवस्था है आपने ही बंधन स्वीकार किया है तो आपको ही मोक्ष प्राप्त होगा आप अपने बंधन को तोड़िए यद्यपि वो कभी
नहीं बंधा जड़ चेतन ग्रंथि पड़ गई जदपि मृषा छूत कठिन यद्यपि मृषा झूठी बात है कि सच्चिदानंद कभी प्रकृति से बांधा नहीं जा सकता जड़ और चैतन्य की गांठी नहीं पड़ सकती पर वो पड़ गई क्योंकि हमने स्वीकार किया है तो अब छूटती कठिनाई अब छूटने में बड़ी कठिन लग रही क्योंकि हमने अपने को पुरुष मान लिया मनुष्य मान लिया और मन और इंद्रियों के द्वारा भोगों को भोगने लगे तो अब अपने चैतन्य घन स्वरूप को भूल गए अब साधना करनी पड़ेगी साधना से अंतःकरण पवित्र होगा बुद्धि शुद्ध होगी तब फिर स्मृति जागृत होगी जैसे
संपूर्ण गीता जी सुनने के बाद अर्जुन को स्मृति प्राप्त हुई नष्ट मोहा स्मृति लब्द त्त प्रसादा मचता हे अच्युत आपके कृपा प्रसाद से मोह का नाश हो गया और स्मृति जागृत हो गई ये स्मृति जो विस्मृति के गर्त में चली गई अब साधना के द्वारा उसे उठाना पड़ेगा वो जहां जागृत हो हो तो अपने आप आ जाएगा हम ब्रह्मा में मैं ब्रह्म हूं खत्म हो जाएगा इसे हमने भूल की है हमें को मिटाना है इस भूल को सुंदर मैं एक छोटी सी चीज कहना चाहता हूं जैसे जीवन तो मुक्तानंद के लिए है लेकिन हम संबंधों
से जुड़े हैं तो संबंध में भी माया कृत संबंध संबंध है क्या स्वप्न में आप एक बादशाह बने लाखों करोड़ों की प्रजा हुई रानी हुई महल हुए जगे तब जगे तब उत्तर दीजिए झूठा था ना सब उमा कह मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना मान रहे ना झूठे संबंधों की अध्यात्म में महता नहीं है अध्यात्म में महत्ता नहीं व्यवहार में महत्ता है तो ज्ञानी पुरुष भी व्यवहार को सम रूप से निभाता है लेकिन सत्य मानकर नहीं स्वांग मानकर तुम किसी के पति हो तो पति का स्वांग कर रहे किसी के पुत्र हो
तो पुत्र का स्वांग कर रहे लेकिन तुम्हें पता है ना मैं पति हूं ना मैं पुत्र हूं मैं आत्म स्वरूप निर्विकार सच्चिदानंद जब यह स्थिति रहती है तो उसे जीवन मुक्त महापुरुष कहते हैं ठीक है अनुज दिल्ली से श्री हरिवंश गुरुदेव महाराज जी आपके चरणों में कोट नमन गुरुदेव रोज आपका स और एकांतिक वार्तालाप सुनता हूं जिसे सुनकर यह पांच बातें आजीवन के लिए गांठ बांध ली हैं मांस ना खाना मदिरा सेवन ना करना पराई स्त्री के प्रति कु विचार नहीं रखना राधा नाम जप करना कर्म समर्पण योग महाराज जी मेरा प्रश्न यह है कि
ग्रस्त में रहते हुए अपनी रोज की दिनचर्या में क्या ऐसी और कोई खास बात भी है जिसे हमें विशेष ध्यान रख बस ये दो खास बातें हैं कर्म समर्पण नाम जप वो तो निषेध है निषेध को एक बार निषेध कर दिया उसका चिंतन तो करना नहीं है चिंतनी विषय है कि जो हमें कर्म समर्पण करना है उसमें गंदगी ना मिलने पावे जैसे हम ठाकुर जी के लिए रसोई बनाते हैं तो अच्छी व्यवस्था करते हैं कि छूना नहीं ठाकुर जी के लिए ऐसे ही हम हर कर्म ठाकुर जी को समर्पित करेंगे तो प्रतिकूल स्य विसर्जन भगवान
की आज्ञा के प्रतिकूल कोई कर्म नहीं होना चाहिए अनुकूल कर्म हो पवित्र कर्म हो भागवत अर्थ कर्म हो उनको भगवत कर और कर्म करते करते मामन स्मर भगवान का स्मरण कर कर्म कर रहे राधा राधा भगवत स्मरण कर रहे भगवत समर्पित कर रहे इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी गृहस्थ में रहते हुए भी इसी में शुद्ध वैराग्य शुद्ध ज्ञान शुद्ध भक्ति जो आकांक्षा करोगे वही जागृत हो जाएगी जब नाम रूपी धन एकत्रित हो जाएगा तो माला माल हो जाओगे खूब नाम जप करो और पवित्र कर्म भगवान को समर्पित करो येतु सर्वानी कर्माणि म सनस मत
परा अनन्य नव योगेन माम ध्या उपास ते सा माम समुद्रत मृत्य संसार सागरा भगवान कह रहे जो सारे कर्म मेरे को समर्पित कर देता है यह तो सर्वानी कर्माणि म स से मत परा मेरे प्रण होकर अपने सारे कर्म मेरे को अर्पित कर देता है उसका उद्धार मैं करता हूं तसा मम समुद धरता मृत्यु संसार सागरा खूब अच्छे से चलो त्रिविक्रम जी उड़ीसा से राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैं आपका सत्संग नियमित रूप से सुन रहा हूं नाम जब भी करता हूं स्वरूप का ज्ञान होने से भी मैं इसी बोध को व्यवहार में पूर्ण
रूप से नहीं ला पा रहा हूं वो व्यवहार लायक ही नहीं है परमार्थ का जो स्वरूप है वह तो केवल अपने अनुभव का है व्यवहार लायक तो देह है देह से व्यवहार करो देह से जो व्यवहार हो रहा है उसको अपने में मत मिलाओ भाई यही तो स्वरूप बोध है मान लो देह का खाना पीना उठना बैठना भोगना नाना प्रकार के व्यवहारों में जाना पति पुत्र परिवार संबंधों में रहना बिल्कुल संसारी पुरुष जैसे देह से व्यवहार हो रहा है लेकिन आप बिल्कुल अलग है अंदर से बिल्कुल अलग है यह मेरे द्वारा नहीं हो रहा प्रकृति
के गुणों के द्वारा ही गुणों का वरता हो रहा है शांत एकदम उसे व्यवहार में नहीं लाया जाता वो तो परमार्थ है वो अनुभव भज ज संता वो तो अनुभव का विषय है बस जान लिया मैं कौन हूं व्यवहार वैसे ही कर रहे हैं शिष्य बनकर गुरु के आगे बेटा बनकर माता-पिता के आगे पति बनकर पत्नी के आगे पिता बनकर पुत्रों के आगे समाज में वैसे ही व्यवहार मान लो आप कोई पदाधिकारी हो तो आपको वैसे ही व्यवहार करना पड़ेगा लेकिन आप अपने स्वरूप में स्थित है सब आत्म स्वरूप है ज्ञानी ऐसे व्यवहार करता है
जैसे अपने शरीर में हम सब प्रियता का व्यवहार करते हैं और भेद का भी व्यवहार करते हैं गाल छू जाए तो हाथ नहीं धोते लेकिन गुदा छू जाए तो हाथ धोते हैं अपनी ही तो गुदा है ना तो ऐसे ही व्यवहार अगर जहां हमें फोड़ा हो गया तो अपना ऑपरेशन भी करवाते हैं तो ऐसे ही अगर कोई दुष्ट पुरुष है तो उसका ऑपरेशन भी जरूरी दंड विधान के द्वारा वह व्यवहार में बिल्कुल सम्यक संसारी पुरुष जैसा रहता है लेकिन ज्ञान में उस स्वरूप में रहता है स्वरूप कभी व्यवहार में नहीं उतारा जाता स्वरूप अंदर अनुभव
का विषय है हमने जान जैसे चार घंटे के लिए कोई राजा रानी बने पैसा के लिए नाटक में तो उसको प्रतिपल याद रहता है मैं रानी नहीं हूं मैं अमुक हूं केवल चार घंटे के लिए राजा बना हूं या रानी बने हूं ऐसे ज्ञानी को प्रतिपल य बोध रहता है मैं शरीर नहीं हूं मैं किसी का पुत्र पिता पत्नी ये जितने संबंध है मैं नहीं हूं यह माया कृत है और मैं इनका दृष्टा हूं मैं इनका साक्षी हूं समझ पा रहे आप अभिषेक पटेल जी गुजरात सेधे गु राधे राधे गुरुदेव गुरुदेव गुरु के वचन प्रतीति
ना जेही सपनेहु सुगम न सुख सिधि लेही गुरु जी आप इष्ट देवता की अधीनता की बात करते हैं पर जब गुरु का चिंतन इट से भी ज्यादा बढ़ने लगे नहीं गुरु सिखाता क्या है इट की अधीनता बस आप अगर गुरु के वचनों में लगोगे तो पहुंचो कहां इष्ट की अधीनता में तो पहुंचो ग वही तो बात है मंदिर जाते तो इष्ट से ज्यादा गुरु का चिंतन होने लगता है महाराज जी बहुत सुंदर बात है हरि गुरु कोई अलग थोड़ी है ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु कृपा
तो गुरु और हरि में जो भेद रखता है वही तो अज्ञानी है बंदो गुरुपद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि साक्षात हरि ही गुरु के रूप में विराजमान साक्षात आत्मा ही गुरु के रूप में विराजमान है आत्मा त्वम गिरजा मति सह चराहा प्राणा शरीर गृहम इस शरीर रूपी घर में आत्मा रूप त्वम गुरुदेव कहो चाहे इष्ट कहो वही विराजमान है हृदय में भी गुरुदेव अखंड मंडला काम व्याप्तम चरा चरम गुरुदेव प्रकट में भी गुरुदेव और इष्ट रूप में भी गुरुदेव इष्ट का करो चराचर जगत रूप में इष्ट गुरुदेव रूप में इष्ट सब रूप में इष्ट
अगर हम गुरुदेवा का करें तो ऐसे और इटाका करें तो ऐसे दो है ही नहीं गुरु गोविंद न भेद कराए संतत सकल सुनो चितला गुरु गोविंद में कभी भेद थोड़ी होता है समझ गए आप ऋषिकेश अग्रवाल जी राधे राधे महाराज जी मैं वर्तमान में लंडन में अध्ययन कर रहा हूं महाराज जी मैं कर्म के चक्र को गहराई से समझना चाहता हूं यदि हमारे जीवन पूर्ण कर्मों का परिणाम है तो क्या हम अपने वर्तमान कर्मों से इसलिए बदल सकते हैं कर्म बंधन से मुक्ति कैसे संभव है और हम अपने जीवन में को कर्म और सच्चे कर्म
के मार्ग पर तीन कर्म है संचित कर्म जो बहुत जन्मों का स्टक उसे संचित कर्म शास्त्री भाषा में कहते हैं उस संचित कर्म से 100 वर्ष के लिए एक शरीर का प्रारब्ध निकाला गया उसे प्रारब्ध कहते हैं जो निकाला गया संचित कर्म से उसका कुछ शुभ और कुछ अशुभ दोनों से मिश्रित मानव देह का निर्माण होता है केवल शुभ कर्म से देव देह का निर्माण होता है केवल अशुभ कर्म से यातना देह का निर्माण होता है नरक में और जो हमारा मनुष्य देह है यह शुभ अशुभ दोनों से बना है तो कुछ शुभ हमारे इस
टाक से कुछ अशुभ उसको मिश्रित किया गया तभी दुख सुखमय मनुष्य देह है उसे कहते प्रारब्ध कर्म अब जो हमारा प्रारब्ध कर्म से निर्मित शरीर है अब इससे जो हम नया कर्म करते हैं उसे कहते क्रिय माण क्रिय माण अब अगर शुभ और अशुभ कर्म ही हुए तो पुनः गोदाम में जमा हो जाएंगे और पूरे जीवन शुभ अशुभ कर्म होगा फिर नया जन्म होगा फिर सुब शुभ कर्म हो यदि हमने भजन किया ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया या भक्ति की भजन किया अध्यात्म किया तो यह संचित को भस्म कर देगा गोदाम को भस्म कर देगा क्रिया
माण जो हो रहा है ये निष्फल कर देगा प्रारब्ध को भोगने की सामर्थ्य देगा और मुक्त हो गए तीनों कर्म नष्ट हो गए संचित भी क्रि माण भी और भोग के प्रारब्ध भी क् छय हो गया और आप भगवान को प्राप्त हो गया समझ पा रहे हो गायत्री बडकी जी राधे रा राधे राधे महाराज जी महाराज जी मेरा प्रश्न है कि सांसारिक जीवन में जैसे-जैसे जिम्मेदारियां कम होती जाती है तो आध्यात्मिक सेवा में आगे बढ़ना चाहती हूं लेकिन अपने जीवन में कुछ रिश्ते नाते ऐसे होते हैं कि आध्यात्मिक सेवा में बाधा बनते हैं तो ऐसे
में कैसे आगे बढ़ा जाए कि रिश्ता भी बना रहे और सेवा भी अंदर से कनेक्शन हटाओ नाता एक राम जी से दूजा नाता छोड़ दे आशा एक राम जी से दूजी आशा हमारा नाते नेह राम के मनियत सुह सुसे जहा लो अंजन कहां आख जी फूटे बहु तक कहो कहा लो हमारा वह संबंध जो भगवान से विमुख कर दे वो हमें छोड़ देना चाहिए अंदर से बाहर से व व्यवहार करना चाहिए अंदर से संबंध जननी जनक बंध सुत दरा तन धन धाम शद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मन बांध बर डोरी भगवान के
चरणों में एक संबंध बाहरी व्यवहार वैसे करता रहे स्वांग करना है बाहरी नाटक करना है अंदर का प्रेम भगवान से रखो इसी का नाम भक्ति है अब ऐसा तो नहीं हो सकता कि सबसे संबंध तोड़कर कहीं एकांत में जाकर बैठ जाए ऐसा नहीं ये बात ठीक नहीं सबसे संबंध जो हम किए हैं वो भगवत भाव में कर ले सब में भगवान को देखें सांसारिक संबंध हटा दे अभी आनंद आ जाएगा तो बाधा तभी है जब हमारी पर्सनल आसक्ति है अगर भगवान के संबंध से कि पति में भी भगवान पुत्र में भी भगवान सास ससुर में
भी भगवान परिवार में भी भगवान अब क्या बाधा है भगवत भाव से आराधना करते हैं मगन रहते हैं अंदर नाम जप कर रहे सब में भगवत भाव बहुत बढ़िया आनंद है जी राम गोपाल अग्रवाल जी जयपुर से राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैं अपने गांव में एक बहुत पुराना मंदिर है उसका जन् दन करना चाहता हूं तो मूर्तियां वही रहेंगी या बदल सकते हैं उस मूर्तियो अभी खंडित नहीं है उ मूर्तिया नहीं बदली जाती खंडित होती तो विचार किया जा सकता था जब खंडित नहीं तो विचार कि नहीं मंदिर नया निर्माण कर दो मूर्ति
ही विराजमान मनीषा मिश्रा जी महाराष्ट्र से श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपकी शरणागत होने की ठसक हमेशा मन में बनी रहती है उसी के सहारे धाम में प्रत्यक्ष वासना होते हुए भी मन को समझा लेती हूं पर रसिंक संग का अभाव होने से कभी-कभी आपके शासन में होने के बाद भी मन इधर उधर भागता है मैं अपनी प्रकृति की जांच कैसे करूं कैसे पता चले कि मैं सही चल रही हूं मन भागे तो कोई परेशानी नहीं तन ना भागे उसके पीछे तो बढ़िया रहेगा और और हमारी उन्नति हो रही इसकी पहचान सुमिरन
से है हमारा नाम जब कम हो रहा है हमारा घाटा हो रहा है अभी मार्ग में दोष है हमारा नाम जब अधिक बढ़ता चला जा रहा है रोज का रोज हमारी भक्ति बढ़ रही तो हमारा मार्ग ठीक है यह खुद परिचय देखो अपनी आत्मा से परिचय लो कि आपका मार्ग सही है कि गलत है जो गलत आचरण वो छूटते जा रहे हैं जो अच्छे आचरण जा रहे हैं जो भजन है वह बढ़ता जा रहा है बढ़िया उन्नति हो रही है भजन कम होता जा रहा है गंदी बातों में मन जा रहा है हमारा पतन हो
रहा है यह देखना है आयुष जी गोवर्धन जय गिरिराज जय गिरिराज महाराज जी नंदगांव वाले कह कि श्री जी हमारी भावी लगे बरसाने वाले कहे कि ठाकुर जी हमारे जीजा लगे तो महाराज जी श्री जी हम गोवर्धन वारों की का लगे गोवर्धन वारे तो श्री जी को का रिश्तो है तो वृंदावन वाले को का रिश्तो फ पूरे संसार का क्या रिश्ता है यह पर्सनल हृदय का रिश्ता है यहां किसी का गांव नगरी से संबंध नहीं है यहां हमारा श्री जी से संबंध है अब जैसे बरसाने की लाड़ली जो है लाल जून के प्रीतम है तो
बनता है ना बहनोई कहना दामाद कहना अब नंदगांव के भाभी भी कहते हैं श्री जी को नहीं कहते हां तो भाव संबंध से है तो गिरिराज जी दोनों आते हैं खेलने गिरिराज जी में दोनों रास रचाने आते दोनों खेलते हैं तो आप जो भाव प्रिया प्रीतम भाव स्वामी भाव जो भाव कर पाओ वो भाव कर लो गिरिराज जी तो प्रिया प्रीतम की विहार स्थली है जैसे बरसाना है तो निज गांव है नंदगांव तो ठाकुर जी का निज गांव है और गिरिराज जी है यह विहार स्थली है प्रिया प्रीतम की विहार स्थली गिरिराज जी है तो
गांव में तो थोड़ी देर रुकते हैं फिर दोनों गल बहिया देकर आ जाते हैं गिरिराज जी और यही खेलते रहते फिर सांझ के चले जाते तो अधिक समय तो विहार स्थली में व्यतीत करते हैं अब इसमें तुम भाव देखो कि स्वामी सेवक भाव कि प्रिया प्रीतम हमारे स्वामी हम उनके सेवक है या सखा भाव जो भाव कर पाओ तुम्हारी क्षमता है बाबा भर के सब पूछे कि इन सन के तो पक्के रिश्ते जाते तुम्हारी लगे ता हां दोनों हमारे स्वामी हैं दोनों हमारे स्वामी हम उनके सेवक हैं उत्तम बात तो यही है हम गिरिराज धरण
की जय बोलते हैं तो स्वामी भाव से ही तो बोलते हैं तो हमारे स्वामी हम उनके सेवक हैं जी स्वाती जी हरियाणा से राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैंने पढ़ा था कि ईश्वर प्राप्ति के लिए जीवित गुरु से दीक्षा लेना जरूरी होता है बिना गुरु ईश्वर प्राप्ति संभव नहीं है तो क्या सिर्फ नाम जप से ईश्वर प्राप्ति हो जाएगी बिना हा नाम जप करो जब से गुरु की प्राप्ति होगी और गुरु प्रदत मंत्र और नाम से ईश्वर की प्राप्ति हो जाएगी जब तक ईश्वर की भक्ति का बहुत हृदय में व्याकुलता नहीं आती तब तक
गुरु की खोज नहीं होती और जब लगता है मुझसे इसी जन्म में भगवत प्राप्ति करनी तो फिर मतलब बेचैनी आ जाएगी गुरु के बिना बेचैनी आ जाएगी किसका प्रश्न है नामदेव जी महाराज जन्म से ही नाम जब करते थे भगवान के प्रिय भक्त थे तो गोरा कुम्हार के यहां सब संत बैठे थे ज्ञानदेव एकनाथ बड़े सब नामदेव जी सब संत बैठे एक थापी होती जिससे मटकी ऐसे की जाती है तो थापी को उठाया मुक्ताबाई ने और कहा कि चाचा यह किस काम में आती है तो बोले मटकी कच्ची पक्की है यह देखने काम में आती
है बोले अच्छा ऐसे मारा ऐसे सब संतों के तो हस दिए संत जन जब नामदेव जी के मारा तो उका ये क्या है संतों का अपमान करते हो एकदम नाराज हो गए बोले काका यह मटकी कच्ची है तो सब संत फिर हस दिए सब संतों से कहा क्या हम कच्चे हैं उन्होने कहा हा आप कच्चे हो क्यों कच्चे हैं उ कहा आपने गुरु नहीं बनाया अभी तक नका गुरु बनाने की क्या जरूरत है गुरु की आवश्यकता होती भगवान का मिला देना और नामदेव जी से स्वयं विट्ठल भगवान बातचीत करते थे मंदिर गए और भगवान से
कहा मैं कच्चा हूं बोले हां कच्चे हो भगवान ने भी कह दिया कच्चे तो उ किस बात के कच्चे उनका गुरु नहीं बनाया बोले गुरु की जरूरत होती आपकी प्राप्ति कराने के लिए जब आप प्राप्त हो गए तो गुरु की जरूरत क्या बोले इसी बात के तो तुम कच्चे हो पहले गुरु बनाओ फिर तुम्हें हम बताएंगे तो उ कहा हम किसको गुरु बनाए भगवान से पूछा तो भगवान ने कहा जंगल में वि शोबा खेचर नाम के महापुरुष पड़े हुए हैं जाओ उनको गुरु बना लो व जंगल में गए तो शिव जी के मंदिर में पड़े
थे बड़े विचित्र ढंग से पड़े थे डेहरी पर सर रखे थे शिवलिंग पर पैर रखे थे तो उन्होने का य तो साधारण आस्तिक पुरुष भी नहीं है इनको हम क्या गुरु बना ले जो भगवान शंकर के ऊपर पैर रखे हैं और डेहरी पर सर रखे हैं तो थोड़ी आस्तिक होती तो शंकर जी पर पैर कौन रखता है उ कहा ये पैर हटाओ शिव जी के ऊपर से उनका बेटा जहां शिव जी ना हो वहां पैर रख दो तो उन्होंने ऐसे पैर पकड़ा इधर जी ही किया तो वहां शिवलिंग प्रकट जिधर करते तब उनको लगा ये
तो सिद्ध पुरुष है हम तो इनको ऐसा चरणों में बैठ गए उन्होंने कहा भगवान ने कहा आपको गुरु बनाने के लिए उ कहा बेटा कोई कण ऐसा नहीं जहां भगवान ना हो ये शिक्षा दी अब उनके दिमाग सिद्ध पुरुष के वचन दिमाग में बैठ गया कोई कण ऐसा नहीं जहां भगवान ना हो कोई कण ऐसा नहीं जहां भगवान ना हो एक दिन रोटी पका रहे थे तो घी गर्म करने के लिए गए तो कुत्ता सब रोटी लेकर भागा तो आप घी लेकर जा रहे हैं कोई कण ऐसा नहीं जहां भगवान ना हो तो कुत्ते में
भी भगवान है कहा प्रभु घी लगवा लो सूखी मत खाओ और कुत्ता खड़ा हो गया और नजदीक गए घी चुपने लगे तो कुत्ते में फिर देखा तो विट्ठल भगवान कुत्ते में विट्ठल भगवान तो भगवान ने कहा देख गुरु कृपा मैं हीथा मुक्ताबाई के रूप में तो हमसे मंदिर में शिकायत करने आए थे और आज जब गुरु कृपा हो गई तो कुत्ते में भगवान देख लिया डंडा नहीं मारा कि हमारी सारी रोटी ले जा रहा है नहीं भगवान देख लिया तो हमें लगता है गुरु कृपा के बिना तो भक्ति ज्ञान वैराग्य सिद्ध होना बड़ा मुश्किल है
तो भगवान से प्रार्थना करें नाम जप करते हुए कि हमें गुरु की प्राप्ति कराओ तो भगवान ही गुरु है गुरु ही भगवान है वो मिल जाएंगे ऋतु जी दिल्ली से राधा वल्लभ श्री हरिश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी गुरुजन और संत जन चरण स्पर्श नहीं कराते खासकर स्त्री शरीर से भी क्या च नहीं स्त्री और पुरुष का बात नहीं है आदेश है शास्त्रों का सम्मानम कल्या घोर गणम नीचा पमान सुधा श्री राधा मुरली धरो भज सके वृंदावन मात सम्मान को घोर विष के समान समझे पैर पुजवाना अपना ये उसी को अच्छा लगेगा जो देह
अपने को मानता है बात मानो भजन करो तु हमारा कल्याण हो जाएगा पैर छूने से क्या होगा अगर पैर छूने से कल्याण हो तो एक बार हम पैर लगा के बैठ जाए लेकिन इससे कुछ नहीं होगा जब तक आप भजन नहीं करोगे आप अच्छे आचरण वाले नहीं बनोगे आप हमारी बात नहीं मानोगे तब तक बात नहीं होनी है इसीलिए जो भगवत मार्ग के सच्चे महात्मा जन है वो पैर पुजवाना पैर छुआ चंदन तिलक लगवाना आरती कर ये सब कभी किसी विशेष अवसर पर बात अलग है कि गुरु पूर्णिमा है आज चलो भाई दंडोत प्रणाम ये
सब बाहरी बातें हमारी बात मानो नाम जब करो मंगल हो जाएगा महाराज जी भजन तो शी नहीं होता ना क्वेश्चन ये था कि अगर पैर छूते हैं तो जैसे भजन क्षीण हो जाए या हम हमारा भजन कोई ऐसे रखा है क्या कि तुम पैर छू के ले जाओगे किसी के पैर छूने से बैंक बैलेंस का ट्रांसफर हो जाता है क्या अपले आप जब तक वो ट्रांसफर नहीं करेगा ऐसे हो तो कोई जबरदस्ती लोग गिरा के चढ़ बैठे पैर छू लेसे ले जब आप हमारी आज्ञा का पालन किए और आपको देखा कि बहुत तरह से विपरीत
आने पर भी आप डिगी नहीं आप हमारी आज्ञा का पालन करें हृदय शीतल हुआ अब ट्रांसफर हो गया अब ट्रांसफर हो गया भजन में बैठे हैं बात याद आ गई कि यार इतना इसको सताया इतना इसको कष्ट दिया गया और यह अपने धर्म से नहीं हिला अब ट्रांसफर हो गया ऐसे नहीं कि पैर छू के ट्रांसफर करवा लो कुछ दे दे जी देखो इसमें कई बातें होती हैं जैसे हम हर समय पवित्र रहते हैं शरीर पवित्र वस्त्र पवित्र अब आप कितना पवित्रता का निर्वाह करते हैं लघु शंका जाकर कितना पवित्र होते हैं सोच जाकर कितना
पवित्र होते हैं आप हमें छू लिए तो बराबर हो गया ना अब हमारे भजन में विक्षेप पहुंचेगा ना यह पहली बात दूसरी बात शास्त्रों की आज्ञा है यह सब नहीं कराना चाहिए समय मान प्रद आप अमानी मान रहित हो करर के रहना चाहिए तीसरी परमाणु है आप किस विचार वाले हैं कैसा चिंतन करते हैं कितना भजन करते हैं आप छुए गे तो व परमाणु हमारे अंदर आएंगे तो इसलिए जी परमाणु का भी फर्क पड़ता बहुत बड़ा फर्क पड़ता है तुरंत फर्क पड़ता है जिस कपड़े में हम बैठते हैं उस कपड़े में बैठकर देखो तुम्हारा चिंतन
क्या होता है और उसी कपड़े में एक कपड़े में जाओ गृहस्ती लोग भोग करते हैं उस कपड़े में बैठ के देखो तुम्हारा चिंतन क्या होता है अपने अपने स्थान का प्रभाव होता है तो इसीलिए दूरी बना के रखी जाती है कि छु मत आप अपने भजन में लगो हमारी बात मानो आपका अपना कल्याण होगा हमको भी भजन करने दो तो यह जो भजनानंद संत जन व प्राय हा नहीं छूते और ना छूने देते हैं कि दूरी बना के रखो आप अपना भजन करो हम अपना भजन करें हमारी बात मानो तुम्हारा भी मंगल हो हमारा भी
मंगल हो मेगा जी इंदौर से जय श्री राधे महाराज जी महाराज जी श्री जी के प्रति आपके अनन्य प्रेम और समर्पण का ऐसा कौन सा क्ण था जिसने आपके हृदय को पूर्णता उनके चरणों में समर्पित कर दिया क्या वह कोई विशेष अनुभूति थी जिसने आपकी भक्ति को एक देखो हम पहले भक्त नहीं जिज्ञासु थे अपने को जानना चाहते थे परमात्मा को जानना चाहते थे जब घर से निकले भक्त बन के थोड़ी निकले एक जिज्ञासु एक खोजी बन कर के निकले खोज करते करते जब जिज्ञासा हमारी पूर्ण होने की बात आई तो एक नवीन जिज्ञासा जागृत
हो गई कैसा होगा वृंदावन अब ये इधर अब इधर जब हम आए और कुछ ही दिन हुए थे कि हमारी रिपोर्ट आ गई बहुत पीड़ा बहुत कष्ट तो उसकी जांच हुई तो पता चला किडनी दोनों फेल है अब हम साधन परायण थे तपस्या जितेंद्रिय नियम संयम सब अब सब होश उड़ गए कि अब तो कुछ नहीं कर पाऊंगा हम अर्थ विहीन जीवन हमारा रहा है कभी जीवन में एक हमारे पास नहीं रहा ना आज भी है एक रुपया नहीं अगर हमें कोई कार्य है तो इन लोगों से कहना होगा एक इंच जमीन नहीं एक वस्तु
अपने नाम नहीं अपना जीवन जैसे पहले था वैसे ही है हां यह पहले अव्यवस्था युक्त जीवन था अब कुछ व्यवस्थाएं शरीर रोग के कारण स्वीकार ही करनी पड़ी है तो उस समय जब हमारी किडनी खराब हुई ना एक पैसा था ना एक व्यक्ति था ना एक इंच जगह थी जिस आश्रम में रुकते वहां से निकाल दिए जाते थे कि इनकी किडनी खराब है ज्यादा बीमार होंगे तो आश्रम को बाहर उठाना पड़ेगा इसलिए पहले उस समय हमारा हृदय शरणागत हुआ जो भक्त हृदय कहा जाएगा तो हम अपने जीवन की बात बताए हमें कभी रोना नहीं आता
था बस जिद्दी स्वभाव अपने कर्तव्य को निष्ठा से निर्वाह करते हुए क्या नहीं हम कर सकते हम सब कुछ कर सकते हैं व हम फेल हो रहे जब किडनी की पूर्णयु कोई साथी नहीं और इस मार्ग का अभी पूर्णतया स्वाद नहीं मिला था 25 वर्ष पहले एकदम आर्त भाव हुआ कि बाल्यावस्था से घर से निकाला प्रभु आपने उत्तम कुल ब्राह्मण के घर में जन्म मिला ब्रह्म ऋषियों के यहां काशी का काम तो हो गया जो होना था अब वृंदावन का काम तो अभी अधूरा है और जीवन किसी काम का नहीं रह गया तो जो आर्थ
भाव से शरणागति हुई उसी का सब चमत्कार है जो भगवान से आर्त भाव की शरणागति हुई वहां हुई इस रोग की कृपा से वह बात बनी जो स्वस्थ होकर ना बनते स्वस्थ होकर के अभिमान रहता साधना का अ स्वस्थ होकर भगवान की चरणों की जो आश्रय वृत्ति मिली वह बहुत बड़ी बात हो गई वह हम कभी किसी जन्म में साधना से नहीं कर सकते थे जो रोग की कृपा से हुआ यह मतलब आर्त भाव उस समय ना खाने का ना कोई बात करने वाला ना एक पैसा ना कोई हमें सपोर्ट देने वाला उस समय जब
चारों तरफ निराशा ही निराशा थी और एक शरीर जिसके बल से हम भिक्षा मांग के खाते थे साधना करते थे उसकी भी किडनी फेल तो अब उस हृदय को सोचो क्या होगा बताओ ऐसी स्थिति चलना मुश्किल था मुझे आश्रम से निकाल दिया गया तो मैं उस आश्रम के महंत के पास जब गया महाराज वो यद सम्मान करते थे हमारे वैराग्य और तपस्या का तो आओ महाराज तो हमने कहा सुना है आपने हमारे लिए खबर भेज दी कि आप निकल जाइए तो अपराध बताइए तुमका कोई नहीं तुमका कारण बताइए बोले कुछ नहीं कारण ऐसे तुमका आपको
समझ में आना चाहिए कि मैं बीमार शरीर हूं कम से कम आपके यहां छत के नीचे तो पड़ा हूं हमारा कोई भरोसा नहीं है कि कब शरीर छूट जाए तो कम से कम आप लोगों के बीच में तो उन्होंने एक शब्द कहा उ कहा मैं आपका ठेकेदार हूं क्या तो हम कहा बस इसके आगे हमने फिर तुरंत पलट गए हम हम कहा नहीं ठेकेदार तो हमारे भगवान है हम कहा ठेकेदार तो हमारे भगवान है तो उनका 15 दिन का समय देते हैं आपका हमका 15 मिनट का बस आश्रम जाना झोला काधे में टांगना है अरे
बचपन से बैरागी अब कोई मतलब ऐसे थोड़ी की घुटने टेक दे माया के इस प्रपंच में नहीं नहीं शेर दिल रहे जिंदगी भर शेर की तरह भूख प्यास गर्मी सर्दी हर कष्ट सहना तो उस समय हमारी शरणागति हुई ब झोला उठाया चल दिया राधा वल्लभ जी के पास गए हम कहा कहां रहे क्योंकि वही है हमारे मालिक सत्य मानिए गेट के बाहर नहीं निकल पाए थे एक संत आए बोले झोला ला क लिए घूम रहे हो महाराज तुम निकाल दिए गए बोले आओ ना बढ़िया व्यवस्था कर दी धीरे-धीरे श्री जी ने य व्यवस्था कर दी
कितनी बड़ी व्यवस्था कर दी भगवान का जब आश्रय हो गया गोस्वामी तुलसीदास जी को जब सम्राट अकबर ने ताज उतार के रखा ना चरणों में तो आ गए तो निज जनों ने पूछा कि आनंद के आसुओं की बादशाह प्रणाम कर रहा है बोले नहीं इस बात के आसुओ की जब तुलसी राम का नहीं था तो मांगे टुकड़े नहीं मिलते थे आज तुलसी राम का है तो बादशाह ताज उतार के रखता है हैना जब हम भगवान के शरण में और जब उन्होंने स्वीकार कर लिया तो आज लाखों लोग प्यार कर रहे हैं नहीं तो यह शरणागति
इस किडनी फेलने दिया अगर ये किडनी फेलना होती तो यह शरणागति नहीं होती ये जो चमक मकार हुआ यह इससे हुआ पूर्ण आश्रय और जहां कनेक्शन जुड़ गया तो बिजली आने लगी फिर [हंसी] क्या पतित पावन प्रभु आ न संतो को पहना हे पतित पावन करणा बाबा का भीड़ में कैसे हम ले चलेंगे लाओ भाई प्रसादी वस्त्र संत भगवान को अच्छा स्वामी जी महाराज जब रोज यमुना जी जाते थे तो महाराज जी के दर्शन होते थे चलो चते जी जी बड़ी कृपा की बड़ी कृपा की दर्शन बहुत आज्ञा कीजिए क्या सेवा करें आपके दर्शन हो
ग मास चौपाई है ना पायो ज्ञान भगति नहीं त थ पायो ज्ञान हा क्योंकि जैसे बिना भूमि के जल नहीं टिकता जल टिकेगा तो भूमि में टिकेगा ऐसे ही भक्ति में ही ज्ञान टिकता है भक्ति का तात्पर्य है स्वरूपा अनुसंधान ज्ञान में माना जाता है और उसी स्वरूप को जिसे ज्ञानी आत्मा परमात्मा कहते हैं भक्त भगवान रूप से कहते हैं जब हम भगवान के प्रति दासत भाव रखते हैं तो अंततोगत्वा आत्म स्वरूप में स्थिति जाती है हम दर्शन फल परम अनूपा जीव पाव निज सहज स्वरूपा हमारा जो सहज स्वरूप है वो भगवान का नित्य स्वरूप
है जब श्री कृष्ण चंद्र जो गीता में कहते मत्ता पर तरम नानत किंच दस्ती धनंजय मेरे सिवा किंचन मात्र कुछ और नहीं है तो यहां उनके सिवा कोई और नहीं है भक्ति की चरम अवस्था में मैं का विस्मरण हो जाता ब्रह्म नहीं माया नहीं नहीं जीव नहीं काल अपनी सुधि ना रही एक रहे नंदलाल एक भगवान की स्मृति मात्र रह गई अपनी पूरी विस्मृति हो गई यह भक्ति का चरम ज्ञान है और ज्ञान का है कि अपनी स्मृति में इतना खो गया कि फिर और कोई स्मृति ही नहीं बची तो दोनों में जाकर के जब
मिलान करो जाकर के तो केवल आत्म स्वरूप ही बचता है निज स्वरूप अपना क्या है जो आत्म स्वरूप है वह भक्ति में अंतिम में आकर निर्णय में आता है और ज्ञान में प्रारंभ में आ जाता है तो अगर हम दासत में नहीं है गुरु के तो शुद्ध ज्ञान हो ही नहीं सकता नायम आत्मा प्रवचने न लभ न मे धया न बहुना सुरते न तो हम जहां भक्त भगवान की आराधना करता है वहां ज्ञानी गुरु की आराधना करता है तो गुरु और भगवान में अभेद है अगर वो गुरु की भक्ति से युक्त नहीं है तो उसे
शुद्ध बोध नहीं प्राप्त हो सकता उसका ज्ञान वेदांत पढ़ने से टिकेगा नहीं और जब रस की स्थिति श्रीपाद प्रबोधनंद जी को आई जिन्होंने सैकड़ों को ब्रह्म बोध कराया तब कहते हैं कि प्रिया प्रीतम के चरणारविंद के प्रेम में वो सुख मिला जिससे मोक्ष सुख को थूंक देने का मन करता है ब्रह्मानंद ुत की कृतम श्रीपाद प्रधान जी ब्रह्मानंद में सम भाव से अखंडानंद का बोध होता है और उस जिसमें सम भाव से अखंडानंद का बोध हुआ उसी में द्वैत के बाद अद्वैत अद्वैत के बाद जो भावा द्वैत होता है उसमें जो सुख मिला वोह प्रेमानंद
मिला और प्रेमानंद सुख के आगे सबने मोक्ष सुख का तिरस्कार कर दिया रूप गोस्वामी भुक्ति मुक्ति पिशाच नहीं शब्द से कहा हरिवंश महाप्रभु कह रहे हैं अलम विषय वार्ता नरक कोट विया व्रथा शति कथा श्रम बत विम कै वलता रा हा हा बोले मुझे बड़ा भय लगता है इस मोक्ष से मोक्ष सुख से बड़ा भय लगता है और मेरे आगे चार जो धर्म अर्थ काम मोक्ष है धर्मात चतुष्टय विजयता किम तथा वारत अब बिना भक्ति के ज्ञान टिकता नहीं है सनक सनन सनातन सनत कुमार परम ज्ञानी है लेकिन हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि
शरणम हर समय उनके श्री मुख से निकलता रहता है भगवान शंकर ज्ञान स्वरूप है लेकिन निरंतर भगवान का नाम जप करते रहते भगवान की लीला कथा का गान करते रहते तो जैसे भूमि के बिना जल नहीं टिकता ऐसे भगवान की भक्ति के बिना भगवान के दासत के बिना भगवान में अभेद भाव करके चाहे भ करो पर बिना उनकी भक्ति के यह ज्ञान रस टिकता रहे और परम ज्ञान भक्तों में पाया गया देखो अद्भुत ज्ञानी हनुमान जी महाराज है कौन सा ऐसा ज्ञान है जो हनुमान जी को ना हो है नहीं परम ज्ञानी है ज्ञानी नाम
अग्र गणम कहा गया ज्ञानी नाम अग्रगण्य बुद्धिमता वरिष्ठ बुद्धिमता और भगवान के चरण लिए हुए हर समय सेवा में रहते हैं विश्वामित्र महामुनि गरुण महा ज्ञानी गुण राश तो अब ये कि जैसे अज्ञान की धारा में भक्ति जो प्रारंभ होती है वह ज्ञान की धारा में नहीं होती ज्ञान की धारा में अपनी ही आत्मा प्रिया प्रीतम के रूप में खेल रहे हैं उसमें कोई द्वैत नहीं रहता पर वह माना हुआ जो द्वैत है बाद का भाव के द्वारा वो वो द्वैत नहीं है विद्या जनित बाध ने वाला जैसे हम प्रिया प्रीतम को देखते हैं तो
हमारी आत्मा ही प्रिया प्रीतम है प्रिया प्रीतम ही हमारी आत्मा है आत्मा हरिवंश प्रकट परमानंद श्री हरिवंश प्रमाण मनम श्री हरिवंश विधि विधि वेदम श्री हरिवंश जो तत्व भेदम जो हमारे आचार्य की वाणी है कि अभेद तत्व हरिवंश चंद्र जो है आत्मा हरिवंश चंद्र जो हरिवंश हा हरि रा राधा वा वृंदावन सा से चरी तो बिना प्रेम के चाहे वो आत्म प्रेम हो चाहे वह कृष्ण प्रेम हो ज्ञानी बहुत मिल सकते हैं लेकिन आत्म प्रेमी मुश्किल मिल सकते हैं आत्म बोध वान आत्म प्रेमी तो बिना विशुद्ध भक्ति के ज्ञान टिकता नहीं इसीलिए गोस्वामी जी ने
बात कही कंचन ना सहज है सहज प्रिया का ने मान बड़ाई ईर्ष दुर्लभ तजना जी स लिखा सह सह तो दिख नहीं रहा नहीं सहज कहा कि जो त्यागी जन है उनके लिए कहा यह सहज जनरल के लिए नहीं कहा यह सहज जनरल के लिए नहीं कहा जो त्यागी जन है वह सहज भाव में आक स्त्री के संग का त्याग कर सकते हैं कंचन की आसक्ति का त्याग कर सकते हैं लेकिन उन त्यागियो में भी मान प्रतिष्ठा की चाह रहती है उन त्यागियो में भी ईर्ष्या भाव रहता है यह सहज जनरल व्यक्ति के लिए प्रयोग
नहीं निवृति दूर कैसे महाराज जी जब तक भगवत भाव नहीं आता तभी तक यह सब कूड़ा करकर टिका रहता है रीरा अभिमान बना हुआ है इसीलिए तो मान प्रतिष्ठा प्रिय लगती है मत सरता मेरे से आगे तो ईर्ष्या हो जाएगी हमारी लेकिन अगर मेरा भगवान ही सब रूपों में है उमा ज राम चरण रत विगत काम मद कोह तो निज प्रभु में देखे जगत तो केसन करें अगर हम सब में अपना भगवान देख रहे हैं सर्वम लमदम ब्रह्म देख रहे हैं वासुदेवा सरमती देख रहे हैं जब वही बना था वही बना है वही बना रहेगा
तो फिर हम लोग तो भगवत मार्ग के पति के तो मान बड़ाई अपने इष्ट से चाहे ऐसा नहीं हो सकता सो अनन्य गति जाके असमत न टरे हनुमंत मैं सेवक सचर चर रूप स्वामी भगवत तो हमें लगता है समम भगवत भाव करने से ईर्ष्या मत सरता मान प्रतिष्ठा इससे हम निपट लेंगे अगर भगवत भाव नहीं है तो निपटना मुश्किल है इसीलिए सहज कहा कि जो बड़े त्यागी है वो सहज में कंचन कामिनी का त्याग कर दिए लेकिन उन सहज में जिन्होंने कंचन कामिनी को को सहज रूप से कोई श्रम नहीं उठाया इतने बड़े त्यागी हैं
कि कंचन कामनी को सहज रूप में त्याग दिया वो भी मत सरता ईर्ष्या मान प्रतिष्ठा त्यागना कठिन है और यह त्यागने के लिए सहज उपाय है सबके चरणों में प्रणाम करो सबको भगवत भाव करो ना ईर्ष्या होगी ना मान प्रतिष्ठा की चा होगी सम में भगवान जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जानी बंदो सबके पद कमल सदा जोर जुग पान तो ना ईर्ष्या रहेगी ना अपने इष्ट मान प्राप्ति की चाह थोड़ी होती जब हम आप में अपने इष्ट का दर्शन करेंगे तो हम आपसे प्रणाम करवाने में सुखी नहीं होंगे दुखी होंगे कि मेरा
स्वामी झुक रहा है संत मिलन को चाहिए माया अभिमान जी जो जो पग आगे बढ आगे बढ़े कोट यज्ञ समान ये स्वरूप लेकर के संत भगवान के पास आओ बाकी संसारी जो भी कामना उसको छोड़ दे जी तो हमारी तो यही निवेदन है सबसे संतों की जिस पर जा पर कृपा राम की तो सब पर होती है संत भी कृपा ना से स होगा हे प्रभु जो भी हमारी शरण में आता है संतों की देखिए भगवान के हमारे बिहारी जी है हम लोग जाते हैं और दर्शन भी करते हैं और सारे काम करते हैं लेकिन
हमको स्वय कुछ नहीं मिलने वाला है क्योंकि वो क्या दे रहे हैं अंदर हमको नहीं पता है लेकिन सके जहां जाएंगे तो आपको जैसे ही पहुंचे सादर या एक सेकंड की टाम नहीं है तुरंत ही आपको फल मिलेगा भगवत चर्चा शुरू हो जाएगी भगवत नाम महिमा भगवत गुण रूप लीला दम बिल्कुल बकल सब ठाकुर जी की कृपा यही है कि जा पर कृपा राम की होई और ता पर कृपा करे सबको ही तो भगवान की जिन परद देखो कोटि कोटि मुन जतन कराई और अंत राम कह आवत नाही यह गुण साधन से नहीं हुई और
प्रभु की कृपा कोई कोही ऐसे संत भगवान को आपके दर्शन मिल जाए उसी से जो इच्छा अंदर है वो आपकी पूरी हो जाएगी पूछने की जरूरत नहीं बाबा बड़ सुंदर आनंद है एक छोटा सा भाव हर बार आ तो बता के जाऊ और ज्यादा समय ल भीड़ ज्यादा है की यार नहीं ब्रज राज कुमार स और प्यार नहीं ब्रजवासी को हेत नहीं हरि भक्ति बराबर और देश नहीं ज नाम रटे ज कृष्ण राध का और निर्मल बहे जमना जल कैसो नाम नहीं मन मोहन को तो बाबा गाम नहीं नंद गाव नंद गाम पधारो जरूर जरूर
महाराज जी राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
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