राजा इवाक ने राज्य किया खूब भोग भोगे संयम से सदाचार से खुले हाथ दान किया साधु संतो सदाचार का सम्मान करने वाला राजा एकवा को एक दिन बैठे थे देखा कि य माल सफेद हो रहे हैं कान के पास के अब बुढ़ापा आया है समाचार आए हैं किब आना पड़ेगा टेलीफोन आता है ना तो कान प रखते पहले कान की तरफ के बाल पकते समझो टेलीफोन आया तैयार रहो पासपोर्ट तैयार है जितना हो सके अपने हाथ से शुभ हो जाने दो परलोक की कमाई हो जाने दो एक सवाक को लगा के परलोक के दिन आ
रहे हैं और मेरा अंतरात्मा का तो मेरे को कुछ ज्ञान और सुख नहीं मिला इन संसार चीजों का तो उपयोग किया और अंत में यह तो उपयोग करने वाला शरीर यही मर जाएगा अपने गुरुदेव का मन ही मन चिंतन किया राजा इवाक के गुरु थे मनु महाराज मनु महाराज का मन ही मन आवाहन किया मनु महाराज आकाश मार्ग की सिद्धि संपन्न संत थे कहीं जा रहे थे देखा कि चेला बहुत श्रद्धा से पुकार रहा है मनु महाराज राजा इवाक के राज महल में उतरे राजा इवाक ने अर्ग पाद से मनु महाराज का पूजन किया चरण
धोए हाथ पैर धुलाए ला तिलक किया अंगों पर तिलक किया चरणों पर तिलक किया पुष्पों की माला पहरा अर्ग पाद से पूजन किया गुरु के देश से निकलते आध्यात्मिक तरंगों को झेलने की कला शास्त्रों ने बताई अर्ग पात से पूजन करते हुए मनु महाराज के चरणों में राजा क्वाकु ने प्रणाम किया और बोला कि मुनीश्वर जीवन तो समाप्त हो रहा है एक एक दिन बीत रहा है आयुष्य कम हो रहा है मनुष्य को क्या करना चाहिए अपने उद्धार के लिए तब मनु महाराज कहते हैं बहुत अधिक कहने से क्या फायदा मुझे राजा अजने ने याद
किया मैं वहां जा रहा हूं थोड़ा सा सार गर्भित बात सुन लो राजन जो घर में स्वास्थ्य के अनुरूप भोजन मिले वह खा लो अपना संकल्प या वासना मत बढ़ाओ कि ऐसा खाऊं वैसा खाऊं वैसा खाऊ सुख भोग के लिए नहीं स्वास्थ्य के लिए खाओ जो वस्त्र मिले सादा सुदा पहन लो जहां नींद आए वहां सो जाओ ऐसा पलंग चाहिए ऐसे माला चाहिए पुष्पों की ऐसा ही चाहिए ये सब भोग वासना के छोड़ दो नित्य अंतर्मुखी सारे राग द्वेष मिट जाएंगे सारे कर्म विकर्म कुकर्म कर्म यह सारे दोष तुम्हारे भगवत ध्यान से निवृत हो जाएंगे
तुम अपने अंतरात्मा भगवान में शांति पा लोगे और उस शांति और परमेश्वरी स्वभाव का अनुभव करने से तुम ज्ञानवान बन जाओगे हे राजा एकवा को ज्ञानवान जिस ईट पर पैर रखता है वो ईट पूजने योग्य हो जाती जिस पत्थर पर पैर रखता है वह पत्थर आदरणीय हो जाता है परमात्मा का अंतःकरण में अनुभव करने वाला महापुरुष जिस वस्तु को छूता है वस्तु प्रसाद मानी जाती है जिस पर दृष्टि डालता है वह भी पुण्यात्मा भक्त होने लगता है तुम ऐसे आत्म शांति और आत्म ज्ञान के खजाने को पाओ राजा इवा को य राज्य का खजाना तुम्हारे
साथ लाए नहीं थे ले जाओगे नहीं यह राज्य का धरती तुम साथ में लाए नहीं थे ले नहीं जाओगे यह महल तुम साथ में लाए नहीं थे ले नहीं जाओगे शरीर भी साथ में लाए नहीं थे वह भी यहां माता पिता के मिस रजवीर से बना और यही मर जाएगा जो तुम्हारे साथ सच्चिदानंद चैतन्य आत्मा था उसी का ध्यान करो तुम देर सबर उसी परमेश्वर पद को पाओगे जहां परि कोई दुख नहीं है जहां कोई शोक नहीं है जहां जन्म नहीं मृत्यु नहीं जरा नहीं व्याधि नहीं भगवान शंकर मिले थे वशिष्ट महाराज को वशिष्ठ जी
ने यह बात राम जी को सुनाई अपने प्यारे शिष्य भगवान राम को कहते शिष्ट जी महाराज कि मैं हिमालय की गुफा में तप करता था तब की बात है सुबह उठता था अपने कुश आसन पर ही शांत बैठ जाता था थोड़ी देर के बाद स्नान आदि करके ध्यान भजन करता था जंगल के कंदमूल लेकर भोजन कर लेता था शाम के समय मेरे आसपास गुफाओं में रहने वाले शिष्यों को शास्त्रों का ज्ञान देता था ऐसा मेरा तपस्या का सिलसिला चल रहा था एक दोपहरी को पार करके सूर्यनारायण संध्या के तरफ जा रहे थे मैं अकेला बैठा
था अरुंधति पास में थी आकाश में देखा तो प्रकाश प्रकाश प्रकाश पुंज गौर करके देखा तो भगवान चंद्रशेखर मां पार्वती के साथ संध्या विचरण कर रहे मेरे आश्रम की ओर आ रहे राम जी मैंने मन ही मन उनका अर्ग पात से पूजन किया फिर अपने आसन आश्रम में उनके अनुकूल आसन बिछाया और अर्ग पाद लाया इतने में वे आ बिराज मैंने उनका भली प्रकार पूजन किया मैंने उनको प्रार्थना किया कि आज मेरी य कुटिया ये मेरा आश्रम पावन हुआ आपने चरण रखे तब शिव जी ने कुशल समाचार पूछते कहा कि मुनीश्वर तुम कुशल तो हो
तुम्हारी तपस्या ठीक तो चल रही है गंगा जी तुम्हें शीतल जल देती और वृक्ष तुम्हें फल फ्रूट तो देते ना य यक्ष के कुबेर के अनुचर यक्ष विचरण करते हैं तुम्हारे आश्रम में विघ्न तो नहीं डालते मैंने कहा हे चंद्रशेखर भवानी शंकर भगवान शंभु एक बार भी जो निष्काम भाव से तुम्हारा नमः शिवाय ओम नम शवा जपता है तो उसके त्रिदोष नाश होने लगते हैं आदि देविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक अशांति दूर होने लगती तो मैं तो तुम्हारे ही स्वरूप के चिंतन में हूं मुझे कोई कमी नहीं है गंगा जी जल देती है कुबेर के
अनुचर आश्रम में कोई विक्षेप नहीं करते लेकिन मेरी एक इच्छा है भोलेनाथ शिव जी ने कहा मुनीश्वर संकोच ना करो पूछो तुम्हारे जैसे संतों को कुछ भी देने में मुझे संकोच नहीं होता भगवान मेरी इच्छा है कि पार्वती जी मेरी पत्नी अरुंधति के साथ जाकर सत्संग करें और मैं अकेले में कुछ सूक्ष्म बातें पूछू आपसे शिव जी का इशारा मिलते ही पार्वती अरुंधति के साथ सत्संग में गए त वशिष्ठ जी कहते हैं कि मुनि हे भगवान शभ सदाशिव ऐसा कौन सा देव है जिसकी उपासना करने से जीव का मंगल हो दो व्यापारी मिलते तो बिजनेस
की बात करते दो ऑफिसर मिलते तो बदली और प्रमोशन की बात करते और दो संत तो यहां संत भगवान मिलते हैं तो लोगों के उद्धार की बात करते हैं नेता को कुर्सी मिलती है तो चमचों की ओर देखता है सेठ को धन मिलता है तो तिजोरी और फिक्स डिपॉजिट की ओर देखता है और संत को जब असली धन मिलता है तो समाज की तरफ भागता है गांव गांव नगर नगर नगरर संत को जब आध्यात्मिक असली धन मिलता है तो गांव गांव नगर नगर डगर गगर देश विदेश बांटता है व जानता है कि कितनी कीमती चीज
है जैसे मैं आत्म धन से धनवान ऐसे मेरा मानव समाज हो जाए और वे बड़भागी जो संत के देवी कार्य में भागीदार हो जाते हैं जो संत के देवी कार्य में भागीदार हो जाते हैं वह संत के देवी अनुभव में भी देर सवेर रिश्तेदार हो जाते भागीदार हो जाते भगवान और संत के देवी कार्य में जो पार्टनर हो जाते हैं भागीदार हो जाते हैं वो भगवान और संत के देवी अनुभव में भी भागीदार हो ही जाते हैं विधान है ऐसा कोई संत का सच्चा सेवक नहीं मिलेगा जिसको संत के संग से संत का हृदय का
जो रस है उसके हृदय में ना आया हो कार्य तो करेगा तब करेगा लेकिन भागीदार होने के विचार मात्र से ही जीवन में भगवत रस भगवत भक्ति भगवत प्रकाश मान शान आने लग भगवान शिव जी से पूछते वशिष्ठ महाराज कि प्रभु ऐसा कौन सा देव है जिसकी पूजा करने से मानव किसी भी युग में सुगमता से तर जाए ऐसा नहीं पूछते कि मेरे को यह मिल जाए मेरे को वो मिल जाए मेरा यह प्रॉब्लम आत्मज्ञानी संतो का कोई प्रॉब्लम ही नहीं होता है समाज का प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए भले वह अपना प्रॉब्लम मानकर कुछ
करें गोविंद सिंह जैसे लोग मुगलों का जुलम यह गोविंद सिंह का प्रॉब्लम नहीं था समाज का प्रॉब्लम था तो गोविंद सिंह ने अपना बनाकर दोनों बेटे दीवाल में चुनवा लिए और भी कई जुलम सेहे तप हुई रहती में ते एक ब बर ने अपना प्राण त्याग तवे पर बिठाकर तपीसी मुगलों ने डाली यह गुरु कभी दुख सहते तो अपने दुख मिटाने के लिए दुख नहीं सहते औरों के दुख मिटाने के लिए अपने को दुख में डाल देते क्योंकि औरों के रूप में भी मेरा ही स्वरूप है ऐसा उन महापुरुषों का मंगल अनुभव होता है वशिष्ठ
जी कहते प्रभु ऐसा कौन सा देव है जिसकी पूजा करने से संसार के दोष निवृत होते हैं कौन सी उपासना है कि हर युग में व्यक्ति उस उपासना के आधार पर अपने को भगवत रस से सराबोर कर दे ऐसा कौन सा उपाय है कि सतयुग हो चाहे द्वापर त्रेता हो चाहे घोर कलयुग हो जीव का उद्धार शीघ्र हो और वह देव प्रसन्न हो ऐसा कौन सा देव है हे महादेव आप ही बताइए हे राम जी तब देवाधि देव महादेव ने कहा कि मुनीश्वर सहस्त्र नेत्र धारी इंद्र भी वास्तव में देव नहीं है ब्रह्मा जी भी
वास्तव में देव नहीं है और मैं भी देव नहीं कैसे सत्य वक्ता है महादेव महादेव बोलते मैं भी वास्तव में देव नहीं हूं कौन बोल रहे महादेव स्वयं बोल रहे हैं कैसा सनातन धर्म का अद्भुत सत हे मुनीश्वर जो ब्रह्मा जी में इंद्र में और विष्णु में है और मुझ में और तुम में है वही आत्मा ही वास्तव में देव है उनके होने से ही सब है और उस आत्म देव में जो विश्रांति पाता है वह आदि नारायण होकर पूजा जाता है उसी आत्म देव में जो स्थित हो जाता है समाधि होता है तो महादेव
कर पूजा जाता हूं वास्तविक देव परमेश्वर है और मनुष्य मात्र का आत्मा बना बैठा है उस आत्मा देव परमात्मा देव के विषय में सुनकर एक महूरत भी कोई ध्यान करता है तो मुनीश्वर उसे एक जग दान करने का फल मिलता है एक घड़ी और एक महूरत जो करता है उसे बाज पर यज्ञ करने का फल होता है एक पहर उस आत्म देव के विषय में सुनकर और शांति पाता है तो उसे अश्वमेघ यज्ञ करने का फल होता है हे मुनि शार दुल वशिष्ठ जी उस आत्म देव का ध्यान करने वाले संत औरों को पवित्र करते
जिन संतों की वाणी से और दर्शन से संसार के लोगों के पाप ताप मिटते और शांति पाते हैं जो संत संसार हों को पावन करते वो भी उस आत्म देव का ध्यान चिंतन करके ही स्वयं पावन होते और उनकी वाणी से दूसरे लोग पावन होते हैं भगवान शंकर वशिष्ठ जी को कहते और वशिष्ठ जी राम जी को यह बात सुनाते तो वह आत्म देव आपका आत्मा है सो साहिब सद सदा हजूर अंधा जानत ता को दूरे यह इंद्रदेव है कि नहीं वो भी आत्म देव से पता चलेगा यह महादेव जी हैं कि नहीं वह भी
आत्म देव से ही पता चलेगा एक शनि देव है कि नहीं यह भी आत्म देव से पता चलेगा अगर आत्म देव नहीं है तो शनि देव को कौन जाने आत्म देव नहीं है तो ब्रह्मदेव को कौन जाने आत्म देव नहीं है तो विष्णु देव को कैसे जानोगे तो यह आत्म देव सदा हाजरा हजूर उस देव को संतुष्ट करने के लिए तब तक कर्म करते रहो जब तक उस देव का ज्ञान हो मनु स्मृति में आया है कि मनुष्य को निष्काम भाव से निस्वार्थ भाव से प्रयत्न पूर्वक कर्म करते रहना चाहिए जब तक उसका देव रीज
करर प्रकट ना हो जाए जो दूसरों की सेवा करते या देवी कार्य करते वह दूसरों पर मेहरबानी हम नहीं करते हमारा आत्म देव संतुष्ट होता है प्रकट होता है प्रेरणा देता है ज्ञान उभरता है हमें ही लाभ होता है लगता है कि हम पर उपकार कर रहे हैं लेकिन स्व उपकार ही बन जाता है पर में भी स्व ही बैठा है तो भगवान शंकर कहते हैं जो नित्य अंतर्म रहता है उस देव में गौ हत्या जैसे पितृ हत्या माता हत्या जैसे पाप भी आधा घंटा उस देव के ध्यान में लगने वाले के नष्ट हो जाते
भागवत में लिखा है दूसरों के धन से जो पुष्ट हुए चोर हैं कामी है क्रोधी हैं लोभी है कुटिल है पात की है पापी है दुराचारी लेकिन यह भगवत कथा और भगवत ध्यान से उनके पाप मिट जाते श्रीमद् भागवत [संगीत] पुण्यम श्रीमद भागवत पुण्यम आयु आरोग्य पुष्टि दम श्रवण पठना तप सर्व पापी प्रम उते य भागवत आयु को देने वाला आरोग्य को देने वाला है सुनने और पठन करने से सारे पापों से मुक्ति दिलाने वाला इसलिए 100 काम छोड़कर भोजन कर ले टाइम से हजार काम छोड़कर स्नान कर ले टाइम से लाख काम छोड़कर दान
पुन दे दे इस नश्वर दुनिया से कौन ले गया तो ईश्वर के नाते दे डाल और करोड़ों काम छोड़कर हरि का ध्यान और हरि का ज्ञान भर ले वही तेरा यहां की धरती की चीजें तुम्हारे साथ नहीं आएगी यू नो बैंक बैलेंस साथ में नहीं आएगा रिश्तेदार और पत्नी और पुत्र और जमाई और यह और वो तेरा तो कुछ है नहीं देखा ठोक बजाए मेरा मेरा करके सब गए क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज छोड़ी छोड़ी सब जात है देह गेह धन और राज सब छोड़ के जा रहे हैं देह भी छोड़ के जा
रहे धन भी छोड़ के जा रहे हैं घर भी छोड़कर जा रहे हैं और राज्य भी छोड़ के जा रहे हैं तुर्क में एक राजा को अच्छे हीरे खरीदने थे ज्वेलर ले आया राज महल में अपना सूटकेस में सारे हीरे जवाहरा मंत्री ने कहा राजा आज एकाय धि के कारण तुम आज आए हो राजा थोड़ा व्यस्त है तब तक चलो अपन एक जगह पर चलते हैं तुम्हें मजा आएगा दो घोड़े आए तबक तबक तबक तबक पूरे तुर्क शहर को चीर कर एक शांत जंगल में सुहावना सुंदर बड़ा बाग था वहां पहुंचे उस बाग में सुंदर
फल और फूल और लगातार राजा का बाग माना क्या सम एक परकोटा था एक छोटा सा कुछ मुजर बना था दोनों ने घोड़े बांध दिए मंत्री और जवेरी गए उस सुंदर सुहावनी ऊंचे ढंग से बनी हुई इमारत के पास बैठे वह क्या देखते हैं कि 200 आदमी आए बड़े विद्वान बुढ़े बुजरक तुर्की भाषा में कुछ बोल बड़बड़ा के में आंसू बहाते हुए चले गए जवेरी तुर की भाषा नहीं जानता था पूछा क्या वेट प्लीज मंत्री ने कहा चुप रहो देखते जाओ थोड़ी देर में 400 सेना के वरिष्ठ ऑफिसर आए उन्होंने भी कुछ कहा और अंत
में आंसू पहुंचते हुए गए [संगीत] फ ललना आई 16 श्रृंगार करती हुई 16 से 18 वर्ष की सुंदरिया वह भी कुछ बोली और चली गई फिर कुछ कवि और विद्वान पंडित आए वे भी बोलकर चले गए आखिरी में राजा आए और राजा ने भी कुछ कहा बहुत अपने को थामा संभाला और बार-बार आंखें पहुंची नाक पहुंचा राजा भी गंभीर मुद्रा से चला गया जवेरी हैरान हो गया मंत्री से पूछा तो मंत्री ने कहा देखो व पहले पहले जो आए थे उन्होंने कहा अगले साल राजकुमार एक लते बैठे तुर्क नरेश के मर गए उनको यहां दफनाया
गया और शाही इमारत खड़ी कर दी गई आज उनकी वर्ष घाट का एक वर्ष का दिन मृत्यु का एक वर्ष गाट हुई बूढे बुजुर्गों ने कहा कि हमारी विद्या में और कहावतों में अगर बल होता तो हम विद्या और कहावतों से मृत्यु को पटाकर भेज देते राजकुमार तुमको मरने नहीं देते लेकिन हमारी अटकले और कहावत मृत्यु पर कोई असर नहीं रख सकती बड़े-बड़े अटकले और कहावत वालों को भी मृत्यु झपेटपुर राजकुमार तुम अब यहां कब्र में सोए हो हमारे से तो सहा नहीं जाता लेकिन हम विवश है सेनापति आए बोले हमारी सैन्य में इतनी ताकत
होती तो हम मृत्यु से फाइट करके तुम्हें बचा लेते लेकिन हमारी पूरी सेना भी एक आदमी को मृत्यु से नहीं बचा सकती हम लाचार है राजकुमार विवश है 16 श्रृंगार करके सुंदरिया आई सुंदरिया कहती कि हमारे हाव भाव नाज नखरे और कटाक्ष में अगर बल होता तो हम मृत्यु को भी ठग लेते मृत्यु को भी संसारी सुख में आकर्षित करके उनको भी बिठा देते चुपचाप और तुम्हारे को जीवन दिला देते लेकिन इस हास्य नाज नखरे में भी वह दम नहीं जो मृत्यु को ढक सके मृत्यु को टाल सके धन भागी तो वह है कि जो
इनर भाव नाज नखरो से बचकर मौत के पहले अपनी अमरता की यात्रा कर लेता है राजकुमार हम चार सुंदरिया भी अपनी लाचारी कह के गई और फिर दूसरे विद्वान कहावत वाले कवि आए वह भी अपनी लाचारी क आखिर में इस तुर्क नरेश ने कहा कि तेरा यह अभागा बाप तेरे को मौत से नहीं बचा सका युवराज तुर्क का तखत देने पर भी मेरा एकलौता बच सकता तो मैं बचा लेता तुझे लेकिन इस कम वक्त संसार की चीजों में यह ताकत कहां कि मौत से एक दिन के लिए भी कोई बचा दे जब मौत अवश्य संभवी
करके आती है तो ले ही जाती है बाप जिंदा और बेटा कबर में सोया है हे एकलो युवराज तेरा बाप तेरे लिए सिवाय आंसुओं के क्या दे सकता है ने देखा जब इतना मौत सत्य तो मैं कब तक ज्वेलर बना [संगीत] रहूंगा जरे आया था तो हीरे बेचने के लिए लेकिन उसके अंतर आत्मा ने कहा हीरे तो क्या बेच रहा है तू तो जिंदगी बेच रहा है भाई आयुष्य क्षीण हो रहा [संगीत] है जवेरी अपनी जवे रात की व्यवस्था करके चला गया जंगल में मौत आकर सब छुड़ा दे उसके पहले जिसका सब कुछ है उसको
पाएंगे खोजा पीर फकीर संत को खते खोदते मिल भी जाते हैं रोम का ज्वेलर रोम का बड़ा भारी संत हो [संगीत] गया जैसे फरू दी दिन अत्तार छोटा सा अत्र का दुकान लेकर [संगीत] बैठा और एक फकीर आया फकीर की बात सुनी अनसुनी कर दी तो फकीर ने कहा क्यों रे फरी दु दुनता क्या दुनिया को साथ ले जाओगे कि ग्राहकों में लगे हो क्या तुम्हारी मौत नहीं याद आती मरोगे नहीं परद उद्दीन ने कह दिया कि बाबा जैसे तुम मरेगे ऐसे हम मरेंगे बोले जा ऐसे कैसे मरेगा हमारे जैसे कैसे मरेगा तू तो मरेगा
तेरे ढंग से हम तो हमारे हाथ की बात है बोले कैसे बाबा बोले कैसे क्या दिखा दूं फगर ने बिछाया कंबल पैर पसारे इंद्रियों को मन में मन को आत्मा में और अपन राम कहते वो अल्लाह कह के सदा के लिए अल्लाह से मिल गए फरीदुद्दीन अत्तार को लगा कि क्या यह जिंदगी है अभी अभी बातचीत हो रही थी और ये अत्र की दुकान का दरवाजा बंद करने नहीं रहा वो भी चला गया और नित्य साधन भजन में लगकर किसी महापुरुष की पूरी कृपा जम कर और एक सुफ फकीर फरीदुद्दीन अत्तार सिद्ध हुए फिर तो
जहां कहां विचरण करते ईरान और तुर्क के बीच जैसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बॉर्डर पर छमक ले होते रहते हैं ऐसे ईरान और तुर्क के बीच भई मनुष्य चलता रहता था परद दिन अता तो सब ला इला लीला मानते थेला के सिवा कुछ नहीं घूमते घाते तुर्क के रेंज में चले गए होंगे तुर्क ने पकड़ लिया शत्रु राज्य का एक फकीर पकड़ा गया है घोषणा कर दी रानियों को कह दिया कि तुम्हारा फकीर हम फांसी चढ़ा देंगे रानियों ने मीटिंग लि आपस में जवानों ने कह के भेजा कि हमारे देश का एक आदमी आपने पकड़ा
है उसे फांसी चढ़ाते हो लेकिन आपको एक आदमी भांसी चलाना है तो हमारे जवानों की मीटिंग में तय हुआ है हमारे जवानों में से कोई भी जवान तैयार है अगर उसको आप छोड़ते हो तुर्क ने मना कर दिया फिर सेठों ने मीटिंग ली फरीदुद्दीन अत्तार की बराबरी हम हीरे जवाहरा तोल के दे देंगे लेकिन हमारे देश के फकीर को वासी मत चढ़ाओ तुर्की ने इंकार कर दिया आखिर विचार विमर्श बढ़ता गया बढ़ता गया मुदत फांसी की मुदत थोड़ी लंबा दी गई तुर्क नरेश ने कहा कि हम आपको चाहिए तो मैं तुमको तख्त दे सकता हूं
लेकिन हमारे देश का ब्रह्मज्ञानी संत की बलि में नहीं देना चाहती [प्रशंसा] खुदा के यहां जाएंगे तो क्या मुंह दिखाएंगे कि पूरा देश एक ब्रह्मज्ञानी संत को ना संभाल सका खुदा से मिलाने वाले खुदा स्वरूप संत को नहीं संभाल सका मेरा तखत तो मेरे पास नहीं रहेगा तो किसी के पास रहेगा लेकिन यह संत के कारण हमारा तुर्क खुदा ताला के हमारा ईरान खुदा ताला के यहां गिरी नजरों में रहेगा तुर्क न कि आखिर ये फरीदुद्दीन अत्तार में क्या भरा है कि तखत देने को तैयार हो गए मैं आऊंगा मौके पर मोहजा लेंगे मौके पर
देखेंगे एक सुबह को तुर्क नरेश गया फरीदुद्दीन अत्तार को देखा देखा कि ये तो फकीर इंसान है हम भी इंसान है भ यह भी खाते पीते हम भी खाते पीते ये भी सोते जगते हम भी सोते जगते यह भी बोलते हैं चुप रहते हम भी बोलते चुप रहते व्ट इ द डिफरेंस क्या फरक ऐसा सोचते सोचते गहराई से देखा एक टक देखा तो फरीद ददन अत्तार की भी एक टक नजर पर अपनी नजर मिली कुछ शांति कुछ पवित्रता कुछ ध्यान करने के प्रभाव का पुण्य उसको मिला तुर्क नरेश की बुद्धि बदली उसने काशिद भेजा चिट्ठी
लिखकर इस फकीर के दीदार के बाद मुझे लगता है कि हम ईगो की लड़ाई में खामखा सिपाहियों की जान ले रहे हैं यह चीजें तो यहीं पड़ी रह जाएगी अपने अहम के टकराव में देश टकरा रहा है अगर आप सहमत हो तो हम इस फकीर को बाइज्जत आपके पास आएंगे और आप और हम मिलकर एक दूसरे से जो फरीदुद्दीन अत्तार ने शांति पाई और रहस्य पाया खुदा के दुनिया का हम लोग अहंकार से टकराए नहीं लेकिन प्रेम से मिले तो कैसा रहेगा रान नरेश ने कहा तुम्हारे मुंह में घी शक्कर आप जल्दी प्रोग्राम बनाई दो
देश टकरा रहे थे सड़ मर रहे थे परद दिन अत्तार के कारण दोनों में उस समय तो मैत्री हो गई कहां तो एक अत्र बेजने वाला फुटपाथ केबिन और कहां ध्यान करके फरद दिन अत्तार बन गए फरद दिन अत्तार को पता ही नहीं होगा कि बापू जी साधना शिविर में मेरी महिमा गाएंगे हरि को भजे सो हरि का हो ध्यान ऐसी चीज है कि आत्म रूपी अंगारे पर विषय विकारों की जो राख है उसको हटाता हटाता उसनी चमक में चमका देता है अपने ओज और बल में उभार देता है जीवात्मा को [संगीत]