एक भीषण महामारी की तरह फैला हुआ रोग है जिसे हस्त क्रिया कहते हैं अंग्रेजी में जिसे मास्टरबेशन कहते हैं इस हस्त्र क्रिया के द्वारा आगे चलकर के वह नितांत नपं शकता को प्राप्त हो जाता है अब चिड़चिड़ा स्वभाव हो गया एकदम निरास अता सुतास अब क्या करें शरीर नष्ट कर दें वो डिप्रेशन में पहुंचने लगे हस्त क्रिया से संपूर्ण शरीर ढीला फीका दुर्बल कमजोर और रोगों का प्रादुर्भाव होने लगता है खड़े भोजन नहीं पाना चाहिए लेटे भोजन नहीं पाना चाहिए चलते हुए नहीं पाना चाहिए बहुत गर्मा गरम भोजन ब्रह्मचारी को नहीं करना चाहिए इस महा
रोग का आना सहज है पर इससे पिंड छुड़ा लेना बहुत ही कठिन है किसी डॉक्टर की ना किसी दवा की कोई सामर्थ्य नहीं इसको छुड़ा सके बहुत गौर से सुनना और प्रायः इसको बहुत हल्के में लेकर के अपने जीवन को नष्ट किया जा रहा है चाहे पुत्र हो या पुत्री शिष्य हो या शिष्या उसको यह बात समझावे कि ब्रह्मचर्य ही आपको लौकिक पारलौकिक उन्नति दिलाएगा जैसे आप सुन रहे हो तो आपको चोट पहुंचाएंगे शब्द य आपको उठाने की कोशिश करेंगे अगर आपने पकड़ लिया शब्द का सारा तो उठ जाओगे कोई औषधि नहीं बचा सकती आप
स्वयं बच सकते हो आप में अभी भगवान ने सामर्थ्य दी है एक भीषण महामारी की तरह फैला हुआ रोग है जिसे हस्त क्रिया कहते हैं अंग्रेजी में जिसे मास्टरबेशन कहते हैं इससे बालकों से लेकर के बड़े तक का यह संघार कर रहा है महामारी कौन सी महामारी यह हस्त म यह हस्त क्रिया इससे बढ़कर नासका कोई रोग नहीं है बहुत ध्यान देने योग्य बातें हैं आज शरमाया जाता है बात अपने बच्चों से पूछने में या अपने शिष्यों को उपदेश देने का यही समय नहीं उपासना की न्यू तो मजबूत होनी चाहिए तब तो उपासना का मैल
खड़ा अरे कैसी बातें कर क्रियाएं कर रहे हो तुम्हें शर्म नहीं आ रही गंदे आचरण में उतर रहे शर्म नहीं आ रही और उनका निवारण कैसे होना है इस बात के सुनने और बोलने में तुम्ह शर्म आ रही है कैसी मड़ता छा रही है यह कराल काल के पंजे में फंसा करके जीवित रहने पर भी मुर्दे के समान कर देता है यह बड़ा दुर्भाग्य हो रहा है कि आज हमारी समाज से पीड़ित होती चली जा रही हित धाम में सायंकाल के समय कुछ समय चर्चा होती थी व जो पुराने हैं उनको याद होगा 70 75
वर्ष के उन्होंने माइक में कहा था कि पूर्व बचपन की अभ्यास आज तक नहीं छूट पा रहे मुझे बचा लो बड़ा आश्चर्य हुआ था कि इतना समय जब इस ब्रह्मचर्य के विषय में चर्चा हुई उन्होंने सुना तो व चकी कहीं न कहीं पवित्रता हृदय में थी तो बोल पड़े माइक में खड़े होकर कि इतनी आयु है पर मैं ऐसी गलती आज भी करता हूं अब मुझे बचा लो इस महा रोग का आना सहज है पर इससे पिंड छुड़ा लेना बहुत ही कठिन है किसी डॉक्टर की ना किसी दवा की कोई सामर्थ्य नहीं इसको छुड़ा सके
बहुत गौर से सुनना और प्रायः इसको बहुत हल्के में लेकर के अपने जीवन को नष्ट किया जा रहा है यह सबसे बड़ी क्रूरता अपने साथ तुम कर रहे हो यदि हस्त क्रिया के द्वारा अपनी जीवनी शक्ति को नष्ट कर रहे हो आपकी नश नाड़ियों से जीवनी शक्ति निचड़ रही है यह तुम्हारा नाश कर देगी इस क्रिया से जितनी हान उठानी पड़ती है वह हम वर्णन नहीं कर सकते यह अनिष्ट कारी क्रिया खिलवाड़ में सीख जाते हैं बच्चे एक 13 वर्ष का बच्चा कुछ चिन्ह होते हैं जो पहले से गुरुजनों की कृपा साधन करने पर परिचय
में आ जाते कि यह स्त्री सवास से वीर्यपात हुआ है या हस्त मैथुन से हुआ है देखा पहले तो मना किया नहीं फिर जब और जोर दिया कि भाई इसमें तुम्हें लाभ मिल जाएगा अगर आप स्वीकार करलो हां दिन में तीन-तीन चार चार बार बच्चों का काम खिलवाड़ उनको उनको खिलवाड़ लग रहा है ऐसा लग रहा है कि बहुत अच्छा मार्ग मिल गया जिससे हम सुखी हो जाएंगे दुर्दशा यह हो गई कि 13 और 14 वर्ष का बच्चा वह इतने बड़े रोग से ग्रसित हो गया कि लभ शंका करते ही जो महान शक्ति उसका पतन
अब ना भजन में रुचि ना किसी सेवा में रुचि पागलो जैसी बात तुमको समझाया जी क्या स्मृति का लोप हो रहा है कोई उत्साह नहीं एक जीवन मृत तुल बच्चा है बच्चा जहां कहीं कोई गुंजा नहीं जैसे अग्नि के ऊपर चला जाए तो कैसे चला जाएगा एकदम पैर से ऐसे यह अवस्था किशोर अवस्था है ब्रह्मचर्य पूर्ण एकदम उछलता हुआ जीवन तेज कैसा भी कोई हो किशोर अवस्था बड़ी सुंदर अवस्था होती है प्रकाश आता है क्योंकि उस समय तक गलत संबंध आज तो किशोर अवस्था प्रारंभ होने से ही यह दुर्दशा मोबाइल कुसंग यह सब बहुत नष्ट
कर कर रहा है इसे खिलवाड़ समझा जाता है और दुर्भाग्य की बात कि जो हमारे सलाहकार हैं वो उनको कहते हैं इससे रिलैक्स हो जाओगे व अंग्रेजी का शब्द है वो हां कौन सा जो भी स्टेशन हो फ स्टेशन बोले उससे मुक्त हो जाओगे होश में होश में ये उन महापुरुषों के वचन है जो ब्रह्मा का वृत्ति में स्थित है जैसे किसी लकड़ी में घुन लग जाता है और व खोखली हो जाती है ऐसे ही शरीर जरजर हो जाता है बहुत बहुत सावधानी की जरूरत है मतलब इस हस्त्र क्रिया के द्वारा आगे चलकर के वह
नितांत नपं शकता को प्राप्त हो जाता है नशों में ऐसा दर्वल ऐसी कमजोरी आ जाती है सहवास के लिए सोचा मात्र खत्म हो गया सहवास की योग्यता खत्म हो जाती गृहस्थ मार्ग में चलने लायक नहीं रहता संतान उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं रहती बहुत सावधानी की जरूरत है इसे खिलवाड़ मत समझो किसी भी औषधि में किसी भी डॉक्टर में कोई भी ऐसा उपाय नहीं है जो इसे छोड़ सके आपकी स्वीकृति ही एक मात्र है सत्संग ही एक मात्र है भगवत चिंतन भगवत कृपा ही एक मात्र उपाय है कि इस महान रोग से और ये वायरल
की तरह फैल रहा है कोरोना वायरल नहीं था ऐसे फैल रहा है छोटे-छोटे बच्चे जो अभी जानते भी नहीं वो इतने से संस्कार पड़ रहा है अच्छा लग रहा है अब वो जीवन भर अगर अभी तो नहीं अभी सुधर जाए नहीं जीवन भर नहीं रोक सकता नहीं रोक सकता या तो सदगुरु कृपा हो जाए और बहुत शासन हो और वह स्वयं उस शासन को स्वीकार करे तो निकल सकता है नहीं बड़े-बड़े इस महामारी से नहीं निपट सकते इसके लिए कोई इंजेशन नहीं तैयार हुआ अभी तक कि आप जाओ रोग खत्म यह स्वयं स्वीकृति में बैठा
हुआ महामारी है और य वायरल की तरह फैल रहा है नवीन पीढ़ी का सर्वनाश और कुछ महानुभाव ऐसे हैं कि इसको बता रहे हैं तो नेचुरल है स्वाभाविक है प्राकृत चलता है यह कोई अरे सर्वनाश को तुमसे प्राकृतिक बता स्वाभाविक बता रहे हो नहीं बहुत सावधान आप लोग दुर्भाग्य का निमंत्रण मत दे यह दुर्भाग्य है ऐसा दुर्भाग्य है कि आपकी दिनचर्या ही नहीं हो सकती कभी भी व्यभिचारी की एक जैसी दिनचर्या बहुत काल तक नहीं हो सकती दो चार दिन प्रयास करेगा गिर जाएगा ब्रह्मचर्य कभी भी दिनचर्या में फर्क नहीं पड़ने देगा चाहे जैसी स्थिति
हो चाहे ज शरीर नहीं उठ पा रहा तो उसका चिंतन भागवती होने लगेगा इसलिए सामान्यता जिसे हम बहुत सरल समझ रहे बहुत सुख समझ रहे हैं इसको आप सावधानी पूर्व बहुत ध्यान दीजिए बहुत ध्यान का इसलिए विषय है कि ये नीव है हमारे अध्यात्म की हमारे पर माथ की शरीर के भीतर बताया था कल भी एक मनोवा नाम की नाड़ी है इस नाड़ी का कार्य मथानी जैसे नहीं जो दूध दही का मंथन करे तो मक्खन निकाल देती है यह इतनी चिंतन से गर्म हो जाती है नाड़ी तो वीर पूरे शरीर के रक्त के साथ है
उसी से आपकी हड्डियां मजबूत होती है उसी से आपका शरीर बलिष्ट होता है उसी से आपके मन को पवित्र विचारों में चलने की सामर्थ्य मिलती है ये जो कहते हैं ना कि हम नहीं चल पा रहे हम भजन नहीं कर पा रहे आप कमी को पहचानिए शरीर के भीतर जो मनोवा नाम की एक नाड़ी है यह मंथन कार्य करती है ज भी आप कामा शक्त हुए चिंतन किए तो पूरे शरीर से जैसे दही के मंथन से वो ग्रत निकाल ले वैसे ही मनोवा नाड़ी काम करती वह पूरे शरीर की नस नाड़ियों से आपके जो वीर्य
शक्ति उसको एकत्रित कर लेती है चाहे शरीर धारी कोई भी स्त्री पुरुष कोई भी हो उसको एकत्रित कर लेती है पूरी नश नाड़ियों काप उठती हैं जब उसका आकर्षण व आप समझ नहीं पा रहे व आप समझेंगे ठन हो रही है आपसे वो पूरे नस नाड़ियों को निर्जीव कर रही शक्तिहीन कर रही है से पैर तक हर अंग हिल जाता है शरीर का मंथन करके वह एकत्रित करके बाहर कर देगी अब क्रिया करो या ना करो दर्वल प्रमेह स्वप्न दोष यह निश्चित उसके शरीर में प्रकट हो जाते हैं शरीर के रक्त में एक सफेद और
दूसरे लाल कीट होते हैं सफेद कीटों में बाहरी आए हुए प्राकृतिक प्रहार रोगों के प्रहार से लड़ने की सामर्थ्य होती है जो हस्त क्रिया या अन्य अष्ट मैथुन के द्वारा वीर शक्ति का नाश करता है तो सफेद कीट ये नष्ट होने लगते हैं अब जो लड़ने की सामर्थ्य थी प्रकृति से गर्मी सर्दी बरसात मान अपमान निंदा स्तुति और रोगों से वीण हो गए अब चिड़चिड़ा स्वभाव हो गया एकदम निरास अता सुतास अब क्या करें शरीर नष्ट कर दे व डिप्रेशन में पहुंचने लगता है समझो अधिकतर हमारी दुर्दशा हो रही है ध्यान देकर सुनना अगर वह
शुभ की जो रोग नाशक सफेद है वीर्य आप नष्ट नहीं करते तो इतने बलवान हो जाते हैं कि एक बार विष को भी वो पचा डालेंगे इतनी उसम सामर्थ्य है आपकी हानि नहीं होने देंगे ज्यों ज्यों आप ये नीच चेष्टा करते हैं त्यों त्यों ही ये जो आपको सबल बनाने वाले वो नष्ट होने लगते हैं और उसके कारण भयानक रोगों का सृजन होने लगता है मनुष्य के शरीर में और दिमाग में और स्नायु पर ऐसा प्रभाव पड़ता है आगे चलकर पक्ष त हो जाता है ग्रंथि वाद जितने जोड़ उन में दर्द पागलपन या और रोगों
की उत्पत्ति होने लगती क्योंकि वह जो लड़ने वाले कीट व सब नष्ट हो जाते हैं व्यभिचार सर्वथा निंदनीय है और सबसे महा निंदनीय है यह हस्त क्रिया क्योंकि इसमें किसी दूसरे की जरूरत नहीं होती है बहुत सावधान बहुत नीच प्रवृति इसका वायरल की तरह जसे वायरस होता है वायरल हो जाता है ऐसे हो रहा है ऐसे जिसको देखो सुख का साधन माने हुए हैं नवीन अवस्था अपने को नष्ट कर रहे और प्रमाण उनको मिल जाता है ऐसे बहिर्मुखी उत्तर है कैसा उपदेश है नाश करने वाला तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित आपने वेद पढ़ा
है आयुर्वेद कौन सी डॉक्टरी ऐसी कहती कि ऐसा करने से आप स्वस्थ हो जाओगे शास्त्र प्रमाणित धर्म प्रमाणित उपदेश होना चाहिए छोटे-छोटे बच्चे नवीन बच्चे जब यह सब पढ़ते हैं और यह सब सुनते हैं देख का है जीवन को जो हमारे नवीन पीढ़ी को बर्बाद किया जा रहा है ऐसे नाटक सिनेमा ऐसे उसमें जिसमें हमारी जो संयम की वृत्ति है वो सब नष्ट हो जाए इस क्रिया के द्वारा सबसे पहला धक्का हृदय पर लगता है इसका धक्का बार-बार लगने से यह क्षमा हृदय रोग और स्मृति का नाश ये शुरू हो जाते हैं इसे राजक क्षमा
कहते हैं यही रोग हुआ था विचित्र वेर को दो पत्नियों के संयोग में बावरे हो गए समझ नहीं पाए सिद्धांत को भयानक हृदय रोग हृदय का कमजोर हो जाना जरा सी बात में घबराहट पैदा होना डर जाना उत्साह हीन हो जाना क्या बात है एकदम कोई बात नहीं बे मतलब कल्पना में पर यह आपके ब्रह्मचर्य नास का लक्षण है ऐसा अभागा मनुष्य जीता हुआ भी मृत्यु मस्तिष्क में बिजली की तरह इसका प्रभाव पड़ता है ब्रह्मचर्य नाश का व एकदम क्षीण करता चला जाता है याददास्त नष्ट हो जाना शरीर में एक अजीब सी पीड़ा होना खाली
खालीपन महसूस होना सुबुद्धि का पूर्ण रूप से ह्रास हो जाना प्रतिभा ना रह जा जाना तेज ना रह जाना उत्साह ना रह जाना और पागल सा व्यवहार होना यह शुरू हो जाता है ब्रह्मचर्य नाश से मस्तिष्क कमजोर होते ही आंखों की ज्योति लड़खड़ा जाती है ऐसे देखें अवस्था गत बात अलग है अभी ब्रह्मचर्य रह कर के आप देखो ये तो प्राकृतिक नेत्र है आपके दिव्य नेत्र खुल जाएंगे कान में सुनने की शक्ति दांत के मसूड़ों का फूल करके दांतों को जो रोकने की शक्ति शरीर की शक्ति ये सब नष्ट हो जाती है क्योंकि ब्रह्मचर्य सबका
आधार है बहुत जल्दी बाल झड़ना बाल पकना जैसे राजा के नष्ट होने पर संपूर्ण सेना बंदी बना ली जाती है ऐसे ही शरीर का राजा है ब्रह्मचर्य वीर इसके नष्ट होने पर हर इंद्रिय हर नस नाड़ी पराजित हो जाती है आंख नाक कान जिव्या वाणी पैर त्वचा आते और इंद्रिया य सब असमर्थ होने लगती हैं पाचन शक्ति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है अब यह नाश नहीं तो और क्या जीते जी नाश है हस्त क्रिया से संपूर्ण शरीर ढीला फीका दुर्बल कमजोर और रोगों का प्रादुर्भाव होने लगता है मुख की कांति हीनता बढ़ती चली जाती
है मुख प्रसन्न तन तेज विराजा किन रामचंद्र कर काजा या चेहरा देखो वैसा लगता है जैसे सब उड़ गया कुछ नहीं रह गया बस केवल सजावट सजावट रह गई है पवित्रता जितेंद्रिय बल अध्यात्म चिंतन कुछ नहीं शून्य बस वही वर्तमान भोगों का चिंतन कैसे भोग भोगे हुए भोगों का चिंतन बस आप देख लो अपने हृदय में झाक करके संपूर्ण जीवन विषयात में फस जाता है इंद्रिय दुर्बलता के कारण अगर वह गृहस्थ में भी गया तो गृहस्थ में भी अपने धर्म का नहीं कर पाता क्योंकि उसकी जो शक्ति है वह नष्ट हो चुकी है संतति सुख
से भी हाथ धो बैठता है फिर जो उसको जलन और शोक होती है क्योंकि वह जो कर्तव्य करना चाहिए ग्रस्त का वो नहीं कर उसकी सामर्थ्य नहीं रह गई अब व अपनी बात तो बता नहीं सकता किसी से अब जो अंदर जलन हो रही उसका निराकरण कहीं नहीं सावधान हो जाइए ना वैरागी और ना गृहस्थ कुछ नहीं रह पाओगे यदि ये गंदी बातें आप नहीं त्याग पाए बोलो ऐसे आदमी की सुख की आशा क्या और अंत में इसका परिणाम महापाप नरक मिलता है ऐसा थोड़ी है कि आप सोचोगे मेरा शरीर मैं जो चाहूं कर लूं
नहीं नहीं आपको दिया गया ये भागवत है आपको प्रभु की तरफ से मिला है जसे आपका शरीर है अभी रिपोर्ट कर दी जाए कि आप अपने शरीर को नष्ट करना चाह आपको दंड मिलेगा इस बात का आप शरीर का सद मार्ग में प्रयोग कीजिए आप इसका असत मार्ग में आप इसको नष्ट करने का अधिकार नहीं रखते यहां भी तो फिर भागवत विधान में तुम्हारा इतना अधिकार कहा कि तुमसे मनमानी नष्ट कर दो दुर्बल चित्त हो जाता है संयम बिल्कुल नहीं रहता जब कभी उसको इसका दोष अनुभव में आता है सुनने में तो प्रतिज्ञा करता है
पर ऐसी हजारों प्रतिज्ञा रोज करता है रोज तोड़ता है क्यों क्योंकि उ बल ही नहीं रह गया है जो इस वासना से पीड़ित है अगर थोड़ा भी हृदय सात्विक है तो शर्मिंदा रहता है उसकी अजीब स्थिति अंदर रहती है खुलकर किसी से बात नहीं कर सकता आंख मिलाकर बात नहीं और जो मलिन हृदय का होता है वो इतना अकड़ करके इतना राक्षसी प्रवृति का हो जाता है बिल्कुल ढीठ य दो वृतिया आती है जो ब्रह्मचर्य हीनता होती या तो इतनी शर्मिंदगी थोड़ा सा भी हृदय अगर सात्विक है व गलानी और या फर इतनी दुष्टता जो
आनंद में हसमुख होना चाहिए व उदास एकदम तेज हीन उसकी सूरत देखने पर लगता है रोने वाला ही स्वभाव में रक्षता होती है चिड़चिड़ापन क्रोधी निस्तेज आंखें अंदर धसने लगती है यहां खालीपन होने लगता है एक खालीपन एक काला सचन बहुत बहुत सावधान यह इतना भयानक रोग है कि जवानी में भी वृद्धावस्था के लक्षण प्रकट होने लगते हैं किसी भी कार्य में मन ना लगना पड़े रहने की इच्छा होना थोड़ी मेहनत करने पर हाते रहना आगे क्या करना ऐसे विचार करने की शक्ति नष्ट हो जाना बहुत जल्दी क्रोध आकर के आवेश में कुछ ऐसे वचन
बोलना क्रियाएं करना देखो ना सुनने को मिलता माता-पिता को पीटा ऐसा किया बैशा कु चिंताओं की बाढ़ आ जाती है कु चिंताओं की उसके हृदय में एक भय एक जलन एक घबराहट बनी ही रहती है थोड़ी सी बात उसको पहाड़ जैसी मालूम होती है विचार के द्वारा काट नहीं पाता है बार-बार झूठ बोलना उसका स्वभाव बन जाता है बार-बार भूख लगना या जठराग्नि का मंद पड़ जाना यह दो दोष होते हैं अन्न ना पचना या तो बारबार ऐसा लगना कि खाओ और मल बद्ध आते जब वीर शक्तिहीन हो जाती है तो मल को पकड़ने लगते
हैं उनमें सामर्थ्य नहीं रह जाती पचाने की या मल निकालने की तो कब्जियत बनी रहती है नींद का या तो नाना और या आना तो कुंभकरण जैसे सोना पड़े हैं दो उठते समय निरोसा आलस्य आंखों को बहुत बहुत भारीपन होना नहीं खुलने देना ऐ जब आप संयम से चले घड़ी की अलार्म की जरूरत नहीं होती ठीक समय में नेत्र खुले ऐसा नहीं ऐसे नहीं एक दिव्यता आती है अी आप उधर कदम सही ढंग से नहीं रख रहे इसलिए है अलार्म बजते रहते हैं सो रहे परमार्थ में या व्यवहार में भी आपको चलना है तो आपका
संयम बहुत अनिवार्य है अब बच्चे कहते हैं हमारी स्मृति काम नहीं करती है पढ़ाई में मन नहीं लगता है ऐसा क्यों नहीं लगता आप देखो अपने आचरण को देखो पढ़ाई यह तो इतने टेबलेट इतना सब एक बार बोल दीजिए कभी भी जीवन में पूछ लीजिएगा उसे दोबारा पढ़ने की सुनने की आवश्यकता नहीं एक बार अगर और अगर हम नहीं सुनना चाहते तो आप हल्ला मचाते रहो बाद में पूछो तो ना हमने वर्तमान में सुना ना बाद में उसकी स्मृति रहेगी जहां स्मृति लगी वही लगी है रात्रि में जो स्वप्न दोष होता है इन्हीं गलतियों का
परिणाम होता है यदि आप ऐसी कोई गलती ना करें तो कल चर्चा में बताया था स्वाभाविक कभी हो व फान जैसा वह जो संतानोत्पत्ति वाला वह नहीं जो हस्त क्रिया से युक्त हो गया है वह अनुभव करे लघु शंक के पहले या बाद में देखना जो जीवनी शक्ति है व आपको रास होती दिखाई देगी बूंद-बूंद निकलते दिखाई द कितना सर्वनाश कर रहे हो बाद में तुम सोचो हम यह विटामिन खा लेंगे वह खा ले कुछ नहीं उसकी पूर्ति नहीं हो सकती उसकी पूर्ति नहीं हो सकती आगे इसमें आता है यह जो आयुर्वेदिक औषधियां दी जाती
है यह बलिष्ट होती हैं और चूंकि आपकी प्रवृत्ति गलत है व बलिष्ट होकर आपको और कामो तेजना प्रदान करेंगी तुम रोग कैसे पाओगे संयम नहीं इसीलिए कोई औषधि नहीं है आप स्वयं औषधि है उसके आपका दृढ़ निश्चय और कुछ व्यायाम प्राणायाम आहार शुद्धि और नाम जप नाम जप इससे आप शासन मेंला सकते हैं इस बात को कौन अपने बच्चों को बैठाकर समझा रहा है अगर व नहीं है तो सावधान हो जाएंगे कि अगर कोई ऐसी बात बताता है तो माता पिता ने मुझे पहले सिखा रखा है कि यह बहुत नासका क्रियाए कभी ऐसा नहीं करना
आप बताते हैं क् आपको फुर्सत कहां है आप अपने मनोरंजन में मस्त है आपको यही लगता है खिलाना पिलाना ही केवल बच्चों का प्यार दुलार है नहीं कभी बैठा लिए उनकी दिनचर्या देखिए आप उनसे पहले इस महान दुर्गुणों का आगाह कीजिए कि ऐसी ऐसी बातें आगे कोई तुम्हें सिखा सकता है या तुम में है तो नहीं जानकारी करनी चाहिए अगर कभी ऐसा हो तो म ऐ मत करना जो नौ युवक है हाथ पैरों के जोड़ों में दर्द मालूम दे रहा है शिथिलता हो रही दिमाग में एक सनसनी बनी रहती है आपको यह अश्लील चित्र देखना
अच्छा लगता है गंदी बातें करना अच्छा लगता है यह सब उसी हस्त क्रिया का परिणाम है जिनको बार-बार एक स्वाभाविक लघु शंका लगती है एक बारबार यह आपका लक्षण है कि आपने ब्रह्मचर्य का नाश बहुत अच्छे से किया है कोई भी हो गृहस्थ हो विरक्त हो कोई भी हो हाथ पैर में कंपन होना चेहरे पर मुहा से उभरना एकदम उठक खड़े हुए अंधकार सा छा जाना स्मरण शक्ति का लोभ हो जाना चित्त का अत्यंत चंचल रहना दुर्बलता प्रतिज्ञा पूरी ना करना कोई भी कार्य पूरा ना करना दिमाग में हर समय गुस्सा गर्मी छाना नेत्रों में
जलन होना क्षण में गुस्सा क्षण में शांत माथा कमर मेरुदंड छाती इनमें दर्द होना य बिल्कुल ध्यान से सुन लीजिए रीढ की हड्डी झुकाकर बैठने में आराम महसूस करना ये सब शी ब्रह्मचर्य नाश के लक्षण है ब्रह्मचर्य आपको ऐसे बैठ नहीं नहीं देगा देखो जरा सी एकाग्रता का आएगा तो बिल्कुल सावधान अरे महान शक्ति है मुख से दुर्गंध और शरीर से दुर्गंध आने लगती है जो अपनी इस ब्रह्मचर्य शक्ति का नाश करता है दुर्गंध युक्त शरीर हो जाता है नाक के किनारे ऐसी हल्की हल्की झाई आने लगती है ऐसे यहां हल्की हल्की झाइयां पड़ने लगती
काले दाग जिन्हें कहते हैं ये चिन्ह है ब्रह्मचर्य का नाश करने की आवाज में कोमलता नष्ट हो जाती है रुक्ष आ जाती है स्वभाव में अप्रिय स्वभाव बन जाता है कोई भी कोई भी तुम्हारे पास बैठना नहीं चाहेगा वही बैठेगा जो तुम्हारे लक्षणों से युक्त होगा किसी भी मार्ग में उसको कामयाबी प्राप्त करने का उत्साह नहीं रह जाता कर एक न युवक भाई कह रहे थे कि अगर वचन सुनने को ना मिलते तो हम ने तो ठान ही लिया था कि अब अपने शरीर को पूरा कर देंगे बचा लिया आपने हमारे जीव व बड़े भाव
से गदगद होकर कह रहे थे ये जैसे आप सुन रहे हो तो आपको एक चोट पहुंचाएंगे शब्द य आपको उठाने की कोशिश करेंगे अगर आपने पकड़ लिया शब्द का सहारा तो उठ जाओगे कोई औषधि नहीं बचा सकती आप स्वयं बच सकते हो आप में अभी भगवान ने सामर्थ्य दी है अभी बच सकते हो अगर आपने अभी अपने को नहीं संभाला सोच सोचो जरा आप इतनी कीमती महान वस्तु को खिलवाड़ में नष्ट कर रहे हो क्या चाहते हो क्या चाहते हो गृहस्थ में संतान उत्पत्ति के लिए आदेश है व्य विचार के लिए थोड़ी आदेश है प्रत्येक
माता पिता गुरु बड़े जनों को यह कर्तव्य का पालन करवाने के लिए चाहिए कि उनको अपने पास बैठा ले चाहे पुत्र हो या पुत्री शिष्य हो या शिष्या उस को यह बात समझावे कि ब्रह्मचर्य ही आपको लौकिक पारलौकिक उन्नति दिलाएगा इसमें लज्जा संकोच करना बिल्कुल मढ़ता होगी कि हम अपने बच्चों से ऐसी बात क्यों करें या यह समझना कि मैं ऐसा बोलूंगा तो कहीं कोई ऐसा ना सोचे मालो गुरु है उपदेश कर रहा कहीं यह ना सोच बैठे कि लोग क्या कहेंगे कि राम कृष्ण हरि की चर्चा छोड़ कर के क्या चर्चा कर रहे हैं
शरीर व्याधि मंदिर यह तभी बनता है जब आप ब्रह्मचर्य का नाश करते हैं अतः माता-पिता से गुरुजनों से सबसे प्रार्थना है कि संकोच लज्जा छोड़कर अपने प्रियजनों को पास बैठाकर चाहे बच्चा हो या बच्ची हो संयम की शिक्षा जरूर बतावे कि कैसे हम अपने जीवन को भविष्य को आप क्या समझते हो अच्छे-अच्छे पदार्थ पवा दिए खूब पैसा लगा कर के उनकी सु धा दे दिए लेकिन वो जो आचरण हीन हो रहे हैं जो जीवनी शक्ति का नाश कर रहे हैं किस उन्नति में जाएंगे जब अंदर ब्रह्मचर्य हीनता आती है तब नशा करने की इच्छा होती
है क्योंकि विक्षिप्त सही नहीं जाती है वो गांजा चरस दक्ष ये वो अब उस नशे की उत्तेजना में और नष्ट होता चला जाता है नष्ट होता चला जाता है आप अपने ब्रह्मचर्य का नाश किए आपके अंदर उस विक्षिप्त को सहन करने की सामर्थ्य नहीं रही आप नशे पर उतर गए अब नशा आपको सर्वनाश की स्थिति में पहुंचा दिया यह बहुत गंभीर विषय है जीवन का केवल फराटे दार श्लोक बोलकर उनके अर्थ कर देने से समझ में नहीं आएगा पहले आप अपने आचरण को सुधारी अपने जीवन शक्ति की रक्षा कीजिए तो बिना उपदेश के भी अंदर
से आप ऊंचाई पर चढ़ने लगेंगे और चाहे जितना उपदेश दे लो और चाहे सुन लो अगर आचरण पवित्र नहीं तो जहां हो वैसे ही रहोगे क्योंकि आचरण पवित्रता ही आपको उठाएगी तो इसलिए माता-पिता या गुरु को ब्रह्मचर्य का स्पष्ट वर्णन करने में कभी लज्जा नहीं मालूम होनी चाहिए और बड़ी दुर्भाग्य की बात हो रही कि घर परिवार के लोग तो कोई ऐसा बता ही नहीं रहे अध्यापक भी इसकी तरफ नहीं बोल रहे अध्यापक अगर 15 मिनट का समय केवल दैनिक दिनचर्या की पुष्ट के लिए दिया जाए हमारे नवीन पीढ़ी की जो उज्जवल है व प्रकाशित
हो जाए अब हमारे तो समय में ऐसा पढ़ाया नहीं गया था लेकिन नवीन बच्चे जो जुड़े उन्होंने बताया कि सब विषय पढ़ाया जाता है तो उसके संयम का शब्द नहीं नहीं ऐसा तो कुछ नहीं बताया गया है क्या है क्या है यह जीवन आप उस जीवन को पतन की तरफ ले जा रहे हैं यह विद्या है विद्या तो विनय सिखाती है विद्या तो संयम सिखाती है विद्या तो भविष्य को उज्जवल करने वाली वस्तु होती है क्यों विद्या को कलंकित किया जाए अगर आप बच्चों की नशा प्रवृत्ति जो बढ़ रही उसको नहीं रोका गया व्यभिचार प्रवृत्ति
बढ़ रही उसको नहीं रोका गया तो हमें लगता है विद्या का मतलब क्या रहा विद्या जो है व गंभीरता संयम विनय यह प्रदान करने वाली होती है विद्या उद्दंडता आज का विद्या विद्यार्थी अपने माता-पिता की अवहेलना करता है शास्त्र वाक्य की अवहेलना करता है और स्वयं अपनी अवहेलना करता है अपने जीवन को पतन गर्त में गिरा रहा है चाहे वो बच्चा हो चाहे बच्ची हो कैसे तो उचित है लज्जा त्याग करके चाहे 15 मिनट का ही केवल हो लेकिन दैनिक दिनचर्या कैसी होनी चाहिए विद्यार्थी की यही हमारे गुरु कुलों में सिखाया जाता था यही संयम
बर्ताव करने के कारण वो गृहस्थ में रहते हुए भी राजर्षि कहलाते थे राजा है पर वो ऋषि शब्द उनके आगे राजर्षि वो गृहस्थ होते थे पर बंद नहीं होते थे आज हम किस दशा को पहुंचते चले जा रहे हैं अरे तुम ना गृहस्थ हो ना विरक्त हो तुम भगवान के निज जन हो मनुष्य शरीर भगवान की प्राप्ति के लिए हुआ है हां तुम्हें भगवान ने गृहस्थ मार्ग दिया किसी को विरक्त दिया अपने अपने कर्तव्य की पूजा करते हुए भगवान को प्राप्त करो ये मनुष्य जीवन का परम लाभ है अपनी कोई भी गुप्त बात अपने गुरुजनों
से छुपानी नहीं चाहिए ये अपनी तरफ गुरुजन माता-पिता अपने जनों को समझाए और अपनी सावधानी कि कोई भी गलती वह तुम्हारी गलती नहीं है तुम्हारा मन बुद्धि तुम्हारी इंद्रियां तुम्हें गलत फसा रही हैं तुम निर्णय नहीं कर पा रहे हो तो तुम अपनी बात अपने प्रियजनों से गुरुजनों से जो सही सलाह दे सके उनसे आप रखो डरो मत आप उसे छुपाओ मत घबराओ मत कि अगर हम ऐसा कहेंगे तो हमारे प्रति गंदी दृष्टि हो जाएगी तो नीच ऐसा नहीं होता ऐसे जैसे डॉक्टर होता है हम उसको अपनी बात बताते हैं तो सही दवा देखता है
ऐसे ही गुरुजनों से जब अपनी कमी बताते हैं तो कृपा करते हैं वो आराध्य देव से प्रार्थना करते हैं वो हमें ऐसे उपदेश देते हैं जिसके कारण हम ऐसे दलदल से ऊपर उठ जाते हैं पर हम वो पूछे भी तो हम छुपाना चाहते हैं इतना प्रिय मानते हैं मन बुद्धि को मन बुद्धि के द्वारा हमारा जो पतन कराया जा रहा है हम उसको इतना छुपा के रखते हैं कि करुणा करके यदि गुरुजन पूछे भी तो हम उसे झूठ बोल देते हैं कि नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है नहीं आप इतना साथ मत दीजिए इस दुष्टता
की प्रवृत्तियों का कि आपका बहुत पतन हो जाए और आप पुनः चढ़ने लायक ना रह जाए अध्यात्म मार्ग में कई लोग यह समझते हैं कि यदि हम समाज में ब्रह्मचर्य की बात हस्त क्रिया आदि की बात शिशु मैथुन आदि की बात करेंगे तो कहीं लोग हम पर ऐसा ना सोचे कि कैसे शब्दों का उच्चारण कर रहे हैं बिल्कुल नहीं लज्जा नहीं करनी क्योंकि जो नहीं जानते हैं वह इस बात को जानकर सावधान हो जाएंगे और जो गलत करते हैं वह अपने को बचाने की चेष्टा करेंगे कुसंग में पड़ा हुआ बिना सत्संग के नहीं निकल सकता
बुराइयों को दबाने के लिए अच्छाई क्या है यह जानकारी होनी आवश्यक है इसीलिए सदाचारी और ब्रह्मचारी बनने के लिए जो सदगुरु के वचन है संतों के वचन है शास्त्र के वचन है उनको सुनो उसमें लज्जा का भाव मत रखो यदि गुरुजन अच्छे ढंग से अपने शिष्यों को समझाएं तो प्रभाव पड़ता है यदि माता-पिता अपने बालकों और बालिकाओं को बैठल करर समझाए तो अच्छा प्रभाव पड़ता है यदि स्कूल में कुछ ही मिनट जो अध्यापक जन है इस विषय पर प्रकाश डाले तो उसका प्रभाव पड़ता है जितनी धातु पौष्टिक औषधियां ली जाती हैं वह सब शोध के
देखी गई उनमें बलवर्धक होता है और आपकी वृत्ति कामों तेजकरण काम वृद्धि ही करेगा जाके बहुत ध्यान देने योग बात है कि यह आयुर्वेदिक औषधि ले लेते हैं यह ले लेते हैं तो आपको आपकी गति गलत है इसलिए पावर जाएगा औषधियों का गलत ढंग से ही प्रयोग हो जाएगा कोई भी ऐसा वैद्य समर्थ नहीं है जो तुम्हें इस हस्त क्रिया को रोकने की औषधि दे दे बहुत सुंदर बात है तुम्हें कोई ब्रह्मचारी बना सके ऐसी कोई औषधि नहीं एक मात्र मन को प्रभु में लगाकर नाम जप करो और जो संयम बताया जा रहा वैसा करो
सब ठीक हो जाएगा सब ठीक हो जाएगा तुम समर्थ बन जाओगे अपनी इंद्रियों को रोकने के लिए उपासक पहले भोजन पर सुधार कर रहे भोजन और बुद्धि का परस्पर बड़ा घनिष्ठ संबंध है सात्विक आहार निसंदेह आपको इस क्रियाओं से विजय प्राप्त करवा देगा ध्यान से सुनिए सात्विक आहार जब आप भोजन पा रहे हो उस समय नाम जब जरूर चलना चाहिए अगर उस समय गलत दृश्य देख करके गलत बातें चिंतन करके भोजन पाओगे तो उसका प्रभाव आपको और गलत में लगा देगा भले सात्विक भोजन है ध्यान दीजिए भोजन के समय जरू बड़ा आनंद मिलता है जैसे
आप प्रसाद पा रहे हो और आपका अभ्यास फिट है अब लगा दिया प्रथम यथा मति प्रणव श्री वृंदावन तिरम श्री राधिका कृपा विनु सब बड़ा पद है देखत नव निकुंज सुन सजनी लागत है यति चारु पद अंदर चल रहा है और प्र चलो नहीं है साब का अभ्यास राधा राधा राधा उस समय व्यर्थ की वार्ता उस समय व्यर्थ का चिंतन व्यर्थ के दृश्य देखते हुए भोजन गलत संस्कार पड़ रहा है सात्विक आहार आपने पाया पर विचारा आपका सात्विक नहीं है अधार्वा है तो सात्विक व्यर्थ हो जाएगा भोजन वो उसी को सपोर्ट करेगा भोजन के समय
बिल्कुल सावधान रहो वह आपकी नस नाड़ियों में फैल करर वैसा ही प्रभाव फैलाए जैसा आप चिंतन कर रहे हैं भोजन के समय जैसा विचार होता है ठीक वैसा ही आपका स्वभाव बनता है महापुरुषों का स्वानुभूति भोजन के समय सावधान भोजन में जो रस बनता है वो नस नस में फैलता है और जिस चिंतन से चिंतित होकर पाया वैसे ही प्रभाव पड़ता है स्थूल भोजन का सूक्ष्म विचार पर प्रभाव पड़ता है कई गुना प्रभावशाली प्रभाव आपके चिंतन का पड़ता है भोजन में बहुत शुद्ध भोजन हो सात्विक भोजन हो पर आपका विचार भोजन करते समय सही नहीं
आपका चिंतन सही नहीं इसलिए देखो संत जनों का जब कभी प्रसाद पाने पहले नाम कीर्तन होता है फिर बहुत से जय जयकार लिखते हैं और बीच-बीच में जोर-जोर से राधे श्याम की गुण कि आपका चिंतन भागवत रहना चाहिए देखो ना हमें लगता है 10 मिनट तो केवल जय जयकार ही होती है जो द्या मधुरा की जय पूरे जितने अपने ठाकुर जी सबकी जय जय का वो रसगुल्ला की तरफ देख रहा है पर जय पूरी हो तब जय जय बोलना ही पड़ेगा कीर्तन करो यह कितनी सुंदर प्रणाली है भोजन बहुत सात्विक बहुत य जीवन बड़ा उज्जवल
भविष्य करने के लिए मिला है भोजन के समय पवित्र उच्च निर्भय शांत और भगवन नाम जप ऐसे भाव होने चाहिए उपासक को जिसे ब्रह्मचर्य रहना है दो समय भोजन हल्का या एक बार भर पेट 24 घंटे में पर्याप्त है ब्रह्मचारी के लिए दो बार तो हल्का केवल दो ही समय भोजन करें पहला भोजन का समय 10 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में दूसरा संध्या होने के बाद 8 बजे तक इसके बाद नहीं अगर इसके बाद आप पाते हैं तो आपकी दिनचर्या में फर्क पड़ेगा वो आपके कई दोष प्रकट कर दे देखो जीवन को
यदि आप मंगलमय प्रकाल बनाना चाहते हैं तो महापुरुषों के वचन मानने पड़ेंगे कोई भी बिना सदाचरण किए सुख शांति को नहीं प्राप्त होता आज हमारी सब दिनचर्या नष्ट हो गई है और हम चाहते हैं सुख शांति आनंद श्वर वैभव और आचरण हो रहे हैं दुख और अशांति और दरिद्रता आने वाले व आप चाह कैसी आचरण कैसे भोजन दो समय बहुत ध्यान से पहला 10 से एक बजे तक और मध्यान में भोजन पाने के बाद चाहे 15 मिनट ही हो आप विश्राम कीजिए दाएं बाए करवट सीधा ऐसे दिन अगर आपको रात में सोने से पर्याप्त नींद
हो जाती तो फिर दिन में सोने की जरूरत नहीं नाम चिंतन करते हुए फिर आप बैठ जाइए फिर अपनी दिनचर्या में लग शाम के 8 बजे तक भोजन हो ही जाना चाहिए क्योंकि घंटा आध घंटा टहलना अपनी दिनचर्या और फिर आप शयन कीजिए फिर आप जग जाइए समय से अगर आपको भगवत मार्ग में संयम पूर्वक चलना है तो आपको सुधारना होगा हमें लगता है प्रया जो अपने साधकों की दिन चर है शायद इसी के अंतर्गत ही है अगर आपका दो बार भोजन में विक्षेप पड़ता है तो एक बार भोजन अच्छे से पा लीजिए थोड़ा मध्यान
में विश्राम बस राधा राधा अगर चल जाए तो जैसे मिलता है आधा लीटर दूध या 2 स ग्राम जो भी शाम के उसको पी लीजिए मतलब ब्रह्मचारी को ज्यादा किसी पदार्थों की ताकत की जरूरत नहीं होती वो स्वयं में इतना अब अनावश्यक आप डालते रहोगे अनावश्यक तो फिर आपका चिंतन भी बिगड़ जाएगा आप नहीं संभाल पाओगे बहुत संयम की जरूरत है बहुत गरमागरम भोजन ब्रह्मचारी को नहीं करना चाहिए उसे आपके ब्रह्मचर्य पर फर्क पड़ जाएगा ताजा भोजन है पर धुआ नहीं उठना चाहिए शांत ये गरमागरम जैसे बिल्कुल नहीं भोजन हमेशा सात्विक ताजा सादा होना चाहिए
जो जैसे रोटी यह सब मठरी आद जैसे एक दो दिन मीठा आद एक दो दिन लेकिन जिसे रोटी आद यह शाम की बनी सुबह नहीं पाई जा सकती क्योंकि उससे फिर बुद्धि में प्रमाद और तमोगुण बढ़ने की चेष्टा बास अन अ भिक्षावृत्ति में यह बड़ी सामर्थ्य है कि हमारी ो बोली में मांगने पर जो आया व ब्रह्म स्वरूप है उसका कोई इन सतोगुण रजोगुण तमोगुण से कोई उसका प्रभाव नहीं य भिक्षा में बहुत बड़ी सामर्थ राधेश्याम बोला कोई पाच दिन की सूखी रोटी दे दे हमारे लिए अमृतम व नहीं होगा तो बाशी है क्या तमोगुण
पैदा करेगी नहीं व महा प्रसाद स्वरूप हो जाती है लेकिन अगर सुविधा है तो ताजन बहुत गरमागरम नहीं सात्विक और कम कम से बहुत लाभ होता है आपकी सारी जीवनी शक्ति आतो पचाने में लग जाती है अ एक बार पच नहीं पाया दोबारा फिर उतने जाड़ लिया तो भजन क्या करोगे थोड़ा जो जीवनी शक्ति है उसको आप ईश्वर के ध्यान में चिंतन में लगाने जिस दिन आप व्रत रहते जो एकादशी तो आप देखो उस दिन ज्यादा भजन होगा अल्पर अगर आप अन्न को उतना ही सीमित पाए जो आपके भजन में विक्षेप ना डाले य ठोस
ठोस के य तक भ तुम शरीर हो क्या तुम्हारा वि ये क्या अरे समझो बेकार को इस थैले को मोटा करते चले जा रहे हो ये थैला है उठने में परेशानी चलने में परेशानी बड़ी समस्या दिनचर्या करने में अब इतना बड़ा पेट हो गया तो दिनचर्या कैसे करें कैसे दिनचर्या होगी काहे को इतना खा रहे हो बोले वो घटाने की दवा ले रहे किसी दवा की जरूरत नहीं है सीधे मूंग की दाल उबा लो दो रोटी शुरू करो एक महीने में अगर तुम्हारी चर्बी ना कम हो जाए तो मैं बताना रोज सुबह टहल थोड़ा व्यायाम
करो अगर जानकारी हो तो जो योगी जन आपको प्राणायाम की पद्धतियां बता और सात्विक भोजन अपने आप ठीक हो जाओगे पाना है पीजा बरगल पाना है तुमको संसारी को अ चर्बी बढ़ती चली जा रही आगे पीछे ना उठने की सामर्थ्य ना बैठने की भाई वृद्ध हो गए हो तो बात अलग है यहां तो जवान जवान केसे मतलब ये पेट निकलना मतलब अपने जीवन को खोखला कर देना है बोलो अपनी दिनचर्या को कैसे कर पाओगे अब इतना मोटा शरीर बनाने से कोई लाभ नहीं है आप समझते हो स्वस्थ शरीर उसे नहीं कहते कि जितना मोटा हो
गया स्वस्थ शरीर आपकी दिनचर्या स्फूर्ति युक्त होनी चाहिए वो उचित हार से युक्ता हार विहार भगवान के वचन है य जो शब्द लिखे यह अच्छे पदार्थों को ठोस ठोस कर खाने का स्वभाव ये आपको संयम में नहीं रहने देगा बढ़िया काजू पड़ी किसमिस पड़ी खीर है हटाओ अरे किसको पिला रहे हो किसको ये रसेंद्र के संतों ने कहा है घाटी नीचे माटी इतने इतना का खेल है इतने के नीचे गया सब बेकार हो अब फूल रहा है गैस बन रही कब्ज बन रही डकार इधर घूम रहे उधर काहे को परेशानी मोल ले ली छोटी कटोरी
जरा सा राधा राधा स्वाद भी हो गया प्रसाद भी हो गया शरीर पुष्ट के लिए ब्रह्मचारी को काजू बादाम पिस्ता हलवा रबड़ी रसगुल्ला की नहीं आवश्यकता है प्रार्थना मान लीजिए नहीं जरूरत है अपने आप में एक महान बल धारण किए हुए है पर अब यही समस्या है कि ना संयम समझ पा रहे हो ना आहार को समय आहार तुम्हारा विषय नहीं है आपको ठीक प्राणों का पोषण करने के लिए उतना जल उतना अन्न उतना पौष्टिक आहार देना है जिससे हमारा मन हमारे कार्यों में हमारे अनुसार चले जो शास्त्र आज्ञा है बहुत नमकीन लाल मिर्च गरम
मसाला कचौड़ी पकौड़ी बहुत मिठाई चाय काफी प्याज लहसुन यह इंद्रियों को भयंकर चंचलता प्रदान करते हैं और वीर शक्ति का नाश करने में बहुत इनका योगदान है पूज्य पाद उड़िया बाबा से किसी ने कहा कि बा हम तो जहां भिक्षा मांगते हैं वहां पराया पकवान ही मिलता है बाबा ने कहा कोई बात नहीं अगर चार रोटी पाते हो तो दो कचौड़ी ले लीजिए बस हो गया कोई परेशानी नहीं होगी चार की है दो पा लीजिए एक बार पूज्य बाबा बहुत से सादर जन बाबा तो कुछ ऐसी कच्ची और मोटी पूड़ी बनवाई और कुछ हल्की एकदम
बहुत पकी हुई पूड़ी बनवाई पकी हुई पड़ियो को पहले परोसा गया उनके ऊपर कच्ची पुड़िया रख दी गई एक एक दो दो और बाबा खड़े हो गए आ भाई पाओ सब तो कुछ जो साधक संयमी थे तो ऊपर से शुरू किया और कुछ साधक जो स्वाद वाले थे वो ऊपर के हटा कर के बाबा रुक खड़े हो क्यों ऐसा किया व बाबा वो नीचे वाली पकी थी और ठंडी हो जाती हां घर जाओ बहू लो गरम गरम बनवा के पाओ बाबा जी बनने लायक नहीं हो अगर रसेंद्र की तृप्त रसेंद्र की पूर्णता की तुम्हारी भावना
है तो तुम नेंद्र को नहीं रोक सकते हो यह वैराग्य मार्ग है स्वयं बाबा बहुत महापुरुषों ने भगवत प्राप्ति के लिए स्वयं कष्ट को वर्ण किया गिरिराज में कोई बहुत बड़े धर्मात्मा पुरुष आए थे सब संतों को भंडारा कर रहे थे और उधर बाबा भी पहुंच गए तो सन्यासी महात्माओं के चरण धोकर वैसे ही आचार्य पद्धति से पवाया जाता था और जो बाहरी भिक्षु कैसे होते थे उनको लाइन में खड़ा किया जाता था बाबा लाइन में खड़े हुए जाके और उनको मोटी रोटी दी जाती थी और वहां खीर पकड़ी कचौड़ी ये सब ऐसे चलता था
वहां दक्षिणा भी दी जाती उनको केवल मोटी रोटी दी जाती थी ये कई दिन ऐसा उन्होंने सदाव्रत की तरह तो बाबा उस लाइन में खड़े हुए चार रोटी उनको मोटी मटी मिली आ गए और एकांत में दो रोटी पाई और दो रोटी जमीन में ऐसे गाड़ दी और जब पता चला कि पूज पाद उड़िया बाबा जी आए हुए हैं वही धर्मात्मा सेठ और सब अंगूर और सेव के झिया बड़ी बड़ी लेकर जहां बाबा प्रणाम साष्टांग बाबा हो भाग्य आपके बाबा चरण पधरा आए अंदर बोले हम तो ले आए हैं आपके यहां से कब बाबा बोले
ले आए हैं और दो पा चुके हैं दो कल पाएंगे ऐसे रज हटाई और दो अरे बाबा आप बोले यही तुम्हें हम समझाना चाहते थे कि आपको क्या पता कौन सा महापुरुष किस यह क्यों भेद जनित भोजन देते हो एक को ऐसे और एक को ऐसे एक दिन पवाओ लेकिन कम से ठीक है माना उनको सम्मान से बैठ के उनको खड़े खड़े लेकिन वही चीज दो जो सबके लिए बाबा कैसे महान पुरुष दो रोटी पाई दो पुराने संतों को देखो कैसे जीवन यापन हां देखो वही बाबा जो एक कवल पाकर 18 18 घंटा पद्मासन में
बैठते थे जब परिपक्व अवस्था 70 70 घरों में एक एक दिन में जाते थे भावना पुष्ट के लिए बाबा हमारा निमंत्रण हुआ गए एक दो कवल पाए ऐसे जरा जरा सब पाए ऐसे हम अभी भगवत प्राप्त नहीं हुए हैं तो हम लोगों की इंद्रिया मन बुद्धि संसार की तरफ जा रहे अब हमको संयम की आवश्यकता है यदि संयम का हम बर्ताव नहीं करेंगे तो सुन लो भोजन के पहले अच्छे से हाथ धो मुह में कुल्ला करो और लघु शंका लगी तो लघु शंका जाओ भोजन के पहले पवित्र हो भोजन पाते समय नाम चलना चाहिए या
पद चलना चाहिए या अच्छे कोई संत महापुरुषों के जो चरित्र है उनका चिंतन करना चाहिए खड़े भोजन नहीं पाना चाहिए लेटे भोजन नहीं पाना चाहिए चलते हुए नहीं पाना चाहिए प्रातः काल कल चर्चा हुई थी जो जल पान बड़ा औषधि का कार्य करता है ब्रह्मचारी को बाल भोग नहीं करना चाहिए सोचो भैया ब्रह्मचारी को बाल भोग नहीं कर 10 से एक के बीच में और 8 बजे तक शाम के भोज इतने में मर थोड़ी जाओगे अरे यार कई कई दिन भोजन नहीं मिला है कई कई दिन गंगा का लारा है गांव जाने का स्वभाव नहीं
था बस आकाश वृत्ति का सहारा था ये अगर आप बाल भोग नहीं करोगे तो आप क्या परेशानी हो जाएगी 10 11 वो तो मिलेगा ही आपको हमारे तो जीवन में था कि पता नहीं कब मिलेगा कहां मिलेगा कोई भरोसा नहीं कभी इतना गुड़ कोई दे दिया कभी वो जो गंगा किनारे बारी लगाते हैं वो ए बाबा दो पर्य लोगे भगवान दिए से मान के गंगा जी में बोरा पा लिया आपको तो निश्चित है कि आपको मिलेगा भोजन फिर आप बाल भोग क्यों बाल भोग पच नहीं पाया राज भोग डाल लिया वह पच नहीं पाया तो
आप बीमार हो जाओगे कब्ज हो जाएगी गैस बनेगी आपका भजन में मन नहीं लगेगा तो फिर वही प्रमाद की स्थिति आएगी भोजन होने के बाद 100 दो कदम चलना चाहिए टहल करके दिन में 15 20 मिनट विम रात्रि में भोजन के बाद आधा पौन घंटा नाम जप माला उठाओ छत में या कहीं जैसा हो आराम से भगवत चिंतन करते टलो य तुरंत पा करके फि कल बताया था उपासक को तीन लीटर पानी पीना ही चाहिए उससे पेशाब के द्वारा बहुत सी जो शरीर को कष्ट देने वाली व पित्ता सब तयार वो निकल जाते हैं कब्ज
की बीमारी पानी की कमी और गरिष्ठ पदार्थों के ने से होती है यह नहीं होना चाहिए तभी आप ब्रह्मचर्य जल पीते समय धीरे-धीरे आराम से पीना चाहिए गट गट गट ऐसे नहीं राधा राधा नाम लेते थोड़ा थोड़ा पाच मिनट में धीरे धीरे प्यास की पानी से ही बुझाए प्यास को सोडा वाटर लेमन या ठंडे पे पदार्थ जो सीसियो में आते हैं हा ये ब्रह्मचर्य संयमी भगवत मार्ग ये सब चीजें ले भाई आपको अमृत पान करना है राधा नाम सुधार सम रश तुम बहुत सावधान प्रकृति के विरुद्ध चलने से कभी कोई सुख का अनुभव नहीं कर
सकता बहुत सावधान भोजन के समय आपको पानी नहीं पीना है यह अभ्यास आपकी दिनचर्या में बहुत बाधा पहुंचा देगा यदि आप भोजन के साथ पानी पीते हैं गैस बनना शुरू हो जाएगी कब्ज बनना शुरू हो जाएगा आप परेशान हो जाएंगे अगर आपको भोजन में पानी की आवश्यकता लगती तो आप आधा घंटे पहले थोड़ा पानी पी लीजिए भोजन के आधा घंटा पहले और भोजन के समय बिल्कुल मत पीजिए और भोजन के आधा घंटा एक घंटा बाद आप छक के पानी पी लीजिए उतना जितना श्वास और भजन करने में परेशानी ना पड़े खड़े-खड़े पानी नहीं पीना चाहिए
रात्रि में सोने के समय गर्म दूध नहीं पीना चाहिए कि आप गरम गरम दूध पी रहे नहीं उसको एकदम शांत कर लीजिए दूध को जब धुआ ना रह जाए अगर दूध भी पीना है तो पीने के बाद 20-30 मिनट ना चाहिए नहीं दूध पीकर आप सो गए संयम में नहीं रह पाओगे प्रात काल उठते ही सूर्योदय के पहले यदि आपको सुविधा हो जाए एक तांबे का पात्र रखो और उसमें जल पूरी रात्रि भरा रख लो और वह पियो तो आपको बहुत संयम में सहयोग मिलेगा और रोगों के नाश में सहयोग मिलेगा तां पात्र में रात
का रखा हुआ जल यह नितांत सत्य है कि कोई भी नशा करने वाला ब्रह्मचारी नहीं रह सकता जो तबाकू और भांग गांजा अफीम इस तरह के कोई भी नश वह ब्रह्मचर्य नहीं टिकने देंगे इसलिए कोई भी नशा ना करें आलस्य अपने कर्तव्य कर्म में ना करें हृदय को बार-बार शीतल करता रहे ऐसा चिंतन करें संतुष्ट यन केनवा ऐसे चिंतन मत करो कि हृदय तुम्हारा जलता रहे यदि हम जो सुनी हुई आज सत्संग की बातें हैं इनको अपने जीवन में उतारे और पहली जीवन की प्रार्थना हमारी कि आपकी पहली सीढ़ी ब्रह्मचर्य है यदि आप य हस्त
क्रिया या किसी भी तरह से गंदी आदतें पूर्व संस्कार वश कुसंग वश है तो आप छोड़ दीजिए हिम्मत कीजिए एक बार जलि एक बार नियम ले लीजिए मैं ऐसा नहीं कर खानपान कीजिए और सोने का एक निश्चित समय रखिए और जिस समय आप ऐसी हरकतों को करते हैं वह समय आप माला लेकर बैठिए जब तक गाढ़ निद्रा का आवेश ना हो तब तक आप अपने को स्वतंत्र मत छोड़ दीजिए कि पड़े पड़े चिंतन फिर गड़बड़ हो जाएगा बिल्कुल ऐसा ही किया गया है जीवन में हां भोजन के बाद चलने के बाद वज्रासन में बैठकर जब
नींद आए तो कभी कोभी माला लिए कभी माला रखे और गुरु कृपा से जब ऐसी भावना बन जाती निरंतर मंत्र नाम जप चल रहा है वो बात अलग है पर आपको अपनी दिन च अब आपो ने जा रहे हैं आराम से दरवाजा बंद कि लेट गए और मोबाइल हाथ में सर्वनाश की स्थिति आप में आ ही जाएगी क्योंकि एकांत में मन बहुत बलवान होकर इंद्रियों के साथ भोगों का चिंतन करता है ये बिल्कुल सावधानी रख लीजिए बलवान इंद्री ग्राम विद्वान कर्ति जहां एकांत होंगे मोबाइल हाथ में वो आपको दुर्गति करने का बहुत बड़ा साधन बन
जाएगा पहला काम कमरे में जब जाओ स्विच ऑफ कर दो बिल्कुल जैसा कहे माला उठाओ या कोई महापुरुष का चरित्र उस समय पढ़ो वह आपको थप्पड़ की तरह लगेगा और चरित्र पढ़कर उसी के चिंतन करते हुए सो जाओ या माला लेकर के जप करते जब नींद आए तब सो जाओ कोई ऐसी चेष्टा मत करो जो तुम्हारे उत्साह को तुम्हारी जीवनी शक्ति को नष्ट करके नरक गामी बना दे बहुत बढ़िया अवसर मिला है निकल चलो प्यारे बार-बार आप देख रहे हो कि आपकी दुर्दशा कर रही चेष्टा एं आप जो कहते हो मैं छोड़ नहीं परा उसका
कारण है आपका निश्चय आप निश्चय ठीक नहीं कर पा रहे और नाम जप करो ऐसा निश्चय होगा आप इस सत्संग सुनकर मनन करो ऐसा निश्चय होगा कि निश्चित भगवान की कृपा से आप इस जीवन में संयम पूर्वक बर्ताव करते हुए भगवत प्राप्ति कर पाए श्री राधा वल्लभ लाल की